प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः — सरल अर्थ, व्याख्या और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 संस्कृत (दीपकम्)
कक्षा 8 की एनसीईआरटी संस्कृत पाठ्यपुस्तक ‘दीपकम्’ का चतुर्थ पाठ ‘प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः’ ओडिशा के महान समाजसेवी, शिक्षक और स्वतन्त्रता-सेनानी उत्कलमणि गोपबन्धु दास के जीवन और त्याग की प्रेरक कथा है। इस लेख में लेखक-परिचय, पाठ परिचय, मूल संवाद व श्लोक, हिंदी अनुवाद, शब्द-संपदा, पूर्वरूप सन्धि आदि व्याकरण, पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर तथा 75 अतिरिक्त प्रश्न (MCQ सहित) — सब कुछ एक ही जगह मिलेगा।
परिचय : उत्कलमणि गोपबन्धु दास
उत्कलमणिः गोपबन्धुदासः
जन्म : ९ अक्टूबर १८७७ — स्वर्गारोहण : १७ जून १९२८‘प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः’ पाठ ओडिशा के महान् समाजसेवक, शिक्षाविद्, पत्रकार, कवि और स्वतन्त्रता-सेनानी गोपबन्धु दास के जीवन पर आधारित है। वे अपनी अद्भुत सेवा-भावना और त्याग के कारण ‘उत्कलमणि’ (उत्कल की मणि) कहलाए।
पाठ का आरम्भ बाढ़-पीड़ितों की सहायता पर चर्चा करते शिक्षक और छात्रों के संवाद से होता है। फिर गोपबन्धु के जीवन के करुणा-भरे प्रसंग, उनके कार्य, रचनाएँ और उनकी प्रसिद्ध देश-भक्ति की पंक्तियाँ दी गई हैं।
- जन्म-स्थान सुआण्डो ग्राम, पुरी जनपद (साक्षीगोपाल के समीप), ओडिशा
- पिता / माता दैत्यारि दास / स्वर्णमयी देवी
- पत्नी मोती देवी
- शिक्षा एफ़्.ए. (१९००, रेवेन्सा महाविद्यालय, कटक); बी.एल्. (१९०६, कलकत्ता विश्वविद्यालय)
- प्रमुख संस्थाएँ सत्यवादी वनविद्यालय, दरिद्रनारायण सेवा-संघ, सत्यवादी मुद्रणालय, ‘समाज’ पत्र
- उपाधि उत्कलमणि (आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय द्वारा सम्मानित)
- पाठ्यपुस्तक दीपकम् (कक्षा 8, एनसीईआरटी संस्कृत)
जीवन-परिचय की कालरेखा (पाठ्यपुस्तक के अनुसार)
| वर्ष / तिथि | घटना |
|---|---|
| ९ अक्टूबर १८७७ | जन्म — सुआण्डो ग्राम, पुरी जनपद, ओडिशा |
| १९०० | एफ़्.ए. उत्तीर्ण — रेवेन्सा महाविद्यालय, कटक |
| १९०६ | बी.एल्. उत्तीर्ण — कलकत्ता विश्वविद्यालय |
| १९०९ | सत्यवादी वनविद्यालय की स्थापना |
| १९१७ | बिहार-ओडिशा व्यवस्थापिका सभा के सदस्य |
| १९१९ | ‘समाज’ साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन |
| १९२० | भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में योगदान |
| १९२४ | ‘उत्कलमणि’ उपाधि से सम्मान |
| १७ जून १९२८ | स्वर्गारोहण (साक्षीगोपाल में) |
पाठ परिचय
यह दीपकम् (कक्षा 8) का चतुर्थ पाठ है। शीर्षक ‘प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः’ का अर्थ है — “यह उदार-हृदय देशभक्त गोपबन्धु प्रणाम करने योग्य हैं।” यह पाठ गद्य-रूप का जीवन-चरित है, जिसमें संवाद, घटना-वर्णन और श्लोक — तीनों का सुन्दर मेल है।
ओडिशा में आई बाढ़ की चर्चा से आरम्भ होकर पाठ हमें बताता है कि गोपबन्धु ने भूखे भिखारी को अपना भोजन दे दिया, बाढ़-पीड़ितों की सेवा के लिए अपने मरणासन्न पुत्र तक को छोड़ दिया और जेल में रहकर भी साहित्य रचा। पाठ का सन्देश है — सेवा, त्याग और देशभक्ति।
पात्र-परिचय
| पात्र | भूमिका |
|---|---|
| आचार्य | सभागार में बाढ़-पीड़ितों की सहायता पर चर्चा कराने वाले शिक्षक; छात्रों को गोपबन्धु का परिचय देते हैं |
| हिमानि | छात्रा; ओडिशा के केन्द्रापड़ा जनपद की बाढ़ की सूचना देती है |
| अशोक | छात्र; बाढ़ से हुई हानि का विवरण बताता है |
| गोपबन्धु दास | पाठ के नायक; उत्कलमणि, महान् समाजसेवक और स्वतन्त्रता-सेनानी |
| आचार्य हरिहरदास | सत्यवादी वनविद्यालय के शिक्षक, जिन्होंने सभी अध्यापकों को भोजन पर बुलाया |
मूल पाठ
(क) प्रस्तावना-संवाद — जलप्लावपीडितानां साहाय्यार्थं चर्चा
(एकदा जलप्लावपीडितानां साहाय्यार्थं शिक्षकाः छात्राश्च सभागारे चर्चां कुर्वन्ति।)
आचार्यः — नमस्ते छात्राः! ह्यस्तनीं वार्तां श्रुतवन्तः किम्?
हिमानि — नमो नमः आचार्य! ओडिशा-राज्यस्य केन्द्रापडा-जनपदे महानद्यां भयङ्करः जलप्लावः सम्भूतः। जलप्लावेन तत्र महती हानिः सञ्जाता।
अशोकः — आम्, हिमानि! त्वं सत्यं वदसि। जलप्लावेन वासगृहाणि नष्टानि, केचित् अस्वस्थाः चिकित्सालये मृत्युना सह युध्यन्ते। अन्ये च अनाहारेण कष्टं सहन्ते। बहवः गृहपालिताः पशवोऽपि नदीस्रोतसा प्रवाहिताः मृताश्च।
छात्रः — महोदय! ते सम्प्रति अतिदुःखिताः भवेयुः खलु?
आचार्यः — सत्यम्, अशोक! ते सर्वे अतिदुःखेन जीवन्ति। अस्माभिः एतादृशानां दुःखितानां सहायता करणीया। यथा उत्कलमणिः गोपबन्धुः जलप्लावपीडितानाम् अकुण्ठं सेवां कृत्वा अद्यापि जनमानसेषु समादृतोऽस्ति।
छात्रः — महोदय! एषः गोपबन्धुः कः?
आचार्यः — भवन्तः सर्वे एतत् चित्रं पश्यन्तु। एषः अस्ति दीनबन्धुः गोपबन्धुः। सम्प्रति वयं तस्य विषये जानीमः।
(ख) भोजन-प्रसंग — भूखे भिक्षुक को अपना भोजन
एकदा आचार्यहरिहरदासः सत्यवादि-वनविद्यालयस्य सर्वान् अध्यापकान् भोजनाय आमन्त्रितवान्। आमन्त्रिताः सर्वे अतिथयः हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः। बहूनि सुस्वादूनि व्यञ्जनानि कदलीपत्रेषु परिवेषितानि। हसन् गोपबन्धुः अवदत् — अरे!
एतच्छ्रुत्वा सर्वे उच्चैः हसितवन्तः। तदानीमेव बहिः कश्चन करुणध्वनिः गोपबन्धोः कर्णयोः अगुञ्जत् —
“मातः, मातः! बुभुक्षितोऽस्मि, कृपया किञ्चित् भोजनं देहि। दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम्। भोजनं देहि मातः! भोजनं देहि। आँ आँ...” इति क्रन्दनध्वनिं श्रुत्वैव दयाविगलितहृदयः गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्। किमपि अविचिन्त्य झटिति स्वस्मै परिवेषितं भोजनं हस्ते गृहीत्वा बहिरागतवान्। भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्।
(ग) गोपबन्धु का जीवन-परिचय
असौ महान् समाजसेवकः आसीत् गोपबन्धुदासः। असौ सत्यवादि-वनविद्यालयस्य अध्यापकः, प्रसिद्धेषु पञ्चमित्रेषु अन्यतमः स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी चासीत्। ओडिशाराज्यस्य पुरीजनपदस्य साक्षीगोपालसमीपे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान्। अध्ययनकालादेव स दरिद्राणां रोगिणां च सेवामकरोत्। सत्यवादि-वनविद्यालये स छात्रान् निःशुल्कम् अपाठयत्। निरक्षरतादूरीकरणाय सः सततं यतते स्म। कार्पासवस्त्रनिर्माणाय सः स्वयमेव सूत्रप्रस्तुतिमकरोत्। जन्मभूमेः दुर्दशामवलोक्य स सर्वदा चिन्ताकुलो भवति स्म। महात्मगान्धेः प्रेरणया भारतीयस्वतन्त्रतान्दोलने गोपबन्धुः भागं गृहीतवान्। सः वर्षद्वयं यावत् कारावासं प्राप्तवान्।
कारागारे निवसन् सः ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’, ‘नचिकेता-उपाख्यान’ इत्यादीनि बहुप्रेरणादायीनि पुस्तकानि ओडिआभाषया विरचितवान्। सर्वदा स्वदेशस्यैव वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान्। मरणासन्नं स्वपुत्रमपि विहाय जलप्लावपीडितान् भारतमातुः सहस्रशः पुत्रान् उद्धर्तुं गृहात् बहिः निर्गतः समाजमसेवत च। देशसेवातत्परस्य गोपबन्धोः यस्य प्रसिद्धं प्रेरणादायकं वचनमधुनापि जनमानसेषु राष्ट्रभक्तिं जागरयति।
(घ) गोपबन्धु की प्रसिद्ध देशभक्ति-पंक्तियाँ
भावार्थः — स्वदेशस्य भूमिभागे मम शरीरं विलीनं भवतु। देशवासिनः मम अनुसरणं कुर्वन्तु। देशस्य स्वतन्त्रतानिमित्तं यत्र यत्र प्रतिबन्धकाः गर्ताः सन्ति, ते सर्वे गर्ताः मम अस्थिभिः मांसैश्च परिपूर्णाः भवन्तु।
(ङ) संस्थाएँ, ‘समाज’ पत्र और उपाधि
असौ सत्यवादि-वनविद्यालयस्य, दरिद्रनारायणसेवा-सङ्घस्य, सत्यवादि-मुद्रणालयस्य, समाजः इति दैनिक-वार्तापत्रस्य च प्रतिष्ठाता आसीत्। समाजः इति दिनपत्रिका शताधिकवर्षेभ्यः अधुनापि प्रतिदिनं प्रकाश्यते। समाजसेवायै देशसेवायै च तस्य असीमं त्यागमनुभवन् वैज्ञानिकः आचार्यः प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान्।
सरल व्याख्या (हिंदी अनुवाद व भावार्थ)
(क) प्रस्तावना-संवाद का हिंदी अनुवाद
(एक बार बाढ़-पीड़ितों की सहायता के लिए शिक्षक और छात्र सभागार में चर्चा कर रहे हैं।)
आचार्य — नमस्ते छात्रो! क्या तुमने कल की खबर सुनी?
हिमानि — आचार्य जी, नमस्कार! ओडिशा राज्य के केन्द्रापड़ा जनपद में महानदी में भयंकर बाढ़ आई है। बाढ़ से वहाँ बहुत बड़ी हानि हुई है।
अशोक — हाँ हिमानि! तुम सच कहती हो। बाढ़ से घर नष्ट हो गए, कुछ बीमार लोग अस्पताल में मृत्यु से संघर्ष कर रहे हैं। दूसरे लोग भोजन के अभाव में कष्ट सह रहे हैं। पालतू पशु भी नदी की धारा में बह गए और मर गए।
छात्र — महोदय! वे लोग इस समय बहुत दुःखी होंगे न?
आचार्य — सच है अशोक! वे सब अत्यन्त दुःख में जी रहे हैं। हमें ऐसे दुःखी लोगों की सहायता करनी चाहिए, जैसे उत्कलमणि गोपबन्धु ने बाढ़-पीड़ितों की निःसंकोच सेवा करके आज भी लोगों के मन में सम्मान पाया है।
छात्र — महोदय! ये गोपबन्धु कौन हैं?
आचार्य — आप सब यह चित्र देखिए। ये दीनों के बन्धु गोपबन्धु हैं। अब हम उनके विषय में जानते हैं।
(ख) भोजन-प्रसंग का हिंदी अनुवाद
एक बार आचार्य हरिहरदास ने सत्यवादी वनविद्यालय के सभी अध्यापकों को भोजन के लिए आमन्त्रित किया। आमन्त्रित सभी अतिथि हाथ-पैर धोकर आसनों पर बैठ गए। केले के पत्तों पर बहुत-से स्वादिष्ट व्यंजन परोसे गए। तब हँसते हुए गोपबन्धु ने कहा — “अरे!
भोजनस्यातिदौर्लभ्यं जीवनाय सुखप्रदम्। तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु॥” (भोजन अत्यन्त दुर्लभ है और जीवन के लिए सुख देने वाला है; इसलिए भोजन करो, शरीर पर दया (संकोच) मत करो।)
यह सुनकर सब ऊँची आवाज़ में हँस पड़े। तभी बाहर से कोई करुण-ध्वनि गोपबन्धु के कानों में गूँजी — “माँ, माँ! मैं भूखा हूँ, कृपया कुछ भोजन दीजिए। तीन दिन से कुछ नहीं खाया। माँ, भोजन दो! भोजन दो! आँ आँ...”। यह रोने की आवाज़ सुनते ही दया से पिघले हृदय वाले गोपबन्धु की आँखें आँसुओं से भर गईं। बिना कुछ सोचे उन्होंने तुरन्त अपने लिए परोसा हुआ भोजन हाथ में उठाया, बाहर आए और उस भिखारी को खिला दिया।
(ग) जीवन-परिचय का हिंदी अनुवाद
ये गोपबन्धुदास एक महान् समाजसेवक थे। वे सत्यवादी वनविद्यालय के अध्यापक, प्रसिद्ध पाँच मित्रों में से एक और स्वतन्त्रता-सेनानी थे। उनका जन्म ओडिशा राज्य के पुरी जनपद में साक्षीगोपाल के समीप सुआण्डो नामक गाँव में हुआ। विद्यार्थी-जीवन से ही वे गरीबों और रोगियों की सेवा करते थे। सत्यवादी वनविद्यालय में वे छात्रों को निःशुल्क पढ़ाते थे। निरक्षरता दूर करने के लिए वे निरन्तर प्रयत्न करते रहे। कपास के वस्त्र बनाने के लिए उन्होंने स्वयं सूत तैयार किया। जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर वे सदा चिन्ता से व्याकुल रहते थे। महात्मा गांधी की प्रेरणा से उन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता-आन्दोलन में भाग लिया और दो वर्ष तक कारावास पाया।
जेल में रहते हुए उन्होंने ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’, ‘नचिकेता-उपाख्यान’ आदि अनेक प्रेरणादायक पुस्तकें ओड़िआ भाषा में लिखीं। वे सदा अपने देश के ही वस्त्रों और वस्तुओं का उपयोग करते थे। मरणासन्न अपने पुत्र को भी छोड़कर वे भारतमाता के हज़ारों पुत्रों (बाढ़-पीड़ितों) को बचाने के लिए घर से बाहर निकले और समाज की सेवा की। देश-सेवा में तत्पर गोपबन्धु का प्रसिद्ध, प्रेरणादायक वचन आज भी लोगों के मन में राष्ट्र-भक्ति जगाता है।
देशभक्ति-श्लोक का पदार्थ और भावार्थ
श्लोक — “स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः”
स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु।
स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका,
ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा॥
पदच्छेद — स्वदेशभूमौ मम लीयताम् तनुः, स्वदेशलोकाः तदनु प्रयान्तु नु। स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका, मम अस्थिमांसैः परिपूरिता अस्तु सा।
भावार्थ — मेरा शरीर मेरी स्वदेश की भूमि में ही विलीन हो जाए और मेरे देशवासी मेरे पीछे-पीछे चलें। स्वराज्य के मार्ग में यदि गड्ढों की कतार हो, तो वह मेरी हड्डियों और मांस से भर जाए — अर्थात् मैं अपना शरीर तक बलिदान कर दूँ ताकि देशवासी बिना बाधा के स्वतन्त्रता के मार्ग पर बढ़ सकें।
(घ) संस्थाएँ और उपाधि — हिंदी अनुवाद
गोपबन्धु सत्यवादी वनविद्यालय, दरिद्रनारायण सेवा-संघ, सत्यवादी मुद्रणालय और ‘समाज’ नामक दैनिक समाचार-पत्र के संस्थापक थे। ‘समाज’ पत्रिका सौ से अधिक वर्षों से आज भी प्रतिदिन प्रकाशित होती है। समाज-सेवा और देश-सेवा के लिए उनके असीम त्याग को देखकर वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने उन्हें ‘उत्कलमणि’ की उपाधि से सम्मानित किया।
अन्तिम श्लोक — “उत्कलमणि नाम से प्रसिद्ध, लोकसेवक ये गोपबन्धु महान् हृदय वाले देशभक्त हैं, अतः प्रणाम करने योग्य हैं।”
योग्यताविस्तर श्लोक : भोजन के विषय में
श्लोक — “भोजनस्यातिदौर्लभ्यम्”
तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु॥
पदच्छेद — भोजनस्य अतिदौर्लभ्यम् जीवनाय सुखप्रदम् तदर्थम् भोजनम् कुर्याः मा शरीरे दयाम् कुरु।
अन्वय — भोजनस्य अतिदौर्लभ्यं (विद्यते)। जीवनाय सुखप्रदं भोजनं कुर्याः। तदर्थं शरीरे दयां मा कुरु।
भावार्थ — भोजन बहुत दुर्लभ (कठिनाई से प्राप्त) होता है। जीवन को आगे बढ़ाने के लिए सुख देने वाला भोजन करना चाहिए। इसलिए शरीर की आवश्यकता पर विचार कर भोजन के विषय में कभी संकोच या लज्जा नहीं करनी चाहिए।
शब्द-संपदा (शब्दार्थ)
| शब्दः | संस्कृत अर्थः | हिन्दी अर्थ | English |
|---|---|---|---|
| जलप्लावपीडितानाम् | बाढेन दुःखितानाम् | बाढ़ से पीड़ित लोगों का | Of the flood-stricken |
| नष्टानि | विनष्टानि | नष्ट हुए | Destroyed |
| अनाहारेण | आहारं विना | बिना भोजन के | Without food |
| नदीस्रोतसा | नद्याः प्रवाहेण | नदी की धारा से | By the river current |
| अकुण्ठम् | निःसङ्कोचम् | बिना संकोच के | Without hesitation |
| समादृतः | सम्मानितः | आदर पाया हुआ | Honoured |
| सुस्वादूनि | उत्तमरसयुक्तानि | स्वादिष्ट | Tasty |
| व्यञ्जनानि | भोज्यपदार्थाः | पकवान, भोजन-सामग्री | Dishes |
| दौर्लभ्यम् | दुर्लभता | दुर्लभता, कठिनाई से मिलना | Scarcity / rarity |
| निःशुल्कम् | शुल्करहितम् | बिना शुल्क का, मुफ़्त | Free of charge |
| करुणध्वनिः | दयाजनकः शब्दः | करुण पुकार | Pitiful cry |
| अगुञ्जत् | अनादयत् | गूँजा | Echoed |
| बुभुक्षितः | क्षुधार्तः | भूखा | Hungry |
| दयाविगलितहृदयः | दयया द्रवितमनाः | दया से पिघले हृदय वाला | Melted with compassion |
| अश्रुपूर्णनयनः | अश्रुभिः पूर्णे नयने यस्य सः | आँसुओं से भरी आँखों वाला | With tear-filled eyes |
| परिवेषितम् | भोजनार्थं प्रदत्तम् | परोसा गया | Served |
| पञ्चमित्रेषु | पञ्चसु सुहृत्सु | पाँच मित्रों में | Among five friends |
| स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी | स्वतन्त्रतायै युद्धकर्ता | स्वतंत्रता-सेनानी | Freedom fighter |
| जन्म लब्धवान् | जातः | जन्म लिया | Was born |
| कारावासम् | बन्धनगृहे वासम् | जेल का निवास | Imprisonment |
| चिन्ताकुलः | चिन्तया व्याकुलः | चिंता से व्याकुल | Anxious |
| देशसेवातत्परस्य | देशसेवायां रतस्य | देश-सेवा में लगे हुए का | Of one devoted to serving the nation |
| सहस्रशः | सहस्रं सहस्रम् | हज़ारों | By the thousands |
| लीयताम् | विलीनं भवतु | विलीन हो जाए | May (it) merge |
| प्रयान्तु | अनुगच्छन्तु | चलें, अनुसरण करें | May they proceed |
| गर्तमालिका | गर्तानां पङ्क्तिः | गड्ढों की पंक्ति | Series of pits |
| अस्थिमांसैः | अस्थिभिः मांसैश्च | हड्डियों और मांस से | With bones and flesh |
| परिपूरिता | सम्पूर्णा | पूरी तरह भरी हुई | Filled up |
| दैनिकवार्तापत्रस्य | प्रतिदिनं प्रकाश्यमानस्य समाचारपत्रस्य | दैनिक समाचार-पत्र का | Of the daily newspaper |
| प्रतिष्ठाता | स्थापकः | स्थापना करने वाला | Founder |
| असीमम् | सीमारहितम् | असीम, बहुत अधिक | Boundless |
| उत्कलमणिः | उत्कलस्य मणिः | उत्कल (ओडिशा) का रत्न | Jewel of Utkal |
| सम्मानितवान् | सत्कृतवान् | सम्मान दिया | Honoured |
| लोकसेवकः | जनसेवकः | जनता का सेवक | Servant of the people |
| महामनाः | उदारचित्तः | महान मन वाला | Noble-minded |
भाषा-विशेष : पूर्वरूप सन्धि, क्तवतु प्रत्यय, समास और विलोम शब्द
1. पूर्वरूप सन्धि के उदाहरण
| सन्धि-विच्छेद | सन्धि-युक्त पद | नियम |
|---|---|---|
| देशभक्तो + अयम् | देशभक्तोऽयम् | ओ + अ = ओऽ |
| सर्वे + अपि | सर्वेऽपि | ए + अ = एऽ |
| पशवो + अपि | पशवोऽपि | ओ + अ = ओऽ |
| बुभुक्षितो + अस्मि | बुभुक्षितोऽस्मि | ओ + अ = ओऽ |
| अश्रुपूर्णनयनो + अभवत् | अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् | ओ + अ = ओऽ |
2. पाठ से अन्य सन्धि-विच्छेद
| पद | सन्धि-विच्छेद | सन्धि का नाम |
|---|---|---|
| प्रणम्यो देशभक्तः | प्रणम्यः + देशभक्तः | विसर्ग-सन्धि (अः को ओ) |
| गोपबन्धुर्महामनाः | गोपबन्धुः + महामनाः | विसर्ग-सन्धि (विसर्ग को र्) |
| भोजनस्यातिदौर्लभ्यम् | भोजनस्य + अतिदौर्लभ्यम् | दीर्घ सन्धि (अ + अ = आ) |
| ममास्थिमांसैः | मम + अस्थिमांसैः | दीर्घ सन्धि (अ + अ = आ) |
| परिपूरितास्तु | परिपूरिता + अस्तु | दीर्घ सन्धि (आ + अ = आ) |
| स्वदेशलोकास्तदनु | स्वदेशलोकाः + तदनु | विसर्ग-सन्धि (विसर्ग को स्) |
| उत्कलमणिरित्याख्यः | उत्कलमणिः + इति + आख्यः | विसर्ग को र् तथा यण् सन्धि |
| देशभक्तोऽयम् | देशभक्तः + अयम् | विसर्ग को ओ, फिर पूर्वरूप |
3. क्तवतु प्रत्यय : पुंलिंग से स्त्रीलिंग
भूतकाल में कर्ता के लिंग के अनुसार क्रिया बदलती है। पुंलिंग एकवचन में -वान् वाला रूप स्त्रीलिंग में -वती हो जाता है। बहुवचन में पुंलिंग ‘-वन्तः’ का स्त्रीलिंग रूप ‘-वत्यः’ बनता है।
| पुंलिंग | स्त्रीलिंग | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| गतवान् | गतवती | गया / गई |
| प्राप्तवान् | प्राप्तवती | पाया / पाई |
| उपविष्टवान् | उपविष्टवती | बैठा / बैठी |
| भुक्तवान् | भुक्तवती | खाया / खाई |
| कृतवान् | कृतवती | किया / की |
| गृहीतवान् | गृहीतवती | लिया / ली |
| दत्तवान् | दत्तवती | दिया / दी |
| उपविष्टवन्तः | उपविष्टवत्यः | (बहुवचन) बैठे / बैठीं |
4. समास-विग्रह
| समस्त पद | विग्रह | समास |
|---|---|---|
| देशभक्तः | देशस्य भक्तः | षष्ठी तत्पुरुष |
| लोकसेवकः | लोकस्य सेवकः | षष्ठी तत्पुरुष |
| उत्कलमणिः | उत्कलस्य मणिः | षष्ठी तत्पुरुष |
| गर्तमालिका | गर्तानां मालिका | षष्ठी तत्पुरुष |
| जलप्लावपीडितः | जलप्लावेन पीडितः | तृतीया तत्पुरुष |
| कारावासः | कारायां वासः | सप्तमी तत्पुरुष |
| अनाहारः | न आहारः | नञ् तत्पुरुष |
| अश्रुपूर्णनयनः | अश्रुभिः पूर्णे नयने यस्य सः | बहुव्रीहि |
| दयाविगलितहृदयः | दयया विगलितं हृदयं यस्य सः | बहुव्रीहि |
| महामनाः | महत् मनः यस्य सः | बहुव्रीहि |
| अस्थिमांसैः | अस्थीनि च मांसानि च तैः | द्वन्द्व |
5. क्रियापद-परिचय
| क्रियापद | धातु | लकार / रूप | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|---|
| अगुञ्जत् | गुञ्ज् | लङ् (भूतकाल), प्रथम पुरुष, एकवचन | गूँजा |
| अभवत् | भू | लङ्, प्रथम पुरुष, एकवचन | हुआ |
| अकरोत् | कृ | लङ्, प्रथम पुरुष, एकवचन | किया |
| आसीत् | अस् | लङ्, प्रथम पुरुष, एकवचन | था |
| प्रयान्तु | प्र + या | लोट्, प्रथम पुरुष, बहुवचन | चलें (अनुसरण करें) |
| लीयताम् | ली | लोट्, प्रथम पुरुष, एकवचन (आत्मनेपद) | विलीन हो जाए |
| अस्तु | अस् | लोट्, प्रथम पुरुष, एकवचन | हो |
6. विलोम शब्द
| शब्द | विलोम | शब्द | विलोम |
|---|---|---|---|
| दौर्लभ्यम् | सौलभ्यम् | स्वतन्त्रता | परतन्त्रता |
| बुभुक्षितः | तृप्तः | निःशुल्कम् | सशुल्कम् |
| सुस्वादूनि | दुःस्वादूनि | असीमम् | ससीमम् |
| दयालुः | निर्दयः | जीवनम् | मरणम् |
| अनाहारेण | आहारेण | देशभक्तः | देशद्रोही |
पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
- (क) समाज-दिनपत्रिकायाः प्रतिष्ठाता कः?
गोपबन्धुः। - (ख) गोपबन्धुः कस्मै स्वभोजनं दत्तवान्?
भिक्षुकाय। - (ग) मरणासन्नः कः आसीत्?
गोपबन्धोः पुत्रः। - (घ) गोपबन्धुः केन उपाधिना सम्मानितः अभवत्?
उत्कलमणिः। - (ङ) गोपबन्धुः कति वर्षाणि कारावासं प्राप्तवान्?
वर्षद्वयम् (दो वर्ष)।
- (क) गोपबन्धुः किमर्थम् अश्रुपूर्णनयनः अभवत्?
भिक्षुकस्य करुणं क्रन्दनं श्रुत्वा (सः त्रीणि दिनानि बुभुक्षितः अस्ति इति ज्ञात्वा) गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनः अभवत्। - (ख) कीदृशं पुत्रं विहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत्?
मरणासन्नं पुत्रं विहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत्। - (ग) गोपबन्धोः कृते उत्कलमणिः इति उपाधिः किमर्थं प्रदत्तः?
देशसेवायै त्यागाय च आचार्यप्रफुल्लचन्द्ररायेण गोपबन्धोः कृते उत्कलमणिः इति उपाधिः प्रदत्तः। - (घ) गोपबन्धुः कुत्र जन्म लब्धवान्?
गोपबन्धुः साक्षीगोपालस्य समीपे पुरीजनपदे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान्। - (ङ) गोपबन्धुः सर्वदा केषाम् उपयोगं कृतवान्?
गोपबन्धुः सर्वदा स्वदेशीयवस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान्।
(सेवाम्, सुस्वादूनि, सहायताम्, स्वदेशवस्त्राणि, अन्यतमः) — आदर्श वाक्य :
- (क) सेवाम्
गोपबन्धुः देशस्य जनानां च सेवाम् अकरोत्। - (ख) सुस्वादूनि
गृहे माता सुस्वादूनि व्यञ्जनानि रचयति। - (ग) सहायताम्
गोपबन्धुः जलप्लावपीडितेभ्यः सहायताम् अकरोत्। - (घ) स्वदेशवस्त्राणि
सः सर्वदा स्वदेशवस्त्राणि धारयति स्म। - (ङ) अन्यतमः
गोपबन्धुः स्वतन्त्रतासङ्ग्रामिषु अन्यतमः आसीत्।
पाठ्यपुस्तक का चित्र चिकित्सालयः (अस्पताल) से जुड़ा है। चित्र देखकर उत्तर अलग-अलग हो सकते हैं। आदर्श उत्तर :
- (क) इदं चिकित्सालयस्य चित्रम् अस्ति।
यह अस्पताल का चित्र है। - (ख) अत्र चिकित्सकः रोगिणं परीक्षते।
यहाँ चिकित्सक रोगी की जाँच करता है। - (ग) रोगी शय्यायां शेते।
रोगी बिस्तर पर लेटा है। - (घ) परिचारिका रोगिणे औषधं ददाति।
नर्स रोगी को दवा देती है। - (ङ) चिकित्सालये रोगिणां सेवा भवति।
अस्पताल में रोगियों की सेवा होती है।
- (क) ............ मम लीयतां तनुः
स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः - (ख) उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो ............
उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो लोकसेवकः - (ग) स्वदेशलोकास्तदनु ............ नु
स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु - (घ) स्वराज्यमार्गे यदि ............
स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका - (ङ) ............ परिपूरितास्तु सा
ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा
यथा — गतवान् → गतवती
- (क) प्राप्तवान्
प्राप्तवती - (ख) उपविष्टवान्
उपविष्टवती - (ग) भुक्तवान्
भुक्तवती - (घ) कृतवान्
कृतवती - (ङ) गृहीतवान्
गृहीतवती
(अ) स्तम्भ को (इ) स्तम्भ से मिलाइए —
- १. समाजः
→ दिनपत्रिका - २. ममास्थिमांसैः
→ परिपूरितास्तु - ३. उत्कलमणिः
→ गोपबन्धुः - ४. आँ आँ इति
→ क्रन्दनध्वनिः - ५. सुस्वादूनि
→ व्यञ्जनानि
सही क्रम : (घ) → (ङ) → (ग) → (क) → (ख)
- १. (घ)
अतिथयो हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः। - २. (ङ)
दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम्। - ३. (ग)
गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्। - ४. (क)
भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्। - ५. (ख)
प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान्।
योग्यताविस्तर और परियोजना-कार्य
सुझाव : अपने राज्य के स्वतंत्रता-सेनानियों की सूची बनाइए। एक सेनानी चुनकर नीचे के ढाँचे के अनुसार चित्र सहित जीवन-परिचय लिखिए (उदाहरण में गोपबन्धु दास लिए गए हैं) —
- नाम / उपाधि
गोपबन्धु दास / उत्कलमणिः - जन्म और स्थान
९ अक्टूबर १८७७, सुआण्डो ग्राम, पुरी (ओडिशा) - शिक्षा
एफ़.ए. (१९००), बी.एल. (१९०६) - प्रमुख कार्य
सत्यवादी वनविद्यालय (१९०९), ‘समाज’ पत्र, दरिद्रनारायण सेवा-संघ, बाढ़-पीड़ितों की सेवा - त्याग / कारावास
देश-सेवा के लिए मरणासन्न पुत्र को छोड़ा, दो वर्ष कारावास - सम्मान और निधन
१९२४ में ‘उत्कलमणि’ उपाधि; १७ जून १९२८ को स्वर्गारोहण
आदर्श कार्य-योजना :
- १. सूचना और टीम बनाना
प्रभावित क्षेत्र की जानकारी लेकर विद्यार्थियों और स्वयंसेवकों की टोली बनाएँ। - २. सामग्री का संग्रह
सूखा राशन, पीने का पानी, कपड़े, कम्बल, दवाइयाँ और स्वच्छता-सामग्री एकत्र करें। - ३. सुरक्षित वितरण
स्थानीय प्रशासन और संस्थाओं की सहायता से ज़रूरतमंद परिवारों तक सामग्री पहुँचाएँ। - ४. स्वास्थ्य और शिविर
चिकित्सा-शिविर, स्वच्छ जल और सफ़ाई की व्यवस्था में सहयोग दें। - ५. पुनर्वास में सहयोग
बाढ़ के बाद बच्चों की पढ़ाई और परिवारों के घर-रोज़गार की वापसी में मदद करें।
अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न
(अ) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
- ‘प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः’ दीपकम् कक्षा ८ का कौन-सा पाठ है?
- (क) प्रथम पाठ
- (ख) द्वितीय पाठ
- (ग) तृतीय पाठ
- (घ) चतुर्थ पाठ ✓
- पाठ के आरम्भ में सभागार में किस विषय पर चर्चा होती है?
- (क) खेल-प्रतियोगिता
- (ख) बाढ़-पीड़ितों की सहायता ✓
- (ग) वार्षिकोत्सव
- (घ) परीक्षा-परिणाम
- पाठ में भयंकर बाढ़ किस जनपद में आई बताई गई है?
- (क) पुरी
- (ख) कटक
- (ग) केन्द्रापडा ✓
- (घ) बालेश्वर
- केन्द्रापडा-जनपद में किस नदी में बाढ़ आई?
- (क) महानदी ✓
- (ख) गंगा
- (ग) यमुना
- (घ) कावेरी
- कल की बाढ़-सम्बन्धी वार्ता आचार्य को किस छात्रा ने बताई?
- (क) अशोक
- (ख) हिमानि ✓
- (ग) गोपबन्धु
- (घ) हरिहरदास
- ‘पशवोऽपि नदीस्रोतसा प्रवाहिताः’ का अर्थ है —
- (क) पशु भी नदी की धारा में बह गए ✓
- (ख) पशु नदी पार कर गए
- (ग) पशु भूखे रहे
- (घ) पशु घर लौट आए
- ‘दीनबन्धुः’ किसे कहा गया है?
- (क) आचार्य हरिहरदास को
- (ख) अशोक को
- (ग) गोपबन्धु दास को ✓
- (घ) प्रफुल्लचन्द्र राय को
- गोपबन्धु दास का जन्म कब हुआ?
- (क) १७ जून १८७७
- (ख) १२ अगस्त १९०९
- (ग) ९ अक्टूबर १९०० ई.
- (घ) ९ अक्टूबर १८७७ ✓
- गोपबन्धु दास का जन्म किस ग्राम में हुआ?
- (क) सुआण्डो-ग्राम ✓
- (ख) कटक
- (ग) साक्षीगोपाल-नगर
- (घ) केन्द्रापडा
- गोपबन्धु ने बी.एल. की परीक्षा कब उत्तीर्ण की?
- (क) १९००
- (ख) १९०९
- (ग) १९०६ ✓
- (घ) १९२४
- सत्यवादी वनविद्यालय की स्थापना किस वर्ष हुई?
- (क) १९००
- (ख) १९०९ ✓
- (ग) १९१७
- (घ) १९१९
- भोजन के लिए सत्यवादी वनविद्यालय के सभी अध्यापकों को किसने आमन्त्रित किया?
- (क) प्रफुल्लचन्द्र राय ने
- (ख) नीलकण्ठ दास ने
- (ग) गोपबन्धु ने
- (घ) आचार्य हरिहरदास ने ✓
- भोजन किन पर परोसा गया था?
- (क) कदलीपत्रों (केले के पत्तों) पर ✓
- (ख) थालियों में
- (ग) मिट्टी के पात्रों में
- (घ) पलाश-पत्रों पर
- ‘भोजनस्यातिदौर्लभ्यं जीवनाय सुखप्रदम्’ श्लोक का मुख्य भाव है —
- (क) भोजन व्यर्थ है
- (ख) केवल स्वाद देखें
- (ग) भोजन दुर्लभ है, अतः उसे संकोच के बिना ग्रहण करें ✓
- (घ) भोजन कम खाएँ
- भिक्षुक कितने दिनों से भूखा था?
- (क) एक दिन
- (ख) तीन दिन ✓
- (ग) पाँच दिन
- (घ) सात दिन
- गोपबन्धु ने भिक्षुक को क्या दिया?
- (क) धन
- (ख) वस्त्र
- (ग) कम्बल
- (घ) अपने भाग का परोसा हुआ भोजन ✓
- ‘अश्रुपूर्णनयनः’ का अर्थ है —
- (क) आँसुओं से भरी आँखों वाला ✓
- (ख) हँसता हुआ
- (ग) क्रोधित
- (घ) सोया हुआ
- गोपबन्धु कितने वर्ष कारावास में रहे?
- (क) एक वर्ष
- (ख) तीन वर्ष
- (ग) दो वर्ष ✓
- (घ) पाँच वर्ष
- कारागार में गोपबन्धु ने पुस्तकें किस भाषा में रचीं?
- (क) संस्कृत
- (ख) ओडिआ (उड़िया) ✓
- (ग) हिन्दी
- (घ) अंग्रेज़ी
- भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने की प्रेरणा गोपबन्धु को किससे मिली?
- (क) सुभाषचन्द्र बोस
- (ख) लाला लाजपत राय
- (ग) सरदार पटेल
- (घ) महात्मा गान्धी ✓
- ‘उत्कलमणि’ का अर्थ है —
- (क) उत्कल (ओडिशा) का रत्न ✓
- (ख) उत्कल का राजा
- (ग) उत्कल का नगर
- (घ) उत्कल की नदी
- ‘समाज’ दैनिक पत्र के विषय में पाठ के अनुसार सही कथन कौन-सा है?
- (क) यह बन्द हो चुका है
- (ख) यह साप्ताहिक ही रहा
- (ग) सौ से अधिक वर्षों से आज भी प्रतिदिन प्रकाशित होता है ✓
- (घ) यह केवल हिन्दी में छपता है
- ‘स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः’ में ‘तनुः’ का अर्थ है —
- (क) धन
- (ख) शरीर ✓
- (ग) मन
- (घ) यश
- ‘देशभक्तोऽयम्’ का सन्धि-विच्छेद है —
- (क) देशभक्तः + आयम्
- (ख) देशभक्तो + आयम्
- (ग) देशभक्तः + अयम्
- (घ) देशभक्तो + अयम् ✓
- ‘गतवान्’ का स्त्रीलिंग रूप है —
- (क) गतवती ✓
- (ख) गतवान्ती
- (ग) गता
- (घ) गतवन्तः
(ब) अति लघु उत्तरीय प्रश्न
- 1. गोपबन्धु दास का जन्म कब हुआ?
९ अक्टूबर १८७७ को। - 2. गोपबन्धु दास का जन्म-स्थान कौन-सा है?
ओडिशा के पुरी जनपद में साक्षीगोपाल के समीप सुआण्डो ग्राम। - 3. गोपबन्धु के माता-पिता के नाम लिखिए।
माता स्वर्णमयी देवी और पिता दैत्यारिदास। - 4. गोपबन्धु की पत्नी का नाम क्या था?
मोती देवी। - 5. गोपबन्धु को कौन-सी उपाधि मिली?
उत्कलमणि। - 6. उत्कलमणि की उपाधि किसने दी?
वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने। - 7. सत्यवादी वनविद्यालय कहाँ स्थापित हुआ?
साक्षीगोपाल (ओडिशा) में, १९०९ ई. में। - 8. सत्यवादी वनविद्यालय को पाठ्यपुस्तक में कौन-सा विशेष स्थान दिया गया है?
भारत का पहला मुक्त (निःशुल्क) विद्यालय। - 9. गोपबन्धु को कितने वर्ष का कारावास मिला?
दो वर्ष का। - 10. कारागार में लिखी गई गोपबन्धु की कोई दो पुस्तकें बताइए।
‘बन्दीर आत्मकथा’ और ‘कारा-कविता’। - 11. भोजन के लिए अध्यापकों को किसने आमन्त्रित किया?
आचार्य हरिहरदास ने। - 12. भोजन किस चीज़ पर परोसा गया था?
केले के पत्तों (कदलीपत्रों) पर। - 13. भिक्षुक ने गोपबन्धु से क्या माँगा?
भोजन। वह बोला — ‘भोजनं देहि मातः’। - 14. भिक्षुक कितने दिनों से भूखा था?
तीन दिनों से। - 15. देश-सेवा के लिए गोपबन्धु ने किसे छोड़ दिया?
अपने मरणासन्न पुत्र को। - 16. पाठ में बाढ़ किस जनपद में आई थी?
ओडिशा के केन्द्रापडा-जनपद में, महानदी में। - 17. पूर्वरूप सन्धि में ‘अ’ के स्थान पर कौन-सा चिह्न लगता है?
अवग्रह-चिह्न (ऽ)। - 18. ‘बुभुक्षितः’ का अर्थ लिखिए।
भूखा (क्षुधार्त)। - 19. ‘समाज’ किस प्रकार का पत्र है?
दैनिक समाचार-पत्र (दिनपत्रिका)। - 20. ‘दीनबन्धुः’ किसे कहा गया है?
गोपबन्धु दास को।
(स) लघु उत्तरीय प्रश्न
- 1. पाठ के आरम्भ में सभागार में किस विषय पर चर्चा हो रही है?
शिक्षक और छात्र ओडिशा के केन्द्रापडा-जनपद में महानदी की बाढ़ से पीड़ित लोगों की सहायता के उपायों पर चर्चा कर रहे हैं। - 2. बाढ़ से कौन-कौन सी हानियाँ हुईं?
बाढ़ से घर नष्ट हो गए, कुछ रोगी अस्पताल में मृत्यु से जूझ रहे हैं, अनेक लोग भोजन के बिना कष्ट सह रहे हैं और पशु नदी की धारा में बहकर मर गए। - 3. आचार्य ने छात्रों को गोपबन्धु का परिचय क्यों दिया?
आचार्य बताना चाहते थे कि दुःखी लोगों की सहायता करनी चाहिए। इसका आदर्श गोपबन्धु हैं, जिन्होंने बाढ़-पीड़ितों की निःसंकोच सेवा की और आज भी लोगों के मन में सम्मानित हैं। - 4. भोजन-प्रसंग में क्या हुआ?
आचार्य हरिहरदास के निमन्त्रण पर अध्यापक भोजन के लिए बैठे और केले के पत्तों पर स्वादिष्ट व्यञ्जन परोसे गए। तभी बाहर से एक भूखे भिक्षुक की करुण पुकार सुनाई दी। - 5. गोपबन्धु ने अपना भोजन भिक्षुक को क्यों दे दिया?
भिक्षुक की करुण पुकार सुनकर गोपबन्धु का हृदय दया से पिघल गया और उनकी आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने बिना विचार किए अपनी परोसी थाली उठाकर भिक्षुक को खिला दी। - 6. ‘भोजनस्यातिदौर्लभ्यं जीवनाय सुखप्रदम्’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
भोजन बहुत दुर्लभ है और जीवन को सुख देता है, इसलिए भोजन ग्रहण करते समय संकोच नहीं करना चाहिए। गोपबन्धु ने इसे हँसी में कहा, पर आगे स्वयं भूखे को भोजन देकर करुणा का आदर्श रखा। - 7. गोपबन्धु ने अध्ययन-काल से ही क्या सेवा की?
अध्ययन-काल से ही वे निर्धनों और रोगियों की सेवा करते थे। - 8. सत्यवादी वनविद्यालय की क्या विशेषता थी?
यह निःशुल्क शिक्षा देने वाला विद्यालय था, जिसे भारत का पहला मुक्त विद्यालय माना जाता है। इसमें गोपबन्धु स्वयं छात्रों को बिना शुल्क पढ़ाते थे। - 9. निरक्षरता और स्वदेशी के लिए गोपबन्धु ने क्या किया?
निरक्षरता दूर करने के लिए वे निरन्तर प्रयत्न करते रहे। सूती वस्त्र बनाने के लिए वे स्वयं सूत तैयार करते थे और सदा स्वदेशी वस्त्रों तथा वस्तुओं का उपयोग करते थे। - 10. गोपबन्धु स्वतन्त्रता-आन्दोलन में कैसे सम्मिलित हुए?
महात्मा गान्धी की प्रेरणा से वे भारतीय स्वतन्त्रता-आन्दोलन में सम्मिलित हुए और इसके कारण उन्हें दो वर्ष कारावास भोगना पड़ा। - 11. कारागार में रहकर गोपबन्धु ने क्या रचा?
उन्होंने ओडिआ भाषा में ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’ और ‘नचिकेता-उपाख्यान’ आदि प्रेरणादायक पुस्तकें लिखीं। - 12. गोपबन्धु के त्याग का एक उदाहरण दीजिए।
उनका पुत्र मरणासन्न था, फिर भी वे उसे छोड़कर बाढ़-पीड़ितों की सेवा के लिए घर से निकल पड़े। - 13. ‘स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः’ श्लोक का भावार्थ लिखिए।
मेरा शरीर अपने देश की भूमि में विलीन हो जाए, देशवासी उसके ऊपर से चलकर आगे बढ़ें और स्वराज्य के मार्ग में जो गड्ढे हैं, वे मेरी हड्डियों और मांस से भर जाएँ। - 14. ‘गर्तमालिका’ से क्या तात्पर्य है?
‘गर्तमालिका’ का अर्थ गड्ढों की पंक्ति है। श्लोक में यह स्वतन्त्रता के मार्ग की बाधाओं का प्रतीक है। - 15. गोपबन्धु की स्थापित संस्थाओं के नाम बताइए।
सत्यवादी वनविद्यालय, दरिद्रनारायण सेवा-संघ, सत्यवादी मुद्रणालय और ‘समाज’ दैनिक पत्र। - 16. ‘समाज’ पत्र का क्या महत्त्व है?
यह गोपबन्धु द्वारा प्रारम्भ किया गया पत्र है, जो सौ से अधिक वर्षों से आज भी प्रतिदिन प्रकाशित होता है। - 17. गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ की उपाधि क्यों दी गई?
समाज-सेवा और देश-सेवा के लिए उनके असीम त्याग को देखकर आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने उन्हें यह उपाधि दी। - 18. पूर्वरूप सन्धि किसे कहते हैं?
जब पद के अन्त में ‘ए’ या ‘ओ’ हो और अगले पद का आरम्भ ‘अ’ से हो, तब ‘अ’ का लोप होकर उसके स्थान पर ‘ऽ’ लगता है; जैसे — सर्वे + अपि = सर्वेऽपि। - 19. क्तवतु प्रत्यय से बने पुंलिंग रूप का स्त्रीलिंग कैसे बनता है?
पुंलिंग में ‘-वान्’ अन्त वाले रूप में स्त्रीलिंग में ‘-वती’ लगता है; जैसे — कृतवान् → कृतवती, गतवान् → गतवती। - 20. गोपबन्धु के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?
हमें दीन-दुःखियों की निःस्वार्थ सेवा, देश के प्रति त्याग, स्वदेशी अपनाने और करुणा रखने की सीख मिलती है।
(द) महत्वपूर्ण प्रश्न
- 1. ‘प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः’ पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
पाठ का आरम्भ बाढ़-पीड़ितों की सहायता की चर्चा से होता है। आचार्य विद्यार्थियों को उत्कलमणि गोपबन्धु दास का परिचय देते हैं। भोजन के समय भिक्षुक की पुकार सुनकर गोपबन्धु अपनी थाली उसे दे देते हैं। वे शिक्षक, समाजसेवी और स्वतन्त्रता-सेनानी थे; उन्होंने निःशुल्क विद्यालय, ‘समाज’ पत्र और सेवा-संस्थाएँ बनाईं, कारावास सहा और पुत्र के मरणासन्न होने पर भी बाढ़-पीड़ितों की सेवा की। उनके देशभक्ति-श्लोक तथा उपाधि-श्लोक के साथ पाठ का समापन होता है। - 2. गोपबन्धु दास का चरित्र-चित्रण कीजिए।
गोपबन्धु दयालु, त्यागी, स्वदेशभक्त और सेवा-भाव से पूर्ण थे। भिक्षुक को अपना भोजन देना उनकी करुणा दिखाता है। पुत्र को छोड़कर बाढ़-पीड़ितों की सेवा उनका त्याग बताती है। स्वदेशी वस्त्रों का उपयोग, कारावास और निःशुल्क शिक्षा उनकी देशभक्ति तथा समाज-सेवा प्रकट करते हैं। इसी कारण उन्हें ‘उत्कलमणि’ और ‘महामना’ कहा गया। - 3. भोजन-प्रसंग का वर्णन करके उससे मिलने वाली शिक्षा लिखिए।
आचार्य हरिहरदास ने अध्यापकों को भोजन पर बुलाया। सबने हाथ-पैर धोकर आसन ग्रहण किए और केले के पत्तों पर स्वादिष्ट भोजन परोसा गया। गोपबन्धु ने हँसकर भोजन की दुर्लभता का श्लोक बोला। तभी बाहर से तीन दिन के भूखे भिक्षुक की करुण पुकार आई। गोपबन्धु की आँखें भर आईं और वे अपनी थाली लेकर बाहर गए तथा भिक्षुक को खिला दिया। शिक्षा : भूखे की सहायता सबसे बड़ा धर्म है और सच्चा मनुष्य अपने सुख से पहले दूसरे का दुःख देखता है। - 4. ‘स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः…’ श्लोक की व्याख्या कीजिए।
कवि-रूप गोपबन्धु कहते हैं कि मेरा शरीर मातृभूमि में विलीन हो जाए। देशवासी मेरे शरीर के ऊपर से चलकर आगे बढ़ें। स्वराज्य के मार्ग में यदि गड्ढे हों, तो वे मेरी हड्डियों और मांस से भर जाएँ। इसका भाव यह है कि वे देश की स्वतन्त्रता के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने को तत्पर हैं। यह श्लोक उनके पूर्ण त्याग और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। - 5. गोपबन्धु की सेवा और त्याग के उदाहरण देकर बताइए कि वे ‘दीनबन्धु’ क्यों कहे जाते हैं।
उन्होंने विद्यार्थी-जीवन से ही रोगियों और निर्धनों की सेवा की। भूखे भिक्षुक को अपना भोजन दिया। बाढ़-पीड़ितों की सहायता के लिए मरणासन्न पुत्र को भी छोड़ दिया। इसी असीम करुणा और परोपकार के कारण वे दीनों के बन्धु कहलाए। - 6. गोपबन्धु द्वारा स्थापित संस्थाओं और उनके कार्यों का परिचय दीजिए।
उन्होंने सत्यवादी वनविद्यालय (१९०९) में निःशुल्क शिक्षा दी, दरिद्रनारायण सेवा-संघ द्वारा गरीबों की सेवा की, सत्यवादी मुद्रणालय स्थापित किया और ‘समाज’ पत्र आरम्भ किया, जो आज भी प्रकाशित होता है। ये सब जन-जागरण और शिक्षा के साधन बने। - 7. गोपबन्धु दास के जीवन की प्रमुख घटनाओं को तिथि-क्रम से लिखिए।
जन्म ९ अक्टूबर १८७७; एफ़.ए. १९००; बी.एल. १९०६; सत्यवादी वनविद्यालय की स्थापना १९०९; बिहार-ओडिशा व्यवस्थापिका सभा के सदस्य १९१७; ‘समाज’ का प्रकाशन १९१९; राष्ट्रीय आन्दोलन में योगदान १९२०; उत्कलमणि उपाधि १९२४; स्वर्गारोहण १७ जून १९२८। - 8. बाढ़-पीड़ितों की सहायता के लिए हम विद्यार्थी क्या कर सकते हैं?
हम धन, अन्न, वस्त्र, दवाइयाँ और पानी एकत्र कर सकते हैं। स्वयंसेवक बनकर वितरण में सहयोग दे सकते हैं, स्वच्छता का ध्यान रख सकते हैं और गोपबन्धु की तरह बिना संकोच दूसरों की सेवा कर सकते हैं। - 9. स्वदेशी और स्वतन्त्रता-संग्राम में गोपबन्धु का योगदान बताइए।
गोपबन्धु सदा स्वदेशी वस्त्र और वस्तुएँ अपनाते थे, स्वयं सूत तैयार करते थे, निरक्षरता दूर करने के लिए कार्य करते थे और गान्धीजी की प्रेरणा से स्वतन्त्रता-आन्दोलन में सम्मिलित होकर दो वर्ष कारावास सहा। जेल में रहते हुए उन्होंने प्रेरक पुस्तकें लिखीं। - 10. पूर्वरूप सन्धि का नियम लिखकर पाँच उदाहरण दीजिए।
नियम : पद के अन्त में ‘ए’ या ‘ओ’ हो और अगले पद का प्रथम वर्ण ‘अ’ हो, तो ‘अ’ के स्थान पर ‘ऽ’ लगता है। उदाहरण : देशभक्तो + अयम् = देशभक्तोऽयम्; सर्वे + अपि = सर्वेऽपि; पशवो + अपि = पशवोऽपि; बुभुक्षितो + अस्मि = बुभुक्षितोऽस्मि; अश्रुपूर्णनयनो + अभवत् = अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्।
माइंड मैप : एक नज़र में पूरा पाठ
प्रस्तावना
- बाढ़-पीड़ितों पर चर्चा
- केन्द्रापडा, महानदी
- आचार्य–हिमानि–अशोक
- दीनबन्धु गोपबन्धु
भोजन-प्रसंग
- हरिहरदास का निमन्त्रण
- केले के पत्तों पर भोजन
- तीन दिन का भूखा भिक्षुक
- अपनी थाली दे दी
जीवन-परिचय
- जन्म ९ अक्टूबर १८७७
- सुआण्डो, पुरी (ओडिशा)
- एफ़.ए. १९००, बी.एल. १९०६
- निधन १७ जून १९२८
कार्य
- सत्यवादी वनविद्यालय १९०९
- ‘समाज’ दैनिक पत्र
- दरिद्रनारायण सेवा-संघ
- निःशुल्क शिक्षा
देशभक्ति
- गान्धीजी की प्रेरणा
- दो वर्ष कारावास
- स्वदेशी वस्त्र
- मरणासन्न पुत्र को छोड़ा
श्लोक और सम्मान
- स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः
- गर्तमालिका
- उत्कलमणि (१९२४)
- प्रफुल्लचन्द्र राय
भाषा-विशेष
- पूर्वरूप सन्धि (ऽ)
- क्तवतु : -वान् → -वती
- समास और धातु-रूप
- विलोम शब्द
अभ्यास
- 25 MCQ
- 20 अति लघु
- 20 लघु
- 10 महत्वपूर्ण
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
‘प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः’ पाठ किस पुस्तक व कक्षा का है?
यह कक्षा 8 की एनसीईआरटी संस्कृत पाठ्यपुस्तक ‘दीपकम्’ का चतुर्थ पाठ है।
गोपबन्धु दास कौन थे?
गोपबन्धु दास (जन्म ९ अक्टूबर १८७७) ओडिशा के समाजसेवी, शिक्षक, पत्रकार और स्वतन्त्रता-सेनानी थे। उन्होंने सत्यवादी वनविद्यालय और ‘समाज’ पत्र की स्थापना की तथा ‘उत्कलमणि’ उपाधि से सम्मानित हुए।
गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ क्यों कहा गया?
समाज-सेवा और देश-सेवा के लिए उनके असीम त्याग को देखकर वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने उन्हें ‘उत्कलमणि’ (उत्कल का रत्न) की उपाधि से सम्मानित किया।
भोजन-प्रसंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
गोपबन्धु ने भिक्षुक की करुण पुकार सुनकर अपनी परोसी हुई थाली उसे दे दी। इससे शिक्षा मिलती है कि भूखे और दुःखी की सहायता सबसे पहले करनी चाहिए।
इस पाठ में कौन-सा व्याकरण-बिन्दु पढ़ाया गया है?
पाठ्यपुस्तक ने ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में पूर्वरूप सन्धि पढ़ाई है — जैसे देशभक्तो + अयम् = देशभक्तोऽयम्। अभ्यास में क्तवतु-प्रत्यय वाले क्रियापदों का स्त्रीलिंग रूप भी पूछा गया है।
परीक्षा के लिए इस पाठ की तैयारी कैसे करें?
पहले संवाद, भोजन-प्रसंग और दोनों श्लोकों को अर्थ सहित पढ़ें। फिर शब्दार्थ और पूर्वरूप सन्धि याद करें, पाठ्यपुस्तक के आठ अभ्यास हल करें और इस लेख के 75 अतिरिक्त प्रश्नों (25 MCQ, 20 अति लघु, 20 लघु, 10 महत्वपूर्ण) का अभ्यास करें।
- संगच्छध्वं संवदध्वम् (पाठ 1)
- अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका (पाठ 2)
- सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु (पाठ 3)
- प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः (पाठ 4) — (यही लेख)
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