हार की जीत
सुदर्शन की मार्मिक कहानी — बाबा भारती, उनके प्रिय घोड़े सुलतान और डाकू खड्गसिंह के हृदय-परिवर्तन की अमर गाथा
1लेखक से परिचय — सुदर्शन
यह कहानी हिंदी की प्रसिद्ध कहानियों में से एक है और इसे हिंदी के प्रसिद्ध लेखक सुदर्शन जी (1896–1983) ने लिखा है। सुदर्शन का वास्तविक नाम बदरीनाथ भट्ट था। उन्होंने पहली कहानी तब लिखी थी जब वे इसी तरह छठी कक्षा में पढ़ते थे।
सुदर्शन ने कहानियों के अतिरिक्त कविताएँ, लेख, नाटक और उपन्यास भी लिखे। इसके अलावा उन्होंने अनेक फ़िल्मों की पटकथा और गीत भी लिखे।
2पाठ परिचय
बाबा भारती अपने सुंदर और बलवान घोड़े सुलतान से बेहद प्रेम करते थे। डाकू खड्गसिंह ने उस घोड़े को पाने की इच्छा से पहले तो सीधे धमकी दी, और जब इससे बात न बनी तो अपाहिज बनकर छल से सुलतान को छीन लिया। परंतु जब उसने बाबा भारती के उच्च विचार और गरीबों के प्रति उनकी चिंता सुनी — कि कहीं इस घटना से लोगों का गरीबों पर से विश्वास न उठ जाए — तो उसका हृदय पूरी तरह बदल गया, और उसने रात के अँधेरे में चुपचाप घोड़ा लौटा दिया। बाहरी तौर पर बाबा भारती अपना प्रिय घोड़ा हार गए, परंतु उनकी सच्चाई और करुणा की यही असली जीत थी — इसीलिए कहानी का नाम 'हार की जीत' रखा गया है।
3मूल पाठ
माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवत-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे सुलतान कहकर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रुपया, माल, असबाब, ज़मीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मंदिर में रहते और भगवान का भजन करते। 'मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकूँगा', उन्हें ऐसी भ्रांति-सी हो गई थी, वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, 'ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।' जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।
खड्गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते-होते सुलतान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। एक दिन वह दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया। बाबा भारती ने पूछा, "खड्गसिंह, क्या हाल है?" खड्गसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, "आपकी दया है।" "कहो, इधर कैसे आ गए?" "सुलतान की चाह खींच लाई।" "विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।" "मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।" "उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!" "कहते हैं देखने में भी बहुत सुंदर है।" "क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।" "बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।" बाबा भारती और खड्गसिंह दोनों अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से। उसने सैकड़ों घोड़े देखे थे, परंतु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुज़रा था। सोचने लगा, 'भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड्गसिंह के पास होना चाहिए। इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ?' कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात उसके हृदय में हलचल होने लगी। बालकों-की-सी अधीरता से बोला, "परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?" बाबा भारती भी मनुष्य ही थे। अपनी चीज़ की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय भी अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर लाए और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे। एकाएक उचककर सवार हो गए, घोड़ा हवा से बातें करने लगा। उसकी चाल को देखकर खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर वह अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था, आदमी थे और बेरहमी थी। जाते-जाते उसने कहा, "बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।"
बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रतिक्षण खड्गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया, यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाईं मिथ्या समझने लगे।
संध्या का समय था। बाबा भारती सुलतान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को और मन में फूले न समाते थे। सहसा एक ओर से आवाज़ आई, "ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।" आवाज़ में करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, "क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?" अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, "बाबा, मैं दुखियारा हूँ मुझ पर दया करो। रामवाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।" "वहाँ तुम्हारा कौन है?" "दुर्गादत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।" बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे। सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड्गसिंह था।
बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, "ज़रा ठहर जाओ।" खड्गसिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, "बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।" "परंतु एक बात सुनते जाओ।" खड्गसिंह ठहर गया।
बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, "यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड्गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ, इसे अस्वीकार न करना; नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।" "बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल यह घोड़ा न दूँ।" "अब घोड़े का नाम न लो, मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।" खड्गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसे लगा था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड्गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, "बाबाजी, इसमें आपको क्या डर है?" सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, "लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे किसी गरीब पर विश्वास न करेंगे। दुनिया से विश्वास उठ जाएगा।" यह कहते-कहते उन्होंने सुलतान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही न रहा हो।
बाबा भारती चले गए। परंतु उनके शब्द खड्गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे सोचता था, 'कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाईं खिल जाता था। कहते थे, इसके बिना मैं रह न सकूँगा। इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं, भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह ख़याल था कि कहीं लोग गरीबों पर विश्वास करना न छोड़ दें।'
रात के अँधेरे में खड्गसिंह बाबा भारती के मंदिर में पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। खड्गसिंह सुलतान की बाग पकड़े हुए था वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक खुला पड़ा था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। खड्गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में पश्चाताप के आँसू थे।
रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था। चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँवों को मन-मन-भर का भारी बना दिया। वे वहीं रुक गए। घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया। अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन से बिछड़े पुत्र से मिल रहा हो। बार-बार उसकी पीठ पर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते और कहते थे, "अब कोई गरीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा।" थोड़ी देर के बाद जब वह अस्तबल से बाहर निकले तो उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। ये आँसू उसी भूमि पर ठीक उसी जगह गिर रहे थे, जहाँ बाहर निकलने के बाद खड्गसिंह खड़ा होकर रोया था। दोनों के आँसुओं का उस भूमि की मिट्टी पर परस्पर मेल हो गया।
— सुदर्शन
4सरल व्याख्या (भावार्थ)
भाग 1 — घोड़े के प्रति बाबा भारती का असीम प्रेम और खड्गसिंह का लालच
बाबा भारती अपने घोड़े सुलतान से बेइंतहा प्रेम करते थे — उसकी देखभाल में ही उनका पूरा समय बीतता। डाकू खड्गसिंह ने जब सुलतान की सुंदरता और चाल के बारे में सुना, तो उसे देखने चला आया। घोड़े को देखते ही उसके मन में इसे हथियाने का लालच जाग उठा, और जाते-जाते उसने खुलेआम धमकी दे दी कि वह घोड़ा ले जाकर रहेगा।
भाग 2 — छल से घोड़ा छीनना
पहले तो बाबा भारती डर के मारे रात-रात भर पहरा देते रहे, परंतु समय बीतने पर वे असावधान हो गए। एक दिन एक 'अपाहिज' की करुण पुकार सुनकर उन्होंने उसे घोड़े पर सवार किया, पर वह अपाहिज असल में डाकू खड्गसिंह ही था, जो छल से घोड़ा लेकर भाग निकला।
भाग 3 — बाबा भारती की अनोखी प्रार्थना और हृदय-परिवर्तन
बाबा भारती ने घोड़ा वापस माँगने के बजाय खड्गसिंह से केवल यह प्रार्थना की कि वह इस घटना को किसी को न बताए, ताकि लोगों का गरीबों पर से विश्वास न उठे। इस त्याग और उच्च विचार ने खड्गसिंह के कठोर हृदय को झकझोर दिया, और पश्चाताप से भरकर उसने रात के अँधेरे में चुपचाप घोड़ा लौटा दिया। घोड़े से फिर मिलने पर बाबा भारती की खुशी के आँसू और खड्गसिंह के पश्चाताप के आँसू एक ही भूमि पर मिल गए — यही कहानी की असली और मार्मिक 'जीत' है।
5शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| भगवत-भजन | ईश्वर की भक्ति/पूजा |
| अर्पण होना | समर्पित हो जाना |
| खरहरा करना | घोड़े के शरीर को साफ़ करना/सहलाना |
| असबाब | सामान, संपत्ति |
| घृणा | नफ़रत |
| भ्रांति | भ्रम, गलतफ़हमी |
| लट्टू होना (मुहावरा) | किसी पर मोहित/आसक्त हो जाना |
| बाँका | सुंदर, आकर्षक (यहाँ घोड़े के लिए) |
| बाहुबल | शारीरिक शक्ति |
| बेरहमी | निर्दयता, क्रूरता |
| कंगला | गरीब, निर्धन |
| दुखियारा | दुखी व्यक्ति |
| अपाहिज | दिव्यांग, विकलांग |
| सौतेला भाई | माता-पिता में से किसी एक के दूसरे विवाह से जन्मा भाई |
| विस्मय | आश्चर्य |
| प्रयोजन | उद्देश्य, मकसद |
| पश्चाताप | अपने किए पर पछतावा |
| हिनहिनाना | घोड़े का बोलना/आवाज़ निकालना |
| मन-मन-भर का भारी | बहुत भारी (मुहावरा-सा प्रयोग) |
| नाईं | जैसे, समान (पुरानी हिंदी का प्रयोग) |
| सन्नाटा | पूर्ण खामोशी, नीरवता |
6पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
मेरी समझ से (क)
- सुलतान के छीने जाने का बाबा भारती पर क्या प्रभाव हुआ?
- बाबा भारती के मन से चोरी का डर समाप्त हो गया ✔
- बाबा भारती ने गरीबों की सहायता करना बंद कर दिया
- बाबा भारती ने द्वार बंद करना छोड़ दिया
- बाबा भारती असावधान हो गए
- "बाबा भारती भी मनुष्य ही थे।" इस कथन के समर्थन में लेखक ने कौन-सा तर्क दिया है?
- बाबा भारती ने डाकू को घमंड से घोड़ा दिखाया
- बाबा भारती घोड़े की प्रशंसा दूसरों से सुनने के लिए व्याकुल थे ✔
- बाबा भारती को घोड़े से अत्यधिक लगाव और मोह था
- बाबा भारती हर पल घोड़े की रखवाली करते रहते थे
शीर्षक
(क) आपने अभी जो कहानी पढ़ी है, इसका नाम सुदर्शन ने 'हार की जीत' रखा है। अपने समूह में चर्चा करके लिखिए कि उन्होंने इस कहानी को यह नाम क्यों दिया होगा।
बाहरी तौर पर देखा जाए तो बाबा भारती अपना सबसे प्रिय घोड़ा सुलतान डाकू खड्गसिंह के हाथों हार गए — यह उनकी 'हार' थी। परंतु उनकी सच्चाई, करुणा और उच्च विचारों ने डाकू के कठोर हृदय को भी बदल दिया, और अंततः उन्हें उनका घोड़ा वापस मिल गया — यही असली और नैतिक 'जीत' है। इसीलिए इस कहानी का नाम 'हार की जीत' अत्यंत सार्थक है — हार में छिपी हुई सच्ची जीत।
(ख) यदि आपको इस कहानी को कोई अन्य नाम देना हो तो क्या नाम देंगे? आपने यह नाम क्यों सोचा, यह भी बताइए।
(व्यक्तिगत उत्तर है।) उदाहरण — 'सच्चे मन की जीत' या 'डाकू का हृदय-परिवर्तन', क्योंकि कहानी की मूल भावना यही है कि सच्चाई, त्याग और करुणा से एक कठोर डाकू का हृदय भी पूरी तरह बदल सकता है।
(ग) बाबा भारती ने डाकू खड्गसिंह से कौन-सा वचन लिया?
बाबा भारती ने खड्गसिंह से यह वचन लिया कि वह घोड़े के छिन जाने की इस पूरी घटना को कभी किसी के सामने प्रकट न करे, ताकि लोगों का गरीबों की सहायता करने और उन पर विश्वास करने का भाव समाप्त न हो जाए।
पंक्तियों पर चर्चा
"भगवत-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता।"
अर्थ — बाबा भारती अपना अधिकांश समय ईश्वर-भक्ति में बिताते थे, और जो थोड़ा समय बचता था, वह भी वे अपने प्रिय घोड़े सुलतान की देखभाल में लगा देते थे — इससे घोड़े के प्रति उनका असीम प्रेम प्रकट होता है।
"बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से।"
अर्थ — बाबा भारती को अपने घोड़े पर गर्व था, इसलिए उन्होंने उसे बड़े गर्व से दिखाया। वहीं खड्गसिंह, जिसने पहले कभी ऐसा सुंदर घोड़ा नहीं देखा था, आश्चर्यचकित रह गया।
"वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर अपना अधिकार समझता था।"
अर्थ — यह पंक्ति खड्गसिंह के डाकू-स्वभाव को दर्शाती है — वह जिस भी चीज़ को पसंद करता, बलपूर्वक उसे हथिया लेना अपना अधिकार समझता था।
"बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, 'यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है।'"
अर्थ — बाबा भारती की स्थिति उस बेबस बकरे जैसी थी जो कसाई के सामने असहाय होता है — वे जानते थे कि अब घोड़ा वापस पाना असंभव है, इसलिए उन्होंने विवश होकर घोड़े को खड्गसिंह का मान लिया।
"उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई।"
अर्थ — आदतवश बाबा भारती के पैर अस्तबल की ओर बढ़ गए, लेकिन जैसे ही उन्हें याद आया कि अब वहाँ सुलतान नहीं है, उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और गहरी निराशा हुई।
सोच-विचार के लिए
कहानी को एक बार फिर से पढ़िए और निम्नलिखित पंक्ति के विषय में पता लगाकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए — "दोनों के आँसुओं का उस भूमि की मिट्टी पर परस्पर मेल हो गया।"
(क) किस-किस के आँसुओं का मेल हो गया था?
बाबा भारती और डाकू खड्गसिंह — दोनों के आँसुओं का उस भूमि की मिट्टी पर मेल हो गया था।
(ख) दोनों के आँसुओं में क्या अंतर था?
खड्गसिंह के आँसू पश्चाताप और ग्लानि के आँसू थे — उसे अपने किए पर गहरा अफ़सोस था। वहीं बाबा भारती के आँसू खुशी और अपने प्रिय घोड़े सुलतान से फिर से मिलने की अपार प्रसन्नता के आँसू थे।
दिनचर्या
(क) कहानी के आधार पर बाबा भारती की दिनचर्या लिखिए।
(कल्पना-आधारित उत्तर है।) उदाहरण — बाबा भारती प्रातः जल्दी उठते, ठंडे जल से स्नान करते, भगवान का भजन-पूजन करते, फिर सुलतान को दाना खिलाते और उसकी देखभाल करते। दिन में मंदिर में भजन करते रहते, और संध्या के समय सुलतान पर सवार होकर आठ-दस मील घूमने जाते, जिसके बाद ही उन्हें चैन मिलता था।
(ख) अब आप अपनी दिनचर्या भी लिखिए।
(व्यक्तिगत उत्तर है।)
कहानी की रचना
(क) इस कहानी की कौन-कौन-सी बातें आपको पसंद आईं? अपने समूह में चर्चा कीजिए।
(व्यक्तिगत उत्तर है।) उदाहरण — मुझे बाबा भारती का घोड़े के प्रति सच्चा प्रेम, उनका निःस्वार्थ त्याग और उच्च विचार सबसे अधिक पसंद आए। साथ ही खड्गसिंह जैसे कठोर डाकू का हृदय-परिवर्तन भी बहुत प्रेरणादायक लगा।
(ख) इस कहानी में आए संवादों के विषय में अपने विचार लिखिए।
कहानी के संवाद बहुत छोटे, सजीव और स्वाभाविक हैं — जैसे "खड्गसिंह, क्या हाल है?" "आपकी दया है।" इन छोटे-छोटे संवादों से पात्रों के भाव और व्यक्तित्व स्पष्ट झलकते हैं, और कहानी में रोचकता व गति बनी रहती है। अच्छे संवाद कहानी को अधिक विश्वसनीय और प्रभावशाली बना देते हैं।
मुहावरे कहानी से
कहानी से चुनकर कुछ मुहावरे नीचे दिए गए हैं — लड्डू होना, हृदय पर साँप लोटना, फूले न समाना, मुँह मोड़ लेना, मुख खिल जाना, न्योछावर कर देना। इन्हें कहानी में खोजकर इनका प्रयोग समझिए, और फिर अपने मन से नए वाक्य बनाइए—
| मुहावरा | अर्थ और नया वाक्य |
|---|---|
| लड्डू होना (मन मोह लेना) | अर्थ: अत्यंत मोहित/प्रसन्न हो जाना। वाक्य: सुलतान की चाल देखकर खड्गसिंह का मन लड्डू हो गया। |
| हृदय पर साँप लोटना | अर्थ: ईर्ष्या या जलन होना। वाक्य: पड़ोसी की नई गाड़ी देखकर उसके हृदय पर साँप लोट गया। |
| फूले न समाना | अर्थ: अत्यधिक खुश होना। वाक्य: परीक्षा में प्रथम आने पर वह फूला न समाया। |
| मुँह मोड़ लेना | अर्थ: संबंध तोड़ लेना/उपेक्षा करना। वाक्य: संकट के समय सच्चे मित्र कभी मुँह नहीं मोड़ते। |
| मुख खिल जाना | अर्थ: प्रसन्न हो जाना। वाक्य: बच्चे को खिलौना मिलते ही उसका मुख खिल गया। |
| न्योछावर कर देना | अर्थ: किसी पर सब कुछ अर्पित कर देना। वाक्य: देश के सैनिक अपना जीवन देश पर न्योछावर कर देते हैं। |
कैसे-कैसे पात्र
इस कहानी में तीन मुख्य पात्र हैं — बाबा भारती, डाकू खड्गसिंह और सुलतान घोड़ा। इनके गुणों को बताने वाले शब्दों से दिए गए शब्द-चित्रों को पूरा कीजिए—
| पात्र | विशेषताएँ (गुण/स्वभाव) |
|---|---|
| बाबा भारती | दयालु, त्यागी, स्नेही, सरल-हृदय, करुणामय |
| डाकू खड्गसिंह | बाहुबली, निर्दयी (आरंभ में), बेबाक, पश्चातापी (अंत में) |
| सुलतान घोड़ा | सुंदर, बलवान, वफ़ादार, चंचल-चाल वाला |
सुलतान की कहानी
मन के भाव
(क) कहानी में से चुनकर कुछ भाव-शब्द दिए गए हैं — चकित, अधीर, डर, प्रसन्नता, करुणा, निराशा। बताइए, कहानी में कौन, कब, ऐसा अनुभव कर रहा था।
चकित — खड्गसिंह जब सुलतान की अद्भुत चाल देखकर हैरान रह गया, और बाबा भारती जब अपाहिज को घोड़ा दौड़ाते देखकर चकित रह गए। अधीर — खड्गसिंह जब सुलतान को देखने को व्याकुल था, और बाबा भारती जब घोड़े की प्रशंसा सुनने को अधीर हुए। डर — बाबा भारती को खड्गसिंह की धमकी के बाद रात-रात भर डर सताता रहा। प्रसन्नता — बाबा भारती जब सुलतान वापस मिलने पर आनंदित हो उठे। करुणा — बाबा भारती को अपाहिज (वास्तव में खड्गसिंह) की करुण पुकार सुनकर दया आई। निराशा — बाबा भारती को जब घोड़ा छिन गया, और फाटक पर पहुँचकर जब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ।
(ख) आप उपर्युक्त भावों को कब-कब अनुभव करते हैं? लिखिए।
(व्यक्तिगत उत्तर है।) उदाहरण — मुझे किसी सड़क पर घायल जानवर को देखकर करुणा का भाव आता है, अच्छे परिणाम की प्रतीक्षा में अधीरता होती है, और परीक्षा में अच्छे अंक आने पर प्रसन्नता होती है।
7झरोखे से — वह चली हवा
वह चली हवा
वह चली हवा,
वह चली हवा।
ना तू देखे
ना मैं देखूँ।
पर पत्तों ने तो देख लिया
वरना वे खुशी मनाते क्यों?
वह चली हवा,
वह चली हवा।
— सुदर्शन
साझी समझ — आपको इस कविता में क्या अच्छा लगा? आपस में चर्चा कीजिए और अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए।
(व्यक्तिगत उत्तर है।) उदाहरण — मुझे यह पंक्ति अच्छी लगी कि हवा को हम आँखों से नहीं देख सकते, फिर भी पत्तों के हिलने से हमें उसके होने का पता चल जाता है — यह कविता की एक सुंदर और सूक्ष्म कल्पना है।
8खोजबीन के लिए
9पाठ का सार — माइंड मैप
10अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'हार की जीत' कहानी के लेखक कौन हैं?
इस कहानी के लेखक सुदर्शन (वास्तविक नाम बदरीनाथ भट्ट, 1896–1983) हैं।
बाबा भारती के घोड़े का नाम क्या था?
बाबा भारती के घोड़े का नाम सुलतान था।
खड्गसिंह ने छल से घोड़ा कैसे छीना?
खड्गसिंह अपाहिज का भेष बनाकर पेड़ के नीचे कराहता हुआ पड़ा रहा, और बाबा भारती की दया का लाभ उठाकर घोड़े पर सवार होकर उसे लेकर भाग गया।
बाबा भारती ने खड्गसिंह से क्या प्रार्थना की?
उन्होंने घोड़ा वापस माँगने के बजाय केवल यह प्रार्थना की कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न किया जाए, ताकि लोगों का गरीबों पर से विश्वास न उठे।
कहानी का नाम 'हार की जीत' क्यों रखा गया है?
क्योंकि बाबा भारती अपना प्रिय घोड़ा भले ही हार गए (हार), परंतु उनकी सच्चाई और करुणा ने डाकू का हृदय बदल दिया और अंततः उन्हें घोड़ा वापस मिल गया — यही असली नैतिक जीत है।
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सुझाया गया शीर्षक: हार की जीत (सुदर्शन) — कक्षा 6 हिंदी मल्हार पाठ 4: भावार्थ, शब्दार्थ और संपूर्ण प्रश्नोत्तर
मेटा विवरण: कक्षा 6 मल्हार पाठ 4 'हार की जीत' का सरल भावार्थ, शब्द-संपदा, लेखक परिचय (सुदर्शन), मुहावरे और सभी पाठ्यपुस्तक प्रश्नों के हल — एक ही स्थान पर।
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