सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हरिद्वार - भारतेंदु हरिश्चंद्र | कक्षा 8 मल्हार पाठ 4 व्याख्या व प्रश्नोत्तर

हरिद्वार – भारतेंदु हरिश्चंद्र, पाठ व्याख्या और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 मल्हार

कक्षा 8 की हिंदी पाठ्यपुस्तक 'मल्हार' के चौथे पाठ 'हरिद्वार' में भारतेंदु हरिश्चंद्र अपनी हरिद्वार-यात्रा का वर्णन एक पत्र के रूप में करते हैं। यह पत्र उन्होंने 14 अक्टूबर सन् 1871 ई. को अपनी पत्रिका 'कविवचन सुधा' के संपादक के नाम लिखा था, इसलिए इसकी भाषा आज से लगभग 150 वर्ष पुरानी है। इस लेख में पाठ का मूल पाठ, सरल हिंदी में व्याख्या, कठिन शब्दों के अर्थ, पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर, अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न (MCQ सहित), माइंड मैप और FAQ — सब कुछ विस्तार से दिया गया है।

लेखक परिचय

भारतेंदु हरिश्चंद्र (जन्म: 9 सितंबर 1850, काशी/बनारस — निधन: 6 जनवरी 1885) हिंदी साहित्य के वे रचनाकार हैं जिन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य (गद्य) का जनक माना जाता है। इसका कारण यह है कि उन्होंने खड़ी बोली हिंदी गद्य को निबंध, नाटक, यात्रा-वृत्तांत और पत्रकारिता जैसी अनेक नई विधाओं में ढालकर उसे साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया, और आधुनिक हिंदी रंगमंच की नींव रखी। उनका प्रसिद्ध उद्घोष है — 'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल' — जिसमें उन्होंने हिंदी भाषा के उत्थान को राष्ट्रीय उन्नति की पहली शर्त बताया।

भारतेंदु ने कविता, नाटक, निबंध और यात्रा-वृत्तांत — इन सभी विधाओं में लेखन किया। उन्होंने 'कविवचन सुधा', 'हरिश्चंद्र मैगजीन' (बाद में 'हरिश्चंद्र चंद्रिका') और स्त्रियों के लिए 'बालाबोधिनी' नामक पत्रिकाएँ प्रकाशित व संपादित कीं। उनकी रचनाओं में समाज-सुधार, राष्ट्र-प्रेम, अंग्रेजी शासन का विरोध और स्वाधीनता की भावना के स्वर मुखर रूप से सुनाई देते हैं — इसी कारण उनके नाम पर हिंदी साहित्य के एक पूरे कालखंड को 'भारतेंदु युग' कहा जाता है, जो सन् 1857 के बाद हिंदी नवजागरण के दूसरे चरण के रूप में जाना जाता है। उनकी प्रमुख कृतियों में 'सत्य हरिश्चंद्र', 'भारत-दुर्दशा', 'अंधेर नगरी' (प्रसिद्ध नाटक) और 'सरयूपार की यात्रा' उल्लेखनीय हैं।

भारतेंदु हरिश्चंद्र मात्र 34-35 वर्ष की अल्पायु में ही चल बसे थे, फिर भी इतने कम समय में उन्होंने हिंदी गद्य, पत्रकारिता और रंगमंच को जितनी दिशा दी, वह अद्वितीय है।

पाठ परिचय

'हरिद्वार' कोई स्वतंत्र निबंध नहीं, बल्कि एक पत्र है — यात्रा-वृत्तांत शैली में लिखा गया पत्र। भारतेंदु हरिश्चंद्र अपनी यात्राओं के प्रति सदा उत्सुक रहते थे। उन्होंने भारत के अनेक गाँवों और नगरों की यात्राएँ कीं और उनके विषय में पत्र-पत्रिकाओं में लिखा। प्रकृति, इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व के अध्ययन में उन्हें यात्राओं से बहुत सहायता मिली; उनकी मान्यता थी कि शिक्षा केवल पुस्तकों से नहीं, यात्राओं से भी पूरी होती है।

सन् 1871 ई. में जब भारतेंदु हरिद्वार की यात्रा पर गए तो वे लिखते हैं — "मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।" हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता, वहाँ के पर्वतों, पक्षियों, वृक्षों और कलकल बहती गंगा, वहाँ के घाटों, लोगों, दुकानों और गंगा तट के मनोरम दृश्यों को देखकर वे अत्यंत आनंदित हुए। इसी यात्रा का रोचक वर्णन उन्होंने अपनी पत्रिका 'कविवचन सुधा' के संपादक के नाम 14 अक्टूबर 1871 ई. को पत्र लिखते हुए प्रस्तुत किया। चूँकि यह पत्र लगभग 150 वर्ष पुराना है, इसमें प्रयुक्त हिंदी का स्वरूप आज की खड़ी बोली से भिन्न — पुरानी वर्तनी, संस्कृतनिष्ठ शब्दावली और लंबे, चित्रात्मक वाक्यों वाला है।

मूल पाठ

श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु!

मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है कि मैं उस पुण्य भूमि का वर्णन करता हूँ जहाँ प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है। यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है जिन पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है और बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं। अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं। सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं। इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।

वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी। एक ओर त्रिभुवन पावनी श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है। जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है, रंग जल का स्वच्छ और श्वेत है और अनेक प्रकार के जल-जंतु कल्लोल करते हुए। यहाँ श्री गंगा जी अपना नाम नदी सत्य करती हैं अर्थात् जल के वेग का शब्द बहुत होता है और शीतल वायु नदी के उन पवित्र छोटे-छोटे कनों को लेकर स्पर्श ही से पावन करता हुआ संचार करता है।

यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं— एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से, इन दोनों धारों के बीच में एक सुंदर नीचा पर्वत है और नील धारा के तट पर एक छोटा-सा सुंदर चुटीला पर्वत है और उसके शिषर पर चण्डिका देवी की मूर्ति है। यहाँ हरि की पैड़ी नामक एक पक्का घाट है और यहीं स्नान भी होता है। विशेष आश्चर्य का विषय यह है कि यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं। यों तो वैरागियों ने मठ मंदिर कई बना लिए हैं। श्री गंगा जी का पाट भी बहुत छोटा है पर वेग बड़ा है, तट पर राजाओं की धर्मशाला यात्रियों के उतरने के हेतु बनी हैं और दुकानें भी बनी हैं पर रात को बंद रहती हैं।

यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं। पंडे दुकानदार इत्यादि कनखल व ज्वालापुर से आते हैं। पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं। इस क्षेत्र में पाँच तीर्थ मुख्य हैं — हरिद्वार, कुशावर्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल। हरिद्वार तो हरि की पैड़ी पर नहाते हैं, कुशावर्त भी उसी के पास है, नीलधारा वही दूसरी धारा, विल्व पर्वत भी पास ही एक सुहाना पर्वत है जिस पर विल्वेश्वर महादेव की मूर्ति है और कनखल तीर्थ इधर ही है, यह कनखल तीर्थ बड़ा उत्तम है। किसी काल में दक्ष ने यहीं यज्ञ किया था और यहीं सती ने शिव जी का अपमान न सहकर अपना शरीर भस्म कर दिया। यहाँ कुछ छोटे-छोटे घर भी बने हैं। और भारामल जैकृष्णदास खत्री यहाँ के प्रसिद्ध धनिक हैं।

हरिद्वार में यह बखेड़ा कुछ नहीं है और शुद्ध निर्मल साधुओं के सेवन योग्य तीर्थ है। मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है। मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। यह स्थान भी उस क्षेत्र में टिकने योग्य ही है। चारों ओर से शीतल पवन आती थी। यहाँ रात्रि को ग्रहण हुआ और हम लोगों ने ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया। वैसे ही मेरे संग कल्लू जी मित्र भी परमानंदी थे। निदान इस उत्तम क्षेत्र में जितना समय बीता, बड़े आनंद से बीता।

एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया। जल के छलके पास ही ठंढे-ठंढे आते थे। उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था। चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। झगड़े-लड़ाई का कहीं नाम भी नहीं था।

यहाँ और भी कई वस्तु अच्छी बनती हैं, जनेऊ यहाँ का अच्छा महीन और उज्ज्वल बनता है। यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्यभूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है। निदान यहाँ जो कुछ है, अपूर्व है और यह भूमि साक्षात विरागमय साधुओं और विरक्तों के सेवन योग्य है।

और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ और अपने वर्णन द्वारा आपके पाठकों को इस पुण्यभूमि का वृत्तांत विदित करके मौनावलंबन करता हूँ। निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।

आपका मित्र
यात्री
— भारतेंदु हरिश्चंद्र

सरल व्याख्या

"मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है... साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।"

भारतेंदु हरिश्चंद्र संपादक को संबोधित करते हुए लिखते हैं कि हरिद्वार जैसी पुण्य भूमि का वर्णन करने में उन्हें बड़ा आनंद मिल रहा है — यह स्थान इतना पवित्र है कि वहाँ प्रवेश करते ही मन अपने-आप शुद्ध हो जाता है। यह भूमि तीन दिशाओं से हरे-भरे पर्वतों से घिरी है। इन पर्वतों पर उगी लताएँ इतनी सुंदर ढंग से फैली हैं मानो सज्जन लोगों की शुभ इच्छाएँ चारों ओर फैल रही हों। बड़े-बड़े वृक्ष एक पैर पर खड़े तपस्वी की भाँति स्थिर खड़े हैं और साधुओं की तरह धूप, ओस और बरसात — सब कुछ चुपचाप सहते रहते हैं।

"अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं... नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।"

लेखक वृक्षों की उदारता की सराहना करते हैं — इन वृक्षों का जन्म धन्य है क्योंकि इनसे माँगने वाला कभी खाली हाथ नहीं लौटता। ये फल, फूल, सुगंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़ तक देते हैं; यहाँ तक कि जल जाने पर बचा कोयला और राख भी लोगों के किसी-न-किसी काम आ जाते हैं। ये वृक्ष इतने उदार (सज्जन) हैं कि इन पर पत्थर मारने पर भी बदले में मीठे फल ही देते हैं (अर्थात् बुराई का बदला भलाई से देते हैं)। इन्हीं वृक्षों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं और शहर के क्रूर शिकारियों (बधिकों) से बिना किसी डर के स्वच्छंद विचरण करते हैं।

"वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी... राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है।"

बरसात के कारण चारों ओर इतनी हरियाली छाई हुई थी मानो यात्रियों के विश्राम के लिए हरे रंग का गलीचा (कालीन) बिछा दिया गया हो। एक ओर तीनों लोकों को पवित्र करने वाली गंगा नदी की पावन धारा बह रही है, जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल यश की तरह फैलती हुई सुंदर लता जैसी दिखाई देती है — अर्थात् जैसे भगीरथ का यश अमर है, वैसे ही गंगा की धारा भी सतत प्रवाहित होती रहती है।

"जल यहाँ का अत्यंत शीतल है... स्पर्श ही से पावन करता हुआ संचार करता है।"

गंगा का जल यहाँ बहुत ठंडा और मीठा है — मानो चीनी के शरबत को बर्फ में जमा दिया गया हो। जल का रंग साफ और सफ़ेद है, और इसमें अनेक जलचर जीव-जंतु स्वच्छंद क्रीड़ा करते रहते हैं। गंगा यहाँ अपने नाम को सार्थक करती हैं — 'नदी' शब्द का अर्थ ही है 'शब्द करने वाली', और यहाँ जल का वेग इतना तेज़ है कि उसकी ध्वनि दूर तक सुनाई देती है। नदी की ठंडी हवा जब उसके पवित्र जल-कणों को साथ लेकर बहती है, तो वह अपने स्पर्श मात्र से ही वातावरण को पवित्र कर देती है।

"यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं... रात को बंद रहती हैं।"

हरिद्वार में गंगा नदी दो धाराओं में बँट गई है — एक 'नील धारा' और दूसरी गंगा जी की मुख्य धारा। इन दोनों धाराओं के बीच एक सुंदर नीची पहाड़ी है, और नील धारा के किनारे एक छोटी-सी नुकीली पहाड़ी है जिसकी चोटी पर चण्डिका देवी की मूर्ति स्थापित है। यहीं पर 'हरि की पैड़ी' नामक पक्का घाट है, जहाँ स्नान होता है। लेखक को यह देखकर आश्चर्य होता है कि यहाँ केवल गंगा जी को ही देवता माना जाता है, कोई अन्य देवता प्रमुख नहीं — यद्यपि वैरागियों (साधुओं) ने आसपास कई मठ-मंदिर बना रखे हैं। गंगा की चौड़ाई (पाट) यहाँ भले ही कम हो, पर धारा का वेग बहुत तेज़ है। तट पर विभिन्न राजाओं द्वारा बनवाई गई धर्मशालाएँ हैं जहाँ यात्री ठहरते हैं, और दुकानें भी हैं जो रात में बंद हो जाती हैं।

"यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा क्रोध की खानि... यहाँ के प्रसिद्ध धनिक हैं।"

यह तीर्थ इतना पवित्र और निर्मल है कि जो लोग इच्छा और क्रोध जैसे विकारों की खान (स्रोत) हैं, वे यहाँ टिक ही नहीं पाते। पंडे और दुकानदार आसपास के कनखल व ज्वालापुर से आते हैं। यहाँ के पंडे बड़े विलक्षण रूप से संतोषी हैं — वे एक पैसा पाकर भी उसे लाख रुपये के बराबर मानकर संतुष्ट हो जाते हैं। लेखक बताते हैं कि इस क्षेत्र में पाँच प्रमुख तीर्थ हैं — हरिद्वार (हरि की पैड़ी), कुशावर्त, नीलधारा, विल्वपर्वत (जहाँ विल्वेश्वर महादेव की मूर्ति है) और कनखल। कनखल तीर्थ का विशेष पौराणिक महत्व है — यहीं राजा दक्ष ने यज्ञ किया था और शिव जी का अपमान सहन न कर पाने के कारण सती ने अपने शरीर को अग्नि में भस्म कर दिया था। यहाँ भारामल जैकृष्णदास खत्री नामक एक प्रसिद्ध धनी व्यक्ति का भी उल्लेख है।

"हरिद्वार में यह बखेड़ा कुछ नहीं है... बड़े आनंद से बीता।"

लेखक कहते हैं कि हरिद्वार में किसी प्रकार का झगड़ा-टंटा नहीं है, यह शुद्ध और पवित्र साधुओं के रहने योग्य तीर्थ है। यहाँ पहुँचते ही उनका मन इतना प्रसन्न और निर्मल हो गया कि उसे शब्दों में बाँधना कठिन है। वे दीवान कृपा राम के घर के ऊपर बने बंगले में ठहरे थे, जो उस क्षेत्र में ठहरने के लिए उपयुक्त स्थान था — चारों ओर से ठंडी हवा आती रहती थी। वहीं रात को चंद्र/सूर्य ग्रहण लगा, जिसमें उन्होंने बड़े आनंद से स्नान किया और दिन में श्रीमद्भागवत का पाठ (पारायण) भी किया। उनके साथ कल्लू जी नाम के मित्र भी बड़े आनंदी स्वभाव के थे। इस प्रकार इस उत्तम तीर्थ में जितना भी समय बीता, वह बड़े आनंद से बीता।

"एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके... झगड़े-लड़ाई का कहीं नाम भी नहीं था।"

एक दिन लेखक ने गंगा तट पर स्वयं भोजन बनाया और उसे पत्थर पर, पानी के बिलकुल पास परोसकर खाया। पानी की ठंडी बूँदें बार-बार उछलकर उनके पास आती रहती थीं। इस पत्थर पर बैठकर खाए गए भोजन का सुख उन्हें सोने की थाली में परोसे भोजन से भी कहीं अधिक अनुभव हुआ — क्योंकि यह सुख बाहरी वैभव का नहीं, बल्कि मन की संतुष्टि और प्रकृति की गोद में मिले शांति का सुख था। वहाँ मन में बार-बार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के भाव जाग्रत होते थे, और वहाँ कहीं भी झगड़े-लड़ाई का नामोनिशान तक नहीं था।

"यहाँ और भी कई वस्तु अच्छी बनती हैं... विरक्तों के सेवन योग्य है।"

हरिद्वार में और भी कई वस्तुएँ अच्छी गुणवत्ता की बनती हैं — जैसे यहाँ का जनेऊ (यज्ञोपवीत) बहुत महीन और चमकीला बनता है। यहाँ की कुशा (एक पवित्र घास) सबसे विशेष होती है, जिसमें से दालचीनी और जावित्री जैसी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यह भूमि इतनी पवित्र है कि यहाँ की घास तक सुगंधित है। लेखक निष्कर्ष निकालते हैं कि यहाँ जो कुछ भी है, वह अद्भुत और अपूर्व है, और यह भूमि सचमुच वैराग्यशील साधुओं और विरक्त लोगों के रहने योग्य है।

"और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ... आपका मित्र, यात्री — भारतेंदु हरिश्चंद्र।"

पत्र का समापन करते हुए लेखक संपादक से कहते हैं कि भले ही वे शरीर से हरिद्वार से लौट आए हों, पर उनका मन आज भी वहीं बसा हुआ है। अपने इस वर्णन के माध्यम से वे पाठकों तक इस पुण्यभूमि का हाल पहुँचाकर अब मौन (चुप) हो जाना चाहते हैं। वे विनम्रतापूर्वक निवेदन करते हैं कि संपादक महोदय इस पत्र को पत्रिका में स्थान (प्रकाशन) अवश्य दें। अंत में वे स्वयं को संपादक का मित्र और एक 'यात्री' बताते हुए अपना नाम — भारतेंदु हरिश्चंद्र — लिखते हैं।

शब्द-संपदा

यह पाठ लगभग 150 वर्ष पुरानी हिंदी में लिखा गया है, इसलिए इसमें अनेक ऐसे शब्द और वर्तनियाँ आती हैं जो आज प्रचलन में नहीं हैं। नीचे दी गई तालिका में इन शब्दों के अर्थ स्पष्ट किए गए हैं।

शब्दअर्थ
वल्लीलता, बेल
मनोरथ / मनोर्थइच्छा, कामना (मनोर्थ पुरानी वर्तनी है)
घामधूप
अर्थीमाँगने वाला, याचक
बधिकपक्षियों/जीवों को पकड़ने या मारने वाला शिकारी
कल्लोलआनंदपूर्वक क्रीड़ा करना, कलरव करना
जात्रीयात्री (पुरानी वर्तनी)
बिछायतबिछाने की वस्तु, बिछावन (गलीचा आदि)
त्रिभुवन पावनीतीनों लोकों (स्वर्ग-पृथ्वी-पाताल) को पवित्र करने वाली
कीर्तियश, प्रसिद्धि
मिष्टमीठा, स्वादिष्ट
पनाशरबत, रस
कनकण, छोटा टुकड़ा
संचार करनाफैलना, गति करना, संचरित होना
चुटीला पर्वतछोटी, नुकीली चोटी वाली पहाड़ी
शिषरशिखर (पुरानी वर्तनी)
पाट (नदी का)नदी की चौड़ाई/तल
विलक्षणअद्भुत, विशेष, असाधारण
संतोषीजो थोड़े में ही संतोष कर ले
बखेड़ाझगड़ा, उपद्रव, झंझट
दीवानराजा/रियासत का प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी या मंत्री
टिकनाठहरना, निवास करना
परमानंदीसदा परम आनंद में रहने वाला
निदानअंततः, निष्कर्षतः
ठंढाठंडा (पुरानी वर्तनी)
जावित्रीजायफल के ऊपर का सुगंधित छिलका, एक मसाला
कुशापूजा-पाठ में प्रयुक्त एक पवित्र घास
विरागमयवैराग्य से युक्त
विरक्तसांसारिक मोह-माया त्याग चुका व्यक्ति
मौनावलंबनमौन धारण करना, चुप हो जाना
स्थानदानस्थान देना; यहाँ आशय पत्रिका में पत्र को प्रकाशित करने से है
महामहिमअत्यंत सम्माननीय (आदरसूचक संबोधन)
मित्रवरेषुश्रेष्ठ मित्र के प्रति (पत्र में प्रयुक्त संस्कृतनिष्ठ संबोधन)
प्रगट होनाप्रकट होना (पुरानी वर्तनी)
वृत्तांतविवरण, हाल, समाचार
विदित करनाज्ञात कराना, बताना
चातुर्यचतुराई, कुशलता
शिल्पविद्याबनाने-गढ़ने की कला, कारीगरी
पारायणकिसी धार्मिक ग्रंथ का आद्यंत (आरंभ से अंत तक) पाठ

पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर

नीचे 'मल्हार' पाठ्यपुस्तक में 'हरिद्वार' पाठ के बाद दी गई सभी गतिविधियाँ उन्हीं शीर्षकों सहित दी गई हैं, साथ में उनके उत्तर/मार्गदर्शन भी दिया गया है।

मेरी समझ से

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर पर चर्चा कीजिए — कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।

1. "सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं" का क्या अर्थ है?

✔ लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं (सबसे उपयुक्त उत्तर)। ✔ लेखक के अनुसार सज्जन लोग बिना पूछे स्वादिष्ट-रसीले फल देते हैं — यह भाव भी आंशिक रूप से सही है क्योंकि पूरा वाक्य वृक्षों की तुलना सज्जनों से करता है।

2. "वैराग्य और भक्ति का उदय होता था" इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है?

✔ मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव।

3. "पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़कर था" इस वाक्य का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है?

✔ संतुष्टि में सुख होता है (सच्चा सुख बाहरी वैभव में नहीं, मन की तृप्ति में है)।

4. "एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।" यह प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है?

✔ सादगी और आत्मनिर्भरता, तथा ✔ स्वच्छता और प्रकृति-प्रेम — दोनों मूल्य इसमें झलकते हैं।

5. लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यतः किस प्रकार का था?

✔ आध्यात्मिक, साथ ही ✔ प्राकृतिक — दोनों पक्ष प्रमुख हैं।

6. पत्र की भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है?

✔ सरलता और चित्रात्मकता (हालाँकि भाषा पुरानी है, फिर भी उसमें वर्णन बहुत सजीव व चित्रमय है)।

(ख) साथियों के अलग-अलग उत्तर पर चर्चा — यह एक समूह-चर्चा गतिविधि है; विद्यार्थी अपने तर्क के आधार पर उत्तर चुनकर कक्षा में साझा करें, इसका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है।

मिलकर करें मिलान

पाठ से चुने गए शब्दों का उनके उपयुक्त संदर्भों से मिलान—

शब्दसही संदर्भ (मिलान)
हरिद्वारयह भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। यहाँ से गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है।
गंगायह भारतवर्ष की एक प्रधान नदी है जो हिमालय से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है; इसके अनेक नाम हैं — भागीरथी, त्रिपथगा, अलकनंदा, मंदाकिनी आदि।
भगीरथये अयोध्या के सूर्यवंशी राजा थे, जिन्होंने घोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाया — इसीलिए गंगा का एक नाम 'भागीरथी' भी है।
चण्डिकामान्यताओं के अनुसार दुर्गा का एक रूप।
भागवतयह अठारह पुराणों में सर्वप्रसिद्ध एक पुराण है, जिसमें अधिकांश श्रीकृष्ण-संबंधी कथाएँ हैं।
दालचीनीयह एक पेड़ है जो दक्षिण भारत में बहुतायत से मिलता है; इसकी सुगंधित छाल दवा और मसाले में प्रयुक्त होती है।
मिलकर करें चयन

पाठ की पंक्तियों के सामने दिए दो-दो निष्कर्षों में से सही निष्कर्ष—

1. "पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली...लहलहा रही है।"

✔ लताओं का फैलना सज्जनों की शुभ इच्छाओं की तरह सौम्यता और सुंदरता को दर्शाता है।

2. "बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो...तपस्या करते हैं।"

✔ वृक्षों की स्थिति साधुओं जैसी है जो हर मौसम को सहते हुए तपस्या करते हैं।

3. "इन वृक्षों पर...निडर होकर कल्लोल करते हैं।"

✔ यहाँ के पक्षी प्रकृति में सुरक्षित अनुभव करते हैं, इसलिए वे निडर होकर कल्लोल करते हैं।

4. "जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है...।"

✔ गंगाजल की ठंडक और मिठास का अनुभव बहुत मनोहारी है (यह एक उपमा है, शाब्दिक कथन नहीं)।

5. "एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके...।"

✔ लेखक ने गंगा के समीप बैठकर भोजन किया, जिससे उनकी प्रकृति से निकटता झलकती है।

6. "निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।"

✔ लेखक चाहता है कि पत्र को महत्व देकर प्रकाशित किया जाए।
पंक्तियों पर चर्चा

(क) "यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है...।"

भावार्थ: यह पंक्ति हरिद्वार को इतनी पवित्र भूमि बताती है कि वहाँ की साधारण घास तक सुगंधित है — मानो पूरी धरती ही पवित्रता से सराबोर हो।

(ख) "अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं...जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।"

भावार्थ: वृक्ष अपने पूरे जीवन-काल में — जीवित रहते हुए भी और जल जाने के बाद भी — मनुष्य के किसी-न-किसी काम आते हैं; इसी परोपकारी गुण के कारण लेखक इनका जन्म धन्य मानते हैं।
सोच-विचार के लिए

(क) "और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ..." — यह वाक्य क्या दर्शाता है?

यह दर्शाता है कि हरिद्वार का प्रभाव लेखक के मन पर इतना गहरा पड़ा कि शरीर से लौट आने पर भी उनका मन वहीं अटका रह गया। यह अनुभव कई बार हमारे जीवन में भी होता है — जैसे किसी सुंदर स्थान, पुराने घर या प्रियजनों से बिछड़ने के बाद भी हम बार-बार उसकी यादों में खो जाते हैं।

(ख) "पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।" — यह कथन आज कितना सच है?

आज के भौतिकवादी युग में ऐसे संतोषी लोग मिलना दुर्लभ हो गया है, फिर भी गाँवों में, साधु-संतों में और कुछ सरल स्वभाव के लोगों में यह गुण अब भी देखा जाता है जो थोड़े में ही संतुष्ट रहते हैं।

(ग) लेखक ने दीवान कृपा राम के बंगले को 'टिकने योग्य' क्यों कहा?

क्योंकि वहाँ चारों ओर से शीतल पवन आती थी, स्थान शांत व स्वच्छ था और गंगा-तट के निकट होने से वहाँ रुकना सुविधाजनक व आनंददायक था — अर्थात केवल आराम ही नहीं, वातावरण की पवित्रता व शांति भी उसे 'टिकने योग्य' बनाती थी।

(घ) "फल, फूल, गंध, छाया...लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।" — इससे वृक्षों के महत्व पर क्या सूझता है?

वृक्ष जीवन-पर्यंत निःस्वार्थ भाव से देना ही जानते हैं — फल, छाया, लकड़ी और अंततः राख तक। यह हमें सिखाता है कि वृक्षों का महत्व अपार है और हमें इन्हें बचाना चाहिए।

(ङ) हरिद्वार की यात्रा किसी दृष्टिबाधित/श्रवणबाधित व्यक्ति के साथ करते हुए सुझाव दीजिए।

दृष्टिबाधित व्यक्ति को गंगा की कलकल ध्वनि, शीतल हवा और सुगंध का शब्दों में जीवंत वर्णन करें, हाथ पकड़कर सुरक्षित मार्ग से चलाएँ; श्रवणबाधित व्यक्ति को इशारों व लिखकर दृश्यों की जानकारी दें और भीड़ में सतर्क रहें।
अनुमान और कल्पना से

(क) कल्पना कीजिए आप हरिद्वार में हैं — आप क्या-क्या करना चाहेंगे?

गंगा में स्नान करना, हर की पैड़ी पर संध्या-आरती देखना, पर्वतों की हरियाली में घूमना, स्थानीय मंदिरों के दर्शन करना और शांत वातावरण में कुछ समय ध्यान में बिताना।

(ख) गंगा तट पर बैठे हों और पानी की छींटें मुँह पर आ रही हों — अपने अनुभव को कल्पना से लिखिए।

ठंडी बूँदों का स्पर्श मन को तुरंत तरोताज़ा कर देता, मानो नदी स्वयं अपनापन जता रही हो; चेहरे पर मुस्कान आ जाती और सारी थकान पल भर में मिट जाती।

(ग) यदि पेड़-पौधे सच में मनुष्यों जैसा व्यवहार करने लगें तो क्या होगा?

तब शायद वे भी अपनी रक्षा के लिए प्रतिकार करते, पर पाठ में वर्णित वृक्ष तो बुराई का बदला भलाई से देते हैं — यह हमें क्षमाशीलता और परोपकार की सीख देता है।

(घ) गंगा शब्द के साथ 'श्री' और 'जी' क्यों लगाया गया?

भारतीय संस्कृति में गंगा को देवी और अत्यंत पूजनीय माना जाता है; 'श्री' और 'जी' आदर व श्रद्धा प्रकट करने के लिए लगाए गए हैं।

(ङ) श्रवणबाधित/दृष्टिबाधित व्यक्ति के साथ यात्रा को अच्छा बनाने के सुझाव दीजिए।

धैर्यपूर्वक साथ चलना, हर दृश्य का वर्णन शब्दों/संकेतों में करना, सुरक्षित व सुगम मार्ग चुनना और आवश्यकता पड़ने पर सहायता के लिए सदैव तत्पर रहना।
लिखें संवाद

(क) लेखक और कल्लू जी के बीच हरिद्वार-यात्रा पर काल्पनिक संवाद लिखिए।

भारतेंदु: कल्लू जी, देखिए यह गंगा जी की धारा कितनी निर्मल है! कल्लू जी: सच कहा, यहाँ आकर मन को जो शांति मिली है, वह और कहीं नहीं मिली। भारतेंदु: चलिए, कल प्रातः हरि की पैड़ी पर स्नान करेंगे और भागवत का पाठ भी करेंगे। कल्लू जी: अवश्य, यह अवसर बार-बार नहीं मिलता। (विद्यार्थी इसी शैली में अपना संवाद आगे बढ़ा सकते हैं।)

(ख) लेखक और प्रकृति के बीच कल्पनात्मक संवाद (पर्वत बोल रहे हों)।

पर्वत: यात्री, वर्षों से मैं यहाँ खड़ा तपस्या कर रहा हूँ। भारतेंदु: आपकी हरियाली देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। पर्वत: यही तो प्रकृति का धर्म है — बिना कुछ माँगे सबका भला करना। (विद्यार्थी अपनी कल्पना से संवाद को आगे बढ़ाएँ।)
'है' और 'हैं' का उपयोग — आदरार्थ बहुवचन

रिक्त स्थानों की पूर्ति (आदरार्थ बहुवचन को ध्यान में रखते हुए)—

वाक्यउत्तर
1. प्रधानाचार्य जी विद्यालय में नहीं ___, वे अभी सभा में उपस्थित ___।हैं / हैं
2. माता-पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते ___।हैं
3. मेरी बहन बाजार जा ___ वहाँ से किताबें ले आएगी।रही है
4. बाहर फेरीवाला ___। ___ बुला लाओ।आया है / उसे
5. डाकिया जी आए ___। उन्हें भी बुला लाओ।हैं
6. आप तो बहुत दिन बाद ___, ___ का स्वागत है।आए हैं / आपके
7. डॉक्टर साहब बहुत विद्वान ___, ___ से परामर्श लेना चाहिए।हैं / उनसे
8. आपके माता-पिता कहाँ ___? क्या मैं ___ से मिल सकता हूँ?हैं / उनसे
9. ये हमारे हिंदी के अध्यापक ___, हम ___ से बहुत-कुछ सीखते-समझते हैं।हैं / उनसे
10. बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर ___।रहा है
भावों की पहचान

शब्द-भंडार: प्रेम, संतोष, भक्ति, श्रद्धा, वैराग्य, आश्चर्य, करुणा, हास्य, शांति, परोपकार, दया, दुख

1. "उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।"

भाव — संतोष

2. "चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।"

भाव — वैराग्य/भक्ति

3. "पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं।"

भाव — संतोष

4. "हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।"

भाव — शांति

5. "सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।"

भाव — परोपकार
काल की पहचान

(क) निम्नलिखित पंक्तियों में काल पहचानिए—

1. "निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।" — भविष्य काल
2. "यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।" — वर्तमान काल
3. "वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से फल देते हैं।" — वर्तमान काल
4. "चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।" — भूतकाल
5. "मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था।" — भूतकाल

(ख) काल बदलकर नए वाक्य बनाना — उदाहरण: "यह भूमि तीन ओर सुंदर पर्वतों से घिरी थी" (भूतकाल), "यह भूमि तीन ओर सुंदर पर्वतों से घिरी होगी" (भविष्य काल)। विद्यार्थी शेष वाक्यों को भी इसी प्रकार तीनों कालों में बदलकर लिखें।

पत्र की रचना

पत्र की विशेषताएँ — व्यक्तिपरकता, संवादात्मकता, स्वाभाविक शैली, व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन, अभिवादन/संबोधन, हस्ताक्षर, उपसंहार व निवेदन, तथा मुख्य विषय-वस्तु — इन सभी विशेषताओं को पाठ में खोजकर संबंधित पंक्तियों से जोड़ने की यह एक समूह-गतिविधि है।

जैसे — अभिवादन/संबोधन का उदाहरण है "श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु!"; हस्ताक्षर का उदाहरण है "आपका मित्र, यात्री — भारतेंदु हरिश्चंद्र"; व्यक्तिगत अनुभव का उदाहरण है "एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके..."; उपसंहार व निवेदन का उदाहरण है "निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।" शेष विशेषताओं को विद्यार्थी समूह में चर्चा करके मूल पाठ की उपयुक्त पंक्तियों से मिलाएँ — यह चर्चा-आधारित गतिविधि है।
पत्र (लेखन कार्य)

अपनी किसी यात्रा के विषय में अपने किसी परिचित को पत्र लिखिए — इसमें संबोधन, अनुभव का सजीव वर्णन, अपनी भावनाएँ और अंत में हस्ताक्षर अवश्य शामिल करें (जैसे भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हरिद्वार-यात्रा का पत्र लिखा था)। यह एक रचनात्मक लेखन-कार्य है जिसे विद्यार्थी स्वयं अपने अनुभव के आधार पर लिखें।

शब्द से जुड़े शब्द

'हरिद्वार' से जुड़े शब्द — पाठ से या अपने मन से चुनकर लिखिए। उदाहरण: गंगा, हर की पैड़ी, कुम्भ मेला, कनखल, चण्डी देवी, तीर्थ, स्नान।

लेखन के अनोखे तरीके

(क) दी गई तुलनाओं के लिए पाठ की मूल पंक्तियाँ ढूँढ़िए—

1. वृक्षों की तुलना साधुओं से — "बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।"
2. गंगाजल की मिठास की तुलना चीनी से — "मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है।"
3. हरियाली की तुलना गलीचे से — "सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।"
4. नदी-धारा की तुलना भगीरथ के यश से — "जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है।"

(ख) पुरानी पंक्तियों को आज की हिंदी में लिखिए—

1. "इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।" → इन वृक्षों पर कई रंगों के पक्षी चहचहाते हैं और शहर के क्रूर शिकारियों से बिना डरे स्वच्छंद विचरण करते हैं।
2. "वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दृष्टि पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।" → बरसात के कारण चारों ओर हरियाली ही दिखती थी, जैसे यात्रियों के आराम के लिए हरा कालीन बिछाया गया हो।
3. "यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं।" → यह इतना पवित्र तीर्थ है कि लालची और क्रोधी स्वभाव के लोग यहाँ टिक ही नहीं पाते।
4. "मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।" → वहाँ पहुँचते ही मेरा मन इतना प्रसन्न और शांत हो गया कि उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
5. "यहाँ रात्रि को ग्रहण हुआ और हम लोगों ने ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया।" → रात को वहाँ ग्रहण लगा, हमने बड़े आनंद से स्नान किया और दिन में भागवत का पूरा पाठ भी किया।
6. "उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।" → उस समय पत्थर पर बैठकर खाए भोजन का आनंद सोने की थाली के भोजन से भी कहीं ज़्यादा था।
7. "निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।" → मुझे पूरा विश्वास है कि आप इस पत्र को अपनी पत्रिका में अवश्य प्रकाशित करेंगे।

(ग) प्राचीन वर्तनी वाले शब्दों की सूची और आज की वर्तनी—

शिषर → शिखर; जात्री → यात्री; मनोर्थ → मनोरथ; ठंढे → ठंडे; प्रगट → प्रकट; मिष्ट → मीठा/स्वादिष्ट; बरफ → बर्फ; बधिक → शिकारी/बहेलिया; निदान → अंततः; दृष्टि पड़ती → दिखाई देती।
आपकी बात

1. क्या आपने कभी खुले वातावरण में/प्रकृति के पास भोजन किया? वह घर के खाने से कैसे भिन्न था?

यह एक व्यक्तिगत अनुभव-आधारित प्रश्न है — विद्यार्थी अपने पिकनिक, यात्रा या शिविर के अनुभव को याद कर लिखें कि प्रकृति के बीच भोजन करने में मिलने वाला सुख घर के भोजन से अलग, अधिक ताज़ा और आनंददायक क्यों लगता है।

2. आपके जीवन में ऐसा कोई क्षण जब किसी सामान्य वस्तु ने गहरा सुख दिया हो?

विद्यार्थी अपने निजी अनुभव (जैसे बारिश में भीगना, माँ के हाथ का सादा खाना, दोस्तों संग खेलना) के आधार पर उत्तर लिखें।

3. आपको किस स्थान पर पवित्रता और प्रसन्नता का अनुभव होता है?

विद्यार्थी अपने किसी प्रिय स्थान (मंदिर, नदी-तट, बगीचा, पहाड़ी स्थल) का उल्लेख कर वहाँ की विशेषताएँ बताएँ जो मन को शांत करती हैं।

4. क्या आपके जीवन में कोई पेड़, फूल या प्राकृतिक वस्तु है जिससे विशेष जुड़ाव महसूस करते हैं?

विद्यार्थी अपने घर-आँगन या विद्यालय के किसी पेड़/पौधे के साथ अपनी यादें साझा करें।
प्रकृति का सौंदर्य और संरक्षण

समूह-चर्चा के बाद "तीर्थ ही नहीं, पृथ्वी भी पावन हो!" विषय पर जन-जागरूकता पोस्टर बनाने की गतिविधि — विद्यार्थी वृक्षारोपण, जल-संरक्षण और स्वच्छता के संदेश के साथ पोस्टर तैयार करें।

स्वास्थ्य और योग

(क) 5 मिनट ध्यान लगाकर अपने अनुभव पर अनुच्छेद लिखिए।

विद्यार्थी मौन बैठकर अपनी श्वास और आसपास की ध्वनियों पर ध्यान केंद्रित करने के अनुभव को अपने शब्दों में लिखें — जैसे मन कैसे शांत हुआ, कौन-सी ध्वनियाँ सुनाई दीं आदि।

(ख) अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर सूचना-पट के लिए 'सूचना' लिखिए।

सूचना — दिनांक 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर विद्यालय प्रांगण में प्रातः 7 बजे योग शिविर आयोजित किया जाएगा। सभी विद्यार्थियों की उपस्थिति अनिवार्य है। — (कक्षा प्रतिनिधि/शारीरिक शिक्षा अध्यापक)
सज्जन वृक्ष

(क) एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करने और उसे नाम देकर मित्र बनाने की गतिविधि। (ख) उसके बारे में दैनंदिनी (डायरी) में नियमित रूप से लिखने की गतिविधि — यह दीर्घकालिक व्यावहारिक कार्य है जिसे विद्यार्थी घर/विद्यालय में करें।

अपने शब्द

'शीतल' शब्द को केंद्र में रखकर—

बिंदुउत्तर
अर्थठंडा
विपरीतार्थक शब्दगर्म / उष्ण
समानार्थी शब्दठंडा, सर्द
वाक्य प्रयोगहरिद्वार में गंगा-तट की शीतल वायु मन को प्रसन्न कर देती है।

इसी प्रकार पत्र के अन्य शब्दों (जैसे 'पवित्र', 'निर्मल') के लिए भी शब्द-चित्र बनाया जा सकता है।

यात्रा के व्यय की गणना

(क) ₹1000 में यात्रा व्यय का विवरण बनाइए।

उदाहरण: आना-जाना किराया — ₹500, भोजन — ₹250, स्थानीय आवागमन — ₹100, प्रवेश/दर्शन शुल्क व अन्य — ₹100, स्मृति-चिह्न/आकस्मिक व्यय — ₹50 (कुल ₹1000)। विद्यार्थी अपनी पसंद के स्थान के अनुसार यह विवरण स्वयं बनाएँ।

(ख) एक स्मृति-चिह्न (souvenir) क्या खरीदेंगे और क्यों?

विद्यार्थी अपनी रुचि अनुसार उत्तर दें (जैसे स्थानीय हस्तशिल्प या धार्मिक वस्तु), साथ ही यह भी बताएँ कि वह आवश्यक क्यों है और शेष बजट में कैसे संतुलन बनाएँगे।
यात्रा सबके लिए

(क) टूरिस्ट गाइड के रूप में समूह-यात्रा को सुविधाजनक बनाने हेतु किन बातों का ध्यान रखेंगे?

सभी आयु-वर्ग (बुज़ुर्ग, बच्चे, दिव्यांगजन) की आवश्यकताओं का ध्यान, आरामदायक मार्ग व विश्राम-स्थल चुनना, समय-सारणी बनाना, प्राथमिक चिकित्सा व सुरक्षा की व्यवस्था करना।

(ख) बिना बोले संकेतों से संवाद — यात्रा में श्रवणबाधित व्यक्ति के लिए क्या आवश्यक होगा?

लिखित सूचना-पट्ट, इशारों की भाषा, स्पष्ट दृश्य संकेत और साथ चल रहे व्यक्ति का निरंतर सहयोग आवश्यक होगा।

(ग) ऐतिहासिक धरोहरों/भवनों की सुरक्षा के लिए यात्रा में किन बातों का ध्यान रखेंगे?

दीवारों पर लिखना/खरोंचना नहीं, निर्धारित मार्ग से ही चलना, कूड़ा न फैलाना और नियमों का पालन करना।
आज की पहेली
संकेतउत्तर (पाठ से)
1. एक मसाले का नामदालचीनी / जावित्री
2. जनेऊ से जुड़ा एक शब्दजनेऊ (महीन सूत से बना)
3. जहाँ स्नान होता हैहरि की पैड़ी
4. वृक्ष के किसी अंग का नामछाल / जड़ / पत्ते
5. एक नगर या तीर्थ का नामहरिद्वार / कनखल / ज्वालापुर
6. व्यापार से जुड़ा स्थानदुकान
7. एक नदी का नामगंगा
8. एक पर्वत का नामविल्व पर्वत
9. एक धार्मिक ग्रंथ का नामभागवत (श्रीमद्भागवत)
झरोखे से

भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखे एक और पत्र 'हरिद्वार के मार्ग में' का अंश पाठ्यपुस्तक में दिया गया है, जिसमें वे मार्ग में देखे गए पीले रंग के सुंदर पक्षी और बया पक्षी के काँटेदार बबूल के वृक्षों में बने घोंसलों का वर्णन करते हैं। इस अंश को पढ़कर कक्षा में इस पर चर्चा करने का निर्देश दिया गया है — यह एक पठन व चर्चा गतिविधि है, इसका कोई निश्चित उत्तर अपेक्षित नहीं।

खोजबीन के लिए

भारतेंदु हरिश्चंद्र के प्रसिद्ध नाटक 'अंधेर नगरी' को पुस्तकालय या इंटरनेट से खोजकर पढ़ने और सहपाठियों के साथ चर्चा करने का निर्देश है। 'अंधेर नगरी' एक प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य प्रधान नाटक है जो कुशासन और मूर्खतापूर्ण शासन-व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करता है — इसकी प्रसिद्ध उक्ति है "अंधेर नगरी, चौपट राजा।"

अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न

(अ) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)

1. भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म किस सन् में हुआ था?

(अ) 1850 (ब) 1857 (स) 1885 (द) 1870

सही उत्तर: (अ) 1850

2. भारतेंदु हरिश्चंद्र का निधन किस सन् में हुआ?

(अ) 1900 (ब) 1885 (स) 1875 (द) 1890

सही उत्तर: (ब) 1885

3. 'हरिद्वार' पाठ मूलतः किस विधा में लिखा गया है?

(अ) कविता (ब) पत्र (स) नाटक (द) कहानी

सही उत्तर: (ब) पत्र

4. यह पत्र किस पत्रिका के संपादक को लिखा गया था?

(अ) हरिश्चंद्र मैगजीन (ब) बालाबोधिनी (स) कविवचन सुधा (द) हरिश्चंद्र चंद्रिका

सही उत्तर: (स) कविवचन सुधा

5. यह पत्र किस तिथि को लिखा गया था?

(अ) 14 अक्टूबर 1871 (ब) 9 सितंबर 1850 (स) 6 जनवरी 1885 (द) 15 अगस्त 1871

सही उत्तर: (अ) 14 अक्टूबर 1871

6. भारतेंदु हरिश्चंद्र को किस रूप में जाना जाता है?

(अ) आधुनिक हिंदी काव्य का जनक (ब) आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक (स) संस्कृत साहित्य के जनक (द) उर्दू शायरी के जनक

सही उत्तर: (ब) आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक

7. भारतेंदु हरिश्चंद्र का प्रसिद्ध नाटक कौन-सा है?

(अ) चंद्रकांता (ब) अंधेर नगरी (स) कामायनी (द) गोदान

सही उत्तर: (ब) अंधेर नगरी

8. लेखक के अनुसार हरिद्वार की भूमि किस ओर से पर्वतों से घिरी है?

(अ) दो ओर (ब) तीन ओर (स) चारों ओर (द) एक ओर

सही उत्तर: (ब) तीन ओर

9. गंगा जी की धारा की तुलना लेखक ने किससे की है?

(अ) राजा भगीरथ की कीर्ति की लता (ब) चंद्रमा की चाँदनी (स) सोने की माला (द) मोतियों की लड़ी

सही उत्तर: (अ) राजा भगीरथ की कीर्ति की लता

10. गंगाजल की मिठास की तुलना किससे की गई है?

(अ) शहद से (ब) चीनी के पने को बरफ में जमाने से (स) अमृत से (द) दूध से

सही उत्तर: (ब) चीनी के पने को बरफ में जमाने से

11. हरिद्वार में गंगा की कितनी धाराएँ बताई गई हैं?

(अ) एक (ब) दो (स) तीन (द) चार

सही उत्तर: (ब) दो (नील धारा व गंगा जी की मुख्य धारा)

12. नील धारा के तट की पहाड़ी पर किसकी मूर्ति है?

(अ) शिव जी (ब) विष्णु जी (स) चण्डिका देवी (द) हनुमान जी

सही उत्तर: (स) चण्डिका देवी

13. हरिद्वार का पक्का स्नान घाट किस नाम से जाना जाता है?

(अ) दशाश्वमेध घाट (ब) हरि की पैड़ी (स) अस्सी घाट (द) मणिकर्णिका घाट

सही उत्तर: (ब) हरि की पैड़ी

14. लेखक के अनुसार हरिद्वार में केवल कौन देवता माने जाते हैं?

(अ) शिव जी (ब) गंगा जी (स) विष्णु जी (द) सूर्य देव

सही उत्तर: (ब) गंगा जी

15. इस क्षेत्र के पाँच मुख्य तीर्थों में से कौन-सा शामिल नहीं है?

(अ) हरिद्वार (ब) कुशावर्त (स) नीलधारा (द) काशी

सही उत्तर: (द) काशी

16. कनखल तीर्थ का पौराणिक महत्व किस कथा से जुड़ा है?

(अ) राम-रावण युद्ध (ब) दक्ष यज्ञ और सती (स) कृष्ण जन्म (द) समुद्र मंथन

सही उत्तर: (ब) दक्ष यज्ञ और सती

17. लेखक हरिद्वार में किसके घर के बंगले पर ठहरे थे?

(अ) पंडित रामनाथ (ब) दीवान कृपा राम (स) भारामल जैकृष्णदास (द) राजा भगीरथ

सही उत्तर: (ब) दीवान कृपा राम

18. लेखक के साथ यात्रा में कौन मित्र थे?

(अ) राधाकृष्ण दास (ब) कल्लू जी (स) प्रताप नारायण मिश्र (द) बालमुकुंद गुप्त

सही उत्तर: (ब) कल्लू जी

19. लेखक ने गंगा तट पर भोजन कैसे किया था?

(अ) सोने की थाली में (ब) पत्थर पर, जल के निकट (स) चाँदी की थाली में (द) घर लौटकर

सही उत्तर: (ब) पत्थर पर, जल के निकट

20. हरिद्वार में कौन-सी वस्तु अपनी विशेष सुगंध के लिए प्रसिद्ध बताई गई है?

(अ) चावल (ब) कुशा (घास) (स) मिट्टी (द) फूल-माला

सही उत्तर: (ब) कुशा (घास)

21. हरिद्वार में प्रसिद्ध धनिक के रूप में किसका उल्लेख हुआ है?

(अ) दीवान कृपा राम (ब) कल्लू जी (स) भारामल जैकृष्णदास खत्री (द) चण्डिका प्रसाद

सही उत्तर: (स) भारामल जैकृष्णदास खत्री

22. पंडे-दुकानदार आदि कहाँ से आते हैं, ऐसा लेखक ने बताया है?

(अ) काशी-प्रयाग से (ब) कनखल व ज्वालापुर से (स) दिल्ली-आगरा से (द) मथुरा-वृंदावन से

सही उत्तर: (ब) कनखल व ज्वालापुर से

23. पाठ की भाषा-शैली की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?

(अ) पूर्णतः आधुनिक खड़ी बोली (ब) लगभग 150 वर्ष पुरानी, चित्रात्मक व उपमामय हिंदी (स) पूर्णतः संस्कृतनिष्ठ भाषा (द) अंग्रेजी शब्दों की भरमार

सही उत्तर: (ब) लगभग 150 वर्ष पुरानी, चित्रात्मक व उपमामय हिंदी

24. 'शिषर' शब्द की आधुनिक वर्तनी क्या है?

(अ) शिखर (ब) शिशिर (स) शीर्ष (द) सिर

सही उत्तर: (अ) शिखर

25. लेखक ने पत्र के अंत में स्वयं को किस रूप में हस्ताक्षरित किया है?

(अ) लेखक भारतेंदु (ब) आपका मित्र, यात्री — भारतेंदु हरिश्चंद्र (स) प्रिय संपादक (द) विनीत सेवक

सही उत्तर: (ब) आपका मित्र, यात्री — भारतेंदु हरिश्चंद्र

(ब) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

1. 'हरिद्वार' पाठ के लेखक कौन हैं?

भारतेंदु हरिश्चंद्र।

2. यह पत्र किस तिथि को लिखा गया?

14 अक्टूबर 1871 ई. को।

3. पत्र किस पत्रिका के संपादक को संबोधित है?

'कविवचन सुधा' के संपादक को।

4. हरिद्वार की भूमि कितनी दिशाओं से पर्वतों से घिरी है?

तीन दिशाओं से।

5. गंगा जी की दो धाराओं के नाम बताइए।

नील धारा और गंगा जी की मुख्य धारा।

6. हरि की पैड़ी क्या है?

हरिद्वार का प्रसिद्ध पक्का स्नान घाट।

7. चण्डिका देवी की मूर्ति कहाँ स्थापित है?

नील धारा के तट की छोटी पहाड़ी के शिखर पर।

8. हरिद्वार क्षेत्र के पाँच मुख्य तीर्थों के नाम लिखिए।

हरिद्वार, कुशावर्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल।

9. दक्ष ने कहाँ यज्ञ किया था?

कनखल में।

10. सती ने अपना शरीर कहाँ भस्म किया?

कनखल में, शिव जी का अपमान न सहने के कारण।

11. लेखक हरिद्वार में किसके बंगले पर ठहरे?

दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर।

12. लेखक के साथ यात्रा में कौन मित्र थे?

कल्लू जी।

13. लेखक ने भोजन कहाँ और कैसे किया था?

गंगा तट पर, पत्थर पर, जल के निकट परोसकर।

14. हरिद्वार की कौन-सी वस्तु अपनी सुगंध के लिए प्रसिद्ध बताई गई है?

कुशा (घास), जिसमें दालचीनी-जावित्री जैसी सुगंध आती है।

15. हरिद्वार के प्रसिद्ध धनिक कौन बताए गए हैं?

भारामल जैकृष्णदास खत्री।

16. पंडे-दुकानदार कहाँ से आते हैं?

कनखल और ज्वालापुर से।

17. गंगा नदी को 'नदी' नाम क्यों सार्थक करती हुई कहा गया है?

क्योंकि जल के वेग से उसका शब्द (ध्वनि) बहुत होता है।

18. पत्र का समापन लेखक ने किन शब्दों से किया?

"आपका मित्र, यात्री — भारतेंदु हरिश्चंद्र।"

19. लेखक के अनुसार हरिद्वार में कौन अकेला देवता माना जाता है?

गंगा जी।

20. 'कविवचन सुधा' पत्रिका का संपादन किसने किया था?

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने।

(स) लघु उत्तरीय प्रश्न

1. भारतेंदु हरिश्चंद्र को 'आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक' क्यों कहा जाता है?

उन्होंने खड़ी बोली हिंदी गद्य को निबंध, नाटक, यात्रा-वृत्तांत और पत्रकारिता जैसी नई विधाओं में विकसित किया, हिंदी रंगमंच की नींव रखी और अपनी पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा व साहित्य को नई दिशा दी।

2. लेखक ने हरिद्वार के वृक्षों का मानवीकरण किस प्रकार किया है?

वृक्षों को साधुओं की भाँति तपस्या करते और सज्जनों की भाँति परोपकारी बताया गया है — जो पत्थर मारने पर भी फल देते हैं, फिर भी शांत भाव से धूप-वर्षा सहते हैं।

3. लेखक ने गंगाजल का वर्णन किन विशेषताओं के साथ किया है?

जल अत्यंत शीतल, स्वच्छ, श्वेत और मीठा है (चीनी के पने-सा), उसमें जल-जंतु क्रीड़ा करते हैं और उसका वेग तेज़ होने से उसमें शब्द (ध्वनि) होता रहता है।

4. हरिद्वार में गंगा जी के अतिरिक्त किसी अन्य देवता की पूजा प्रमुखता से क्यों नहीं होती, लेखक ने क्या कहा?

लेखक ने इसे विशेष आश्चर्य का विषय बताया कि यहाँ केवल गंगा जी ही देवता के रूप में पूजी जाती हैं, यद्यपि वैरागियों ने आसपास कई मठ-मंदिर बना रखे हैं।

5. हरिद्वार के पाँच तीर्थों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

हरिद्वार (हरि की पैड़ी घाट), कुशावर्त (हरि की पैड़ी के पास), नीलधारा (गंगा की दूसरी धारा), विल्वपर्वत (विल्वेश्वर महादेव की मूर्ति सहित) और कनखल (दक्ष यज्ञ व सती की पौराणिक कथा से जुड़ा तीर्थ)।

6. कनखल तीर्थ का पौराणिक महत्व स्पष्ट कीजिए।

यहीं राजा दक्ष ने यज्ञ किया था, और शिव जी का अपमान न सह पाने के कारण उनकी पत्नी सती ने यहीं अपने शरीर को यज्ञाग्नि में भस्म कर दिया था।

7. लेखक ने पंडों के स्वभाव के विषय में क्या लिखा है?

पंडे बड़े विलक्षण संतोषी स्वभाव के हैं — वे एक पैसे को भी लाख रुपये के बराबर मानकर संतुष्ट हो जाते हैं।

8. लेखक ने गंगा तट पर भोजन के अनुभव का वर्णन किस प्रकार किया है?

उन्होंने पत्थर पर, पानी के निकट भोजन बनाकर खाया; पानी की ठंडी बूँदें पास आती रहीं, और इस भोजन का सुख उन्हें सोने की थाली के भोजन से भी अधिक अनुभव हुआ।

9. हरिद्वार की कुशा घास की विशेषता क्या बताई गई है?

यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है, जिसमें दालचीनी और जावित्री जैसी प्राकृतिक सुगंध आती है, जो भूमि की पवित्रता का प्रमाण मानी गई है।

10. लेखक ने हरिद्वार को 'निर्मल तीर्थ' क्यों कहा है?

क्योंकि वहाँ की पवित्रता ऐसी है कि इच्छा-क्रोध से भरे लोग वहाँ टिक ही नहीं पाते और वहाँ किसी प्रकार का झगड़ा-बखेड़ा नहीं होता।

11. दीवान कृपा राम के बंगले में ठहरने का लेखक ने कैसा अनुभव बताया?

वह स्थान ठहरने योग्य था, चारों ओर से शीतल हवा आती थी, और वहीं रात में हुए ग्रहण में उन्होंने आनंदपूर्वक स्नान व भागवत-पारायण किया।

12. पत्र-लेखन शैली की दृष्टि से यह रचना किस प्रकार विशिष्ट है?

इसमें संबोधन, व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन, संवादात्मकता, उपसंहार-निवेदन और हस्ताक्षर — पत्र के सभी आवश्यक अंग सम्मिलित हैं, फिर भी भाषा साहित्यिक व चित्रात्मक है।

13. भारतेंदु हरिश्चंद्र की भाषा-शैली की दो विशेषताएँ लिखिए।

(1) उपमाओं व तुलनाओं का प्रचुर प्रयोग (जैसे लता-सज्जन, गंगाजल-चीनी)। (2) संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के साथ पुरानी वर्तनी का प्रयोग (जैसे शिषर, जात्री)।

14. वृक्षों की तुलना लेखक ने साधुओं से किस आधार पर की है?

जैसे साधु तपस्या करते हुए धूप, ओस, वर्षा सहते हैं, वैसे ही वृक्ष भी एक स्थान पर स्थिर खड़े होकर सभी ऋतुओं को चुपचाप सहन करते हैं।

15. हरिद्वार में वर्षाकाल का दृश्य कैसा था?

चारों ओर इतनी हरियाली छाई थी कि मानो यात्रियों के विश्राम के लिए हरा गलीचा बिछा दिया गया हो।

16. 'सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं' — इस पंक्ति का भावार्थ लिखिए।

जैसे फलदार वृक्ष पत्थर मारने पर भी बदले में मीठा फल देते हैं, वैसे ही सच्चे सज्जन बुराई का बदला भी भलाई से देते हैं।

17. लेखक ने अपने संपादक को पत्र भेजने का उद्देश्य क्या बताया है?

वे चाहते थे कि अपने वर्णन द्वारा पत्रिका के पाठकों को हरिद्वार की पुण्यभूमि का वृत्तांत ज्ञात हो, और इसीलिए पत्र को प्रकाशित करने का निवेदन भी करते हैं।

18. भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा संपादित पत्रिकाओं के नाम लिखिए।

कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन (हरिश्चंद्र चंद्रिका) और बालाबोधिनी।

19. हरिद्वार की दुकानों और धर्मशालाओं के विषय में लेखक ने क्या बताया है?

तट पर राजाओं द्वारा बनवाई गई धर्मशालाएँ हैं जहाँ यात्री ठहरते हैं, और दुकानें भी हैं जो रात्रि में बंद हो जाती हैं।

20. इस पाठ से हमें प्रकृति के प्रति क्या सीख मिलती है?

प्रकृति (वृक्ष, नदी, पर्वत) निःस्वार्थ भाव से मनुष्य को सब कुछ देती है; हमें उसका सम्मान करना चाहिए और उसकी रक्षा व संरक्षण के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।

(द) महत्वपूर्ण प्रश्न

1. 'हरिद्वार' पत्र के आधार पर भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रकृति-दृष्टि पर प्रकाश डालिए।

भारतेंदु प्रकृति को केवल दृश्य के रूप में नहीं, बल्कि सजीव, भावपूर्ण और परोपकारी सत्ता के रूप में देखते हैं। वे वृक्षों, नदी और पर्वतों का मानवीकरण करके उन्हें सज्जन, साधु और तपस्वी के रूप में चित्रित करते हैं। उनकी दृष्टि में प्रकृति आध्यात्मिक शांति और नैतिक शिक्षा दोनों प्रदान करती है — यही कारण है कि हरिद्वार पहुँचते ही उनका मन शुद्ध और प्रसन्न हो उठता है।

2. इस पत्र में प्रयुक्त भाषा 150 वर्ष पुरानी है — इसकी भाषिक विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।

भाषा में संस्कृतनिष्ठ शब्दावली (त्रिभुवन पावनी, विरागमय, मौनावलंबन), पुरानी वर्तनी (शिषर, जात्री, मनोर्थ, ठंढे, प्रगट), लंबे व जटिल वाक्य-गठन, तथा उपमा व मानवीकरण अलंकारों का प्रचुर प्रयोग मिलता है। साथ ही तत्कालीन पत्र-लेखन की औपचारिक शैली (संबोधन 'महामहिम मित्रवरेषु', हस्ताक्षर 'आपका मित्र') भी स्पष्ट दिखाई देती है।

3. पत्र-शैली के यात्रा-वृत्तांत के रूप में 'हरिद्वार' की समीक्षा कीजिए।

यह रचना पत्र और यात्रा-वृत्तांत दोनों विधाओं का सुंदर संगम है — पत्र का ढाँचा (संबोधन, वृत्तांत, निवेदन, हस्ताक्षर) अपनाते हुए लेखक ने यात्रा के दृश्यों, अनुभवों और भावनाओं को इतने सजीव ढंग से चित्रित किया है कि पाठक स्वयं को हरिद्वार में उपस्थित अनुभव करता है। यह हिंदी की आरंभिक यात्रा-वृत्तांत परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

4. लेखक ने वृक्षों, नदी और पर्वतों का मानवीकरण करके क्या संदेश दिया है?

मानवीकरण के माध्यम से लेखक यह संदेश देते हैं कि प्रकृति के प्रत्येक तत्व में परोपकार, त्याग और सहनशीलता के गुण विद्यमान हैं — वृक्ष सज्जन व साधु समान हैं, नदी पवित्रता की प्रतीक है और पर्वत तपस्वी समान स्थिर हैं। यह मनुष्य को भी इन्हीं गुणों को अपनाने की प्रेरणा देता है।

5. हरिद्वार में लेखक द्वारा वर्णित धार्मिक व सामाजिक जीवन का चित्र प्रस्तुत कीजिए।

हरिद्वार में गंगा जी की पूजा प्रमुख है, हरि की पैड़ी पर स्नान होता है, वैरागियों के मठ-मंदिर हैं, पंडे-दुकानदार आसपास के क्षेत्रों से आकर सेवा-व्यापार करते हैं, और धनिक व्यक्ति (जैसे भारामल जैकृष्णदास) समाज में प्रतिष्ठित हैं। समग्र रूप से यह एक शांत, संतोषी और झगड़ा-रहित समाज का चित्र प्रस्तुत करता है।

6. भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनुसार सच्चा सुख किसमें है? गंगा तट के भोजन-प्रसंग के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

लेखक के अनुसार सच्चा सुख बाहरी वैभव (सोने की थाली) में नहीं, बल्कि मन की संतुष्टि, सादगी और प्रकृति की समीपता में है। गंगा तट पर पत्थर पर बैठकर किए गए भोजन का सुख उन्हें राजसी भोजन से भी बढ़कर लगा, क्योंकि उसमें आत्मिक शांति और वैराग्य का भाव जुड़ा था।

7. 'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल' — इस उद्घोष के आलोक में भारतेंदु के हिंदी-प्रेम पर टिप्पणी कीजिए।

भारतेंदु मानते थे कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक उन्नति उसकी अपनी भाषा की उन्नति के बिना संभव नहीं। इसी विचारधारा के अनुरूप उन्होंने आजीवन हिंदी भाषा व साहित्य के विकास के लिए कार्य किया — पत्रिकाएँ निकालीं, नाटक-निबंध लिखे और खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित किया।

8. पाठ में वर्णित उपमाओं (तुलनाओं) का सौंदर्यबोध की दृष्टि से मूल्यांकन कीजिए।

लेखक ने लता की तुलना सज्जनों की शुभ इच्छाओं से, वृक्षों की तुलना तपस्वी साधुओं से, हरियाली की तुलना गलीचे से, गंगाजल की मिठास की तुलना बर्फ में जमी चीनी से की है। ये उपमाएँ न केवल दृश्य को जीवंत बनाती हैं, बल्कि भावनात्मक गहराई और आध्यात्मिक भाव भी जोड़ती हैं, जिससे भाषा अत्यंत काव्यात्मक व चित्रात्मक बन जाती है।

9. हरिद्वार तीर्थ की पवित्रता और वहाँ के लोगों के संतोषी स्वभाव के बीच लेखक क्या संबंध दिखाता है?

लेखक के अनुसार तीर्थ की पवित्रता का सीधा प्रभाव वहाँ रहने वालों के स्वभाव पर पड़ता है — यही कारण है कि यहाँ के पंडे अत्यंत संतोषी हैं और झगड़ालू/लालची स्वभाव के लोग यहाँ टिक ही नहीं पाते। पवित्र वातावरण मनुष्य के भीतर संतोष व शांति के भाव को स्वाभाविक रूप से जाग्रत करता है।

10. आज के पर्यटन और भारतेंदु के समय की तीर्थ-यात्रा में क्या अंतर है? पाठ के आधार पर तुलना कीजिए।

भारतेंदु के समय यात्रा सीमित साधनों में, धीमी गति से और गहरे आध्यात्मिक भाव के साथ होती थी — वे हफ्तों ठहरकर स्नान, पाठ व चिंतन करते थे। आज का पर्यटन प्रायः तेज़, सुविधा-केंद्रित और सीमित समय का होता है, जिसमें आध्यात्मिक अनुभव से अधिक दर्शन और मनोरंजन पर बल रहता है — यद्यपि आज भी अनेक लोग शांति व स्वास्थ्य-लाभ के लिए तीर्थ-यात्रा करते हैं।

माइंड मैप

हरिद्वार

भौगोलिक स्थिति

  • तीन ओर पर्वतों से घिरा
  • गंगा नदी का तट
  • नील धारा व मुख्य धारा

पौराणिक महत्व

  • दक्ष यज्ञ
  • सती का शरीर-त्याग
  • चण्डिका देवी मूर्ति

प्रमुख तीर्थ

  • हरि की पैड़ी
  • कुशावर्त, नीलधारा
  • विल्वपर्वत, कनखल

प्रकृति-वर्णन

  • तपस्वी वृक्ष
  • निडर पक्षी
  • शीतल-मीठा गंगाजल

लोग व जीवन

  • संतोषी पंडे
  • दीवान कृपा राम
  • मित्र कल्लू जी

भाषा-शैली

  • 150 वर्ष पुरानी हिंदी
  • उपमा व मानवीकरण
  • पत्र-रूप में यात्रा-वृत्तांत

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

'हरिद्वार' पाठ किस विधा की रचना है?

यह भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा पत्र-शैली में लिखा गया एक यात्रा-वृत्तांत है, जो उन्होंने अपनी हरिद्वार-यात्रा के अनुभवों पर आधारित 'कविवचन सुधा' पत्रिका के संपादक को भेजा था।

यह पत्र किसे और कब लिखा गया था?

यह पत्र भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 14 अक्टूबर 1871 ई. को अपनी पत्रिका 'कविवचन सुधा' के संपादक को लिखा था।

भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक क्यों कहा जाता है?

क्योंकि उन्होंने हिंदी गद्य को निबंध, नाटक, यात्रा-वृत्तांत और पत्रकारिता जैसी अनेक नई विधाओं में विकसित किया, हिंदी रंगमंच की नींव रखी और खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित किया।

हरिद्वार में कौन-कौन से पाँच तीर्थ प्रमुख माने गए हैं?

हरिद्वार (हरि की पैड़ी), कुशावर्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल।

इस पाठ की भाषा समझने में कठिन क्यों लगती है?

क्योंकि यह पत्र लगभग 150 वर्ष पहले लिखा गया था, इसमें पुरानी वर्तनी (जैसे शिषर, जात्री, मनोर्थ) और संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग हुआ है, जो आज की खड़ी बोली से भिन्न है।

कक्षा 8 की परीक्षा के लिए 'हरिद्वार' पाठ से कौन-से प्रश्न महत्वपूर्ण हैं?

लेखक-परिचय, पत्र की विशेषताएँ, वृक्षों व गंगा का मानवीकरण, हरिद्वार के पाँच तीर्थ, दक्ष-सती की कथा, तथा पुरानी वर्तनी को आज की हिंदी में लिखना — ये बिंदु परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विशेषण क्या है? परिभाषा, भेद, उदाहरण, अभ्यास प्रश्न | Class 6-8 Hindi Grammar

  परिभाषा • भेद • माइंड मैप • MCQ • वर्कशीट • क्विज़ • अभ्यास प्रश्न इस लेख में विशेषण को बहुत आसान भाषा में , ढेर सारे उदाहरणों , चित्रों और अभ्यास के साथ समझाया गया है। यह लेख खासकर कक्षा 6 से 9  तक के विद्यार्थियों के लिए बनाया गया है , ताकि हर बच्चा इसे आसानी से समझ सके। 1. विशेषण क्या है ? ( सरल व्याख्या) जब हम किसी व्यक्ति , वस्तु या जानवर के बारे में बात करते हैं , तो अक्सर यह भी बताते हैं कि वह कैसा है — जैसे उसका रंग क्या है , वह कितना बड़ा है , या कितने हैं। इसी बात को बताने वाले शब्द को विशेषण कहते हैं। परिभाषा: जो शब्द किसी संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता (गुण , रंग , संख्या , आकार आदि) बताए , उसे विशेषण कहते हैं। जिस शब्द की विशेषता बताई जाती है , उसे विशेष्य कहते हैं। आसान उदाहरणों से समझें: राम अच्छा लड़का है। → "अच्छा" विशेषण है , " लड़का" विशेष्य है। मेज़ पर पाँच किताबें हैं। → "पाँच" गिनती बता रहा है , इसलिए विशेषण है। यह लाल गुलाब बहुत सुंदर है। → "लाल" रंग बता रहा ह...

संज्ञा (Noun) — पूरी जानकारी सरल भाषा में (कक्षा 6, 7 और 8 के विद्यार्थियों के लिए • उदाहरण, चित्र और माइंड मैप सहित)

  संज्ञा (Noun) — पूरी जानकारी सरल भाषा में कक्षा 6, 7 और 8 के विद्यार्थियों के लिए • उदाहरण, चित्र और माइंड मैप सहित ज़रा सोचिए — जब आप बोलते हैं "राम स्कूल जाता है", तो इस वाक्य में राम और स्कूल — ये दोनों शब्द किसी न किसी नाम को बता रहे हैं। हिंदी व्याकरण में ऐसे ही शब्दों को संज्ञा कहा जाता है। आज हम इसे बहुत आसान तरीके से, ढेर सारे उदाहरणों के साथ समझेंगे। 1. संज्ञा किसे कहते हैं? किसी भी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, भाव या गुण के नाम को "संज्ञा" कहते हैं। सरल शब्दों में — दुनिया की हर चीज़ का एक नाम होता है, और वह नाम ही संज्ञा है। संज्ञा = किसी भी नाम का बोध कराने वाला शब्द व्यक्ति (राम, सीता) वस्तु (किताब, कुर्सी) स्थान (दिल्ली, स्कूल) भाव / गुण (ख़ुशी, ईमानदारी) कुछ आसान उदाहरण वाक्यों में: मोहन बाज़ार से आम लाया। (व्यक्ति + वस्तु) दिल्ली भारत की राजधानी है। (स्थान) उसकी ईमानदारी सबको पसंद है। (गुण) गंगा एक पवित्र नदी है। (स्थान/वस्तु का नाम) ✻ ✻ ✻ 2. संज्ञा के भेद (प्रकार) — माइंड मैप संज्ञा मुख्यतः पाँच प्रकार की होती है। नीचे दिया गया माइंड मैप इसे ...

क्रिया (Verb) की परिभाषा, भेद, उदाहरण, पहचान, नियम, MCQ, Worksheet | हिंदी व्याकरण

  🌈 क्रिया क्या है? कक्षा 6–8 हिंदी व्याकरण परिभाषा, भेद, उदाहरण, माइंड मैप, अभ्यास और महत्वपूर्ण प्रश्न 📚 क्रिया का परिचय हिंदी भाषा में वाक्य को पूरा अर्थ देने के लिए कई प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इनमें क्रिया का विशेष महत्व है। क्रिया से हमें किसी काम के करने, होने या किसी अवस्था का पता चलता है। जैसे—राम पढ़ता है, सीता गाना गाती है, बच्चे मैदान में खेलते हैं और पक्षी आकाश में उड़ते हैं। इन सभी वाक्यों में पढ़ता, गाती, खेलते और उड़ते शब्द किसी न किसी काम का बोध कराते हैं। इसलिए ये सभी क्रिया शब्द हैं। उदाहरण: मोहन पुस्तक पढ़ता है। बच्चे मैदान में खेलते हैं। माँ खाना बनाती हैं। चिड़िया आकाश में उड़ती है। दादाजी कुर्सी पर बैठे हैं। चित्र: विद्यार्थी पढ़ते और सीखते हुए। ✅ क्रिया की परिभाषा जिस शब्द से किसी का...