पाठ 9: मैया मैं नहिं माखन खायो
महाकवि सूरदास के पद • सरल भावार्थ • कठिन शब्दार्थ • संपूर्ण प्रश्नोत्तर
मैया मैं नहिं माखन खायो
महाकवि सूरदास का ब्रजभाषा पद — बाल-कृष्ण की मासूम शरारत और यशोदा माँ का अपार वात्सल्य
1कवि से परिचय
सूरदास का जन्म 15वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन मथुरा, गोवर्धन सहित ब्रज के क्षेत्रों में श्रीकृष्ण के गुणगान में भजन गाते हुए बिताया।
उनकी रचनाएँ ब्रजभाषा में उपलब्ध हैं। ये रचनाएँ इतनी सुंदर हैं कि आज भी लोगों के बीच बहुत प्रचलित हैं। उनकी अधिकतर कविताओं में श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का मनोहारी वर्णन है। ये कविताएँ अत्यंत लोकप्रिय हैं और देशभर में प्रेम से गायी जाती हैं। अपनी उत्कृष्ट रचनाओं के लिए वे महाकवि सूरदास कहलाते हैं। उनकी मृत्यु 16वीं शताब्दी में हुई थी।
2पाठ परिचय
प्रस्तुत पद में बाल-कृष्ण अपनी माँ यशोदा के सामने यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि उन्होंने माखन नहीं खाया है। वे तरह-तरह के मासूम तर्क देते हैं — कि वे तो सुबह से गाय चराने गए थे, वे अभी छोटे बालक हैं जिनकी भुजाएँ ऊँचे टँगे छीके तक नहीं पहुँच सकतीं, और यह तो साथी ग्वाल-बालों ने ईर्ष्यावश उनके मुँह पर ज़बरदस्ती माखन लपेट दिया है। अंत में यशोदा माँ कृष्ण की इन प्यारी बातों पर मुस्कुराकर उन्हें स्नेह से गले लगा लेती हैं। यह पद बाल-सुलभ मासूमियत और माँ के अपार वात्सल्य का सुंदर चित्रण करता है।
3मूल पाठ
मैया मैं नहिं माखन खायो।
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो।
चार पहर बंसीवट भटक्यो, साँझ परे घर आयो।।
मैं बालक बहियन को छोटो, छीको केहि बिधि पायो।
ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो।।
तू माता मन की अति भोरी, इनके कहे पतियायो।
जिय तेरे कछु भेद उपजि हैं, जानि परायो जायो।।
ये ले अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो।
सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो।।
— सूरदास
4सरल व्याख्या (भावार्थ)
भाग 1 — मुखड़ा
बाल-कृष्ण अपनी माँ यशोदा से कहते हैं — "हे माता! मैंने माखन नहीं खाया है।" वे अपनी इस बात को सिद्ध करने के लिए आगे कई तर्क देते हैं।
भाग 2 — सुबह से शाम तक का वृत्तांत
श्रीकृष्ण कहते हैं कि सुबह होते ही उन्हें गायों के पीछे (गाय चराने) मधुबन भेज दिया गया था। वे चार पहर (लगभग बारह घंटे) तक बंसीवट में भटकते रहे और शाम ढलने पर ही घर लौटे। इस तरह उन्हें माखन चुराकर खाने का अवसर ही नहीं मिला।
भाग 3 — छोटे बालक का तर्क और ग्वाल-बालों की शरारत
श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे अभी छोटे बालक हैं, उनकी भुजाएँ भी छोटी हैं, तो वे ऊँचे टँगे छीके तक कैसे पहुँच सकते हैं? वे आगे कहते हैं कि सभी ग्वाल-बाल उनसे ईर्ष्या रखते हैं, और उन्हीं लोगों ने ज़बरदस्ती उनके मुँह पर माखन लपेट (लीप) दिया है, ताकि उन्हें झूठा दोषी ठहराया जा सके।
भाग 4 — माँ को भोली बताकर बहलाना
श्रीकृष्ण चतुराई से कहते हैं कि हे माँ, तू तो मन की बहुत भोली है, इसीलिए दूसरों (ग्वाल-बालों) की बातों में आ गई। वे यह भी कहते हैं कि माँ के मन में ज़रूर कोई भेद (शंका) उत्पन्न हो गया है, तभी वह उन्हें पराया समझकर ऐसी बातें कह रही है।
भाग 5 — लाठी-कंबल लौटाना और यशोदा का दुलार
अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं — "यह लो अपनी लाठी और कंबल" (मानो वे कह रहे हों कि यदि माँ को विश्वास नहीं है तो वे गाय चराने ही नहीं जाएँगे), और इस तरह वे माँ को खूब नचाते (परेशान करते) हैं। सूरदास कहते हैं कि तब यशोदा माता मुस्कुराते हुए श्रीकृष्ण को अपने गले (कंठ) से लगा लेती हैं — उनकी सारी शिकायत स्नेह में बदल जाती है।
5शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मैया | माँ |
| भोर | सुबह |
| गैयन के पाछे | गायों के पीछे (गाय चराने) |
| मधुबन | मथुरा के पास यमुना के किनारे का एक वन |
| पठायो | भेज दिया |
| पहर | समय मापने की एक इकाई (एक पहर तीन घंटे का होता है) |
| बंसीवट | वह वट वृक्ष जहाँ श्रीकृष्ण चढ़कर बंसी बजाते और गायों को पुकारते थे |
| भटक्यो | इधर-उधर घूमा या भटका |
| साँझ परे | शाम होने पर |
| बहियन | बाँह, हाथ, भुजा |
| छीको | रस्सियों का बुना गोल जाल जो ऊँचाई पर टाँगा जाता है (खाने-पीने की चीज़ें सुरक्षित रखने हेतु) |
| केहि बिधि | किस प्रकार, कैसे |
| ग्वाल-बाल | गाय पालने वालों के बच्चे, श्रीकृष्ण के संगी साथी |
| बैर परे | दुश्मनी/ईर्ष्या रखते हैं |
| बरबस | ज़बरदस्ती, बलपूर्वक |
| लपटायो | मला, लगाया, पोता |
| भोरी | भोली |
| पतियायो | विश्वास किया, सच माना |
| जिय | मन, जी |
| कछु | कुछ |
| उपजि | उपजना, उत्पन्न होना |
| जानि | जानकर, समझकर |
| परायो | पराया, गैर |
| जायो | जन्मा (यहाँ भाव — समझ लिया) |
| लकुटि कमरिया | लाठी और छोटा कंबल (कमली) |
| बहुतहिं | बहुत ही |
| बिहँसि | मुसकाई, हँसी |
| जसोदा | यशोदा, श्रीकृष्ण की माँ |
| उर कंठ लगायो | हृदय/गले से लगा लिया |
6पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
मेरी समझ से (क)
- मैं माखन कैसे खा सकता हूँ? इसके लिए श्रीकृष्ण ने क्या तर्क दिया?
- मुझे तुम पराया समझती हो
- मेरी माता, तुम बहुत भोली हो
- मुझे यह लाठी-कंबल नहीं चाहिए
- मेरे छोटे-छोटे हाथ छीके तक कैसे जा सकते हैं? ✔
- श्रीकृष्ण माँ के आने से पहले क्या कर रहे थे?
- गाय चरा रहे थे ✔
- माखन खा रहे थे
- मधुबन में भटक रहे थे
- मित्रों के संग खेल रहे थे
मिलकर करें मिलान
| शब्द | सही अर्थ या संदर्भ |
|---|---|
| जसोदा | यशोदा, श्रीकृष्ण की माँ, जिन्होंने श्रीकृष्ण को पाला था। |
| पहर | समय मापने की एक इकाई (तीन घंटे का एक पहर होता है। एक दिवस में आठ पहर होते हैं)। |
| लकुटि कमरिया | लाठी और छोटा कंबल, कमली (मान्यता है कि श्रीकृष्ण लकुटि-कमरिया लेकर गाय चराने जाया करते थे)। |
| बंसीवट | एक वट वृक्ष (मान्यता है कि श्रीकृष्ण जब गाय चराया करते थे, तब वे इसी वृक्ष के ऊपर चढ़कर वंशी की ध्वनि से गायों को पुकारकर उन्हें एकत्रित करते)। |
| मधुबन | मथुरा के पास यमुना के किनारे का एक वन। |
| छीको | गोल पात्र के आकार का रस्सियों का बुना हुआ जाल जो छत या ऊँची जगह से लटकाया जाता है ताकि उसमें रखी हुई खाने-पीने की चीज़ों को कुत्ते, बिल्ली आदि न पा सकें। |
| माता | जन्म देने वाली, उत्पन्न करने वाली, जननी, माँ। |
| ग्वाल-बाल | गाय पालने वालों के बच्चे, श्रीकृष्ण के संगी साथी। |
पंक्तियों पर चर्चा
(क) "भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो।"
अर्थ — सुबह होते ही मुझे गायों के पीछे (गाय चराने) मधुबन भेज दिया गया।
(ख) "सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो।"
अर्थ — सूरदास कहते हैं कि तब यशोदा माता मुस्कुराते हुए श्रीकृष्ण को अपने गले (हृदय) से लगा लेती हैं।
सोच-विचार के लिए
(क) पद में श्रीकृष्ण ने अपने बारे में क्या-क्या बताया है?
श्रीकृष्ण बताते हैं कि उन्होंने माखन नहीं खाया; सुबह होते ही उन्हें गाय चराने मधुबन भेजा गया था; वे चार पहर बंसीवट में भटकते रहे और शाम को घर लौटे; वे अभी छोटे बालक हैं जिनकी भुजाएँ छोटी हैं, इसलिए वे ऊँचे टँगे छीके तक नहीं पहुँच सकते; और बाकी ग्वाल-बाल उनसे ईर्ष्या रखते हैं, जिन्होंने ज़बरदस्ती उनका मुँह माखन से लीप दिया है।
(ख) यशोदा माता ने श्रीकृष्ण को हँसते हुए गले से क्यों लगा लिया?
श्रीकृष्ण की मासूम, बाल-सुलभ तर्कपूर्ण बातें और उनका प्यारा बहाना सुनकर यशोदा माता का हृदय दुलार से भर गया। वे समझ गईं कि यह उनके प्रिय बालक की निश्छल शरारत भर है, इसलिए क्रोध की जगह स्नेह और हँसी के साथ उन्होंने कृष्ण को गले से लगा लिया।
कविता की रचना
(क)-(ख) इस पद को एक बार फिर से पढ़िए और अपने-अपने समूह में मिलकर इस पद की विशेषताओं की सूची बनाइए, जैसे इस पद की अंतिम पंक्ति में कवि ने अपना नाम भी दिया है।
इस पद की कुछ विशेषताएँ — (1) पूरा पद ब्रजभाषा में रचा गया है। (2) प्रत्येक दो पंक्तियों के जोड़े में तुक मिलती है, जैसे पठायो-आयो, पायो-लपटायो, पतियायो-जायो, नचायो-लगायो। (3) कवि ने अंतिम पंक्ति में अपना नाम 'सूरदास' भी दिया है — इसे 'भणिता' या 'छाप' कहा जाता है, जो भक्तिकालीन कविता की एक विशेषता है। (4) संवाद-शैली में लिखा गया है, जिसमें बाल-कृष्ण अपनी माँ से सीधे बात करते प्रतीत होते हैं। (5) पूरे पद में बाल-सुलभ मासूमियत और स्नेह का सुंदर चित्रण है।
अनुमान या कल्पना से
(क) श्रीकृष्ण अपनी माँ यशोदा को तर्क क्यों दे रहे होंगे?
क्योंकि वे स्वयं को माखन चुराकर खाने के आरोप से बचाना चाहते हैं और अपनी माँ को यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया, ताकि वे डाँट या सज़ा से बच सकें।
(ख) जब माता यशोदा ने श्रीकृष्ण को गले से लगा लिया, तब क्या हुआ होगा?
संभवतः यशोदा माता कृष्ण के मासूम बहाने और प्यारी बातें सुनकर मुस्कुराते हुए उन्हें दुलार करने लगी होंगी, और शायद स्नेहपूर्वक बिना किसी शिकायत की परवाह किए उन्हें फिर से प्रेम से माखन खिला दिया होगा।
शब्दों के रूप
"भोर भयो गैयन के पाछे" — इस पंक्ति में 'पाछे' शब्द आया है। इसके लिए 'पीछे' शब्द का उपयोग भी किया जाता है। इस पद में ऐसे कुछ और शब्द हैं जिन्हें आप कुछ अलग रूप में लिखते और बोलते होंगे। इन्हें आप जिस रूप में बोलते-लिखते हैं, उस प्रकार से लिखिए—
| पद का शब्द | प्रचलित/मानक रूप |
|---|---|
| परे | पड़े |
| छोटो | छोटा |
| बिधि | विधि |
| भोरी | भोली |
| कछु | कुछ |
| लै | ले |
| नहिं | नहीं |
पद में से कुछ शब्द चुनकर नीचे स्तंभ 1 में दिए गए हैं और स्तंभ 2 में उनके अर्थ दिए गए हैं। शब्दों का उनके सही अर्थों से मिलान कीजिए—
| स्तंभ 1 | स्तंभ 2 — सही अर्थ |
|---|---|
| उपजि | उपजना, उत्पन्न होना |
| जानि | जानकर, समझकर |
| जायो | जन्मा |
| जिय | मन, जी |
| पठायो | भेज दिया |
| पतियायो | विश्वास किया, सच माना |
| बहियन | बाँह, हाथ, भुजा |
| बिधि | प्रकार, भाँति, रीति |
| बिहँसि | मुसकाई, हँसी |
| भटक्यो | इधर-उधर घूमा या भटका |
| लपटायो | मला, लगाया, पोता |
वर्ण-परिवर्तन
ऐसे शब्द चुनकर लिखिए जिनमें 'ल'/'ड़' और 'र' में वर्ण-परिवर्तन हुआ है।
भोरी (भोली, ल→र), बरबस (बलात् से बना, ल→र)। विद्यार्थी अपने शिक्षक व साथियों की सहायता से ऐसे कुछ और उदाहरण खोजकर लिख सकते हैं, जैसे 'पालना/पारना' जैसे क्षेत्रीय बोली-भेद।
पंक्ति से पंक्ति
नीचे स्तंभ 1 में कुछ पंक्तियाँ दी गयी हैं और स्तंभ 2 में उनके भावार्थ दिए गए हैं। सही मिलान कीजिए—
| स्तंभ 1 — पंक्ति | स्तंभ 2 — भावार्थ |
|---|---|
| 1. भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो। | सुबह होते ही गायों के पीछे मुझे मधुबन भेज दिया। |
| 2. चार पहर बंसीवट भटक्यो, साँझ परे घर आयो। | चार पहर बंसीवट में भटकने के बाद सांझ होने पर घर आया। |
| 3. मैं बालक बहियन को छोटो, छीको केहि बिधि पायो। | मैं छोटा बालक हूँ, मेरी बाँहें छोटी हैं, मैं छीके तक कैसे पहुँच सकता हूँ? |
| 4. ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो। | ये सब सखा मुझसे बैर रखते हैं, इन्होंने मक्खन ज़बरदस्ती मेरे मुख पर लिपटा दिया। |
| 5. तू माता मन की अति भोरी, इनके कहे पतियायो। | माँ तुम मन की बड़ी भोली हो, इनकी बातों में आ गई हो। |
| 6. जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो। | तेरे हृदय में अवश्य कोई भेद है, जो मुझे पराया समझ लिया। |
पाठ से आगे — आपकी बात
"मैया मैं नहिं माखन खायो" — यहाँ श्रीकृष्ण अपनी माँ के सामने सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं कि उन्होंने माखन नहीं खाया है। कभी-कभी हमें दूसरों के सामने सिद्ध करना पड़ता है कि यह कार्य हमने नहीं किया। क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है? कब? किसके सामने? आपने अपनी बात सिद्ध करने के लिए कौन-कौन से तर्क दिए? उस घटना के बारे में बताइए।
(व्यक्तिगत उत्तर है) उदाहरण के लिए — एक बार घर में फूलदान टूट गया था और सबने मुझ पर शक किया, पर मैंने बताया कि मैं उस समय कमरे में था ही नहीं और खिड़की खुली होने से हवा से भी वह गिर सकता था। बाद में सच्चाई सामने आने पर सबको विश्वास हो गया कि गलती मेरी नहीं थी।
घर की वस्तुएँ
"मैं बालक बहियन को छोटो, छीको केहि बिधि पायो।" 'छीका' घर की एक ऐसी वस्तु है जिसे सैकड़ों-वर्षों से भारत में उपयोग में लाया जा रहा है। नीचे कुछ और घरेलू वस्तुओं के चित्र दिए गए हैं। इन्हें आपके घर में क्या कहते हैं?
चित्रों में दी गई वस्तुओं के नाम लिखिए।
घड़ा/मटका, इस्त्री (प्रेस), चौकी/पीढ़ा (छोटी लकड़ी की बैठकी), सिलाई मशीन, चारपाई/खटिया, मर्तबान/बरनी (अचार रखने का जार), सूपा (अनाज साफ़ करने की बाँस की टोकरी), परात (आटा गूँधने की थाली), डिब्बा/पिटारी, हाथ का पंखा, झाड़ू, छलनी, मसाला-दानी, ओखली-मूसल, मथानी/बिलौना (दही बिलोने का उपकरण)। (कुछ क्षेत्रीय नाम भिन्न हो सकते हैं — कठिनाई होने पर शिक्षक, परिजनों या इंटरनेट की सहायता ली जा सकती है।)
आप जानते ही हैं कि श्रीकृष्ण को मक्खन बहुत पसंद था। दूध से दही, मक्खन बनाया जाता है और मक्खन से घी बनाया जाता है। दूध से घी बनाने की प्रक्रिया लिखिए।
सबसे पहले गाय का दूध दुहा जाता है। फिर उस दूध को मिट्टी की हाँडी में उबाला जाता है। ठंडा होने पर उसमें जामन डालकर रात भर के लिए ढककर रख दिया जाता है, जिससे वह दही बन जाता है। सुबह उस दही को मथानी (बिलौना) से मथा जाता है, जिससे उसमें से मक्खन अलग होकर ऊपर आ जाता है और नीचे छाछ रह जाती है। इस मक्खन को इकट्ठा करके हाँडी में गर्म किया जाता है, जिससे वह पिघलकर घी में बदल जाता है और अंत में उसे साफ़ बर्तन/जार में भरकर रख लिया जाता है।
समय का माप
(क) 'पहर' और 'साँझ' शब्दों का प्रयोग समय बताने के लिए किया जाता है। समय बताने के लिए और कौन-कौन से शब्दों का प्रयोग किया जाता है? (संकेत — कल, ऋतु, वर्ष, अब, पखवाड़ा, दशक, वेला, अवधि आदि)
समय बताने के लिए इनके अतिरिक्त और भी शब्द प्रयोग किए जाते हैं, जैसे — क्षण, पल, घड़ी, घंटा, दिन, सप्ताह, पखवाड़ा, महीना, ऋतु, वर्ष, दशक, शताब्दी, युग, सुबह, दोपहर, शाम, रात, वेला, अवधि, अभी/अब, कल, परसों आदि।
(ख) श्रीकृष्ण के अनुसार वे कितने घंटे गाय चराते थे?
श्रीकृष्ण के अनुसार वे चार पहर गाय चराते थे। एक पहर तीन घंटे का होता है, इसलिए चार पहर = 4 × 3 = 12 घंटे।
(ग) मान लीजिए वे शाम को छह बजे गाय चराकर लौटे। वे सुबह कितने बजे गाय चराने के लिए घर से निकले होंगे?
यदि वे 12 घंटे गाय चराने के बाद शाम को 6 बजे लौटे, तो वे सुबह 6 बजे (6 बजे शाम से 12 घंटे पीछे) गाय चराने के लिए घर से निकले होंगे।
(घ) 'दोपहर' का अर्थ है 'दो पहर' का समय। जब दूसरे पहर की समाप्ति होती है और तीसरे पहर का प्रारंभ होता है, यह लगभग 12 बजे का समय होता है, जब सूर्य सिर पर आ जाता है। बताइए दिन के पहले पहर का प्रारंभ लगभग कितने बजे होगा?
यदि दूसरा पहर 12 बजे (दोपहर) समाप्त होता है और हर पहर तीन घंटे का होता है, तो दूसरा पहर सुबह 9 बजे से 12 बजे तक रहा होगा, और इससे पहले पहला पहर सुबह लगभग 6 बजे से 9 बजे तक रहा होगा। इसलिए दिन के पहले पहर का प्रारंभ लगभग सुबह 6 बजे होगा।
हम सब विशेष हैं
(क) महाकवि सूरदास दृष्टिबाधित थे। उनकी विशेष क्षमता थी उनकी कल्पना शक्ति और कविता रचने की कुशलता। हम सभी में कुछ न कुछ ऐसा होता है जो हमें सबसे विशेष और सबसे भिन्न बनाता है। नीचे दिए गए व्यक्तियों की विशेष क्षमताएँ क्या हैं, विचार कीजिए और लिखिए — आपकी, आपके किसी परिजन की, आपके शिक्षक की, आपके मित्र की।
(व्यक्तिगत उत्तर है) उदाहरण के लिए — मेरी विशेष क्षमता चित्रकारी करना है; मेरी माँ की विशेष क्षमता स्वादिष्ट भोजन बनाना है; मेरे शिक्षक की विशेष क्षमता कठिन विषयों को सरलता से समझाना है; मेरे मित्र की विशेष क्षमता अच्छा खेलना है।
(ख) एक विशेष क्षमता ऐसी भी है जो हम सबके पास होती है। वह क्षमता है सबकी सहायता करना, सबके भले के लिए सोचना। तो बताइए, इस क्षमता का उपयोग करके आप इनकी सहायता कैसे करेंगे —
• एक सहपाठी पढ़ना जानता है और उसे एक पाठ समझ में नहीं आ रहा है।
• एक सहपाठी को पढ़ना अच्छा लगता है और वह देख नहीं सकता।
• एक सहपाठी बहुत जल्दी-जल्दी बोलता है और उसे कक्षा में भाषण देना है।
• एक सहपाठी बहुत अटक-अटक कर बोलता है और उसे कक्षा में भाषण देना है।
• एक सहपाठी को चलने में कठिनाई है और वह सबके साथ दौड़ना चाहता है।
• एक सहपाठी प्रतिदिन विद्यालय आता है और उसे सुनने में कठिनाई है।
(व्यक्तिगत उत्तर है) उदाहरण के लिए — पहले सहपाठी को मैं धैर्यपूर्वक सरल शब्दों में और उदाहरण देकर पाठ समझाऊँगा/समझाऊँगी। दूसरे सहपाठी को मैं पाठ ज़ोर से पढ़कर सुनाऊँगा/सुनाऊँगी। तीसरे सहपाठी को धीरे और स्पष्ट बोलने का अभ्यास कराने में सहायता करूँगा/करूँगी। चौथे सहपाठी के साथ धैर्य रखूँगा/रखूँगी, उसे जल्दबाज़ी नहीं कराऊँगा/कराऊँगी और प्रोत्साहित करूँगा/करूँगी। पाँचवें सहपाठी को उसकी क्षमता के अनुसार खेल में शामिल करूँगा/करूँगी और सहारा दूँगा/दूँगी। छठे सहपाठी के पास बैठकर स्पष्ट और थोड़ा धीरे बोलूँगा/बोलूँगी, आवश्यकता पड़ने पर इशारों या लिखकर भी बात समझाऊँगा/समझाऊँगी।
आज की पहेली
दूध से मक्खन ही नहीं बल्कि और भी बहुत कुछ बनाया जाता है। ऊपर दूध से बनने वाली कुछ वस्तुओं के चित्र दिए गए हैं — जैसे रसगुल्ला, लस्सी, दही, पनीर, कुल्फी/श्रीखंड, मक्खन, मलाई, घी और दूध। दी गई शब्द-पहेली में उनके नाम के पहले अक्षर दे दिए गए हैं।
खोजबीन के लिए
7पाठ का सार — माइंड मैप
8अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'मैया मैं नहिं माखन खायो' पद के रचयिता कौन हैं?
इस पद के रचयिता महाकवि सूरदास हैं, जिनका जन्म 15वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। वे ब्रजभाषा में श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं के लिए प्रसिद्ध हैं।
श्रीकृष्ण माखन न खाने के लिए क्या-क्या तर्क देते हैं?
वे कहते हैं कि सुबह से गाय चराने गए थे, वे छोटे बालक हैं जिनकी भुजाएँ छीके तक नहीं पहुँच सकतीं, और ग्वाल-बालों ने ईर्ष्यावश ज़बरदस्ती उनके मुँह पर माखन लपेट दिया है।
'छीका' क्या है?
छीका रस्सियों का बुना हुआ गोल जाल है, जिसे ऊँचाई पर टाँगकर उसमें दूध-दही जैसी खाने-पीने की चीज़ें रखी जाती थीं, ताकि जानवर उन तक न पहुँच सकें।
यशोदा माता ने अंत में क्या किया?
श्रीकृष्ण की मासूम बातें सुनकर यशोदा माता मुस्कुराईं और उन्हें स्नेह से गले लगा लिया।
पद का मुख्य संदेश क्या है?
यह पद बाल-सुलभ मासूमियत, बुद्धिमत्तापूर्ण तर्क और माँ के अपार वात्सल्य का सुंदर संदेश देता है — एक माँ का प्रेम सारी शिकायतों से बढ़कर होता है।
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सुझाया गया शीर्षक: मैया मैं नहिं माखन खायो — कक्षा 6 हिंदी मल्हार पाठ 9: भावार्थ, शब्दार्थ और संपूर्ण प्रश्नोत्तर
मेटा विवरण: कक्षा 6 मल्हार पाठ 9 सूरदास रचित 'मैया मैं नहिं माखन खायो' का सरल भावार्थ, शब्द-संपदा, कवि परिचय और सभी पाठ्यपुस्तक प्रश्नों के हल — एक ही स्थान पर।
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