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गीता सुगीता कर्तव्या – सरल अर्थ, व्याख्या और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 संस्कृत दीपकम्

गीता सुगीता कर्तव्या — सरल अर्थ, व्याख्या और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 संस्कृत (दीपकम्)

कक्षा 8 की एनसीईआरटी संस्कृत पाठ्यपुस्तक 'दीपकम्' का पञ्चम पाठ 'गीता सुगीता कर्तव्या' श्रीमद्भगवद्गीता के महत्व एवं उसके आठ प्रसिद्ध श्लोकों (स्थितप्रज्ञ-लक्षण, ज्ञान-प्राप्ति के उपाय, प्रिय भक्त के लक्षण आदि) पर आधारित है। इस लेख में आपको गीता-परिचय, पाठ परिचय, मूल संवाद व सभी आठ श्लोक, पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ सहित सरल व्याख्या, शब्द-संपदा, व्याकरण विशेष, पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर तथा 75 अतिरिक्त प्रश्न (MCQ सहित) — सब कुछ एक ही जगह मिलेगा।

इस लेख में: गीता-परिचय • पाठ परिचय • मूल पाठ (संवाद व श्लोक) • सरल व्याख्या • शब्द-संपदा • व्याकरण विशेष • पाठ्यपुस्तक के अभ्यास • अतिरिक्त प्रश्न (MCQ/लघु/दीर्घ) • माइंड मैप • अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रीमद्भगवद्गीता — ग्रन्थ-परिचय

गी

श्रीमद्भगवद्गीता

महाभारत के भीष्मपर्व का अंश — रचयिता (संकलनकर्ता): महर्षि वेदव्यास

भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में अर्जुन को जीवन-मूल्यों से सम्बद्ध जो उपदेश दिए गए, उनका संकलनात्मक ग्रन्थ ही श्रीमद्भगवद्गीता कहलाता है। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के भीष्मपर्व में श्रीमद्भगवद्गीता का वर्णन किया है। गीता में अठारह अध्याय तथा कुल सात सौ (700) श्लोक हैं। यह ग्रन्थ 'गीतोपनिषद्' के नाम से भी प्रसिद्ध है, क्योंकि इसमें उपनिषदों के समान ही आत्मा-परमात्मा, कर्म, ज्ञान व भक्ति संबंधी गूढ़ दर्शन सरल रूप में प्रस्तुत किया गया है।

  • स्रोत महाभारत, भीष्मपर्व
  • वक्ता भगवान् श्रीकृष्ण
  • श्रोता अर्जुन
  • संकलनकर्ता महर्षि वेदव्यास
  • अध्याय व श्लोक 18 अध्याय, 700 श्लोक
  • पाठ्यपुस्तक दीपकम् (कक्षा 8 एनसीईआरटी संस्कृत)
  • इस पाठ के श्लोक मुख्यतः द्वितीय अध्याय (साङ्ख्ययोगः) से — स्थितप्रज्ञ-लक्षण-विषयक

पाठ परिचय

'गीता सुगीता कर्तव्या' पाठ एक रोचक संवाद से आरम्भ होता है — कुरुक्षेत्र में श्रीगीता-जयन्ती महोत्सव के अवसर पर रमेश अपने परिवार के साथ जाता है। वहाँ कथावाचक गीता के विषय में बताते हुए श्लोक सुनाते हैं — "गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥" यह सुनकर रमेश अपने पिता से पूछता है कि गीता क्या है और उसे 'सुगीता' कैसे बनाया जाए। पिता महाभारत-युद्ध की पृष्ठभूमि बताते हुए स्पष्ट करते हैं कि युद्धपराङ्मुख हुए अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण ने कर्तव्यपालन का जो उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता है। तत्पश्चात् पाठ में गीता के आठ प्रसिद्ध श्लोक संकलित हैं, जो स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण, क्रोध से होने वाले पतन का क्रम, तत्त्वज्ञान प्राप्ति के उपाय (प्रणिपात, परिप्रश्न, सेवा), श्रद्धावान् की महिमा, भगवान् के प्रिय भक्त के गुण तथा वाणी-सम्बन्धी तप का वर्णन करते हैं। पाठ के अन्त में आधारार्थ सप्तमी विभक्ति व कारणार्थ पञ्चमी विभक्ति के प्रयोग का व्याकरण-अध्ययन भी कराया गया है।

मूल पाठ

(क) संवाद-भागः

कुरुक्षेत्रे श्रीगीता-जयन्ती-महोत्सवः आचरितः। तत्र बहवः जनाः अगच्छन्। रमेशः अपि स्वजनकेन सह तत्र गतवान्। कथावाचकः गीतायाः विषये वर्णयति स्म —

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥

इदं श्रुत्वा रमेशः पितरम् अपृच्छत् — "पितः! गीता का? कथं सुगीता कर्तव्या?"

पिता — पुत्र! बहुभ्यः वर्षेभ्यः पूर्वं कुरुक्षेत्रे कौरवाणां पाण्डवानां च मध्ये सङ्ग्रामः अभवत्। तस्मिन् युद्धे स्वबान्धवान् दृष्ट्वा अर्जुनः युद्धं कर्तुं न इच्छति स्म। तदा भगवान् श्रीकृष्णः युद्धपराङ्मुखम् अर्जुनं कर्तव्यपालनार्थम् उपदिष्टवान्। श्रीकृष्णस्य उपदेशः एव श्रीमद्भगवद्गीता अस्ति। गीतायाम् अमृततुल्याः उपदेशाः सन्ति।

रमेशः — तर्हि सुगीता कर्तव्या इत्यस्य कः आशयः?

पिता — अस्य आशयः अस्ति यत् गीतायाः अभ्यासः सम्यक् रूपेण करणीयः। गीता उत्तमभावेन पठितव्या। कार्यक्षेत्रे जीवनक्षेत्रे च गीतायाः उपदेशाः अनुपालनीयाः। अस्मिन् पाठे वयं श्रीमद्भगवद्गीतायाः काञ्चन श्लोकान् पठामः। वयं श्लोकान् मिलित्वा गायामः अपि।

(ख) मूल श्लोकाः

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥ १॥
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥ २॥
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ ३॥
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥ ४॥
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ ५॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ ६॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥ ७॥
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ ८॥

— श्रीमद्भगवद्गीता (द्वितीय व सप्तदश अध्यायौ)

सरल व्याख्या

संवाद-भाग का हिंदी भावार्थ

कुरुक्षेत्र में श्रीगीता-जयंती महोत्सव के अवसर पर रमेश अपने परिवार के साथ जाता है, जहाँ कथावाचक गीता की महिमा बताते हुए कहते हैं कि गीता को भली-भाँति पढ़ना व समझना चाहिए, अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या लाभ, क्योंकि यह स्वयं भगवान् विष्णु (पद्मनाभ) के मुखकमल से निकली हुई वाणी है। यह सुनकर रमेश पिता से पूछता है कि गीता क्या है। पिता महाभारत-युद्ध का प्रसंग सुनाते हैं — जब अर्जुन अपने ही बान्धवों को युद्धभूमि में देखकर युद्ध करने से विमुख हो गया, तब भगवान् श्रीकृष्ण ने उसे कर्तव्य-पालन का जो उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता है। 'सुगीता कर्तव्या' का अर्थ है कि गीता का भली-भाँति अभ्यास किया जाए और उसके उपदेशों को जीवन में उतारा जाए।

श्लोक 1

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥ १॥

पदच्छेदः — दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः वीत-राग-भय-क्रोधः स्थितधीः मुनिः उच्यते।

अन्वयः — यः दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः, सुखेषु विगतस्पृहः, वीतरागभयक्रोधः (च अस्ति, सः) स्थितधीः मुनिः उच्यते।

भावार्थ — जो मनुष्य दुःखों में उद्विग्न (व्याकुल) नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जिसकी लालसा समाप्त हो चुकी है, तथा जो राग (आसक्ति), भय और क्रोध से मुक्त हो चुका है, ऐसा स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति ही 'मुनि' (स्थितप्रज्ञ) कहलाता है।

श्लोक 2

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥ २॥

पदच्छेदः — क्रोधात् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।

अन्वयः — क्रोधात् सम्मोहः भवति। सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः (भवति)। स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः (भवति)। बुद्धिनाशात् (जनः) प्रणश्यति।

भावार्थ — मनुष्य में जब क्रोध उत्पन्न होता है, तब उससे मोह (विवेक-भ्रम) उत्पन्न होता है। मोह से स्मृति (स्मरणशक्ति) नष्ट हो जाती है। स्मृतिनाश से बुद्धि नष्ट हो जाती है, और बुद्धि के नष्ट होने पर मनुष्य का पूर्ण पतन (विनाश) हो जाता है। इसलिए क्रोध पर नियंत्रण रखना अत्यावश्यक है।

श्लोक 3

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ ३॥

पदच्छेदः — तत् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम् ज्ञानिनः तत्त्वदर्शिनः।

अन्वयः — तद् प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया विद्धि। ते तत्त्वदर्शिनः ज्ञानिनः ते ज्ञानम् उपदेक्ष्यन्ति।

भावार्थ — भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं — हे अर्जुन! तू गुरु के समीप जाकर, विनम्रतापूर्वक प्रणाम करके (प्रणिपातेन), जिज्ञासापूर्वक प्रश्न पूछकर (परिप्रश्नेन) तथा गुरु की सेवा करके (सेवया) उस तत्त्वज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास कर। जो सत्य को जान चुके हैं, ऐसे तत्त्वदर्शी ज्ञानी गुरुजन ही तुझे वह ज्ञान प्रदान करेंगे।

श्लोक 4

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥ ४॥

पदच्छेदः — श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् तत्परः संयतेन्द्रियः ज्ञानम् लब्ध्वा पराम् शान्तिम् अचिरेण अधिगच्छति।

अन्वयः — संयतेन्द्रियः तत्परः श्रद्धावान् (मनुष्यः) ज्ञानं लभते। तथा ज्ञानं लब्ध्वा (सः) अचिरेण परां शान्तिम् अधिगच्छति।

भावार्थ — जो मनुष्य श्रद्धालु है, ज्ञान-प्राप्ति में तत्पर (लगनशील) है तथा जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है, वही ज्ञान प्राप्त करता है। और वह दिव्य ज्ञान प्राप्त करके शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त होता है, जिससे उसे जीवन में अनन्त आनन्द प्राप्त होता है।

श्लोक 5

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ ५॥

पदच्छेदः — अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् मैत्रः करुणः एव च निर्ममः निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।

अन्वयः — (यः) सर्वभूतानाम् अद्वेष्टा मैत्रः करुणः एव च निर्ममः निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी (अस्ति, सः एव मम प्रियः भवति)।

भावार्थ — हे अर्जुन! जो मनुष्य किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता, जो समस्त प्राणियों के प्रति ईर्ष्यारहित तथा मित्रभाव व दयालु है, जो ममत्वरहित, अहंकारविहीन, सुख-दुःख में समभाव युक्त तथा क्षमाशील है, ऐसा पुरुष भगवान् का अत्यन्त प्रिय भक्त होता है।

श्लोक 6

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ ६॥

पदच्छेदः — सन्तुष्टः सततम् योगी यतात्मा दृढनिश्चयः मयि अर्पितमनोबुद्धिः यः मद्भक्तः सः मे प्रियः।

अन्वयः — यः योगी सततं सन्तुष्टः यतात्मा दृढनिश्चयः मयि (च) अर्पितमनोबुद्धिः (भवति), सः मद्भक्तः मे प्रियः (भवति)।

भावार्थ — हे पार्थ! जो निरंतर संतुष्ट रहता है, जो मन व इन्द्रियों को जीतकर संयमी बन चुका है, जो अपनी बुद्धि से परमेश्वर के स्वरूप को स्थिर करता है, तथा जिसने अपना मन व बुद्धि मुझमें (ईश्वर में) समर्पित कर दी है, ऐसा मनुष्य मेरा अत्यंत प्रियतम भक्त होता है।

श्लोक 7

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥ ७॥

पदच्छेदः — यस्मात् न उद्विजते लोकः लोकात् न उद्विजते च यः हर्ष-अमर्ष-भय-उद्वेगैः मुक्तः यः सः च मे प्रियः।

अन्वयः — यस्मात् लोकः न उद्विजते, यः च लोकात् न उद्विजते, यः च हर्ष-अमर्ष-भय-उद्वेगैः मुक्तः (सः) मे प्रियः (भवति)।

भावार्थ — हे अर्जुन! जिससे किसी भी प्राणी को उद्वेग (कष्ट/भय) नहीं होता, तथा जो स्वयं भी किसी प्राणी अथवा परिस्थिति से उद्विग्न नहीं होता, और जो हर्ष, ईर्ष्या, भय तथा चिंता से मुक्त है, ऐसा मनुष्य मुझे अत्यंत प्रिय है।

श्लोक 8

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ ८॥

पदच्छेदः — अनुद्वेगकरम् वाक्यम् सत्यम् प्रियहितम् च यत् स्वाध्यायाभ्यसनम् च एव वाङ्मयम् तपः उच्यते।

अन्वयः — यद् वाक्यम् अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च (तथा) स्वाध्यायाभ्यसनं च एव वाङ्मयं तपः उच्यते।

भावार्थ — जो वचन उद्वेग उत्पन्न न करने वाला हो, सत्य हो, प्रिय व हितकर हो, ऐसा भाषण ही 'वाणी का तप' कहलाता है। शास्त्रों का स्वाध्याय (स्वयं अध्ययन) तथा उसका अभ्यास भी वाचिक तप कहा जाता है। इसीलिए विद्यार्थियों को स्मरण रखना चाहिए — प्रिय वचन कहने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं, अतः वही वचन बोलना चाहिए; वचन बोलने में कंजूसी क्यों की जाए?

शब्द-संपदा

शब्दःसंस्कृत अर्थःहिन्दी अर्थ
महोत्सवःपर्वत्यौहार
कथावाचकःउपन्यासकःकथा वाचक
सुगीतागानमयीअच्छी तरह गाई जाने वाली
युद्धपराङ्मुखम्युद्ध-विमुखम्युद्ध से विमुख
अमृततुल्याःअमृतेन सदृशाःअमृत के समान
अनुद्विग्नमनाःयस्य मनः विचलितं न भवतिअविचलित मन वाला
विगतस्पृहःअनुरागरहितःआसक्ति रहित
वीत-राग-भय-क्रोधःवासना, भय व क्रोध से रहितवासना, भय और क्रोध से रहित
स्थितधीःस्थिरमतिमान्स्थिर मन वाला
मुनिःयतिःतपस्वी
सम्मोहःकिंकर्तव्यविमूढताकर्तव्य-अकर्तव्य का अविवेक
स्मृतिविभ्रमःस्मृतिनाशःस्मरणशक्ति का नाश होना
श्रद्धावान्श्रद्धालुःश्रद्धा से युक्त
संयतेन्द्रियःसंयमितइन्द्रियोवालासंयमित इन्द्रियों वाला
प्रणिपातेननमस्कारेणप्रणाम द्वारा
परिप्रश्नेनपुनः पुनः प्रश्नकरणेनप्रश्नों द्वारा (विनम्रता से)
उपदेक्ष्यन्तिउपदेशं प्रदास्यन्तिउपदेश देंगे
तत्त्वदर्शिनःदाशर्निकाःतत्त्वज्ञानी
शब्दःसंस्कृत अर्थःहिन्दी अर्थ
विद्धिजानीहितुम जानो
अद्वेष्टाद्वेषरहितःद्वेष न करने वाला
सर्वभूतानाम्सर्वेषां प्राणिनाम्सभी प्राणियों का
मैत्रःमित्रताभावयुक्तःमित्रता के भाव वाला
करुणःदयार्द्रचित्तःकरुणावान्
निर्ममःममत्व-भावनारहितःममत्व से रहित
निरहङ्कारःगर्वहीनःअहंकाररहित
समदुःखसुखःदुःखेषु सुखेषु च समानभाव-शीलःसुख-दुःख में समान भाव वाला
क्षमीक्षमावान्क्षमाशील
उद्विजतेउद्वेगं गच्छतिउद्विग्न होता है
लोकःजगत्संसार
हर्षामर्षभयोद्वेगैःआह्लाद-क्रोध-भय-चिन्तादिभिःहर्ष, क्रोध, भय और चिंताओं से
यतात्मासंयमीआत्म-संयमी
दृढनिश्चयःदृढः निश्चयः यस्य सःदृढ निश्चय वाला
अर्पितमनोबुद्धिःअर्पितं मनः बुद्धिः च येन सःमन-बुद्धि अर्पित करने वाला
अनुद्वेगकरम्न उद्वेगकरम्व्याकुलता न करने वाला
अभ्यसनम्अभ्यासःअभ्यास
वाङ्मयम्वाचिकम्वाणी-सम्बन्धी

व्याकरण विशेष

1. आधारार्थ सप्तमी विभक्ति — जहाँ किसी क्रिया के आधार (स्थान/स्थिति) का बोध कराना हो, वहाँ सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है। यथा — उत्पीठिकायां पुस्तकम् अस्ति। दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः भवेत्। सुखेषु विगतस्पृहः भवेत्।
2. उत्पत्ति/कारणार्थ पञ्चमी विभक्ति — जहाँ किसी कार्य के कारण या उत्पत्ति-स्रोत का बोध कराना हो, वहाँ पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है। यथा — क्रोधात् सम्मोहः भवति। सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः भवति। स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः भवति।
योग्यताविस्तरः — श्रीमद्भगवद्गीता (18 अध्यायों के नाम): 1. अर्जुनविषादयोगः, 2. साङ्ख्ययोगः, 3. कर्मयोगः, 4. ज्ञान-कर्म-संन्यासयोगः, 5. कर्मसंन्यासयोगः, 6. आत्मसंयमयोगः, 7. ज्ञान-विज्ञानयोगः, 8. अक्षर-ब्रह्मयोगः, 9. राजविद्या-राजगुह्ययोगः, 10. विभूतियोगः, 11. विश्वरूप-दर्शनयोगः, 12. भक्तियोगः, 13. क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोगः, 14. गुणत्रय-विभागयोगः, 15. पुरुषोत्तमयोगः, 16. दैवासुर-सम्पद्विभागयोगः, 17. श्रद्धात्रय-विभागयोगः, 18. मोक्ष-संन्यासयोगः।

पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर

1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत —
  1. (क) श्रद्धावान् जनः किं लभते?
    ज्ञानम् (लभते)।
  2. (ख) कस्मात् सम्मोहः जायते?
    क्रोधात्।
  3. (ग) सम्मोहात् किं जायते?
    स्मृतिविभ्रमः।
  4. (घ) अर्जुनाय गीतां कः उपदिष्टवान्?
    श्रीकृष्णः (भगवान् श्रीकृष्णः)।
  5. (ङ) हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तः नरः कस्य प्रियः भवति?
    भगवतः (मे) प्रियः भवति।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत —
  1. (क) कीदृशं वाक्यं वाङ्मयं तपः उच्यते?
    यत् वाक्यम् अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च भवति, स्वाध्यायाभ्यसनं च, तत् वाङ्मयं तपः उच्यते।
  2. (ख) कीदृशः जनः स्थितधीः उच्यते?
    यः जनः दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः, सुखेषु विगतस्पृहः तथा वीतरागभयक्रोधः भवति, सः स्थितधीः उच्यते।
  3. (ग) जनः कथं प्रणश्यति?
    क्रोधात् सम्मोहः, सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः, स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः भवति, तथा बुद्धिनाशात् जनः प्रणश्यति।
  4. (घ) जनः कथम् उत्तमां शान्तिं प्राप्नोति?
    श्रद्धावान्, तत्परः, संयतेन्द्रियः जनः ज्ञानं लब्ध्वा अचिरेण परां शान्तिं प्राप्नोति।
  5. (ङ) उपदेशप्राप्तये त्रयः उपायाः के भवन्ति?
    प्रणिपातः, परिप्रश्नः तथा सेवा — एते त्रयः उपायाः उपदेशप्राप्तये भवन्ति।
3. कोष्ठके दत्तानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत —

(पेटिका: सेवया, स्मृतिविभ्रमः, योगी, वाङ्मयं, स्थितधीः)

  1. (क) अनुद्रेगकरं सत्यं प्रियहितं च वाक्यं वाङ्मयं तपः उच्यते।
  2. (ख) सततं सन्तुष्टः दृढनिश्चयः च योगी भवति।
  3. (ग) अनुद्विग्नमनाः मुनिः स्थितधीः उच्यते।
  4. (घ) तद् आत्मज्ञानं प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया च विद्धि।
  5. (ङ) सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः भवति।
4. अधोलिखितानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत —
  1. उच्यते —
    सः स्थितधीः मुनिः उच्यते।
  2. च —
    रामः श्यामः च मित्रे स्तः।
  3. न —
    सः क्रोधं न करोति।
  4. लब्ध्वा —
    ज्ञानं लब्ध्वा सः प्रसन्नः अभवत्।
  5. कुर्यात् —
    छात्रः नित्यं अभ्यासं कुर्यात्।
5. पाठानुसारं समुचितेन पदेन श्लोकं पूरयत —
  1. (क) श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
  2. (ख) अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्, स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।
  3. (ग) सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
  4. (घ) क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
  5. (ङ) तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
6. उदाहरणानुसारं पदानि स्त्रीलिङ्गे परिवर्तयत —

उदाहरणम् — श्रद्धावान् → श्रद्धावती; बुद्धिमान् → बुद्धिमती

  1. (क) गुणवान् →
    गुणवती
  2. (ख) आयुष्मान् →
    आयुष्मती
  3. (ग) क्षमावान् →
    क्षमावती
  4. (घ) ज्ञानवान् →
    ज्ञानवती
  5. (ङ) श्रीमान् →
    श्रीमती
7. समुचितेन पदेन सह स्तम्भौ मेलयत —
  1. (क) सर्वभूतानाम् →
    सर्वेषां प्राणिनाम्
  2. (ख) अनुद्विग्नमनाः →
    यस्य मनः विचलितं न भवति
  3. (ग) स्थितधीः →
    स्थिरमतिमान्
  4. (घ) परिप्रश्नेन →
    पुनः पुनः प्रश्नकरणेन
  5. (ङ) संयतेन्द्रियः →
    इन्द्रियसंयमी
8. श्रीमद्भगवद्गीतायाः विषये पञ्च वाक्यानि लिखत —
  1. (क) श्रीमद्भगवद्गीता भगवतः श्रीकृष्णस्य अर्जुनाय प्रदत्तानाम् उपदेशानां संकलनम् अस्ति।
  2. (ख) महर्षिः वेदव्यासः महाभारतस्य भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतां वर्णितवान्।
  3. (ग) गीतायाम् अष्टादश अध्यायाः सप्तशतं (700) श्लोकाः च सन्ति।
  4. (घ) गीता कर्मयोगस्य, ज्ञानयोगस्य, भक्तियोगस्य च दिव्यं ज्ञानं ददाति।
  5. (ङ) गीतायाः उपदेशाः सम्पूर्णविश्वे जीवनदर्शनरूपेण आदृताः सन्ति।

अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न

(अ) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)

  1. 'गीता सुगीता कर्तव्या' पाठ किस पाठ्यपुस्तक से लिया गया है?
    • (क) दीपकम् ✓
    • (ख) रुचिरा
    • (ग) शेमुषी
    • (घ) अभ्यासवान् भव
  2. श्रीमद्भगवद्गीता का स्रोत ग्रन्थ कौन-सा है?
    • (क) रामायण
    • (ख) महाभारत ✓
    • (ग) पुराण
    • (घ) उपनिषद्
  3. महाभारत के किस पर्व में गीता का वर्णन है?
    • (क) आदिपर्व
    • (ख) भीष्मपर्व ✓
    • (ग) शान्तिपर्व
    • (घ) उद्योगपर्व
  4. गीता का संकलन किसने किया?
    • (क) वाल्मीकि
    • (ख) महर्षि वेदव्यास ✓
    • (ग) कालिदास
    • (घ) पतञ्जलि
  5. गीता में कुल कितने अध्याय हैं?
    • (क) 12
    • (ख) 16
    • (ग) 18 ✓
    • (घ) 24
  6. गीता में कुल कितने श्लोक हैं?
    • (क) 500
    • (ख) 700 ✓
    • (ग) 900
    • (घ) 108
  7. गीता का उपदेश किसने किसको दिया?
    • (क) अर्जुन ने कृष्ण को
    • (ख) श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ✓
    • (ग) व्यास ने अर्जुन को
    • (घ) भीष्म ने युधिष्ठिर को
  8. अर्जुन युद्ध क्यों नहीं करना चाहता था?
    • (क) वह भयभीत था
    • (ख) स्वजनों को देखकर मोहग्रस्त हो गया ✓
    • (ग) उसके पास शस्त्र नहीं थे
    • (घ) वह थका हुआ था
  9. स्थितधीः (स्थितप्रज्ञ) मुनि किन गुणों से रहित होता है?
    • (क) ज्ञान से
    • (ख) राग, भय और क्रोध से ✓
    • (ग) शांति से
    • (घ) संतोष से
  10. क्रोध से सबसे पहले क्या उत्पन्न होता है?
    • (क) स्मृतिनाश
    • (ख) सम्मोह ✓
    • (ग) बुद्धिनाश
    • (घ) विनाश
  11. सम्मोह से क्या उत्पन्न होता है?
    • (क) स्मृतिविभ्रम ✓
    • (ख) बुद्धिनाश
    • (ग) क्रोध
    • (घ) शांति
  12. बुद्धिनाश होने पर मनुष्य का क्या होता है?
    • (क) वह सुखी होता है
    • (ख) उसका पतन/विनाश होता है ✓
    • (ग) वह ज्ञानी बनता है
    • (घ) कुछ नहीं होता
  13. ज्ञान-प्राप्ति के लिए गुरु के पास किस भाव से जाना चाहिए?
    • (क) प्रणिपात, परिप्रश्न व सेवा के भाव से ✓
    • (ख) अहंकार के भाव से
    • (ग) क्रोध के भाव से
    • (घ) उदासीनता के भाव से
  14. ज्ञान किसे प्राप्त होता है?
    • (क) क्रोधी को
    • (ख) श्रद्धावान् व संयतेन्द्रिय को ✓
    • (ग) आलसी को
    • (घ) अहंकारी को
  15. ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य क्या प्राप्त करता है?
    • (क) धन
    • (ख) परम शान्ति ✓
    • (ग) यश
    • (घ) क्रोध
  16. भगवान् का प्रिय भक्त सबके प्रति कैसा भाव रखता है?
    • (क) द्वेष का
    • (ख) मैत्री व करुणा का ✓
    • (ग) ईर्ष्या का
    • (घ) उपेक्षा का
  17. भगवान् का प्रिय भक्त सुख-दुःख में कैसा रहता है?
    • (क) विचलित
    • (ख) समभाव युक्त ✓
    • (ग) दुःखी
    • (घ) क्रोधित
  18. योगी किसमें अपना मन-बुद्धि अर्पित करता है?
    • (क) धन में
    • (ख) भगवान् में (मयि) ✓
    • (ग) संसार में
    • (घ) परिवार में
  19. प्रिय भक्त हर्ष, अमर्ष, भय व उद्वेग से कैसा होता है?
    • (क) युक्त
    • (ख) मुक्त ✓
    • (ग) आसक्त
    • (घ) भयभीत
  20. वाणी का तप किसे कहा गया है?
    • (क) मौन रहना
    • (ख) सत्य, प्रिय व हितकर वचन बोलना ✓
    • (ग) कठोर वचन बोलना
    • (घ) अधिक बोलना
  21. स्वाध्याय-अभ्यास किस तप के अंतर्गत आता है?
    • (क) कायिक तप
    • (ख) वाङ्मय (वाचिक) तप ✓
    • (ग) मानसिक तप
    • (घ) दैहिक तप
  22. प्रिय वाक्य बोलने से क्या होता है?
    • (क) सब दुःखी होते हैं
    • (ख) सब प्राणी प्रसन्न होते हैं ✓
    • (ग) कुछ नहीं होता
    • (घ) झगड़ा होता है
  23. गीता को अन्य नाम से क्या कहा जाता है?
    • (क) उपनिषद्
    • (ख) गीतोपनिषद् ✓
    • (ग) संहिता
    • (घ) आरण्यक
  24. 'पद्मनाभस्य मुखपद्मात्' का सन्दर्भ किससे है?
    • (क) ब्रह्मा से
    • (ख) भगवान् विष्णु/श्रीकृष्ण से ✓
    • (ग) शिव से
    • (घ) इंद्र से
  25. पाठ में गीता-जयंती-महोत्सव कहाँ मनाया गया दर्शाया गया है?
    • (क) मथुरा में
    • (ख) कुरुक्षेत्र में ✓
    • (ग) द्वारका में
    • (घ) हस्तिनापुर में

(ब) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. पाठ का नाम क्या है?
    गीता सुगीता कर्तव्या।
  2. यह पाठ किस पाठ्यपुस्तक से लिया गया है?
    दीपकम् (कक्षा 8, एनसीईआरटी संस्कृत)।
  3. श्रीमद्भगवद्गीता किस ग्रन्थ का अंश है?
    महाभारत के भीष्मपर्व का।
  4. गीता का उपदेश किसने दिया?
    भगवान् श्रीकृष्ण ने।
  5. गीता का उपदेश किसे दिया गया?
    अर्जुन को।
  6. गीता का संकलन किसने किया?
    महर्षि वेदव्यास ने।
  7. गीता में कितने अध्याय हैं?
    अठारह (18)।
  8. गीता में कुल कितने श्लोक हैं?
    सात सौ (700)।
  9. पाठ में सुनाया गया प्रथम श्लोक किसकी महिमा बताता है?
    गीता की महिमा।
  10. 'स्थितधीः' शब्द का अर्थ क्या है?
    स्थिर बुद्धि वाला (स्थितप्रज्ञ)।
  11. क्रोध से सबसे पहले क्या उत्पन्न होता है?
    सम्मोह।
  12. ज्ञान-प्राप्ति के तीन उपाय कौन-से हैं?
    प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा।
  13. ज्ञान किसे प्राप्त होता है?
    श्रद्धावान् व संयतेन्द्रिय मनुष्य को।
  14. 'निरहङ्कारः' शब्द का अर्थ बताइए।
    अहंकाररहित।
  15. भगवान् के प्रिय भक्त का मन-बुद्धि कहाँ अर्पित रहता है?
    भगवान् में (मयि)।
  16. वाणी का तप किसे कहा गया है?
    सत्य, प्रिय व हितकर वचन को।
  17. 'क्षमी' शब्द का अर्थ क्या है?
    क्षमाशील।
  18. 'यतात्मा' शब्द का अर्थ बताइए।
    संयमी (जिसने इन्द्रियाँ वश में कर ली हों)।
  19. गीता का दूसरा नाम क्या है?
    गीतोपनिषद्।
  20. पाठ में गीता-जयंती-महोत्सव कहाँ आचरित हुआ?
    कुरुक्षेत्र में।

(स) लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. "गीता सुगीता कर्तव्या" श्लोक का भावार्थ लिखिए।
    गीता को भली-भाँति पढ़ना व समझना चाहिए, अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या लाभ, क्योंकि यह स्वयं भगवान् विष्णु (पद्मनाभ) के मुखकमल से निःसृत वाणी है।
  2. अर्जुन युद्ध क्यों नहीं करना चाहता था और श्रीकृष्ण ने क्या किया?
    कुरुक्षेत्र के युद्ध में अपने ही बान्धवों को देखकर अर्जुन युद्ध करने से विमुख हो गया था। तब भगवान् श्रीकृष्ण ने उसे कर्तव्यपालन का उपदेश दिया, जो ही श्रीमद्भगवद्गीता कहलाता है।
  3. स्थितधीः मुनि के लक्षण लिखिए।
    जो दुःखों में उद्विग्न नहीं होता, सुखों की लालसा से रहित है, तथा राग, भय व क्रोध से मुक्त है, ऐसा स्थिर बुद्धि वाला मुनि 'स्थितधीः' कहलाता है।
  4. क्रोध से मनुष्य के पतन का क्रम स्पष्ट कीजिए।
    क्रोध से सम्मोह उत्पन्न होता है, सम्मोह से स्मृतिविभ्रम, स्मृतिभ्रंश से बुद्धिनाश और बुद्धिनाश से मनुष्य का सम्पूर्ण विनाश हो जाता है।
  5. तत्त्वज्ञान प्राप्ति के तीन उपाय समझाइए।
    गुरु के समीप विनम्रतापूर्वक प्रणाम करके (प्रणिपात), जिज्ञासापूर्वक प्रश्न पूछकर (परिप्रश्न) तथा गुरु की सेवा करके (सेवा) तत्त्वज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
  6. श्रद्धावान् मनुष्य को क्या प्राप्त होता है?
    जो मनुष्य श्रद्धालु, ज्ञान-प्राप्ति में तत्पर तथा संयतेन्द्रिय है, वह ज्ञान प्राप्त करता है और ज्ञान प्राप्त करके शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त होता है।
  7. भगवान् के प्रिय भक्त के कोई पाँच गुण लिखिए।
    द्वेषरहित, मित्रभाव व करुणा से युक्त, ममत्वरहित, अहंकाररहित, सुख-दुःख में समभाव वाला तथा क्षमाशील — ये भगवान् के प्रिय भक्त के गुण हैं।
  8. "यस्मान्नोद्विजते लोकः" श्लोक का भाव स्पष्ट कीजिए।
    जिससे किसी प्राणी को उद्वेग नहीं होता और जो स्वयं भी किसी परिस्थिति से विचलित नहीं होता, तथा जो हर्ष, ईर्ष्या, भय व चिंता से मुक्त है, ऐसा मनुष्य भगवान् को प्रिय है।
  9. वाणी के तप का क्या लक्षण बताया गया है?
    जो वचन उद्वेगरहित, सत्य, प्रिय व हितकर हो तथा शास्त्रों का स्वाध्याय व अभ्यास हो, वही वाणी का तप (वाङ्मय तप) कहलाता है।
  10. गीता के रचना-सन्दर्भ के बारे में संक्षेप में लिखिए।
    महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर युद्ध से विमुख हुआ, तब भगवान् श्रीकृष्ण ने उसे जो उपदेश दिया, उसी का संकलन महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के भीष्मपर्व में गीता के रूप में किया।
  11. आधारार्थ सप्तमी विभक्ति का एक उदाहरण दीजिए।
    दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः भवेत् — यहाँ 'दुःखेषु' में सप्तमी विभक्ति आधार के अर्थ में प्रयुक्त हुई है।
  12. कारणार्थ पञ्चमी विभक्ति का एक उदाहरण दीजिए।
    क्रोधात् सम्मोहः भवति — यहाँ 'क्रोधात्' में पञ्चमी विभक्ति कारण के अर्थ में प्रयुक्त हुई है।
  13. गीता के किन्हीं तीन अध्यायों के नाम लिखिए।
    अर्जुनविषादयोगः, साङ्ख्ययोगः तथा कर्मयोगः (अन्य भी सही उत्तर हैं)।
  14. 'सम्मोह' और 'स्मृतिविभ्रम' में क्या अंतर है?
    सम्मोह का अर्थ है कर्तव्य-अकर्तव्य का अविवेक (मोह), जबकि स्मृतिविभ्रम का अर्थ है स्मरणशक्ति का नाश होना — सम्मोह से ही स्मृतिविभ्रम उत्पन्न होता है।
  15. पाठ में रमेश ने पिता से क्या प्रश्न पूछा?
    रमेश ने पूछा कि गीता क्या है और उसे 'सुगीता' कैसे बनाया जाए (सुगीता कर्तव्या इत्यस्य कः आशयः)।
  16. 'सुगीता कर्तव्या' का क्या अभिप्राय है?
    इसका अभिप्राय है कि गीता का भली-भाँति अभ्यास किया जाए, उसे उत्तम भाव से पढ़ा जाए तथा उसके उपदेशों का जीवन व कार्यक्षेत्र में पालन किया जाए।
  17. प्रिय वचन बोलने के विषय में पाठ में क्या शिक्षा दी गई है?
    पाठ में शिक्षा दी गई है कि प्रिय वचन बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं, अतः वाणी बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए, सदैव सत्य व हितकर वचन ही बोलने चाहिए।
  18. 'समदुःखसुखः' का क्या अर्थ है?
    सुख और दुःख दोनों में समान भाव रखने वाला।
  19. इस पाठ के आधार पर गीता की सामाजिक प्रासंगिकता पर एक पंक्ति लिखिए।
    गीता आज भी मनुष्य को कर्तव्य-पालन, संयम, समभाव व ऐक्य जैसे जीवन-मूल्य सिखाती है, इसलिए यह सदैव प्रासंगिक ग्रन्थ है।
  20. ज्ञानप्राप्ति के पश्चात् मनुष्य को क्या लाभ होता है?
    ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त होता है, जिससे उसे जीवन में स्थायी आनन्द मिलता है।

(द) महत्वपूर्ण प्रश्न

  1. पाठ में वर्णित सभी आठ श्लोकों का सप्रसंग सार अपने शब्दों में लिखिए।
    प्रथम श्लोक में स्थितप्रज्ञ मुनि के लक्षण बताए गए हैं — जो दुःख-सुख, राग-भय-क्रोध से अप्रभावित रहता है। द्वितीय श्लोक में क्रोध से होने वाले क्रमिक पतन (सम्मोह→स्मृतिविभ्रम→बुद्धिनाश→विनाश) का वर्णन है। तृतीय श्लोक में तत्त्वज्ञान प्राप्ति के तीन उपाय (प्रणिपात, परिप्रश्न, सेवा) बताए गए हैं। चतुर्थ श्लोक में कहा गया है कि श्रद्धावान् व संयमी मनुष्य ही ज्ञान व शान्ति प्राप्त करता है। पंचम व षष्ठ श्लोकों में भगवान् के प्रिय भक्त के गुण (द्वेषरहित, समभावी, संतुष्ट, समर्पित) बताए गए हैं। सप्तम श्लोक में हर्ष-भय-उद्वेग से मुक्त व्यक्ति को प्रिय बताया गया है। अष्टम श्लोक में वाणी के तप (सत्य, प्रिय, हितकर वचन) का वर्णन है।
  2. पाठ के संवाद-भाग के आधार पर गीता की उत्पत्ति व महत्व स्पष्ट कीजिए।
    कुरुक्षेत्र में गीता-जयंती-महोत्सव के अवसर पर कथावाचक गीता की महिमा बताते हैं। रमेश के प्रश्न पर पिता बताते हैं कि महाभारत-युद्ध में स्वजनों को देखकर मोहग्रस्त हुए अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण ने जो उपदेश दिया, वही गीता है। इसे 'सुगीता' बनाने का अर्थ है इसका भली-भाँति अध्ययन व जीवन में उसके उपदेशों का पालन करना। गीता में जीवन के हर क्षेत्र (कर्म, ज्ञान, भक्ति) से संबंधित अमृततुल्य उपदेश हैं, इसीलिए यह विश्व-प्रसिद्ध ग्रन्थ है।
  3. स्थितप्रज्ञ (स्थितधीः) पुरुष के लक्षणों की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
    गीता के अनुसार स्थितप्रज्ञ पुरुष वह है जो दुःख में विचलित नहीं होता, सुख की लालसा नहीं रखता, राग-भय-क्रोध से मुक्त रहता है, समस्त प्राणियों के प्रति द्वेषरहित व मैत्रीपूर्ण रहता है, ममत्व व अहंकार से रहित होता है, सुख-दुःख में समभाव रखता है और क्षमाशील होता है। ऐसा व्यक्ति सदैव संतुष्ट, संयमी, दृढनिश्चयी रहता है और अपना मन-बुद्धि ईश्वर में अर्पित करता है — यही भगवान् का सबसे प्रिय भक्त कहलाता है।
  4. क्रोध के दुष्परिणामों की श्रृंखला को उदाहरण सहित समझाइए।
    गीता के अनुसार क्रोध मनुष्य के पतन का मूल कारण है — क्रोधात् भवति सम्मोहः (क्रोध से मोह/विवेक-भ्रम उत्पन्न होता है), सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः (मोह से स्मरणशक्ति नष्ट होती है), स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः (स्मृतिनाश से बुद्धि नष्ट होती है), बुद्धिनाशात् प्रणश्यति (बुद्धिनाश से मनुष्य का सम्पूर्ण विनाश हो जाता है)। यह क्रमिक श्रृंखला दर्शाती है कि क्रोध पर नियंत्रण रखना जीवन में सफलता के लिए कितना आवश्यक है।
  5. तत्त्वज्ञान प्राप्ति के उपायों (प्रणिपात, परिप्रश्न, सेवा) का विस्तार से वर्णन कीजिए।
    गीता में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि सच्चा ज्ञान गुरु के पास विनम्रतापूर्वक प्रणाम करने (प्रणिपात), जिज्ञासापूर्वक शंका-समाधान हेतु प्रश्न पूछने (परिप्रश्न) तथा निष्ठापूर्वक गुरु-सेवा करने (सेवा) से ही प्राप्त होता है। ऐसे विनम्र व जिज्ञासु शिष्य को ही तत्त्वदर्शी ज्ञानी गुरु सच्चा ज्ञान प्रदान करते हैं — यह गीता की शिक्षा-पद्धति की मूल भावना है।
  6. भगवान् के प्रिय भक्त (मद्भक्त) के गुणों का वर्णन पाठ के आधार पर कीजिए।
    गीता के अनुसार भगवान् का प्रिय भक्त वह है जो सभी प्राणियों के प्रति द्वेषरहित, मैत्रीपूर्ण व करुणावान् है; ममत्व व अहंकार से रहित, सुख-दुःख में समभाव युक्त व क्षमाशील है; निरंतर संतुष्ट, संयमी, दृढनिश्चयी है; जिसका मन-बुद्धि भगवान् में अर्पित है; जिससे किसी को उद्वेग नहीं होता तथा जो स्वयं भी हर्ष-क्रोध-भय-चिंता से मुक्त है। ऐसा भक्त भगवान् को अत्यंत प्रिय होता है।
  7. वाणी के तप (वाङ्मय तप) पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
    गीता के अनुसार जो वाणी उद्वेग उत्पन्न न करने वाली, सत्य, तथा सुनने वाले के लिए प्रिय व हितकर हो, वही वाणी का तप है। इसके साथ ही शास्त्रों का नियमित स्वाध्याय व उसका अभ्यास भी वाचिक तप में सम्मिलित है। पाठ में यह भी शिक्षा दी गई है कि प्रिय वचन बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं, अतः वाणी बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए।
  8. आधुनिक जीवन में गीता की शिक्षाओं की प्रासंगिकता पर अपने विचार लिखिए।
    गीता की शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं — क्रोध पर नियंत्रण, कर्तव्य-पालन, समभाव, संयम व सत्य-प्रिय वाणी जैसे मूल्य प्रतिस्पर्धा व तनाव से भरे आधुनिक जीवन में मानसिक शांति व सफलता दोनों के लिए आवश्यक हैं। विद्यार्थी जीवन में भी संयतेन्द्रिय होकर श्रद्धापूर्वक अध्ययन करना गीता की महत्वपूर्ण सीख है।
  9. इस पाठ से विद्यार्थियों को क्या शिक्षा व प्रेरणा मिलती है?
    इस पाठ से विद्यार्थियों को प्रेरणा मिलती है कि क्रोध व मोह से बचकर संयमपूर्वक, श्रद्धा व लगन से अध्ययन करना चाहिए; गुरुजनों के प्रति विनम्रता व सेवाभाव रखना चाहिए; सदैव सत्य व हितकर वाणी बोलनी चाहिए; तथा सुख-दुःख में समभाव रखते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए — यही सच्चे ज्ञान व शांति का मार्ग है।
  10. श्लोक 1 व श्लोक 4 की तुलना करते हुए स्थितप्रज्ञता और ज्ञान-प्राप्ति के संबंध को स्पष्ट कीजिए।
    श्लोक 1 स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण बताता है — दुःख-सुख व राग-भय-क्रोध से अप्रभावित रहना। श्लोक 4 बताता है कि यह स्थिति श्रद्धा व इन्द्रिय-संयम से प्राप्त ज्ञान द्वारा ही सम्भव होती है — अर्थात् जब मनुष्य श्रद्धापूर्वक ज्ञान प्राप्त करता है, तभी वह स्थितप्रज्ञ बनकर परम शान्ति प्राप्त करता है। दोनों श्लोक परस्पर पूरक हैं — ज्ञान स्थितप्रज्ञता का मार्ग है, और स्थितप्रज्ञता ज्ञान का फल।
  11. 'गीता सुगीता कर्तव्या' शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
    यह शीर्षक स्वयं गीता के ही एक श्लोक से लिया गया है, जिसका अर्थ है कि गीता को भली-भाँति पढ़ना व समझना आवश्यक है क्योंकि यह भगवान् के मुखकमल से निःसृत दिव्य वाणी है। पाठ का संपूर्ण संवाद व सभी श्लोक इसी भावना को पुष्ट करते हैं कि गीता का सम्यक् अध्ययन व उसके उपदेशों का जीवन में पालन ('सुगीता कर्तव्या') ही मानव-जीवन की सार्थकता है — अतः यह शीर्षक अत्यंत सटीक व सार्थक है।

माइंड मैप

गीता सुगीता कर्तव्या

स्रोत

  • महाभारत, भीष्मपर्व
  • वक्ता: श्रीकृष्ण
  • संकलन: वेदव्यास

संवाद

  • गीता-जयंती-महोत्सव
  • रमेश का प्रश्न
  • पिता का उत्तर

आठ श्लोक

  • स्थितधीः लक्षण
  • क्रोध का दुष्परिणाम
  • ज्ञान-प्राप्ति के उपाय
  • प्रिय भक्त के गुण

व्याकरण

  • आधारार्थ सप्तमी
  • कारणार्थ पञ्चमी

अभ्यास

  • 25 MCQ
  • लघु/दीर्घ प्रश्न
  • पाठ्यपुस्तक गतिविधियाँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

'गीता सुगीता कर्तव्या' पाठ किस पाठ्यपुस्तक और कक्षा का है?

यह कक्षा 8 की एनसीईआरटी संस्कृत पाठ्यपुस्तक 'दीपकम्' का पञ्चम पाठ है।

यह पाठ किस ग्रन्थ पर आधारित है?

यह श्रीमद्भगवद्गीता (महाभारत के भीष्मपर्व का अंश) पर आधारित है, जिसका उपदेश भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था।

गीता में कितने अध्याय और श्लोक हैं?

गीता में कुल 18 अध्याय तथा 700 श्लोक हैं, और महर्षि वेदव्यास ने इसका संकलन किया।

पाठ का मुख्य संदेश क्या है?

पाठ का मुख्य संदेश है — क्रोध, राग व भय से मुक्त होकर स्थितप्रज्ञ बनना, श्रद्धा व संयम से ज्ञान प्राप्त करना, तथा सत्य व हितकर वाणी बोलना।

'सुगीता कर्तव्या' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि गीता का सम्यक् रूप से अध्ययन किया जाए और उसके उपदेशों का जीवन में पालन किया जाए।

परीक्षा की दृष्टि से इस पाठ के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु कौन-से हैं?

आठों श्लोकों का पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ, शब्दार्थ, क्रोध के दुष्परिणामों की श्रृंखला, तत्त्वज्ञान-प्राप्ति के तीन उपाय, प्रिय भक्त के लक्षण, तथा आधारार्थ सप्तमी व कारणार्थ पञ्चमी विभक्ति — ये सभी बिंदु परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

📚 कक्षा 8 संस्कृत — दीपकम् पाठ्यक्रम (सभी पाठ)
  1. पाठ 1 : संगच्छध्वं संवदध्वम्
  2. पाठ 2 : अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका
  3. पाठ 3 : सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु
  4. पाठ 4 : प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः
  5. पाठ 5 : गीता सुगीता कर्तव्या (यह पाठ)
  6. पाठ 6 : डिजिभारतम् – युगपरिवर्तनम्
  7. पाठ 7 : मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा

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