नए मेहमान – एकांकी की व्याख्या और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 मल्हार
किराए के एक छोटे-से मकान में तंगी और भीषण गरमी से जूझता एक मध्यवर्गीय परिवार, और तभी बिना बुलाए आ धमकते दो अनजान मेहमान — उदयशंकर भट्ट की एकांकी "नए मेहमान" हिंदी की सबसे चर्चित एकांकियों में से एक है, जो सीमित साधनों में भी अतिथि-सत्कार निभाने वाले भारतीय गृहस्थ जीवन का सजीव और मार्मिक चित्रण करती है। इस लेख में कक्षा 8 "मल्हार" पाठ्यपुस्तक के आठवें पाठ का पूरा मूल पाठ, सरल व्याख्या, शब्दार्थ, पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यासों के उत्तर तथा अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न दिए गए हैं।
लेखक परिचय
पाठ परिचय
"नए मेहमान" एकांकी भारत के किसी बड़े नगर में किराए के एक तंग मकान में रहने वाले एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार की कहानी है। भीषण गरमी की एक रात, जब घर के सभी सदस्य पहले से ही उमस, पसीने और सिरदर्द से बेहाल हैं, तभी दो अनजान व्यक्ति — नन्हेमल और बाबूलाल — बिना बुलाए घर में मेहमान बनकर आ जाते हैं। घर का मुखिया विश्वनाथ शिष्टाचारवश उन्हें बिना ठीक से पहचाने ही घर में ठहरा लेता है। धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता है कि आगंतुक असल में किसी और (कविराज रामलाल वैद्य) के यहाँ आना चाहते थे और गलती से विश्वनाथ के घर पहुँच गए हैं। इसी बीच रेवती का भाई भी अचानक बिना पूर्व-सूचना पहुँच जाता है। एकांकी में लेखक ने संकोच, गरमी की विवशता और आर्थिक तंगी के बावजूद अतिथि का सत्कार करने की भारतीय पारिवारिक भावना को बड़े स्वाभाविक संवादों और हास्य-व्यंग्य के माध्यम से उकेरा है। यह एकांकी शहरी मध्यवर्गीय परिवार के सीमित संसाधनों, पड़ोसी-संबंधों और 'अतिथि देवो भव' की परंपरा — दोनों का यथार्थवादी और मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करती है।
पात्र परिचय
| पात्र | भूमिका/परिचय |
|---|---|
| विश्वनाथ | गृहपति — घर का मुखिया, उम्र 45 वर्ष, गंभीर स्वभाव |
| रेवती | विश्वनाथ की पत्नी, सिरदर्द और गरमी से परेशान गृहिणी |
| प्रमोद, किरण | विश्वनाथ के बच्चे — आज्ञाकारी और सहयोगी |
| नन्हेमल, बाबूलाल | अतिथि — अनजाने में विश्वनाथ के घर पहुँचे दो व्यक्ति (उम्र क्रमशः 35 व 24 वर्ष) |
| आगंतुक | रेवती का भाई — बिना सूचना पहुँचा तीसरा मेहमान |
| पड़ोसी | छत पर पानी फैलने की शिकायत लेकर आने वाला चिड़चिड़ा पड़ोसी |
स्थान: भारत का कोई बड़ा नगर (किराए का एक साधारण मकान)
मूल पाठ (संवाद)
भाग 1 — गरमी से त्रस्त घर
(गरमी की ऋतु, रात के आठ बजे का समय। कमरे के पूर्व की ओर दो दरवाजे। दक्षिण का द्वार बाहर आने-जाने के लिए। पश्चिम का द्वार भीतर खुलता है। उत्तर की ओर एक मेज है, जिस पर कुछ किताबें और अखबार रखे हैं। पास ही दो कुर्सियाँ, पश्चिम द्वार के पास एक पलंग बिछा है। मेज पर रखा हुआ पुराना पंखा चल रहा है, जिससे बहुत कम हवा आ रही है। कमरा बेहद गरम है। मकान एक साधारण गृहस्थ का है। पलंग के ऊपर चार-पाँच साल का एक बच्चा सो रहा है। पंखे की हवा केवल उस बच्चे को लग रही है। फिर भी वह पसीने से तर है, इसलिए वह कभी-कभी बेचैन हो उठता है, फिर सो जाता है। कुरता-धोती पहने एक व्यक्ति प्रवेश करता है। पसीने से उसके कपड़े तर हैं। कुरता उतार कर वह खूँटी पर टाँग देता है और हाथ के पंखे से बच्चे को हवा करता है। उसका नाम विश्वनाथ है। उम्र 45 वर्ष, गठा हुआ शरीर, गेहुँआ रंग, मुख पर गंभीरता का चिह्न।)
विश्वनाथ — ओफ, बड़ी गरमी है! (पंखा जोर-जोर से करने लगता है) इन बंद मकानों में रहना कितना भयंकर है! मकान है कि भट्ठी!
(पश्चिम की ओर से एक स्त्री प्रवेश करती है)
रेवती — (आँचल से मुँह का पसीना पोंछती हुई) पत्ता तक नहीं हिल रहा है। जैसे साँस बंद हो जाएगी। सिर फटा जा रहा है। (सिर दबाती है)
विश्वनाथ — पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है और प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती। अभी चार गिलास पीकर आया हूँ, फिर भी होंठ सूख रहे हैं। एक गिलास पानी और पिला दो। ठंडा तो क्या होगा।
रेवती — गरम है। आँगन में घड़े में भी तो पानी ठंडा नहीं होता— हवा लगे तब तो ठंडा हो। जाने कब तक इस जेलखाने में सड़ना होगा।
विश्वनाथ — मकान मिलता ही नहीं। आज दो साल से दिन-रात एक करके ढूँढ़ रहा हूँ। हाँ, पानी तो ले आओ, जरा गला ही तर कर लूँ।
रेवती — बरफ ले आते। पर बरफ भी कोई कहाँ तक पिए।
विश्वनाथ — बरफ! बरफ का पानी पीने से क्या फायदा? प्यास जैसी-की-तैसी, बल्कि दुगुनी लगती है। ओफ! लो, पंखा कर लो, बच्चे क्या ऊपर हैं?
रेवती — रहने दो, तुम्हीं करो। छत इतनी छोटी है कि पूरी खाटें भी तो नहीं आतीं। एक खाट पर दो-दो, तीन-तीन बच्चे सोते हैं, तब भी पूरा नहीं पड़ता।
विश्वनाथ — एक यह पड़ोसी हैं, निर्दयी, जो खाली छत पड़ी रहने पर भी बच्चों के लिए एक खाट नहीं बिछाने देंगे।
रेवती — वे तो हमको मुसीबत में देखकर प्रसन्न होते हैं। उस दिन मैंने कहा तो लाला की औरत बोली 'क्या छत तुम्हारे लिए है? नकद पचास देते, तब चार खाटों की जगह मिली है। न, बाबा, यह नहीं हो सकेगा। मैं खाट नहीं बिछाने दूँगी। सब हवा रुक जाएगी। उन्हें और किसी को सोता देखकर नींद नहीं आती।'
विश्वनाथ — पर बच्चों के सोने में क्या हर्ज है? जरा आराम से सो सकेंगे। कहो तो मैं कहूँ?
रेवती — क्या फायदा? अगर लाला मान भी लेगा तो वह नहीं मानेगी। वैसे भी मैं उसकी छत पर बच्चों का अकेला सोना पसन्द नहीं करूँगी।
विश्वनाथ — फिर जाने दो। मैं नीचे आँगन में सो जाया करूँगा। कमरे में भला क्या सोया जाएगा? मैं कभी-कभी सोचता हूँ यदि कोई अतिथि आ जाए तो क्या होगा?
रेवती — ईश्वर करे इन दिनों कोई मेहमान न आए। मैं तो वैसे ही गरमी के मारे मर रही हूँ। पिछले पंद्रह दिन से दर्द के मारे सिर फट रहा है। मैं ही जानती हूँ जैसे रोटी बनाती हूँ।
विश्वनाथ — सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो। यहाँ की गरमी से तो ईश्वर बचाए। इसीलिए यहाँ गर्मियों में सभी संपन्न लोग पहाड़ों पर चले जाते हैं।
रेवती — चले जाते होंगे। गरीबों की तो मौत है।
(रेवती जाती है। बच्चा गरमी से घबरा उठता है। विश्वनाथ जोर-जोर से पंखा करता है।)
विश्वनाथ — इन सुकुमार बालकों का क्या अपराध है? इन्होंने क्या बिगाड़ा है? तमाम शरीर मारे गरमी के उबल उठा है।
(रेवती पानी का गिलास लेकर आती है।)
रेवती — बड़े का तो अभी तक बुरा हाल है। अब भी कभी-कभी देह गरम हो जाती है।
विश्वनाथ — (पानी पीकर) उसने क्या कम बीमारी भोगी है — पूरे तीन महीने तो पड़ा रहा। वह तो कहो मैंने उसे शिमला भेज दिया, नहीं तो न जाने...
रेवती — भगवान ने रक्षा की। देखा नहीं, सामने वालों की लड़की को फिर से टाइफाइड हो गया और वह चल बसी। तुम कुछ दिनों की छुट्टी क्यों नहीं ले लेते? मुझे डर है, कहीं कोई बीमार न पड़ जाए।
विश्वनाथ — छुट्टी कोई दे तब न। छुट्टी ले भी लूँ तो खर्च चाहिए। खैर, तुम आज जाकर ऊपर सो जाओ। मैं आँगन में खाट डालकर पड़ा रहूँगा। बच्चे को ले जाओ। यह गरमी में भुन रहा है।
रेवती — यह नहीं हो सकता। मैं नीचे सो जाऊँगी। तुम ऊपर छत पर जाकर सो जाओ। और ऊपर भी क्या हवा है! चारों तरफ दीवारें तप रही हैं। तुम्हीं जाओ ऊपर।
विश्वनाथ — यही तो तुम्हारी बुरी आदत है। किसी का कहना न मानोगी, बस अपनी ही हाँके जाओगी। पंद्रह दिन से सिर में दर्द हो रहा है। मैं कहता हूँ खुली हवा में सो जाओगी तो तबीयत ठीक हो जाएगी।
रेवती — तुम तो व्यर्थ की जिद करते हो। भला यहाँ आँगन में तुम्हें नींद आएगी? बंद मकान, हवा का नाम नहीं। रात भर नींद न आएगी। सबेरे काम पर जाना है। जाओ, मेरा क्या है, पड़ी रहूँगी।
विश्वनाथ — नहीं, यह नहीं हो सकता। आज तो तुम्हें ऊपर सोना पड़ेगा। वैसे भी मुझे कुछ काम करना है।
रेवती — ऐसी गरमी में क्या काम करोगे? तुम्हें भी न जाने क्या धुन सवार हो जाती है। जाओ, सो जाओ। मैं आँगन में खाट पर इसे लेकर जैसे-तैसे रात काट लूँगी, जाओ।
विश्वनाथ — अच्छा तुम जानो। मैं तो तुम्हारी भलाई के लिए कह रहा था। मैं ही ऊपर जाता हूँ।
(बाहर से कोई दरवाजा खटखटाता है।)
रेवती — कौन होगा?
विश्वनाथ — न जाने। देखता हूँ।
रेवती — हे भगवान! कोई मुसीबत न आ जाए।
भाग 2 — नन्हेमल और बाबूलाल का आगमन
(बच्चे को पंखा करती है। बच्चा गरमी के मारे उठ बैठता है, पानी माँगता है। वह बच्चे को पानी पिलाती है, पंखा करती है। इसी समय दो व्यक्तियों के साथ विश्वनाथ प्रवेश करता है। रेवती बच्चे को लेकर आँगन में चली जाती है। आगंतुक एक साधारण बिस्तर तथा एक संदूक लेकर कमरे में प्रवेश करते हैं। विश्वनाथ भी पीछे-पीछे आता है। कमीजों के ऊपर काली बंडी, सिर पर सफेद पगड़ियाँ। बड़े की अवस्था पैंतीस और छोटे की चौबीस है। बड़े की मूँछें मुँह को घेरे हुए, माथे पर सलवटें। छोटे की अधकटी मूँछें, लंबा मुख। दोनों मैली धोतियाँ पहने हैं। बड़े का नाम नन्हेमल और छोटे का बाबूलाल है। इस हबड़-तबड़ में दोनों बच्चे ऊपर से उतरकर आते हैं और दरवाजे के पास खड़े होकर आगंतुकों को देखते हैं।)
विश्वनाथ — (बड़े लड़के से) प्रमोद, जरा कुर्सी इधर खिसका दो। (दूसरे अतिथि से) आप इधर खाट पर आ जाइए! जरा पंखा तेज कर देना, किरण।
(किरण पंखा तेज करती है, किंतु पंखा वैसे ही चलता है।)
नन्हेमल — (पगड़ी के पल्ले से मुँह का पसीना पोंछकर उसी से हवा करता हुआ) बड़ी गरमी है। क्या कहें, पंडित जी, पैदल चले आ रहे हैं, कपड़े तो ऐसे हो गए कि निचोड़ लो।
विश्वनाथ — जी, आप लोग...
बाबूलाल — चाचा, मेरे कपड़े निचोड़कर देख लो, एक लोटे से कम पसीना नहीं निकलेगा। धोती ऐसी चर्रा रही है, जैसे पुरानी हो। पिछले दिनों नकद नौ रुपये खर्च करके खरीदी थी।
नन्हेमल — मोतीराम की दुकान से ली होगी। बड़ा ठग है। मैंने भी कुरतों के लिए छह गज मलमल मोल ली थी, सवा रुपया गज दी, जबकि नत्थामल के यहाँ साढ़े नौ आने गज बिक रही थी। पंडित जी, गला सूखा जा रहा है। स्टेशन पर पानी भी नहीं मिला, मन करता है लेमन की पाँच-छह बोतलें पी जाऊँ।
बाबूलाल — मुझे कोई पिलाकर देखे, दस से कम नहीं पीऊँगा। (बच्चों की ओर देखकर) क्या नाम है तुम्हारा भाई?
प्रमोद — प्रमोद।
किरण — किरण।
बाबूलाल — ठंडा-ठंडा पानी पिलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे हैं।
विश्वनाथ — देखो प्रमोद, कहीं से बरफ मिले तो ले आओ। आप लोग...
नन्हेमल — अपना लोटा कहाँ रखा है? थैले में ही है न?
बाबूलाल — बिस्तर में होगा चाचा, निकालूँ क्या? और तो और बिस्तर भी पसीने से भीग गया, चाचा मैं तो पहले नहाऊँगा, फिर जो होगा देखा जाएगा, हाँ नहीं तो! मुझे नहीं मालूम था यहाँ इतनी गरमी है।
नन्हेमल — देखते जाओ। हाँ साहबा।
विश्वनाथ — क्षमा कीजिएगा, आप कहाँ से पधारे हैं?
नन्हेमल — अरे, आप नहीं जानते! वह लाला संपतराम हैं गोटेवाले, वह मेरे चचेरे भाई हैं। क्या बताएँ साहब, उन बेचारों का कारोबार सब चौपट हो गया, हम लोगों के देखते-देखते वह लाखों के आदमी खाक में मिल गए। बाबू, यह लो मेरी बंडी संदूक में रख दो।
विश्वनाथ — कौन संपतराम?
बाबूलाल — अरे वही गोटेवाले। लाओ न, चाचा। (संदूक खोलकर बंडी रखते हुए) माल-मसाला तो अंटी में है न?
नन्हेमल — नहीं, जेब में है, बंडी की जेब में है। अब डर की क्या बात है! घर ही तो है।
विश्वनाथ — मैं संपतराम को नहीं जानता।
नन्हेमल — संपतराम को जानने की... क्यों, वह तो आपसे मिले हैं। आपकी तो वह...
बाबूलाल — हाँ, उन्होंने कई बार मुझसे कहा है। आपकी तो वह बहुत तारीफ करते हैं। पंडित जी, क्या मकान इतना ही बड़ा है?
नन्हेमल — देख नहीं रहे, इसके पीछे एक कमरा दिखाई देता है। पंडित जी, इसके पीछे आँगन होगा और ऊपर छत होगी? शहर में तो ऐसे ही मकान होते हैं।
किरण — (विश्वनाथ से) माँ पूछती है, खाना...
नन्हेमल — क्यों बाबूलाल? पंडित जी, कष्ट तो होगा, पर तुम जानो, खाना तो...
बाबूलाल — बस एक साग और पूरी।
नन्हेमल — वैसे तो मैं परांठे भी खा लेता हूँ।
बाबूलाल — अरे खाने की भली चलाई, पेट ही तो भरना है। शहर में आए हैं तो किसी को तकलीफ थोड़े ही देंगे, देखिए पंडित जी, जिसमें आपको आराम हो, हम तो रोटी भी खा लेंगे। कल फिर देखी जाएगी।
नन्हेमल — भूख कब तक नहीं लगेगी— सारा दिन तो गया।
बाबूलाल — नहाने का प्रबंध तो होगा, पंडित जी?
(प्रमोद बरफ का पानी लाता है)
नन्हेमल — हाँ भैया, ला तो जरा, मैं तो डेढ़ लोटा पानी पीऊँगा।
बाबूलाल — उतना ही मैं।
(दोनों गट-गट पानी पीते हैं।)
किरण — (विश्वनाथ से धीरे से) फिर खाना?
विश्वनाथ — (इशारे से) ठहर जा जरा।
नन्हेमल — (पानी पीकर) आह! अब जान में जान आई। सचमुच गरमी में पानी ही तो जान है।
बाबूलाल — पानी भी खूब ठंडा है, वाह भैया, खुश रहो।
नन्हेमल — कितने सीधे लड़के हैं।
बाबूलाल — शहर के हैं न!
विश्वनाथ — क्षमा कीजिए, मैंने आपको...
दोनों — अरे पंडित जी, आप कैसी बातें करते हैं? हम तो आपके पास के हैं।
विश्वनाथ — आप कहाँ से आए हैं?
नन्हेमल — बिजनौर से।
विश्वनाथ — (आश्चर्य से) बिजनौर से! बिजनौर में तो... मैं बिजनौर गया हूँ, किंतु...
नन्हेमल — मैं जरा नहाना चाहता हूँ।
बाबूलाल — मैं भी स्नान करूँगा।
विश्वनाथ — पानी तो नल में शायद ही हो, फिर भी देख लो। प्रमोद, इन्हें नीचे नल पर ले जाओ।
बाबूलाल — तब तक खाना भी तैयार हो जाएगा।
भाग 3 — रेवती की जिज्ञासा और भोजन की समस्या
(दोनों बाहर निकल जाते हैं, रेवती का प्रवेश)
रेवती — ये लोग कौन हैं? जान-पहचान के तो मालूम नहीं पड़ते।
विश्वनाथ — न जाने कौन हैं।
रेवती — पूछ लो न?
विश्वनाथ — क्या पूछ लूँ? दो-तीन बार पूछा, ठीक-ठीक उत्तर ही नहीं देते।
रेवती — मेरा तो दर्द के मारे सिर फटा जा रहा है, इधर पिछली शिकायत फिर बढ़ती जा रही है। पहले सोते-सोते हाथ-पैर सुन्न हो जाते थे, अब बैठे-बैठे हो जाते हैं।
विश्वनाथ — क्या बताऊँ, जीवन में तुम्हें कोई सुख न दे सका। नौकर भी नहीं टिकता है।
रेवती — पानी जो तीन मंजिल पर चढ़ाना पड़ता है, इसीलिए भाग जाता है और गरमी क्या कम है! किसी को क्या जरूरत पड़ी है जो गरमी में भुने। यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं।
विश्वनाथ — क्या किया जाए?
रेवती — फिर क्या खाना बनाना ही होगा? पर ये हैं कौन?
विश्वनाथ — खाना तो बनाना ही पड़ेगा। कोई भी हों, जब आए हैं तो खाना जरूर खाएँगे, थोड़ा-सा बना लो।
रेवती — (तुनककर) खाना तो खिलाना ही होगा — तुम भी खूब हो! भला इस तरह कैसे काम चलेगा? दर्द के मारे सिर फटा जा रहा है, फिर खाना बनाना इनके लिए और इस समय? आखिर ये आए कहाँ से हैं?
विश्वनाथ — कहते हैं बिजनौर से आए हैं।
रेवती — (आश्चर्य से) बिजनौर! क्या बिजनौर में तुम्हारी जान-पहचान है? अपनी रिश्तेदारी का तो कोई आदमी वहाँ रहता नहीं है?
विश्वनाथ — बहुत दिन हुए एक बार काम से बिजनौर गया था, पर तब से अब तो बीस साल हो गए हैं।
रेवती — सोच लो, शायद वहाँ कोई साहित्यिक मित्र हो, उसी ने इन्हें भेजा हो।
विश्वनाथ — ध्यान तो नहीं आता, फिर भी कदाचित कोई मुझे जानता हो और उसी ने भेजा हो, किसी संपतराम का नाम बता रहे थे, मैं जानता भी नहीं।
रेवती — बड़ी मुश्किल है, मैं खाना नहीं बनाऊँगी, पहले आत्मा फिर परमात्मा, जब शरीर ही ठीक नहीं रहता तो फिर और क्या करूँ?
विश्वनाथ — क्या कहेंगे कि रातभर भूखा मारा, बाजार से कुछ मँगा दो न!
रेवती — बाजार से क्या मुफ्त में आ जाएगा? तीन-चार रुपये से कम में क्या इनका पेट भरेगा, पहले तुम पूछ लो, मैं बाद में खाना बनाऊँगी।
भाग 4 — पड़ोसी का झगड़ा
(बाबूलाल का प्रवेश, रेवती का दूसरी ओर से जाना)
बाबूलाल — तबीयत अब शांत हुई है, फिर भी पसीने से नहा गया हूँ, न जाने पंडित जी, आप यहाँ कैसे रहते हैं! (पंखा करता है)
विश्वनाथ — आठ-नौ लाख आदमी इस शहर में रहते हैं और उनमें से छह-सात लाख आदमी इसी तरह के मकानों में रहते हैं। (ऊपर छत पर शोर मचता है) क्या बात है? कैसा झगड़ा है, प्रमोद?
प्रमोद — (आकर) उन्होंने दूसरी छत पर हाथ धो लिए, पानी फैल गया, इसीलिए वह पड़ोस की स्त्री चिल्ला रही है। मैंने कहा, सबेरे साफ कर देंगे, इन्हें मालूम नहीं था।
विश्वनाथ — तुमने क्यों नहीं बताया कि हाथ दूसरी जगह धोओ।
प्रमोद — मैं पानी पीने चला गया था। वहाँ उषा रोने लगी। उसे चुप कराया, पानी पिलाया और पंखा झलता रहा।
विश्वनाथ — चलो कोई बात नहीं, उनसे कह दो कि सबेरे साफ करा देंगे।
(नेपथ्य में — "अरे बाबू मेरी धोती दे देना। मैं भी नहा लूँ")
बाबूलाल — लाया चाचा। (जाता है)
(पड़ोसी का तेजी से प्रवेश)
पड़ोसी — देखिए साहब, मेहमान आपके होंगे, मेरे नहीं। मैं यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि मेरी छत पर इस तरह गंदा पानी फैलाया जाए।
विश्वनाथ — वाकई गलती हो गई। कल सबेरे साफ करा दूँगा।
पड़ोसी — आपसे रोज ही गलती होती है।
विश्वनाथ — अनजान आदमी से गलती हो ही जाती है। उसे क्षमा कर देना चाहिए। कल से ऐसा नहीं होगा।
पड़ोसी — होगा क्यों नहीं, रोज होगा। रोज होता है। अभी उसी दिन आपके एक और मेहमान ने पानी फैला दिया था। फिर वह हमारी खाट बिछाकर लेट गया था।
विश्वनाथ — मैंने समझा तो दिया था। फिर तो वह आदमी खाट पर नहीं लेटा था।
पड़ोसी — तो आपके यहाँ इतने मेहमान आते ही क्यों हैं? यदि मेहमान बुलाने हों तो बड़ा-सा मकान लो।
विश्वनाथ — यह भी आपने खूब कहा कि इतने मेहमान क्यों आते हैं! अरे भाई मेहमानों को क्या मैं बुलाता हूँ? खैर, आज क्षमा करें, अब आगे ऐसा नहीं होगा।
पड़ोसी — कहाँ तक कोई क्षमा करे। क्षमा, क्षमा! बस एक ही बात याद कर ली है — क्षमा!
(पड़ोसी चला जाता है। दोनों अतिथि आते हैं।)
दोनों — क्या बात है?
विश्वनाथ — कुछ नहीं, आप धोतियाँ छज्जे पर सुखा दें।
नन्हेमल — सचमुच हमारी वजह से आपको बड़ा कष्ट हुआ। भैया, जरा-सा पानी और पिला दो। उफ, बड़ी गरमी है। हाँ साहब, खाने में क्या देर-दार है? बात यह है कि नींद बड़े जोर से आ रही है।
विश्वनाथ — देखिए, मैं आपसे एक-दो बात पूछना चाहता हूँ।
नन्हेमल — हाँ, हाँ पूछिए, मालूम होता है, आपने हमें पहचाना नहीं है।
विश्वनाथ — जी हाँ, बात यह है कि मैं बिजनौर गया तो अवश्य हूँ, पर बहुत दिन हो गए हैं।
भाग 5 — पहचान की उलझन
नन्हेमल — तो क्या हर्ज है — कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है। हम तो आपको जानते हैं। कई बार आपको देखा भी है।
बाबूलाल — लाला भानामल की लड़की की शादी में आप नजीबाबाद गए थे?
नन्हेमल — अरे, दूर क्यों जाते हो। अभी पिछले साल आप मुरादाबाद गए थे?
विश्वनाथ — हाँ पिछले साल मैं लखनऊ जाते हुए दो दिन के लिए जगदीशप्रसाद के पास मुरादाबाद ठहरा था।
नन्हेमल — हाँ, सेठ जगदीशप्रसाद के यहाँ हमने आपको देखा था।
बाबूलाल — उनकी आटे की मिल है, क्या कहने हैं उनके — बड़े आदमी हैं। हम उन्हीं के रिश्तेदार हैं।
विश्वनाथ — पर उनका तो प्रेस है।
नन्हेमल — प्रेस भी होगा। उनकी एक बड़ी मिल भी है। अब एक और गन्ने की मिल बिजनौर में खुल रही है।
बाबूलाल — अगले महीने तक खुल जाएगी। हाँ भैया, पानी ले आए, लो चाचा, पहले तुम पी लो।
विश्वनाथ — तो आप कोई चिट्ठी-विट्ठी लाए हैं?
दोनों — (सकपकाकर) चिट्ठी, चिट्ठी तो नहीं लाए हैं।
नन्हेमल — संपतराम ने कहा था कि स्टेशन से उतर कर सीधे रेलवे रोड चले जाना। वहाँ कृष्णा गली में वह रहते हैं।
विश्वनाथ — पर कृष्णा गली तो यहाँ छह हैं। कौन-सी गली में बताया था?
नन्हेमल — छह हैं। बहुत बड़ा शहर है साहब! हमें तो यह मालूम नहीं है, शायद बताया हो। याद ही नहीं रहा।
विश्वनाथ — (खीझकर) जिसके यहाँ आपको जाना है, उसका नाम भी तो बताया होगा?
बाबूलाल — क्या नाम था चाचा?
नन्हेमल — नाम तो याद नहीं आता। जरा ठहरिए, सोच लूँ।
बाबूलाल — अरे चाचा, कविराज या कवि बताया था। मैं उस समय नहीं था। सामान लेने घर गया था। तुम्हीं ने रेल में बताया था।
नन्हेमल — हाँ, साहब, कविराज बताया था। आप तो बेकार शक में पड़े हैं! हम कोई चोर थोड़े ही हैं।
बाबूलाल — चोर छिपे थोड़े ही रहते हैं। पंडित जी, क्या बताएँ, हमारे घर चलकर देख लें तो पता लगेगा कि हम भी...
विश्वनाथ — लेकिन मैं कविराज तो नहीं हूँ?
दोनों — (चिल्लाकर) तो कवि ही बताया होगा, साहब।
नन्हेमल — हमें याद नहीं आ रहा। हमें तो जो पता दिया था उसी के सहारे आ गए। नीचे आवाज लगाई और आप मिल गए, ऊपर चढ़ आए। पहले हमने सोचा होटल या धर्मशाला में ठहर जाएँ। फिर सोचा घर के ही तो हैं। चलो, घर ही चलें।
विश्वनाथ — जिनके यहाँ आपको जाना था, वह काम क्या करते हैं?
नन्हेमल — काम? क्या काम बताया था बाबू?
बाबूलाल — मेरे सामने तो कोई बात ही नहीं हुई। मैं तो सामान लेने चला गया था। आप तो, पंडित जी, शायद वैद्य हैं?
नन्हेमल — हाँ, याद आया। बताया था वैद्य हैं।
विश्वनाथ — पर मैं तो वैद्य नहीं हूँ।
प्रमोद — पिछली गली में एक कविराज वैद्य रहते हैं।
विश्वनाथ — हाँ, हाँ ठीक, कहीं आप कविराज रामलाल वैद्य के यहाँ तो नहीं आए हैं?
दोनों — (उछलकर) अरे हाँ, वही तो कविराज रामलाल।
विश्वनाथ — शायद वह उधर के ही हों।
नन्हेमल — ठीक है, साहब, ठीक है। वही हैं! मैं भी सोच रहा था कि आप न संपतराम को जानते हैं, न जगदीशप्रसाद को — (प्रमोद से) कहाँ है उन कविराज का घर?
विश्वनाथ — जाओ, इन्हें उनका मकान बता दो। मैं भीतर हो आऊँ।
दोनों — चलो, जल्दी चलो भैया, अच्छा साहब, राम-राम।
विश्वनाथ — (भीतर से ही) राम-राम!
भाग 6 — रेवती के भाई का अकस्मात आगमन
रेवती — अब जान में जान आई। हाय, सिर फटा जा रहा है।
(नीचे से आवाज आती है। नेपथ्य में — "भले आदमी, न जाने कहाँ मकान लिया है — ढूँढ़ते-ढूँढ़ते आधी रात हो गई।")
रेवती — फिर, फिर, (प्रसन्न होकर) अरे अरे भैया हैं! आओ, आओ, तुमने तो खबर भी न दी।
आगंतुक — रेवती! (दोनों मिलते हैं। विश्वनाथ से) पिछले चार घंटे से बराबर मकान खोज रहा हूँ। क्या मेरा तार नहीं मिला?
विश्वनाथ — नहीं तो, कब तार दिया था?
आगंतुक — कल ही तो झाँसी से दिया था। सोचा था कि ठीक समय पर मिल जाएगा। ओह! बड़ी परेशानी हुई।
रेवती — लो, कपड़े उतार डालो। पंखा करती हूँ। अरे प्रमोद, जा जल्दी से बरफ तो ला। मामा को ठंडा पानी पिला। और देख, नुक्कड़ पर हलवाई की दुकान खुली हो तो...
आगंतुक — भाई, बहुत बड़ा शहर है। वह तो कहो, मैं भी ढूँढ़कर ही रहा, नहीं तो न जाने कहाँ होटल या धर्मशाला में रहना पड़ता। बड़ी गरमी है। मैं जरा बाथरूम जाना चाहता हूँ।
विश्वनाथ — हाँ, हाँ, अवश्य। सामने चले जाइए।
आगंतुक — एक बार तो जी में आया कि सामने होटल में ठहर जाऊँ। शायद रात को आप लोगों को कोई कष्ट हो।
रेवती — ऐसा क्यों सोचते हो! कष्ट काहे का! यह तो हम लोगों का कर्तव्य था। अच्छा, तुम तैयार हो, मैं खाना बनाती हूँ।
आगंतुक — भई, देखो, इस समय खाना-वाना रहने दो, मैं पानी पीकर सो जाऊँगा। वैसे मुझे भूख भी नहीं है।
रेवती — (जाती हुई, लौटकर) कैसी बातें करते हो भैया! मैं अभी खाना बनाती हूँ।
आगंतुक — इतनी गरमी में! रहने दो न।
विश्वनाथ — तुम नहाने तो जाओ। (आगंतुक जाता है। रेवती से) कहो, अब?
रेवती — अब क्या, मैं खाना बनाऊँगी। भैया भूखे नहीं सो सकते।
(यवनिका)
— उदयशंकर भट्ट
सरल व्याख्या
भाग 1 — गरमी से त्रस्त घर
एकांकी की शुरुआत में एक तंग किराए के मकान का दृश्य दिखाया गया है, जहाँ भीषण गरमी के कारण पूरा परिवार बेचैन है। पंखा होते हुए भी हवा नहीं मिल रही, पानी और बरफ पीकर भी प्यास नहीं बुझ रही। विश्वनाथ और रेवती के बीच संवाद से पता चलता है कि मकान की तंगी, पड़ोसी की असहयोगी प्रवृत्ति, बच्चे की हाल की बीमारी और आर्थिक विवशता — सब मिलकर परिवार का जीवन कठिन बना रहे हैं। रेवती की यह इच्छा कि "इन दिनों कोई मेहमान न आए" आगे आने वाली घटनाओं के लिए विडंबनापूर्ण (आयरॉनिक) भूमिका बनाती है — क्योंकि ठीक इसके बाद ही दरवाजा खटखटाया जाता है।
भाग 2 — नन्हेमल और बाबूलाल का आगमन
दो अनजान व्यक्ति — नन्हेमल (लगभग 35 वर्ष) और बाबूलाल (24 वर्ष) — बिस्तर और संदूक लिए विश्वनाथ के घर में प्रवेश करते हैं। वे लगातार अपनी परेशानियों (गरमी, पसीना, प्यास, थकान) का जिक्र करते हैं, बिना यह स्पष्ट किए कि वे कौन हैं और किसलिए आए हैं। विश्वनाथ बार-बार पूछने की कोशिश करता है, पर हर बार बात इधर-उधर हो जाती है। वे संपतराम नामक व्यक्ति का हवाला देते हैं, जिसे विश्वनाथ बिलकुल नहीं जानता। यहाँ नाटककार ने संवादों के माध्यम से हास्य उत्पन्न किया है — मेहमान अपनी ज़रूरतों (पानी, नहाना, खाना) की माँग बड़ी सहजता से करते जाते हैं, मानो यह उनका घर हो।
भाग 3 — रेवती की जिज्ञासा और भोजन की समस्या
रेवती विश्वनाथ से पूछती है कि ये मेहमान कौन हैं, पर विश्वनाथ के पास भी कोई ठोस जवाब नहीं है। रेवती अपनी शारीरिक तकलीफ (सिरदर्द, थकान) के बावजूद खाना बनाने के लिए राजी हो जाती है, यद्यपि पहले वह झुँझलाहट दिखाती है। यह भाग भारतीय गृहिणी के उस द्वंद्व को दिखाता है जहाँ निजी कष्ट के बावजूद अतिथि-सत्कार का कर्तव्य प्राथमिकता ले लेता है।
भाग 4 — पड़ोसी का झगड़ा
मेहमानों की लापरवाही से पड़ोसी की छत पर पानी फैल जाता है, जिससे पड़ोसी क्रोधित होकर विश्वनाथ से झगड़ता है। पड़ोसी का व्यवहार यह दिखाता है कि तंग बस्तियों में साझा जगहों (छत, आँगन) को लेकर पड़ोसियों में कैसे रोज-रोज तनाव बना रहता है। विश्वनाथ बार-बार क्षमा माँगकर स्थिति को शांत करने की कोशिश करता है, जबकि पड़ोसी को यह भी शिकायत है कि विश्वनाथ के यहाँ मेहमानों का आना-जाना बहुत अधिक है।
भाग 5 — पहचान की उलझन
विश्वनाथ मेहमानों से उनके आने का कारण पूछता है। नन्हेमल और बाबूलाल बारी-बारी से अलग-अलग नाम (जगदीशप्रसाद, संपतराम) और अलग-अलग पेशे (मिल मालिक, प्रेस मालिक, वैद्य, कविराज) बताते जाते हैं, जो आपस में मेल नहीं खाते। अंततः पता चलता है कि वे वास्तव में पास की गली में रहने वाले कविराज रामलाल वैद्य के यहाँ जाना चाहते थे और गलती से विश्वनाथ के घर पहुँच गए थे। यह भाग एकांकी का हास्यपूर्ण चरमोत्कर्ष है, जो मानवीय भूल और गलतफहमी पर आधारित है।
भाग 6 — रेवती के भाई का अकस्मात आगमन
नन्हेमल-बाबूलाल के जाते ही रेवती का भाई (आगंतुक) अचानक आ पहुँचता है। उसने एक दिन पहले झाँसी से तार भेजा था, जो समय पर नहीं पहुँचा। थकान और गरमी से परेशान भाई भोजन के लिए मना करता है, पर रेवती — शारीरिक कष्ट और थकान के बावजूद — यह कहकर भोजन बनाने चल पड़ती है कि "भैया भूखे नहीं सो सकते।" यह अंतिम पंक्ति ही एकांकी का मूल संदेश है — चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत क्यों न हों, भारतीय परिवार में अतिथि-सत्कार और पारिवारिक स्नेह का भाव कभी कम नहीं होता।
चरित्र-चित्रण
विश्वनाथ
विश्वनाथ एक सीधा-सादा, कर्तव्यनिष्ठ और सहनशील गृहस्थ है। आर्थिक तंगी और गरमी के बावजूद वह अनजान मेहमानों को भी संकोचवश मना नहीं कर पाता। वह विनम्र है — पड़ोसी की डाँट भी चुपचाप सह लेता है — और परिवार के प्रति उत्तरदायी भी, जो पत्नी और बच्चों की तकलीफ की चिंता करता रहता है।
रेवती
रेवती गरमी और सिरदर्द से त्रस्त एक सामान्य गृहिणी है, जो शुरू में मेहमानों के आने पर झुँझलाती है, पर अंततः अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देकर भोजन बनाने चल पड़ती है। उसका चरित्र भारतीय गृहिणी की सहनशीलता और वत्सलता (विशेषकर भाई के प्रति) का प्रतीक है।
नन्हेमल और बाबूलाल
ये दोनों हास्य उत्पन्न करने वाले पात्र हैं — असमंजस में पड़े, अस्त-व्यस्त और भोले प्रतीत होने वाले यात्री, जो अनजाने में गलत घर पहुँच जाते हैं, फिर भी बेझिझक मेजबान से पानी, भोजन और नहाने की सुविधा माँगते रहते हैं।
प्रमोद और किरण
विश्वनाथ के आज्ञाकारी बच्चे, जो बिना किसी शिकायत के मेहमानों की सेवा में जुट जाते हैं — पानी लाना, बरफ लाना, नल पर ले जाना आदि — और छोटी बहन उषा का भी ध्यान रखते हैं।
पड़ोसी और आगंतुक (रेवती का भाई)
पड़ोसी असहयोगी और चिड़चिड़े स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि आगंतुक (रेवती का भाई) परिवार के आत्मीय रिश्तों और स्नेह को दर्शाता है — वह बिना सूचना दिए आता है, फिर भी बहन उसका उतने ही अपनत्व से स्वागत करती है।
शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| भट्ठी | अत्यधिक गरम स्थान, आँवा |
| जेलखाना | बंदीगृह; यहाँ तंग, बंद मकान के लिए प्रयुक्त |
| सुकुमार | कोमल, नाजुक |
| हबड़-तबड़ | जल्दबाजी, हड़बड़ी |
| बंडी | बिना बाँह की छोटी जैकेट/कुरता |
| चर्रा जाना | कपड़े का पुराने की तरह खराब/बेरंग हो जाना |
| अंटी | कमरबंद या धोती में बँधी गाँठ, जिसमें पैसा रखा जाता है |
| सकपकाना | घबरा जाना, अचकचा जाना |
| खीझना | चिढ़ना, झुँझलाना |
| कदाचित | शायद, संभवतः |
| तुनकना | चिढ़कर तीखी प्रतिक्रिया देना |
| गोटेवाला | गोटा-किनारी (कपड़े की सजावटी लेस) का व्यापारी |
| प्रबंध | व्यवस्था, इंतजाम |
| बर्दाश्त | सहन |
| नेपथ्य | मंच के पीछे का वह भाग जहाँ से आवाज़ आती है पर पात्र दिखाई नहीं देता |
| यवनिका | नाटक/एकांकी में दृश्य समाप्ति सूचित करने वाला परदा |
| पगड़ी | सिर पर बाँधा जाने वाला वस्त्र, साफा |
| तार | विद्युत संकेतों द्वारा दूर संदेश भेजने की पुरानी सेवा (टेलीग्राम) |
| कविराज | आयुर्वेदिक चिकित्सक, वैद्य |
| संपन्न | धनी, समृद्ध |
| छज्जा | घर के बाहर निकला हुआ छोटा छत जैसा भाग |
| अधकटी | आधी कटी हुई |
| गठा हुआ (शरीर) | सुदृढ़, मजबूत बनावट का |
पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
मेरी समझ से
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।
1. आगंतुकों ने विश्वनाथ के बच्चों को 'सीधे लड़के' किस संदर्भ में कहा?
- अतिथियों की सेवा करने के कारण
- ★ किसी तरह का प्रश्न न करने के कारण
- ★ आज्ञाकारिता के भाव के कारण
- गरमी को चुपचाप सहने के कारण
बच्चों ने बिना कोई सवाल किए, बड़ों की हर बात मानकर तुरंत पानी-बरफ लाकर दिया — इसी आज्ञाकारिता और प्रश्न न करने की प्रवृत्ति के कारण नन्हेमल-बाबूलाल ने उन्हें 'सीधे लड़के' कहा।
2. "एक ये पड़ोसी हैं, निर्दयी..." विश्वनाथ ने अपने पड़ोसी को निर्दयी क्यों कहा?
- उन्हें कष्ट में देखकर प्रसन्न होते हैं
- ★ पड़ोसी किसी प्रकार का सहयोग नहीं करते हैं
- लड़ने-झगड़ने के अवसर ढूँढ़ते हैं
- अतिथियों का अपमान करते हैं
क्योंकि पड़ोसी अपनी खाली पड़ी छत पर भी बच्चों के लिए एक खाट तक बिछाने नहीं देते थे — यानी वे कोई सहयोग नहीं करते थे, इसी कारण विश्वनाथ ने उन्हें निर्दयी कहा।
3. "ईश्वर करें इन दिनों कोई मेहमान न आए।" रेवती इस तरह की कामना क्यों कर रही है?
- मेहमान के ठहरने की उचित व्यवस्था न होने के कारण
- ★ रेवती का स्वास्थ्य कुछ समय से ठीक न होने के कारण
- अतिथियों के आने से घर का कार्य बढ़ जाने के कारण
- उसे अतिथियों का आना-जाना पसंद न होने के कारण
रेवती पिछले पंद्रह दिनों से सिरदर्द और गरमी से बेहाल है, इसलिए वह इस कमजोर स्वास्थ्य की स्थिति में किसी मेहमान का बोझ नहीं उठाना चाहती।
4. "हे भगवान! कोई मुसीबत न आ जाए।" रेवती कौन-सी मुसीबत नहीं आने के लिए कहती है?
- पानी की कमी होने की
- पड़ोसियों के चिल्लाने की
- ★ मेहमानों के आने की
- गरमी के कारण बीमारी की
रेवती यह पंक्ति ठीक उस समय कहती है जब दरवाजा खटखटाया जाता है — उसे आशंका है कि कोई अनजान मेहमान न आ टपके, इसीलिए वह मुसीबत न आने की प्रार्थना करती है।
5. इस एकांकी के आधार पर बताएँ कि मुख्य रूप से कौन-सी बात किसी रचना को नाटक का रूप देती है?
- ★ संवाद
- कथा
- वर्णन
- मंचन
संवाद ही किसी रचना को नाटक/एकांकी का रूप देते हैं, क्योंकि पूरी कथा पात्रों के आपसी संवादों से ही आगे बढ़ती है, वर्णन के माध्यम से नहीं।
(ख) हो सकता है कि आप सभी ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अब अपने सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
यह सहपाठियों के साथ मिलकर चर्चा करने का अभ्यास है — कक्षा में अपने चुने गए विकल्प के पीछे का तर्क (एकांकी के संबंधित संवाद का हवाला देकर) साझा करें और दूसरों के तर्क भी सुनें।
पंक्तियों पर चर्चा
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपनी कक्षा में साझा कीजिए।
"पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है, और प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती।"
गरमी इतनी अधिक है कि बार-बार पानी पीने पर भी प्यास शांत नहीं होती — यह भीषण गरमी और शरीर की बेचैनी को अतिशयोक्ति द्वारा दर्शाती पंक्ति है।
"सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो।"
यह उपमा पूरे शहर के तापमान की भीषणता को दर्शाती है, मानो आकाश से आग की वर्षा हो रही हो।
"यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं।"
गरीब/मध्यवर्गीय लोग साधन न होने के कारण गरमी में यूँ ही तपते रहने को विवश हैं, जैसे भाड़ में चना भुना जाता है — यह उनकी विवशता और नियति को दर्शाता है।
"आह, अब जान में जान आई। सचमुच गरमी में पानी ही तो जान है।"
तीव्र गरमी और प्यास के बाद ठंडा पानी पीकर मिलने वाली राहत को व्यक्त करती है — गरमी में पानी का महत्व जीवनदायी वस्तु जैसा हो जाता है।
मिलकर करें मिलान
स्तंभ 1 में कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं और स्तंभ 2 में उनसे मिलते-जुलते भाव दिए गए हैं। स्तंभ 1 की पंक्तियों को स्तंभ 2 की उनके सही भाव वाली पंक्तियों से मिलाइए —
| स्तंभ 1 | सही मिलान (स्तंभ 2) |
|---|---|
| 1. लाखों के आदमी खाक में मिल गए। | बहुत ही समृद्ध व्यक्ति थे पर अब उनके पास कुछ भी नहीं है। |
| 2. धोती ऐसी चर्रा रही है, जैसे पुरानी हो। | कपड़ा पसीने से भीगकर पुराने जैसा हो गया है। |
| 3. माल-मसाला तो अंटी में है न? | धनराशि सुरक्षित तो है न! |
| 4. खाने में क्या देर-दार है। | भोजन की व्यवस्था कब तक हो जाएगी। |
| 5. पहले आत्मा फिर परमात्मा। | पहले अपना ध्यान, फिर दूसरा काम। |
सोच-विचार के लिए
एकांकी को पुनः पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए —
(क) "शहर में तो ऐसे ही मकान होते हैं।" नन्हेमल का 'ऐसे ही मकान' से क्या आशय है?
नन्हेमल का आशय है कि शहरों में जगह की कमी के कारण छोटे, तंग मकान बनते हैं जिनमें आगे कमरा, पीछे छोटा-सा आँगन और ऊपर एक संकरी छत होती है — यही शहरी मकानों की सामान्य बनावट है।
(ख) पड़ोसी को विश्वनाथ से किस तरह की शिकायत है? आपके विचार से पड़ोसी का व्यवहार उचित है या अनुचित? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
पड़ोसी की शिकायत है कि विश्वनाथ के मेहमान बार-बार उसकी छत पर गंदा पानी फैला देते हैं और पहले भी एक मेहमान उसकी खाट पर लेट गया था। पानी फैलाने पर आपत्ति करना उचित है, परंतु बार-बार 'क्षमा-क्षमा' कहकर ताना मारना और विश्वनाथ पर चिल्लाना अशिष्ट और अनुचित है — छोटी-सी भूल को समझदारी और सहनशीलता से भी सुलझाया जा सकता था।
(ग) एकांकी में विश्वनाथ नन्हेमल और बाबूलाल को नहीं जानता है, फिर भी उन्हें अपने घर में आने देता है। क्यों?
भारतीय समाज में मेहमान को सीधे मना करना अशिष्टता मानी जाती है। विश्वनाथ को लगता है कि शायद ये कोई भूला-बिसरा परिचित हों जो उसे पहचानते हों, और संकोचवश तथा शिष्टाचारवश वह बिना ठीक से पहचाने ही उन्हें भीतर आने देता है।
(घ) एकांकी के उन संवादों को ढूँढ़कर लिखिए जिनसे पता चलता है कि बाबूलाल और नन्हेमल विश्वनाथ के परिचित नहीं हैं?
जैसे — "तो आप कोई चिट्ठी-विट्ठी लाए हैं?" पर दोनों का सकपकाकर कहना "चिट्ठी तो नहीं लाए हैं"; नाम, पता, काम आदि पूछने पर बार-बार अलग-अलग और परस्पर-विरोधी उत्तर देना; अंत में यह स्पष्ट होना कि वे कविराज रामलाल वैद्य के यहाँ जाना चाहते थे — ये सभी संवाद दिखाते हैं कि वे विश्वनाथ को वास्तव में नहीं जानते थे।
(ङ) एकांकी के उन वाक्यों को ढूँढ़कर लिखिए जिनसे पता चलता है कि शहर में भीषण गरमी पड़ रही है।
"मकान है कि भट्ठी!", "सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो", "चारों तरफ दीवारें तप रही हैं", "यह गरमी में भुन रहा है", "प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती", "यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं" — ये सभी वाक्य गरमी की भीषणता को स्पष्ट करते हैं।
अनुमान और कल्पना से
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए —
(क) एकांकी में विश्वनाथ अपनी पत्नी को अतिथियों के लिए भोजन की व्यवस्था करने के लिए कहता है। साथ ही रेवती की अस्वस्थता का विचार करके भोजन बाजार से मँगाने का सुझाव भी देता है। लेकिन उसने स्वयं अतिथियों के लिए भोजन बनाने के विषय में क्यों नहीं सोचा?
उस समय के पारिवारिक ढाँचे में भोजन बनाना परंपरागत रूप से घर की स्त्री का दायित्व माना जाता था; विश्वनाथ को स्वाभाविक रूप से यही सामाजिक धारणा प्रभावित करती है, इसीलिए वह स्वयं भोजन बनाने के बारे में नहीं सोचता, केवल विकल्प (बाजार से मँगाना) सुझाता है।
(ख) एकांकी में विश्वनाथ का बेटा प्रमोद अतिथियों के पेयजल की व्यवस्था करता है और छोटी बहन का भी ध्यान रखता है। प्रमोद को इस तरह के उत्तरदायित्व क्यों दिए गए होंगे?
प्रमोद घर का सबसे बड़ा बेटा है, इसलिए परिवार में उससे अधिक जिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। भारतीय परिवारों में बड़े बच्चों को छोटी उम्र से ही घरेलू कार्यों और छोटे भाई-बहनों की देखभाल में सहभागी बनाया जाता है, ताकि वे उत्तरदायित्व सीखें।
(ग) "कैसी बातें करते हो, भैया! मैं अभी खाना बनाती हूँ।" भीषण गरमी और सिर में दर्द के बावजूद भी रेवती भोजन की व्यवस्था करने के लिए क्यों तैयार हो गई होगी?
भाई के प्रति स्नेह और अतिथि-सत्कार का पारिवारिक कर्तव्य-भाव उसकी व्यक्तिगत तकलीफ पर हावी हो जाता है। रेवती के लिए भाई को भूखा सोने देना असंभव है — यह उसके स्नेहिल और कर्तव्यनिष्ठ स्वभाव को दर्शाता है।
(घ) एकांकी से गरमी की भीषणता दर्शाने वाली कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं। अपनी कल्पना और अनुमान से बताइए कि सर्दी और वर्षा की भीषणता के लिए आप इनके स्थान पर क्या-क्या वाक्य प्रयोग करते हैं?
| गरमी की भीषणता | सर्दी की भीषणता | वर्षा की भीषणता |
|---|---|---|
| 1. यह गरमी में भुन रहा है। | यह सर्दी में जम गया। | यह वर्षा में भीग रहा है। |
| 2. पर बरफ भी कोई कहाँ तक पिए। | पर रजाई में भी कहाँ तक दुबका रहे। | पर छाते में भी कहाँ तक भीगने से बचें। |
| 3. सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो। | सारे शहर में जैसे बर्फ गिर रही हो। | सारे शहर में जैसे बादल फट रहे हों। |
| 4. प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती। | ठंड है कि जाने का नाम नहीं लेती। | बारिश है कि थमने का नाम नहीं लेती। |
| 5. चारों तरफ दीवारें तप रही हैं। | चारों तरफ दीवारें बर्फ-सी ठंडी हैं। | चारों तरफ पानी ही पानी भर गया है। |
| 6. ठंडा-ठंडा पानी पिलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे हैं। | गरम-गरम चाय पिलाओ दोस्त, हाथ-पैर सुन्न हुए जा रहे हैं। | गरम कपड़े दे दो दोस्त, ठंड से बुरा हाल है। |
| 7. सचमुच गरमी में पानी ही तो जान है। | सचमुच सर्दी में धूप ही तो जान है। | सचमुच बरसात में छाता ही तो सहारा है। |
| 8. यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं। | यह तो हमारा ही भाग्य है कि बर्फ की तरह जमते रहते हैं। | यह तो हमारा ही भाग्य है कि मछली की तरह भीगते रहते हैं। |
| 9. फिर भी पसीने से नहा गया हूँ। | फिर भी ठंड से काँप रहा हूँ। | फिर भी सिर से पैर तक भीग गया हूँ। |
एकांकी की रचना
एकांकी एक प्रकार का नाटक होता है जिसमें केवल एक ही अंक या भाग होता है। इसमें किसी कहानी या घटना को संक्षेप में दर्शाया जाता है।
(क) अपने समूह में मिलकर इस एकांकी की विशेषताओं की सूची बनाइए।
प्रमुख विशेषताएँ — एक ही स्थान (घर) और एक ही रात में पूरी घटना घटित होना; सीमित पात्र; कथा का संवादों के माध्यम से आगे बढ़ना; आरंभ में पात्र-परिचय, स्थान व समय की जानकारी; कोष्ठक में रंगमंच-निर्देश (हाव-भाव, वेशभूषा, गतिविधि); अंत में यवनिका (पर्दा गिरना) का संकेत।
(ख) आगे कुछ वाक्य दिए गए हैं। एकांकी के बारे में जो वाक्य आपको सही लग रहे हैं, उनके सामने 'हाँ' लिखिए। जो वाक्य सही नहीं लग रहे हैं, उनके सामने 'नहीं' लिखिए।
| वाक्य | हाँ/नहीं |
|---|---|
| 1. 'नए मेहमान' एकांकी में पूरी कहानी एक ही स्थान, घर में घटित होती दिखाई गई है। | हाँ |
| 2. एकांकी में पात्रों की संख्या बहुत अधिक है। | नहीं |
| 3. एकांकी में एक कहानी छिपी है। | हाँ |
| 4. एकांकी और कहानी में कोई अंतर नहीं है। | नहीं |
| 5. एकांकी में कहानी की घटनाएँ अलग-अलग दिनों या महीनों में हो रही हैं। | नहीं |
| 6. एकांकी में कहानी मुख्य रूप से संवादों से आगे बढ़ती है। | हाँ |
| 7. एकांकी में पात्रों को अभिनय के लिए निर्देश दिए गए हैं। | हाँ |
अभिनय की बारी
(क) क्या आपने कभी मंच पर कोई एकांकी या नाटक देखा है? टीवी पर फिल्में और धारावाहिक तो अवश्य देखे होंगे! अपने अनुभवों से बताइए कि यदि आपको अपने विद्यालय में 'नए मेहमान' एकांकी का मंचन करना हो तो आप क्या-क्या तैयारियाँ करेंगे?
पात्रों के अनुरूप वेशभूषा (पगड़ी, धोती-कुरता, साड़ी) जुटाना; मंच पर घर जैसा दृश्य (मेज, कुर्सी, पलंग, पंखा) सजाना; संवादों का अभ्यास व सही उच्चारण; ध्वनि-प्रभाव (दरवाजा खटखटाना, नेपथ्य की आवाज़ें) की व्यवस्था; हास्य के दृश्यों में समय (टाइमिंग) का अभ्यास — ये सब मंचन को रोचक बनाएँगे।
(ख) अब अपने-अपने समूह में इस एकांकी को प्रस्तुत करने की तैयारी करनी है। इसके लिए यह सोचना है कि कौन किस पात्र का अभिनय करेगा। शिक्षक तैयारी के बाद अभिनय के लिए निर्धारित समय देंगे। सुझाव के अनुसार तैयारी कर एकांकी प्रस्तुत करें।
यह कक्षा-गतिविधि है — समूह में पात्र बाँटकर, दिए गए सुझावों (आसपास की वस्तुओं का उपयोग, आवश्यकता पड़ने पर संवाद में मामूली परिवर्तन, स्थान की कमी में खड़े-खड़े भी अभिनय) के अनुसार अभ्यास करके निर्धारित समय में एकांकी प्रस्तुत करें।
भाषा की बात
"सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो।", "चारों तरफ दीवारें तप रही हैं।", "यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं।" — उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित शब्द गरमी की प्रचंडता को दर्शा रहे हैं कि तापमान अत्यधिक है। एकांकी में इस प्रकार के और भी प्रयोग हुए हैं जहाँ शब्दों के माध्यम से विशेष प्रभाव उत्पन्न किया गया है, उन प्रयोगों को छाँटकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।
जैसे — "पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है", "प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती", "मकान है कि भट्ठी", "तमाम शरीर मारे गरमी के उबल उठा है", "ठंडा-ठंडा पानी पिलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे हैं" आदि — इन सभी में अतिशयोक्ति के माध्यम से गरमी की तीव्रता को उभारा गया है।
मुहावरे
"आज दो साल से दिन-रात एक करके ढूँढ़ रहा हूँ।" तथा "लाखों के आदमी खाक में मिल गए।" — उपर्युक्त वाक्यांशों में रेखांकित वाक्यांश 'रात-दिन एक करना' तथा 'खाक में मिलना' मुहावरों का प्रायोगिक रूप हैं। ये वाक्य एक विशेष प्रभाव उत्पन्न कर रहे हैं। एकांकी में आए अन्य मुहावरों की पहचान करके लिखिए और उनके अर्थ समझते हुए अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
अन्य मुहावरे — 'जान में जान आना' (राहत मिलना): जैसे — परीक्षा परिणाम अच्छा आने पर मेरी जान में जान आई। 'सिर फटा जाना' (तीव्र पीड़ा होना): जैसे — शोर के कारण मेरा सिर फटा जा रहा था। 'हाथ-पैर सुन्न होना' (शरीर का निष्क्रिय हो जाना): जैसे — देर तक एक ही मुद्रा में बैठे रहने से मेरे हाथ-पैर सुन्न हो गए। 'अपनी हाँकना' (अपनी मनमानी करना): जैसे — वह किसी की नहीं सुनता, बस अपनी ही हाँकता रहता है।
बात पर बल देना
"वह तो कहो, मैं भी ढूँढ़कर ही रहा।" उपर्युक्त वाक्य से रेखांकित शब्द 'ही' हटाकर पढ़िए — "वह तो कहो, मैं भी ढूँढ़कर रहा।"
(क) दो-दो के जोड़े में चर्चा कीजिए कि वाक्य में 'ही' के प्रयोग से किस बात को बल मिल रहा था और 'ही' हटा देने से क्या कमी आई?
'ही' लगाने से यह बल मिलता है कि खोजने का काम पूरी तरह और निश्चित रूप से खुद किया गया, किसी और की सहायता के बिना। 'ही' हटाने से वाक्य सामान्य कथन-भर रह जाता है, दृढ़ता और विशिष्टता का भाव समाप्त हो जाता है।
(ख) नीचे लिखे वाक्यों में ऐसे स्थान पर 'ही' का प्रयोग कीजिए कि वे सामने लिखा अर्थ देने लगें —
| वाक्य | वांछित अर्थ |
|---|---|
| 1. विश्वनाथ के अतिथि ही यहाँ रुकेंगे। | और किसी के अतिथि नहीं। |
| 2. विश्वनाथ के अतिथि यहीं रुकेंगे। | यहाँ के अतिरिक्त और कहीं नहीं। |
| 3. विश्वनाथ के अतिथि यहाँ रुकेंगे ही। | यहाँ रुकना निश्चित है। |
"तुम नहाने तो जाओ।" उपर्युक्त वाक्य में 'तो' का स्थान बदलकर अर्थ में आए परिवर्तन पर ध्यान दें — "तुम तो नहाने जाओ।" / "तुम नहाने जाओ तो।"
'ही' और 'तो' के ऐसे और प्रयोग करके वाक्य बनाइए।
उदाहरण — वह पढ़ाई में ही मन लगाता है (केवल पढ़ाई में, और किसी काम में नहीं)। वह पढ़ाई में मन लगाता ही है (यह निश्चित रूप से सच है)। तुम खाना तो खा लो (कम-से-कम इतना तो करो)। तुम तो खाना खा लो (तुम खा लो, दूसरों की बात अलग है)।
आपकी बात
(क) "रेवती— ये लोग कौन हैं? जान-पहचान के तो मालूम नहीं पड़ते। विश्वनाथ— क्या पूछ लूँ? दो-तीन बार पूछा, ठीक-ठीक उत्तर ही नहीं देते।" उपर्युक्त संवाद से पता चलता है कि विश्वनाथ दुविधा की स्थिति में है। क्या आपके सामने कभी कोई ऐसी दुविधापूर्ण स्थिति आई है जब आपको यह समझने में समय लगा हो कि क्या सही है और क्या गलत? अपने अनुभव साझा कीजिए।
यह व्यक्तिगत अनुभव-आधारित प्रश्न है — विद्यार्थी अपने जीवन की किसी दुविधा (जैसे किसी अनजान व्यक्ति की सहायता करनी चाहिए या नहीं, कोई निर्णय लेने में असमंजस) का उदाहरण देकर बताएँ कि उन्होंने स्थिति को कैसे समझा और क्या निर्णय लिया।
(ख) एकांकी से ऐसा लगता है कि नन्हेमल और बाबूलाल सगे संबंधी ही नहीं, अच्छे मित्र भी हैं। आपके अच्छे मित्र कौन-कौन हैं? वे आपको क्यों प्रिय हैं?
व्यक्तिगत उत्तर — अपने घनिष्ठ मित्रों के नाम बताते हुए यह लिखें कि वे आपके सुख-दुख में साथ देते हैं, आप पर भरोसा करते हैं और आपसी समझ के कारण वे आपको प्रिय हैं।
(ग) आप अपने किसी संबंधी या मित्र के घर जाने से पहले क्या-क्या तैयारी करते हैं?
पहले फोन करके सूचना देना/समय तय करना, सही पता और रास्ता मालूम करना, उपहार या मिठाई ले जाना, उचित कपड़े पहनना — ये सामान्य तैयारियाँ की जाती हैं।
(घ) विश्वनाथ के पड़ोसी उनका किसी प्रकार से भी सहयोग नहीं करते हैं। आप अपने पड़ोसियों का किस प्रकार से सहयोग करते हैं?
आपात स्थिति में सहायता करना, त्योहारों में मिलजुल कर मनाना, ज़रूरत की वस्तुएँ आपस में साझा करना, विनम्रता से पेश आना — इस प्रकार पड़ोसियों के साथ सहयोग किया जा सकता है।
(ङ) नन्हेमल और बाबूलाल का व्यवहार सामान्य अतिथियों जैसा नहीं है। आपके अनुसार सामान्य अतिथियों का व्यवहार कैसा होना चाहिए?
एक अच्छे अतिथि को मेजबान को पहले सूचित करना चाहिए, मेजबान पर अनावश्यक बोझ नहीं डालना चाहिए, विनम्र रहना चाहिए और अपनी हर आवश्यकता को हठपूर्वक नहीं जताना चाहिए।
सावधानी और सुरक्षा
(क) विश्वनाथ ने नन्हेमल और बाबूलाल से उनका परिचय नहीं पूछा और उन्हें घर के भीतर ले आए। यदि आप उनके स्थान पर होते तो क्या करते?
मैं पहले विनम्रता से उनका नाम, पता और आने का उद्देश्य पूछता, किसी पहचान-पत्र या संदर्भ की पुष्टि करता, और स्पष्ट जानकारी मिलने तक उन्हें सीधे घर के भीतरी हिस्से में न ले जाकर बाहरी बैठक में ही बैठाता।
(ख) आपके माता-पिता या अभिभावक की अनुपस्थिति में यदि कोई अपरिचित व्यक्ति आए तो आप क्या-क्या सावधानियाँ बरतेंगे?
दरवाजा पूरी तरह न खोलकर पहले पूछताछ करना, अपरिचित को घर के अंदर अकेले न आने देना, तुरंत माता-पिता या किसी बड़े को फोन पर सूचित करना, और ज़रूरत पड़ने पर पड़ोसी की सहायता लेना।
सृजन
(क) आपने यह एकांकी पढ़ी। इस एकांकी में एक कहानी कही गई है। उस कहानी को अपने शब्दों में लिखिए। (जैसे— एक दिन मेरे घर मेहमान आ गए...)
यह रचनात्मक-लेखन गतिविधि है — विद्यार्थी एकांकी की घटना (गरमी की रात, दो अनजान मेहमानों का आना, भोजन की दुविधा, पड़ोसी का झगड़ा, पहचान की उलझन और अंत में असली मेहमान का आना) को अपनी भाषा में, कथा-शैली (गद्य) में क्रमबद्ध रूप से लिखें।
गरमी का प्रकोप
"तमाम शरीर मारे गरमी के उबल उठा है।" एकांकी में भीषण गरमी का वर्णन किया गया है। आप गरमी के प्रकोप से बचने के लिए क्या-क्या सावधानी बरतेंगे? पाँच-पाँच के समूह में चर्चा करें। मुख्य बिंदुओं को चार्ट पेपर पर लिखकर बुलेटिन बोर्ड पर लगाएँ और इन्हें व्यवहार में लाएँ।
पर्याप्त पानी और तरल पदार्थ पीना, तेज धूप (दोपहर 12-3 बजे) में बाहर न निकलना, हल्के व सूती कपड़े पहनना, छाता/टोपी का प्रयोग करना, ठंडी छाया में विश्राम करना, और लू लगने के लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना — ये मुख्य बिंदु समूह-चर्चा में शामिल किए जा सकते हैं।
तार से संदेश
"क्या मेरा तार नहीं मिला?" रेवती के भाई ने अपने आने की सूचना तार द्वारा भेजी थी। 'तार' संदेश भेजने का एक माध्यम था, जिसके द्वारा शीघ्रता से किसी के पास संदेश भेजा जा सकता था, किंतु अब इसका प्रचलन नहीं है।
(क) तार भेजने के आधार पर अनुमान लगाएँ कि यह एकांकी लगभग कितने वर्ष पहले लिखी गई होगी?
चूँकि एकांकी में तार को संदेश भेजने का सामान्य और सुलभ साधन बताया गया है, अनुमान लगाया जा सकता है कि यह उस दौर की रचना है जब भारत में तार-सेवा प्रचलन में थी (भारत में तार सेवा 15 जुलाई 2013 को बंद हुई); यानी यह एकांकी दशकों पहले की रचना होनी चाहिए।
(ख) आजकल संदेश भेजने के कौन-कौन से साधन सुलभ हैं?
मोबाइल फोन कॉल, एस.एम.एस., व्हाट्सऐप और अन्य मैसेजिंग ऐप, ईमेल, सोशल मीडिया तथा वीडियो-कॉल आदि।
(ग) आप किसी को संदेश भेजने के लिए किस माध्यम का सर्वाधिक उपयोग करते हैं?
व्यक्तिगत उत्तर — अधिकतर विद्यार्थी मोबाइल फोन पर कॉल या व्हाट्सऐप संदेश का सर्वाधिक उपयोग करते हैं।
(घ) अपने किसी प्रिय व्यक्ति को एक पत्र लिखकर भारतीय डाक द्वारा भेजिए।
यह एक व्यावहारिक गतिविधि है — औपचारिक/अनौपचारिक पत्र के सही प्रारूप (दिनांक, संबोधन, विषय-वस्तु, हस्ताक्षर) में अपने किसी प्रिय व्यक्ति (मित्र/रिश्तेदार) को पत्र लिखकर डाकघर से भेजें।
नाप, तौल और मुद्राएँ
"जबकि नत्थामल के यहाँ साढ़े नौ आने गज बिक रही थी।" उपर्युक्त पंक्ति के रेखांकित शब्दों पर ध्यान दीजिए। रेखांकित शब्द 'साढ़े नौ', 'आने', 'गज' में 'साढ़े नौ' भारतीय भाषा में अंतरराष्ट्रीय अंक (9.5) को दर्शा रहा है तो वहीं 'आने' शब्द भारतीय मुद्रा और 'गज' शब्द लंबाई नापने का मापक है।
(क) पता लगाइए कि एक रुपये में कितने आने होते हैं?
पुरानी भारतीय मुद्रा-प्रणाली में एक रुपये में 16 आने होते थे।
(ख) चार आने में कितने पैसे होते हैं?
पुरानी प्रणाली में 1 आना = 4 पैसे होते थे, अतः चार आने में 16 पैसे होते हैं।
(ग) आपके आस-पास 'गज' शब्द का प्रयोग किस संदर्भ में किया जाता है? पता लगाइए और लिखिए।
आज भी 'गज' शब्द का प्रयोग कपड़ा नापने (जैसे साड़ी, कपड़े की दुकान पर) और भूमि/प्लॉट की लंबाई-चौड़ाई नापने में किया जाता है।
(घ) बताइए कि एक गज में कितनी फीट होती हैं?
एक गज में 3 फीट होते हैं (लगभग 0.9144 मीटर के बराबर)।
झरोखे से
कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जीवन सादगी से भरा था, परंतु वे अपने आतिथ्य के लिए जाने जाते थे। उनके घर कोई अतिथि आ जाए तो वे उसके सत्कार के लिए जी-जान से जुट जाते थे। महादेवी वर्मा की पुस्तक पथ के साथी से निराला के आतिथ्य-भाव का एक अंश पाठ्यपुस्तक में दिया गया है, जिसमें बताया गया है कि निराला अतिथि के भोजन से लेकर जूठे बर्तन माँजने तक का काम स्वयं हर्षपूर्वक करते थे, और अतिथि-पूजा के प्रति उनकी दृष्टि गाँव के परंपरागत किसान जैसी सहज और गहरी थी।
इस अंश से स्पष्ट होता है कि 'नए मेहमान' एकांकी के विश्वनाथ-रेवती परिवार की भाँति ही निराला जी में भी अतिथि-सत्कार की गहरी भावना थी — अंतर केवल इतना है कि निराला यह कार्य स्वेच्छा व उत्साह से करते थे, जबकि एकांकी के पात्र आर्थिक तंगी और शारीरिक कष्ट के बावजूद कर्तव्यवश करते हैं।
साझी समझ
भारत में 'अतिथि देवो भव' की परंपरा रही है। आपके घर जब अतिथि आते हैं तो आप उनका अभिवादन कैसे करते हैं, अपनी भाषा में बताइए और अपने सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए कि अतिथियों को आप अपने राज्य, क्षेत्र का कौन-सा पारंपरिक व्यंजन खिलाना चाहेंगे।
व्यक्तिगत/क्षेत्रीय उत्तर — नमस्ते या प्रणाम कहकर, हाथ जोड़कर या पैर छूकर अतिथि का स्वागत करने की परंपरा है; अपने क्षेत्र के किसी प्रसिद्ध व्यंजन (जैसे उत्तर भारत में कढ़ी-चावल, दाल-बाटी आदि) का नाम बताकर सहपाठियों से चर्चा करें।
खोजबीन के लिए
इस एकांकी में 'आने', 'गज' और 'तार' शब्द आए हैं। इनके विषय में विस्तार से जानकारी इकट्ठी कीजिए। इसके लिए आप अपने अभिभावक, अध्यापक, पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता भी ले सकते हैं।
'आना' — ब्रिटिश-भारतीय मुद्रा-प्रणाली की एक इकाई थी (1 रुपया = 16 आने); 1957 में दशमलव प्रणाली लागू होने पर यह चलन से बाहर हो गई। 'गज' — लंबाई मापने की परंपरागत इकाई है, जो लगभग 3 फीट (0.9144 मीटर) के बराबर होती है और आज भी कपड़ा व ज़मीन नापने में प्रचलित है। 'तार' (टेलीग्राम) — विद्युत संकेतों द्वारा दूर संदेश भेजने की सेवा थी, जिसे भारत में सरकारी दूरसंचार विभाग (BSNL) संचालित करता था; तेज़ फोन व इंटरनेट सेवाओं के आने से इसका प्रयोग घटता गया और 15 जुलाई 2013 को भारत में यह सेवा पूर्णतः बंद कर दी गई।
अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न
(अ) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (बहुविकल्पीय)
1. 'नए मेहमान' एकांकी के लेखक कौन हैं?
(अ) जयशंकर प्रसाद (ब) उदयशंकर भट्ट (स) प्रेमचंद (द) निराला
2. एकांकी में विश्वनाथ की उम्र कितनी बताई गई है?
(अ) 35 वर्ष (ब) 40 वर्ष (स) 45 वर्ष (द) 50 वर्ष
3. एकांकी का घटनास्थल क्या है?
(अ) एक गाँव (ब) भारत का कोई बड़ा नगर (स) पहाड़ी क्षेत्र (द) समुद्र तट
4. एकांकी में घटना किस समय घटित होती है?
(अ) सुबह आठ बजे (ब) दोपहर बारह बजे (स) रात के आठ बजे (द) शाम पाँच बजे
5. विश्वनाथ का बड़ा बेटा कौन है?
(अ) किरण (ब) उषा (स) प्रमोद (द) बाबूलाल
6. रेवती किसकी पत्नी है?
(अ) नन्हेमल (ब) विश्वनाथ (स) बाबूलाल (द) आगंतुक
7. नन्हेमल और बाबूलाल कहाँ से आने का दावा करते हैं?
(अ) मुरादाबाद (ब) नजीबाबाद (स) बिजनौर (द) झाँसी
8. रेवती का भाई कहाँ से तार भेजता है?
(अ) बिजनौर (ब) मुरादाबाद (स) झाँसी (द) दिल्ली
9. नन्हेमल किसे अपना चचेरा भाई बताता है?
(अ) जगदीशप्रसाद (ब) संपतराम (स) रामलाल (द) भानामल
10. नन्हेमल के अनुसार संपतराम का व्यवसाय क्या था?
(अ) वैद्य (ब) गोटे का व्यापारी (स) कविराज (द) मिल मालिक
11. अंत में स्पष्ट होता है कि नन्हेमल-बाबूलाल वास्तव में किसके यहाँ जाना चाहते थे?
(अ) जगदीशप्रसाद (ब) कविराज रामलाल वैद्य (स) संपतराम (द) पड़ोसी
12. विश्वनाथ के पड़ोसी की मुख्य शिकायत क्या थी?
(अ) शोर मचाने की (ब) छत पर पानी फैलाने की (स) पैसे न देने की (द) चोरी की
13. एकांकी के आरंभ में बच्चे को पंखा कौन कर रहा है?
(अ) रेवती (ब) विश्वनाथ (स) प्रमोद (द) किरण
14. बड़ा बच्चा कितने महीने बीमार रहा था?
(अ) एक महीना (ब) दो महीना (स) तीन महीना (द) चार महीना
15. सामने वालों की लड़की की मृत्यु किस बीमारी से हुई?
(अ) मलेरिया (ब) टाइफाइड (स) हैजा (द) निमोनिया
16. नन्हेमल ने मलमल किस भाव से खरीदी?
(अ) साढ़े नौ आने गज (ब) नौ आने गज (स) सवा रुपया गज (द) दो रुपया गज
17. बाबूलाल की धोती की कीमत क्या बताई गई?
(अ) पाँच रुपये (ब) सात रुपये (स) नौ रुपये (द) ग्यारह रुपये
18. विश्वनाथ के अनुसार वह पहले कितने वर्ष पहले बिजनौर गया था?
(अ) पाँच वर्ष (ब) दस वर्ष (स) बीस वर्ष (द) कभी नहीं गया
19. रेवती का भाई अपने आने की सूचना किस माध्यम से भेजता है?
(अ) पत्र (ब) तार (स) फोन (द) दूत के द्वारा
20. एकांकी में किसे लगातार सिरदर्द की शिकायत रहती है?
(अ) विश्वनाथ (ब) रेवती (स) प्रमोद (द) किरण
21. विश्वनाथ के अनुसार जगदीशप्रसाद का व्यवसाय क्या है?
(अ) आटे की मिल (ब) प्रेस (स) गन्ने की मिल (द) कपड़े की दुकान
22. एकांकी का समापन किस घटना से होता है?
(अ) पड़ोसी की माफी से (ब) रेवती का भाई के लिए भोजन बनाने को तैयार होना (स) नन्हेमल-बाबूलाल के लौट आने से (द) बच्चे के रोने से
23. उदयशंकर भट्ट का जन्म किस वर्ष हुआ था?
(अ) 1888 (ब) 1898 (स) 1908 (द) 1918
24. उदयशंकर भट्ट का जन्मस्थान कौन-सा है?
(अ) इटावा (ब) लखनऊ (स) बनारस (द) आगरा
25. एकांकी में कथा मुख्यतः किसके माध्यम से आगे बढ़ती है?
(अ) वर्णन (ब) कथोपकथन-रहित विवरण (स) संवाद (द) केवल मंच-निर्देश
(ब) अति लघु उत्तरीय प्रश्न
1. एकांकी का शीर्षक क्या है?
नए मेहमान।
2. एकांकी के लेखक कौन हैं?
उदयशंकर भट्ट।
3. एकांकी में गृहपति की भूमिका में कौन है?
विश्वनाथ।
4. विश्वनाथ के बच्चों के नाम बताइए।
प्रमोद और किरण।
5. एकांकी में कुल कितने मेहमान घर आते हैं?
तीन — नन्हेमल, बाबूलाल और रेवती का भाई।
6. रेवती को कौन-सी शारीरिक तकलीफ है?
गरमी के कारण पंद्रह दिनों से सिरदर्द।
7. एकांकी में समय और मौसम कैसा दिखाया गया है?
भीषण गरमी की रात, आठ बजे का समय।
8. बड़े बच्चे को स्वास्थ्य-लाभ के लिए कहाँ भेजा गया था?
शिमला।
9. पड़ोसी की शिकायत का मुख्य कारण क्या था?
छत पर गंदा पानी फैलाया जाना।
10. नन्हेमल किसे अपना चचेरा भाई बताता है?
संपतराम को।
11. अंततः पता चलता है कि नन्हेमल-बाबूलाल किसके यहाँ जाना चाहते थे?
कविराज रामलाल वैद्य के यहाँ।
12. रेवती के भाई ने तार कब और कहाँ से भेजा था?
एक दिन पहले, झाँसी से।
13. विश्वनाथ मुरादाबाद में किसके यहाँ ठहरा था?
सेठ जगदीशप्रसाद के यहाँ।
14. नन्हेमल ने मलमल किस दर पर खरीदी थी?
सवा रुपया गज।
15. बाबूलाल की उम्र क्या बताई गई है?
चौबीस वर्ष।
16. नन्हेमल की उम्र क्या बताई गई है?
पैंतीस वर्ष।
17. एकांकी में कोष्ठक में दिए गए निर्देशों को क्या कहा जाता है?
रंगमंच-निर्देश।
18. एकांकी की समाप्ति पर प्रयुक्त शब्द क्या है, जो पर्दा गिरने का संकेत देता है?
यवनिका।
19. एकांकी में विश्वनाथ किस प्रकार के मकान में रहता है?
भारत के किसी बड़े नगर में किराए के एक छोटे-से साधारण मकान में।
20. एकांकी में रेवती के भाई का नाम बताया गया है या नहीं?
नहीं, उसे पूरे एकांकी में केवल 'आगंतुक' कहा गया है।
(स) लघु उत्तरीय प्रश्न
1. एकांकी के आरंभिक दृश्य में परिवार की स्थिति कैसी दिखाई गई है?
भीषण गरमी के कारण घर के सभी सदस्य बेचैन हैं — पंखा होते हुए भी हवा नहीं मिल रही, पानी-बरफ पीकर भी प्यास नहीं बुझ रही, और रेवती पंद्रह दिनों से सिरदर्द से परेशान है।
2. विश्वनाथ और रेवती में छत पर सोने को लेकर क्या विवाद होता है?
दोनों एक-दूसरे को खुली हवा में (छत/आँगन में) सोने के लिए कहते हैं, अपनी सुविधा त्यागकर दूसरे की भलाई चाहते हैं — यह दोनों के परस्पर स्नेह को दर्शाता है।
3. नन्हेमल और बाबूलाल के व्यवहार में क्या विरोधाभास (विसंगति) दिखाई देती है?
वे अपने बारे में और अपने गंतव्य के बारे में बार-बार अलग-अलग और परस्पर-विरोधी बातें बताते हैं — कभी वैद्य, कभी कविराज बताना; कभी संपतराम तो कभी जगदीशप्रसाद का हवाला देना — जिससे उनकी असलियत छिपी रहती है।
4. पड़ोसी और विश्वनाथ के बीच झगड़े का कारण और परिणाम बताइए।
मेहमानों द्वारा पड़ोसी की छत पर पानी फैला देने से झगड़ा होता है। विश्वनाथ बार-बार क्षमा माँगकर मामला शांत करने की कोशिश करता है, पर पड़ोसी असंतुष्ट होकर चला जाता है।
5. रेवती शुरू में खाना बनाने से क्यों हिचकिचाती है?
वह गरमी और सिरदर्द से बेहाल है, और मेहमानों के बारे में कुछ भी ठीक से पता न होने के कारण उसे लगता है कि व्यर्थ ही उसे कष्ट उठाना पड़ रहा है।
6. विश्वनाथ का स्वभाव किन गुणों से युक्त दिखाया गया है?
वह विनम्र, सहनशील, कर्तव्यनिष्ठ और संकोची स्वभाव का है — अनजान मेहमानों को भी मना नहीं कर पाता और पड़ोसी की डाँट भी चुपचाप सह लेता है।
7. एकांकी में प्रमोद और किरण की भूमिका क्या दर्शाती है?
वे बिना किसी शिकायत के मेहमानों की सेवा (पानी, बरफ लाना, नल तक ले जाना) में जुट जाते हैं और छोटी बहन उषा का भी ध्यान रखते हैं — यह उनकी आज्ञाकारिता और उत्तरदायित्व-भावना दर्शाता है।
8. नन्हेमल और बाबूलाल की असलियत अंततः कैसे उजागर होती है?
विश्वनाथ के लगातार सवाल पूछने और उनके परस्पर-विरोधी जवाबों से यह साफ होता है कि वे वास्तव में कविराज रामलाल वैद्य के यहाँ जाना चाहते थे, न कि विश्वनाथ के घर।
9. आगंतुक (रेवती का भाई) के आगमन का दृश्य पिछले मेहमानों के आगमन से किस प्रकार भिन्न है?
नन्हेमल-बाबूलाल के विपरीत, आगंतुक परिवार का जाना-पहचाना सदस्य है, और रेवती उसका स्वागत तुरंत आत्मीयता व प्रसन्नता के साथ करती है, बिना किसी संदेह के।
10. एकांकी का शीर्षक 'नए मेहमान' कितना सार्थक है?
शीर्षक पूर्णतः सार्थक है क्योंकि पूरी कथा ही एक ही रात में आए तीन नए/अप्रत्याशित मेहमानों — नन्हेमल, बाबूलाल और रेवती के भाई — के इर्द-गिर्द घूमती है।
11. एकांकी में गरमी का चित्रण किन तरीकों से किया गया है?
संवादों में अतिशयोक्तिपूर्ण उपमाओं ("आग बरस रही हो", "दीवारें तप रही हैं", "चने की तरह भाड़ में भुनना") और पात्रों की शारीरिक बेचैनी (पसीना, प्यास, सिरदर्द) के माध्यम से गरमी का प्रभावी चित्रण किया गया है।
12. एकांकी में 'अतिथि देवो भव' की भावना कहाँ-कहाँ दिखाई देती है?
विश्वनाथ का अनजान मेहमानों को घर में ठहराना, रेवती का बीमार होने के बावजूद खाना बनाने को तैयार होना, और अंत में भाई के मना करने पर भी रेवती का "भैया भूखे नहीं सो सकते" कहना — ये सभी इसी भावना के उदाहरण हैं।
13. पड़ोसी का चरित्र-चित्रण संक्षेप में कीजिए।
पड़ोसी असहयोगी, चिड़चिड़े और तीखे स्वभाव का है, जो छोटी-सी भूल पर भी बार-बार शिकायत करता है और क्षमा माँगने पर भी संतुष्ट नहीं होता।
14. एकांकी में स्थान और समय की एकता (यूनिटी) कैसे बनी रहती है?
पूरी कथा एक ही रात में, विश्वनाथ के घर के एक ही कमरे/आँगन में घटित होती है, बीच में कोई काल-परिवर्तन या स्थान-परिवर्तन नहीं दिखाया गया — यही एकांकी की विशेष एकता है।
15. रेवती और विश्वनाथ के संवादों से उनके वैवाहिक संबंध की कौन-सी झलक मिलती है?
दोनों के बीच हल्की नोक-झोंक होते हुए भी गहरी चिंता और परस्पर देखभाल का भाव झलकता है — दोनों एक-दूसरे को आराम देने की कोशिश करते हैं।
16. एकांकी में हास्य कहाँ-कहाँ उत्पन्न होता है?
नन्हेमल-बाबूलाल के परस्पर-विरोधी उत्तरों में, उनके बेधड़क होकर मेजबान से सुविधाएँ माँगते जाने में, और अंत में उनकी असलियत उजागर होने के दृश्य में स्पष्ट हास्य है।
17. एकांकी विधा की परिभाषा अपने शब्दों में लिखिए।
एकांकी एक ऐसा संक्षिप्त नाटक है जिसमें केवल एक ही अंक होता है, सीमित पात्र होते हैं और किसी एक ही मुख्य घटना या भाव को संवादों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।
18. एकांकी में मध्यवर्गीय परिवार की किन समस्याओं का चित्रण हुआ है?
तंग किराए के मकान, असहयोगी पड़ोसी, नौकर का न टिकना, आर्थिक तंगी, और भीषण गरमी में बिना पर्याप्त साधनों के गुजारा करना — ये सभी समस्याएँ चित्रित हैं।
19. एकांकी के अंत की पंक्ति "भैया भूखे नहीं सो सकते" का क्या महत्त्व है?
यह पंक्ति एकांकी का सार है — व्यक्तिगत कष्ट के बावजूद पारिवारिक स्नेह और अतिथि-सत्कार का कर्तव्य सर्वोपरि रहता है।
20. एकांकी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
विषम परिस्थितियों में भी अतिथि-सत्कार, सहनशीलता और पारिवारिक कर्तव्य का पालन करना चाहिए, साथ ही अजनबियों से व्यवहार करते समय उचित सावधानी भी बरतनी चाहिए।
(द) महत्वपूर्ण प्रश्न
1. 'नए मेहमान' एकांकी के आधार पर सिद्ध कीजिए कि यह शहरी मध्यवर्गीय जीवन का यथार्थवादी चित्रण है।
एकांकी में तंग किराए के मकान, बिजली-पानी की कमी, असहयोगी पड़ोसी, नौकर का न टिकना, बीमारी का भय और आर्थिक तंगी जैसी समस्याएँ बड़ी बारीकी से चित्रित हैं। ये सभी समस्याएँ भारत के बड़े नगरों में रहने वाले मध्यवर्गीय परिवारों की वास्तविक स्थिति को प्रतिबिंबित करती हैं, जिससे एकांकी एक सजीव और यथार्थवादी सामाजिक दस्तावेज़ बन जाती है।
2. विश्वनाथ के चरित्र की विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
विश्वनाथ एक विनम्र, कर्तव्यनिष्ठ और संकोची गृहस्थ है। वह परिवार की भलाई की चिंता करता है, अनजान मेहमानों को शिष्टाचारवश मना नहीं कर पाता, पड़ोसी के अपमानजनक व्यवहार को भी सहनशीलता से झेलता है, और अंत तक शालीनता नहीं छोड़ता। उसका चरित्र भारतीय मध्यवर्गीय पुरुष के आदर्श और सीमाएँ — दोनों को उजागर करता है।
3. एकांकी में हास्य और गंभीरता का सामंजस्य किस प्रकार स्थापित किया गया है?
एक ओर गरमी, बीमारी, आर्थिक तंगी और पड़ोसी के झगड़े जैसी गंभीर स्थितियाँ हैं, तो दूसरी ओर नन्हेमल-बाबूलाल के भ्रमपूर्ण और परस्पर-विरोधी संवाद पाठक/दर्शक को हँसाते हैं। लेखक ने गंभीर पारिवारिक यथार्थ को हल्के-फुल्के हास्य के साथ इस तरह पिरोया है कि एकांकी बोझिल नहीं, बल्कि रोचक बन जाती है।
4. "अतिथि देवो भव" की भारतीय परंपरा को यह एकांकी किस प्रकार प्रतिबिंबित करती है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
बीमार और गरमी से त्रस्त होते हुए भी रेवती अजनबी मेहमानों के लिए भोजन बनाने को तैयार होती है; विश्वनाथ बिना पहचाने भी मेहमानों को घर में ठहरने देता है; अंत में रेवती अपने भाई के मना करने पर भी उसके लिए भोजन बनाने चली जाती है — ये सभी दृष्टांत भारतीय समाज में रचे-बसे 'अतिथि देवो भव' के भाव को स्पष्ट करते हैं, जहाँ व्यक्तिगत असुविधा भी अतिथि-सत्कार के कर्तव्य के आगे गौण हो जाती है।
5. नन्हेमल और बाबूलाल के माध्यम से लेखक ने किस सामाजिक/मानवीय प्रवृत्ति को उजागर किया है?
इन दोनों पात्रों के माध्यम से मनुष्य की उस प्रवृत्ति को उजागर किया गया है जहाँ भ्रम और गलतफहमी में भी व्यक्ति संकोच छोड़कर अजनबी से सुविधा माँगने में नहीं हिचकता, और साथ ही यह भी कि सामान्य जन कभी-कभी बिना जाँचे-परखे किसी अनजान स्थान/व्यक्ति के पास पहुँच जाते हैं।
6. यदि विश्वनाथ शुरू में ही नन्हेमल-बाबूलाल से उनका पूरा परिचय पूछ लेता, तो कथा में क्या परिवर्तन आ सकता था? अपने विचार लिखिए।
यदि विश्वनाथ शुरू में ही ठीक से परिचय पूछ लेता, तो शायद गलतफहमी जल्दी ही सुलझ जाती और घर में अनावश्यक भोजन-व्यवस्था, पड़ोसी से झगड़ा और रेवती का कष्ट टल जाता। परंतु इससे एकांकी का हास्य और नाटकीय तनाव भी समाप्त हो जाता — यही उलझन ही तो कथा को रोचक बनाती है।
7. एकांकी में स्त्री-पात्रों (रेवती) की भूमिका पर टिप्पणी कीजिए।
रेवती घर की सामान्य गृहिणी है, जो शारीरिक कष्ट सहते हुए भी घर-गृहस्थी और अतिथि-सत्कार का सारा भार वहन करती है। उसका चरित्र उस दौर की भारतीय स्त्री की सहनशीलता, कर्तव्यपरायणता और पारिवारिक स्नेह को उजागर करता है, यद्यपि यह भी दर्शाता है कि भोजन बनाने की जिम्मेदारी स्वाभाविक रूप से केवल स्त्री पर ही डाली जाती थी।
8. पड़ोसी के प्रसंग के माध्यम से लेखक शहरी जीवन की किस समस्या की ओर संकेत करता है?
यह प्रसंग शहरों में सीमित जगह, साझा छत/आँगन और घनी बस्तियों में रहने के कारण पड़ोसियों के बीच होने वाले रोज़मर्रा के तनाव और असहयोग की समस्या की ओर संकेत करता है, जो बड़े नगरों के मध्यवर्गीय जीवन की एक आम सच्चाई है।
9. एकांकी की भाषा-शैली की विशेषताएँ बताइए।
एकांकी की भाषा सरल, बोलचाल की और स्वाभाविक है। संवादों में मुहावरों ('दिन-रात एक करना', 'खाक में मिलना') और अतिशयोक्तिपूर्ण उपमाओं ('आग बरस रही हो') का सजीव प्रयोग हुआ है, जिससे पात्रों की भावनाएँ और परिस्थितियाँ यथार्थपूर्ण ढंग से उभरती हैं।
10. यदि आप 'नए मेहमान' एकांकी को आज के दौर (मोबाइल फोन, इंटरनेट) में पुनर्लिखें, तो कथा में क्या-क्या बदलाव आएँगे?
आज मोबाइल फोन और लोकेशन-शेयरिंग के कारण नन्हेमल-बाबूलाल तुरंत सही पता खोज सकते थे, और रेवती के भाई का तार समय पर SMS/कॉल से पहुँच जाता, जिससे भ्रम की गुंजाइश कम हो जाती। हालाँकि गरमी की समस्या और अतिथि-सत्कार का भाव आज भी उतना ही प्रासंगिक बना रहेगा।
माइंड मैप
लेखक
- उदयशंकर भट्ट (1898–1966)
- जन्मस्थान: इटावा, उ.प्र.
- नाटक व एकांकी विधा में विशेष प्रसिद्धि
पात्र
- विश्वनाथ, रेवती
- प्रमोद, किरण
- नन्हेमल, बाबूलाल
- आगंतुक (रेवती का भाई), पड़ोसी
कथा के भाग
- गरमी से त्रस्त परिवार
- नन्हेमल-बाबूलाल का आगमन
- भोजन की दुविधा
- पड़ोसी का झगड़ा
- पहचान की उलझन
- भाई का अकस्मात आगमन
मूल भाव/संदेश
- अतिथि देवो भव
- विषम परिस्थिति में भी कर्तव्य-पालन
- पारिवारिक स्नेह व सहनशीलता
विधागत विशेषताएँ
- एक ही स्थान व समय में कथा
- संवाद-प्रधान रचना
- रंगमंच-निर्देश (कोष्ठक में)
- यवनिका से समापन
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: 'नए मेहमान' एकांकी के लेखक कौन हैं और उनका जन्म कब हुआ था?
उ. उत्तर: इस एकांकी के लेखक उदयशंकर भट्ट हैं, जिनका जन्म 3 अगस्त 1898 को उत्तर प्रदेश के इटावा में हुआ था और निधन 28 फरवरी 1966 को हुआ।
प्रश्न: एकांकी की मुख्य कथा संक्षेप में क्या है?
उ. उत्तर: भीषण गरमी की एक रात, विश्वनाथ के तंग किराए के घर में अचानक दो अनजान मेहमान (नन्हेमल-बाबूलाल) आ जाते हैं, जो बाद में पता चलता है कि गलती से पहुँचे हैं। इसी बीच रेवती का भाई भी बिना सूचना के आ पहुँचता है, और परिवार हर परिस्थिति में अतिथि-सत्कार निभाता है।
प्रश्न: नन्हेमल और बाबूलाल वास्तव में किसके यहाँ जाना चाहते थे?
उ. उत्तर: वे वास्तव में पास की गली में रहने वाले कविराज रामलाल वैद्य के यहाँ जाना चाहते थे, पर पता ठीक से याद न होने के कारण गलती से विश्वनाथ के घर पहुँच गए थे।
प्रश्न: एकांकी का मुख्य संदेश क्या है?
उ. उत्तर: चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विषम क्यों न हों — आर्थिक तंगी, बीमारी या भीषण गरमी — भारतीय परिवार में 'अतिथि देवो भव' की भावना और पारिवारिक कर्तव्य कभी कम नहीं होते।
प्रश्न: एकांकी और कहानी में क्या अंतर है?
उ. उत्तर: कहानी में वर्णन प्रमुख होता है जबकि एकांकी (नाटक की एक विधा) में कथा मुख्य रूप से पात्रों के संवादों के माध्यम से आगे बढ़ती है और इसे मंच पर अभिनीत भी किया जा सकता है।
प्रश्न: एकांकी में 'तार' का उल्लेख क्यों महत्वपूर्ण है?
उ. उत्तर: यह उस दौर की झलक देता है जब तार (टेलीग्राम) संदेश भेजने का प्रमुख व शीघ्र साधन था। भारत में यह सेवा 15 जुलाई 2013 को पूरी तरह बंद कर दी गई, इसलिए यह प्रसंग आज पुराने युग की तकनीक को समझने में सहायक है।
प्रश्न: एकांकी में पड़ोसी की भूमिका क्या दर्शाती है?
उ. उत्तर: पड़ोसी का चिड़चिड़ा और असहयोगी व्यवहार शहरी घनी बस्तियों में साझा स्थान (छत, आँगन) को लेकर होने वाले आम पड़ोसी-विवादों को दर्शाता है।
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