पानी रे पानी — निबंध सार, सरल व्याख्या और प्रश्नोत्तर | कक्षा 7 मल्हार
कक्षा 7 की एनसीईआरटी हिंदी पाठ्यपुस्तक 'मल्हार' का चौथा पाठ 'पानी रे पानी' प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र का एक विचारोत्तेजक निबंध है, जो जल-चक्र, जल-संकट, बाढ़ और भूजल संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर हमें सोचने के लिए प्रेरित करता है। इस लेख में आपको लेखक-परिचय, मूल पाठ, सरल व्याख्या, कठिन शब्दों के अर्थ, पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर (उपसर्ग-व्याकरण सहित), पूरक पाठों 'पाल के किनारे रखा इतिहास' और 'विश्वेश्वरैया' का सार, तथा अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न (MCQ सहित) — सब कुछ एक ही जगह मिलेगा।
लेखक परिचय
'पानी रे पानी' के लेखक अनुपम मिश्र एक प्रखर लेखक, संपादक और जाने-माने पर्यावरणविद् होने के साथ-साथ छायाकार भी थे। उनका जन्म वर्धा (महाराष्ट्र) में हुआ था। सन् 1969 से वे गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली से जुड़े और वहाँ पर्यावरण-संरक्षण के क्षेत्र में उन्होंने अनेक प्रयोगात्मक कार्य किए। उनकी पुस्तक 'आज भी खरे हैं तालाब' भारत की पारंपरिक तालाब-प्रणालियों और जल-संरक्षण पद्धतियों पर आधारित उनकी सर्वाधिक चर्चित रचना है, जो लगभग आठ वर्षों के क्षेत्रीय शोध पर आधारित है; ब्रेल लिपि सहित इसका अनुवाद अनेक भाषाओं में हो चुका है और यह कॉपीराइट-मुक्त पुस्तक है। 'साफ माथे का समाज' उनकी एक और महत्वपूर्ण पुस्तक है। वे गांधी शांति प्रतिष्ठान से प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'गांधी मार्ग' के संस्थापक-संपादक भी थे। उनके पर्यावरण-संरक्षण कार्यों के लिए उन्हें इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार (1996) तथा जमनालाल बजाज पुरस्कार (2011) सहित कई सम्मान प्राप्त हुए।
- जन्म-स्थान वर्धा, महाराष्ट्र
- प्रमुख पहचान लेखक, संपादक, पर्यावरणविद्, छायाकार
- प्रमुख कृतियाँ आज भी खरे हैं तालाब; साफ माथे का समाज
- संपादन 'गांधी मार्ग' पत्रिका (गांधी शांति प्रतिष्ठान)
- सम्मान इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार (1996), जमनालाल बजाज पुरस्कार (2011)
पाठ परिचय
'पानी रे पानी' निबंध में लेखक अनुपम मिश्र ने जल-चक्र की किताबी अवधारणा और आज के समय में पानी से जुड़ी वास्तविक समस्याओं — जल-संकट, अकाल और बाढ़ — के बीच के अंतर को बड़े रोचक ढंग से उजागर किया है। लेखक धरती की तुलना एक विशाल गुल्लक से करते हैं, जिसमें वर्षा का जल तालाबों और झीलों के माध्यम से भूजल भंडार के रूप में संचित होता है। निबंध हमें यह संदेश देता है कि तालाबों और जलस्रोतों की उपेक्षा करके हमने स्वयं जल-संकट को आमंत्रित किया है, और जल-चक्र को ठीक से समझकर तथा भूजल भंडार की रक्षा करके ही हम इस संकट से बच सकते हैं।
मूल पाठ
कहाँ से आता है हमारा पानी और फिर कहाँ चला जाता है हमारा पानी? हमने कभी इस बारे में कुछ सोचा है? सोचा तो नहीं होगा शायद, पर इस बारे में पढ़ा जरूर है। भूगोल की किताब पढ़ते समय जल-चक्र जैसी बातें हमें बताई जाती हैं। एक सुंदर-सा चित्र भी होता है, इस पाठ के साथ। सूरज, समुद्र, बादल, हवा, धरती, फिर बरसात की बूँदें और लो फिर बहती हुई एक नदी और उसके किनारे बसा तुम्हारा, हमारा घर, गाँव या शहर। चित्र के दूसरे भाग में यही नदी अपने चारों तरफ का पानी लेकर उसी समुद्र में मिलती दिखती है। चित्र में कुछ तीर भी बने रहते हैं। समुद्र से उठी भाप बादल बनकर पानी में बदलती है और फिर, इन तीरों के सहारे जल की यात्रा एक तरफ से शुरू होकर समुद्र में वापिस मिल जाती है। जल-चक्र पूरा हो जाता है।
यह तो हुई जल-चक्र की किताबी बातें, पर अब तो हम सबके घरों में, स्कूल में, माता-पिता के कार्यालय में, कारखानों और खेतों में पानी का कुछ अजीब-सा चक्कर सामने आने लगा है।
नलों में अब पूरे समय पानी नहीं आता। नल खोलो तो उससे पानी के बदले सूँ-सूँ की आवाज आने लगती है। पानी आता भी है तो बेवक्त। कभी देर रात को तो कभी बहुत सबेरे।
मीठी नींद छोड़कर घर भर की बालटियाँ, बर्तन और घड़े भरते फिरो। पानी को लेकर कभी-कभी, कहीं-कहीं आपस में तू-तू मैं-मैं भी होने लगती है।
रोज-रोज के इन झगड़े-टंटों से बचने के लिए कई घरों में लोग नलों के पाइप में मोटर लगवा लेते हैं। इससे कई घरों का पानी खिंचकर एक ही घर में आ जाता है। यह तो अपने आस-पास का हक छीनने जैसा काम है, लेकिन मजबूरी मानकर इस काम को मोहल्ले में कोई एक घर कर बैठे तो फिर और कई घर यही करने लगते हैं। पानी की कमी और बढ़ जाती है। शहरों में तो अब कई चीजों की तरह पानी भी बिकने लगा है। यह कमी गाँव-शहरों में ही नहीं बल्कि हमारे प्रदेशों की राजधानियों में और दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बैंगलोर जैसे बड़े शहरों में भी लोगों को भयानक कष्ट में डाल देती है। देश के कई हिस्सों में तो अकाल जैसी हालत बन जाती है। यह तो हुई गर्मी के मौसम की बात।
लेकिन बरसात के मौसम में क्या होता है? लो, सब तरफ पानी ही बहने लगता है। हमारे-तुम्हारे घर, स्कूल, सड़कों, रेल की पटरियों पर पानी भर जाता है। देश के कई भाग बाढ़ में डूब जाते हैं। यह बाढ़ न गाँवों को छोड़ती है और न मुंबई जैसे बड़े शहरों को। कुछ दिनों के लिए सब कुछ थम जाता है, सब कुछ बह जाता है।
ये हालात हमें बताते हैं कि पानी का बेहद कम हो जाना और पानी का बेहद ज्यादा हो जाना, यानी अकाल और बाढ़ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि हम इन दोनों को ठीक से समझ सकें और सँभाल लें तो इन कई समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है।
चलो, थोड़ी देर के लिए हम पानी के इस चक्कर को भूल जाएँ और याद करें अपनी गुल्लक को। जब भी हमें कोई पैसा देता है, हम खुश होकर, दौड़कर उसे झट से अपनी गुल्लक में डाल देते हैं। एक रुपया, दो रुपया, पाँच रुपया, कभी सिक्के, तो कभी छोटे-बड़े नोट सब इसमें धीरे-धीरे जमा होते जाते हैं। फिर जब हमें कभी कुछ पैसों की जरूरत पड़ती है तो इस गुल्लक की बचत का उपयोग कर लेते हैं।
हमारी यह धरती भी इसी तरह की खूब बड़ी गुल्लक है। मिट्टी की बनी इस विशाल गुल्लक में प्रकृति वर्षा के मौसम में खूब पानी बरसाती है। तब रुपयों से भी कई गुना कीमती इस वर्षा को हमें इस बड़ी गुल्लक में जमा कर लेना चाहिए। हमारे गाँव में, शहर में जो छोटे-बड़े तालाब, झील आदि हैं, वे धरती की गुल्लक में पानी भरने का काम करते हैं। इनमें जमा पानी जमीन के नीचे छिपे जल के भंडार में धीरे-धीरे रिसकर, छनकर जा मिलता है। इससे हमारा भूजल भंडार समृद्ध होता जाता है। पानी का यह खजाना हमें दिखता नहीं, लेकिन इसी खजाने से हम बरसात का मौसम बीत जाने के बाद पूरे साल भर तक अपने उपयोग के लिए घर में, खेतों में, पाठशाला में पानी निकाल सकते हैं। लेकिन एक दौर ऐसा भी आया जब हम लोग इस छिपे खजाने का महत्व भूल गए और जमीन के लालच में हमने अपने तालाबों को कचरे से पाटकर, भरकर समतल बना दिया। देखते-ही-देखते इन पर तो कहीं मकान, कहीं बाजार, स्टेडियम और सिनेमा आदि खड़े हो गए।
इस बड़ी गलती की सजा अब हम सबको मिल रही है। गर्मी के दिनों में हमारे नल सूख जाते हैं और बरसात के दिनों में हमारी बस्तियाँ डूबने लगती हैं। इसीलिए यदि हमें अकाल और बाढ़ से बचना है तो अपने आस-पास के जलस्रोतों की, तालाबों की और नदियों आदि की रखवाली अच्छे ढंग से करनी पड़ेगी।
जल-चक्र हम ठीक से समझें, जब बरसात हो तो उसे थाम लें, अपना भूजल भंडार सुरक्षित रखें, अपनी गुल्लक भरते रहें, तभी हमें जरूरत के समय पानी की कोई कमी नहीं आएगी। यदि हमने जल-चक्र का ठीक उपयोग नहीं किया तो हम पानी के चक्कर में फँसते चले जाएँगे।
— अनुपम मिश्र
सरल व्याख्या
भाग 1 — जल-चक्र की किताबी बात
भावार्थ — लेखक बताते हैं कि भूगोल की किताब में जल-चक्र को सूरज, समुद्र, बादल, वर्षा और नदी के माध्यम से समझाया जाता है — समुद्र से भाप उठकर बादल बनती है, वर्षा होती है, नदियाँ बहकर पानी वापस समुद्र में मिला देती हैं, और इस तरह जल-चक्र पूरा होता है। यह जल-चक्र की सैद्धांतिक (किताबी) व्याख्या है।
भाग 2 — पानी की वास्तविक समस्या (जल-संकट)
भावार्थ — वास्तविकता में नलों में पूरे समय पानी नहीं आता, कभी बेवक्त आता है, जिससे लोगों को असुविधा होती है और आपस में झगड़े भी होते हैं। कई घर मोटर लगाकर दूसरों का हक छीन लेते हैं, जिससे जल-संकट और गहरा होता है। यह संकट गाँव-शहर से लेकर दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों तक और देश के कई हिस्सों में अकाल जैसी स्थिति पैदा कर देता है।
भाग 3 — बाढ़ की समस्या
भावार्थ — बरसात के मौसम में स्थिति बिलकुल विपरीत हो जाती है — घर, स्कूल, सड़कें और रेल पटरियाँ तक पानी में डूब जाती हैं। बाढ़ गाँव और शहर, दोनों को प्रभावित करती है। लेखक बताते हैं कि अकाल (पानी की अत्यधिक कमी) और बाढ़ (पानी की अत्यधिक अधिकता) दरअसल एक ही समस्या के दो रूप हैं।
भाग 4 — धरती रूपी गुल्लक का रूपक
भावार्थ — लेखक धरती की तुलना एक बड़ी गुल्लक से करते हैं। जिस प्रकार हम पैसे बचाकर गुल्लक में जमा करते हैं, उसी प्रकार वर्षा का पानी तालाबों और झीलों के माध्यम से धरती के भीतर संचित होकर भूजल भंडार बनाता है, जो हमें पूरे वर्ष पानी उपलब्ध कराता है।
भाग 5 — गलती और उसकी सजा
भावार्थ — लेखक खेद व्यक्त करते हैं कि हमने जमीन के लालच में तालाबों को कचरे से पाटकर मकान, बाजार, स्टेडियम आदि बना डाले, जिससे भूजल भंडार को पानी मिलना बंद हो गया। इसी गलती की सजा आज हमें गर्मी में सूखे नलों और बरसात में डूबती बस्तियों के रूप में मिल रही है। लेखक अंत में संदेश देते हैं कि जल-चक्र को समझकर, वर्षा जल को सहेजकर और भूजल भंडार को सुरक्षित रखकर ही हम इस संकट से बच सकते हैं।
शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| जल-चक्र | पानी का समुद्र से बादल, वर्षा और नदी होते हुए पुनः समुद्र में मिलने का चक्र |
| बेवक्त | असमय, गलत समय पर |
| तू-तू मैं-मैं (मुहावरा) | आपस में झगड़ा, कहा-सुनी |
| झगड़े-टंटे | विवाद, कलह |
| हक छीनना | किसी का अधिकार जबरन ले लेना |
| मोहल्ला | बस्ती, पड़ोस का क्षेत्र |
| अकाल | भीषण सूखा, पानी/अन्न की भारी कमी |
| बाढ़ | अत्यधिक पानी से डूब जाने की स्थिति |
| सिक्के के दो पहलू (मुहावरा) | एक ही समस्या के दो अलग-अलग रूप |
| गुल्लक | पैसे बचाकर रखने का मिट्टी का पात्र |
| भूजल भंडार | जमीन के नीचे संचित जल का भंडार |
| रिसना | धीरे-धीरे टपकना/समाना |
| छनना | छानकर शुद्ध होते हुए जाना |
| खजाना | बहुमूल्य संचित वस्तु/धन |
| लालच | अधिक पाने की इच्छा |
| पाटना | भरकर समतल कर देना |
| जलस्रोत | पानी का उद्गम स्थान (नदी, तालाब, झील आदि) |
| रखवाली | देखभाल, सुरक्षा |
पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
(क) निम्नलिखित प्रश्नों का सही उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।
- हमारा भूजल भंडार निम्नलिखित में से किससे समृद्ध होता है?
- नल सूख जाने से
- बाढ़ आने से
- ★ तालाब और झीलों से
- पानी बिकने से
- निम्नलिखित में से कौन-सी बात जल-चक्र से संबंधित है?
- वर्षा जल का संग्रह करना
- ★ समुद्र से उठी भाप का बादल बनकर बरसना
- नदियों का समुद्र में जाकर मिलना
- बरसात में चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देना
- "इस बड़ी गलती की सजा अब हम सबको मिल रही है" — यहाँ किस गलती की ओर संकेत किया गया है?
- जल-चक्र की अवधारणा को न समझना
- आवश्यकता से अधिक पानी का उपयोग करना
- ★ तालाबों को कचरे से पाटकर समाप्त करना
- भूजल भंडारण के विषय में विचार न करना
(ख) अब अपने मित्रों के साथ संवाद कीजिए और कारण बताइए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने — यह एक समूह-चर्चा गतिविधि है।
पाठ में से कुछ शब्द समूह या संदर्भ चुनकर स्तंभ 1 में दिए गए हैं और उनके अर्थ स्तंभ 2 में दिए गए हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और रेखा खींचकर सही मिलान कीजिए—
| स्तंभ 1 | सही मिलान (स्तंभ 2) |
|---|---|
| 1. वर्षा जल संग्रहण | वर्षा के जल को प्राकृतिक अथवा कृत्रिम रूप से (मानवीय प्रयासों से) धरती में संग्रह करना |
| 2. जल संकट | जल की अत्यधिक कमी होना |
| 3. जल-चक्र | समुद्र से उठी भाप का बादल बनकर पानी में बदलना और वर्षा के द्वारा पुनः समुद्र में मिल जाना |
| 4. भूजल | जमीन के नीचे छिपा जल भंडार |
इस पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और अपने सहपाठियों से चर्चा कीजिए।
(क) "पानी आता भी है तो बेवक्त।"
भावार्थ: जल-आपूर्ति अनियमित और अव्यवस्थित हो गई है, जिससे लोगों को असुविधा होती है।
(ख) "देश के कई हिस्सों में तो अकाल जैसे हालात बन जाते हैं।"
भावार्थ: जल-संकट इतना गंभीर हो जाता है कि सूखे जैसी विकट स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
(ग) "कुछ दिनों के लिए सब कुछ थम जाता है।"
भावार्थ: बाढ़ के कारण जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त होकर रुक जाता है।
(घ) "अकाल और बाढ़ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।"
भावार्थ: पानी की अत्यधिक कमी (अकाल) और अत्यधिक अधिकता (बाढ़), दोनों वास्तव में जल-प्रबंधन की एक ही मूल समस्या के दो अलग-अलग रूप हैं।
लेख को एक बार पुनः पढ़िए और निम्नलिखित के विषय में पता लगाकर लिखिए—
(क) पाठ में धरती को एक बहुत बड़ी गुल्लक क्यों कहा गया है?
क्योंकि जिस प्रकार हम पैसे बचाकर गुल्लक में जमा करते हैं, उसी प्रकार धरती भी वर्षा के जल को तालाबों-झीलों के माध्यम से अपने भीतर भूजल के रूप में संचित करती है।
(ख) जल-चक्र की प्रक्रिया कैसे पूरी होती है?
समुद्र से उठी भाप बादल बनती है, बादल वर्षा के रूप में बरसते हैं, वर्षा का जल नदियों के माध्यम से बहकर पुनः समुद्र में जा मिलता है — इस प्रकार जल-चक्र पूरा होता है।
(ग) यदि सारी नदियाँ, झीलें और तालाब सूख जाएँ तो क्या होगा?
भूजल भंडार समृद्ध नहीं हो पाएगा, पानी की भीषण कमी हो जाएगी, खेती व दैनिक जीवन प्रभावित होगा और अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
(घ) पाठ में पानी को रुपयों से भी कई गुना मूल्यवान क्यों बताया गया है?
क्योंकि रुपये-पैसे के बिना जीवन चल सकता है परंतु पानी के बिना जीवन असंभव है; पानी हर प्राणी की मूलभूत आवश्यकता है, इसलिए इसका मूल्य धन से भी अधिक है।
(क) इस पाठ का शीर्षक 'पानी रे पानी' दिया गया है। पाठ का यह नाम क्यों दिया गया होगा? अपने सहपाठियों के साथ चर्चा करके लिखिए। अपने उत्तर का कारण भी लिखिए।
'पानी रे पानी' शीर्षक पानी के महत्व और उससे जुड़ी विभिन्न समस्याओं (कमी और बाढ़, दोनों) की ओर बार-बार ध्यान आकर्षित करता है; दोहराव पानी की गंभीरता और आवश्यकता पर विशेष बल देता है।
(ख) आप इस पाठ को क्या नाम देना चाहेंगे? इसका कारण भी लिखिए।
यह एक व्यक्तिगत/रचनात्मक प्रश्न है — विद्यार्थी अपने विचार से शीर्षक सुझाएँ, जैसे 'धरती की गुल्लक' या 'जल का संकट', और उसका कारण भी स्पष्ट करें।
"हमारी यह धरती भी इसी तरह की एक गुल्लक है।" "हमारी यह धरती इसी तरह की एक गुल्लक है।"
(क) इन दोनों वाक्यों को ध्यान से पढ़िए। दूसरे वाक्य में कौन-सा शब्द हटा दिया गया है? उस शब्द को हटा देने से वाक्य के अर्थ में क्या अंतर आया, पहचान कर लिखिए।
दूसरे वाक्य में 'भी' शब्द हटा दिया गया है। 'भी' शब्द तुलना और विशेष बल देने के लिए प्रयुक्त होता है — इसे हटाने से वाक्य में वह ज़ोर या तुलनात्मक भाव समाप्त हो जाता है जो पहले वाक्य में था।
(ख) पाठ में ऐसे ही कुछ और शब्द भी आए हैं जो अपनी उपस्थिति से वाक्य में विशेष प्रभाव उत्पन्न करते हैं। पाठ को फिर से पढ़िए और इस तरह के शब्दों वाले वाक्यों को चुनकर लिखिए।
उदाहरण: "पानी आता भी है तो बेवक्त" (यहाँ 'भी' पानी के अनियमित आने पर बल देता है); "अब तो हम सबके घरों में... पानी का कुछ अजीब-सा चक्कर सामने आने लगा है" (यहाँ 'अब तो' समय में आए बदलाव पर विशेष बल देता है)।
नीचे दिए गए वाक्यों में रेखांकित शब्दों के स्थान पर समान अर्थ देने वाले उपयुक्त शब्द लिखिए। इस कार्य के लिए आप बादल में से शब्द चुन सकते हैं (सूर्य, मेघ, भास्कर, पवन, वारिद, वायु, दिवाकर, जलद, वाष्प, समीर, दिनकर, नीरद)—
- सूरज की किरणें पड़ते ही फूल खिल उठे। (सूर्य / भास्कर / दिवाकर / दिनकर)
- समुद्र का पानी भाप बनकर ऊपर जाता है। (वाष्प)
- अचानक बादल गरजने लगे। (मेघ / वारिद / जलद / नीरद)
- जल-चक्र में हवा की भी बहुत बड़ी भूमिका है। (पवन / वायु / समीर)
"देश के कई हिस्सों में तो अकाल जैसे हालात बन जाते हैं।" उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित शब्द 'अकाल' में 'अ' ने 'काल' शब्द में जुड़कर एक नया अर्थ दिया है। काल का अर्थ है— समय, मृत्यु; जबकि अकाल का अर्थ है— कुसमय, सूखा। कुछ शब्दांश किसी शब्द के आरंभ में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं या कोई विशेषता उत्पन्न कर देते हैं और इस प्रकार नए शब्दों का निर्माण करते हैं। इस तरह के शब्दांश 'उपसर्ग' कहलाते हैं।
कुछ और उपसर्गों की पहचान करते हैं— 'देश' शब्द में प्र, वि, पर, स्व उपसर्ग जोड़ने पर क्रमशः प्रदेश, विदेश, परदेश, स्वदेश शब्द बनते हैं।
अब आप भी उपसर्ग के प्रयोग से नए शब्द बनाकर उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए—
| उपसर्ग + मूल शब्द | नया शब्द | वाक्य-प्रयोग |
|---|---|---|
| सु + पात्र | सुपात्र | दान सदा सुपात्र को ही देना चाहिए। |
| अ + पात्र | अपात्र | अपात्र व्यक्ति को यह पुरस्कार नहीं मिलना चाहिए। |
| सु + ज्ञान | सुज्ञान | सुज्ञान से जीवन में सफलता मिलती है। |
| अ + ज्ञान | अज्ञान | अज्ञान ही अनेक समस्याओं की जड़ है। |
| वि + ज्ञान | विज्ञान | विज्ञान ने मानव-जीवन को सरल बना दिया है। |
(क) धरती की गुल्लक में जलराशि की कमी न हो, इसके लिए आप क्या-क्या प्रयास कर सकते हैं, अपने सहपाठियों के साथ चर्चा करके लिखिए।
वर्षा जल संग्रहण करना, तालाबों-झीलों की सफाई और रखवाली करना, पानी का सीमित व सोच-समझकर उपयोग करना, पेड़-पौधे लगाना, और जल-स्रोतों को प्रदूषण व कचरे से बचाना — ये कुछ महत्वपूर्ण प्रयास हो सकते हैं।
(ख) इस पाठ में एक छोटे-से खंड में जल-चक्र की प्रक्रिया को प्रस्तुत किया गया है। उस खंड की पहचान करें और जल-चक्र को चित्र के माध्यम से प्रस्तुत करें।
यह खंड पाठ के आरंभ में है: "सूरज, समुद्र, बादल, हवा, धरती, फिर बरसात की बूँदें और लो फिर बहती हुई एक नदी..." — यह एक रचनात्मक चित्रकला-गतिविधि है, जिसमें विद्यार्थी सूरज, समुद्र, बादल, वर्षा और नदी को चित्र में दर्शाते हुए जल-चक्र बनाएँ।
(ग) अपने द्वारा बनाए गए जल-चक्र के चित्र का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
यह एक मौखिक प्रस्तुतीकरण गतिविधि है — विद्यार्थी अपने बनाए चित्र के आधार पर जल-चक्र के प्रत्येक चरण (वाष्पीकरण, बादल-निर्माण, वर्षा, प्रवाह, समुद्र में मिलन) का वर्णन करें।
(क) कल्पना कीजिए कि किसी दिन आपके घर में पानी नहीं आया। आपको विद्यालय जाना है। आपके घर के समीप ही एक सार्वजनिक नल है। आप बालटी लेकर वहाँ पहुँचते हैं और ठीक उसी समय आपके पड़ोसी भी पानी लेने पहुँच जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में आपस में विवाद न हो, यह ध्यान में रखते हुए पाँच संदेश वाक्य (स्लोगन) तैयार कीजिए।
नमूना स्लोगन: 1) "बाँटकर पिएँ, मिलकर जिएँ — पानी सबका है।" 2) "जल है तो कल है, आपस में झगड़ा नहीं।" 3) "बारी-बारी से लें पानी, यही है सच्ची समझदारी।" 4) "एक बूँद भी कीमती, मिल-बाँटकर करें उपयोग।" 5) "सहयोग से सुलझे हर समस्या, जल-बँटवारे में भी अपनाएँ यह प्रथा।"
(ख) "सूरज, समुद्र, बादल, हवा, धरती, फिर बरसात की बूँदें और फिर बहती हुई एक नदी और उसके किनारे बसा तुम्हारा, हमारा घर, गाँव या शहर।" इस वाक्य को पढ़कर आपके सामने कोई एक चित्र उभर आया होगा, उस चित्र को बनाकर उसमें रंग भरिए।
यह एक रचनात्मक चित्रकला-गतिविधि है — विद्यार्थी अपनी कल्पना के अनुसार सूरज, समुद्र, बादल, नदी और गाँव/शहर का दृश्य बनाकर रंग भरें।
नीचे हम सबकी दिनचर्या से जुड़ी कुछ गतिविधियों के चित्र दिए गए हैं। उन चित्रों पर बातचीत कीजिए जो धरती पर पानी के संकट को कम करने में सहायक हैं और उन चित्रों पर भी बात करें जो पानी की गुल्लक को जल्दी ही खाली कर रहे हैं।
चित्रों में बाल्टी से नहाना, पौधों को पानी देना, वर्षा जल संग्रहण, हैंडपंप/मोटर से पानी भरना और नल से सीधे पानी पीना जैसी दिनचर्या की गतिविधियाँ दिखाई गई हैं। इनमें से बाल्टी का उपयोग, पौधों को सीमित मात्रा में पानी देना और वर्षा जल संग्रहण जैसी गतिविधियाँ पानी बचाने में सहायक हैं, जबकि वाहन धोने में बहते पानी का उपयोग या नल को खुला छोड़ देना जैसी गतिविधियाँ पानी की बर्बादी करती हैं। यह एक चित्र-आधारित समूह-चर्चा गतिविधि है।
'सभी को अपनी आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त पानी कैसे मिले' इस विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन करके, परिचर्चा के मुख्य बिंदुओं को आधार बनाते हुए एक रिपोर्ट तैयार करने की गतिविधि है — विद्यार्थी समान जल-वितरण, जल-संरक्षण और सामुदायिक सहयोग जैसे बिंदुओं पर चर्चा करके रिपोर्ट लिखें।
(क) क्या आपने कभी यह जानने का प्रयास किया है कि आपके घर में एक दिन में औसतन कितना पानी खर्च होता है? अपने घर में पानी के उपयोग से जुड़ी एक तालिका बनाइए।
यह एक व्यक्तिगत सर्वेक्षण गतिविधि है — विद्यार्थी अपने घर के दैनिक जल-उपयोग (नहाने, खाना बनाने, कपड़े धोने आदि) का अवलोकन करके बाल्टी/घड़े को मापक बनाकर तालिका तैयार करें।
(ख) क्या आपको अपनी आवश्यकतानुसार पानी उपलब्ध हो जाता है? यदि हाँ, तो कैसे? यदि नहीं, तो क्यों?
यह एक व्यक्तिगत अनुभव-आधारित प्रश्न है — विद्यार्थी अपने घर की स्थिति के आधार पर उत्तर लिखें।
(ग) आपके घर में दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पानी का संचयन कैसे और किन पात्रों में किया जाता है?
विद्यार्थी अपने घर में उपयोग होने वाले पात्रों (टंकी, घड़े, बालटी, ड्रम आदि) के आधार पर उत्तर लिखें।
जन-सुविधा के रूप में जल: दिए गए चित्रों में सार्वजनिक जल-वितरण केंद्र, पानी के टैंकर से जल भरना, तालाब से पानी लाना, सिर पर मटका ढोकर पानी ले जाना और जल-रेल द्वारा जल-आपूर्ति जैसी स्थितियाँ दिखाई गई हैं — ये सभी चित्र जल-संकट की गंभीरता और सार्वजनिक जल-आपूर्ति व्यवस्था की आवश्यकता को दर्शाते हैं। इन चित्रों के आधार पर जल-आपूर्ति की स्थिति पर सहपाठियों से चर्चा करके विवरण लिखने की गतिविधि है।
(क) पाठ में भूजल स्तर के कम होने के कुछ कारण बताए गए हैं, जैसे— तालाबों में कचरा फेंककर भरना आदि। भूजल स्तर कम होने के और क्या-क्या कारण हो सकते हैं? पता लगाइए और कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
अत्यधिक भूजल दोहन (बोरवेल से अत्यधिक पानी निकालना), वनों की कटाई, अनियोजित शहरीकरण, वर्षा जल संग्रहण की कमी, तथा कंक्रीट सड़कों के कारण पानी का जमीन में न रिसना — ये भी भूजल स्तर कम होने के प्रमुख कारण हैं।
(ख) भूजल स्तर की कमी से हमें आजकल किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है?
पीने के पानी की कमी, खेती की सिंचाई में कठिनाई, बार-बार गहरे बोरवेल खुदवाने की आवश्यकता, तथा गर्मियों में जल-संकट जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
(ग) आपके विद्यालय, गाँव या शहर के स्थानीय प्रशासन द्वारा भूजल स्तर बढ़ाने के लिए क्या-क्या प्रयास किए जा रहे हैं, पता लगाकर लिखिए।
यह एक स्थानीय अन्वेषण-गतिविधि है — विद्यार्थी अपने क्षेत्र में चल रहे वर्षा जल संग्रहण अभियान, तालाब-पुनरुद्धार कार्यक्रम या जल-संरक्षण योजनाओं के बारे में जानकारी एकत्र करके लिखें।
वर्षा के जल को एकत्र करना और उसका भंडारण करके बाद में प्रयोग करना जल की उपलब्धता में वृद्धि करने का एक उपाय है। इस उपाय द्वारा वर्षा का जल एकत्र करने को 'वर्षा जल संग्रहण' कहते हैं। वर्षा जल संग्रहण का मूल उद्देश्य यही है कि "जल जहाँ गिरे वहीं एकत्र कीजिए।" छत के ऊपर वर्षा-जल संग्रहण की एक तकनीक में भवनों की छत पर एकत्रित वर्षा जल को पाइप द्वारा भंडारण टंकी में पहुँचाया जाता है। इस जल में छत पर उपस्थित मिट्टी के कण मिल जाते हैं, अतः इसका उपयोग करने से पहले इसे स्वच्छ करना आवश्यक होता है।
अपने घर या विद्यालय के आस-पास, मुहल्ले या गाँव में पता लगाइए कि वर्षा जल संग्रहण की कोई विधि अपनाई जा रही है या नहीं। यदि हाँ, तो उसके विषय में लिखिए। यदि नहीं, तो शिक्षक या परिजनों की सहायता से इस विषय में समाचार पत्र के संपादक को एक पत्र लिखने की गतिविधि है।
जल के प्राकृतिक स्रोत हैं— वर्षा, नदी, झील और तालाब। दिए गए शब्द-खोज वर्ग में जल और इन प्राकृतिक स्रोतों के समानार्थी शब्द ढूँढ़िए और लिखिए।
पहेली में पहचाने जा सकने वाले कुछ शब्द: अंबु (जल का पर्याय), बारिश (वर्षा का पर्याय), प्रवाहिनी व तरंगिणी (नदी के पर्याय)। इसके अतिरिक्त जल के अन्य सामान्य पर्याय हैं — नीर, वारि, तोय; वर्षा के अन्य पर्याय — वृष्टि; झील का पर्याय — सरोवर; तालाब का पर्याय — पोखर/जलाशय।पानी से संबंधित गीत या कविताओं का संकलन कीजिए और इनमें से कुछ को अपनी कक्षा में प्रस्तुत कीजिए। इसके लिए अपने परिजनों एवं शिक्षक अथवा पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता ली जा सकती है — यह एक स्वतंत्र संकलन-गतिविधि है।
झरोखे से — पाल के किनारे रखा इतिहास
तालाबों और नदियों से रिसकर धरती रूपी गुल्लक में जमा होने वाले पानी के संबंध में हमने यह रोचक लेख पढ़ा। अब आइए, तालाबों के बनने के इतिहास के विषय में अनुपम मिश्र के ही एक अन्य लेख 'पाल के किनारे रखा इतिहास' का अंश पढ़ते हैं।
"अच्छे-अच्छे काम करते जाना", राजा ने कूड़न किसान से कहा था। कूड़न, बुढ़ान, सरमन और कौंराई थे चार भाई। चारों सुबह जल्दी उठकर अपने खेत पर काम करने जाते। दोपहर को कूड़न की बेटी आती, पोटली में खाना लेकर।
एक दिन घर से खेत जाते समय बेटी को एक नुकीले पत्थर से ठोकर लग गई। उसे बहुत गुस्सा आया। उसने अपनी दराँती से उस पत्थर को उखाड़ने की कोशिश की। पर लो, उसकी दराँती तो पत्थर पर पड़ते ही लोहे से सोने में बदल गई! और फिर बदलती जाती हैं इस लंबे किस्से की घटनाएँ — पत्थर उठाकर लड़की भागी-भागी खेत पर आती है। अपने पिता और चाचाओं को सब कुछ एक साँस में बता देती है। चारों भाइयों की साँस भी अटक जाती है। जल्दी-जल्दी सब घर लौटते हैं। उन्हें मालूम पड़ चुका है कि उनके हाथ में कोई साधारण पत्थर नहीं है, पारस है। वे लोहे की जिस चीज को छूते हैं, वह सोना बनकर उनकी आँखों में चमक भर देती है।
पर आँखों की यह चमक ज्यादा देर तक नहीं टिक पाती। कूड़न को लगता है कि देर-सबेर राजा तक यह बात पहुँच ही जाएगी और तब पारस छिन जाएगा। तो क्या यह ज्यादा अच्छा नहीं होगा कि वे खुद जाकर राजा को सब कुछ बता दें।
किस्सा आगे बढ़ता है। फिर जो कुछ घटता है, वह लोहे को नहीं बल्कि समाज को पारस से छुड़ाने का किस्सा बन जाता है। राजा न पारस लेता है, न सोना। सब कुछ कूड़न को वापस देते हुए कहता है, "जाओ इससे अच्छे-अच्छे काम करते जाना, तालाब बनाते जाना।"
यह कहानी सच्ची है, ऐतिहासिक है — नहीं मालूम। पर देश के मध्य भाग में एक बहुत बड़े हिस्से में यह इतिहास को अँगूठा दिखाती हुई लोगों के मन में रमी हुई है। यहीं के पाटन नामक क्षेत्र में चार बहुत बड़े तालाब आज भी मिलते हैं और इस कहानी को इतिहास की कसौटी पर कसने वालों को लजाते हैं — चारों तालाब इन्हीं चारों भाइयों के नाम पर हैं। बूढ़ा सागर, मझगवाँ में सरमन सागर है, कुआँग्राम में कौंराई सागर है तथा कुंडम गांव में कुंडम सागर। इतिहास ने सरमन, बुढ़ान, कौंराई और कूड़न को याद नहीं रखा लेकिन इन लोगों ने तालाब बनाए और इतिहास को उनके किनारे पर रख दिया था।
किसी तालाब को राजा ने बनाया तो किसी को रानी ने, किसी को किसी साधारण गृहस्थ ने तो किसी को किसी असाधारण साधु-संत ने — जिस किसी ने भी तालाब बनाया, वह महाराज या महात्मा ही कहलाया। एक कृतज्ञ समाज तालाब बनाने वालों को अमर बनाता था और लोग भी तालाब बनाकर समाज के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते थे।
— अनुपम मिश्र
'पानी रे पानी' और 'पाल के किनारे रखा इतिहास' में आपको कौन-कौन-सी बातें समान लगीं? उनके विषय में अपने सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए।
दोनों ही रचनाएँ अनुपम मिश्र द्वारा लिखी गई हैं और जल-संरक्षण, विशेषकर तालाबों के महत्व, पर केंद्रित हैं। दोनों में यह संदेश है कि तालाब न केवल जल-संचय का साधन हैं बल्कि सामाजिक कृतज्ञता और सामूहिक जिम्मेदारी का भी प्रतीक हैं — 'पानी रे पानी' जहाँ जल-चक्र और आधुनिक जल-संकट पर केंद्रित है, वहीं 'पाल के किनारे रखा इतिहास' कहानी-शैली में तालाब बनाने की परंपरा और उसके सामाजिक महत्व को उजागर करता है।
पढ़ने के लिए — विश्वेश्वरैया
यह एक पूरक पठन-सामग्री है, जिसमें प्रसिद्ध अभियंता (इंजीनियर) मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के बचपन की एक प्रेरक घटना का वर्णन है (लेखक: आर. के. मूर्ति; अनुवाद: सुमन जैन)।
आकाश में अँधेरा छाया हुआ था। बादल आकाश में मँडराते हुए एक-दूसरे से टकरा जाते तो बिजली चमक उठती और गर्जन होता। फिर मूसलाधार वर्षा होने लगी। कुछ ही देर में गड्ढे और नालियाँ पानी से भर गईं।
छः वर्षीय विश्वेश्वरैया अपने घर के बरामदे में खड़ा इस दृश्य को निहार रहा था। गली में पंक्तियों में खड़े पेड़ बारिश में धुल जाने के कारण साफ व सुंदर दिखाई दे रहे थे। पत्तियों और टहनियों से पानी की बूँदें टप-टप गिर रही थीं। थोड़ी ही दूरी पर हरे-भरे धान के खेत लहलहा रहे थे।
जहाँ विश्वेश्वरैया खड़ा था वहीं निकट की नाली का पानी उमड़-घुमड़ रहा था। उसमें भँवर भी उठ रहे थे। उसने एक जलप्रपात का रूप धारण कर लिया था। वह एक बहुत बड़े पत्थर को अपने साथ बहा कर ले जा रहा था, जिससे उसकी शक्ति का प्रदर्शन होता था। विश्वेश्वरैया ने हवा और सूर्य की शक्ति को भी देखा था। सामूहिक रूप से वे प्रकृति की असीम शक्ति की ओर संकेत कर रहे थे। 'प्रकृति शक्ति है। मुझे प्रकृति के बारे में सब कुछ जानना चाहिए' वह छोटा-सा लड़का बुदबुदाया।
फिर उसने थोड़ी दूरी पर, निर्भीकता से मूसलाधार वर्षा में खड़ी एक आकृति को ताड़पत्र की छतरी हाथ में लिए देखा। वह उसे तुरंत पहचान गया। उसके कपड़े फटे हुए थे। वह कमजोर और भूखी लग रही थी। वह एक झोंपड़ी में रहती थी। उसके बच्चे कभी स्कूल नहीं जाते। वह गरीब थी। विश्वेश्वरैया ने सोचा 'वह इतनी गरीब क्यों है?'
उन्होंने बड़ी गंभीरता से प्रकृति और गरीबी के कारण के बारे में जानने का प्रयास किया। वह परिवार के बड़ों से इन बातों का उत्तर जानना चाहते थे। वह अपने अध्यापकों से भी जिरह करते। वह उनसे प्रकृति के बारे में पूछते— ऊर्जा के कौन से प्रचलित स्रोत हैं? कैसे इस ऊर्जा को पकड़ कर इस्तेमाल में लाया जा सकता है?
वह यह भी पूछते कि आखिर इतने लोग गरीब क्यों हैं? नौकरानी फटी साड़ी क्यों पहनती है? वह झोंपड़ी में क्यों रहती है? क्या उसे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजना चाहिए?
धीरे-धीरे इस लड़के को प्रकृति और जीवन के बारे में अंतर्दृष्टि प्राप्त होने लगी। उन्हें महसूस हुआ कि ज्ञान असीमित है। उसे बिना रुके, सीखते रहना होगा। तभी उन्हें उन प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं जो उन्होंने उठाए थे। उन्होंने निश्चय किया कि वह जीवनपर्यंत छात्र बने रहेंगे क्योंकि बहुत कुछ सीखना बाकी है। इसी संकल्प में उनकी महानता की कुंजी थी।
मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म मैसूर (जो अब कर्नाटक में है) के मुद्देनहल्ली नामक स्थान पर 15 सितंबर 1861 को हुआ था। उनके पिता वैद्य थे। वर्षों पहले उनके पूर्वज आंध्र प्रदेश के मोक्षगुंडम से यहाँ आए और मैसूर में बस गए थे।
दो वर्ष की आयु से ही उनका परिचय रामायण, महाभारत और पंचतंत्र की कहानियों से हो गया था। ये कहानियाँ हर रात घर की वृद्ध महिलाएँ उन्हें सुनाती थीं। कहानियाँ शिक्षाप्रद व मनोरंजक थीं। इन कहानियों से विश्वेश्वरैया ने ईमानदारी, दया और अनुशासन जैसे मूल मानवीय मूल्यों को आत्मसात किया। विश्वेश्वरैया चिकबल्लापुर के मिडिल व हाईस्कूल में पढ़े। जब उन्हें 'गाड सेव द किंग' (ईश्वर राजा को सुरक्षित रखे) वाला गीत गाने को कहा गया तो उन्हें पता चला कि भारत एक ब्रिटिश उपनिवेश है, अपने मामलों में भी भारतीयों को कुछ कहने का अधिकार न था। भारत की अधिकांश संपत्ति विदेशियों ने हड़प ली थी।
क्या उनके घर में काम करने वाली नौकरानी विदेशी शासन के कारण गरीब है? यह प्रश्न विश्वेश्वरैया के मस्तिष्क में उमड़ता-घुमड़ता रहा। राष्ट्रीयता की चिंगारी जल उठी थी और उनके जीवन में यह अंत समय तक जलती रही। विश्वेश्वरैया जब केवल चौदह वर्ष के थे तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई। क्या वह अपनी पढ़ाई जारी रखें? इस प्रश्न पर तब विचार-विमर्श हुआ जब उन्होंने अपनी माँ से कहा, "अम्मा, क्या मैं बंगलौर जा सकता हूँ? मैं वहाँ मामा रामैया के यहाँ रह सकता हूँ। वहाँ मैं कॉलेज में प्रवेश ले लूँगा।"
"पर बेटा... तुम्हारे मामा अमीर नहीं हैं। तुम उन पर बोझ क्यों बनना चाहते हो?" उनकी माँ ने तर्क दिया।
"अम्मा... मैं अपनी जरूरतों के लिए स्वयं कमाऊँगा। मैं बच्चों को ट्यूशन पढ़ाऊँगा। अपनी फीस देने और पुस्तकें खरीदने के लिए मैं काफी धन कमा लूँगा। मेरे ख्याल से मेरे पास कुछ पैसे बच भी जाएँगे, जिन्हें मैं मामा को दे दूँगा," विश्वेश्वरैया ने समझाया।
उनके पास हर प्रश्न का उत्तर था— समाधान ढूँढ़ने की क्षमता उनके पूरे जीवन में लगातार विकसित होती रही और इस कारण वह एक व्यावहारिक व्यक्ति बन गए। यह उनके जीवन का सार था और उनका संदेश था पहले जानो, फिर करो। बड़े होकर यही विश्वेश्वरैया एक महान इंजीनियर बने।
— आर. के. मूर्ति (अनुवाद — सुमन जैन)
बालक विश्वेश्वरैया के स्वभाव की किन विशेषताओं ने उन्हें आगे चलकर एक महान इंजीनियर बनाया?
जिज्ञासा, गहन अवलोकन-शक्ति, प्रश्न पूछने की आदत, ज्ञान को असीमित मानकर निरंतर सीखते रहने का संकल्प, तथा समस्याओं का व्यावहारिक समाधान खोजने की क्षमता — इन्हीं गुणों ने बालक विश्वेश्वरैया को आगे चलकर एक महान अभियंता बनाया।
अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न
(अ) बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
- 'पानी रे पानी' निबंध के लेखक कौन हैं?
- (क) अनुपम मिश्र ✓
- (ख) राजेंद्र सिंह
- (ग) आर. के. मूर्ति
- (घ) सुमन जैन
- अनुपम मिश्र किस क्षेत्र के जाने-माने विशेषज्ञ थे?
- (क) चिकित्सा
- (ख) पर्यावरण ✓
- (ग) खगोल विज्ञान
- (घ) अर्थशास्त्र
- अनुपम मिश्र की सर्वाधिक चर्चित पुस्तक कौन-सी है?
- (क) साफ माथे का समाज
- (ख) आज भी खरे हैं तालाब ✓
- (ग) गांधी मार्ग
- (घ) पाल के किनारे रखा इतिहास
- अनुपम मिश्र किस पत्रिका के संस्थापक-संपादक थे?
- (क) कादंबिनी
- (ख) गांधी मार्ग ✓
- (ग) धर्मयुग
- (घ) सरिता
- भूगोल की किताब में जल-चक्र किन तत्वों के माध्यम से समझाया जाता है?
- (क) पर्वत, गुफा, वन
- (ख) सूरज, समुद्र, बादल, हवा, धरती ✓
- (ग) पशु-पक्षी, वृक्ष
- (घ) रेगिस्तान, बर्फ
- नल खोलने पर पानी के बदले क्या सुनाई देता है?
- (क) गड़गड़ाहट
- (ख) सूँ-सूँ की आवाज ✓
- (ग) घंटी की आवाज
- (घ) कुछ नहीं
- कई घरों में लोग पानी की समस्या से बचने के लिए क्या लगवा लेते हैं?
- (क) बड़ी टंकी
- (ख) नलों के पाइप में मोटर ✓
- (ग) नया नल
- (घ) फिल्टर
- पाठ के अनुसार अकाल और बाढ़ को क्या कहा गया है?
- (क) दो अलग समस्याएँ
- (ख) एक ही सिक्के के दो पहलू ✓
- (ग) मौसम का सामान्य बदलाव
- (घ) मानव-निर्मित घटनाएँ नहीं
- लेखक ने धरती की तुलना किससे की है?
- (क) समुद्र से
- (ख) गुल्लक से ✓
- (ग) नदी से
- (घ) पहाड़ से
- तालाब और झीलें किस काम आती हैं?
- (क) केवल सुंदरता बढ़ाने के
- (ख) धरती की गुल्लक में पानी भरने के ✓
- (ग) मछली पालन के लिए ही
- (घ) नौका विहार के लिए
- तालाबों में जमा पानी कहाँ रिसकर मिलता है?
- (क) नदी में
- (ख) भूजल भंडार में ✓
- (ग) समुद्र में सीधे
- (घ) नाली में
- तालाबों को पाटकर लोगों ने क्या बना डाला?
- (क) मकान, बाजार, स्टेडियम, सिनेमा ✓
- (ख) नए तालाब
- (ग) पार्क और उद्यान
- (घ) खेत
- इस बड़ी गलती की सजा हमें किस रूप में मिल रही है?
- (क) प्रदूषण के रूप में
- (ख) गर्मी में सूखे नल और बरसात में डूबती बस्तियाँ ✓
- (ग) बीमारियों के रूप में
- (घ) महँगाई के रूप में
- लेखक के अनुसार जल-संकट से बचने के लिए क्या करना आवश्यक है?
- (क) नए नल लगवाना
- (ख) जलस्रोतों, तालाबों और नदियों की रखवाली करना ✓
- (ग) पानी का व्यापार बढ़ाना
- (घ) शहरों में और मकान बनाना
- 'अकाल' शब्द में कौन-सा उपसर्ग है?
- (क) आ
- (ख) अ ✓
- (ग) का
- (घ) कोई नहीं
- 'विज्ञान' शब्द में कौन-सा उपसर्ग है?
- (क) अ
- (ख) सु
- (ग) वि ✓
- (घ) अनु
- 'पाल के किनारे रखा इतिहास' किस लेखक की रचना है?
- (क) आर. के. मूर्ति
- (ख) अनुपम मिश्र ✓
- (ग) सुमन जैन
- (घ) महात्मा गांधी
- 'पाल के किनारे रखा इतिहास' में कूड़न को क्या मिला था?
- (क) सोने का सिक्का
- (ख) पारस पत्थर ✓
- (ग) हीरा
- (घ) खजाना
- राजा ने कूड़न को पारस पत्थर वापस करते हुए क्या करने को कहा?
- (क) व्यापार करने को
- (ख) तालाब बनाने को ✓
- (ग) महल बनाने को
- (घ) सेना बनाने को
- मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म कब हुआ था?
- (क) 15 अगस्त 1861
- (ख) 15 सितंबर 1861 ✓
- (ग) 15 अक्टूबर 1861
- (घ) 15 नवंबर 1861
- विश्वेश्वरैया का जन्म कहाँ हुआ था?
- (क) बंगलौर
- (ख) मुद्देनहल्ली, मैसूर ✓
- (ग) चेन्नई
- (घ) हैदराबाद
- विश्वेश्वरैया के पिता का पेशा क्या था?
- (क) अध्यापक
- (ख) वैद्य ✓
- (ग) किसान
- (घ) व्यापारी
- विश्वेश्वरैया जब कितने वर्ष के थे तब उनके पिता की मृत्यु हुई?
- (क) दस वर्ष
- (ख) चौदह वर्ष ✓
- (ग) अठारह वर्ष
- (घ) बीस वर्ष
- विश्वेश्वरैया के सम्मान में कौन-सा दिवस मनाया जाता है?
- (क) शिक्षक दिवस
- (ख) अभियंता दिवस (15 सितंबर) ✓
- (ग) विज्ञान दिवस
- (घ) राष्ट्रीय दिवस
- विश्वेश्वरैया के जीवन का मूल संदेश क्या था?
- (क) पहले धन कमाओ, फिर पढ़ो
- (ख) पहले जानो, फिर करो ✓
- (ग) कभी प्रश्न मत पूछो
- (घ) दूसरों पर निर्भर रहो
(ब) अति लघु उत्तरीय प्रश्न
- 'पानी रे पानी' निबंध के लेखक कौन हैं?
अनुपम मिश्र। - अनुपम मिश्र की सर्वाधिक चर्चित पुस्तक कौन-सी है?
आज भी खरे हैं तालाब। - अनुपम मिश्र किस पत्रिका के संस्थापक-संपादक थे?
गांधी मार्ग। - जल-चक्र में समुद्र से उठी भाप किसमें बदलती है?
बादल में। - नल खोलने पर पानी के बदले क्या सुनाई देता है?
सूँ-सूँ की आवाज। - पानी की कमी से बचने के लिए कई घर क्या लगवा लेते हैं?
नलों के पाइप में मोटर। - पाठ के अनुसार अकाल और बाढ़ क्या हैं?
एक ही सिक्के के दो पहलू। - लेखक ने धरती की तुलना किससे की है?
गुल्लक से। - तालाबों में जमा पानी कहाँ रिसकर मिलता है?
भूजल भंडार में। - तालाबों को पाटकर लोगों ने क्या बना डाला?
मकान, बाजार, स्टेडियम, सिनेमा। - 'अकाल' शब्द में कौन-सा उपसर्ग है?
अ। - 'पाल के किनारे रखा इतिहास' किसकी रचना है?
अनुपम मिश्र की। - कूड़न को कौन-सा पत्थर मिला था?
पारस पत्थर। - राजा ने कूड़न को पारस पत्थर वापस करते हुए क्या करने को कहा?
तालाब बनाने को। - मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म कब और कहाँ हुआ?
15 सितंबर 1861 को मुद्देनहल्ली, मैसूर में। - विश्वेश्वरैया के पिता का पेशा क्या था?
वैद्य। - विश्वेश्वरैया जब चौदह वर्ष के थे तब क्या हुआ?
उनके पिता की मृत्यु हो गई। - विश्वेश्वरैया के सम्मान में कौन-सा दिवस मनाया जाता है?
अभियंता दिवस (15 सितंबर)। - विश्वेश्वरैया के जीवन का मूल संदेश क्या था?
पहले जानो, फिर करो। - 'पानी रे पानी' पाठ से हमें मुख्य रूप से क्या शिक्षा मिलती है?
जल-चक्र को समझकर, वर्षा जल को सहेजकर और तालाबों-भूजल की रक्षा करके ही हम जल-संकट से बच सकते हैं।
(स) लघु उत्तरीय प्रश्न
- जल-चक्र की प्रक्रिया को संक्षेप में समझाइए।
समुद्र से उठी भाप बादल बनकर वर्षा के रूप में बरसती है, वर्षा का जल नदियों के माध्यम से बहकर पुनः समुद्र में मिल जाता है — इस निरंतर चलने वाली प्रक्रिया को जल-चक्र कहते हैं। - आज के समय में जल-संकट के क्या-क्या कारण बताए गए हैं?
नलों में अनियमित जल-आपूर्ति, मोटर लगाकर दूसरों का पानी खींच लेना, तालाबों को पाटकर समाप्त करना, तथा भूजल भंडार का उचित संरक्षण न करना — ये जल-संकट के प्रमुख कारण हैं। - लेखक ने धरती को गुल्लक क्यों कहा है?
जिस प्रकार हम पैसे बचाकर गुल्लक में जमा करते हैं, उसी प्रकार धरती भी वर्षा के जल को तालाबों-झीलों के माध्यम से भूजल के रूप में अपने भीतर संचित करती है, इसलिए लेखक ने धरती को गुल्लक कहा है। - अकाल और बाढ़ को "एक ही सिक्के के दो पहलू" क्यों कहा गया है?
क्योंकि दोनों ही जल के असंतुलित प्रबंधन का परिणाम हैं — पानी की अत्यधिक कमी अकाल का रूप लेती है जबकि अत्यधिक अधिकता बाढ़ का, और दोनों ही जल-चक्र को ठीक से न समझने से उत्पन्न होती हैं। - तालाबों को पाटने से क्या हानि हुई?
तालाबों को पाटने से वर्षा जल का भूजल भंडार में जाना रुक गया, जिससे गर्मियों में नल सूखने लगे और भूजल स्तर में भारी गिरावट आई। - लेखक के अनुसार जल-संकट से बचने के उपाय क्या हैं?
जल-चक्र को ठीक से समझना, वर्षा जल को थामकर संग्रहित करना, भूजल भंडार को सुरक्षित रखना, तथा तालाबों-नदियों की उचित रखवाली करना — ये सभी उपाय जल-संकट से बचने में सहायक हैं। - 'पाल के किनारे रखा इतिहास' कहानी का सार लिखिए।
चार भाइयों को पारस पत्थर मिलता है, परंतु राजा उससे सोना लेने के बजाय उन्हें तालाब बनाने की प्रेरणा देता है। कालांतर में उन्हीं भाइयों के नाम पर बने चार तालाब आज भी विद्यमान हैं, जो तालाब बनाने की परंपरा और समाज की कृतज्ञता को दर्शाते हैं। - 'पानी रे पानी' और 'पाल के किनारे रखा इतिहास' में क्या समानता है?
दोनों रचनाएँ अनुपम मिश्र द्वारा लिखी गई हैं और जल-संरक्षण तथा तालाबों के महत्व पर केंद्रित हैं। - बालक विश्वेश्वरैया की जिज्ञासु प्रवृत्ति के बारे में लिखिए।
बालक विश्वेश्वरैया प्रकृति की शक्ति और समाज में व्याप्त गरीबी के कारणों के बारे में गहराई से जानना चाहते थे; वे बड़ों और अध्यापकों से लगातार प्रश्न पूछते और स्वयं उत्तर खोजने का प्रयास करते थे। - विश्वेश्वरैया ने अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए क्या निर्णय लिया?
पिता की मृत्यु के बाद विश्वेश्वरैया ने बंगलौर जाकर मामा के घर रहने और ट्यूशन पढ़ाकर स्वयं अपनी फीस व पुस्तकों का खर्च उठाने का निर्णय लिया, ताकि वे मामा पर बोझ न बनें। - विश्वेश्वरैया के जीवन से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
जिज्ञासा, आत्मनिर्भरता, निरंतर सीखते रहने का संकल्प, तथा समस्याओं का व्यावहारिक व तार्किक समाधान खोजने की प्रवृत्ति — ये सभी गुण जीवन में सफलता की कुंजी हैं। - वर्षा जल संग्रहण किसे कहते हैं?
वर्षा के जल को प्राकृतिक अथवा कृत्रिम रूप से एकत्र करके भंडारण करना और बाद में उसका उपयोग करना 'वर्षा जल संग्रहण' कहलाता है। - छत के ऊपर वर्षा-जल संग्रहण की तकनीक को समझाइए।
इस प्रणाली में भवनों की छत पर एकत्रित वर्षा जल को पाइप द्वारा भंडारण टंकी में पहुँचाया जाता है; चूँकि इस जल में मिट्टी के कण मिल जाते हैं, इसलिए उपयोग से पहले इसे स्वच्छ करना आवश्यक होता है। - पाठ में शहरों में पानी बिकने की बात क्यों कही गई है?
जल-संकट इतना गंभीर हो गया है कि शहरों में लोगों को अन्य वस्तुओं की तरह पानी भी खरीदना पड़ता है, जो जल की कमी की गंभीरता को दर्शाता है। - 'उपसर्ग' किसे कहते हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
वे शब्दांश जो किसी शब्द के आरंभ में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन करते हैं, 'उपसर्ग' कहलाते हैं; जैसे 'काल' में 'अ' उपसर्ग जोड़ने पर 'अकाल' शब्द बनता है, जिसका अर्थ बदलकर 'सूखा/कुसमय' हो जाता है। - कूड़न ने राजा के पास स्वयं जाने का निर्णय क्यों लिया?
कूड़न को डर था कि देर-सबेर राजा तक पारस पत्थर की बात पहुँच जाएगी और वह जबरन छीन ली जाएगी, इसलिए उसने स्वयं जाकर राजा को सब कुछ बताना उचित समझा। - एक कृतज्ञ समाज तालाब बनाने वालों के प्रति क्या करता था?
एक कृतज्ञ समाज तालाब बनाने वालों को महाराज या महात्मा कहकर सम्मानित करता था और उन्हें अमर बना देता था। - विश्वेश्वरैया को अपने बचपन में किस गीत से भारत की स्थिति का एहसास हुआ?
'गाड सेव द किंग' (ईश्वर राजा को सुरक्षित रखे) गीत गाने को कहे जाने पर उन्हें एहसास हुआ कि भारत एक ब्रिटिश उपनिवेश है और भारतीयों को अपने मामलों में भी अधिकार नहीं है। - विश्वेश्वरैया बड़े होकर क्या बने और उनकी प्रमुख उपलब्धि क्या रही?
वे एक महान इंजीनियर बने और कृष्णराज सागर बाँध के मुख्य अभियंता के रूप में स्वचालित द्वार प्रणाली का आविष्कार किया, जिससे बाँधों में जल-स्तर नियंत्रित करना संभव हुआ। - 'पानी रे पानी' पाठ की भाषा-शैली की विशेषता बताइए।
पाठ की भाषा सरल, संवादात्मक और प्रश्न-शैली में है, जो पाठकों को सीधे संबोधित करते हुए विषय से जोड़ती है; रोजमर्रा के उदाहरणों (गुल्लक, मोहल्ले के झगड़े) के माध्यम से गंभीर विषय को सहज बना दिया गया है।
(द) महत्वपूर्ण प्रश्न
- 'पानी रे पानी' निबंध के केंद्रीय संदेश को विस्तार से स्पष्ट कीजिए।
निबंध का केंद्रीय संदेश यह है कि जल-चक्र को समझना केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि हमें व्यावहारिक रूप से वर्षा जल का संरक्षण करना चाहिए, तालाबों और जलस्रोतों की रक्षा करनी चाहिए, तभी हम अकाल और बाढ़ जैसी समस्याओं से बच सकते हैं। - "अकाल और बाढ़ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं" — इस कथन के आलोक में जल-प्रबंधन के महत्व पर अपने विचार लिखिए।
यह कथन बताता है कि जल का असंतुलन ही अकाल और बाढ़ दोनों का मूल कारण है। यदि हम वर्षा जल का उचित प्रबंधन करें — अतिरिक्त जल को संचित करें और आवश्यकता के समय उपयोग करें — तो दोनों ही समस्याओं से बचा जा सकता है, जो सिद्ध करता है कि जल-प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। - धरती को गुल्लक कहने के रूपक (metaphor) का विश्लेषण कीजिए और बताइए कि यह रूपक कितना सार्थक है।
जिस प्रकार गुल्लक में डाला गया धन धीरे-धीरे जमा होता है और आवश्यकता के समय काम आता है, उसी प्रकार तालाबों और झीलों के माध्यम से धरती में रिसने वाला वर्षा जल भूजल भंडार के रूप में जमा होता है और वर्ष भर हमारे उपयोग में आता है। यह रूपक अत्यंत सार्थक है क्योंकि यह जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया को सरल व रोचक ढंग से समझाता है। - 'पानी रे पानी' और 'पाल के किनारे रखा इतिहास' — दोनों रचनाओं के माध्यम से लेखक अनुपम मिश्र क्या संदेश देना चाहते हैं?
दोनों रचनाओं के माध्यम से लेखक यह संदेश देना चाहते हैं कि तालाब केवल जल-संचय के साधन नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रतीक हैं; इनकी उपेक्षा हमें जल-संकट की ओर ले जाती है, जबकि इनका संरक्षण हमें सतत विकास की राह दिखाता है। - बालक विश्वेश्वरैया के जीवन की घटना से आधुनिक विद्यार्थियों को क्या सीख मिलती है?
यह घटना सिखाती है कि जिज्ञासा और प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति को कभी नहीं दबाना चाहिए; निरंतर सीखते रहने का संकल्प और समस्याओं के व्यावहारिक समाधान खोजने की क्षमता ही किसी व्यक्ति को महान बनाती है। - जल-संकट और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संबंध स्पष्ट कीजिए।
जल-संकट केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं बल्कि मानवीय लापरवाही (तालाबों को पाटना, अनियंत्रित उपयोग) से भी उत्पन्न होता है; इसलिए इसका समाधान भी सामूहिक सामाजिक उत्तरदायित्व — जलस्रोतों की रक्षा और सामुदायिक सहयोग — से ही संभव है। - 'पाल के किनारे रखा इतिहास' कहानी में निहित सामाजिक मूल्य पर प्रकाश डालिए।
इस कहानी में निहित मूल्य यह है कि व्यक्तिगत लाभ (पारस पत्थर/धन) से अधिक सामाजिक कल्याण (तालाब बनाना) महत्वपूर्ण है; एक कृतज्ञ समाज उन्हीं को सम्मान देता है जो समुदाय के लिए स्थायी उपयोगी कार्य करते हैं। - यदि आप अपने विद्यालय में जल-संरक्षण के लिए कोई अभियान चलाना चाहें, तो उसकी रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।
यह एक रचनात्मक/खुला प्रश्न है — विद्यार्थी जागरूकता रैली, वर्षा जल संग्रहण प्रणाली की स्थापना, नल-मरम्मत अभियान, तथा पोस्टर-स्लोगन प्रतियोगिता जैसी गतिविधियों को शामिल करते हुए अपनी योजना प्रस्तुत करें। - निबंध में प्रयुक्त सरल भाषा-शैली गंभीर विषय को कैसे सुगम बनाती है, उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
लेखक ने जल-चक्र और भूजल जैसे जटिल विषयों को गुल्लक, घर की बालटी-घड़े, मोहल्ले के झगड़े जैसे रोजमर्रा के परिचित उदाहरणों से जोड़कर समझाया है, जिससे पाठक विषय को सहजता से समझ पाते हैं — यही निबंध की सबसे बड़ी विशेषता है। - 'पानी रे पानी', 'पाल के किनारे रखा इतिहास' और 'विश्वेश्वरैया' — तीनों पाठों में समान रूप से कौन-सा मूल्य झलकता है?
तीनों पाठों में जिज्ञासा, प्रकृति के प्रति सजगता, तथा समाज व पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व का भाव समान रूप से झलकता है — चाहे वह जल-संरक्षण हो या ज्ञान-अर्जन, तीनों ही व्यक्ति और समाज के दीर्घकालिक कल्याण पर बल देते हैं।
माइंड मैप
- अनुपम मिश्र (1948-2016)
- आज भी खरे हैं तालाब
- गांधी मार्ग पत्रिका
- सूरज-समुद्र-बादल-वर्षा-नदी
- किताबी बनाम वास्तविक
- जल-संकट (अकाल)
- बाढ़
- तालाबों का विनाश
- धरती रूपी गुल्लक
- भूजल संरक्षण
- वर्षा जल संग्रहण
- पाल के किनारे रखा इतिहास
- विश्वेश्वरैया
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'पानी रे पानी' किस कक्षा और पाठ्यपुस्तक का पाठ है?
यह कक्षा 7 की एनसीईआरटी हिंदी पाठ्यपुस्तक 'मल्हार' का चौथा पाठ है।
'पानी रे पानी' के लेखक कौन हैं?
इस निबंध के लेखक प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र हैं, जो 'आज भी खरे हैं तालाब' पुस्तक के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं।
पाठ का केंद्रीय संदेश क्या है?
केंद्रीय संदेश यह है कि जल-चक्र को समझकर वर्षा जल का संरक्षण करना और तालाबों-भूजल भंडार की रक्षा करना ही अकाल और बाढ़ जैसी समस्याओं से बचने का उपाय है।
पाठ में धरती की तुलना किससे की गई है और क्यों?
धरती की तुलना गुल्लक से की गई है, क्योंकि जिस प्रकार हम पैसे बचाकर गुल्लक में जमा करते हैं, उसी प्रकार वर्षा जल तालाबों के माध्यम से भूजल के रूप में धरती में संचित होता है।
इस पाठ के साथ कौन-से पूरक पाठ दिए गए हैं?
इस पाठ के साथ 'झरोखे से' खंड में अनुपम मिश्र का ही 'पाल के किनारे रखा इतिहास' और 'पढ़ने के लिए' खंड में आर. के. मूर्ति द्वारा लिखित 'विश्वेश्वरैया' नामक पूरक पाठ दिए गए हैं।
परीक्षा की दृष्टि से इस पाठ के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु कौन-से हैं?
लेखक-परिचय, जल-चक्र की प्रक्रिया, अकाल-बाढ़ का कारण, गुल्लक का रूपक, उपसर्ग-व्याकरण, तथा पूरक पाठों का सार — ये सभी बिंदु परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें