तरुण के स्वप्न (सुभाषचंद्र बोस) - कक्षा 8 मल्हार पाठ 10 पूर्ण व्याख्या, सारांश, प्रश्न-उत्तर व नोट्स
तरुण के स्वप्न – सुभाषचंद्र बोस का भाषण, व्याख्या और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 मल्हार
नेताजी सुभाषचंद्र बोस केवल एक क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे, बल्कि एक ऐसे दूरदर्शी विचारक भी थे जो आज़ादी के साथ-साथ एक न्यायपूर्ण, समान और शोषणमुक्त समाज की भी कल्पना करते थे। कक्षा 8 की हिंदी पाठ्यपुस्तक 'मल्हार' के दसवें पाठ 'तरुण के स्वप्न' में उनके उसी भाषण का एक अंश दिया गया है, जो उन्होंने 29 दिसंबर 1929 को मेदिनीपुर ज़िला युवक-सम्मेलन में युवाओं को संबोधित करते हुए दिया था। इस लेख में हम इस भाषण का पूरा पाठ, सरल व्याख्या, शब्दार्थ, पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर और अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न विस्तार से देखेंगे, जिससे विद्यार्थियों को परीक्षा की तैयारी में पूरी सहायता मिल सके।
वक्ता परिचय (सुभाषचंद्र बोस)
उड़ीसा (अब ओडिशा) राज्य के कटक नगर में 23 जनवरी 1897 को जन्मे सुभाषचंद्र बोस को पूरा देश 'नेताजी' के नाम से जानता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनका उद्देश्य स्पष्ट था— भारत को अंग्रेज़ी शासन से मुक्त कराना। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष करते हुए उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। स्वतंत्रता की लड़ाई में उनकी दूरदर्शिता का पता तब चलता है जब उन्होंने 'आज़ाद हिंद फौज' (इंडियन नेशनल आर्मी) का नेतृत्व संभाला। यह सेना मूलतः 1942 में दक्षिण-पूर्व एशिया में गठित हुई थी और जुलाई 1943 में सिंगापुर पहुँचने पर सुभाषचंद्र बोस ने इसका नेतृत्व अपने हाथों में लिया। भारतीय सैनिकों को स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एकजुट कर उन्होंने 'दिल्ली चलो' और 'जय हिंद' का नारा दिया। 1944 में उन्होंने 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा' जैसा प्रेरक नारा भी दिया। सुभाषचंद्र बोस दो बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए— 1938 में हरिपुरा अधिवेशन में और 1939 में त्रिपुरी अधिवेशन में पुनः निर्वाचित हुए, किंतु कांग्रेस नेतृत्व से वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर 'फॉरवर्ड ब्लॉक' नामक अपना दल बनाया। उन्होंने एक स्वाधीन राष्ट्र और आत्मनिर्भर समाज का सपना देखा। उनके जीवन के विषय में जानना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को जानना है। 'द इंडियन स्ट्रगल' उनकी चर्चित पुस्तक है। प्रकाशन विभाग, भारत सरकार ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस का वाङ्मय (संपूर्ण लेखन) प्रकाशित किया है, जिसमें उनके उपलब्ध सभी कार्यों, पत्रों, टिप्पणियों, भाषणों आदि को सम्मिलित किया गया है।
पाठ परिचय
'तरुण के स्वप्न' शीर्षक से दिया गया यह अंश नेताजी सुभाषचंद्र बोस के उस भाषण से लिया गया है जो उन्होंने 29 दिसंबर 1929 को बंगाल के मेदिनीपुर ज़िला युवक-सम्मेलन में युवाओं को संबोधित करते हुए दिया था। यह वह दौर था जब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन युवाओं के उत्साह और बलिदान से नई ऊर्जा प्राप्त कर रहा था। सन् 1929 अपने आप में भारतीय राजनीति के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण वर्ष था— उसी वर्ष अप्रैल में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय असेंबली में बम फेंककर अंग्रेज़ी सत्ता को चुनौती दी थी, जुलाई-सितंबर 1929 में जेल में क्रांतिकारियों के साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध जतिन दास ने 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद अपने प्राण त्याग दिए थे, और उसी वर्ष के अंत में दिसंबर 1929 में लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने 'पूर्ण स्वराज' का प्रस्ताव पारित किया था। ऐसे उद्वेलित समय में सुभाषचंद्र बोस ने युवा-सम्मेलन में तरुणों के सामने अपना वह सपना रखा जो उन्हें उनके राजनीतिक गुरु देशबंधु चित्तरंजन दास से प्रेरणा के रूप में मिला था। ध्यान देने योग्य है कि चित्तरंजन दास का 1925 में ही निधन हो चुका था, इसलिए बोस उन्हें 'स्वर्गीय' कहकर संबोधित करते हैं।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ऐसे स्वाधीन संपन्न समाज और राष्ट्र का सपना देखते थे जिसमें व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से भागीदार बने। वे अपने उद्बोधनों में नारी मुक्ति और सभी को शिक्षा तथा समान अवसर मिलने की बात भी करते थे। अपना यह स्वप्न वे युवाओं को सौंपना चाहते थे जिससे आदर्श समाज और आदर्श राष्ट्र का रूप साकार हो सके।
मूल पाठ (भाषण)
स्वप्न तो अनेकों ने देखा। हमारे नेता स्वर्गीय देशबंधु चित्तरंजन दास ने भी एक स्वप्न देखा था। वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा। उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं। इसलिए हमारा भी अपना एक स्वप्न है, इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, फिरते हैं और लिखते हैं, भाषण देते हैं, काम-काज करते हैं। वह स्वप्न या आदर्श क्या है? हम चाहते हैं, एक नया सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र। उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नहीं। उस समाज में जातिभेद का स्थान नहीं हो, उस समाज में नारी मुक्त होकर समाज एवं राष्ट्र के पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा ले, उस समाज में अर्थ की विषमता न हो, उस समाज में प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर पाए। जिस समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी और आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा, वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा।
जो राष्ट्र हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा, सर्वोपरि वह समाज और राष्ट्र भारतवासियों का अभाव मिटाएगा या भारतवासी के आदर्श को सार्थक बनाकर ही स्थिर नहीं होगा, बल्कि विश्व-मानव के समक्ष आदर्श-समाज और आदर्श-राष्ट्र के रूप में गण्य होगा। मैं ऐसे समाज और ऐसे राष्ट्र का ही स्वप्न देखता रहा हूँ, यह स्वप्न मेरे समक्ष नित्य एवं अखंड सत्य है। इस सत्य की प्रतिष्ठा के लिए सबकुछ किया जा सकता है, हर प्रकार का त्याग किया जा सकता है, हर संकट को सहा जा सकता है और इस स्वप्न को सार्थक बनाने के दौरान प्राण देना भी है तो 'वह मरण है स्वर्ग समान'। हे मेरे तरुण भाइयो! तुम्हें देने लायक मेरे पास कुछ भी नहीं है, है सिर्फ यही स्वप्न जो हमें असीम शक्ति और अपार आनंद देता है, जो मेरे क्षुद्र जीवन को भी सार्थक बनाता है। यह स्वप्न मैं तुम्हें उपहारस्वरूप देता हूँ— स्वीकार करो।
— सुभाषचंद्र बोस
सरल व्याख्या
नेताजी कहते हैं कि सपने अनेक लोगों ने देखे हैं, केवल उनका ही यह विशेष अनुभव नहीं है। उनके राजनीतिक गुरु और नेता स्वर्गीय देशबंधु चित्तरंजन दास ने भी अपने समय में स्वाधीनता और एक बेहतर समाज का सपना देखा था। वही सपना चित्तरंजन दास की शक्ति का स्रोत (उत्स) बना और उनके जीवन के आनंद का निरंतर बहता झरना (निर्झर) रहा, अर्थात उनकी सारी ऊर्जा और उत्साह उसी सपने से मिलता था। सुभाषचंद्र बोस स्वयं को और अपनी पीढ़ी को उसी सपने का उत्तराधिकारी मानते हैं, यानी वह सपना अब उनके कंधों पर आ गया है और उसे पूरा करने का दायित्व उन्हीं का है।
चूँकि वे उस पुराने सपने के उत्तराधिकारी हैं, इसलिए उनका भी अपना एक सपना है। यही सपना उनकी हर छोटी-बड़ी गतिविधि— उठना-बैठना, चलना-फिरना, लिखना, भाषण देना और काम-काज करना— की प्रेरणा बनता है। अर्थात उनका पूरा जीवन और दिनचर्या उसी लक्ष्य की प्राप्ति पर केंद्रित है।
यहाँ नेताजी अपने सपने को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं। वे एक नया, सर्वांगीण (सब प्रकार से पूर्ण), स्वाधीन और संपन्न समाज तथा उस पर आधारित एक स्वाधीन राष्ट्र चाहते हैं। ऐसे समाज में व्यक्ति हर तरह के बंधन (सामाजिक, आर्थिक, मानसिक) से मुक्त हो और समाज के दबाव में दबकर उसका दम न घुटे। उस समाज में जाति के आधार पर भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। सबसे महत्त्वपूर्ण बात— उस समाज में नारी को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हों और वह समाज तथा राष्ट्र की सेवा में पुरुषों की तरह ही समान रूप से भाग ले सके। यह उस युग में एक अत्यंत प्रगतिशील और साहसिक विचार था।
नेताजी चाहते थे कि ऐसे समाज में धन-संपत्ति की असमानता न हो, यानी अमीरी-गरीबी की खाई बहुत गहरी न हो। हर व्यक्ति को शिक्षा प्राप्त करने और उन्नति करने का समान अवसर मिलना चाहिए। साथ ही, ऐसे समाज में श्रम (मेहनत) और कर्म की पूरी प्रतिष्ठा और सम्मान हो, तथा आलसी और अकर्मण्य (काम न करने वाले) व्यक्तियों के लिए कोई जगह न हो। अर्थात मेहनत करने वाले का सम्मान हो और निठल्लेपन को कोई स्थान न मिले।
ऐसा राष्ट्र किसी भी विदेशी अथवा पराई जाति के प्रभाव (विजातीय प्रभाव, यहाँ मुख्यतः ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रभाव) से पूरी तरह मुक्त होगा। यह राष्ट्र हमारे अपने स्वदेशी समाज के एक यंत्र (उपकरण/तंत्र) की भाँति काम करेगा। इतना ही नहीं, यह राष्ट्र केवल भारतवासियों की ज़रूरतों और अभावों को दूर करके ही संतुष्ट नहीं होगा, बल्कि सारे विश्व-मानव जगत के सामने एक आदर्श समाज और आदर्श राष्ट्र का उदाहरण बनकर खड़ा होगा। यानी नेताजी का सपना केवल भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि वे भारत को पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल के रूप में देखना चाहते थे।
नेताजी कहते हैं कि वे लगातार ऐसे ही समाज और राष्ट्र का सपना देखते रहे हैं। यह सपना उनके लिए कोई अस्थायी कल्पना नहीं, बल्कि एक नित्य (सदा रहने वाला) और अखंड (जिसमें कोई खंड या टूट न हो, संपूर्ण) सत्य है। इस सत्य की स्थापना के लिए वे सबकुछ करने, हर प्रकार का त्याग करने और हर संकट सहने को तैयार हैं। यहाँ तक कि यदि इस सपने को साकार करते हुए उन्हें अपने प्राण भी देने पड़ें, तो वह मृत्यु स्वर्ग के समान होगी— अर्थात देश और समाज के आदर्श के लिए दिया गया बलिदान उनके लिए सबसे बड़ा पुण्य और गौरव है।
अंत में नेताजी सीधे युवाओं को संबोधित करते हुए कहते हैं कि उनके पास तरुणों को देने के लिए भौतिक रूप से कुछ भी नहीं है, केवल यही सपना है। लेकिन यही सपना उन्हें असीम (जिसकी कोई सीमा न हो) शक्ति और अपार (बहुत अधिक) आनंद देता है, और उनके अपने छोटे-से (क्षुद्र) जीवन को भी सार्थक बना देता है। वे इस अनमोल सपने को युवाओं को एक उपहार के रूप में देना चाहते हैं और उनसे इसे स्वीकार करने का आह्वान करते हैं। यह भाषण का सबसे भावुक और प्रेरक हिस्सा है, जहाँ नेताजी अपनी पूरी विचारधारा और आदर्श की ज़िम्मेदारी युवा पीढ़ी को सौंप देते हैं।
शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सर्वांगीण | सभी अंगों/दिशाओं से संपूर्ण, हर तरह से पूर्ण |
| स्वाधीन | स्वतंत्र, अपने अधीन, आज़ाद |
| संपन्न | समृद्ध, सुख-साधनों से युक्त |
| उत्तराधिकारी | किसी के बाद उसकी संपत्ति/दायित्व पाने का हकदार, वारिस |
| उत्स | सोता, स्रोत, जलमय स्थान |
| निर्झर | झरना, प्रपात |
| जातिभेद | जाति के आधार पर किया जाने वाला भेदभाव |
| उपभोग | भोगना, फलभोग, सुख, व्यवहार में लाना |
| विषमता | असमानता, ऊँच-नीच का भाव |
| मर्यादा | सीमा, प्रतिष्ठा, सदाचार |
| अकर्मण्य | कर्म के अयोग्य, आलसी, निकम्मा |
| विजातीय | भिन्न जाति का, दूसरी जाति/वर्ग का |
| स्वदेशी | अपने देश का, अपने देश में बना हुआ |
| गण्य | गिनने योग्य, माने जाने वाला, महत्त्वपूर्ण |
| अखंड | जिसका सिलसिला न टूटे, अविकल, संपूर्ण, अटूट |
| प्रतिष्ठा | सम्मान, मान-मर्यादा, स्थापना |
| त्याग | छोड़ना, बलिदान, कुर्बानी |
| असीम | जिसकी कोई सीमा न हो, अपार |
| अपार | बहुत अधिक, जिसका पार न हो |
| क्षुद्र | तुच्छ, छोटा |
| उपहारस्वरूप | उपहार के रूप में, भेंट स्वरूप |
| स्वर्गीय | दिवंगत (मृत) व्यक्ति के लिए प्रयुक्त सम्मानसूचक शब्द |
पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
आगे पाठ्यपुस्तक में दी गई सभी गतिविधियाँ उन्हीं शीर्षकों सहित दी जा रही हैं, साथ ही हर प्रश्न/उप-प्रश्न का पूरा उत्तर भी दिया गया है।
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।
- (1) "उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं" इस कथन में रेखांकित शब्द 'हम' किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
★ देश के तरुण वर्ग के लिए — सही उत्तर है। (सुभाषचंद्र बोस, चित्तरंजन दास और भारतवासी विकल्प इस संदर्भ में सटीक नहीं बैठते, क्योंकि यहाँ बोस समस्त युवा-पीढ़ी को संबोधित करते हुए उन्हें ही सपने का उत्तराधिकारी बता रहे हैं।)
- (2) स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न साकार होगा?
निम्नलिखित सभी विकल्पों से मुक्ति पाकर स्वप्न साकार होगा — आर्थिक असमानता से, स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकारों से, श्रम और कर्म की मर्यादा (के अभाव) से तथा जातिभेद से — अर्थात चारों ★ विकल्प सही हैं, क्योंकि भाषण में बोस ने इन चारों बुराइयों के अंत की बात कही है।
- (3) "उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।" 'उत्तराधिकारी' होने से क्या अभिप्राय है?
हमें उनके स्वप्नों को संजोकर रखना है तथा उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है — ये दोनों उत्तर सही हैं। ('चर्चा करने का दायित्व' और 'स्वप्न देखने का अधिकार' अभिप्राय की मूल भावना नहीं दर्शाते।)
- (4) जब प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा और उन्नति का समान अवसर प्राप्त होगा तब—
राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी तथा राष्ट्र स्वाधीन बनेगा — ये दोनों विकल्प उपयुक्त हैं, क्योंकि शिक्षित व सक्षम नागरिक ही राष्ट्र को आत्मनिर्भर व स्वाधीन बना सकते हैं।
(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
यह एक कक्षा-चर्चा गतिविधि है। विद्यार्थी आपस में अपने चुने गए उत्तरों के पीछे के तर्क साझा करें— जैसे भाषण की किस पंक्ति के आधार पर उन्होंने कोई विशेष विकल्प चुना, और यदि किसी साथी ने अलग उत्तर चुना है तो उसका तर्क भी समझें। इससे पाठ की गहरी और बहुआयामी समझ विकसित होती है।
नीचे स्तंभ 1 में पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं और स्तंभ 2 में उन पंक्तियों से संबंधित भाव-विचार दिए गए हैं। स्तंभ 1 में दी गई पंक्तियों का स्तंभ 2 में दिए गए भाव-विचार से सही मिलान कीजिए।
| स्तंभ 1 (पंक्ति) | स्तंभ 2 (सही मिलान भाव-विचार) |
|---|---|
| "इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, फिरते हैं और लिखते हैं, भाषण देते हैं, काम-काज करते हैं।" | हमारी समूची दिनचर्या और आचार-विचार इसी लक्ष्य (स्वप्न) की प्राप्ति पर केंद्रित हैं। |
| "जो राष्ट्र हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा, सर्वोपरि वह समाज और राष्ट्र भारतवासियों का अभाव मिटाएगा।" | जिस देश की योजनाएँ हमारे अपने समाज को ध्यान में रखकर बनाई जाएँगी, उस देश में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं होगा। |
| "उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नहीं।" | समाज में सभी व्यक्तियों को सभी तरह की स्वतंत्रता हो और उस पर किसी तरह का बंधन या सामाजिक दबाव न हो। |
पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपनी कक्षा में साझा कीजिए।
- (क) "उस समाज में अर्थ की विषमता न हो।"
अर्थ यह है कि आदर्श समाज में धन-संपत्ति के वितरण में बहुत बड़ा अंतर नहीं होना चाहिए। अमीर और गरीब के बीच की खाई इतनी गहरी न हो कि समाज में असंतोष और शोषण पनपे। यह आर्थिक समानता के विचार को दर्शाता है।
- (ख) "वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा।"
इसका अर्थ है कि चित्तरंजन दास का सपना ही उनकी संपूर्ण ऊर्जा और शक्ति का मूल स्रोत था, तथा वही सपना उनके जीवन में निरंतर आनंद और संतोष का कारण भी बना रहा। एक सार्थक लक्ष्य किस प्रकार व्यक्ति के पूरे जीवन को दिशा और ऊर्जा देता है, यह पंक्ति इसी भाव को व्यक्त करती है।
- (ग) "उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो।"
आशय है कि आदर्श समाज में व्यक्ति सामाजिक कुरीतियों, आर्थिक शोषण, जातिगत भेदभाव, राजनीतिक पराधीनता — इन सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त होना चाहिए, तभी वह अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर पाएगा।
अब आप इस पाठ को पुनः पढ़िए और निम्नलिखित के विषय में पता लगाकर लिखिए—
- (क) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस प्रकार के राष्ट्र-निर्माण का स्वप्न देखा था?
नेताजी ने एक ऐसे सर्वांगीण, स्वाधीन और संपन्न समाज तथा उस पर आधारित स्वाधीन राष्ट्र का सपना देखा था, जिसमें व्यक्ति हर प्रकार के बंधन से मुक्त हो, जातिभेद न हो, नारी को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हों, आर्थिक विषमता न हो, हर व्यक्ति को शिक्षा व उन्नति का समान अवसर मिले, श्रम व कर्म का सम्मान हो और वह राष्ट्र किसी भी विदेशी प्रभाव से मुक्त होकर विश्व के सामने आदर्श का उदाहरण प्रस्तुत करे।
- (ख) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस लक्ष्य की प्राप्ति को अपने जीवन की सार्थकता के रूप में देखा?
नेताजी ने अपने आदर्श समाज और स्वाधीन राष्ट्र के स्वप्न को साकार करने के लक्ष्य को ही अपने जीवन की सार्थकता माना। उन्होंने कहा कि यही स्वप्न उनके क्षुद्र (छोटे-से) जीवन को भी सार्थक बनाता है, और इस सत्य की प्रतिष्ठा के लिए प्राण देना भी उनके लिए स्वर्ग के समान है।
- (ग) "आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा" सुभाषचंद्र बोस ने ऐसा क्यों कहा होगा?
क्योंकि किसी भी राष्ट्र की उन्नति और स्वाधीनता श्रम, परिश्रम और कर्मठता पर ही टिकी होती है। यदि समाज में आलस्य और अकर्मण्यता को बढ़ावा मिलेगा तो राष्ट्र आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़ जाएगा और आत्मनिर्भर नहीं बन सकेगा। इसीलिए बोस ने श्रम की मर्यादा और कर्मठता को अनिवार्य बताया।
- (घ) नेताजी सुभाषचंद्र बोस के लक्ष्यों या ध्येय को पूरा करने के लिए आज की युवा पीढ़ी क्या-क्या कर सकती है?
आज की युवा पीढ़ी जातिभेद और सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने में योगदान दे सकती है, स्त्री-पुरुष समानता को अपने आचरण में उतार सकती है, ईमानदारी व मेहनत से अपना कर्तव्य निभाकर राष्ट्र-निर्माण में भाग ले सकती है, शिक्षा को बढ़ावा देकर सामाजिक व आर्थिक असमानता कम करने का प्रयास कर सकती है, तथा देश की एकता व अखंडता को बनाए रखने के लिए सजग रह सकती है।
- (क) "उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो", सुभाषचंद्र बोस ने किन-किन दृष्टियों से मुक्ति की बात की होगी?
संभवतः वे सामाजिक बंधनों (जाति, ऊँच-नीच), आर्थिक शोषण व गरीबी, राजनीतिक पराधीनता (विदेशी शासन), लैंगिक असमानता, तथा अंधविश्वास व रूढ़िवादी परंपराओं से मुक्ति की बात कर रहे होंगे।
- (ख) "उस समाज में नारी मुक्त होकर समाज एवं राष्ट्र के पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे", सुभाषचंद्र बोस को अपने भाषण में नारी के लिए समान अधिकारों की बात क्यों कहनी पड़ी होगी?
उस समय के समाज में स्त्रियों को शिक्षा, संपत्ति, राजनीतिक भागीदारी जैसे अनेक क्षेत्रों में पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त नहीं थे और वे सामाजिक बंधनों में जकड़ी हुई थीं। सुभाषचंद्र बोस एक सच्चे स्वाधीन व आदर्श समाज की कल्पना नारी की समान भागीदारी के बिना अधूरी मानते थे, इसीलिए उन्हें विशेष रूप से इस असमानता को दूर करने की बात कहनी पड़ी।
- (ग) आपके विचार से हमारे समाज में और कौन-कौन से लोग हैं जिन्हें विशेष अधिकार दिए जाने की आवश्यकता है?
दिव्यांगजन, आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग, अनुसूचित जाति/जनजाति व पिछड़े वर्गों के लोग, वरिष्ठ नागरिक, और ग्रामीण व दूरदराज़ क्षेत्रों में रहने वाले लोग जिन्हें शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएँ आसानी से नहीं मिल पातीं, इन्हें विशेष अधिकार व सुविधाएँ दिए जाने की आवश्यकता है।
- (घ) सुभाषचंद्र बोस देश के समस्त युवा वर्ग को संबोधित करते हुए कहते हैं— "हे मेरे तरुण भाइयो!" उनका संबोधन केवल 'भाइयो' शब्द तक ही क्यों सीमित रहा होगा?
उस समय की सामाजिक परिस्थितियों और भाषा-प्रयोग की सामान्य परंपरा में पुरुषवाचक शब्दों से ही समस्त वर्ग को संबोधित करने की प्रवृत्ति प्रचलित थी, इसलिए यह संबोधन केवल 'भाइयो' तक सीमित रह गया। परंतु भाषण के भाव और विषय-वस्तु से स्पष्ट है कि नेताजी अपने संबोधन में स्त्री-पुरुष दोनों तरुणों को ही समान रूप से संबोधित कर रहे थे, क्योंकि वे स्वयं नारी-मुक्ति व समानता के प्रबल समर्थक थे।
- (ङ) "यह स्वप्न मैं तुम्हें उपहारस्वरूप देता हूँ— स्वीकार करो" सुभाषचंद्र बोस के इस आह्वान पर श्रोताओं (युवा वर्ग) की क्या प्रतिक्रिया रही होगी?
यह एक अत्यंत भावुक और प्रेरक आह्वान था, जिसे सुनकर युवा वर्ग में देशभक्ति और उत्साह की लहर दौड़ गई होगी। श्रोताओं ने इसे हार्दिक रूप से स्वीकार किया होगा और स्वाधीनता संग्राम में और अधिक समर्पण भाव से जुड़ने के लिए प्रेरित हुए होंगे। तालियों और जयकारों के साथ यह भाषण सुनने वाले युवाओं ने संभवतः इस स्वप्न को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया होगा।
- (क) आपने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के भाषण का एक अंश पढ़ा है, इसे 'तरुण के स्वप्न' शीर्षक दिया गया है। अपने समूह में चर्चा करके लिखिए कि यह शीर्षक क्यों दिया गया होगा?
यह शीर्षक इसलिए दिया गया होगा क्योंकि पूरा भाषण मुख्य रूप से तरुण (युवा) वर्ग को संबोधित करते हुए दिया गया है और नेताजी अपने स्वप्न (सपने) को इन्हीं तरुणों को सौंपना चाहते हैं। भाषण का केंद्रीय भाव यही है कि स्वाधीन व आदर्श समाज-राष्ट्र का सपना अब युवाओं की ज़िम्मेदारी है, इसलिए 'तरुण के स्वप्न' शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।
- (ख) यदि आपको भाषण के इस अंश को कोई अन्य नाम देना हो तो क्या नाम देंगे? आपने यह नाम क्यों सोचा? यह भी लिखिए।
इसे 'आदर्श राष्ट्र का स्वप्न' या 'स्वाधीनता का उपहार' जैसा शीर्षक भी दिया जा सकता है, क्योंकि भाषण में मुख्य ज़ोर एक आदर्श, समतामूलक और स्वाधीन राष्ट्र की परिकल्पना पर है, और अंत में इसे स्पष्ट रूप से एक 'उपहार' के रूप में युवाओं को सौंपा गया है।
- (ग) सुभाषचंद्र बोस ने अपने समय की स्थितियों या समस्याओं को अपने संबोधन में स्थान दिया है। यदि आपको अपनी कक्षा को संबोधित करने का अवसर मिले तो आप किन-किन विषयों को अपने उद्बोधन में सम्मिलित करेंगे और उसका क्या शीर्षक रखेंगे?
विद्यार्थी अपनी कक्षा के लिए वर्तमान समय की समस्याओं जैसे— पर्यावरण संरक्षण, डिजिटल साक्षरता, नशाखोरी से बचाव, लैंगिक समानता, सामाजिक भेदभाव का अंत आदि पर आधारित उद्बोधन तैयार कर सकते हैं और उसे 'हमारा भारत, हमारा सपना' या 'नई पीढ़ी का संकल्प' जैसा शीर्षक दे सकते हैं। (यह एक रचनात्मक, स्व-अनुभव आधारित प्रश्न है, अतः विद्यार्थी अपने विचारों के अनुसार उत्तर लिख सकते हैं।)
(क) सुभाषचंद्र बोस ने अपने भाषण में संख्या, संगठन या भाव आदि का बोध कराने वाले शब्दों के साथ उनकी विशेषता अथवा गुण बताने वाले शब्दों का प्रयोग किया है। उनके भाषण से विशेषता अथवा गुण बताने वाले शब्द ढूँढ़कर दिए गए शब्द समूह को पूरा कीजिए—
| विशेषता/गुण बताने वाला शब्द | संज्ञा शब्द |
|---|---|
| अखंड (उदाहरणस्वरूप दिया गया) | सत्य |
| क्षुद्र | जीवन |
| संपन्न | समाज |
| असीम | शक्ति |
| स्वाधीन | राष्ट्र |
| अपार | आनंद |
(ख) सुभाषचंद्र बोस ने तो उपर्युक्त विशेषताओं के साथ इन शब्दों को रखा है। आप किन विशेषताओं के साथ इन उपर्युक्त शब्दों को रखना चाहेंगे और क्यों? लिखिए।
यह एक रचनात्मक और खुला प्रश्न है। उदाहरण के लिए विद्यार्थी लिख सकते हैं— 'शाश्वत सत्य', 'अनमोल जीवन', 'समतामूलक समाज', 'अटूट शक्ति', 'प्रगतिशील राष्ट्र', 'निश्छल आनंद' आदि। विद्यार्थी अपने शब्द-चयन का कारण भी बताएँ, जैसे कि उनके अनुसार वह विशेषण संज्ञा शब्द के भाव को और अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त करता है।
(क) "और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र" इस वाक्यांश में रेखांकित शब्द 'स्वाधीन' का विपरीत अर्थ देने वाला शब्द है 'पराधीन'। इसी प्रकार के कुछ विपरीतार्थक शब्द आगे दिए गए हैं, लेकिन वे आमने-सामने नहीं हैं। रेखाएँ खींचकर विपरीतार्थक शब्दों के सही जोड़े बनाइए—
| शब्द | विपरीतार्थक शब्द |
|---|---|
| स्वीकार | अस्वीकार |
| सार्थक | निरर्थक |
| विषमता | समानता |
| क्षुद्र | विशाल / वृहत / विराट / महान |
| संपन्न | विपन्न |
| अकर्मण्य | कर्मण्य / कर्मठ |
| मरण | जीवन |
(ख) अब स्तंभ 1 और स्तंभ 2 के सभी शब्दों से दिए गए उदाहरण के अनुसार वाक्य बनाकर लिखिए, जैसे— "समाज की उन्नति अकर्मण्य नहीं अपितु कर्मण्य व्यक्तियों पर निर्भर है।"
- हमें दूसरों की उचित सलाह को अस्वीकार नहीं बल्कि सहर्ष स्वीकार करना चाहिए।
- व्यर्थ की बातों में समय गँवाने के बजाय हमें सार्थक कार्यों में समय लगाना चाहिए, क्योंकि निरर्थक बातें कुछ हासिल नहीं करा सकतीं।
- एक आदर्श समाज में विषमता के लिए नहीं बल्कि समानता के लिए स्थान होना चाहिए।
- देशभक्ति की भावना किसी क्षुद्र स्वार्थ से नहीं बल्कि विशाल हृदय से जन्म लेती है।
- कड़ी मेहनत करने वाले व्यक्ति विपन्न नहीं बल्कि संपन्न जीवन जीते हैं।
- देश के लिए बलिदान होने वाला मरण भी सच्चे अर्थों में जीवन को अमर बना देता है।
- (क) आपने सुभाषचंद्र बोस के स्वप्न के बारे में जाना। आप अपने विद्यालय, राज्य और देश के बारे में कैसे स्वप्न देखते हैं? लिखिए।
विद्यार्थी अपने स्वयं के विचार लिखें — जैसे, मैं अपने विद्यालय को ऐसा देखना चाहता/चाहती हूँ जहाँ सभी विद्यार्थियों को समान अवसर मिले और बिना भेदभाव के शिक्षा दी जाए; मैं अपने राज्य को स्वच्छ, शिक्षित और रोज़गारयुक्त देखना चाहता/चाहती हूँ; मैं अपने देश को ऐसा राष्ट्र बनते देखना चाहता/चाहती हूँ जहाँ गरीबी, भेदभाव और अशिक्षा न हो और सभी नागरिक मिलकर विकास में भागीदार बनें।
- (ख) हमें बड़े संघर्षों के बाद स्वतंत्रता मिली है। अपनी इस स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए हम अपने स्तर पर क्या-क्या कर सकते हैं? लिखिए।
हम अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन कर, कानून का सम्मान कर, राष्ट्रीय एकता व अखंडता को बनाए रखकर, जातीय व धार्मिक भेदभाव से दूर रहकर, मतदान जैसे लोकतांत्रिक अधिकारों का सही उपयोग करके, तथा देश की संपत्ति व संसाधनों का सदुपयोग करके अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित रख सकते हैं।
(क) नीचे स्तंभ 1 में स्वतंत्रता सेनानियों से संबंधित कुछ तथ्य दिए गए हैं और स्तंभ 2 में स्वतंत्रता सेनानियों के नाम दिए गए हैं। तथ्यों का स्वतंत्रता सेनानियों के नाम से रेखा खींचकर सही मिलान कीजिए।
| तथ्य | स्वतंत्रता सेनानी |
|---|---|
| 8 अप्रैल, 1929 को 'सेंट्रल असेंबली' में बम फेंकने वाले क्रांतिकारी, 'शहीद-ए-आज़म' के नाम से जाने जाते हैं। | भगत सिंह |
| 'स्वराज पार्टी' के संस्थापकों में एक, सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक गुरु कहे जाते हैं। | चित्तरंजन दास |
| जेल में क्रांतिकारियों के साथ राजबंदियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रांतिकारियों ने 13 जुलाई 1929 से भूख हड़ताल शुरू कर दी। अनशन के तिरसठवें दिन जेल में इनका देहांत हो गया। | जतिन दास |
| इनके जन्मदिवस पर 'अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस' मनाया जाता है। | महात्मा गांधी |
| नर्मदा नदी के तट पर इनकी एक विशाल प्रतिमा स्थापित है, जिसे 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' कहा जाता है। | सरदार वल्लभभाई पटेल |
| 1921 में असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार होने पर न्यायाधीश ने इनसे पिता का नाम पूछा तो इन्होंने कहा— "मेरा नाम आज़ाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता और पता कारावास है।" | चंद्रशेखर आज़ाद |
(ख) इनमें से एक स्वतंत्रता सेनानी का नाम 'तरुण के स्वप्न' पाठ में भी आया है। उसे पहचान कर लिखिए।
वे स्वतंत्रता सेनानी हैं— देशबंधु चित्तरंजन दास, जिनका उल्लेख पाठ के आरंभ में "हमारे नेता स्वर्गीय देशबंधु चित्तरंजन दास ने भी एक स्वप्न देखा था" पंक्ति में हुआ है।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वाधीन संपन्न समाज की स्थापना के लिए अपने समय में अनेक प्रयास किए। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इस दिशा में क्या-क्या उल्लेखनीय प्रयत्न किए गए हैं? अपनी सामाजिक अध्ययन की पाठ्यपुस्तक, अपने अनुभवों एवं पुस्तकालय की सहायता से लिखिए।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में सामाजिक-आर्थिक समानता की दिशा में अनेक कदम उठाए गए हैं, जैसे— भारतीय संविधान द्वारा सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता व मौलिक अधिकार प्रदान करना; छुआछूत व जातिगत भेदभाव को कानूनन समाप्त करना; अनुसूचित जाति/जनजाति व पिछड़े वर्गों के उत्थान हेतु आरक्षण व विशेष योजनाएँ लागू करना; सबके लिए निःशुल्क व अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा (शिक्षा का अधिकार अधिनियम); महिला सशक्तीकरण हेतु कानून व योजनाएँ (जैसे बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ); गरीबी उन्मूलन व रोज़गार गारंटी योजनाएँ (जैसे मनरेगा); तथा पंचायती राज व्यवस्था द्वारा ग्रामीण स्तर पर लोकतांत्रिक भागीदारी सुनिश्चित करना। ये सभी प्रयास नेताजी के सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज के सपने की दिशा में उठाए गए महत्त्वपूर्ण कदम माने जा सकते हैं।
- (क) सुभाषचंद्र बोस ने स्त्रियों के लिए समान अधिकार की बात की है। अपने अनुभवों के आधार पर बताइए कि उन्हें कौन-कौन से विशेषाधिकार राज्य की ओर से दिए गए हैं?
वर्तमान में स्त्रियों को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जैसे— मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव), शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं में विशेष छूट व योजनाएँ, पंचायत व स्थानीय निकायों में आरक्षण, कन्या भ्रूण हत्या रोकने संबंधी कठोर कानून, कार्यस्थल पर उत्पीड़न से सुरक्षा हेतु कानून (POSH अधिनियम), संपत्ति में समान अधिकार, तथा सरकारी योजनाओं के अंतर्गत आर्थिक सहायता व छात्रवृत्तियाँ।
- (ख) सुभाषचंद्र बोस ने 'आज़ाद हिंद फौज' का नेतृत्व किया था। उसमें एक टुकड़ी स्त्रियों की भी थी। उस टुकड़ी का नाम पता लगाकर लिखिए। उस टुकड़ी की भूमिका क्या थी? यह भी बताइए।
आज़ाद हिंद फौज में स्त्रियों की उस टुकड़ी का नाम 'रानी झाँसी रेजिमेंट' (Rani of Jhansi Regiment) था, जिसका नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल (लक्ष्मी स्वामीनाथन) कर रही थीं। यह आज़ाद हिंद फौज की पहली और उस समय की एशिया की पहली महिला लड़ाकू रेजिमेंट थी। इस टुकड़ी की महिलाओं ने पुरुषों के समान ही सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई, जिससे यह सिद्ध हुआ कि महिलाएँ भी पुरुषों के समान बलिदान व साहस दिखा सकती हैं।
आप किस स्वतंत्रता सेनानी के कार्यों व विचारों से प्रभावित हैं? कारण सहित लिखिए और अभिनय (रोल-प्ले) करते हुए उनके विचारों को कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
यह एक व्यक्तिगत व सर्जनात्मक गतिविधि है। विद्यार्थी अपने पसंदीदा स्वतंत्रता सेनानी (जैसे भगत सिंह, महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, सरदार पटेल, रानी लक्ष्मीबाई आदि) को चुनकर उनके प्रमुख विचारों, संघर्षों व बलिदान के आधार पर कारण लिखें और कक्षा में उनके किसी प्रसिद्ध भाषण/नारे या घटना का अभिनय प्रस्तुत करें।
ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में 1944 में सुभाषचंद्र बोस ने 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा' नारे के माध्यम से आह्वान किया था। स्वाधीनता संग्राम के दौरान और भी बहुत से नारे दिए गए। ये नारे स्वतंत्रता सेनानियों के अदम्य साहस, निर्भीकता और देश-प्रेम को दर्शाते हैं। नीचे स्तंभ 1 में कुछ नारे दिए गए हैं। नारों के सामने लिखिए कि यह किसके द्वारा दिया गया?
| नारा | स्वतंत्रता सेनानी |
|---|---|
| स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है | बाल गंगाधर तिलक |
| करो या मरो | महात्मा गांधी (भारत छोड़ो आंदोलन, 1942) |
| मैं आज़ाद हूँ, आज़ाद रहूँगा और आज़ाद ही मरूँगा | चंद्रशेखर आज़ाद |
| इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद | भगत सिंह |
| पूर्ण स्वराज | जवाहरलाल नेहरू (लाहौर अधिवेशन, 1929) |
आप सभी राज्यों के स्वतंत्रता सेनानियों के विषय में पढ़कर उनमें से 10 महिला एवं 10 पुरुष स्वतंत्रता सेनानियों के चित्रों का संग्रह करके एक संग्रहिका तैयार कीजिए। चित्रों के नीचे उनके विशेष योगदान के बारे में एक-दो वाक्य भी लिखिए। अपनी संग्रहिका तैयार करते समय ध्यान रखिए कि आप किसी भी राज्य से एक से अधिक व्यक्ति न चुनें।
आपने जो पाठ पढ़ा है उसमें सुभाषचंद्र बोस तरुणों से अपने सपनों की बात करते हैं। अब आप नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा लिखित यह पत्र पढ़िए जिसमें उन्होंने गृह एवं कुटीर उद्योग पर अपने विचार व्यक्त किए हैं—
मुझे जहाँ तक याद है (मैं मात्र एक बार 'पॉलिटेकनीक' में गया था), पॉलिटेकनीक के सभी कामों में एकमात्र बेंत का काम अथवा मिट्टी के खिलौने बनाने का काम हमें गृह-उद्योग के रूप में चलाना होगा। अब यदि अंत में मिट्टी के खिलौने बनाने का काम चलाने का प्रस्ताव हो तो कोई भी कुछ दिनों में ही यह काम सीख सकता है। खर्च कुछ भी नहीं लगेगा और हम जब गृह-उद्योग प्रारंभ करेंगे तब मात्र रंगों के लिए कुछ नकद रुपये खर्च होंगे। इसके अलावा बहुत कम खर्च होगा।
एक बात मेरे मन में बार-बार उठती रहती है— पहले भी शायद इस विषय में मैंने लिखा है— सीप के बटन तैयार करना। बंगाल के बहुत-से गाँवों में यह काम घर-घर में हो रहा है। गरीब गृहस्थों के घरों में स्त्री-पुरुष अपनी फुरसत के समय में यह काम करते रहते हैं। किसी एक कार्यकर्ता को बहुत कम समय में यह काम सिखाया जा सकता है। अथवा यह काम जानने और सिखाने वाले एक नए कार्यकर्ता को आप लोग नियुक्त कर सकते हैं। मुझे लगता है कि पत्थरों के ऊपर घिसकर बटन बनाया जा सकता है— हम चाहें तो बना सकते हैं। इसके अलावा गोल काटने के लिए एक धारदार यंत्र की आवश्यकता पड़ सकती है। समिति की ओर से कुछ यंत्र और एक बोरा सीप मँगाकर ही यह काम प्रारंभ किया जा सकता है। काम सहायता-प्रार्थियों में आबद्ध रहेगा, किंतु एक बार कारगर होने पर आप देखेंगे कि गरीब परिवार अपनी आय बढ़ाने के लिए यह काम स्वयं आरंभ कर देगा। समिति सिर्फ सस्ते दामों में रॉ मैटीरियल आदि जुटा देगी और तैयार वस्तुओं को अधिक दामों में बेचने की व्यवस्था करेगी। यह काम आरंभ करना पड़ा तो पहले-पहल इसके लिए बहुत अधिक समय देना होगा।
बंगाल में बटन-निर्माण गृह-उद्योग के रूप में ही चल रहा है। बहुतों का ख़याल है कि बंगाल के बटन फैक्टरी में बनते हैं किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। गाँव-देहात के घर-घर में, फुरसत के समय, यहाँ तक कि रसोई के समय में से बचे खाली समय में भी, स्त्रियाँ यह काम करती रहती हैं। इसीलिए इतने सस्ते में यह बटन मिलते हैं।
— दक्षिण कलकत्ता सेवक-समिति के उप-मंत्री, श्री अनिलचंद्र विश्वास को मांडले जेल से लिखे गए सुभाषचंद्र बोस के पत्र से।
उपर्युक्त पत्र में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने गृह एवं कुटीर उद्योग की बात की है। यह पत्र देश की स्वतंत्रता से पहले लिखा गया था। अपने आस-पास के गृह एवं कुटीर उद्योगों के विषय में अपने साथियों के साथ चर्चा कीजिए।
यह एक कक्षा-चर्चा गतिविधि है। विद्यार्थी अपने आस-पास चल रहे गृह/कुटीर उद्योगों (जैसे अगरबत्ती बनाना, बुनाई-कढ़ाई, अचार-पापड़ बनाना, मिट्टी के बर्तन, बाँस/बेंत की वस्तुएँ, हथकरघा वस्त्र आदि) के बारे में जानकारी इकट्ठा करें और चर्चा करें कि ये उद्योग स्थानीय अर्थव्यवस्था व रोज़गार सृजन में किस प्रकार सहायक हैं।
नीचे दी गई इंटरनेट कड़ी का प्रयोग करके आप सुभाषचंद्र बोस पर आधारित फिल्म देख सकते हैं। साथ ही 'आज़ाद हिंद फौज' के विषय में और अधिक जानकारी जुटाइए और अपनी कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
विद्यार्थी पुस्तकालय, इंटरनेट व शिक्षकों की सहायता से 'आज़ाद हिंद फौज' (Indian National Army) के गठन (1942), नेताजी द्वारा इसका नेतृत्व संभालने (जुलाई 1943), 'आज़ाद हिंद सरकार' की स्थापना (अक्तूबर 1943), रानी झाँसी रेजिमेंट, तथा 'दिल्ली चलो' के नारे के साथ हुए सैन्य अभियानों के बारे में जानकारी एकत्र कर कक्षा में प्रस्तुत करें।
अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न
ये प्रश्न पाठ्यपुस्तक के अभ्यासों से अलग हैं तथा परीक्षा-अभ्यास एवं पुनरावृत्ति हेतु तैयार किए गए हैं।
(अ) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
- 1. 'तरुण के स्वप्न' पाठ किस विधा की रचना है?
- 2. सुभाषचंद्र बोस का जन्म किस नगर में हुआ था?
- 3. सुभाषचंद्र बोस को किस उपाधि से जाना जाता है?
- 4. यह भाषण किस अवसर पर दिया गया था?
- 5. यह भाषण किस तारीख़ को दिया गया था?
- 6. भाषण में उल्लिखित 'स्वर्गीय देशबंधु' किसे कहा गया है?
- 7. सुभाषचंद्र बोस के अनुसार आदर्श समाज में किसका स्थान नहीं होना चाहिए?
- 8. भाषण के अनुसार नारी को समाज व राष्ट्र में कैसा स्थान मिलना चाहिए?
- 9. "वह मरण है स्वर्ग समान" — यह किस स्थिति के लिए कहा गया है?
- 10. सुभाषचंद्र बोस ने अपना स्वप्न किसे उपहारस्वरूप दिया?
- 11. 'उत्तराधिकारी' शब्द का अर्थ है—
- 12. 'अकर्मण्य' शब्द का अर्थ है—
- 13. 'विजातीय' शब्द का सही अर्थ है—
- 14. सुभाषचंद्र बोस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष किन वर्षों में रहे?
- 15. 1938 का कांग्रेस अधिवेशन कहाँ हुआ था, जहाँ बोस अध्यक्ष चुने गए?
- 16. सुभाषचंद्र बोस द्वारा स्थापित/नेतृत्व की गई सेना का नाम था—
- 17. "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा" नारा किस वर्ष दिया गया?
- 18. आज़ाद हिंद फौज की महिला रेजिमेंट का नाम था—
- 19. सुभाषचंद्र बोस की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम है—
- 20. 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने वाले क्रांतिकारी थे—
- 21. जतिन दास की मृत्यु किस कारण हुई?
- 22. भाषण में प्रयुक्त 'अखंड सत्य' का आशय है—
- 23. नेताजी के अनुसार आदर्श राष्ट्र किसके यंत्र के रूप में काम करेगा?
- 24. 'क्षुद्र जीवन' में 'क्षुद्र' शब्द का अर्थ है—
- 25. सुभाषचंद्र बोस के निधन के बारे में इतिहासकारों की राय—
(ब) अति लघु उत्तरीय प्रश्न
- 1. 'तरुण के स्वप्न' भाषण के वक्ता कौन हैं?
इस भाषण के वक्ता नेताजी सुभाषचंद्र बोस हैं।
- 2. यह भाषण कब और कहाँ दिया गया था?
यह भाषण 29 दिसंबर 1929 को मेदिनीपुर ज़िला युवक-सम्मेलन में दिया गया था।
- 3. सुभाषचंद्र बोस को किस नाम से जाना जाता है?
उन्हें 'नेताजी' के नाम से जाना जाता है।
- 4. सुभाषचंद्र बोस का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उनका जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक (उड़ीसा, अब ओडिशा) में हुआ था।
- 5. देशबंधु किसे कहा गया है?
देशबंधु चित्तरंजन दास को कहा गया है, जो सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक गुरु थे।
- 6. सुभाषचंद्र बोस के अनुसार आदर्श समाज में व्यक्ति कैसा होना चाहिए?
आदर्श समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त होना चाहिए।
- 7. आदर्श समाज में नारी को कैसा अधिकार मिलना चाहिए?
नारी को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त होना चाहिए।
- 8. आदर्श समाज में किसके लिए कोई स्थान नहीं रहेगा?
आलसी और अकर्मण्य व्यक्तियों के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा।
- 9. सुभाषचंद्र बोस अपना स्वप्न किसे देना चाहते हैं?
वे अपना स्वप्न तरुण (युवा) वर्ग को उपहारस्वरूप देना चाहते हैं।
- 10. सुभाषचंद्र बोस की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम बताइए।
'द इंडियन स्ट्रगल'।
- 11. सुभाषचंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष कब-कब रहे?
वे 1938 (हरिपुरा) और 1939 (त्रिपुरी) में कांग्रेस अध्यक्ष रहे।
- 12. सुभाषचंद्र बोस द्वारा गठित दल का नाम बताइए।
फॉरवर्ड ब्लॉक।
- 13. आज़ाद हिंद फौज का नेतृत्व किसने किया?
सुभाषचंद्र बोस ने।
- 14. आज़ाद हिंद फौज की महिला टुकड़ी का नाम क्या था?
रानी झाँसी रेजिमेंट।
- 15. "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा" नारा कब दिया गया?
1944 में।
- 16. 'उत्स' शब्द का अर्थ बताइए।
सोता, स्रोत।
- 17. 'निर्झर' शब्द का अर्थ बताइए।
झरना, प्रपात।
- 18. 'स्वाधीन' शब्द का विपरीतार्थक शब्द बताइए।
पराधीन।
- 19. भाषण के अनुसार आदर्श राष्ट्र कैसा होगा?
वह किसी भी विजातीय (विदेशी) प्रभाव से मुक्त, स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करने वाला राष्ट्र होगा।
- 20. नेताजी के अनुसार सत्य की प्रतिष्ठा के लिए क्या किया जा सकता है?
सबकुछ त्याग किया जा सकता है, हर संकट सहा जा सकता है, यहाँ तक कि प्राण भी दिए जा सकते हैं।
(स) लघु उत्तरीय प्रश्न
- 1. सुभाषचंद्र बोस के अनुसार आदर्श समाज की क्या विशेषताएँ होंगी?
आदर्श समाज में व्यक्ति सभी बंधनों से मुक्त होगा, जातिभेद नहीं होगा, नारी को पुरुषों के समान अधिकार मिलेगा, आर्थिक विषमता नहीं होगी और हर व्यक्ति को शिक्षा व उन्नति का समान अवसर प्राप्त होगा।
- 2. चित्तरंजन दास का सपना सुभाषचंद्र बोस के लिए क्या महत्त्व रखता था?
चित्तरंजन दास का सपना ही उनकी शक्ति का स्रोत और आनंद का निर्झर था। सुभाषचंद्र बोस स्वयं को उसी सपने का उत्तराधिकारी मानते हुए उसे साकार करने के लिए प्रेरित होते थे।
- 3. नेताजी के अनुसार श्रम व कर्म को समाज में क्या स्थान मिलना चाहिए?
श्रम और कर्म को पूरी मर्यादा और सम्मान मिलना चाहिए, जबकि आलस्य और अकर्मण्यता के लिए समाज में कोई स्थान नहीं रहना चाहिए, क्योंकि राष्ट्र की उन्नति परिश्रमी नागरिकों पर निर्भर करती है।
- 4. आदर्श राष्ट्र विश्व-मानव के समक्ष किस रूप में गण्य होगा?
वह राष्ट्र न केवल भारतवासियों के अभाव को मिटाएगा, बल्कि समस्त विश्व-मानव के समक्ष एक आदर्श समाज और आदर्श राष्ट्र के उदाहरण के रूप में माना जाएगा।
- 5. "इस स्वप्न को सार्थक बनाने के दौरान प्राण देना भी है तो वह मरण स्वर्ग समान है" — इस कथन का भाव स्पष्ट कीजिए।
इस कथन से नेताजी की देशभक्ति और त्याग की भावना प्रकट होती है। वे कहते हैं कि आदर्श समाज व राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए यदि प्राण भी न्योछावर करने पड़ें, तो वह बलिदान साधारण मृत्यु नहीं बल्कि स्वर्ग के समान पवित्र और गौरवशाली माना जाएगा।
- 6. सुभाषचंद्र बोस अपने भाषण में तरुणों को क्या उपहार देते हैं और क्यों?
वे तरुणों को अपना स्वप्न (आदर्श समाज व स्वाधीन राष्ट्र की परिकल्पना) उपहारस्वरूप देते हैं, क्योंकि उनके पास भौतिक रूप से देने योग्य कुछ नहीं है, परंतु यही स्वप्न असीम शक्ति व आनंद देकर जीवन को सार्थक बना सकता है।
- 7. सुभाषचंद्र बोस ने नारी मुक्ति की बात क्यों की?
क्योंकि वे मानते थे कि सच्चा स्वाधीन व समान समाज तभी संभव है जब नारी को भी पुरुषों के समान अधिकार व अवसर प्राप्त हों तथा वह समाज व राष्ट्र-सेवा में समान रूप से भाग ले सके। उस समय स्त्रियाँ अनेक सामाजिक बंधनों में जकड़ी हुई थीं, इसलिए यह बात कहनी ज़रूरी थी।
- 8. 'तरुण के स्वप्न' शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
यह शीर्षक सार्थक है क्योंकि पूरा भाषण तरुणों को संबोधित है और नेताजी का आदर्श समाज व राष्ट्र का सपना अंततः युवाओं को ही सौंपा गया है, जिससे भावी पीढ़ी उसे साकार कर सके।
- 9. सुभाषचंद्र बोस के अनुसार समाज में आर्थिक दृष्टि से क्या स्थिति होनी चाहिए?
समाज में अर्थ की विषमता नहीं होनी चाहिए, अर्थात धन के वितरण में बहुत बड़ी असमानता नहीं होनी चाहिए, ताकि हर व्यक्ति को उन्नति का समान अवसर मिल सके।
- 10. आज़ाद हिंद फौज के बारे में आप क्या जानते हैं?
आज़ाद हिंद फौज (इंडियन नेशनल आर्मी) मूलतः 1942 में दक्षिण-पूर्व एशिया में गठित हुई थी। जुलाई 1943 में सुभाषचंद्र बोस ने इसका नेतृत्व संभाला और इसमें एक महिला रेजिमेंट (रानी झाँसी रेजिमेंट) भी शामिल थी। इस सेना ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष किया।
- 11. 'स्वदेशी समाज के यंत्र' से नेताजी का क्या आशय है?
इसका आशय है कि राष्ट्र किसी विदेशी सत्ता के अधीन नहीं, बल्कि अपने ही देश के समाज की आवश्यकताओं व हितों के अनुरूप कार्य करने वाला एक उपकरण/तंत्र होगा।
- 12. भाषण में प्रयुक्त 'अखंड सत्य' किसे कहा गया है?
सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज व स्वाधीन राष्ट्र के स्वप्न को 'अखंड सत्य' कहा गया है, क्योंकि नेताजी के लिए यह स्वप्न सदा अटूट व सत्य बना रहा।
- 13. सुभाषचंद्र बोस ने अपने भाषण में युवाओं को किस रूप में संबोधित किया?
उन्होंने युवाओं को 'तरुण भाइयो' कहकर आत्मीय व स्नेहपूर्ण रूप से संबोधित किया।
- 14. सन् 1929 का ऐतिहासिक महत्त्व संक्षेप में बताइए।
1929 में भगत सिंह-बटुकेश्वर दत्त द्वारा केंद्रीय असेंबली में बम फेंकना, जतिन दास की भूख हड़ताल में मृत्यु और लाहौर अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' का प्रस्ताव पारित होना — ये सभी घटनाएँ इसी वर्ष हुईं, जिससे यह वर्ष स्वतंत्रता संग्राम के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन गया।
- 15. चित्तरंजन दास कौन थे?
चित्तरंजन दास 'स्वराज पार्टी' के संस्थापकों में से एक थे और सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक गुरु माने जाते हैं। उनका देहांत 1925 में हो चुका था।
- 16. सुभाषचंद्र बोस के भाषण की भाषा-शैली पर टिप्पणी कीजिए।
भाषण की भाषा ओजपूर्ण, प्रेरक और भावनात्मक है। इसमें संस्कृतनिष्ठ शब्दावली (सर्वांगीण, अखंड, विजातीय आदि) का प्रयोग हुआ है, जो भाषण को गंभीरता व प्रभावशीलता प्रदान करती है।
- 17. सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु/लापता होने से जुड़े विवाद के बारे में संक्षेप में लिखिए।
18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुई एक विमान दुर्घटना में उनके निधन की सूचना दी गई थी, परंतु आज भी यह घटना विवादास्पद मानी जाती है क्योंकि विभिन्न जाँच आयोगों के निष्कर्ष परस्पर भिन्न रहे हैं और स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
- 18. भाषण से हमें युवाओं के प्रति क्या संदेश मिलता है?
भाषण से यह संदेश मिलता है कि युवा वर्ग ही किसी राष्ट्र के भविष्य और परिवर्तन का आधार होता है, इसलिए उन्हें आदर्श व समतामूलक समाज-निर्माण के लक्ष्य के प्रति समर्पित होना चाहिए।
- 19. सुभाषचंद्र बोस ने त्याग व बलिदान को किस दृष्टि से देखा?
उन्होंने त्याग व बलिदान को आदर्श स्वप्न की प्राप्ति हेतु सर्वोच्च साधन माना और कहा कि इस उद्देश्य के लिए प्राण देना भी स्वर्ग समान मृत्यु है।
- 20. 'तरुण के स्वप्न' पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
यह पाठ हमें समता, स्वतंत्रता, नारी-सम्मान, श्रम की गरिमा और देश-सेवा के प्रति समर्पण जैसे आदर्शों की शिक्षा देता है और युवाओं को राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करता है।
(द) महत्वपूर्ण प्रश्न
- 1. नेताजी सुभाषचंद्र बोस के आदर्श समाज की संपूर्ण परिकल्पना को अपने शब्दों में विस्तार से लिखिए।
नेताजी के अनुसार आदर्श समाज एक ऐसा समाज होगा जो सर्वांगीण, स्वाधीन और संपन्न होगा। इसमें व्यक्ति हर प्रकार के सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक बंधनों से मुक्त होगा तथा समाज के दबाव में दबकर उसका दमन नहीं होगा। इस समाज में जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा और नारी को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त होंगे, जिससे वह समाज व राष्ट्र-सेवा में समान भागीदार बन सके। आर्थिक दृष्टि से इस समाज में विषमता नहीं होगी और प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा व उन्नति का समान अवसर मिलेगा। श्रम व परिश्रम को पूरा सम्मान मिलेगा तथा आलस्य के लिए कोई स्थान नहीं होगा। इस प्रकार का समाज एक स्वाधीन राष्ट्र का आधार बनेगा जो किसी विदेशी प्रभाव से मुक्त होकर स्वदेशी हितों के अनुरूप कार्य करेगा और विश्व के समक्ष एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करेगा।
- 2. सुभाषचंद्र बोस के भाषण के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि वे नारी मुक्ति के विषय में क्या विचार रखते थे और आज के समाज में उनका यह विचार कितना प्रासंगिक है।
सुभाषचंद्र बोस मानते थे कि आदर्श समाज तभी संभव है जब नारी पुरुषों के समान अधिकारों का उपभोग करे और समाज व राष्ट्र-सेवा में समान भागीदार बने। उस समय के पितृसत्तात्मक समाज में यह विचार अत्यंत प्रगतिशील था। आज के समाज में भी यह विचार पूर्णतः प्रासंगिक है, क्योंकि लैंगिक समानता आज भी एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक लक्ष्य है — शिक्षा, रोज़गार, राजनीतिक भागीदारी व सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में स्त्री-पुरुष समानता स्थापित करने के प्रयास आज भी जारी हैं। नेताजी का यह विचार हमें याद दिलाता है कि सच्ची स्वाधीनता स्त्री-पुरुष दोनों की समान भागीदारी के बिना अधूरी है।
- 3. 'तरुण के स्वप्न' पाठ के आधार पर सुभाषचंद्र बोस के व्यक्तित्व की विशेषताएँ बताइए।
इस पाठ से सुभाषचंद्र बोस के व्यक्तित्व की अनेक विशेषताएँ उभरकर सामने आती हैं— वे एक दूरदर्शी विचारक थे जो केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि सामाजिक व आर्थिक समानता का भी सपना देखते थे; वे नारी-सम्मान व समानता के प्रबल समर्थक थे; वे त्याग व बलिदान की भावना से ओतप्रोत थे तथा अपने आदर्श के लिए प्राण देने को भी तत्पर थे; वे युवाओं में अत्यधिक विश्वास रखते थे और उन्हें अपने सपने का उत्तराधिकारी व सहभागी मानते थे; तथा वे एक ओजस्वी व प्रभावशाली वक्ता भी थे, जिनके शब्दों में गहरी प्रेरणा शक्ति थी।
- 4. भाषण में प्रयुक्त संस्कृतनिष्ठ व तत्सम शब्दावली भाषण के प्रभाव को किस प्रकार बढ़ाती है, उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
भाषण में सर्वांगीण, अखंड, विजातीय, गण्य, प्रतिष्ठा, उपभोग, उत्तराधिकारी जैसे तत्सम/संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग हुआ है। ये शब्द भाषण को गंभीरता, गरिमा और वैचारिक दृढ़ता प्रदान करते हैं। जैसे 'अखंड सत्य' कहने से यह भाव व्यक्त होता है कि यह विचार कभी खंडित या कमज़ोर नहीं पड़ेगा; 'विजातीय प्रभाव' कहकर विदेशी सत्ता के दबदबे को स्पष्ट व सटीक ढंग से इंगित किया गया है। इस प्रकार की शब्दावली भाषण को एक ओजस्वी, विचारोत्तेजक व स्मरणीय स्वरूप प्रदान करती है।
- 5. सन् 1929 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में इस भाषण का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
1929 का वर्ष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए निर्णायक मोड़ लेकर आया था — भगत सिंह-बटुकेश्वर दत्त का असेंबली बम कांड, जतिन दास का बलिदान और लाहौर अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' का प्रस्ताव, इन सबने युवाओं में क्रांति व बलिदान की भावना को प्रबल कर दिया था। ऐसे समय में सुभाषचंद्र बोस का यह भाषण युवाओं को न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता बल्कि एक व्यापक सामाजिक क्रांति के लिए भी प्रेरित करता है, जिससे यह भाषण उस कालखंड की भावना का सशक्त प्रतिनिधित्व करता है।
- 6. आदर्श समाज व राष्ट्र के निर्माण में आर्थिक समानता की भूमिका पर अपने विचार लिखिए, भाषण के आधार पर।
भाषण के अनुसार आदर्श समाज में अर्थ की विषमता नहीं होनी चाहिए, क्योंकि आर्थिक असमानता समाज में असंतोष, शोषण व अन्याय को जन्म देती है। जब हर व्यक्ति को शिक्षा व उन्नति का समान अवसर मिलेगा, तभी समाज सच्चे अर्थों में समृद्ध व स्थिर बन सकेगा। आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता भी अधूरी रहती है, क्योंकि गरीबी और असमानता के बने रहने से समाज का एक बड़ा वर्ग वास्तविक स्वतंत्रता के लाभों से वंचित रह जाता है।
- 7. भाषण के अंतिम भाग "हे मेरे तरुण भाइयो!..." की भावनात्मक अपील का विश्लेषण कीजिए।
भाषण का यह अंतिम भाग सबसे अधिक भावुक व प्रभावशाली है। नेताजी विनम्रता से स्वीकार करते हैं कि उनके पास भौतिक रूप से देने के लिए कुछ नहीं है, परंतु वे अपना सबसे अनमोल स्वप्न युवाओं को सौंप रहे हैं। 'उपहारस्वरूप' और 'स्वीकार करो' जैसे शब्द सीधे श्रोताओं के हृदय को स्पर्श करते हैं और उनमें उत्तरदायित्व व गौरव की भावना जगाते हैं। यह अपील नेताजी की विनम्रता, ईमानदारी और युवाओं के प्रति गहरे विश्वास को दर्शाती है।
- 8. सुभाषचंद्र बोस द्वारा गृह-उद्योग पर लिखे पत्र (झरोखे से) के आधार पर उनकी आर्थिक सोच का विश्लेषण कीजिए।
पत्र से स्पष्ट होता है कि सुभाषचंद्र बोस केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी अत्यंत महत्त्व देते थे। वे गाँव-गाँव में गृह-उद्योगों (जैसे सीप के बटन बनाना) को बढ़ावा देकर गरीब परिवारों विशेषकर स्त्रियों को अतिरिक्त आय का साधन उपलब्ध कराना चाहते थे। इससे स्पष्ट होता है कि उनकी सोच में स्वाधीनता का अर्थ केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि आम जन विशेषतः ग्रामीण व निर्धन वर्ग का आर्थिक सशक्तीकरण भी शामिल था।
- 9. 'तरुण के स्वप्न' पाठ और नेताजी के गृह-उद्योग विषयक पत्र, दोनों को मिलाकर देखने पर सुभाषचंद्र बोस के समग्र दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिए।
दोनों रचनाओं को साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि सुभाषचंद्र बोस का दृष्टिकोण बहुआयामी था। भाषण में वे राजनीतिक स्वाधीनता, सामाजिक समानता व नारी-मुक्ति की बात करते हैं, वहीं पत्र में वे आर्थिक आत्मनिर्भरता व ग्रामीण रोज़गार सृजन पर बल देते हैं। इस प्रकार उनका 'सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज' का सपना राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक — तीनों ही स्तरों पर पूर्णता की माँग करता है, जो उनकी समग्र व व्यावहारिक सोच को दर्शाता है।
- 10. यदि नेताजी सुभाषचंद्र बोस आज के युवाओं को संबोधित करते, तो वे किन विषयों पर अपने विचार रखते? अपनी कल्पना के आधार पर तर्कसंगत उत्तर दीजिए।
यह एक कल्पनाशील प्रश्न है। विद्यार्थी तर्क सहित लिख सकते हैं कि नेताजी आज के युवाओं को भ्रष्टाचार व सामाजिक असमानता के विरुद्ध खड़े होने, पर्यावरण संरक्षण व सतत विकास पर ध्यान देने, नारी सुरक्षा व समान अवसर सुनिश्चित करने, तकनीकी व वैज्ञानिक प्रगति में देश को आत्मनिर्भर बनाने, तथा राष्ट्रीय एकता व सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए प्रेरित करते, क्योंकि उनके मूल विचार — समानता, स्वाधीनता, श्रम का सम्मान और त्याग — आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
माइंड मैप
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
यह भाषण नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने 29 दिसंबर 1929 को मेदिनीपुर ज़िला युवक-सम्मेलन में दिया था।
इस भाषण का मुख्य संदेश है कि युवाओं को मिलकर एक ऐसे सर्वांगीण स्वाधीन व संपन्न समाज और राष्ट्र का निर्माण करना चाहिए जिसमें समानता, नारी-सम्मान, श्रम की गरिमा और त्याग की भावना निहित हो।
यह उपाधि उन्हें उनके अनुयायियों व आज़ाद हिंद फौज के सैनिकों द्वारा उनके प्रभावशाली नेतृत्व, साहस व त्याग के सम्मान में दी गई। समय के साथ यह नाम पूरे देश में लोकप्रिय हो गया।
देशबंधु चित्तरंजन दास उनके राजनीतिक गुरु माने जाते हैं, जिनका उल्लेख इसी भाषण के आरंभ में हुआ है।
18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुई एक विमान दुर्घटना में उनके निधन की सूचना दी गई थी, किंतु यह घटना आज भी विवादास्पद मानी जाती है और इसके स्पष्ट, सर्वसम्मत प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
क्योंकि पूरा भाषण तरुण (युवा) वर्ग को संबोधित करते हुए दिया गया है और अंत में सुभाषचंद्र बोस अपना यह स्वप्न स्पष्ट रूप से युवाओं को उपहारस्वरूप सौंप देते हैं, इसलिए यह शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।
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