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दो गौरैया सारांश, व्याख्या व प्रश्नोत्तर — कक्षा 8 मल्हार पाठ 2

दो गौरैया – निबंध की व्याख्या और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 मल्हार

कक्षा 8 की हिंदी पाठ्यपुस्तक 'मल्हार' (NCERT, 2026-27 संस्करण) के दूसरे पाठ 'दो गौरैया' में प्रसिद्ध कथाकार भीष्म साहनी अपने ही घर में घटी एक रोचक, हास्यपूर्ण किंतु गहरे भाव से भरी घटना सुनाते हैं — कैसे एक घर में इंसानों के साथ-साथ चूहे, बिल्ली, कबूतर, चमगादड़ और दो गौरैयों का एक साथ बसेरा हो जाता है, और कैसे गौरैयों को भगाने पर तुले पिताजी का दिल अंततः पिघल जाता है। इस लेख में आपको लेखक-परिचय, पाठ की पृष्ठभूमि, मूल पाठ, सरल व्याख्या, कठिन शब्दों के अर्थ, पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर, अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न (MCQ सहित), माइंड मैप और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न — सब कुछ एक ही जगह मिलेगा।

लेखक परिचय

भीष्म साहनी (1915–2003)

भीष्म साहनी हिंदी साहित्य के बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न लेखक थे। उन्होंने अपनी कहानियों में देश-विभाजन और मानवीय मूल्यों की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'तमस' पर उन्हें 1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। साहित्य में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1998 में पद्म भूषण से अलंकृत किया था। बच्चों के लिए उन्होंने 'गुलेल का खेल' आदि कई कहानियाँ लिखी हैं।

  • जन्म — 8 अगस्त 1915, रावलपिंडी (अविभाजित भारत); निधन — 11 जुलाई 2003
  • प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी के छोटे भाई; लाहौर से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए.
  • भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) और प्रगतिशील लेखक संघ से गहरा जुड़ाव; कुछ वर्ष मास्को में रूसी साहित्य का हिंदी अनुवाद भी किया
  • कहानी-संग्रह — भाग्य रेखा, पहला पाठ, भटकती राख, वाङचू, पाली, डायन आदि; नाटक — हानूश, कबिरा खड़ा बाज़ार में, माधवी

पाठ परिचय

'दो गौरैया' एक संस्मरणात्मक निबंध है, जिसमें भीष्म साहनी अपने ही घर की एक सहज, रोजमर्रा की घटना को इतनी सजीवता और हास्य-व्यंग्य के साथ प्रस्तुत करते हैं कि वह पाठक के मन पर गहरी छाप छोड़ जाती है। निबंध की शुरुआत में लेखक बताते हैं कि उनके घर में केवल तीन व्यक्ति — माँ, पिताजी और लेखक स्वयं — रहते हैं, पर पिताजी के अनुसार असली घर तो वह है जिसमें आँगन के आम के पेड़ पर तोते, कौवे और गौरैयाँ डेरा डाले रहते हैं, और घर के भीतर चूहे, बिल्ली, चमगादड़, कबूतर, छिपकलियाँ, बर्रे और चींटियाँ तक अपना बसेरा बनाए हुए हैं। इसी पृष्ठभूमि में जब दो गौरैयाँ घर में घुसकर बैठक के पंखे के गोले में अपना घोंसला बना लेती हैं, तो घर में एक हास्यपूर्ण किंतु मार्मिक संघर्ष छिड़ जाता है।

निबंध का केंद्रीय द्वंद्व पिताजी और गौरैयों के बीच है — पिताजी हर तरह से गौरैयों को घर से निकालने का प्रयास करते हैं (ताली बजाना, नाचना, लाठी चलाना, दरवाजे बंद करना, अंततः घोंसला ही तोड़ने का प्रयास करना), जबकि माँ हर बार व्यंग्य और हास्य के साथ पिताजी का मज़ाक उड़ाती हुई परोक्ष रूप से गौरैयों का पक्ष लेती हैं। कहानी का सबसे मार्मिक क्षण तब आता है जब पिताजी घोंसला तोड़ ही रहे होते हैं कि अंडों से निकली नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ चीं-चीं करके अपने माता-पिता को पुकारने लगती हैं — यह दृश्य पिताजी के कठोर हृदय को पिघला देता है और वे चुपचाप गौरैयों को घर में रहने देने का निर्णय लेते हैं।

इस निबंध की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भाषा-शैली है — सरल, संवादात्मक, हास्य-व्यंग्य से भरपूर, और साथ ही मनुष्य व प्रकृति के बीच सह-अस्तित्व, करुणा और ममता जैसे गंभीर भावों को भी सहज ढंग से उभारने वाली। यह निबंध हमें सिखाता है कि छोटे-से-छोटा प्राणी भी अपने परिवार और घर के प्रति उतना ही गहरा लगाव रखता है जितना मनुष्य, और कठोरतम व्यक्ति का हृदय भी ममता के आगे पिघल सकता है।

मूल पाठ

घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं— माँ, पिताजी और मैं। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं।

आँगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं। जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। यहाँ कभी तोते पहुँच जाते हैं, तो कभी कौवे और कभी तरह-तरह की गौरैयाँ। वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं!

घर के अंदर भी यही हाल है। बीसियों तो चूहे बसते हैं। रात-भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते फिरते हैं। वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। बर्तन गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं, प्याले टूटते हैं। एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है। एक दूसरा है जिसे बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठना पसंद है। उसे शायद गरमी बहुत लगती है। बिल्ली हमारे घर में रहती तो नहीं मगर घर उसे भी पसंद है और वह कभी-कभी झाँक जाती है। मन आया तो अंदर आकर दूध पी गई, न मन आया तो बाहर से ही 'फिर आऊँगी' कहकर चली जाती है। शाम पड़ते ही दो-तीन चमगादड़ कमरों के आर-पार पर फैलाए कसरत करने लगते हैं। घर में कबूतर भी हैं। दिन-भर 'गुटर-गूँ गुटर-गूँ' का संगीत सुनाई देता रहता है। इतने पर ही बस नहीं, घर में छिपकलियाँ भी हैं और बर्रे भी हैं और चींटियों की तो जैसे फौज ही छावनी डाले हुए है।

अब एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं। पिताजी कहने लगे कि मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं। कभी वे किसी रोशनदान पर जा बैठतीं, तो कभी खिड़की पर। फिर जैसे आई थीं वैसे ही उड़ भी गईं। पर दो दिन बाद हमने क्या देखा कि बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उन्होंने अपना बिछावन बिछा लिया है और सामान भी ले आई हैं और मजे से दोनों बैठी गाना गा रही हैं। जाहिर है, उन्हें घर पसंद आ गया था।

माँ और पिताजी दोनों सोफे पर बैठे उनकी ओर देखे जा रहे थे। थोड़ी देर बाद माँ सिर हिलाकर बोलीं, "अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।"

इस पर पिताजी को गुस्सा आ गया। वह उठ खड़े हुए और बोले, "देखता हूँ ये कैसे यहाँ रहती हैं। गौरैयाँ मेरे आगे क्या चीज हैं! मैं अभी निकाल बाहर करता हूँ।"

"छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" माँ ने व्यंग्य से कहा।

माँ कोई बात व्यंग्य में कहें, तो पिताजी उबल पड़ते हैं, वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक उड़ा रही हैं। वह फौरन उठ खड़े हुए और पंखे के नीचे जाकर जोर से ताली बजाई और मुँह से 'श...शू' कहा, बाँहें झुलाईं, फिर खड़े-खड़े कूदने लगे, कभी बाँहें झुलाते, कभी 'श...शू' करते।

गौरियों ने घोंसले में से सिर निकालकर नीचे की ओर झाँककर देखा और दोनों एक साथ 'चीं-चीं' करने लगीं। और माँ खिलखिलाकर हँसने लगीं।

पिताजी को गुस्सा आ गया, "इसमें हँसने की क्या बात है?"

माँ को ऐसे मौकों पर हमेशा मजाक सूझता है। हँसकर बोली, "चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?"

तब पिताजी को और भी ज्यादा गुस्सा आ गया और वह पहले से भी ज्यादा ऊँचा कूदने लगे।

गौरियाँ घोंसले में से निकलकर दूसरे पंखे के डैने पर जा बैठीं। उन्हें पिताजी का नाचना जैसे बहुत पसंद आ रहा था। माँ फिर हँसने लगीं, "ये निकलेंगी नहीं, जी। अब इन्होंने अंडे दे दिए होंगे।"

"निकलेंगी कैसे नहीं?" पिताजी बोले और बाहर से लाठी उठा लाए। इसी बीच गौरियाँ फिर घोंसले में जा बैठी थीं। उन्होंने लाठी ऊँची उठाकर पंखे के गोले को ठकोरा। 'चीं-चीं' करती गौरियाँ उड़कर पर्दे के डंडे पर जा बैठीं।

"इतनी तकलीफ करने की क्या जरूरत थी। पंखा चला देते, तो ये उड़ जातीं" माँ ने हँसकर कहा।

पिताजी लाठी उठाए पर्दे के डंडे की ओर लपके। एक गौरैया उड़कर किचन के दरवाजे पर जा बैठी। दूसरी सीढ़ियों वाले दरवाजे पर।

माँ फिर हँस दी। "तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाजे खुले हैं और तुम गौरियों को बाहर निकाल रहे हो। एक दरवाजा खुला छोड़ो, बाकी दरवाजे बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी।"

अब पिताजी ने मुझे झिड़ककर कहा, "तू खड़ा क्या देख रहा है? जा, दोनों दरवाजे बंद कर दे!"

मैंने भागकर दोनों दरवाजे बंद कर दिए केवल किचन वाला दरवाजा खुला रहा।

पिताजी ने फिर लाठी उठाई और गौरियों पर हमला बोल दिया। एक बार तो झूलती लाठी माँ के सिर पर लगते-लगते बची। चीं-चीं करती चिड़ियाँ कभी एक जगह तो कभी दूसरी जगह जा बैठतीं। आखिर दोनों किचन की ओर खुलने वाले दरवाजे में से बाहर निकल गईं। माँ तालियाँ बजाने लगीं। पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे।

"आज दरवाजे बंद रखो" उन्होंने हुक्म दिया। "एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देंगी।"

तभी पंखे के ऊपर से चीं-चीं की आवाज सुनाई पड़ी। और माँ खिलखिलाकर हँस दी। मैंने सिर उठाकर ऊपर की ओर देखा, दोनों गौरियाँ फिर अपने घोंसले में मौजूद थीं।

"दरवाजे के नीचे से आ गई हैं," माँ बोलीं।

मैंने दरवाजे के नीचे देखा। सचमुच दरवाजों के नीचे थोड़ी-थोड़ी जगह खाली थी।

पिताजी को फिर गुस्सा आ गया। माँ मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थीं।

अब तो पिताजी गौरियों पर पिल पड़े। उन्होंने दरवाजों के नीचे कपड़े ठूँस दिए ताकि कहीं कोई छेद बचा नहीं रह जाए। और फिर लाठी झुलाते हुए उन पर टूट पड़े। चिड़ियाँ चीं-चीं करती फिर बाहर निकल गईं। पर थोड़ी ही देर बाद वे फिर कमरे में मौजूद थीं। अबकी बार वे रोशनदान में से आ गई थीं जिसका एक शीशा टूटा हुआ था।

"देखो—जी, चिड़ियों को मत निकालो," माँ ने अबकी बार गंभीरता से कहा, अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे। अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी।

"क्या मतलब? मैं कालीन बरबाद करवा लूँ?" पिताजी बोले और कुर्सी पर चढ़कर रोशनदान में कपड़ा ठूँस दिया और फिर लाठी झुलाकर एक बार फिर चिड़ियों को खदेड़ दिया। दोनों पिछले आँगन की दीवार पर जा बैठीं।

इतने में रात पड़ गई। हम खाना खाकर ऊपर जाकर सो गए। जाने से पहले मैंने आँगन में झाँककर देखा, चिड़ियाँ वहाँ पर नहीं थीं। मैंने समझ लिया कि उन्हें अक्ल आ गई होगी। अपनी हार मानकर किसी दूसरी जगह चली गई होंगी।

दूसरे दिन इतवार था। जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं। पिताजी ने फिर लाठी उठा ली। उस दिन उन्हें गौरियों को बाहर निकालने में बहुत देर नहीं लगी।

अब तो रोज यही कुछ होने लगा। दिन में तो वे बाहर निकाल दी जातीं पर रात के वक्त जब हम सो रहे होते, तो न जाने किस रास्ते से वे अंदर घुस आतीं।

पिताजी परेशान हो उठे। आखिर कोई कहाँ तक लाठी झुला सकता है? पिताजी बार-बार कहें, "मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।" पर आखिर वह भी तंग आ गए थे आखिर जब उनकी सहनशीलता चुक गई तो वह कहने लगे कि वह गौरियों का घोंसला नोचकर निकाल देंगे। और वह फौरन ही बाहर से एक स्टूल उठा लाए।

घोंसला तोड़ना कठिन काम नहीं था। उन्होंने पंखे के नीचे फर्श पर स्टूल रखा और लाठी लेकर स्टूल पर चढ़ गए "किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए," उन्होंने गुस्से से कहा।

घोंसले में से अनेक तिनके बाहर की ओर लटक रहे थे, गौरियों ने सजावट के लिए मानो झालर टाँग रखी हो। पिताजी ने लाठी का सिरा सूखी घास के तिनकों पर जमाया और दाईं ओर को खींचा। दो तिनके घोंसले में से अलग हो गए और फरफराते हुए नीचे उतरने लगे।

"चलो, दो तिनके तो निकल गए" माँ हँसकर बोली, "अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे?"

तभी मैंने बाहर आँगन की ओर देखा और मुझे दोनों गौरियाँ नजर आईं। दोनों चुपचाप दीवार पर बैठी थीं। इस बीच दोनों कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं। अब वे चहक भी नहीं रही थीं।

अब पिताजी लाठी का सिरा घास के तिनकों के ऊपर रखकर वहीं रखे-रखे घुमाने लगे। इससे घोंसले के लंबे-लंबे तिनके लाठी के सिरे के साथ लिपटने लगे। वे लिपटते गए, लिपटते गए और घोंसला लाठी के इर्द-गिर्द खिंचता चला आने लगा। फिर वह खींच-खींचकर लाठी के सिरे के इर्द-गिर्द लपेटा जाने लगा। सूखी घास और रुई के फाहे और धागे और थिगलियाँ लाठी के सिरे पर लिपटने लगीं। तभी सहसा जोर की आवाज आई, "चीं-चीं, चीं-चीं!!!"

पिताजी के हाथ ठिठक गए। यह क्या? क्या गौरियाँ लौट आई हैं? मैंने झट से बाहर की ओर देखा। नहीं, दोनों गौरियाँ बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी थीं।

"चीं-चीं चीं-चीं!" फिर आवाज आई। मैंने ऊपर देखा। पंखे के गोले के ऊपर से नन्हीं-नन्हीं गौरियाँ सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं-चीं किए जा रही थीं। अभी भी पिताजी के हाथ में लाठी थी और उस पर लिपटा घोंसले का बहुत-सा हिस्सा था। नन्हीं-नन्हीं दो गौरियाँ! वे अभी भी झाँके जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं, हमारे माँ-बाप कहाँ हैं?

मैं अवाक् उनकी ओर देखता रहा। फिर मैंने देखा, पिताजी स्टूल पर से नीचे उतर आए हैं और घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर उन्होंने लाठी को एक ओर रख दिया है और चुपचाप कुर्सी पर आकर बैठ गए। इस बीच माँ कुर्सी पर से उठीं और सभी दरवाजे खोल दिए। नन्हीं चिड़ियाँ अभी भी हाँफ-हाँफकर चिल्लाए जा रही थीं और अपने माँ-बाप को बुला रही थीं।

उनके माँ-बाप झट-से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुगा डालने लगे। माँ-पिताजी और मैं उनकी ओर देखते रह गए। कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।

— भीष्म साहनी

सरल व्याख्या

1. "घर सराय बना हुआ है" — घर का अनोखा परिचय

निबंध के आरंभ में लेखक बताते हैं कि उनके घर में केवल तीन व्यक्ति — माँ, पिताजी और वह स्वयं — रहते हैं, लेकिन पिताजी मजाक में कहते हैं कि यह घर तो 'सराय' (यात्रियों के अस्थायी ठहरने की जगह) बना हुआ है, क्योंकि घर के असली मालिक तो कोई और ही हैं। आँगन के आम के पेड़ पर तरह-तरह के पक्षी — तोते, कौवे, गौरैयाँ — इस तरह डेरा डाले रहते हैं मानो पूरे उत्तर भारत के पक्षियों को हमारे घर का पता मालूम हो। इनका शोर इतना तेज होता है कि कान के पर्दे फटने का डर लगे, फिर भी लोग विनम्रतापूर्वक कहते हैं कि पक्षी 'गा रहे हैं' — यहीं से निबंध का हास्य-व्यंग्य भरा स्वर शुरू हो जाता है।

2. घर के भीतर का जीव-जगत

घर के बाहर ही नहीं, भीतर भी जीव-जंतुओं का साम्राज्य है। बीसियों चूहे रात-भर एक कमरे से दूसरे कमरे में उछल-कूद करते हैं, जिससे बर्तन गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं और घर के लोग चैन से सो भी नहीं पाते। लेखक बड़ी रोचकता से बताते हैं कि एक चूहा सर्दी से बचने के लिए अँगीठी के पीछे बैठता है तो दूसरा गर्मी से राहत पाने के लिए बाथरूम की टंकी पर — मानो चूहे भी मनुष्यों की तरह मौसम के अनुसार अपनी जगह चुनते हों। बिल्ली घर में रहती तो नहीं, पर मन आने पर दूध पी जाती है और न आने पर 'फिर आऊँगी' कहकर चली जाती है (यह मानवीकरण निबंध की खास शैली है)। इसके अलावा चमगादड़, कबूतर, छिपकलियाँ, बर्रे और चींटियों की पूरी 'फौज' भी घर में मौजूद है — यह सब मिलकर यह अहसास कराता है कि यह घर वाकई एक 'सराय' जैसा बन चुका है, जहाँ अनगिनत मेहमान बेरोक-टोक आते-जाते हैं।

3. दो गौरैयों का आगमन और घोंसला बनाना

एक दिन दो गौरैयाँ सीधे घर में घुस आती हैं और बिना पूछे मकान का 'निरीक्षण' करने लगती हैं, मानो देख रही हों कि यह जगह रहने लायक है या नहीं। कुछ देर बाद वे उड़ जाती हैं, पर दो दिन बाद पता चलता है कि उन्होंने बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में अपना घोंसला बना लिया है, सामान भी जमा लिया है और मजे से गाना गा रही हैं। माँ इसे देखकर तुरंत भाँप लेती हैं कि अब गौरैयों को निकालना आसान नहीं होगा — "पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।" यह पंक्ति निबंध की एक महत्वपूर्ण सीख को भी दर्शाती है — किसी चीज़ को जड़ जमाने से पहले रोकना आसान होता है, बाद में उसे हटाना कठिन हो जाता है।

4. पिताजी का गुस्सा और माँ का व्यंग्य

माँ की बात सुनते ही पिताजी को गुस्सा आ जाता है और वे गौरैयों को तुरंत निकाल बाहर करने की ठान लेते हैं। माँ व्यंग्य से कहती हैं, "छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" — यह व्यंग्य पिताजी को और भड़का देता है, क्योंकि वे इसे अपनी क्षमता पर सीधा प्रहार और अपना मजाक समझते हैं। यहीं से निबंध का हास्यपूर्ण संघर्ष शुरू होता है, जो निबंध के अंत तक चलता रहता है।

5. पिताजी का अनोखा प्रयास — नाचना, ताली बजाना

गुस्से में पिताजी पंखे के नीचे जाकर जोर से ताली बजाते हैं, 'श...शू' कहते हैं और उछल-उछलकर नाचने लगते हैं। पर इसका उल्टा असर होता है — गौरैयाँ डरने के बजाय घोंसले से सिर निकालकर 'चीं-चीं' करने लगती हैं मानो पिताजी का नाचना देखकर मनोरंजन ले रही हों, और माँ भी हँस-हँसकर कहती हैं कि चिड़ियाँ आपस में पूछ रही हैं कि "यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?" यह पूरा दृश्य निबंध का सबसे हास्यप्रद हिस्सा है, जहाँ पिताजी की गंभीर कोशिश हास्यास्पद बन जाती है।

6. लाठी का प्रयोग और गौरैयों की चतुराई

पिताजी गुस्से में और ज्यादा ऊँचा कूदते हैं, फिर लाठी लेकर आते हैं और पंखे के गोले को ठकोरते हैं। गौरैयाँ उड़कर पर्दे के डंडे पर, फिर किचन और सीढ़ियों के दरवाजों पर जा बैठती हैं। माँ फिर व्यंग्य करती हैं कि सारे दरवाजे खुले रखकर चिड़ियों को निकालना मूर्खता है — एक दरवाजा खुला छोड़कर बाकी बंद कर देने चाहिए। लेखक (बालक कथावाचक) दौड़कर दरवाजे बंद करता है, और अंततः लाठी के प्रहार से गौरैयाँ किचन वाले दरवाजे से बाहर निकल जाती हैं। पिताजी विजयी भाव से "छाती फैलाए" कुर्सी पर बैठ जाते हैं और आदेश देते हैं कि दरवाजे बंद रखे जाएँ।

7. गौरैयों की वापसी — दरवाजों के नीचे से और रोशनदान से

पिताजी की खुशी अधिक देर टिकती नहीं। जल्द ही ऊपर से फिर 'चीं-चीं' सुनाई पड़ती है — गौरैयाँ दरवाजों के नीचे बची खाली जगह से रेंगकर अंदर आ गई हैं। पिताजी फिर गुस्से में आकर दरवाजों के नीचे कपड़े ठूँस देते हैं और लाठी झुलाकर गौरैयों को भगाते हैं, पर वे इस बार टूटे शीशे वाले रोशनदान से अंदर आ जाती हैं। माँ अब गंभीरता से समझाती हैं कि गौरैयों ने शायद अंडे भी दे दिए होंगे, इसलिए वे अब कहीं नहीं जाएँगी — पर पिताजी इसे स्वीकार नहीं करते और रोशनदान भी बंद करवाकर गौरैयों को फिर खदेड़ देते हैं।

8. रात की अस्थायी हार, इतवार को फिर संघर्ष

रात होने पर परिवार खाना खाकर सो जाता है। जाते समय लेखक आँगन में झाँककर देखता है — चिड़ियाँ वहाँ नहीं होतीं, और वह मान लेता है कि उन्होंने हार मानकर कहीं और ठिकाना ढूँढ़ लिया होगा। पर अगले दिन (इतवार) जब सब नीचे आते हैं, गौरैयाँ फिर मौजूद हैं और मजे से 'मल्हार' गा रही हैं। पिताजी फिर लाठी उठाते हैं और उन्हें निकाल देते हैं। अब यह रोज़ का सिलसिला बन जाता है — दिन में गौरैयाँ बाहर निकाल दी जातीं, पर रात को न जाने किस रास्ते से अंदर घुस आतीं।

9. पिताजी की जिद — घोंसला तोड़ने का निर्णय

रोज-रोज के इस संघर्ष से पिताजी परेशान हो उठते हैं, फिर भी बार-बार दोहराते हैं, "मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।" पर आखिरकार जब उनकी सहनशीलता चुक जाती है, तो वे स्टूल लाकर पंखे के नीचे चढ़ जाते हैं और घोंसला ही नोच-नोचकर तोड़ने लगते हैं, यह कहते हुए कि "किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए।" यह पंक्ति दिखाती है कि जब सामान्य उपाय असफल हो जाते हैं, तो व्यक्ति अंतिम, कठोरतम कदम उठाने पर उतर आता है — भले ही उसका परिणाम विनाशकारी हो।

10. गौरैयों की उदासी और घोंसले का उजड़ना

घोंसला टूटता देख दोनों गौरैयाँ बाहर दीवार पर चुपचाप बैठी रहती हैं। लेखक बताते हैं कि इस दौरान वे कुछ-कुछ दुबली और काली पड़ गई थीं और अब चहक भी नहीं रही थीं — यह उनके भीतर के गहरे तनाव, चिंता और असहायता को दर्शाता है, मानो अपने घर को उजड़ते देखकर वे शोकाकुल हो गई हों। माँ तिनके गिरते देखकर व्यंग्य में कहती हैं, "अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे?" — जो पिताजी की धीमी, थकाऊ कोशिश पर एक हल्का कटाक्ष है।

11. नन्हीं गौरैयों की पुकार और पिताजी का हृदय-परिवर्तन

पिताजी जब लाठी के सिरे पर घोंसले के तिनके लपेटकर उसे पूरी तरह उखाड़ने ही वाले होते हैं, तभी अचानक जोरदार "चीं-चीं" की आवाज़ सुनाई देती है। सब चौंक जाते हैं — बाहर की गौरैयाँ तो चुपचाप बैठी हैं, पर ऊपर घोंसले में से नन्हीं-नन्हीं (अभी-अभी अंडों से निकली) गौरैयाँ सिर निकालकर पुकार रही हैं, मानो कह रही हों — "हम आ गई हैं, हमारे माँ-बाप कहाँ हैं?" यह दृश्य निबंध का चरम बिंदु है। यह देखकर पिताजी के हाथ ठिठक जाते हैं, वे चुपचाप स्टूल से नीचे उतर आते हैं, लाठी एक ओर रख देते हैं और कुर्सी पर बैठ जाते हैं। माँ तुरंत उठकर सभी दरवाजे खोल देती हैं ताकि गौरैयों के माता-पिता अंदर आ सकें।

12. मिलन का सुखद दृश्य और निबंध का समापन

माता-पिता गौरैयाँ झट से उड़कर अंदर आती हैं, चीं-चीं करते हुए अपने बच्चों से मिलती हैं और उनकी नन्हीं चोंचों में चुगा डालती हैं। घर में फिर से वही पुराना शोर होने लगता है, पर अब पिताजी की प्रतिक्रिया पूरी तरह बदल चुकी है — वे गुस्सा करने की बजाय केवल मुसकराते रहते हैं। यह अंत निबंध को एक गहरा मानवीय संदेश देता है — ममता और कोमल भावनाओं के आगे कठोरतम इंसान का हृदय भी पिघल सकता है।

निबंध का सार / मूल संदेश

'दो गौरैया' निबंध हास्य-व्यंग्य के हल्के-फुल्के अंदाज़ में मनुष्य और प्रकृति के बीच सह-अस्तित्व का गहरा संदेश देता है। यह दिखाता है कि छोटे-से-छोटा प्राणी भी अपने घर-परिवार के प्रति उतनी ही ममता, संघर्षशीलता और लगाव रखता है जितना मनुष्य। साथ ही यह भी सिखाता है कि बल-प्रयोग और हठ से हर समस्या हल नहीं होती — कभी-कभी करुणा और समझ ही सच्चा समाधान देती हैं। पिताजी का चरित्र-परिवर्तन यह भी दर्शाता है कि क्रोध और अहंकार चाहे कितने भी प्रबल हों, ममता और निर्दोष जीवन के प्रति करुणा उन्हें अंततः पराजित कर देती है।

शब्द-संपदा

शब्दअर्थ
सराययात्रियों के अस्थायी ठहरने की जगह, धर्मशाला
डेरा डालनालंबे समय के लिए किसी स्थान पर ठहर जाना/बस जाना
धमा-चौकड़ीउछल-कूद, शोर-शराबे भरी भागदौड़
अँगीठीकोयले/लकड़ी जलाकर तापने का पात्र, सिगड़ी
कसरतव्यायाम, शारीरिक अभ्यास
गुटर-गूँकबूतर की बोली/आवाज़
छावनीसेना के ठहरने की जगह; यहाँ बड़ी संख्या में जमावड़े के अर्थ में
निरीक्षणबारीकी से जाँच-परख करना
बिछावनबिछाने का सामान, बिस्तर
व्यंग्यहँसी-मज़ाक या उलटे ढंग से कही गई बात जिसमें कटाक्ष छिपा हो
उबल पड़ना (मुहावरा)अचानक बहुत क्रोधित हो जाना
झिड़कनाडाँटना, कड़े स्वर में बोलना
हुक्मआदेश
पिल पड़ना (मुहावरा)पूरी शक्ति से टूट पड़ना, आक्रमण कर देना
खदेड़नाभगा देना, दूर हटा देना
अक्ल आना (मुहावरा)समझ आना, सही निर्णय लेने योग्य होना
सहनशीलता चुकनासहन करने की शक्ति समाप्त हो जाना, धैर्य टूट जाना
झालरसजावटी लटकन/किनारी
फरफरानाहल्की, फड़फड़ाहट की आवाज़ के साथ हिलना
थिगलीकपड़े का छोटा टुकड़ा जो जोड़ने/पैबंद के लिए लगाया जाता है
गुमसुमचुपचाप, उदास और शांत
अवाक् होनाआश्चर्य से चुप रह जाना, बोल न पाना
चुगानापक्षियों का अपने बच्चों की चोंच में दाना/भोजन डालना
मल्हारभारतीय शास्त्रीय संगीत का एक प्रसिद्ध राग, जो वर्षा ऋतु से जुड़ा है

पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर

आइए, अब हम इस निबंध को थोड़ी और स्पष्टता से समझते हैं। नीचे दी गई गतिविधियाँ इस कार्य में आपकी सहायता करेंगी।

मेरी समझ से

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।

(1) पिताजी ने कहा कि घर सराय बना हुआ है क्योंकि—

★ घर में विभिन्न पक्षी और जीव-जंतु रहते हैं। ★ घर में विभिन्न जीव-जंतु आते-जाते रहते हैं। (सराय में जैसे यात्री अस्थायी रूप से आते-जाते रहते हैं, वैसे ही इस घर में तरह-तरह के पक्षी और जीव-जंतु बेरोक-टोक आते-जाते और बसते रहते हैं।)

(2) कहानी में 'घर के असली मालिक' किसे कहा गया है?

★ जीव-जंतुओं को जो उस घर में रहते थे। (पिताजी का व्यंग्य है कि घर के तीन मानव-सदस्य तो जैसे मेहमान हैं, असली अधिकार तो घर में बसे पशु-पक्षियों का है।)

(3) गौरैयों के प्रति माँ और पिताजी की प्रतिक्रियाएँ कैसी थीं?

★ पिताजी ने उन्हें भगाने की कोशिश की लेकिन माँ ने मना किया। (पिताजी पूरे निबंध में लाठी, हुक्म और गुस्से से गौरैयों को निकालने की कोशिश करते रहे, जबकि माँ बार-बार व्यंग्य व हास्य से उन्हें रोकने और गौरैयों का पक्ष लेने का प्रयास करती रहीं।)

(4) माँ बार-बार पिताजी की बातों पर मुसकराती और मजाक करती थीं इससे क्या पता चलता है?

★ माँ चाहती थीं कि गौरैयाँ घर से भगाई न जाएँ। ★ माँ को गौरैयों की गतिविधियों पर हँसी आ जाती थी। (माँ का व्यवहार करुणा और विनोदप्रियता दोनों को एक साथ दर्शाता है।)

(5) कहानी में गौरैयों के बार-बार लौटने को जीवन के किस पहलू से जोड़ा जा सकता है?

★ अपने प्रयास को निरंतर जारी रखना। (चाहे कितनी भी बार भगाई जाएँ, गौरैयाँ हार नहीं मानतीं और नए-नए रास्तों से अपने घर लौटती रहती हैं — यह दृढ़ता और निरंतर प्रयास का प्रतीक है।)

(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?

यह चर्चा-आधारित गतिविधि है — विद्यार्थी समूह में अपने चुने गए उत्तरों के पक्ष में निबंध की पंक्तियों का हवाला देकर तर्क प्रस्तुत करें, जैसे प्रश्न (1) के लिए पंक्ति "जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है... वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है" का संदर्भ दिया जा सकता है।

मिलकर करें मिलान

(क) पाठ में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। प्रत्येक वाक्य के सामने दो-दो अर्थ दिए गए हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें इनके सबसे उपयुक्त अर्थ से मिलाइए।

क्रम व वाक्यसर्वाधिक उपयुक्त अर्थ
1. वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं!पक्षियों का शोर बहुत तेज होता है, लेकिन लोग उसे संगीत की तरह सराहते हैं।
2. आँगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं।आम के पेड़ पर अलग-अलग प्रकार के पक्षी हर समय निवास करते हैं।
3. वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते।चूहों की भागदौड़ और शोर इतना होता है कि घर के लोग चैन से सो नहीं पाते।
4. वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक उड़ा रही हैं।पिताजी को ऐसा भ्रम होने लगता है कि माँ उनकी चेष्टाओं का उपहास कर रही हैं।
5. पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे।पिताजी ने लाठी एक ओर रख दी और गर्व से, विजयी मुद्रा में बैठ गए।
6. इतने में रात पड़ गई।कहानी की घटनाओं के बीच धीरे-धीरे रात हो गई और अँधेरा छा गया।
7. जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं।गौरैयाँ फिर से लौट आई थीं और शांत व प्रसन्न भाव से चहचहा रही थीं जैसे कोई राग गा रही हों।

(ख) अपने उत्तर को अपने मित्रों के उत्तर से मिलाइए और विचार कीजिए कि आपने कौन-से अर्थ का चुनाव किया है और क्यों?

विद्यार्थी समूह-चर्चा में अपने चुनाव का कारण पाठ की भाषा-शैली (लाक्षणिक/मुहावरेदार प्रयोग बनाम शाब्दिक अर्थ) के आधार पर स्पष्ट करें।

पंक्तियों पर चर्चा

पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए।

(क) "अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।"

माँ की यह पंक्ति बताती है कि गौरैयों को शुरुआत में भगाना आसान होता, पर अब जब उन्होंने घोंसला बनाकर अपना घर बसा लिया है, तो उन्हें हटाना कठिन हो गया है। यह जीवन की एक बड़ी सच्चाई को भी दर्शाता है — किसी बात या समस्या को जड़ जमाने से पहले रोकना आसान होता है, बाद में उसे बदलना या हटाना कहीं अधिक कठिन हो जाता है।

(ख) "एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देंगी।"

यह पिताजी का आत्मविश्वास और जिद दर्शाने वाली पंक्ति है — वे मानते हैं कि दृढ़ता और लगातार प्रयास से गौरैयों को हरा सकते हैं। पर आगे की घटनाओं में उनका यह विश्वास गलत साबित होता है, क्योंकि गौरैयाँ बार-बार नए रास्तों से लौट आती हैं — यह दिखाता है कि केवल बल-प्रयोग या हठ से हर समस्या का समाधान संभव नहीं होता।

(ग) "किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए।"

यह पंक्ति पिताजी की हताशा और उनके अंतिम, कठोर निर्णय को दिखाती है — जब सामान्य उपाय असफल हो जाते हैं, तो व्यक्ति अधिक क्रूर उपाय अपनाने पर उतर आता है। साथ ही यह भी संकेत करती है कि बल-प्रयोग कई बार निर्दोष के आश्रय (घर) को नष्ट करने पर उतारू हो जाता है, भले ही अंततः वह उद्देश्य में सफल न हो — जैसा कि निबंध के अंत में होता है।

सोच-विचार के लिए

पाठ को पुनः ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए।

(क) आपको कहानी का कौन-सा पात्र सबसे अच्छा लगा — घर पर रहने आई गौरैयाँ, माँ, पिताजी, लेखक या कोई अन्य प्राणी? आपको उसकी कौन-कौन सी बातें अच्छी लगीं और क्यों?

विद्यार्थी अपनी पसंद के अनुसार उत्तर लिख सकते हैं; उदाहरण के लिए — माँ का पात्र सबसे अच्छा लगता है क्योंकि वह करुणाशील, विनोदप्रिय और संवेदनशील है। वह गौरैयों के मातृत्व और उनके संघर्ष को समझती है, और पिताजी की जिद पर हँसते हुए भी परोक्ष रूप से उन्हें सही राह दिखाने का प्रयास करती रहती है।

(ख) लेखक के घर में चिड़िया ने अपना घोंसला कहाँ बनाया? उसने घोंसला वहीं क्यों बनाया होगा?

बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में। यह जगह ऊँची, छत से ढकी, सुरक्षित और बिल्ली-चूहों जैसे शिकारियों की सीधी पहुँच से दूर थी, इसलिए गौरैयों को यह घोंसला बनाने के लिए उपयुक्त स्थान लगा होगा।

(ग) क्या आपको लगता है कि पशु-पक्षी भी मनुष्यों के समान परिवार और घर का महत्व समझते हैं? अपने उत्तर के समर्थन में कहानी से उदाहरण दीजिए।

हाँ। कहानी में गौरैयाँ बार-बार भगाए जाने पर भी लौटकर आती हैं, घोंसला बनाती हैं, अंडे देती हैं और अपने चूजों की देखभाल करती हैं — यह उनके घर व परिवार के प्रति गहरी ममता दिखाता है। अंत में जब चूजे पुकारते हैं, तो माँ-बाप गौरैयाँ तुरंत उड़कर आ जाती हैं और उन्हें चुगाने लगती हैं — यह उनके प्रबल पारिवारिक बंधन का प्रमाण है, जो मनुष्यों के परिवार-प्रेम से बहुत मिलता-जुलता है।

(घ) "अब मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ" इस कथन से पिताजी के स्वभाव के कौन-से गुण उभरकर आते हैं?

इस कथन से पिताजी की जिद, दृढ़ता, आत्मसम्मान और हार न मानने की प्रवृत्ति उभरती है। साथ ही यह उनके थोड़े हठी और अहंकारी स्वभाव को भी दर्शाता है, जो एक छोटी-सी बात (गौरैयों को घर से निकालना) को भी अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं।

(ङ) कहानी में गौरैयों के व्यवहार में कब और कैसा बदलाव आया? यह बदलाव क्यों आया? (संकेत — कहानी में खोजिए कि उन्होंने गाना कब बंद कर दिया।)

शुरू में गौरैयाँ खुशी से गाना गाती और चहकती थीं, पिताजी के नाचने-कूदने पर भी चीं-चीं करके मानो मज़ा ले रही थीं। लेकिन जब पिताजी बार-बार लाठी से उन्हें खदेड़ने लगे और अंततः घोंसला ही तोड़ने लगे, तो वे दुबली और उदास पड़ गईं तथा गाना/चहकना बिल्कुल बंद कर दिया। यह बदलाव उन पर बढ़ते डर, तनाव और असुरक्षा की भावना के कारण आया, जब उनका घर (घोंसला और उसमें छिपे अंडे) खतरे में पड़ गया।

(च) कहानी में गौरैयाँ ने किन-किन स्थानों से घर में प्रवेश किया? सूची बनाइए।

1. पहली बार सीधे खुले दरवाज़े से। 2. किचन की ओर खुलने वाले दरवाजे से। 3. दरवाजों के नीचे बची खाली जगह से रेंगकर। 4. टूटे शीशे वाले रोशनदान से।

(छ) इस कहानी को कौन सुना रहा है? आपको यह बात कैसे पता चली?

यह कहानी घर के बेटे यानी परिवार के तीसरे सदस्य (माँ, पिताजी और 'मैं') द्वारा प्रथम पुरुष ('मैं') में सुनाई जा रही है। यह बात बार-बार आए "मैंने देखा", "मुझे झिड़ककर कहा", "मैंने भागकर दरवाजे बंद किए" जैसे वाक्यों से स्पष्ट पता चलती है।

(ज) माँ बार-बार क्यों कह रही होंगी कि गौरैयाँ घर छोड़कर नहीं जाएँगी?

माँ को गौरैयों की मातृ-सुलभ ममता की गहरी समझ थी — वे जानती थीं कि गौरैयों ने अंडे दे दिए हैं और घोंसला बना लिया है, इसलिए वे अपने बच्चों और घर की सुरक्षा के लिए बार-बार लौटकर आएँगी, चाहे उन्हें कितनी भी बार भगाया जाए। शायद माँ यह भी चाहती थीं कि गौरैयाँ यहीं रह जाएँ।

अनुमान और कल्पना से

(क) कल्पना कीजिए कि आप उस घर में रहते हैं जहाँ चिड़ियाँ अपना घर बना रही हैं। अपने घर में उन्हें देखकर आप क्या करते?

विद्यार्थी अपनी कल्पना से लिखें — उदाहरण के लिए, मैं उन्हें परेशान न करते हुए दूर से उनकी गतिविधियाँ देखता, उनके लिए पानी और दाने की व्यवस्था करता और घर के सदस्यों को उन्हें न सताने के लिए समझाता, जब तक उनके चूजे उड़ने लायक न हो जाएँ।

(ख) मान लीजिए कि कहानी में चिड़िया नहीं, बल्कि नीचे दिए गए प्राणियों में से कोई एक प्राणी घर में घुस गया है। ऐसे में घर के लोगों का व्यवहार कैसा होगा? क्यों? (प्राणियों के नाम— चूहा, कुत्ता, मच्छर, बिल्ली, कबूतर, कॉकरोच, तितली, मक्खी)

उदाहरण के लिए, यदि कॉकरोच या चूहा घर में आ जाए तो लोग तुरंत उसे भगाने या मारने की कोशिश करेंगे क्योंकि इन्हें गंदगी व बीमारी फैलाने वाला माना जाता है; वहीं तितली या कबूतर के प्रति लोगों का रवैया अपेक्षाकृत सहनशील और कोमल होगा क्योंकि ये सुंदर व हानिरहित लगते हैं। इस तरह प्राणी के प्रति हमारा व्यवहार उसकी उपयोगिता, सुंदरता और सामाजिक धारणा पर निर्भर करता है, न कि केवल तर्क पर।

(ग) "मैं अवाक् उनकी ओर देखता रहा।" लेखक को विस्मय या हैरानी किसे देखकर हुई? उसे विस्मय क्यों हुआ होगा?

लेखक को घोंसले में से निकली दो नन्हीं-नन्हीं (नवजात) गौरैयों को देखकर विस्मय हुआ, जो चीं-चीं करके अपने माँ-बाप को पुकार रही थीं। उसे विस्मय इसलिए हुआ क्योंकि ठीक उसी क्षण जब पिताजी घोंसला तोड़ रहे थे, तभी अंडों से बच्चे निकल आए — यह अप्रत्याशित और भावुक कर देने वाला क्षण था, जिसने पूरी स्थिति को एक ही पल में पूरी तरह बदल दिया।

(घ) "माँ मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थीं।" माँ ने गौरैयों को निकालने में पिताजी की सहायता क्यों नहीं की होगी?

माँ के मन में गौरैयों के प्रति सहानुभूति और ममता थी — वे नहीं चाहती थीं कि गौरैयों को घर से निकाला जाए। साथ ही पिताजी का गुस्से में उछल-कूद करना और लाठी घुमाना उन्हें हास्यास्पद भी लग रहा था, इसलिए वे मदद करने के बजाय मज़ा लेकर हँस रही थीं।

(ङ) "एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है।" लेखक ने चूहे के विशेष व्यवहार से अनुमान लगाया कि उसे सर्दी लगती होगी। आप भी किसी एक अपरिचित व्यक्ति या प्राणी के व्यवहार को ध्यान से देखकर अनुमान लगाइए कि वह क्या सोच रहा होगा, क्या करता होगा या वह कैसा व्यक्ति होगा आदि। (संकेत— आपको उसके व्यवहार पर ध्यान देना है, उसके रंग-रूप या वेशभूषा पर नहीं)

यह अवलोकन-आधारित गतिविधि है — विद्यार्थी अपने आस-पास किसी व्यक्ति/प्राणी को देखकर उदाहरण लिखें; जैसे— पार्क में रोज एक ही बेंच पर अकेला बैठा व्यक्ति बार-बार अपनी घड़ी देखता है और गेट की ओर देखता रहता है, संभवतः वह किसी के आने का इंतज़ार कर रहा है।

(च) "पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है।" सराय और घर में कौन-कौन से अंतर होते होंगे?

सराय एक अस्थायी ठहरने का स्थान है, जहाँ अनजान यात्री थोड़े समय के लिए रुककर आगे बढ़ जाते हैं और जहाँ किसी का स्थायी अधिकार या भावनात्मक जुड़ाव नहीं होता। घर स्थायी निवास होता है, जहाँ परिवार का भावनात्मक लगाव, अपनापन और अधिकार होता है। पिताजी इसी तुलना से व्यंग्य करते हैं कि उनका घर भी सराय जैसा बन गया है क्योंकि वहाँ तरह-तरह के पक्षी-जीव आते-जाते और बसते रहते हैं, मानो घर के असली मालिक कोई और ही हों।

संवाद और अभिनय

नीचे दी गई स्थितियों के लिए अपने समूह में मिलकर अपनी कल्पना से संवाद लिखिए और बातचीत को अभिनय द्वारा प्रस्तुत कीजिए—

(क) "वे अभी भी झाँक जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं, हमारे माँ-बाप कहाँ हैं?" नन्हीं-नन्हीं दो गौरैया क्या-क्या बोल रही होंगी?

पहली नन्ही गौरैया: चीं-चीं! हम आ गए, पर यह इतना शोर क्यों हो रहा है?
दूसरी नन्ही गौरैया: चीं-चीं! मुझे डर लग रहा है। हमारे माँ-बाप कहाँ हैं, वे हमें लेने क्यों नहीं आ रहे?
पहली: देखो, कोई हमारा घर तोड़ रहा है! माँ! पापा! जल्दी आओ!

(ख) "चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?" घोंसले से झाँकती गौरैयाँ क्या-क्या बातें कर रही होंगी?

पहली गौरैया: यह देखो, यह आदमी हाथ हिला-हिलाकर और उछल-कूदकर क्या कर रहा है?
दूसरी गौरैया: शायद यह किसी उत्सव में इतनी मेहनत से नाच रहा है!
पहली: चलो, हम भी चीं-चीं करके इसे उत्साहित करें!

(ग) "एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं।" जब उन्होंने पहली बार घर में प्रवेश किया तो उन्होंने आपस में क्या बातें की होंगी?

पहली गौरैया: देखो, कितना बड़ा और खुला घर है, रहने के लिए कितनी अच्छी जगह!
दूसरी गौरैया: हाँ, और यह पंखे का गोल घेरा तो घोंसले के लिए बिल्कुल सही है — न धूप, न बारिश!
पहली: चलो, यहीं अपना घर बसाते हैं।

(घ) "उनके माँ-बाप झट से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुगा डालने लगे।" गौरैयों और उनके बच्चों ने क्या-क्या बातें की होंगी?

माँ गौरैया: मेरे बच्चो, हम आ गए! डरो मत, अब हम यहीं हैं।
नन्ही गौरैया: माँ, हमें बहुत डर लगा, यहाँ बहुत शोर हो रहा था।
पिता गौरैया: अब चिंता मत करो, लो चुग्गा खाओ, हम तुम्हारी रक्षा करेंगे।

बदली कहानी

मान लीजिए कि घोंसले में अंडों से बच्चे न निकले होते। ऐसे में कहानी आगे कैसे बढ़ती? यह बदली हुई कहानी लिखिए।

यदि अंडों से बच्चे समय पर न निकलते, तो शायद पिताजी अपनी लाठी से घोंसला पूरी तरह तोड़ देते और गौरैयों को हमेशा के लिए घर से बाहर निकाल देते। दुखी होकर दोनों गौरैयाँ अपने टूटे घोंसले और बिखरे अंडों को देखकर वहाँ से उड़ जातीं और किसी और सुरक्षित जगह — शायद पड़ोस के किसी पेड़ या छत पर — नया आशियाना बसातीं। घर में सन्नाटा छा जाता, माँ थोड़ी उदास हो जातीं कि इतनी मेहनत से बनाया घोंसला और गौरैयों का संघर्ष व्यर्थ चला गया, जबकि पिताजी अपनी 'जीत' पर इतराते, पर शायद मन-ही-मन उन्हें भी कहीं ग्लानि होती। इस तरह कहानी का अंत करुण होता और यह संदेश देता कि हठ व बल-प्रयोग से जीता गया संघर्ष हमेशा सुख नहीं देता।

कहने के ढंग/क्रिया विशेषण

"माँ खिलखिलाकर हँस दीं।" इस वाक्य में 'खिलखिलाकर' शब्द बता रहा है कि माँ कैसे हँसी थीं। कोई कार्य कैसे किया गया, इसे बताने वाले शब्द 'क्रिया विशेषण' कहलाते हैं। 'खिलखिलाकर' भी एक क्रिया विशेषण शब्द है। अब नीचे दिए गए रेखांकित शब्दों पर ध्यान दीजिए। इन शब्दों का प्रयोग करते हुए अपने मन से वाक्य बनाइए।

(क) पिताजी ने झिड़ककर कहा, "तू खड़ा क्या देख रहा है?"

'झिड़ककर' से नया वाक्य — शिक्षक ने झिड़ककर कहा, "कक्षा में शोर मत करो।"

(ख) "देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो", माँ ने अबकी बार गंभीरता से कहा।

'गंभीरता से' से नया वाक्य — डॉक्टर ने गंभीरता से कहा, "इस बीमारी में लापरवाही मत करो।"

(ग) "किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए", उन्होंने गुस्से में कहा।

'गुस्से में' से नया वाक्य — मालिक ने गुस्से में कहा, "यह काम अभी पूरा करो।"

अब आप इनसे मिलते-जुलते कुछ और क्रिया विशेषण शब्द सोचिए और उनका प्रयोग करते हुए कुछ वाक्य बनाइए। (संकेत— धीरे से, जोर से, अटकते हुए, चिल्लाकर, शरमाकर, सहमकर, फुसफुसाते हुए आदि)

धीरे से — उसने धीरे से दरवाजा खोला ताकि किसी की नींद न टूटे। जोर से — बच्चा जोर से चिल्लाया, "मुझे मदद चाहिए!" अटकते हुए — वह अटकते हुए बोला, "मुझे माफ़ कर दीजिए।" शरमाकर — लड़की शरमाकर बोली, "मुझे यह इनाम नहीं चाहिए।" सहमकर — बच्चा सहमकर कोने में जा बैठा। फुसफुसाते हुए — दोनों दोस्त फुसफुसाते हुए बातें करने लगे।

घर के प्राणी

कहानी में आपने पढ़ा कि लेखक के घर में अनेक प्राणी रहते थे। लेखक ने उनका वर्णन ऐसे किया है जैसे वे भी मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हैं। कहानी में से चुनकर उन प्राणियों की सूची बनाइए और बताइए कि वे मनुष्यों जैसे कौन-कौन से काम करते थे?

(क) बिल्ली —

'फिर आऊँगी' कहकर चली जाती है (मनुष्य की तरह वादा करके जाना)।

(ख) अँगीठी के पीछे बैठने वाला चूहा —

सर्दी से बचने के लिए गरम जगह ढूँढ़ता है, ठीक जैसे इंसान सर्दियों में अलाव या हीटर के पास बैठते हैं।

(ग) टंकी पर चढ़ने वाला चूहा —

गर्मी से राहत पाने के लिए ठंडी जगह चुनता है, जैसे इंसान गर्मी में छत या पानी की टंकी के पास बैठना पसंद करते हैं।

(घ) गौरैया —

घर में घुसकर पहले उसका 'निरीक्षण' करती है कि रहने लायक है या नहीं, ठीक वैसे ही जैसे इंसान मकान देखने जाते समय जाँच-परख करते हैं।

(ङ) कबूतर —

दिन-भर 'गुटर-गूँ' का संगीत सुनाकर मानो घर में गुनगुनाते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है, ठीक जैसे इंसान काम करते समय गुनगुनाते हैं।

हेर-फेर मात्रा का

नीचे दिए गए शब्दों की मात्राओं और अर्थों के अंतर पर ध्यान दीजिए। इन शब्दों का प्रयोग करते हुए अपने मन से वाक्य बनाइए।

शब्द-समूहवाक्य-प्रयोग
नाच-नाचा-नचाउसका नाच सबको बहुत पसंद आया। पिताजी गुस्से में उछल-उछलकर नाचा। मदारी ने बंदर को नचा-नचाकर तमाशा दिखाया।
हार-हरा-हाराउसे मेहनत के बदले जीत की जगह हार मिली। टीम ने प्रतिद्वंद्वी को हरा दिया। वह खेल में हारा, फिर भी हिम्मत नहीं हारा।
पिता-पीतामेरे पिता रोज सुबह टहलने जाते हैं। बच्चा गिलास से दूध पीता है।
चूक-चुकउसकी एक चूक से पूरा काम बिगड़ गया। पिताजी की सहनशीलता आखिर चुक गई।
नीचा-नीचेउसने कभी किसी को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं की। किताब मेज़ के नीचे गिर गई।
सहसा-साहससहसा तेज आवाज सुनकर वह चौंक गया। उसने साहस दिखाकर सच बोल दिया।

वाद-विवाद

कहानी में माँ द्वारा कही गई कुछ बातें नीचे दी गई हैं—

  • "अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं।"
  • "एक दरवाजा खुला छोड़ो, बाकी दरवाजे बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी।"
  • "देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो, अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे। अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी।"

कक्षा में एक वाद-विवाद गतिविधि का आयोजन कीजिए। वाद-विवाद का विषय है— "माँ चिड़ियों को घर से निकालना चाहती थीं।" कक्षा में आधे समूह इस कथन के पक्ष में और आधे इसके विपक्ष में तर्क देंगे।

यह एक कक्षा-गतिविधि है। पक्ष में तर्क: माँ शुरुआत में ही कहती हैं, "पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं" — जो दिखाता है कि वे प्रारंभ में गौरैयों को जाने देना चाहती थीं, और वे दरवाजे बंद करने की तरकीब भी पिताजी को बताती हैं। विपक्ष में तर्क: माँ ने कभी गौरैयों को निकालने में सक्रिय सहायता नहीं की, बल्कि हर बार पिताजी का मज़ाक उड़ाया और अंत में स्पष्ट रूप से कहा, "चिड़ियों को मत निकालो... अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी" — जो दिखाता है कि वे वास्तव में गौरैयों को घर में रहने देना चाहती थीं। कक्षा में विद्यार्थी दोनों पक्षों के तर्क पाठ की पंक्तियों के आधार पर प्रस्तुत करें।

कहानी की रचना

"कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।" इस पंक्ति में बताया गया है कि पिताजी का दृष्टिकोण कैसे बदल गया। इस प्रकार यह विशेष वाक्य है। इस तरह के वाक्यों से कहानी और अधिक प्रभावशाली बन जाती है।

(क) आपको इस कहानी में ऐसी अनेक विशेषताएँ दिखाई देंगी। उन्हें अपने समूह के साथ मिलकर ढूँढ़िए और उनकी सूची बनाइए।

कुछ अन्य विशेषताएँ — मानवीकरण (पशु-पक्षियों को इंसानों जैसे भाव देना), हास्य-व्यंग्य का सतत प्रयोग, संवादों के माध्यम से कहानी को आगे बढ़ाना, नाटकीय मोड़ (घोंसला तोड़ते समय अचानक चूजों का बोलना), संक्षिप्त किंतु सजीव दृश्य-चित्रण।

आपकी बात

(ख) इस कहानी की कुछ विशेषताओं को नीचे दिया गया है। इनके उदाहरण कहानी में से चुनकर लिखिए।

कहानी की विशेषताएँकहानी में से उदाहरण
1. किसी बात को कल्पना से बढ़ा-चढ़ाकर कहना"जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो।"
2. हास्य यानी हँसी-मजाक का उपयोग किया जाना"छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" माँ ने व्यंग्य से कहा।
3. सोचा कुछ और, हुआ कुछ औरपिताजी लाठी घुमाकर, दरवाजे बंद करके गौरैयों को हमेशा के लिए निकालना चाहते थे, पर अंत में स्वयं ही उन्हें घर में रहने देने पर राज़ी हो जाते हैं।
4. दूसरों के मन के भावों का अनुमान लगानामाँ कहती हैं, "चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?" — यह गौरैयों के मन का अनुमान लगाना है।
5. किसी की कही बात को उसी के शब्दों में लिखना"छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए..." — माँ के सीधे कथन को उद्धरण चिह्नों में ज्यों-का-त्यों लिखा गया है।
6. किसी प्राणी या उसके कार्य को कोई अन्य नाम देनागौरैयों की उछल-कूद और शोर को "धमा-चौकड़ी" और उनके चहकने को "गा रहे हैं"/"मल्हार गा रही थीं" कहा गया है।
7. किसने किससे कोई बात कही, यह सीधे-सीधे बताए बिना उस संवाद को लिखना"अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं।" — यहाँ सीधे नहीं बताया गया कि माँ किससे बात कर रही हैं, पर संदर्भ से स्पष्ट है।

पाठ से आगे

(क) "गौरियों ने घोंसले में से सिर निकालकर नीचे की ओर झाँककर देखा और दोनों एक साथ 'चीं-चीं' करने लगीं।" आपने अपने घर के आस-पास पक्षियों को क्या-क्या करते देखा है? उनके व्यवहार में आपको कौन-कौन से भाव दिखाई देते हैं?

विद्यार्थी अपने अनुभव के आधार पर लिखें — उदाहरण के लिए, पक्षियों को दाना चुगते, आपस में झगड़ते, घोंसला बनाते और बच्चों को चुग्गा खिलाते देखा है। उनके व्यवहार में सतर्कता, ममता, सहयोग और भय जैसे भाव दिखाई देते हैं।

(ख) "कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।" कहानी के अंत में पिताजी गौरैयों का अपने घर में रहना स्वीकार कर लेते हैं। क्या आप भी कोई स्थान या वस्तु किसी अन्य के साथ साझा करते हैं? उनके बारे में बताइए। साझेदारी में यदि कोई समस्या आती है तो उसे कैसे हल करते हैं?

विद्यार्थी अपने अनुभव लिखें — जैसे अपना कमरा भाई-बहन के साथ साझा करना, या खिलौने-किताबें साझा करना। समस्या आने पर आपस में बातचीत करके, बारी तय करके या समझौता करके हल निकाला जा सकता है।

(ग) परिवार के लोग गौरैयों को घर से बाहर भगाने की कोशिश करते हैं, किंतु गौरैयों के बच्चों के कारण उनका दृष्टिकोण बदल जाता है। क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि किसी को देखकर या किसी से मिलकर आपका दृष्टिकोण बदल गया हो?

विद्यार्थी अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करें — जैसे किसी नए सहपाठी को पहले नापसंद करने के बाद, उसकी परिस्थिति जानकर या उसे किसी की मदद करते देखकर मन बदल जाना।

चिड़ियों का घोंसला

घोंसला बनाना चिड़ियों के जीवन का एक सामान्य हिस्सा है। विभिन्न पक्षी अलग-अलग तरह के घोंसले बनाते हैं। इन घोंसलों में वे अपने अंडे देते हैं और अपने चूजों को पालते हैं।

(क) अपने आस-पास विभिन्न प्रकार के घोंसले ढूँढ़िए और उन्हें ध्यान से देखिए और नीचे दी गई तालिका को पूरा कीजिए। (सावधानी— उन्हें हाथ न लगाएँ अन्यथा पक्षियों, उनके अंडों और आपको भी खतरा हो सकता है।)

यह एक क्षेत्र-अवलोकन आधारित गतिविधि है। विद्यार्थी अपने घर/विद्यालय के आस-पास पेड़ों, छज्जों या रोशनदानों में मिलने वाले घोंसलों को दूर से ध्यान से देखकर तालिका में — घोंसला कहाँ देखा, किन चीजों (तिनके, रुई, धागे, कीचड़ आदि) से बनाया गया, वह खाली था या नहीं, और किस पक्षी का था — इन स्तंभों को अपने वास्तविक अवलोकन के आधार पर भरें। बिना हाथ लगाए, सुरक्षित दूरी से यह अवलोकन करना ज़रूरी है।

(ख) विभिन्न पक्षियों के घोंसलों के संबंध में एक प्रस्तुति तैयार कीजिए। उसमें आप चाहें तो उनके चित्र और थोड़ी रोचक जानकारी सम्मिलित कर सकते हैं।

यह एक प्रस्तुति-आधारित गतिविधि है — विद्यार्थी गौरैया, कौआ, बया (सुघड़ बुनकर पक्षी), कबूतर आदि के घोंसलों के चित्र एकत्र करके उनकी बनावट, सामग्री और विशेषताओं की जानकारी के साथ कक्षा में एक संक्षिप्त प्रस्तुति दें।

मल्हार

"जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं।" 'मल्हार' भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक प्रसिद्ध राग का नाम है। यह राग वर्षा ऋतु से जुड़ा है। आप जानते ही हैं कि आपकी हिंदी पाठ्यपुस्तक का नाम 'मल्हार' भी इसी राग के नाम पर है।

पाठ्यपुस्तक में राग मल्हार को सुनने के लिए इंटरनेट कड़ियाँ दी गई हैं — विद्यार्थी शिक्षक/अभिभावक की सहायता से इन्हें सुनकर राग मल्हार की मधुरता का आनंद लें और चर्चा करें कि निबंध में गौरैयों के चहचहाने की तुलना इस राग से क्यों की गई है।

हास्य-व्यंग्य

"छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे! माँ ने व्यंग्य से कहा।" आप समझ गए होंगे कि इस वाक्य में माँ ने पिताजी से कहा है कि वे चिड़ियों को नहीं निकाल सकते। इस प्रकार से कही गई बात को 'व्यंग्य करना' कहते हैं। व्यंग्य का अर्थ होता है— हँसी-मज़ाक या उपहास के माध्यम से किसी कमी, बुराई या विडंबना को उजागर करना। व्यंग्य में बात को सीधे न कहकर उलटा या संकेतात्मक ढंग से कहा जाता है ताकि उसमें चुटकीलापन भी हो और गंभीर सोच की संभावना भी बनी रहे। अनेक बार व्यंग्य में हास्य भी छिपा होता है।

(क) आपको इस कहानी में कौन-कौन से वाक्य पढ़कर हँसी आई? उन वाक्यों को चुनकर लिखिए।

कुछ हास्यपूर्ण वाक्य — "चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?", "इतनी तकलीफ करने की क्या जरूरत थी। पंखा चला देते, तो ये उड़ जातीं", "तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाजे खुले हैं और तुम गौरियों को बाहर निकाल रहे हो", "चलो, दो तिनके तो निकल गए, अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे?"

(ख) अब चुने हुए वाक्यों में से कौन-कौन से वाक्य 'व्यंग्य' कहे जा सकते हैं? उन पर सही (✓) का चिह्न लगाइए।

व्यंग्यपूर्ण वाक्य (✓) — "छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" ✓, "तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाजे खुले हैं और तुम गौरियों को बाहर निकाल रहे हो।" ✓, "चलो, दो तिनके तो निकल गए, अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे?" ✓ — ये वाक्य बात को सीधे न कहकर उल्टे/संकेतात्मक ढंग से कहते हैं, इसलिए व्यंग्य हैं। शेष वाक्य ("चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं...", "इतनी तकलीफ करने की क्या जरूरत थी...") सरल हास्य के उदाहरण हैं, सीधा व्यंग्य नहीं।

आज की पहेली

यह एक चित्र-पहेली (भूल-भुलैया/maze) है, जिसमें बिल्ली को घुमावदार रास्तों से होते हुए चूहे तक पहुँचाना है। विद्यार्थी पाठ्यपुस्तक में दिए गए चित्र में पेंसिल से रास्ता खोजकर बिल्ली को चूहे तक पहुँचाने का अभ्यास करें — यह एक मनोरंजक दृश्य-गतिविधि है, जिसका सीधा पाठ्य-उत्तर संभव नहीं है।

झरोखे से

'दो गौरैया' निबंध में आपने पढ़ा कि 'दो गौरैया' लेखक के घर में बिन बुलाए अतिथि की तरह आ जाती हैं। पिछले कई वर्षों से गाँव-नगरों में इन नन्ही चिड़ियों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है। इसलिए भारत सरकार ने इनके संरक्षण के लिए 20 मार्च को 'विश्व गौरैया दिवस' घोषित किया है। पाठ्यपुस्तक में इस विषय पर प्रेस सूचना ब्यूरो द्वारा प्रकाशित एक लेख का अंश दिया गया है, जिसका सार इस प्रकार है—

कभी बहुतायत में पाई जाने वाली घरेलू गौरैया अब कई जगहों पर एक दुर्लभ दृश्य बन गई है। इन छोटे प्राणियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उनकी रक्षा करने के लिए हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। भारत में गौरैया सिर्फ पक्षी नहीं है; वह साझा इतिहास और संस्कृति का प्रतीक है। हिंदी में "गौरैया", तमिल में "कुरुवी" और उर्दू में "चिरिया" जैसे कई नामों से जानी जाने वाली गौरैया पीढ़ियों से दैनिक जीवन का हिस्सा रही है। उनकी महत्ता के बावजूद, गौरैया तेजी से लुप्त हो रही हैं — सीसा रहित पेट्रोल के उपयोग से जहरीले यौगिक पैदा हुए हैं जो उन कीटों को नुकसान पहुँचाते हैं जिन पर गौरैया भोजन के लिए निर्भर हैं, और शहरीकरण ने उनके प्राकृतिक घोंसलों की जगह भी छीन ली है।

— साभार: पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (भारत सरकार)

इस पठन-सामग्री का उद्देश्य विद्यार्थियों में गौरैयों के घटते संरक्षण के प्रति जागरूकता जगाना है। यह कहानी में गौरैयों के प्रति दिखाई गई सहनशीलता और अंततः स्वीकृति के भाव को वास्तविक पर्यावरणीय संदर्भ से जोड़ता है — निबंध में जिस तरह पिताजी अंततः गौरैयों को अपनाते हैं, उसी तरह हमें भी वास्तविक जीवन में गौरैयों और अन्य छोटे पक्षियों के संरक्षण के लिए सहनशील और सजग होना चाहिए।

साझी समझ

नीचे दी गई इंटरनेट कड़ी का प्रयोग कर इस लेख को पूरा पढ़िए और कक्षा में चर्चा कीजिए।

यह एक स्वाध्याय व कक्षा-चर्चा गतिविधि है — विद्यार्थी पाठ्यपुस्तक में दी गई पीआईबी (PIB) की वेबसाइट कड़ी का उपयोग करके 'विश्व गौरैया दिवस' पर पूरा लेख पढ़ें और कक्षा में इस पर चर्चा करें कि हम अपने आस-पास गौरैयों के संरक्षण के लिए क्या-क्या कर सकते हैं — जैसे घर की छत/बालकनी में पानी के कटोरे रखना, कृत्रिम घोंसले (बर्ड-हाउस) लगाना और पेड़-पौधे बढ़ाना।

अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न

नीचे दिए गए प्रश्न पाठ्यपुस्तक के अभ्यासों से अलग, अभ्यास और परीक्षा-तैयारी के दृष्टिकोण से तैयार किए गए हैं।

(अ) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (बहुविकल्पीय)

1. 'दो गौरैया' निबंध के लेखक कौन हैं?
  • (क) प्रेमचंद
  • (ख) भीष्म साहनी
  • (ग) यशपाल
  • (घ) अमरकांत
2. भीष्म साहनी का जन्म किस वर्ष हुआ था?
  • (क) 1905
  • (ख) 1915
  • (ग) 1925
  • (घ) 1935
3. भीष्म साहनी का निधन किस वर्ष हुआ था?
  • (क) 1993
  • (ख) 1998
  • (ग) 2003
  • (घ) 2010
4. भीष्म साहनी को किस उपन्यास पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला?
  • (क) गोदान
  • (ख) तमस
  • (ग) मैला आँचल
  • (घ) कर्मभूमि
5. भीष्म साहनी के भाई कौन प्रसिद्ध अभिनेता थे?
  • (क) बलराज साहनी
  • (ख) राज कपूर
  • (ग) दिलीप कुमार
  • (घ) मनोज कुमार
6. भीष्म साहनी को भारत सरकार ने किस सम्मान से अलंकृत किया था?
  • (क) भारत रत्न
  • (ख) पद्म भूषण
  • (ग) पद्मश्री
  • (घ) ज्ञानपीठ
7. बच्चों के लिए भीष्म साहनी की प्रसिद्ध कहानी कौन-सी है?
  • (क) गुलेल का खेल
  • (ख) ईदगाह
  • (ग) बड़े भाई साहब
  • (घ) आम की टोकरी
8. लेखक के घर में गौरैयों ने अपना घोंसला कहाँ बनाया?
  • (क) रसोई में
  • (ख) पंखे के गोले में
  • (ग) खिड़की पर
  • (घ) दरवाजे के ऊपर
9. पिताजी घर को क्या कहते थे?
  • (क) महल
  • (ख) सराय
  • (ग) चिड़ियाघर
  • (घ) दुर्ग
10. गौरैयों को देखकर पिताजी का मजाक सबसे पहले किसने उड़ाया?
  • (क) लेखक ने
  • (ख) माँ ने
  • (ग) पड़ोसी ने
  • (घ) नौकर ने
11. पिताजी ने गौरैयों को भगाने के लिए सबसे पहले क्या किया?
  • (क) लाठी उठाई
  • (ख) ताली बजाकर 'श...शू' किया और नाचे
  • (ग) पानी छिड़का
  • (घ) जाल लगाया
12. गौरैयाँ दरवाजे बंद होने पर घर में किस रास्ते से आ गईं?
  • (क) खिड़की से
  • (ख) दरवाजों के नीचे बची खाली जगह से
  • (ग) चिमनी से
  • (घ) छत से
13. पिताजी ने घोंसला तोड़ने के लिए क्या इस्तेमाल किया?
  • (क) कैंची
  • (ख) स्टूल और लाठी
  • (ग) सीढ़ी और रस्सी
  • (घ) हाथ से
14. घोंसला टूटते समय गौरैयों की स्थिति कैसी हो गई थी?
  • (क) वे और चमकीली हो गईं
  • (ख) वे कुछ दुबली और काली पड़ गईं
  • (ग) उनका रंग सफेद हो गया
  • (घ) कोई बदलाव नहीं हुआ
15. पिताजी के हाथ अचानक क्यों ठिठक गए?
  • (क) उन्हें चोट लगी
  • (ख) उन्होंने ऊपर से तेज "चीं-चीं" की आवाज़ सुनी
  • (ग) माँ ने रोका
  • (घ) लाठी टूट गई
16. घोंसले से किसकी आवाज़ आई थी जिसने पिताजी को रोका?
  • (क) गौरैयों के माता-पिता की
  • (ख) नवजात/नन्हीं गौरैयों की
  • (ग) बिल्ली की
  • (घ) कबूतर की
17. निबंध के अंत में पिताजी ने क्या किया?
  • (क) घोंसला पूरी तरह तोड़ दिया
  • (ख) लाठी एक ओर रखकर चुपचाप बैठ गए
  • (ग) माँ को डाँटा
  • (घ) दरवाजे तोड़ दिए
18. निबंध के अंत में सभी दरवाजे किसने खोले?
  • (क) पिताजी ने
  • (ख) माँ ने
  • (ग) लेखक ने
  • (घ) नौकर ने
19. घर में किस जानवर का जिक्र है जो "फिर आऊँगी" कहकर चली जाती थी?
  • (क) कुत्ता
  • (ख) बिल्ली
  • (ग) गाय
  • (घ) बकरी
20. "छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे" का पाठ में मुख्य भाव क्या है?
  • (क) थकान
  • (ख) गर्व/विजय भाव
  • (ग) डर
  • (घ) उदासी
21. 'सराय' शब्द का सही अर्थ है—
  • (क) होटल
  • (ख) यात्रियों के अस्थायी ठहरने की जगह
  • (ग) दुर्ग
  • (घ) मंदिर
22. 'मल्हार' शब्द किससे संबंधित है?
  • (क) एक नृत्य से
  • (ख) भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक राग से
  • (ग) एक त्योहार से
  • (घ) एक व्यंजन से
23. 'विश्व गौरैया दिवस' कब मनाया जाता है?
  • (क) 5 जून
  • (ख) 20 मार्च
  • (ग) 15 अगस्त
  • (घ) 1 अप्रैल
24. 'झरोखे से' पाठ के अनुसार गौरैया को उर्दू में क्या कहा जाता है?
  • (क) कुरुवी
  • (ख) चिरिया
  • (ग) पंछी
  • (घ) मुनिया
25. 'दो गौरैया' मूलतः किस विधा की रचना है?
  • (क) कविता
  • (ख) संस्मरणात्मक निबंध
  • (ग) नाटक
  • (घ) पत्र

(ब) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

1. 'दो गौरैया' पाठ के लेखक कौन हैं?

भीष्म साहनी।

2. भीष्म साहनी का जन्म कब हुआ था?

8 अगस्त 1915 को।

3. भीष्म साहनी का निधन कब हुआ?

11 जुलाई 2003 को।

4. भीष्म साहनी के किस उपन्यास पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला?

'तमस' उपन्यास पर।

5. भीष्म साहनी को कौन-सा सरकारी सम्मान मिला था?

पद्म भूषण।

6. भीष्म साहनी के भाई कौन थे?

प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी।

7. लेखक के घर में कितने व्यक्ति रहते थे?

तीन — माँ, पिताजी और लेखक।

8. पिताजी घर को क्या कहते थे?

सराय।

9. आँगन में कौन-सा पेड़ था?

आम का पेड़।

10. घर में कौन-कौन से जानवर रहते थे (कोई तीन नाम लिखिए)?

चूहे, बिल्ली, चमगादड़, कबूतर, छिपकलियाँ, बर्रे, चींटियाँ (इनमें से कोई तीन)।

11. गौरैयों ने घोंसला कहाँ बनाया?

बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में।

12. गौरैयों को देखकर पिताजी की पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

गुस्से में आकर उन्हें निकालने की बात कहना।

13. माँ ने पिताजी की किस बात का व्यंग्य किया?

कि चूहे तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियाँ निकालेंगे।

14. पिताजी ने गौरैयों को भगाने के लिए क्या-क्या उपाय किए (कोई दो)?

ताली बजाकर नाचना, लाठी चलाना।

15. दरवाजे बंद होने पर गौरैयाँ किस रास्ते से अंदर आईं?

दरवाजों के नीचे बची खाली जगह से।

16. पिताजी ने घोंसला तोड़ने के लिए क्या इस्तेमाल किया?

स्टूल और लाठी।

17. घोंसला तोड़ते समय अचानक क्या आवाज़ सुनाई दी?

नन्हीं गौरैयों की तेज "चीं-चीं" की आवाज़।

18. निबंध के अंत में पिताजी ने क्या निर्णय लिया?

लाठी एक ओर रखकर, मुसकराते हुए गौरैयों को घर में रहने दिया।

19. 'मल्हार' किसका नाम है?

भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक प्रसिद्ध, वर्षा ऋतु से जुड़े राग का नाम।

20. 'विश्व गौरैया दिवस' किस तारीख को मनाया जाता है?

20 मार्च को।

(स) लघु उत्तरीय प्रश्न

1. लेखक ने अपने घर को 'सराय' क्यों कहा है, यह पिताजी की दृष्टि से समझाइए।

पिताजी के अनुसार घर में स्थायी रूप से रहने वाले तीन सदस्यों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण वे पक्षी-जानवर जान पड़ते हैं जो दिन-रात आते-जाते रहते हैं — तोते, कौवे, गौरैयाँ, चूहे, बिल्ली, चमगादड़, कबूतर आदि। इसी कारण पिताजी मजाक में घर को 'सराय' कहते हैं, मानो घर के असली मालिक वही जीव-जंतु हों।

2. घर के भीतर चूहों का जीवन कैसा दिखाया गया है?

घर में बीसियों चूहे रात-भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते-फिरते थे, जिससे धमा-चौकड़ी मचती और घर के लोग ठीक से सो भी नहीं पाते थे। एक चूहा सर्दी से बचने के लिए अँगीठी के पीछे बैठता तो दूसरा गर्मी से बचने के लिए बाथरूम की टंकी पर बैठना पसंद करता था।

3. गौरैयों ने पहली बार घर में प्रवेश करने पर क्या किया?

दोनों गौरैयाँ बिना पूछे सीधी अंदर घुस आईं और उड़-उड़कर मकान का निरीक्षण करने लगीं, मानो देख रही हों कि यह घर रहने योग्य है या नहीं। कुछ देर बाद वे जैसे आई थीं वैसे ही उड़ भी गईं।

4. दो दिन बाद परिवार ने क्या देखा?

दो दिन बाद परिवार ने देखा कि बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में गौरैयों ने अपना बिछावन बिछा लिया था और सामान भी ले आई थीं। वे मजे से वहाँ बैठकर गाना गा रही थीं, जिससे स्पष्ट था कि उन्हें वह घर पसंद आ गया था।

5. माँ की गौरैयों के प्रति प्रतिक्रिया कैसी थी?

माँ गौरैयों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण और विनोदप्रिय थीं। वे पिताजी के गुस्से और उछल-कूद पर हँसती रहती थीं, बीच-बीच में व्यंग्य करती थीं और अंत तक गौरैयों को न निकालने की सलाह देती रहीं।

6. पिताजी ने गौरैयों को भगाने के लिए सबसे पहला उपाय क्या अपनाया और उसका क्या परिणाम हुआ?

पिताजी ने पंखे के नीचे जाकर ताली बजाई, 'श...शू' किया और उछल-कूद कर नाचने लगे। परिणाम यह हुआ कि गौरैयाँ डरने की बजाय चीं-चीं करने लगीं मानो पिताजी के नाचने का मजा ले रही हों, और माँ भी हँस पड़ीं।

7. दरवाजे बंद करने पर भी गौरैयाँ घर में कैसे आ गईं?

दरवाजे बंद होने पर भी उनके नीचे थोड़ी-थोड़ी खाली जगह बची रह गई थी। गौरैयाँ उसी संकरी जगह से रेंगकर अंदर आ गईं, जिसका पता माँ ने पिताजी को दिखाया।

8. दरवाजों के नीचे की जगह बंद करने पर भी गौरैयाँ कैसे लौट आईं?

पिताजी ने दरवाजों के नीचे कपड़े ठूँस दिए ताकि कोई जगह खाली न बचे। फिर भी गौरैयाँ टूटे शीशे वाले रोशनदान से होकर अंदर आ गईं।

9. पिताजी घोंसला तोड़ने के लिए क्यों तैयार हुए?

रोज-रोज गौरैयों को निकालने और उनके बार-बार लौट आने से पिताजी की सहनशीलता जवाब दे गई। तंग आकर उन्होंने निश्चय किया कि गौरैयों का घोंसला ही नोचकर निकाल देंगे, ताकि वे स्थायी रूप से घर छोड़ दें।

10. घोंसला तोड़े जाने के दौरान गौरैयों की स्थिति कैसी थी?

घोंसला तोड़े जाने के दौरान दोनों गौरैयाँ चुपचाप दीवार पर बैठी थीं, कुछ दुबली और काली पड़ गई थीं तथा चहकना भी बंद कर चुकी थीं — यह उनके भीतर के डर और तनाव को दर्शाता है।

11. पिताजी अचानक क्यों रुक गए?

घोंसला तोड़ते समय अचानक तेज "चीं-चीं" की आवाज़ सुनाई दी। ऊपर देखने पर पता चला कि घोंसले में से नन्हीं-नन्हीं (नवजात) गौरैयाँ सिर निकालकर पुकार रही थीं — यह देखकर पिताजी के हाथ ठिठक गए।

12. निबंध का अंत किस भावना के साथ होता है?

निबंध का अंत करुणा, ममता और मानवीय हृदय-परिवर्तन की भावना के साथ होता है — पिताजी घोंसला तोड़ना छोड़ देते हैं, माँ दरवाजे खोल देती हैं, और माता-पिता गौरैयाँ उड़कर आकर अपने बच्चों को चुगाने लगती हैं, जिसे देखकर पिताजी केवल मुसकराते रहते हैं।

13. निबंध में हास्य-व्यंग्य का प्रयोग किन प्रसंगों में हुआ है?

माँ के व्यंग्यात्मक संवादों में ("छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए..."), पिताजी के गुस्से में नाचने के दृश्य में, तथा "अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे?" जैसे वाक्यों में हास्य-व्यंग्य स्पष्ट झलकता है।

14. पिताजी के स्वभाव की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

पिताजी जिद्दी, आत्मसम्मानी, गुस्सैल और हार न मानने वाले स्वभाव के हैं, परंतु अंततः वे कोमल हृदय और संवेदनशील भी सिद्ध होते हैं, जब वे नन्हीं गौरैयों को देखकर अपना क्रोध त्याग देते हैं।

15. माँ के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ बताइए।

माँ हास-परिहासप्रिय, संवेदनशील, सहृदय और व्यावहारिक हैं। वे गौरैयों के प्रति सहानुभूति रखती हैं और पिताजी की जिद पर हँसते हुए भी परोक्ष रूप से गौरैयों की रक्षा करती हैं।

16. निबंध का शीर्षक 'दो गौरैया' कितना सार्थक है?

शीर्षक पूर्णतः सार्थक है क्योंकि पूरा निबंध इन्हीं दो गौरैयों के इर्द-गिर्द घूमता है — उनका घर में आना, घोंसला बनाना, पिताजी से संघर्ष करना और अंततः अपने बच्चों के साथ घर में स्थायी रूप से बस जाना ही निबंध का केंद्रीय विषय है।

17. इस निबंध से मनुष्य और पशु-पक्षियों के संबंध के बारे में क्या सीख मिलती है?

यह निबंध सिखाता है कि मनुष्य को पशु-पक्षियों के साथ सह-अस्तित्व और सहनशीलता से रहना चाहिए। छोटे प्राणी भी अपने परिवार और घर के प्रति उतनी ही ममता रखते हैं जितनी मनुष्य, इसलिए उनके प्रति क्रूरता के बजाय करुणा का भाव रखना चाहिए।

18. निबंध की भाषा-शैली पर टिप्पणी कीजिए।

निबंध की भाषा सरल, सजीव, संवादात्मक और हास्य-व्यंग्य से भरपूर है। दैनिक जीवन की घटनाओं का चित्रण इतने रोचक ढंग से किया गया है कि यह एक जीवंत संस्मरण जैसा प्रतीत होता है।

19. निबंध में प्रयुक्त कोई एक लाक्षणिक प्रयोग बताइए और उसका अर्थ स्पष्ट कीजिए।

"छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे" — इसका अर्थ है गर्व और विजयी भाव से बैठना, जो पिताजी के अस्थायी 'जीत' के भाव को दर्शाता है।

20. गौरैयों के प्रति वर्तमान समाज की चिंता के बारे में आप क्या जानते हैं?

आज गौरैयों की संख्या शहरीकरण, प्रदूषण और सीसा-रहित पेट्रोल से उत्पन्न जहरीले तत्वों के कारण तेज़ी से घट रही है। इसी जागरूकता के लिए हर वर्ष 20 मार्च को 'विश्व गौरैया दिवस' मनाया जाता है।

(द) महत्वपूर्ण प्रश्न

1. 'दो गौरैया' निबंध के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि यह रचना मानव और प्रकृति के बीच सह-अस्तित्व का कैसा चित्र प्रस्तुत करती है।

निबंध में लेखक का घर मनुष्य और अनेक जीव-जंतुओं — चूहे, बिल्ली, चमगादड़, कबूतर, गौरैया आदि — के सह-अस्तित्व का जीवंत उदाहरण है। शुरुआत में पिताजी इस सह-अस्तित्व को अनिच्छा से स्वीकार करते हैं (चूहे, कबूतर आदि को सहते हुए), पर जब दो गौरैयाँ घर में घोंसला बना लेती हैं, तो वे इसे चुनौती के रूप में लेते हैं और उन्हें भगाने का हरसंभव प्रयास करते हैं। अंततः जब वे नन्हीं गौरैयों की असहाय पुकार देखते हैं, तो उनका हृदय बदल जाता है और वे सह-अस्तित्व को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। इस तरह निबंध यह संदेश देता है कि मनुष्य और प्रकृति का सह-अस्तित्व भले ही शुरू में असुविधाजनक लगे, पर करुणा और समझ से यह एक सुंदर और संतोषजनक संबंध में बदल सकता है।

2. पिताजी के चरित्र में निबंध के आरंभ से अंत तक आए परिवर्तन का विश्लेषण कीजिए।

निबंध के आरंभ में पिताजी गौरैयों की उपस्थिति को अपनी सत्ता और गरिमा के लिए चुनौती मानते हैं — "गौरैयाँ मेरे आगे क्या चीज हैं!" कहकर वे उन्हें तुरंत निकालने की ठान लेते हैं। बीच के हिस्से में वे बार-बार असफल होकर भी हार नहीं मानते और अंततः घोंसला तोड़ने जैसा कठोर कदम उठाने पर उतर आते हैं। परंतु जब वे नन्हीं, असहाय गौरैयों को अपने माता-पिता को पुकारते देखते हैं, तो उनके भीतर छिपी करुणा जाग उठती है। वे चुपचाप लाठी रख देते हैं और गौरैयों को घर में रहने देते हैं। यह परिवर्तन दर्शाता है कि कठोर और जिद्दी दिखने वाला व्यक्ति भी भीतर से संवेदनशील हो सकता है, और सच्ची ममता किसी भी अहंकार को पिघला सकती है।

3. माँ का चरित्र इस निबंध को हास्य-व्यंग्य की दृष्टि से किस प्रकार समृद्ध करता है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

माँ का चरित्र निबंध में हास्य-व्यंग्य का मुख्य स्रोत है। वे लगातार पिताजी की गंभीर कोशिशों पर हल्के-फुल्के व्यंग्य कसती रहती हैं — जैसे "छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!", "तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाजे खुले हैं...", और "चलो, दो तिनके तो निकल गए, अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे?" — ये संवाद न केवल पाठक को हँसाते हैं, बल्कि पिताजी के अहंकार और हठ पर एक सूक्ष्म कटाक्ष भी करते हैं। इस तरह माँ का पात्र निबंध को हल्का-फुल्का और मनोरंजक बनाए रखते हुए भी एक गहरी टिप्पणी करता चलता है।

4. निबंध में मानवीकरण (मानवीय भावनाओं का पशु-पक्षियों/प्राणियों पर आरोपण) के उदाहरण खोजकर उनका प्रभाव स्पष्ट कीजिए।

निबंध में मानवीकरण की कई मिसालें हैं — बिल्ली का 'फिर आऊँगी' कहकर जाना, गौरैयों का घर का 'निरीक्षण' करना, माँ की कल्पना कि गौरैयाँ आपस में पूछ रही हैं "यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है", और नन्हीं गौरैयों का चीं-चीं करके मानो 'अपना परिचय' देना। इस मानवीकरण से निबंध अधिक जीवंत, रोचक और भावनात्मक बन जाता है — पाठक पशु-पक्षियों के प्रति सहज ही आत्मीयता महसूस करने लगता है और उनके संघर्ष व भावनाओं से जुड़ाव अनुभव करता है, जिससे निबंध का अंतिम, करुण मोड़ और भी प्रभावशाली बन जाता है।

5. "किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए" — इस कथन के आलोक में सत्ता/बल-प्रयोग की सीमाओं पर चर्चा कीजिए।

यह कथन दर्शाता है कि जब सामान्य और सौम्य उपाय असफल हो जाते हैं, तो व्यक्ति निराशा में अधिक कठोर और विनाशकारी कदम उठाने पर उतर आता है। परंतु निबंध यह भी दिखाता है कि बल-प्रयोग की एक सीमा होती है — पिताजी घोंसला तोड़ने में लगभग सफल हो ही जाते हैं, पर ठीक उसी क्षण करुणा उनके निर्णय को पलट देती है। यह हमें सिखाता है कि शक्ति और बल-प्रयोग से किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलता, बल्कि समझ, सहनशीलता और मानवीय (या यहाँ प्राणी-सुलभ) संवेदना से कहीं बेहतर और स्थायी हल निकलता है।

6. निबंध के अंत में हुए हृदय-परिवर्तन के प्रसंग का विस्तृत विश्लेषण कीजिए और बताइए यह प्रसंग निबंध को किस प्रकार भावनात्मक गहराई प्रदान करता है।

निबंध का चरम बिंदु वह क्षण है जब पिताजी घोंसला तोड़ने ही वाले होते हैं और अचानक नन्हीं, अभी-अभी जन्मी गौरैयाँ चीं-चीं करके अपने माता-पिता को पुकारती हैं। यह दृश्य इतना असहाय और मार्मिक है कि पिताजी का क्रोध क्षण-भर में विलीन हो जाता है। वे चुपचाप लाठी रख देते हैं, और माँ तुरंत दरवाजे खोल देती हैं ताकि माता-पिता गौरैयाँ अंदर आकर अपने बच्चों से मिल सकें। यह प्रसंग निबंध को केवल एक हास्यपूर्ण घरेलू किस्से से उठाकर मानवीय करुणा, ममता और आत्म-परिवर्तन की एक गहरी कथा में बदल देता है — यही इसकी सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है।

7. भीष्म साहनी की लेखन-शैली की विशेषताओं को 'दो गौरैया' निबंध के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

भीष्म साहनी की शैली सरल, सहज, संवादात्मक और आत्मीय है। वे रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं को इतनी बारीकी और हास्य-व्यंग्य के साथ चित्रित करते हैं कि पाठक स्वयं को उस घर का हिस्सा महसूस करने लगता है। संवादों का सजीव प्रयोग, पात्रों (यहाँ तक कि पशु-पक्षियों) का सूक्ष्म चरित्र-चित्रण, और साधारण घटना से गहरा मानवीय संदेश निकाल लाने की कला उनकी लेखनी की मुख्य विशेषताएँ हैं, जो इस निबंध में स्पष्ट रूप से झलकती हैं।

8. निबंध में वर्णित घर के अन्य प्राणियों (चूहे, बिल्ली, कबूतर, चमगादड़ आदि) के प्रसंगों का समग्र उद्देश्य क्या है?

इन प्रसंगों का उद्देश्य पाठक को यह बताना है कि लेखक का घर पहले से ही अनेक जीव-जंतुओं का साझा आवास बन चुका था, इसलिए दो गौरैयों का आना कोई असाधारण बात नहीं थी — बल्कि यह उसी सिलसिले की एक और कड़ी थी। यह पृष्ठभूमि निबंध के मुख्य संघर्ष (पिताजी बनाम गौरैया) को संदर्भ और हास्य दोनों प्रदान करती है, और यह भी स्पष्ट करती है कि पिताजी की सहनशीलता पहले से ही परीक्षा में थी, इसीलिए गौरैयों के मामले में उनका धैर्य जल्दी टूट जाता है।

9. यदि यह घटना आज के किसी शहरी फ्लैट में घटती, तो परिस्थितियाँ कैसे भिन्न होतीं? अपने विचार तर्कसहित लिखिए।

आज के बंद, वातानुकूलित शहरी फ्लैटों में खिड़कियाँ, रोशनदान और आँगन प्रायः नहीं होते या बहुत सीमित होते हैं, इसलिए गौरैयों का इस तरह घर में घुसकर घोंसला बनाना कठिन होता। साथ ही आज गौरैयों की संख्या भी बहुत कम हो चुकी है (जैसा 'झरोखे से' पाठ में बताया गया है), इसलिए ऐसी घटना दुर्लभ ही होगी। यदि होती भी, तो शायद लोग वन्यजीव संरक्षण के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण गौरैयों को तुरंत स्वीकार कर लेते, बजाय इसके कि निबंध जैसा लंबा संघर्ष चले।

10. 'दो गौरैया' निबंध की वर्तमान समय में सामाजिक-पर्यावरणीय प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।

आज जब शहरीकरण, प्रदूषण और पर्यावरणीय बदलावों के कारण गौरैयों जैसी नन्ही चिड़ियों की संख्या तेजी से घट रही है, तब 'दो गौरैया' निबंध और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि इंसानों को छोटे प्राणियों के प्रति सहनशीलता, करुणा और स्वीकृति का भाव रखना चाहिए, न कि उन्हें अपने रास्ते की बाधा मानकर भगाना चाहिए। यह निबंध परोक्ष रूप से 'विश्व गौरैया दिवस' जैसे संरक्षण-प्रयासों की भावना को भी पुष्ट करता है और हमें प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व अपनाने की प्रेरणा देता है।

माइंड मैप

दो गौरैया

लेखक

  • भीष्म साहनी (1915-2003)
  • उपन्यास: तमस (साहित्य अकादमी)
  • सम्मान: पद्म भूषण
  • भाई: बलराज साहनी

मुख्य पात्र

  • पिताजी
  • माँ
  • लेखक (बालक कथावाचक)
  • दो गौरैया व उनके चूजे

मुख्य घटनाएँ

  • गौरैयों का घोंसला बनाना
  • पिताजी के भगाने के प्रयास
  • दरवाजों-रोशनदान से वापसी
  • घोंसला तोड़ने का प्रयास
  • चूजों की पुकार व हृदय-परिवर्तन

भाव व शैली

  • हास्य-व्यंग्य
  • मानवीकरण
  • संवादात्मकता
  • संस्मरणात्मक शैली

मूल संदेश

  • सह-अस्तित्व और सहनशीलता
  • ममता अहंकार को पिघला देती है
  • बल-प्रयोग स्थायी समाधान नहीं

घर के अन्य प्राणी

  • चूहे, बिल्ली, चमगादड़
  • कबूतर, छिपकली, बर्रे, चींटियाँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'दो गौरैया' निबंध किसने लिखा है?

इस निबंध के लेखक भीष्म साहनी (1915-2003) हैं, जो हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार थे और जिन्हें उपन्यास 'तमस' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण सम्मान मिला था।

2. गौरैयों ने घर में अपना घोंसला कहाँ बनाया था?

गौरैयों ने बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में अपना घोंसला बनाया था, जो उनके लिए एक सुरक्षित, ऊँची और ढकी हुई जगह थी।

3. पिताजी ने गौरैयों को निकालने के लिए क्या-क्या उपाय अपनाए?

पिताजी ने ताली बजाकर व नाचकर डराने की कोशिश की, लाठी से घोंसले को ठकोरा, दरवाजे बंद करवाए, दरवाजों के नीचे व रोशनदान में कपड़े ठूँसे, और अंततः स्टूल पर चढ़कर लाठी से घोंसला ही तोड़ने का प्रयास किया।

4. निबंध के अंत में पिताजी का मन क्यों बदल गया?

घोंसला तोड़ते समय अचानक अंडों से निकलीं नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ चीं-चीं करके अपने माता-पिता को पुकारने लगीं। यह असहाय और मार्मिक दृश्य देखकर पिताजी का क्रोध पिघल गया और उन्होंने लाठी रखकर गौरैयों को घर में रहने देने का निर्णय लिया।

5. माँ का चरित्र निबंध में क्या भूमिका निभाता है?

माँ हास्य-व्यंग्य के माध्यम से पिताजी की कोशिशों पर टिप्पणी करती रहती हैं और परोक्ष रूप से गौरैयों का पक्ष लेती हैं। उनका पात्र निबंध को मनोरंजक बनाए रखते हुए भी करुणा और संवेदनशीलता का संदेश देता है।

6. इस निबंध से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

यह निबंध सिखाता है कि हमें प्रकृति और छोटे प्राणियों के साथ सहनशीलता, करुणा और सह-अस्तित्व की भावना से रहना चाहिए, और यह कि बल-प्रयोग की बजाय समझ व ममता से ही स्थायी व सुखद समाधान निकलता है।

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