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संगच्छध्वं संवदध्वम् – सरल अर्थ, व्याकरण और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 संस्कृत दीपकम्

संगच्छध्वं संवदध्वम् — सरल अर्थ, व्याकरण और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 संस्कृत (दीपकम्)

कक्षा 8 की एनसीईआरटी संस्कृत पाठ्यपुस्तक 'दीपकम्' का प्रथम पाठ 'संगच्छध्वं संवदध्वम्' ऋग्वेद के प्रसिद्ध संज्ञान सूक्त (संघटन सूक्त) पर आधारित है, जो एकता और सहकार का संदेश देता है। इस लेख में आपको सूक्त-परिचय, मूल संवाद व मंत्र, पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ सहित सरल व्याख्या, शब्द-संपदा, महत्वपूर्ण व्याकरण (लोट्-लकार तथा अस्मद्/युष्मद् शब्द), पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर तथा अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न (MCQ सहित) — सब कुछ एक ही जगह मिलेगा।

इस लेख में: सूक्त-परिचय • पाठ परिचय • मूल पाठ (संवाद व मंत्र) • सरल व्याख्या • शब्द-संपदा • व्याकरण विशेष • पाठ्यपुस्तक के अभ्यास • अतिरिक्त प्रश्न (MCQ/लघु/दीर्घ) • माइंड मैप • अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ऋग्वेद एवं सूक्त-परिचय

संज्ञान सूक्तम् (संघटन सूक्तम्)

ऋग्वेद, दशम मण्डल, सूक्त 191 — ऋषिः: सम्वनन आङ्गिरसः

प्राचीन भारतीय ज्ञान-परम्परा में वेद को साक्षात् ब्रह्मा के मुख से निःसृत परम पवित्र दैवी वाणी माना जाता है। वेद की चार संहिताएँ हैं — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। इन्हें विश्व का प्राचीनतम साहित्य माना जाता है। इस पाठ का आधार ऋग्वेद के दशम मण्डल का 191वाँ सूक्त है, जो 'संज्ञान-सूक्तम्' अथवा 'संघटन-सूक्तम्' नाम से प्रसिद्ध है। इस सूक्त के ऋषि सम्वनन आङ्गिरसः हैं। सूक्त के आरंभिक मंत्र के देवता अग्नि हैं, जबकि पाठ में संकलित एकता-विषयक मंत्रों (मंत्र 2-4) के देवता संज्ञानम् (सामूहिक चेतना/एकता) माने जाते हैं। "संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्" पंक्ति भारतीय चिंतन में एकता के सर्वाधिक उद्धृत मंत्रों में से एक है और आज भी विद्यालयों, संसद-भवन तथा सार्वजनिक समारोहों में उद्धृत की जाती है।

  • स्रोत ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 191
  • सूक्त के नाम संज्ञान-सूक्तम्, संघटन-सूक्तम्
  • ऋषि सम्वनन आङ्गिरसः
  • देवता मंत्र 1 का देवता अग्नि; मंत्र 2-4 का देवता संज्ञानम् (एकता)
  • पाठ्यपुस्तक दीपकम् (कक्षा 8 एनसीईआरटी संस्कृत)
  • मुख्य विषय ऐक्य, सहकार, समान विचार व समान लक्ष्य की भावना
ध्यान दें: ऋग्वेद-संहिता के मूल क्रम में "संगच्छध्वं संवदध्वम्" पंक्ति सूक्त 10.191 का द्वितीय मंत्र है (प्रथम मंत्र अग्नि-सम्बन्धी है, जो इस पाठ में नहीं लिया गया)। पाठ्यपुस्तक में सुविधा हेतु पढ़ाए गए तीन मंत्रों को क्रमांक 1, 2, 3 दिया गया है — इस लेख में भी उसी पाठ्यपुस्तक-क्रम का पालन किया गया है।

पाठ परिचय

'संगच्छध्वं संवदध्वम्' पाठ एक रोचक संवाद से आरंभ होता है — विद्यालय के क्रीड़ोत्सव (खेल-प्रतियोगिता) में विजय प्राप्त करने के पश्चात् छात्र आचार्य के पास आकर उन्हें बधाई देते हैं। आचार्य पूछते हैं कि प्रतिद्वंद्वी दल की पराजय का क्या कारण था। छात्र बताते हैं कि उनके दल में परस्पर सामंजस्य व सहयोग था जबकि विपक्षी दल में मनोभेद व द्वेषभाव था, इसी कारण वह दल हार गया। इस पर आचार्य कार्य की सफलता के लिए एकता, समन्वय और सहयोग को अनिवार्य बताते हुए विद्यार्थियों को ऋग्वेद के 'संज्ञान-सूक्त' के तीन प्रसिद्ध मंत्रों का पाठ कराते हैं। ये मंत्र मनुष्य को परस्पर मिलकर चलने, एकस्वर में बोलने, समान मन-चित्त रखने तथा समाज, राष्ट्र व विश्व में ऐक्यभाव से जीवन-यापन करने की प्रेरणा देते हैं। पाठ के अंत में गम्-धातु के लोट्-लकार रूप तथा अस्मद्/युष्मद् शब्दों के वैकल्पिक रूपों का व्याकरण-अध्ययन भी कराया गया है।

मूल पाठ

(क) संवाद-भागः

छात्राः — नमस्ते आचार्य! वर्धापनानि, अभिनन्दनं भवताम्। अपि भवन्तः जानन्ति यत् भवतां प्रतिद्वन्द्विनः कथं पराजिताः?

छात्रः — अस्माकं विद्यालयस्य क्रीडोत्सवे पादकन्दुक-क्रीडायां वयं विजयं प्राप्नवन्तः।

आचार्यः — आम्, जानामि आचार्य! (छात्राणां कथनम्) अस्माकं दलस्य क्रीडकेषु परस्परं सम्यक् साम्ञ्जस्यम् आसीत्, किन्तु विपक्षि-दले तत् नासीत्।

छात्रः — सत्यम् आचार्य! तस्य दलस्य क्रीडकेषु परस्परं मनोभेदः द्वेषभावः च आसीत्। ते अन्योन्यं सहयोगं न कृतवन्तः।

आचार्यः — तर्हि वदन्तु, विजयप्राप्त्यर्थं किं किम् आवश्यकम्?

छात्रः — मिलित्वा कार्यकरणम्, एकता, परस्परं साम्ञ्जस्यं च आवश्यकम्।

आचार्यः — सत्यम् एव उक्तम्। एष एव सन्देशः वेदे 'संगच्छध्वं संवदध्वम्' इत्येवं प्रदत्तः।

छात्रः — आचार्य! कस्मात् वेदात् गृहीतः एष सन्देशः? कः च अस्य अभिप्रायः?

आचार्यः — ऋग्वेदे 'संज्ञान-सूक्तस्य' एषः मन्त्रांशः। एतत् 'संघटन-सूक्तम्' इत्यपि प्रख्यातम्। आगच्छन्तु, वयम् अस्य सूक्तस्य प्रसिद्धान् त्रीन् मन्त्रान् पठाम।

(ख) मूल मन्त्राः

ओ३म् संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥ १॥
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्। समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥ २॥
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥ ३॥

— ऋग्वेदः, मण्डल 10, सूक्त 191 (संज्ञान-सूक्तम्)

सरल व्याख्या

संवाद-भाग का हिंदी भावार्थ

विद्यालय के क्रीड़ोत्सव में फुटबॉल-क्रीड़ा में विजय प्राप्त करने पर छात्र आचार्य को बधाई देने आते हैं। आचार्य के पूछने पर कि प्रतिद्वंद्वी दल क्यों हारा, छात्र बताते हैं कि उनके अपने दल में खिलाड़ियों के बीच पूर्ण सामंजस्य और एकता थी, जबकि विरोधी दल के खिलाड़ियों में परस्पर मनमुटाव और द्वेष होने के कारण वे एक-दूसरे का सहयोग नहीं कर पाए, इसीलिए वह दल हार गया। आचार्य इस अनुभव से यह शिक्षा देते हैं कि किसी भी कार्य में सफलता के लिए मिलकर काम करना, आपसी एकता और सामंजस्य होना अत्यंत आवश्यक है — यही संदेश वेद में "संगच्छध्वं संवदध्वम्" के रूप में दिया गया है। यह मंत्र-भाग ऋग्वेद के 'संज्ञान-सूक्त' (जिसे 'संघटन-सूक्त' भी कहा जाता है) से लिया गया है, जिसके तीन प्रसिद्ध मंत्रों का पाठ आचार्य विद्यार्थियों को कराते हैं।

मंत्र 1

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥ १॥

पदच्छेद — संगच्छध्वम् संवदध्वम् सम् वः मनांसि जानताम् देवाः भागम् यथा पूर्वे संजानानाः उपासते।

अन्वय — (यूयम्) संगच्छध्वं संवदध्वं वः मनांसि संजानाताम्। यथा पूर्वे देवाः भागं संजानानाः उपासते।

भावार्थ — हे मनुष्यो! तुम सब मिलकर चलो (संगच्छध्वम्), आपस में समान वाणी में/सहमतिपूर्वक बोलो (संवदध्वम्), और तुम्हारे मन परस्पर एक-दूसरे के भावों को भली-भाँति जानें (संजानताम्), जिससे मनोभेद न रहे। जैसे सृष्टि के प्रारंभ में देवताओं ने (ब्रह्माण्डीय शक्तियों — अग्नि, वायु, आदित्य आदि ने) सृष्टि-निर्माण-यज्ञ की सफलता के लिए अपने-अपने कर्तव्य को स्वीकार करते हुए, परस्पर उत्कृष्ट समन्वय के साथ अपना-अपना कार्य निभाया, उसी प्रकार हम मनुष्य भी अपने परिवार, समाज व राष्ट्र की उन्नति के लिए सदैव एकजुट होकर अपने-अपने कर्तव्य का भली-भाँति निर्वाह करें।

मंत्र 2

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥ २॥

पदच्छेद — समानः मन्त्रः समितिः समानी समानम् मनः सह चित्तम् एषाम् समानम् मन्त्रम् अभिमन्त्रये वः समानेन वः हविषा जुहोमि।

अन्वय — एषां मन्त्रः समानः, समितिः समानी, मनः समानं, चित्तं सह (अस्तु)। वः समानं मन्त्रम् अभिमन्त्रये वः समानेन हविषा जुहोमि।

भावार्थ — इन सबका विचार/चिंतन समान हो, इनकी सभा/संगठन समान हो (अर्थात लक्ष्य-सिद्धि में समान हो), इन सबका मन समान भाव से युक्त हो तथा बुद्धिजन्य ज्ञान (चित्त) भी एकीभूत हो। हे मनुष्यो! मैं तुम्हारे समान संकल्पों को दिव्यभाव से संस्कारित/प्रकट करता हूँ, तथा तुम्हारे लिए सामूहिक प्रार्थना के साथ ज्ञान-यज्ञ सम्पन्न करता हूँ। इस प्रकार ऋषिजन और महापुरुष सदैव सौमनस्यपूर्ण संकल्प व चिंतन को दिव्यभाव से समाज में प्रचारित करते हैं तथा उसकी सफलता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं।

मंत्र 3

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥ ३॥

पदच्छेद — समानी वः आकूतिः समाना हृदयानि वः समानम् अस्तु वः मनः यथा वः सु सह असति।

अन्वय — (हे मानवाः!) वः आकूतिः समानी (अस्तु)। वः हृदयानि समाना (सन्तु)। यथा वः सह सु असति, (तथा) वः मनः समानम् अस्तु।

भावार्थ — हे मनुष्यो! तुम्हारा संकल्प समान हो, तुम्हारे हृदय सामरस्यपूर्ण हों। जिस प्रकार तुम्हारा साथ (संघठन) सुंदर व उत्कृष्ट होता है, उसी प्रकार तुम्हारा मन भी सामंजस्ययुक्त व एकरूप हो। इसी से परिवार, गण, समाज, राष्ट्र व विश्व में सुख, शांति और मैत्रीभाव सुशोभित होता है — इन मंत्रों से एकत्रित होकर सहजीवन जीने की प्रेरणा मिलती है, जिससे जीवन में प्रसन्नता, उत्साह, आयु, आरोग्य, विजय, समृद्धि, धर्म, ज्ञानप्राप्ति व आत्मतृप्ति प्राप्त होती है।

शब्द-संपदा

शब्दःसंस्कृत अर्थःहिन्दी अर्थ
संगच्छध्वम्मिलित्वा गच्छतमिलकर चलो
संवदध्वम्एकस्वरेण वदतसहमतिपूर्वक बोलो
समवेतस्वरेणसम्मिलित-स्वरेणसम्मिलित ध्वनि से
मनांसिचित्तानिमनों को
जानताम्जानन्तुजानें
देवाःब्रह्माण्डीय-शक्तयःसृष्टि की मूलभूत/वैश्विक शक्तियाँ
संजानानाःएकमनसः भूत्वाएक विचार वाले होकर
उपासतेसेवन्तेश्रद्धापूर्वक कर्तव्य निर्वहण करते हैं
अभ्युदयम्अभिवृद्धिःलौकिक उन्नति
मन्त्रःविचारःचिंतन
समितिःसमाना प्राप्तिःसमान सिद्धि
वःयुष्मभ्यम्तुम्हारे/तुम्हारे लिए
अभिमन्त्रयेसंस्कृत्य प्रचारयामिअभिमंत्रित करके प्रचारित करता हूँ
हविषाप्रार्थनापूर्वक समर्पणेनप्रार्थना पूर्वक यज्ञाहुति द्वारा
जुहोमिज्ञानकर्ममयं यज्ञं साधयामिदिव्य यज्ञ कर्म को साधता/ती हूँ
आकूतिःसङ्कल्पःसंकल्प
सुसहासतिसुसंघटितः भवेत्सुसंगठित हो
संहितामूलमन्त्रपाठःमूल वैदिक मंत्र-पाठ
ब्रह्मणासृष्टिकर्त्रा/परमेश्वरेणसृष्टि के निर्माता (परमात्मा) के द्वारा
निरवहन्निर्वाहम् अकुर्वन्निर्वाह किया
क्रीडोत्सवःक्रीडा-समारोहःखेल-प्रतियोगिता/खेल-उत्सव
प्रतिद्वन्द्वीविपक्षीप्रतिद्वंद्वी/विरोधी
द्वेषभावःवैमनस्यम्ईर्ष्या-द्वेष का भाव

व्याकरण विशेष

1. गम्-धातु — परस्मैपद से आत्मनेपद: सामान्यतः 'गम्' धातु परस्मैपदी है (गम् + ति = गच्छति)। परंतु जब 'सम्' उपसर्गयुक्त गम्-धातु होती है, तब उसके आत्मनेपद रूप बनते हैं — यथा: सम् + गच्छति = सङ्गच्छते।

गम्-धातोः लोट्-लकारस्य रूपाणि

परस्मैपदम्
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःगच्छतुगच्छताम्गच्छन्तु
मध्यमपुरुषःगच्छगच्छतम्गच्छत
उत्तमपुरुषःगच्छानिगच्छावगच्छाम
आत्मनेपदम् (सङ्गच्छ्)
पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःसङ्गच्छताम्सङ्गच्छेताम्सङ्गच्छन्ताम्
मध्यमपुरुषःसङ्गच्छस्वसङ्गच्छेथाम्सङ्गच्छध्वम्
उत्तमपुरुषःसङ्गच्छैसङ्गच्छावहैसङ्गच्छामहै
लोट्-लकार के प्रयोग: आज्ञार्थ में — यथा: छात्राः! यूयम् उत्तिष्ठत। यूयम् उपविशत। आमन्त्रणार्थ में — यथा: भवन्तः आगच्छन्तु। सार्धं क्रीडामः। आशीर्वादार्थ में — यथा: आयुष्मान् भव। विजयी भव। शिवास्ते पन्थानः सन्तु।

अस्मद्/युष्मद् शब्दयोः वैकल्पिक रूपाणि

अस्मद्-युष्मद् शब्दयोः द्वितीया, चतुर्थी व षष्ठी विभक्तिषु वैकल्पिक (छोटे) रूप भी होते हैं —

शब्दःविभक्तिःमूल रूपवैकल्पिक रूप
अस्मद्द्वितीया (एकवचन)माम्मा
अस्मद्चतुर्थी (एकवचन)मह्यम्मे
अस्मद्षष्ठी (एकवचन)मममे
युष्मद्द्वितीया (एकवचन)त्वाम्त्वा
युष्मद्चतुर्थी (एकवचन)तुभ्यम्ते
युष्मद्षष्ठी (एकवचन)तवते

उदाहरण — शाधि माम् त्वां प्रपन्नम् = शाधि मा त्वा प्रपन्नम्। देहि मह्यं वरदे वरम् = देहि मे वरदे वरम्। त्वमेव सर्वं मम देवदेव = त्वमेव सर्वं मे देवदेव। नमः तुभ्यम् (नमस्तुभ्यम्) = नमः ते (नमस्ते)। शिष्यः तव अहम् = शिष्यः ते अहम्।

पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर

1. संज्ञानसूक्तं सस्वरं पठत स्मरत लिखत च।

यह एक अभ्यास-गतिविधि है — विद्यार्थी शुद्ध उच्चारण के साथ तीनों मंत्रों को बार-बार पढ़ें, कंठस्थ करें तथा लिखने का अभ्यास करें।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत —
  1. (क) सर्वेषां मनः कीदृशं भवेत्?
    सर्वेषां मनः समानम् भवेत्।
  2. (ख) सङ्गच्छध्वं संवदध्वम् इत्यस्य कः अभिप्रायः?
    अस्य अभिप्रायः अस्ति यत् वयं सर्वे मिलित्वा गच्छेम, सहमतिपूर्वकं वदेम, तथा परस्परं मनोभावान् सम्यक् जानीयाम, येन समाजे ऐक्यं स्थापितं भवेत्।
  3. (ग) सर्वे किं परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः?
    सर्वे मनोभेदं व वैमनस्यं परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः।
  4. (घ) अस्मिन् पाठे का प्रेरणा अस्ति?
    अस्मिन् पाठे एषा प्रेरणा अस्ति यत् वयं सर्वे मिलित्वा कार्यं कुर्मः, परस्परं सामञ्जस्येन जीवामः तथा ऐक्यभावेन समाजस्य/राष्ट्रस्य उन्नतिं साधयामः।
3. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
  1. (क) परमेश्वरः सर्वत्र व्याप्नोति।
    परमेश्वरः कुत्र व्याप्नोति?
  2. (ख) वयम् ईश्वरं नमामः।
    वयं कं नमामः?
  3. (ग) वयम् ऐक्यभावेन जीवामः।
    वयं केन जीवामः?
  4. (घ) ईश्वरस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते।
    कस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते?
  5. (ङ) अहं समाजाय श्रमं करोमि।
    अहं कस्मै श्रमं करोमि?
  6. (च) अयं पाठः ऋग्वेदात् सङ्कलितः।
    अयं पाठः कस्मात् सङ्कलितः?
  7. (छ) वेदस्य अपरं नाम श्रुतिः
    वेदस्य अपरं नाम किम्?
  8. (ज) मन्त्राः वेदेषु भवन्ति।
    मन्त्राः कुत्र भवन्ति?
4. पट्टिकातः शब्दान् चित्वा अधोलिखितेषु मन्त्रेषु रिक्तस्थानानि पूरयत —

(पट्टिका: संवदध्वं, समितिः, आकूतिः, भागं, मनः, हृदयानि, जानाना, समानं, मनो, हविषा, सुसहसति, मनांसि)

  1. (क) सङ्गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे सं जानाना उपासते।
  2. (ख) समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्। समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि।
  3. (ग) समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहसति
5. पाठे प्रयुक्तान् शब्दान् भावानुसारं परस्परं योजयत —
  1. (क) संगच्छध्वम् → मिलित्वा चलत
  2. (ख) संवदध्वम् → एकस्वरेण वदत
  3. (ग) मनः → चित्तम्
  4. (घ) उपासते → सेवन्ते
  5. (ङ) वसूनि → धनानि
  6. (च) विश्वानि → समस्तानि
  7. (छ) आकूतिः → सङ्कल्पः
6. उदाहरणानुसारेण लट्-लकारस्य वाक्यानि लोट्-लकारेण परिवर्तयत —

यथा — बालिकाः नृत्यन्ति। → बालिकाः नृत्यन्तु।

  1. (क) बालकाः हसन्ति।
    बालकाः हसन्तु।
  2. (ख) युवां तत्र गच्छथः।
    युवां तत्र गच्छतम्।
  3. (ग) यूयं धावथ।
    यूयं धावत।
  4. (घ) आवां लिखावः।
    आवां लिखाव।
  5. (ङ) वयं पठामः।
    वयं पठाम।
योग्यताविस्तरः (सामान्य ज्ञान): वेदाः — ऋग्वेदः, यजुर्वेदः, सामवेदः, अथर्ववेदः। ब्राह्मणानि — ऐतरेयः, शतपथः, सामविधानम्, गोपथः इत्यादयः। प्रसिद्ध उपनिषदः — ईशः, केनः, कठः, प्रश्नः, मुण्डकः, माण्डूक्यः, ऐतरेयः, तैत्तिरीयः, छान्दोग्यः, बृहदारण्यकः इत्यादयः। उपवेदाः — आयुर्वेदः, धनुर्वेदः, गान्धर्ववेदः, अर्थवेदः/स्थापत्यवेदः। षड्दर्शनानि (वेदोपाङ्गानि) — न्यायः, वैशेषिकं, साङ्ख्यं, योगः, पूर्व-मीमांसा, उत्तर-मीमांसा (वेदान्तः)। वेदाङ्गानि — शिक्षा, व्याकरणं, छन्दः, निरुक्तं, ज्योतिषं, कल्पः। ऋग्वेद के मन्त्रों की कुल संख्या — दश सहस्राणि, पञ्च शतानि, द्विपञ्चाशत् च (१०,५५२) मन्त्राः; मण्डलक्रमेण 10 मण्डलानि, 85 अनुवाकाः, 1028 सूक्तानि; अष्टकक्रमेण 8 अष्टकाः, 64 अध्यायाः।

अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न

(अ) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)

  1. 'संगच्छध्वं संवदध्वम्' पाठ किस वेद से संकलित है?
    • (क) ऋग्वेद ✓
    • (ख) यजुर्वेद
    • (ग) सामवेद
    • (घ) अथर्ववेद
  2. यह पाठ किस सूक्त पर आधारित है?
    • (क) पुरुष-सूक्त
    • (ख) संज्ञान-सूक्त ✓
    • (ग) नासदीय-सूक्त
    • (घ) हिरण्यगर्भ-सूक्त
  3. यह सूक्त ऋग्वेद के किस मण्डल में है?
    • (क) प्रथम मण्डल
    • (ख) पञ्चम मण्डल
    • (ग) दशम मण्डल ✓
    • (घ) सप्तम मण्डल
  4. सूक्त की संख्या क्या है?
    • (क) 91
    • (ख) 191 ✓
    • (ग) 119
    • (घ) 219
  5. इस सूक्त के ऋषि कौन हैं?
    • (क) विश्वामित्र
    • (ख) वसिष्ठ
    • (ग) सम्वनन आङ्गिरसः ✓
    • (घ) अगस्त्य
  6. 'संगच्छध्वम्' शब्द का क्या अर्थ है?
    • (क) बोलो
    • (ख) मिलकर चलो ✓
    • (ग) जानो
    • (घ) सुनो
  7. 'संवदध्वम्' का क्या अर्थ है?
    • (क) चलो
    • (ख) सहमतिपूर्वक/एकस्वर में बोलो ✓
    • (ग) लिखो
    • (घ) सुनो
  8. ऋग्वेद में कुल कितने मण्डल हैं?
    • (क) 4
    • (ख) 8
    • (ग) 10 ✓
    • (घ) 18
  9. मण्डलक्रम के अनुसार ऋग्वेद में सूक्तों की कुल संख्या कितनी है?
    • (क) 64
    • (ख) 85
    • (ग) 1028 ✓
    • (घ) 10552
  10. मण्डलक्रम के अनुसार अनुवाकों की कुल संख्या कितनी है?
    • (क) 64
    • (ख) 85 ✓
    • (ग) 1028
    • (घ) 10552
  11. अष्टकक्रम के अनुसार ऋग्वेद में कितने अष्टक हैं?
    • (क) 4
    • (ख) 8 ✓
    • (ग) 10
    • (घ) 64
  12. अष्टकक्रम के अनुसार अध्यायों की कुल संख्या कितनी है?
    • (क) 8
    • (ख) 85
    • (ग) 64 ✓
    • (घ) 1028
  13. वेद की कुल कितनी संहिताएँ हैं?
    • (क) 2
    • (ख) 3
    • (ग) 4 ✓
    • (घ) 6
  14. 'गम्' धातु सामान्यतः किस पद की होती है?
    • (क) परस्मैपदी ✓
    • (ख) आत्मनेपदी
    • (ग) उभयपदी
    • (घ) इनमें से कोई नहीं
  15. 'सम्' उपसर्ग लगने पर 'गम्' धातु किस पद की हो जाती है?
    • (क) परस्मैपदी
    • (ख) आत्मनेपदी ✓
    • (ग) उभयपदी
    • (घ) कोई परिवर्तन नहीं होता
  16. 'गम् + ति' का रूप क्या बनता है?
    • (क) गन्ता
    • (ख) गच्छति ✓
    • (ग) गमिष्यति
    • (घ) अगच्छत्
  17. 'सम् + गच्छति' का रूप क्या बनता है?
    • (क) संगच्छति
    • (ख) सङ्गच्छते ✓
    • (ग) सङ्गमिष्यति
    • (घ) संगत्वा
  18. लोट्-लकार का प्रयोग किस अर्थ में नहीं होता?
    • (क) आज्ञार्थ
    • (ख) आमन्त्रणार्थ
    • (ग) आशीर्वादार्थ
    • (घ) भूतकालार्थ ✓
  19. 'अस्मद्' शब्द के द्वितीया विभक्ति एकवचन का वैकल्पिक रूप क्या है?
    • (क) मे
    • (ख) मा ✓
    • (ग) माम्
    • (घ) मम
  20. 'युष्मद्' शब्द के चतुर्थी विभक्ति एकवचन का वैकल्पिक रूप क्या है?
    • (क) त्वा
    • (ख) तव
    • (ग) ते ✓
    • (घ) त्वाम्
  21. मंत्र 2 में 'समानम्' शब्द किस भाव के लिए बार-बार प्रयुक्त हुआ है?
    • (क) भिन्नता
    • (ख) एकता/समानता ✓
    • (ग) प्रतिस्पर्धा
    • (घ) विरोध
  22. मंत्र 3 के अनुसार सबका मन कैसा होना चाहिए?
    • (क) भिन्न-भिन्न
    • (ख) समान ✓
    • (ग) चंचल
    • (घ) स्वतंत्र
  23. वेद का दूसरा नाम क्या है?
    • (क) स्मृति
    • (ख) श्रुति ✓
    • (ग) संहिता
    • (घ) आरण्यक
  24. 'ऐतरेय' किसका उदाहरण है?
    • (क) उपवेद
    • (ख) ब्राह्मण ग्रंथ ✓
    • (ग) वेदांग
    • (घ) दर्शन
  25. पाठ में छात्रों की विजय किस क्रीड़ा में हुई थी?
    • (क) क्रिकेट
    • (ख) पादकन्दुक (फुटबॉल) ✓
    • (ग) कबड्डी
    • (घ) दौड़

(ब) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. पाठ का नाम क्या है?
    संगच्छध्वं संवदध्वम्।
  2. यह पाठ किस पाठ्यपुस्तक से लिया गया है?
    दीपकम् (कक्षा 8, एनसीईआरटी संस्कृत)।
  3. सूक्त का दूसरा नाम क्या है?
    संघटन-सूक्तम्।
  4. इस सूक्त के ऋषि का पूरा नाम क्या है?
    सम्वनन आङ्गिरसः।
  5. पाठ में संकलित एकता-विषयक मंत्रों के देवता कौन हैं?
    संज्ञानम्।
  6. 'ओ३म्' किसका प्रतीक माना जाता है?
    ब्रह्म/परमेश्वर का।
  7. वेद को किस रूप में माना जाता है?
    साक्षात् ब्रह्म-मुख से निःसृत पवित्रतमा दैवी वाणी के रूप में।
  8. वेद की चार संहिताएँ कौन-सी हैं?
    ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद।
  9. उपनिषदों को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
    वेदान्त।
  10. वेदांगों की कुल संख्या कितनी है?
    छह (6)।
  11. किन्हीं दो वेदांगों के नाम लिखिए।
    शिक्षा और व्याकरण (छन्दः, निरुक्तं, ज्योतिषं, कल्पः भी सही उत्तर हैं)।
  12. उपवेदों की कुल संख्या कितनी है?
    चार (4)।
  13. 'गम्' धातु का अर्थ क्या है?
    जाना/चलना।
  14. 'जानताम्' शब्द का सरल अर्थ बताइए।
    जानें/जान लें।
  15. मध्यमपुरुष एकवचन लोट्-लकार में गम्-धातु (गच्छ्) का रूप क्या होगा?
    गच्छ।
  16. उत्तमपुरुष द्विवचन लोट्-लकार में गम्-धातु का रूप क्या होगा?
    गच्छाव।
  17. 'हविषा' शब्द का अर्थ बताइए।
    प्रार्थनापूर्वक (यज्ञाहुति द्वारा) अर्पण करते हुए।
  18. 'आकूतिः' का हिंदी अर्थ क्या है?
    संकल्प।
  19. 'उपासते' शब्द का अर्थ बताइए।
    श्रद्धापूर्वक सेवा/कर्तव्य-निर्वहण करते हैं।
  20. पाठ में संवाद किस विद्यालयीय प्रसंग से आरंभ होता है?
    क्रीड़ोत्सव (पादकन्दुक-क्रीड़ा में विजय) के प्रसंग से।

(स) लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. 'संगच्छध्वं संवदध्वम्' मंत्र का संक्षिप्त भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए।
    इस मंत्र में ऋषि उपदेश देते हैं कि हम सब मिलकर चलें, एकस्वर में सहमतिपूर्वक बोलें और परस्पर एक-दूसरे के मनोभावों को भली-भाँति जानें, जैसे सृष्टि के आरंभ में देवताओं ने आपसी समन्वय से अपना-अपना कर्तव्य निभाया था।
  2. मंत्र 2 (समानो मन्त्रः...) का मुख्य भाव क्या है?
    इस मंत्र में यह भावना व्यक्त की गई है कि सबका विचार, सभा/संगठन, मन और चित्त समान/एकरूप हो, तथा ऋषिजन दिव्यभाव से सामूहिक प्रार्थना व ज्ञान-यज्ञ के माध्यम से समाज में एकता का संचार करते हैं।
  3. मंत्र 3 (समानी व आकूतिः...) में क्या प्रार्थना की गई है?
    इसमें प्रार्थना की गई है कि सबका संकल्प समान हो, हृदय सामरस्यपूर्ण हों तथा मन भी एकरूप व सामंजस्ययुक्त हो, जिससे समाज व राष्ट्र में सुख-शांति और मैत्रीभाव बना रहे।
  4. आचार्य और छात्रों के बीच संवाद किस विषय पर आरंभ होता है?
    विद्यालय के क्रीड़ोत्सव में छात्रों की फुटबॉल-क्रीड़ा में विजय तथा प्रतिद्वंद्वी दल की पराजय के कारण पर संवाद आरंभ होता है।
  5. प्रतिद्वंद्वी दल की हार का क्या कारण छात्रों ने बताया?
    छात्रों ने बताया कि विपक्षी दल के खिलाड़ियों में परस्पर मनोभेद व द्वेषभाव था और उन्होंने एक-दूसरे का सहयोग नहीं किया, इसीलिए वह दल हार गया।
  6. ऋग्वेद के मण्डलक्रम विभाजन को स्पष्ट कीजिए।
    मण्डलक्रम के अनुसार ऋग्वेद में 10 मण्डल, 85 अनुवाक तथा 1028 सूक्त हैं।
  7. ऋग्वेद के अष्टकक्रम विभाजन को स्पष्ट कीजिए।
    अष्टकक्रम के अनुसार ऋग्वेद में 8 अष्टक हैं, जिनमें प्रत्येक अष्टक में 8 अध्याय अर्थात कुल 64 अध्याय होते हैं।
  8. गम् धातु परस्मैपदी से आत्मनेपदी कैसे बनती है, उदाहरण सहित लिखिए।
    सामान्यतः गम् धातु परस्मैपदी है (गच्छति), परंतु जब इसमें 'सम्' उपसर्ग जुड़ता है तब यह आत्मनेपदी बन जाती है — जैसे सम् + गच्छति = सङ्गच्छते।
  9. लोट्-लकार का प्रयोग किन-किन अर्थों में होता है?
    लोट्-लकार का प्रयोग आज्ञार्थ (जैसे यूयम् उत्तिष्ठत), आमन्त्रणार्थ (जैसे भवन्तः आगच्छन्तु) तथा आशीर्वादार्थ (जैसे आयुष्मान् भव) में होता है।
  10. अस्मद् शब्द के वैकल्पिक रूपों का एक उदाहरण दीजिए।
    द्वितीया विभक्ति एकवचन में 'माम्' के स्थान पर वैकल्पिक रूप 'मा' प्रयुक्त होता है — जैसे शाधि मा त्वा प्रपन्नम्।
  11. युष्मद् शब्द के वैकल्पिक रूपों का एक उदाहरण दीजिए।
    चतुर्थी विभक्ति एकवचन में 'तुभ्यम्' के स्थान पर वैकल्पिक रूप 'ते' प्रयुक्त होता है — जैसे नमः तुभ्यम् के स्थान पर नमस्ते।
  12. "देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते" पंक्ति का भावार्थ लिखिए।
    जिस प्रकार सृष्टि के आरंभ में देवताओं ने एकमन होकर अपने-अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन किया, उसी प्रकार हमें भी परस्पर समन्वय से अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।
  13. वेदांगों की सूची बनाइए।
    शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष तथा कल्प — ये छह वेदांग हैं।
  14. उपवेदों की सूची बनाइए।
    आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद तथा अर्थवेद/स्थापत्यवेद — ये चार उपवेद हैं।
  15. षड्दर्शन कौन-कौन से हैं?
    न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व-मीमांसा तथा उत्तर-मीमांसा (वेदान्त) — ये छह दर्शन हैं।
  16. किन्हीं पाँच प्रसिद्ध उपनिषदों के नाम लिखिए।
    ईश, केन, कठ, प्रश्न तथा मुण्डक (माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक भी सही उत्तर हैं)।
  17. यह सूक्त किस मण्डल और किस सूक्त-संख्या पर आधारित है, स्पष्ट कीजिए।
    यह सूक्त ऋग्वेद के दशम मण्डल के 191वें सूक्त (10.191) पर आधारित है।
  18. पाठ के अनुसार समाज में ऐक्य क्यों आवश्यक है?
    पाठ के अनुसार ऐक्य से ही समाज, राष्ट्र व विश्व में सुख, शांति व मैत्रीभाव स्थापित होता है, तथा किसी भी कार्य की सफलता के लिए परस्पर सामंजस्य व सहयोग अनिवार्य है, जैसा क्रीड़ोत्सव के उदाहरण से स्पष्ट होता है।
  19. "समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति" पंक्ति का भावार्थ लिखिए।
    जिस प्रकार तुम्हारा साथ/संगठन उत्कृष्ट व सुंदर है, उसी प्रकार तुम्हारा मन भी समान व एकरूप हो — यही इस पंक्ति का भाव है।
  20. वेद का अपरनाम 'श्रुति' क्यों है?
    क्योंकि प्राचीन काल में वेद-मंत्रों को गुरु से शिष्य तक सुनकर (श्रवण द्वारा) ही सीखा व आगे बढ़ाया जाता था, इसीलिए वेद को 'श्रुति' कहा जाता है।

(द) महत्वपूर्ण प्रश्न

  1. "संगच्छध्वं संवदध्वम्" पाठ के तीनों मंत्रों का सप्रसंग भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए।
    प्रथम मंत्र में ऋषि उपदेश देते हैं कि हम सब मिलकर चलें, सहमतिपूर्वक बोलें और परस्पर मनोभावों को जानें, जैसे देवताओं ने सृष्टि-निर्माण में समन्वय रखा। द्वितीय मंत्र में यह भावना व्यक्त है कि सबका विचार, संगठन, मन व चित्त समान हो, तथा ऋषिजन सामूहिक प्रार्थना द्वारा समाज में एकता का संचार करते हैं। तृतीय मंत्र में प्रार्थना है कि सबका संकल्प व हृदय समान हों तथा मन भी एकरूप हो, जिससे परिवार, समाज व राष्ट्र में सुख-शांति व मैत्रीभाव बना रहे। तीनों मंत्रों का केंद्रीय संदेश एकता, सहकार व समान भाव है।
  2. संवाद के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि दल की हार का क्या कारण था और आचार्य ने क्या शिक्षा दी।
    प्रतिद्वंद्वी दल के खिलाड़ियों में परस्पर मनोभेद व द्वेषभाव था तथा उन्होंने एक-दूसरे का सहयोग नहीं किया, इसी कारण वह दल हार गया, जबकि विजयी दल में पूर्ण सामंजस्य था। इस अनुभव के आधार पर आचार्य ने शिक्षा दी कि किसी भी कार्य की सफलता के लिए एकता, सहयोग व सामंजस्य अनिवार्य है, और इसी भावना को उन्होंने ऋग्वेद के संज्ञान-सूक्त के मंत्रों द्वारा विद्यार्थियों के समक्ष प्रस्तुत किया।
  3. गम् धातु के लोट्-लकार परस्मैपद एवं आत्मनेपद के रूपों को तालिका सहित लिखिए।
    परस्मैपद — प्रथमपुरुष: गच्छतु, गच्छताम्, गच्छन्तु; मध्यमपुरुष: गच्छ, गच्छतम्, गच्छत; उत्तमपुरुष: गच्छानि, गच्छाव, गच्छाम। आत्मनेपद (सङ्गच्छ्) — प्रथमपुरुष: सङ्गच्छताम्, सङ्गच्छेताम्, सङ्गच्छन्ताम्; मध्यमपुरुष: सङ्गच्छस्व, सङ्गच्छेथाम्, सङ्गच्छध्वम्; उत्तमपुरुष: सङ्गच्छै, सङ्गच्छावहै, सङ्गच्छामहै।
  4. अस्मद् एवं युष्मद् शब्दों के द्वितीया, चतुर्थी व षष्ठी विभक्ति के वैकल्पिक रूपों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
    अस्मद् — द्वितीया: माम्/मा, चतुर्थी: मह्यम्/मे, षष्ठी: मम/मे। युष्मद् — द्वितीया: त्वाम्/त्वा, चतुर्थी: तुभ्यम्/ते, षष्ठी: तव/ते। उदाहरण — देहि मह्यं वरदे वरम् = देहि मे वरदे वरम्; नमः तुभ्यम् = नमस्ते।
  5. ऋग्वेद के मण्डलक्रम व अष्टकक्रम विभाजन की तुलना कीजिए।
    मण्डलक्रम में ऋग्वेद 10 मण्डल, 85 अनुवाक व 1028 सूक्तों में विभाजित है, जबकि अष्टकक्रम में यह 8 अष्टकों में विभाजित है, जिनमें प्रत्येक अष्टक 8 अध्यायों में विभक्त है, अर्थात कुल 64 अध्याय — दोनों विभाजन एक ही मूल मंत्र-संख्या (10,552) को अलग-अलग परंपराओं के अनुसार व्यवस्थित करते हैं।
  6. वेद, वेदांग, उपवेद व उपनिषद् में अंतर स्पष्ट कीजिए।
    वेद मूल मंत्र-संहिताएँ हैं (ऋग्, यजु, साम, अथर्व); वेदांग वेदों को सही ढंग से समझने-पढ़ने के सहायक शास्त्र हैं (शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष, कल्प); उपवेद व्यावहारिक विद्याओं से संबंधित हैं (आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद, स्थापत्यवेद); तथा उपनिषद् वेदों के अंतिम/दार्शनिक भाग हैं जिन्हें वेदान्त भी कहते हैं, जो आत्मा-ब्रह्म संबंधी ज्ञान की चर्चा करते हैं।
  7. "संज्ञान सूक्त" के आधार पर ऐक्य/एकता के महत्व पर अपने विचार लिखिए।
    संज्ञान सूक्त हमें सिखाता है कि व्यक्तिगत सफलता से बढ़कर सामूहिक ऐक्य का महत्व है। जब सब मिलकर चलें, समान विचार रखें व एक-दूसरे का सम्मान करें, तभी परिवार, समाज व राष्ट्र उन्नति कर सकते हैं। आज के प्रतिस्पर्धी युग में भी यह संदेश उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि टीम-भावना व सहयोग के बिना कोई भी बड़ा लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता।
  8. इस पाठ से विद्यार्थियों को क्या प्रेरणा और शिक्षा मिलती है?
    इस पाठ से विद्यार्थियों को यह प्रेरणा मिलती है कि जीवन में सफलता के लिए परस्पर सहयोग, सामंजस्य व एकता अनिवार्य है। खेल हो या पढ़ाई या सामाजिक कार्य, मनभेद व द्वेष सफलता में बाधक बनते हैं, जबकि मिलकर कार्य करने से बड़े-से-बड़ा लक्ष्य भी सहज ही प्राप्त हो जाता है।
  9. मंत्रों के पदच्छेद और अन्वय के आधार पर द्वितीय मंत्र (समानो मन्त्रः...) की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
    पदच्छेद के अनुसार — समानः मन्त्रः, समितिः समानी, समानम् मनः, सह चित्तम् एषाम्, वः समानम् मन्त्रम् अभिमन्त्रये, वः समानेन हविषा जुहोमि। अन्वय से स्पष्ट होता है कि इन सबका विचार, सभा, मन व चित्त समान हो। भावार्थ है कि ऋषि/नेता समाज के लिए समान संकल्प का दिव्यभाव से प्रचार करते हैं तथा सामूहिक प्रार्थना व ज्ञान-यज्ञ द्वारा समाज में एकता स्थापित करने का प्रयास करते हैं — यह मंत्र सामूहिक चिंतन व सहमति की महत्ता प्रतिपादित करता है।
  10. आधुनिक समय में विद्यालय, परिवार व समाज में ऐक्यभाव की क्या भूमिका है, संज्ञान सूक्त के आलोक में स्पष्ट कीजिए।
    विद्यालय में सहपाठियों के मध्य सहयोग व टीम-भावना से खेल व पढ़ाई दोनों में सफलता मिलती है (जैसा पाठ के क्रीड़ोत्सव-प्रसंग में दिखाया गया है); परिवार में सदस्यों के परस्पर समान विचार व सामंजस्य से घर में सुख-शांति बनी रहती है; तथा समाज व राष्ट्र में ऐक्यभाव से ही एकता, प्रगति व स्थायित्व संभव होता है। संज्ञान-सूक्त का यह संदेश — 'सं गच्छध्वं सं वदध्वम्' — आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना वैदिक काल में था।

माइंड मैप

संगच्छध्वं संवदध्वम्

स्रोत

  • ऋग्वेद, मण्डल 10
  • सूक्त 191
  • ऋषि: सम्वनन आङ्गिरसः

संवाद

  • क्रीड़ोत्सव विजय
  • दल में सामंजस्य
  • आचार्य की शिक्षा

तीन मंत्र

  • संगच्छध्वं संवदध्वम्
  • समानो मन्त्रः
  • समानी व आकूतिः

व्याकरण

  • गम् धातु लोट्-लकार
  • अस्मद्/युष्मद् वैकल्पिक रूप

अभ्यास

  • 25 MCQ
  • लघु/दीर्घ प्रश्न
  • पाठ्यपुस्तक गतिविधियाँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

'संगच्छध्वं संवदध्वम्' पाठ किस पाठ्यपुस्तक और कक्षा का है?

यह कक्षा 8 की एनसीईआरटी संस्कृत पाठ्यपुस्तक 'दीपकम्' का प्रथम पाठ है।

यह पाठ किस सूक्त पर आधारित है?

यह ऋग्वेद के दशम मण्डल के 191वें सूक्त (संज्ञान-सूक्त/संघटन-सूक्त) पर आधारित है, जिसके ऋषि सम्वनन आङ्गिरसः हैं।

पाठ का मुख्य संदेश क्या है?

पाठ का मुख्य संदेश है — मिलकर चलना, सहमतिपूर्वक बोलना तथा समान विचार व मन रखना, जिससे परिवार, समाज व राष्ट्र में एकता व सुख-शांति स्थापित हो।

गम् धातु आत्मनेपदी कब बनती है?

सामान्यतः गम् धातु परस्मैपदी होती है, परंतु जब इसमें 'सम्' उपसर्ग जुड़ता है (जैसे सङ्गच्छते), तब यह आत्मनेपदी बन जाती है।

अस्मद्/युष्मद् के वैकल्पिक रूप कब प्रयुक्त होते हैं?

द्वितीया, चतुर्थी व षष्ठी विभक्ति में अस्मद्/युष्मद् के मूल रूपों (माम्, मह्यम्, मम / त्वाम्, तुभ्यम्, तव) के स्थान पर छोटे वैकल्पिक रूप (मा, मे, मे / त्वा, ते, ते) प्रयुक्त हो सकते हैं।

परीक्षा की दृष्टि से इस पाठ के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु कौन-से हैं?

तीनों मंत्रों का पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ, शब्दार्थ, गम्-धातु का लोट्-लकार रूप, अस्मद्/युष्मद् के वैकल्पिक रूप तथा ऋग्वेद संबंधी सामान्य ज्ञान (मण्डल, सूक्त, अनुवाक संख्या) — ये सभी बिंदु परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

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