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नहीं होना बीमार — कक्षा 7 मल्हार पाठ 5 सार, व्याख्या और प्रश्नोत्तर

नहीं होना बीमार — कहानी सार, सरल व्याख्या और प्रश्नोत्तर | कक्षा 7 मल्हार

कक्षा 7 की एनसीईआरटी हिंदी पाठ्यपुस्तक 'मल्हार' का पाँचवाँ पाठ 'नहीं होना बीमार' प्रसिद्ध कथाकार स्वयं प्रकाश की एक रोचक और मनोरंजक कहानी है, जो एक बच्चे की उस भावना पर आधारित है जो बीमार लोगों को मिलने वाली सुविधाओं और लाड़-प्यार को देखकर खुद बीमार पड़ने की इच्छा करता है। इस लेख में आपको लेखक-परिचय, मूल पाठ, सरल व्याख्या, कठिन शब्दों के अर्थ, पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर तथा अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न (MCQ सहित) — सब कुछ एक ही जगह मिलेगा।

इस लेख में: लेखक परिचय • पाठ परिचय • मूल पाठ • सरल व्याख्या • शब्द-संपदा • पाठ्यपुस्तक के अभ्यास • अतिरिक्त प्रश्न (MCQ/लघु/दीर्घ) • माइंड मैप • अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लेखक परिचय

स्वयं प्रकाश (जन्म: 20 जनवरी 1947, इंदौर, मध्य प्रदेश — निधन: दिसंबर 2019)
'नहीं होना बीमार' के लेखक स्वयं प्रकाश हिंदी के जाने-माने कथाकार थे। उनका मूल परिवार राजस्थान के अजमेर से संबंधित था। मशीनी अभियांत्रिकी (मैकेनिकल इंजीनियरिंग) में डिप्लोमा करने के बाद उन्होंने कुछ समय भारतीय नौसेना और डाक विभाग में भी कार्य किया, परंतु उनके जीवन का अधिकांश समय हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में भाषा अधिकारी (बाद में मुख्य भाषा अधिकारी) के पद पर बीता, जहाँ से वे सन् 2002 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर पूर्णतः लेखन को समर्पित हो गए। स्वयं प्रकाश की कहानियाँ बच्चों और बड़ों दोनों के दिलों को छू जाती हैं — पढ़ते हुए लगता है मानो वे हमारे ही जीवन की कहानियाँ हैं, हमारे ही अनुभव उन्होंने लिख दिए हैं। प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने मध्यमवर्गीय जीवन, सामाजिक बदलाव और आम आदमी के संघर्षों को सहज, चुटीली और बोलचाल की भाषा में चित्रित किया। उन्हें उनकी बाल-कथा 'प्यारे भाई राम सहाय' के लिए सन् 2017 का साहित्य अकादमी बाल साहित्य पुरस्कार मिला, साथ ही राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार, वनमाली सम्मान और सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार सहित कई अन्य सम्मान भी मिले।
  • जन्म-स्थान — इंदौर, मध्य प्रदेश (मूल परिवार अजमेर, राजस्थान से)
  • प्रमुख पहचान — कथाकार, बाल साहित्यकार
  • प्रमुख कहानी-संग्रह — मात्रा और भार, अगली किताब, आसमान कैसे-कैसे, सूरज कब निकलेगा
  • प्रमुख उपन्यास — ज्योति रथ के सारथी, जलते जहाज पर, बीच में विनय, ईंधन; गद्य कृति फीनिक्स
  • सम्मान — साहित्य अकादमी बाल साहित्य पुरस्कार (2017), राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार, वनमाली सम्मान

पाठ परिचय

'नहीं होना बीमार' एक हास्य-व्यंग्य से भरपूर कहानी है, जिसमें एक बच्चा अपनी नानी के साथ अस्पताल में भर्ती बीमार सुधाकर काका को देखने जाता है। वहाँ का शांत, साफ-सुथरा और आरामदायक माहौल तथा काका को मिलने वाली देखभाल देखकर बच्चे के मन में बीमार होने की इच्छा जाग उठती है। कुछ दिनों बाद, स्कूल न जाने और गृहकार्य न करने की सजा से बचने के लिए वह बीमारी का बहाना बना लेता है। परंतु दिनभर अकेले भूखे-प्यासे बिस्तर पर पड़े रहने का अनुभव उसकी सोच को पूरी तरह बदल देता है। यह कहानी बच्चों को बहाने बनाने के परिणामों के बारे में मनोरंजक ढंग से सिखाती है।

मूल पाठ

एक दिन मुझे साथ लेकर नानीजी हमारे पड़ोसी सुधाकर काका को देखने गईं, जो बीमार थे। वे अस्पताल में भर्ती थे। अस्पताल जाने का यह मेरा पहला अवसर था।

एक बड़े से वार्ड में कई एक जैसे पलंग लाइन से लगे हुए थे। सब पर एक जैसी सफेद चादर और लाल कंबल। सफेद दीवारें, ऊँची छत, खिड़कियों पर हरे परदे और फर्श एकदम चमकता हुआ। एक पलंग पर सुधाकर काका लेटे हुए थे। एकदम पास पहुँचने पर दिखाई दिया।

हमें देखकर सुधाकर काका जैसे खुश हो गए। नानीजी ने उनके सिर पर हाथ फेरा और उनके सिरहाने खड़ी हो गईं और हालचाल पूछने लगीं।

अस्पताल का माहौल मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। बड़ी-बड़ी खिड़कियों के पास हरे-हरे पेड़ झूम रहे थे। न ट्रैफिक का शोरगुल, न धूल, न मच्छर-मक्खी...। सिर्फ लोगों के धीरे-धीरे बातचीत करने की धीमी-धीमी गुनगुन। बाकी एकदम शांति।

तभी सफेद कपड़ों में एक नर्स आई। नर्स ने नानीजी को देखकर अभिवादन में सिर हिलाया और काका को दवा खिलाई। नानीजी काका के लिए साबूदाने की खीर बनाकर लाई थीं। नर्स से पूछा कि खिला दूँ क्या? नर्स के हाँ कहने पर उसके जाने के बाद नानीजी ने चम्मच से धीरे-धीरे काका को साबूदाने की खीर खिलाई। काका ने बहुत स्वाद लेकर खीर खाई।

क्या ठाठ हैं बीमारों के भी। मैंने सोचा... ठाठ से साफ-सुथरे बिस्तर पर लेटे रहो और साबूदाने की खीर खाते रहो। काश! सुधाकर काका की जगह मैं होता! मैं कब बीमार पड़ूँगा!

कुछ रोज बाद एक दिन मेरा स्कूल जाने का मन नहीं किया। मैंने होमवर्क भी नहीं किया था। स्कूल जाता तो जरूर सजा मिलती। मैंने सोचा बीमार पड़ने के लिए आज का दिन बिलकुल ठीक रहेगा। चलो बीमार पड़ जाते हैं।

मैं रजाई से निकला ही नहीं। नानीजी उठाने आईं तो मैंने कहा, "मैं आज बीमार हूँ।" "क्या हो गया?" "मेरे सिर में दर्द हो रहा है। पेट भी दुख रहा है और मुझे बुखार भी है।" नानीजी चली गईं।

मैं रजाई में पड़ा-पड़ा घर में चल रही गतिविधियों का अनुमान लगाता रहा। अब छोटे मामा नहाकर निकले। अब कुसुम मौसी रोज की तरह नाश्ता छोड़कर कॉलेज बस पकड़ने भागीं। अब मुन्नू अपना जूता ढूँढ़ रहा है। अब छोटे मामा ने साइकिल उठाई। अब सब चले गए। अब घर में मैं अकेला रह गया।

पता नहीं कब झपकी-सी आ गई। तभी नानाजी आए। "क्या हो गया? क्या हो गया?" "बुखार आ गया" मैंने कराहते हुए कहा। "देखें!" नानाजी ने रजाई हटाकर मेरा माथा छुआ। पेट देखा और नब्ज देखने लगे। इस बीच नानीजी भी आ गई। "क्या हुआ?", नानीजी ने पूछा। "बुखार तो नहीं है" नानाजी बोले। "आपको पता नहीं चल रहा। थर्मामीटर लगाकर देखिए" मैंने कहा।

मुझे पता था घर में कोई नहीं है। थर्मामीटर लगा भी लिया तो देखेगा कौन? पर खुद को बीमार साबित करने के लिए यह चाल अच्छी थी। बहुत ढूँढ़ा गया पर थर्मामीटर मिला ही नहीं। शायद कोई माँगकर ले गया था।

फिर नानाजी की आवाज आई, "ले, पुड़िया खा ले।" न चाहते हुए भी मुझे कड़वी पुड़िया खानी पड़ी और काढ़े जैसी चाय पीनी पड़ी। फिर नानाजी बोले, "आज इसे कुछ खाने को मत देना। आराम करने दो। शाम को देखेंगे।" दोनों चले गए। मैं पता नहीं कब नींद में गुड़ुप हो गया।

कुछ देर बाद जब मेरी आँख खुली मुझे बड़ी तेज इच्छा हुई कि इसी समय बाहर निकलकर दिन की रोशनी में अपनी गली की चहल-पहल देखूँ। देखा जाए कि चंद्रभाई ड्राइक्लीनर क्या कर रहे हैं? तेजराम की दुकान पर कितने ग्राहक बैठे हैं? महेश घी सेंटर ने मलाई का भगोना आँच पर चढ़ाया या नहीं और टेलीफोन के तारों पर कितनी चिड़िया बैठी हैं? लेकिन मजबूरी थी। चाहे जितनी ऊब हो, लेटे ही रहना था।

कुछ देर इधर-उधर की, स्कूल की, दोस्तों की बातें सोचता रहा... फिर लेटे-लेटे पीठ दुखने लगी तो उठकर बैठ गया। लेकिन बाहर कुछ आहट होते ही फिर से लेट गया।

नानाजी आए। बोले — "अब कैसा है सिरदर्द?" मैंने कहा, "ठीक है" फिर भी एक पुड़िया और खिला गए।

अचानक मुझे भूख-सी लगी। फल या साबूदाने की खीर मिलने की उम्मीद की तो सुबह ही हत्या हो चुकी थी। अब नानीजी से जाकर कहूँ कि भूख लग रही है तो वे क्या करेंगी? ज्यादा से ज्यादा यही कि दूध पी लो। या नानाजी से पूछने चली जाएँगी — वो कह रहा है भूख लगी है। और फिर नानाजी क्या कहेंगे? वही जो सुबह कह रहे थे — तबियत ढीली हो तो सबसे अच्छा उपाय है भूखे रहना। इससे सारे विकार निकल जाएँगे।

क्या मुसीबत है! पड़े रहो! आखिर कब तक कोई पड़ा रह सकता है? इससे तो स्कूल चला जाता तो ही ठीक रहता। सजा मिलती तो मिल जाती। कितना मजा आता जब रिसेस में ठेले पर जाकर नमक मिर्च लगे अमरूद खाते कटर-कटर।

फिर झपकी लग गई।

लेकिन भूख के कारण ठीक से नींद भी नहीं आ रही थी। और आँख जरा लगती भी तो खाने ही खाने की चीजें दिखाई देतीं। गरमागरम खस्ता कचौड़ी... माँ की बर्फी... बेसन की चिक्की... गोलगप्पे! और सबसे ऊपर साबूदाने की खीर! पता नहीं क्यों साबूदाने की खीर सिर्फ उपवास और बीमारी में ही बनाई जाती है। जैसे गुझिया सिर्फ होली-दिवाली और पंजीरी सिर्फ पूर्णिमा के दिन ही बनाई जाती है। क्यों? क्या ये चीजें जब इच्छा हो तब नहीं बनाई जा सकतीं। कोई मना करता है?

हे भगवान! यह तो अच्छी खासी बोरियत हो गई। पूरा दिन कोई कैसे लेटा रहे? और शाम को...। क्या शाम को भी नानाजी बाहर जाने देंगे? सारे बच्चे हल्ला मचाते हुए आँगन में खेल रहे होंगे और मैं बिस्तर में पड़ा झख मार रहा होऊँगा। अक्लमन्द! और बनो बीमार। और आज दिया गया होमवर्क! किससे कॉपी माँगोगे? मैं रुआँसा हो गया।

पास के कमरे में होती खटर-पटर से अंदाजा हुआ कि मुन्नू स्कूल से आ गया है। तो क्या एक बज गया? अब बरतनों की आवाज आ रही है। शायद सब लोग खाना खाने बैठ रहे हैं। मुन्नू एक बार भी मुझे देखने नहीं आया। आया भी होगा तो दबे पाँव आया होगा और मुझे सोता जान लौट गया होगा।

...वो खाना खा रहे हैं। चबाने की आवाजें आ रही हैं! देखो! उन्होंने एक बार भी आकर नहीं पूछा कि तू क्या खाएगा? पूछते तो मैं साबूदाने की खीर ही तो माँगता। कोई ताजमहल तो नहीं माँग लेता। लेकिन नहीं! भूखे रहो!! इससे सारे विकार निकल जाएँगे। विकार निकल जाएँ बस। चाहे इस चक्कर में तुम खुद शिकार हो जाओ।

... आज क्या खाना बना होगा? खुशबू तो दाल-चावल की आ रही है। अरहर की दाल में हींग-जीरे का बघार और ऊपर से बारीक कटा हरा धनिया और आधा चम्मच देसी घी। फिर उसमें उन्होंने नींबू निचोड़ा होगा। थोड़ा-सा इस बीमार को भी दे दे कोई।

...लेकिन खुशबू तो किसी और चीज की है। क्या हरी मिर्च तली गई है? उसे दाल-चावल में मसलकर खा रहे हैं। जब रहा नहीं गया तो मैं रजाई फेंककर खड़ा हो गया। दबे पाँव दरवाजे तक गया और चुपके से झाँककर देखा।

हाँ, दाल-चावल, तली हुई हरी मिर्च।

लेकिन मुन्नू आम चूस रहा था। आम! इस मौसम में! जरूर बंबई वाले चाचाजी ने भेजे होंगे। कैसे चूस रहा है। पूरी गुठली मुँह में ठूंसे। जैसे आम कभी देखे न हों। भुक्कड़ कहीं का। पूरा हाथ भी सान रहा है।

मैं जलन, गुस्से और कुढ़न में पाँव पटकता वापस बिस्तर में आ गया। उस पूरे दिन मुझे भूखे पेट ही रहना पड़ा। सारे विकार निकल गए।

इसके बाद स्कूल से छुट्टी मारने के लिए मैंने बीमारी का बहाना कभी नहीं बनाया।

— स्वयं प्रकाश

सरल व्याख्या

भाग 1 — अस्पताल की यात्रा

भावार्थ — बच्चा पहली बार नानीजी के साथ बीमार सुधाकर काका को अस्पताल में देखने जाता है। वहाँ का साफ-सुथरा, शांत और सुव्यवस्थित माहौल — सफेद चादरें, हरे परदे, नर्स की देखभाल, साबूदाने की खीर — देखकर बच्चे को लगता है कि बीमार होना भी बड़े ठाठ की बात है, और वह खुद बीमार पड़ने की इच्छा करने लगता है।

भाग 2 — बीमारी का बहाना

भावार्थ — कुछ दिनों बाद, गृहकार्य न करने और स्कूल न जाने की सजा से बचने के लिए बच्चा बीमार होने का बहाना बना लेता है। वह सिरदर्द, पेटदर्द और बुखार होने का झूठा दावा करता है ताकि स्कूल न जाना पड़े।

भाग 3 — नानाजी-नानीजी की जाँच और इलाज

भावार्थ — नानाजी माथा छूकर और नब्ज देखकर जाँच करते हैं, थर्मामीटर ढूँढ़ा जाता है पर मिलता नहीं। बच्चे को कड़वी पुड़िया और काढ़े जैसी चाय पिलाई जाती है, और आराम के नाम पर उसे कुछ भी खाने को न देने की हिदायत दी जाती है।

भाग 4 — अकेलापन, ऊब और भूख

भावार्थ — घर के सब लोग अपने-अपने काम पर चले जाते हैं और बच्चा अकेला बिस्तर पर पड़ा रहता है। धीरे-धीरे उसे भूख सताने लगती है और नींद में भी उसे तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान दिखाई देने लगते हैं। वह ऊब और बोरियत से परेशान हो उठता है और सोचने लगता है कि स्कूल जाना ही बेहतर था।

भाग 5 — सच्चाई का एहसास और सीख

भावार्थ — दोपहर को परिवार वाले बिना उससे पूछे खाना खाने बैठ जाते हैं। वह चुपके से झाँककर देखता है कि सब स्वादिष्ट दाल-चावल खा रहे हैं और मुन्नू आम खा रहा है। इससे उसे जलन और गुस्सा आता है, और उसे पूरे दिन भूखा रहना पड़ता है। इस अनुभव से सीख लेकर वह आगे कभी स्कूल से बचने के लिए बीमारी का बहाना नहीं बनाता।

शब्द-संपदा

शब्दअर्थ
वार्डअस्पताल का वह बड़ा कमरा जहाँ कई मरीज एक साथ रहते हैं
थर्मामीटरशरीर का तापमान (बुखार) नापने का यंत्र
रजाईरुई भरा दोहरा कपड़े का ओढ़ना
काढ़ाजड़ी-बूटियों को उबालकर बनाया गया कड़वा पेय
पुड़ियाकागज में लिपटी दवा की छोटी पुड़िया/पुरिया
नब्जकलाई की नाड़ी जिससे रोग की जाँच की जाती है
ठाठशान-शौकत, आराम और सुख-सुविधा
गुनगुनधीमी, अस्पष्ट आवाज
चहल-पहलरौनक, हलचल, गतिविधि
बहानाअसली कारण छिपाकर बताया गया झूठा कारण
विकारमन में उठने वाला बुरा या अनुचित भाव
भुक्कड़बहुत लालच से खाने वाला व्यक्ति
कुढ़नमन ही मन जलन और चिढ़ का भाव
दबे पाँवबिना आवाज किए, चुपके से
झूठमूठबिना किसी असली कारण के, नाटक करके
फुसफुसानाबहुत धीमी आवाज में बोलना
अंदाजाअनुमान, कयास
साबूदानासागू नामक वृक्ष के तने से बनने वाले सफेद दाने

पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर

पाठ से — मेरी समझ से

(क) सही उत्तर पर तारा (★) बनाइए — कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं
  1. बच्चे के विद्यालय न जाने का मुख्य कारण क्या था?
    • ★ उसका विद्यालय जाने का मन नहीं था।
    • ★ उसने गृहकार्य नहीं किया था।
  2. कहानी के अंत में बच्चे ने यह निर्णय क्यों लिया कि वह भविष्य में बीमारी का बहाना नहीं बनाएगा?
    • ★ इस बहाने के कारण उसे दिनभर अकेले और भूखे रहना पड़ा।
  3. "लेटे-लेटे पीठ दुखने लगी" इस बात से बच्चे के बारे में क्या पता चलता है?
    • ★ उसे बिस्तर पर लेटे रहने के कारण ऊब हो गई थी।
  4. "क्या ठाठ हैं बीमारों के भी!" बच्चे के मन में यह बात आई क्योंकि —
    • ★ बीमार व्यक्ति को अच्छे खाने का आनंद मिलता है।
    • ★ बीमार व्यक्ति को बहुत आराम करने को मिलता है।

(ख) यह एक समूह-चर्चा गतिविधि है, जिसमें विद्यार्थी अपने साथियों के साथ मिलकर चर्चा करें कि उन्होंने ऊपर दिए गए उत्तर ही क्यों चुने।

मिलकर करें मिलान

शब्दसही अर्थ
साबूदानासागू नामक वृक्ष के तने का गूदा, जो पहले आटे के रूप में होता है और फिर कूटकर दानों के रूप में सुखा लिया जाता है
वार्डकिसी विशिष्ट कार्य के लिए घेरकर बनाया हुआ स्थान
नर्सवह व्यक्ति जो रोगियों, घायलों या वृद्धों आदि की देखभाल करे
रजाईएक प्रकार का जाड़े का ओढ़ना जिसका कपड़ा दोहरा होता है और जिसमें रुई भरी होती है
थर्मामीटरशरीर का तापमान (जैसे बुखार) नापने का एक छोटा यंत्र
काढ़ाकई तरह की जड़ी-बूटियों और औषधियों को उबालकर उनके रस से बना पेय, जो सर्दी-जुकाम, खाँसी-बुखार और पाचन से जुड़ी समस्याओं में लाभदायक माना जाता है
ड्राइक्लीनररेशमी, ऊनी, मलमल जैसे नाजुक कपड़ों को पानी, साबुन और डिटर्जेंट के बिना मशीनों से साफ करने वाला व्यक्ति
ताजमहलउत्तर प्रदेश के आगरा शहर में स्थित 17वीं सदी में निर्मित एक विश्व-प्रसिद्ध स्मारक जो सफेद संगमरमर से बना है
अरहरएक दाल जिसे तुअर भी कहते हैं

पंक्तियों पर चर्चा

(क) "मैंने सोचा बीमार पड़ने के लिए आज का दिन बिलकुल ठीक रहेगा। चलो बीमार पड़ जाते हैं।" — इन पंक्तियों का क्या अर्थ है?
इससे पता चलता है कि बच्चा गृहकार्य न करने और स्कूल जाने से बचने के लिए जान-बूझकर बीमार होने का बहाना बनाने की योजना बना रहा है — यहाँ बीमारी सच्ची नहीं बल्कि सोच-समझकर बनाया गया एक बहाना है।

(ख) "देखो! उन्होंने एक बार भी आकर नहीं पूछा कि तू क्या खाएगा? पूछते तो मैं साबूदाने की खीर ही तो माँगता। कोई ताजमहल तो नहीं माँग लेता। लेकिन नहीं! भूखे रहो!! इससे सारे विकार निकल जाएँगे। विकार निकल जाएँ बस। चाहे इस चक्कर में तुम खुद शिकार हो जाओ।" — इन पंक्तियों का क्या अर्थ है?
यहाँ बच्चा व्यंग्यपूर्ण ढंग से अपनी नाराजगी और भूख को व्यक्त कर रहा है। वह खुद की स्थिति पर तंज कस रहा है कि छोटी-सी माँग (साबूदाने की खीर) भी पूरी नहीं की जा रही, जबकि बीमारी का बहाना खुद उसने ही बनाया था — यहाँ लेखक ने बच्चे के आत्म-विरोधाभास को हास्यपूर्ण ढंग से दिखाया है।

सोच-विचार के लिए

(क) अस्पताल में बच्चे को कौन-कौन सी चीजें अच्छी लगीं और क्यों?
बच्चे को अस्पताल का शांत और साफ-सुथरा माहौल, हरे-भरे पेड़, धूल-मच्छर-शोरगुल का न होना, नर्स की सेवा और सुधाकर काका को प्यार से खिलाई जा रही साबूदाने की खीर अच्छी लगी, क्योंकि ये सब उसे आराम और लाड़-प्यार से भरा जीवन लगा।

(ख) कहानी के अंत में बच्चे को महसूस हुआ कि उसे स्कूल जाना चाहिए था। क्या आपको लगता है कि उसका निर्णय सही था? क्यों?
हाँ, बच्चे का यह निर्णय सही था, क्योंकि झूठा बहाना बनाकर उसे दिनभर अकेले, भूखे और बोर होकर रहना पड़ा, जबकि स्कूल जाने पर वह दोस्तों के साथ समय बिताता और कम-से-कम सजा मिलने के बाद बात खत्म हो जाती।

(ग) जब बच्चा बीमार पड़ने का बहाना बनाकर बिस्तर पर लेटा रहा तो उसके मन में कौन-कौन से भाव आ रहे थे?
पहले उसके मन में सुविधा और आराम पाने का लालच था, फिर धीरे-धीरे ऊब, बोरियत, भूख, पछतावा, जलन और गुस्से जैसे भाव आने लगे।

(घ) कहानी में बच्चे ने सोचा था कि "ठाठ से साफ-सुथरे बिस्तर पर लेटे रहो और साबूदाने की खीर खाते रहो।" आपको क्या लगता है, असल में बीमार हो जाने और इस बच्चे की सोच में कौन-कौन सी समानताएँ और अंतर होंगे?
समानता यह है कि दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति को आराम और देखभाल मिलती है, परंतु अंतर यह है कि असली बीमारी में दर्द, कमजोरी और तकलीफ होती है, जबकि बच्चे ने केवल सुविधाओं की कल्पना की थी, तकलीफ की नहीं — इसीलिए झूठी बीमारी में उसे केवल भूख और बोरियत का सामना करना पड़ा।

(ङ) नानाजी और नानीजी ने बच्चे को बीमारी की दवा दी और उसे आराम करने को कहा। बच्चे को खाना नहीं दिया गया। क्या आपको लगता है कि उन्होंने सही किया? आपको ऐसा क्यों लगता है?
यह एक खुला प्रश्न है — विद्यार्थी अपने विचार से उत्तर दे सकते हैं। सामान्यतः बुजुर्गों की यह मान्यता होती थी कि हल्के बुखार में उपवास से लाभ होता है, इसलिए उन्होंने अच्छी नीयत से ऐसा किया; यद्यपि आजकल चिकित्सक बीमारी में उचित पोषण देने की सलाह देते हैं।

अनुमान और कल्पना से

(क) कहानी के अंत में बच्चा नानाजी और नानीजी को सब कुछ सच-सच बताने का निर्णय ले लेता तो कहानी में आगे क्या होता?
शायद शुरू में उसे डाँट पड़ती, लेकिन बाद में उसे खाना मिल जाता और सब मिलकर हँसते कि उसने कैसा नाटक किया था — इससे बच्चे को जल्दी राहत मिल जाती।

(ख) कहानी में बच्चे की नानीजी के स्थान पर आप हैं। आप सारे नाटक को समझ गए हैं लेकिन चाहते हैं कि बच्चा सारी बात आपको स्वयं बता दे। अब आप क्या करेंगे?
मैं बच्चे से प्यार से बात करती, उससे उसकी पसंदीदा चीजें खाने के बारे में पूछती और धीरे-धीरे उसे यह एहसास कराती कि सच बताने में कोई बुराई नहीं है, ताकि वह खुद अपनी बात बता दे।

(ग) कहानी में बच्चे के स्थान पर आप हैं और घर में अकेले हैं। अब आप ऊबने से बचने के लिए क्या-क्या करेंगे?
मैं कोई किताब या कहानी पढ़ता, चित्र बनाता, संगीत सुनता या कोई रचनात्मक खेल खेलता, जिससे समय अच्छे से बीत जाता और ऊब भी न होती।

(घ) कहानी के अंत में बच्चे को लगा कि उसे स्कूल जाना चाहिए था। कल्पना कीजिए, अगर वह स्कूल जाता तो उसका दिन कैसा होता? अगले दिन जब वह स्कूल गया होगा तो उसने क्या-क्या किया होगा?
स्कूल जाता तो वह दोस्तों के साथ खेलता, रिसेस में नमक-मिर्च लगे अमरूद खाता और पढ़ाई भी पूरी करता। अगले दिन स्कूल जाकर उसने शायद अध्यापक से माफी माँगी होगी और बकाया गृहकार्य पूरा करने का वादा किया होगा।

(ङ) कहानी में नानाजी और नानीजी ने बच्चे की बीमारी ठीक करने के लिए उसे दवाई दी और खाने के लिए कुछ नहीं दिया। अगर आप नानाजी या नानीजी की जगह होते तो क्या-क्या करते?
यह एक खुला प्रश्न है — विद्यार्थी अपने अनुभव और समझ के अनुसार उत्तर दे सकते हैं, जैसे हल्का और सुपाच्य भोजन देना, बार-बार तबियत पूछना आदि।

कहानी की रचना

"अस्पताल का माहौल मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। बड़ी-बड़ी खिड़कियों के पास हरे-हरे पेड़ झूम रहे थे। न ट्रैफिक का शोरगुल, न धूल, न मच्छर-मक्खी...। सिर्फ लोगों के धीरे-धीरे बातचीत करने की धीमी-धीमी गुनगुन। बाकी एकदम शांति।" इन पंक्तियों में ऐसा लग रहा है मानो हमारी आँखों के सामने अस्पताल का चित्र-सा बन गया हो। लेखन में इसे 'चित्रात्मक भाषा' कहते हैं। अनेक लेखक अपनी रचना को रोचक और सरस बनाने के लिए उपयुक्त स्थानों पर अनेक वस्तुओं, कार्यों, स्थानों आदि का विस्तार से वर्णन करते हैं। लेखक ने इस कहानी को सरस और रोचक बनाने के लिए और भी अनेक तरीकों का उपयोग किया है, जैसे 'बच्चे द्वारा कल्पना करने' का प्रयोग (जब बच्चा अकेले लेटे-लेटे घर और बाहर के लोगों के बारे में सोच रहा है)।
(क) इस पाठ की अन्य विशेषताओं की सूची बनाइए और कक्षा में साझा कीजिए — यह एक समूह-गतिविधि है। (ख) कहानी में से निम्नलिखित के लिए उदाहरण खोजकर लिखिए —
विशेष बिंदुकहानी में से उदाहरण
बच्चे द्वारा पिछली बातों को याद किया जाना"अस्पताल का माहौल मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था... क्या ठाठ हैं बीमारों के भी।" — काका को देखने अस्पताल गया अनुभव याद करना
हास्य यानी हँसी-मजाक का उपयोग किया जाना"आपको पता नहीं चल रहा। थर्मामीटर लगाकर देखिए... घर में कोई नहीं है, थर्मामीटर लगा भी लिया तो देखेगा कौन?"
बच्चे द्वारा सोचने के तरीके में बदलाव आना"इसके बाद स्कूल से छुट्टी मारने के लिए मैंने बीमारी का बहाना कभी नहीं बनाया।"
कहानी में किसी का किसी बात से अनजान होनानानाजी-नानीजी को यह पता नहीं कि बच्चा झूठमूठ बीमार बना है — वे उसे सच में बीमार समझकर काढ़ा-पुड़िया देते हैं
बच्चे द्वारा स्वयं से बातें किया जाना"क्या मुसीबत है! पड़े रहो! आखिर कब तक कोई पड़ा रह सकता है?" — बच्चा मन ही मन खुद से सवाल-जवाब कर रहा है

समस्या और समाधान

(क) बच्चे के सामने क्या समस्या थी? उसने उस समस्या का क्या समाधान निकाला?
बच्चे के सामने समस्या यह थी कि उसने गृहकार्य नहीं किया था और स्कूल जाने का मन नहीं था। उसने इसका समाधान यह निकाला कि उसने बीमार होने का बहाना बना लिया।

(ख) नानीजी-नानाजी के सामने क्या समस्या थी? उन्होंने उस समस्या का क्या समाधान निकाला?
नानीजी-नानाजी के सामने समस्या यह थी कि बच्चा बीमार बता रहा था पर थर्मामीटर नहीं मिल रहा था और बुखार का पक्का पता नहीं चल पा रहा था। उन्होंने इसका समाधान यह निकाला कि उसे कड़वी पुड़िया व काढ़ा देकर आराम करने और भूखा रहकर विकार निकालने की सलाह दी।

शब्द से जुड़े शब्द

नीचे दिए गए स्थानों में 'बीमार' से जुड़े शब्द पाठ में से चुनकर लिखिए — थर्मामीटर, रजाई, नब्ज, काढ़ा, पुड़िया, दवा, आराम, वार्ड — ये सभी शब्द कहानी में बीमारी और उसके इलाज से संबंधित प्रसंगों में आए हैं।

खोजबीन

(क) कहानी में सर्दी के मौसम की घटनाएँ बताई गई हैं, यह किस वाक्य से पता चलता है?
"मैं रजाई से निकला ही नहीं" और "नानाजी ने रजाई हटाकर मेरा माथा छुआ" — इन वाक्यों में रजाई का उल्लेख सर्दी के मौसम की ओर संकेत करता है।

(ख) बच्चे को बहाना बनाने के परिणाम का आभास कब हो गया, यह किस वाक्य से पता चलता है?
"उस पूरे दिन मुझे भूखे पेट ही रहना पड़ा। सारे विकार निकल गए।" और "इसके बाद स्कूल से छुट्टी मारने के लिए मैंने बीमारी का बहाना कभी नहीं बनाया।" — इन वाक्यों से पता चलता है।

(ग) बच्चे को खाना-पीना बहुत प्रिय है, यह किस वाक्य से पता चलता है?
"गरमागरम खस्ता कचौड़ी... माँ की बर्फी... बेसन की चिक्की... गोलगप्पे! और सबसे ऊपर साबूदाने की खीर!" — इस वाक्य से पता चलता है।

(घ) बच्चे को स्कूल जाना अच्छा लगता है, यह किस वाक्य से पता चलता है?
"इससे तो स्कूल चला जाता तो ही ठीक रहता। सजा मिलती तो मिल जाती। कितना मजा आता जब रिसेस में ठेले पर जाकर नमक मिर्च लगे अमरूद खाते कटर-कटर।" — इस वाक्य से पता चलता है।

शीर्षक

(क) आपने जो कहानी पढ़ी है, इसका नाम 'नहीं होना बीमार' है। अपने समूह में चर्चा करके लिखिए कि इस कहानी का यह नाम उपयुक्त है या नहीं। अपने उत्तर का कारण भी बताइए।
हाँ, यह शीर्षक उपयुक्त है, क्योंकि कहानी का मूल संदेश यही है कि झूठमूठ बीमार बनना (और वास्तव में बीमार होने की इच्छा करना) गलत है — बच्चे को अपने अनुभव से यही सीख मिलती है कि उसे "बीमार नहीं होना" चाहिए।

(ख) यदि आपको इस कहानी को कोई अन्य नाम देना हो तो क्या नाम देंगे? आपने यह नाम क्यों सोचा, यह भी बताइए।
यह एक रचनात्मक प्रश्न है — विद्यार्थी अपने विचार से शीर्षक सुझाएँ, जैसे 'झूठी बीमारी का सच' या 'बहाने का नतीजा', और उसका कारण भी स्पष्ट करें।

अभिनय

कहानी में से चुनकर कुछ संवाद नीचे दिए गए हैं। इन्हें अभिनय के साथ बोलकर दिखाना है। प्रत्येक समूह से बारी-बारी से छात्र-छात्राएँ कक्षा में सामने आएँगे और एक संवाद अभिनय के साथ बोलकर दिखाएँगे —
1. "बुखार आ गया" मैंने कराहते हुए कहा।
2. "आपको पता नहीं चल रहा। थर्मामीटर लगाकर देखिए।" मैंने कहा।
3. "मेरे सिर में दर्द हो रहा है। पेट भी दुख रहा है और मुझे बुखार भी है।"
4. नानाजी आए। बोले, "अब कैसा है सिरदर्द?"
5. फिर नानाजी बोले, "आज इसे कुछ खाने को मत देना। आराम करने दो। शाम को देखेंगे।"
यह एक कक्षा-गतिविधि है जिसमें विद्यार्थी संवादों को भाव व स्वर के साथ अभिनीत करते हैं।

चेहरों पर मुस्कान, मुँह में पानी

(क) इस कहानी में अनेक रोचक घटनाएँ हैं जिन्हें पढ़कर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। इस कहानी में किन बातों को पढ़कर आपके चेहरे पर भी मुस्कान आ गई थी? उन्हें रेखांकित कीजिए।
बच्चे का झूठमूठ बीमार बनना, थर्मामीटर न मिलने पर भी जिद करना, और अंत में मुन्नू के आम चूसने पर जलना — ये सभी घटनाएँ हास्यपूर्ण हैं और मुस्कान लाती हैं।

(ख) इस कहानी में किन वाक्यों को पढ़कर आपके मुँह में पानी आ गया था? उन्हें रेखांकित कीजिए।
"गरमागरम खस्ता कचौड़ी... माँ की बर्फी... बेसन की चिक्की... गोलगप्पे! और सबसे ऊपर साबूदाने की खीर!" और "अरहर की दाल में हींग-जीरे का बघार... तली हुई हरी मिर्च" — इन वाक्यों को पढ़कर मुँह में पानी आ जाता है।

लेखन के अनोखे तरीके

कहानी में ढूँढ़िए कि इन बातों को कैसे लिखा गया है —
  1. ऐसा लगा मानो हमें देखकर सुधाकर काका खुश हो गए।
    "हमें देखकर सुधाकर काका जैसे खुश हो गए।"
  2. खिड़कियाँ बहुत बड़ी थीं और उनके बाहर हरे पेड़ हवा से हिल रहे थे।
    "बड़ी-बड़ी खिड़कियों के पास हरे-हरे पेड़ झूम रहे थे।"
  3. वहाँ केवल लोगों के फुसफुसाने की आवाजें आ रही थीं।
    "सिर्फ लोगों के धीरे-धीरे बातचीत करने की धीमी-धीमी गुनगुन।"
  4. फुसफुसाने की आवाजों के सिवा वहाँ कोई आवाज नहीं थी।
    "बाकी एकदम शांति।"
  5. बीमार लोगों के बहुत मजे होते हैं।
    "क्या ठाठ हैं बीमारों के भी।"
  6. मैं झूठमूठ बीमार पड़ जाता हूँ।
    "मैंने सोचा बीमार पड़ने के लिए आज का दिन बिलकुल ठीक रहेगा। चलो बीमार पड़ जाते हैं।"

विराम चिह्न

विराम चिह्नचिह्न
पूर्ण विराम
अल्प विराम ,
प्रश्नवाचक चिह्न ?
विस्मयादिबोधक चिह्न !
उद्धरण चिह्न " "
इन विराम चिह्नों का प्रयोग वाक्यों में इस प्रकार होता है — पूर्ण विराम (।) वाक्य के अंत में; अल्प विराम (,) वाक्य में थोड़ा रुकने के लिए; प्रश्नवाचक चिह्न (?) प्रश्न पूछने वाले वाक्य के अंत में; विस्मयादिबोधक चिह्न (!) आश्चर्य, हर्ष या भाव व्यक्त करने वाले वाक्य के अंत में; और उद्धरण चिह्न (" ") किसी के कहे गए शब्दों को ज्यों का त्यों दिखाने के लिए प्रयोग होता है, जैसा कहानी में पात्रों के संवादों में देखा जा सकता है।

कैसी होगी गली

"मुझे बड़ी तेज इच्छा हुई कि इसी समय बाहर निकलकर दिन की रोशनी में अपनी गली की चहल-पहल देखूँ।" आपने कहानी में बच्चे के घर के साथ वाली गली के बारे में बहुत-सी बातें पढ़ी हैं। उन बातों और अपनी कल्पना के आधार पर उस गली का एक चित्र बनाइए — यह एक चित्रकला-गतिविधि है; विद्यार्थी चंद्रभाई ड्राइक्लीनर, तेजराम की दुकान, महेश घी सेंटर और टेलीफोन के तारों पर बैठी चिड़ियों जैसे विवरणों के आधार पर गली का चित्र बना सकते हैं।

पाठ से आगे — आपकी बात

(क) बच्चे ने अस्पताल के वातावरण का विस्तार से सुंदर वर्णन किया है। इसी प्रकार आप अपनी कक्षा का वर्णन कीजिए।
यह एक रचनात्मक प्रश्न है — विद्यार्थी अपनी कक्षा के रंग, बैठने की व्यवस्था, दीवारों पर लगे चार्ट, खिड़कियों और अपने साथियों के बारे में विस्तार से लिखें।

(ख) कहानी में बच्चे को घर में अकेले दिन भर लेटे रहना पड़ा था। क्या आप कभी कहीं अकेले रहे हैं? उस समय आपको कैसा लग रहा था? आपने क्या-क्या किया था?
यह विद्यार्थी के निजी अनुभव पर आधारित प्रश्न है — वे अपने अनुभव साझा करें कि अकेले रहते हुए उन्होंने समय कैसे बिताया।

(ग) कहानी में आम खाने वाले मुन्नू को देखकर बच्चे को ईर्ष्या हुई थी। क्या आपको कभी किसी से या किसी को आपसे ईर्ष्या हुई है? आपने तब क्या किया था ताकि यह भावना दूर हो जाए?
यह विद्यार्थी के निजी अनुभव पर आधारित प्रश्न है — वे बताएँ कि उन्होंने ईर्ष्या के भाव को कैसे दूर किया, जैसे बातचीत करके या मन को समझाकर।

(घ) कहानी में नानाजी-नानीजी बच्चे का पूरा ध्यान रखने का प्रयास करते हैं। आपके घर और विद्यालय में आपका ध्यान कौन-कौन रखते हैं? कैसे?
यह विद्यार्थी के निजी अनुभव पर आधारित प्रश्न है — वे अपने माता-पिता, दादा-दादी, अध्यापकों आदि के बारे में लिखें जो उनका ध्यान रखते हैं।

(ङ) आप अपने परिजनों और मित्रों का ध्यान कैसे रखते हैं? क्या-क्या करते हैं या क्या-क्या नहीं करते हैं ताकि उन्हें कम-से-कम परेशानी हो?
यह विद्यार्थी के निजी अनुभव पर आधारित प्रश्न है — वे बताएँ कि वे अपने परिजनों-मित्रों की छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर उन्हें परेशानी से कैसे बचाते हैं।

बहाने

(क) कहानी में बच्चे ने बीमारी का बहाना बनाया ताकि उसे स्कूल न जाना पड़े। क्या आपने भी कभी किसी कारण से बहाना बनाया है? यदि हाँ, तो उसके बारे में बताइए। उस समय आपके मन में कौन-कौन से भाव आ-जा रहे थे? आप कैसा अनुभव कर रहे थे?
यह विद्यार्थी के निजी अनुभव पर आधारित प्रश्न है — वे अपने अनुभव और उस समय के भावों (डर, बेचैनी, पछतावा आदि) के बारे में साझा करें।

(ख) आमतौर पर बनाए जाने वाले बहानों की एक सूची बनाइए।
पेट दर्द होना, सिर दर्द होना, बुखार होना, नींद न आना, थकान होना, किताब घर भूल आना आदि आमतौर पर बनाए जाने वाले बहाने हैं।

(ग) बहाने क्यों बनाने पड़ते हैं? बहाने न बनाने पड़ें, इसके लिए हम क्या-क्या कर सकते हैं?
बहाने प्रायः तब बनाने पड़ते हैं जब हम अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करते या किसी काम से बचना चाहते हैं। बहाने न बनाने पड़ें इसके लिए हमें समय पर अपना काम पूरा करना चाहिए और ईमानदारी से अपनी बात कहनी चाहिए।

अनुमान

"मैं रजाई में पड़ा-पड़ा घर में चल रही गतिविधियों का अनुमान लगाता रहा।" कहानी में बच्चे ने अनेक प्रकार के अनुमान लगाए हैं। क्या आपने भी कभी किसी अनदेखे व्यक्ति/वस्तु/पशु-पक्षी/स्थान आदि के विषय में अनुमान लगाया है? किसके बारे में? क्या? कब? विस्तार से बताइए। (संकेत के अनुसार) — यह विद्यार्थी के निजी अनुभव पर आधारित प्रश्न है, जैसे पेड़ से आने वाली आवाज सुनकर किसी पक्षी का अनुमान लगाना, या दूर रहने वाले किसी रिश्तेदार के बारे में सुनकर उसके बारे में अनुमान लगाना।

घर का सामान

"बहुत ढूँढ़ा गया पर थर्मामीटर मिला ही नहीं। शायद कोई माँगकर ले गया था।" कहानी में बच्चे के घर पर थर्मामीटर खोजने पर भी वह मिल नहीं पाता। आमतौर पर हमारे घरों में कोई न कोई ऐसी वस्तु होती है जिसे खोजने पर भी नहीं मिलती, जिसे कोई माँगकर ले जाता है या हम जिसे किसी से माँगकर लाते हैं। अपने घर को ध्यान में रखते हुए ऐसी वस्तुओं की सूची बनाइए —
जो खोजने पर भी नहीं मिलतींजो कोई माँगकर ले जाते हैंजो आप किसी से माँगकर लाते हैं
कैंची, टॉर्चछाता, थर्मामीटरचीनी, दही
पेन, स्केलकिताबें, बर्तननमक, चार्जर
चाबी, रिमोटसाइकिल पंपचीनी मिट्टी के बर्तन

(यह सूची उदाहरण मात्र है — विद्यार्थी अपने घर के अनुभव के आधार पर अपनी सूची बनाएँ।)

खान-पान और आप

(क) कहानी में सुधाकर काका को बीमार होने पर साबूदाने की खीर दी गई थी। आपके घर में किसी के बीमार होने पर उसे क्या-क्या खिलाया जाता है?
यह विद्यार्थी के निजी अनुभव पर आधारित प्रश्न है — वे बताएँ कि उनके घर में बीमार होने पर खिचड़ी, दलिया, साबूदाने की खीर, सूप आदि जैसी चीजें दी जाती हैं।

(ख) कहानी में बच्चे को बहुत-सी चीजें खाने का मन है। आपका क्या-क्या खाने का बहुत मन करता है?
यह विद्यार्थी के निजी पसंद पर आधारित प्रश्न है — वे अपनी पसंदीदा खाने की चीजों के नाम बताएँ।

(ग) कहानी में बच्चा सोचता है कि साबूदाने की खीर सिर्फ बीमारी या उपवास में क्यों मिलती है। आपके घर में ऐसा क्या-क्या है, जो केवल विशेष अवसरों या त्योहारों पर ही बनता है?
यह विद्यार्थी के निजी अनुभव पर आधारित प्रश्न है — वे बताएँ कि उनके घर में गुझिया, खीर, सेवइयाँ, पूरन पोली आदि जैसी चीजें विशेष अवसरों पर ही बनती हैं।

(घ) कहानी में बच्चा सोचता है कि अगर वह स्कूल जाता तो उसे ठेले पर नमक-मिर्च वाले अमरूद खाने को मिलते। आप अपने विद्यालय में क्या-क्या खाते-पीते हैं? विद्यालय में आपका रुचिकर भोजन क्या है?
यह विद्यार्थी के निजी अनुभव पर आधारित प्रश्न है — वे अपने टिफिन या स्कूल कैंटीन के पसंदीदा भोजन के बारे में बताएँ।

(ङ) इस कहानी में भोजन से जुड़ी बच्चे की कई रोचक बातें बताई गई हैं। आपको बचपन की भोजन से जुड़ी कोई विशेष याद है, जिसे आप अब भी याद करते हैं?
यह विद्यार्थी के निजी अनुभव पर आधारित प्रश्न है — वे अपनी किसी विशेष याद को साझा करें।

(च) कहानी में बच्चा भोजन की सुगंध से रजाई फेंककर रसोई में झाँकने लगा। क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि घर में किसी विशेष खाने की सुगंध से आप भी रसोई में जाकर तुरंत देखना चाहते हैं कि क्या पक रहा है? आपको किस-किस खाने की सुगंध सबसे अधिक पसंद है?
यह विद्यार्थी के निजी अनुभव पर आधारित प्रश्न है — वे अपनी पसंदीदा खुशबू (जैसे पूरी-सब्जी, हलवा आदि) के बारे में बताएँ।

आज की पहेली

कहानी में आपने खाने-पीने की अनेक वस्तुओं के बारे में पढ़ा है। अब हम आपके सामने खाने-पीने की वस्तुओं या व्यंजनों से जुड़ी कुछ पहेलियाँ लाए हैं। इन्हें बूझिए और उत्तर लिखिए —
पहेलीउत्तर
1. रोटी जैसा होता है ये, पर आलू से भरा-भरा। घी-तेल साथी हैं इसके, दही-चटनी से हरा-भरा।आलू पराठा
2. दाल-चावल का मेल है यह तो, भारत भर में तुम इसे पाओ। दक्षिण में ये खूब है बनता, चटनी-सांभर संग-संग खाओ। गोल-तिकोना इसका आकार, गरम-गरम तुम इसे बनाओ।डोसा
3. नाश्ते का यह बड़ा है खास, महाराष्ट्र में इसका वास। मिर्च-मसाले से भरपूर, संग बटाटा भी मशहूर।वड़ा पाव
4. बेसन से बने चौकोर या गोल, गुजरात में बड़ा है बोल। खाने में नर्म, पानी भरे, धनिया मिर्ची संग सजे।ढोकला
5. गोल-गोल पानी से भरके, चटनी सोंठ संग इसे खाओ। उत्तर-दक्षिण पूरब-पश्चिम, गली-मुहल्लों में भी पाओ। खट्टी-मीठी, तीखी हाय, खाना तो इसे हर कोई चाहे!गोलगप्पे (पानी पूरी)
6. हरे साग संग मुझको पाओ, मक्खन के संग मुझको खाओ। आटा मेरा हल्का पीला, स्वाद मेरा है बड़ा रंगीला।मक्के की रोटी
7. आग में पकती हूँ, सोंधा-सा स्वाद, साथ में खाओ चूरमा, बन जाए फिर बात। गरम दाल से मुझको प्यार, राजस्थान का मैं उपहार।बाटी
8. गोल-गोल और श्वेत रंग का, रस से भरा हुआ हूँ खूब। मीठी दुनिया का महाराजा, चाशनी मीठी डूब-डूब।रसगुल्ला

(नोट — ये पहेलियों के उत्तर दिए गए संकेतों के आधार पर हैं; कक्षा में शिक्षक के मार्गदर्शन से पुष्टि अवश्य कर लें।)

अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न

(अ) बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

  1. 'नहीं होना बीमार' कहानी के लेखक कौन हैं?
    • (क) स्वयं प्रकाश ✓
    • (ख) प्रेमचंद
    • (ग) यशपाल
    • (घ) महादेवी वर्मा
  2. बच्चा नानीजी के साथ किसे देखने अस्पताल गया था?
    • (क) मुन्नू को
    • (ख) सुधाकर काका को ✓
    • (ग) नानाजी को
    • (घ) डॉक्टर को
  3. अस्पताल के वार्ड में पलंगों पर कैसे कंबल बिछे थे?
    • (क) नीले
    • (ख) लाल ✓
    • (ग) पीले
    • (घ) हरे
  4. नानीजी सुधाकर काका के लिए क्या बनाकर लाई थीं?
    • (क) दलिया
    • (ख) हलवा
    • (ग) साबूदाने की खीर ✓
    • (घ) खिचड़ी
  5. बच्चे ने बीमार होने का बहाना क्यों बनाया?
    • (क) उसने गृहकार्य नहीं किया था ✓
    • (ख) उसे सचमुच बुखार था
    • (ग) उसे स्कूल में सजा पसंद थी
    • (घ) उसे साबूदाने की खीर पसंद नहीं थी
  6. बच्चे ने नानीजी को क्या-क्या तकलीफ बताई?
    • (क) खाँसी और जुकाम
    • (ख) सिरदर्द, पेटदर्द और बुखार ✓
    • (ग) कान दर्द
    • (घ) दाँत दर्द
  7. घर में बच्चे को जाँचने के लिए क्या नहीं मिला?
    • (क) दवाई
    • (ख) थर्मामीटर ✓
    • (ग) रजाई
    • (घ) चम्मच
  8. नानाजी ने बच्चे को क्या खिलाया?
    • (क) मिठाई
    • (ख) कड़वी पुड़िया ✓
    • (ग) साबूदाने की खीर
    • (घ) फल
  9. नानाजी के अनुसार तबियत ढीली होने पर सबसे अच्छा उपाय क्या है?
    • (क) खूब खाना खाना
    • (ख) भूखे रहना ✓
    • (ग) खूब सोना
    • (घ) खेलना
  10. बच्चे को झपकी में किन चीजों के सपने आने लगे?
    • (क) खिलौनों के
    • (ख) खाने की चीजों के ✓
    • (ग) दोस्तों के
    • (घ) स्कूल के
  11. दोपहर में मुन्नू क्या खा रहा था?
    • (क) केला
    • (ख) आम ✓
    • (ग) सेब
    • (घ) अंगूर
  12. आम किसने भेजे थे, ऐसा बच्चे ने अनुमान लगाया?
    • (क) मौसीजी ने
    • (ख) बंबई वाले चाचाजी ने ✓
    • (ग) मामाजी ने
    • (घ) पड़ोसियों ने
  13. परिवार वालों के भोजन में दाल-चावल के साथ क्या तला गया था?
    • (क) पापड़
    • (ख) हरी मिर्च ✓
    • (ग) बैंगन
    • (घ) आलू
  14. बच्चे ने दरवाजे तक जाकर कैसे झाँककर देखा?
    • (क) जोर से चिल्लाकर
    • (ख) दबे पाँव, चुपके से ✓
    • (ग) दौड़कर
    • (घ) कूदकर
  15. कहानी के अंत में बच्चे ने क्या निर्णय लिया?
    • (क) वह रोज बीमार बनेगा
    • (ख) वह कभी बीमारी का बहाना नहीं बनाएगा ✓
    • (ग) वह स्कूल नहीं जाएगा
    • (घ) वह डॉक्टर बनेगा
  16. स्वयं प्रकाश का जन्म कब हुआ था?
    • (क) 20 जनवरी 1940
    • (ख) 20 जनवरी 1947 ✓
    • (ग) 20 फरवरी 1950
    • (घ) 20 मार्च 1945
  17. स्वयं प्रकाश का अधिकांश कार्यकाल किस संस्था में बीता?
    • (क) रेलवे
    • (ख) हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड ✓
    • (ग) डाक विभाग
    • (घ) विश्वविद्यालय
  18. स्वयं प्रकाश को 2017 में कौन-सा पुरस्कार मिला?
    • (क) ज्ञानपीठ पुरस्कार
    • (ख) साहित्य अकादमी बाल साहित्य पुरस्कार ✓
    • (ग) पद्मश्री
    • (घ) भारत रत्न
  19. बच्चे ने अनुमान लगाया कि कौन नहाकर निकले?
    • (क) छोटे मामा ✓
    • (ख) नानाजी
    • (ग) मुन्नू
    • (घ) नानीजी
  20. कुसुम मौसी नाश्ता छोड़कर कहाँ जाने के लिए भागीं?
    • (क) बाजार
    • (ख) कॉलेज बस पकड़ने ✓
    • (ग) मंदिर
    • (घ) पड़ोस
  21. बच्चे को किस चीज की सबसे ज्यादा याद आ रही थी?
    • (क) खिलौनों की
    • (ख) साबूदाने की खीर की ✓
    • (ग) किताबों की
    • (घ) दोस्तों की
  22. बच्चे के अनुसार साबूदाने की खीर की तरह गुझिया कब बनाई जाती है?
    • (क) रोज
    • (ख) होली-दिवाली पर ✓
    • (ग) रविवार को
    • (घ) जन्मदिन पर
  23. पंजीरी पाठ के अनुसार किस दिन बनाई जाती है?
    • (क) अमावस्या
    • (ख) पूर्णिमा ✓
    • (ग) एकादशी
    • (घ) रविवार
  24. कहानी के अनुसार बच्चे के मन में मुन्नू के प्रति कौन-सा भाव जागा?
    • (क) प्रेम
    • (ख) जलन और गुस्सा ✓
    • (ग) करुणा
    • (घ) उदासीनता
  25. कहानी 'नहीं होना बीमार' मुख्यतः किस भाव-शैली में लिखी गई है?
    • (क) करुण
    • (ख) हास्य-व्यंग्य ✓
    • (ग) वीर
    • (घ) भयानक

(ब) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. 'नहीं होना बीमार' कहानी के लेखक कौन हैं?
    स्वयं प्रकाश।
  2. बच्चा नानीजी के साथ किसे देखने अस्पताल गया था?
    सुधाकर काका को।
  3. नानीजी काका के लिए क्या बनाकर लाई थीं?
    साबूदाने की खीर।
  4. बच्चे ने नानीजी को कौन-सी तीन तकलीफें बताईं?
    सिरदर्द, पेटदर्द और बुखार।
  5. घर में जाँच के लिए क्या नहीं मिला?
    थर्मामीटर।
  6. नानाजी ने बच्चे को क्या पिलाया?
    काढ़े जैसी चाय।
  7. तबियत ढीली होने पर नानाजी क्या उपाय बताते हैं?
    भूखे रहना।
  8. दोपहर को मुन्नू क्या खा रहा था?
    आम।
  9. आम किसने भेजे थे, ऐसा बच्चे ने सोचा?
    बंबई वाले चाचाजी ने।
  10. परिवार वाले दोपहर को क्या खा रहे थे?
    दाल-चावल और तली हुई हरी मिर्च।
  11. बच्चे को दरवाजे तक कैसे जाना पड़ा?
    दबे पाँव, चुपके से।
  12. कहानी के अंत में बच्चे ने क्या निर्णय लिया?
    वह कभी बीमारी का बहाना नहीं बनाएगा।
  13. स्वयं प्रकाश का जन्म कब और कहाँ हुआ?
    20 जनवरी 1947 को इंदौर में।
  14. स्वयं प्रकाश का अधिकांश कार्यकाल किस संस्था में बीता?
    हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में।
  15. स्वयं प्रकाश को 2017 में कौन-सा पुरस्कार मिला?
    साहित्य अकादमी बाल साहित्य पुरस्कार।
  16. बच्चे ने बीमार होने का बहाना क्यों बनाया?
    क्योंकि उसने गृहकार्य नहीं किया था और स्कूल नहीं जाना चाहता था।
  17. बच्चे के अनुसार साबूदाने की खीर सिर्फ कब बनाई जाती है?
    उपवास और बीमारी में।
  18. अस्पताल के वार्ड में खिड़कियों पर कैसे परदे थे?
    हरे परदे।
  19. बच्चे को झपकी में किन चीजों के सपने आते हैं?
    कचौड़ी, बर्फी, चिक्की, गोलगप्पे और साबूदाने की खीर के।
  20. कहानी की भाव-शैली कैसी है?
    हास्य-व्यंग्यपूर्ण।

(स) लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. अस्पताल के वार्ड का वर्णन संक्षेप में कीजिए।
    वार्ड में कई एक जैसे पलंग लाइन से लगे थे, सब पर एक जैसी सफेद चादरें और लाल कंबल, सफेद दीवारें, ऊँची छत, खिड़कियों पर हरे परदे और चमकता हुआ फर्श था — पूरा माहौल एकदम साफ-सुथरा और शांत था।
  2. बच्चे को अस्पताल का माहौल इतना अच्छा क्यों लगा?
    वहाँ न ट्रैफिक का शोरगुल था, न धूल थी, न मच्छर-मक्खी — केवल लोगों की धीमी-धीमी बातचीत की गुनगुन थी, जो बच्चे को बहुत शांत और सुखद लगी।
  3. बच्चे ने बीमार पड़ने की योजना क्यों बनाई?
    उसने गृहकार्य नहीं किया था और स्कूल जाने का मन नहीं था। स्कूल जाने पर सजा मिलने का डर था, इसलिए उसने बीमार पड़ने की योजना बनाई।
  4. थर्मामीटर न मिलने पर क्या हुआ?
    बहुत ढूँढ़ने पर भी थर्मामीटर नहीं मिला, शायद कोई माँगकर ले गया था। इससे बच्चे के "बीमार होने" को साबित करने की चाल सफल हो गई, क्योंकि जाँच नहीं हो सकी।
  5. नानाजी-नानीजी ने बच्चे का इलाज कैसे किया?
    नानाजी ने माथा छूकर, पेट देखकर और नब्ज देखकर जाँच की; बच्चे को कड़वी पुड़िया और काढ़े जैसी चाय दी गई तथा आराम करने और कुछ न खाने की हिदायत दी गई।
  6. घर में अकेले रह जाने पर बच्चे ने क्या-क्या अनुमान लगाए?
    उसने अनुमान लगाया कि छोटे मामा नहाकर निकले, कुसुम मौसी नाश्ता छोड़कर कॉलेज बस पकड़ने भागीं, मुन्नू जूता ढूँढ़ रहा है और छोटे मामा साइकिल लेकर निकल गए।
  7. बच्चे को झपकी में क्या-क्या खाने की चीजें दिखाई दीं?
    उसे गरमागरम खस्ता कचौड़ी, माँ की बर्फी, बेसन की चिक्की, गोलगप्पे और सबसे ऊपर साबूदाने की खीर दिखाई दी।
  8. बच्चे ने साबूदाने की खीर, गुझिया और पंजीरी के बारे में क्या सोचा?
    उसने सोचा कि साबूदाने की खीर सिर्फ उपवास-बीमारी में, गुझिया सिर्फ होली-दिवाली पर और पंजीरी सिर्फ पूर्णिमा के दिन ही क्यों बनाई जाती है, जबकि इन्हें कभी भी बनाया जा सकता है।
  9. बच्चे ने दरवाजे से झाँककर क्या देखा?
    उसने देखा कि परिवार वाले दाल-चावल और तली हुई हरी मिर्च खा रहे थे, और मुन्नू आम की गुठली मुँह में ठूँसकर बड़े चाव से खा रहा था।
  10. मुन्नू को आम खाते देखकर बच्चे को कैसा लगा?
    उसे जलन, गुस्सा और कुढ़न हुई, और वह पाँव पटकता हुआ वापस बिस्तर पर चला गया।
  11. कहानी का अंत क्या सीख देता है?
    कहानी सिखाती है कि झूठा बहाना बनाने से अंततः खुद को ही तकलीफ उठानी पड़ती है, इसलिए बहाने बनाने के बजाय अपनी जिम्मेदारियाँ ईमानदारी से निभानी चाहिए।
  12. बच्चे को दिनभर लेटे रहने में क्या-क्या परेशानियाँ हुईं?
    उसे ऊब, बोरियत, पीठ दर्द, भूख और अकेलापन महसूस हुआ तथा गली की चहल-पहल और दोस्तों के साथ खेलने की भी याद सताने लगी।
  13. लेखक ने कहानी को रोचक बनाने के लिए किस भाषा-शैली का प्रयोग किया है?
    लेखक ने चित्रात्मक भाषा का प्रयोग किया है, जिसमें दृश्यों, वस्तुओं और भावों का ऐसा विस्तृत वर्णन किया गया है कि पाठक की आँखों के सामने चित्र-सा बन जाता है।
  14. कहानी में हास्य कहाँ-कहाँ देखने को मिलता है?
    बच्चे का झूठमूठ बीमार बनना, थर्मामीटर न मिलने पर भी जिद करना, और खुद के बनाए बहाने में खुद ही फँस जाना — इन प्रसंगों में हास्य देखने को मिलता है।
  15. स्वयं प्रकाश की लेखन-शैली की विशेषता बताइए।
    स्वयं प्रकाश की लेखन-शैली सहज, बोलचाल की भाषा में, चुटीली और मध्यमवर्गीय जीवन के अनुभवों से जुड़ी हुई है, जो प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाती है।
  16. कहानी में 'विकार' शब्द का क्या अर्थ है और यह किस संदर्भ में प्रयोग हुआ है?
    'विकार' का अर्थ है मन में उठने वाला बुरा या अनुचित भाव। नानाजी के अनुसार भूखे रहने से शरीर के सारे विकार निकल जाते हैं, इसी संदर्भ में यह शब्द प्रयोग हुआ है।
  17. बच्चे ने स्कूल जाने के फायदे किस प्रसंग में सोचे?
    जब वह बोरियत और भूख से परेशान हो गया, तब उसने सोचा कि स्कूल चला जाता तो अच्छा रहता, क्योंकि वहाँ दोस्तों के साथ खेलने और रिसेस में नमक-मिर्च वाले अमरूद खाने का मजा आता।
  18. कहानी में 'चित्रात्मक भाषा' का एक उदाहरण दीजिए।
    "बड़ी-बड़ी खिड़कियों के पास हरे-हरे पेड़ झूम रहे थे" — यह वाक्य चित्रात्मक भाषा का उदाहरण है, क्योंकि इसे पढ़ते ही दृश्य आँखों के सामने आ जाता है।
  19. बच्चे को घर में अकेले रहते हुए किन-किन बातों की याद सताई?
    उसे स्कूल, दोस्तों, गली की चहल-पहल, चंद्रभाई ड्राइक्लीनर, तेजराम की दुकान और टेलीफोन के तारों पर बैठी चिड़ियों की याद सताई।
  20. कहानी से हमें क्या नैतिक शिक्षा मिलती है?
    हमें यह शिक्षा मिलती है कि अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए झूठे बहाने बनाना उचित नहीं है, क्योंकि इसका परिणाम अंततः स्वयं को ही भुगतना पड़ता है।

(द) महत्वपूर्ण प्रश्न

  1. 'नहीं होना बीमार' कहानी का सार अपने शब्दों में लिखिए।
    एक बच्चा नानीजी के साथ बीमार सुधाकर काका को अस्पताल में देखने जाता है और वहाँ के आरामदायक व शांत माहौल तथा काका को मिल रही सेवा-सुविधा को देखकर स्वयं भी बीमार होने की इच्छा करने लगता है। कुछ दिनों बाद, गृहकार्य न करने के कारण स्कूल न जाने के लिए वह बीमारी का बहाना बना लेता है। नानाजी-नानीजी उसकी जाँच करते हैं और उसे आराम व भूखे रहने की सलाह देकर कड़वी दवा पिलाते हैं। दिनभर अकेले, भूखे और बोर रहकर तथा परिवार वालों को स्वादिष्ट भोजन खाते देखकर उसे बहुत पछतावा होता है। इस अनुभव से सीख लेकर वह आगे कभी बीमारी का बहाना नहीं बनाता।
  2. बच्चे के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।
    बच्चा जिज्ञासु, कल्पनाशील और चतुर है, परंतु साथ ही वह जिम्मेदारी से बचने के लिए झूठ का सहारा भी लेता है। कहानी के अंत में उसमें आत्म-चिंतन और सुधार की भावना भी देखने को मिलती है, जो उसे एक सच्चरित्र बालक बनाती है।
  3. कहानी में हास्य-व्यंग्य किस प्रकार उभरकर आया है, उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
    बच्चे का झूठमूठ बीमार बनकर जिद करना, थर्मामीटर न मिलने पर भी अपनी बीमारी साबित करने की कोशिश करना, और अंत में खुद अपने ही बनाए जाल में फँसकर भूखा रहना — ये सभी प्रसंग पाठक को हँसाते हुए भी एक गहरी सीख देते हैं, जो हास्य-व्यंग्य शैली का सुंदर उदाहरण है।
  4. कहानी में प्रयुक्त चित्रात्मक भाषा-शैली पाठक पर क्या प्रभाव डालती है?
    चित्रात्मक भाषा-शैली पाठक की आँखों के सामने दृश्य को जीवंत कर देती है, जिससे पाठक कहानी के साथ गहराई से जुड़ जाता है — जैसे अस्पताल के शांत वातावरण या खाने की सुगंध का वर्णन पढ़ते ही पाठक स्वयं उस दृश्य में मौजूद महसूस करता है।
  5. बच्चे के मन में बीमार होने की इच्छा जागने और फिर उससे पछतावा होने के बीच के मानसिक बदलाव का वर्णन कीजिए।
    शुरू में बच्चे को बीमारी सुविधा और आराम का प्रतीक लगती है, इसलिए वह जान-बूझकर बीमार बनने का बहाना करता है। परंतु जैसे-जैसे दिन बीतता है, अकेलापन, भूख और बोरियत उसे यह एहसास कराते हैं कि झूठी बीमारी में केवल तकलीफ है, सुविधा नहीं — इस प्रकार उसकी सोच में पूर्ण परिवर्तन आता है और वह पछतावे के साथ सही निर्णय लेता है।
  6. यदि बच्चा नानाजी-नानीजी को सच बता देता तो कहानी में क्या परिवर्तन आ सकता था? अपने विचार लिखिए।
    यदि बच्चा सच बता देता, तो शायद उसे हल्की डाँट पड़ती, परंतु साथ ही परिवार में विश्वास और खुलेपन का माहौल बनता। उसे भूखा भी न रहना पड़ता और वह गलती स्वीकार कर तुरंत सुधार की दिशा में बढ़ पाता — यह कहानी को एक सकारात्मक और शीघ्र समाधान वाला मोड़ दे सकता था।
  7. कहानी के शीर्षक 'नहीं होना बीमार' की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
    यह शीर्षक कहानी के केंद्रीय संदेश को सटीक रूप से व्यक्त करता है — बच्चे को अपने अनुभव से यही सीख मिलती है कि झूठमूठ बीमार बनना या बीमार होने की कामना करना गलत है, इसलिए 'नहीं होना बीमार' शीर्षक पूर्णतः सार्थक और उपयुक्त है।
  8. स्वयं प्रकाश के जीवन और साहित्यिक योगदान का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
    स्वयं प्रकाश (1947-2019) का जन्म इंदौर में हुआ था। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा के बाद उन्होंने अधिकांश समय हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में भाषा अधिकारी के रूप में बिताया। उन्होंने मात्रा और भार, अगली किताब जैसे कहानी-संग्रह तथा ज्योति रथ के सारथी जैसे उपन्यास लिखे। उन्हें 2017 में साहित्य अकादमी बाल साहित्य पुरस्कार सहित कई सम्मान मिले। वे प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा के महत्वपूर्ण कथाकार माने जाते हैं।
  9. कहानी में परिवार के सदस्यों (नानाजी, नानीजी, मुन्नू आदि) की भूमिका पर टिप्पणी कीजिए।
    नानाजी-नानीजी बच्चे की देखभाल करने वाले स्नेही अभिभावक के रूप में दिखाए गए हैं, जो उसकी बीमारी पर विश्वास करके उसकी सेवा करते हैं। मुन्नू एक सामान्य बच्चे की तरह अनजाने में ही बच्चे की ईर्ष्या का कारण बनता है, जिससे कहानी में स्वाभाविकता और हास्य दोनों उत्पन्न होते हैं।
  10. इस कहानी से विद्यार्थियों को कौन-सी जीवन-शिक्षा मिलती है, विस्तार से लिखिए।
    इस कहानी से विद्यार्थियों को यह शिक्षा मिलती है कि जिम्मेदारियों से बचने के लिए झूठ या बहाने का सहारा लेना अंततः स्वयं के लिए ही हानिकारक सिद्ध होता है। इसके बजाय ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए तथा गलतियों को स्वीकार कर सुधार करने का साहस रखना चाहिए।

माइंड मैप

नहीं होना बीमार
लेखक परिचय
  • स्वयं प्रकाश (1947-2019)
  • हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड
  • साहित्य अकादमी बाल साहित्य पुरस्कार 2017
अस्पताल-प्रसंग
  • सुधाकर काका बीमार
  • साफ-सुथरा शांत माहौल
  • साबूदाने की खीर
बहाना
  • गृहकार्य न करना
  • झूठा सिरदर्द-बुखार
  • थर्मामीटर न मिलना
इलाज व अकेलापन
  • कड़वी पुड़िया-काढ़ा
  • भूखे रहने की सलाह
  • दिनभर अकेलापन-ऊब
सीख
  • मुन्नू का आम खाना
  • जलन और पछतावा
  • फिर कभी बहाना न बनाना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

'नहीं होना बीमार' किस कक्षा और पाठ्यपुस्तक का पाठ है?यह कक्षा 7 की एनसीईआरटी हिंदी पाठ्यपुस्तक 'मल्हार' का पाँचवाँ पाठ है।
'नहीं होना बीमार' के लेखक कौन हैं?इस कहानी के लेखक स्वयं प्रकाश हैं।
कहानी का केंद्रीय संदेश क्या है?कहानी सिखाती है कि जिम्मेदारियों से बचने के लिए झूठा बहाना बनाना अंततः स्वयं के लिए ही हानिकारक होता है, इसलिए ईमानदारी से अपने कर्तव्य निभाने चाहिए।
बच्चे को बीमार होने की इच्छा क्यों हुई?अस्पताल में सुधाकर काका को मिल रही आरामदायक सुविधाओं, शांत माहौल और साबूदाने की खीर जैसी विशेष देखभाल देखकर बच्चे को लगा कि बीमार होना भी एक सुखद अनुभव है।
कहानी में हास्य कहाँ देखने को मिलता है?बच्चे का झूठमूठ बीमार बनना, थर्मामीटर न मिलने पर भी जिद करना और अंत में खुद अपने ही बहाने के जाल में फँसकर भूखा रहना — इन प्रसंगों में हास्य देखने को मिलता है।
परीक्षा की दृष्टि से इस पाठ के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु कौन-से हैं?लेखक परिचय (स्वयं प्रकाश), कहानी का सार, बच्चे द्वारा बीमारी का बहाना बनाना और उसके परिणाम, तथा कहानी से मिलने वाली नैतिक शिक्षा — ये परीक्षा की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण बिंदु हैं।

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