आदमी का अनुपात (गिरिजा कुमार माथुर) - कक्षा 8 मल्हार पाठ 9 पूर्ण व्याख्या, सारांश, प्रश्न-उत्तर व नोट्स
आदमी का अनुपात – कविता व्याख्या, कवि परिचय और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 मल्हार
कमरे से लेकर पूरे ब्रह्मांड तक की यात्रा करते हुए भी अंत में मनुष्य के भीतर की तंगदिली को उघाड़ देना — यही गिरिजा कुमार माथुर की कविता 'आदमी का अनुपात' की सबसे बड़ी विशेषता है। कक्षा 8 की हिंदी पाठ्यपुस्तक 'मल्हार' के नौवें पाठ में संकलित यह छोटी-सी किंतु गहन कविता विराट ब्रह्मांड और सूक्ष्म मनुष्य के बीच के अनुपात को दिखाते हुए यह सवाल खड़ा करती है कि इतना छोटा होकर भी आदमी ईर्ष्या, अहंकार और स्वार्थ की दीवारें क्यों खड़ी करता है। इस लेख में हम इस कविता का पूरा मूल पाठ, सरल व्याख्या, शब्दार्थ, पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर और परीक्षा-अभ्यास हेतु अतिरिक्त प्रश्न विस्तार से देखेंगे।
कवि परिचय
गिरिजा कुमार माथुर (1919–1994)
- जन्म : 22 अगस्त 1919, अशोकनगर (मध्य प्रदेश)
- निधन : 10 जनवरी 1994, नई दिल्ली
- पिता : देवीचरण माथुर (वे भी कविताएँ लिखते थे)
- कार्यक्षेत्र : आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत
- विधाएँ : कविता के अतिरिक्त नाटक, गीत, कहानी और निबंध
- प्रमुख कृतियाँ : मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले, मैं वक्त के हूँ सामने
- प्रसिद्ध भावांतर गीत : 'होंगे कामयाब'
गिरिजा कुमार माथुर का जन्म 22 अगस्त 1919 को मध्य प्रदेश के अशोकनगर जनपद में हुआ था। उनके पिता देवीचरण माथुर स्वयं भी कविताएँ लिखते थे, इसलिए घर में साहित्यिक वातावरण उन्हें आरंभ से ही मिला। उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर से स्नातक और लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी विषय में स्नातकोत्तर किया। सन् 1943 में वे सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' द्वारा संपादित बहुचर्चित संकलन 'तारसप्तक' के सात कवियों में से एक रहे, जिससे उनकी प्रयोगधर्मी काव्य-प्रतिभा को व्यापक पहचान मिली। कविताओं के अतिरिक्त उन्होंने कई नाटक, गीत, कहानी और निबंध भी लिखे। वे आकाशवाणी में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे और बाद में दूरदर्शन में उप-महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए। उनकी अनेक कृतियाँ प्रकाशित हैं, जिनमें मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले और मैं वक्त के हूँ सामने प्रमुख हैं। इस अंतिम काव्य-संग्रह 'मैं वक्त के हूँ सामने' के लिए उन्हें वर्ष 1991 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार तथा 1993 में व्यास सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्होंने प्रसिद्ध भावांतर गीत 'होंगे कामयाब' की भी रचना की थी, जो जन-आंदोलनों और सामाजिक उत्थान के प्रेरक गीत के रूप में आज भी गाया जाता है। 10 जनवरी 1994 को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया।
पाठ परिचय
'आदमी का अनुपात' कविता में गिरिजा कुमार माथुर एक बेहद रोचक तरीके से मनुष्य के आकार और ब्रह्मांड के विस्तार के बीच के 'अनुपात' को उभारते हैं। कविता की शुरुआत एक कमरे में बैठे दो व्यक्तियों से होती है, जो कमरे से भी छोटे हैं। इसके बाद कवि क्रमशः कमरे से घर, घर से मुहल्ले, मुहल्ले से नगर, नगर से प्रदेश, प्रदेश से देश, देश से पृथ्वी और अंततः पृथ्वी से अनगिनत नक्षत्रों, करोड़ों ब्रह्मांडों तक की एक विराट यात्रा कराते हैं। यह विस्तार दिखाता है कि पृथ्वी स्वयं करोड़ों में एक छोटी-सी वस्तु है और ऐसे लाखों ब्रह्मांडों में से हर एक में अनगिनत पृथ्वियाँ, भूमियाँ और सृष्टियाँ हो सकती हैं।
इस विराट विस्तार के सामने आदमी का आकार अत्यंत सूक्ष्म ठहरता है — यही इस कविता का 'अनुपात' है। परंतु कवि यहीं नहीं रुकते; वे मानव-स्वभाव पर करारी चोट करते हैं — इतना छोटा और नगण्य होकर भी आदमी ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास में डूबा रहता है, असंख्य दीवारें खड़ी करता है और स्वयं को दूसरों का स्वामी घोषित करता है। कविता के अंत में गहरा व्यंग्य है — जब आदमी संपूर्ण देशों की तो बात ही क्या करे, वह एक ही कमरे में रहकर भी अपनी-अपनी दो अलग-अलग दुनिया रच लेता है। इस प्रकार यह कविता विराटता और लघुता के अनुपात के माध्यम से मनुष्य के अहंकार, स्वार्थ और विभाजनकारी प्रवृत्ति पर सटीक टिप्पणी करती है और सहअस्तित्व तथा व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देती है।
मूल कविता
— गिरिजा कुमार माथुर
सरल व्याख्या
कविता की शुरुआत में कवि एक साधारण दृश्य प्रस्तुत करते हैं — एक कमरे में दो व्यक्ति बैठे हैं, और स्पष्ट है कि वे दोनों व्यक्ति उस कमरे से आकार में छोटे हैं। यह पंक्ति आगे आने वाले पूरे विस्तार-क्रम की नींव रखती है, जिसमें छोटी वस्तु बड़ी वस्तु में समाई हुई दिखाई जाएगी।
यहाँ से कवि एक सुंदर शृंखला बनाते हैं — कमरा घर में है, घर मुहल्ले में है, मुहल्ला नगर में है, नगर प्रदेश में है, प्रदेश कई मिलकर एक देश बनाते हैं, और ऐसे कई देश मिलकर पृथ्वी पर बसे हैं। इतना ही नहीं, यह पृथ्वी स्वयं अनगिनत नक्षत्रों (तारों) के बीच स्थित एक ग्रह मात्र है। इस प्रकार छोटी इकाई से बड़ी इकाई की ओर बढ़ते हुए कवि क्रमिक विस्तार का सुंदर चित्र खींचते हैं।
कवि कहते हैं कि यह विशाल दिखने वाली पृथ्वी वास्तव में करोड़ों नक्षत्रों में से एक छोटी-सी वस्तु मात्र है। यह अकेली पृथ्वी ही आकाशगंगा (नभ गंगा) की परिधि में समस्त मनुष्यों, जीव-जंतुओं और प्रकृति को अपने भीतर समेटे हुए है — यानी जो कुछ भी हमें असीम लगता है, वह भी विराट ब्रह्मांड के आगे अत्यंत सूक्ष्म है।
कवि विस्तार को और आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि हमारी यह आकाशगंगा भी लाखों ब्रह्मांडों में से एक ब्रह्मांड है। और हर एक ऐसे ब्रह्मांड में न जाने कितनी ही पृथ्वियाँ, कितनी ही भूमियाँ (धरातल) और कितनी ही सृष्टियाँ (रचनाएँ/संसार) हो सकती हैं। यह कल्पना मनुष्य की समझ और सोच की सीमाओं को चुनौती देती है और ब्रह्मांड की अनंतता का बोध कराती है।
इस छोटी-सी किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण पंक्ति में कवि पूरी कविता का सार प्रस्तुत करते हैं — कमरे से लेकर ब्रह्मांडों तक जो विस्तार दिखाया गया, वही आदमी और इस विराट सृष्टि के बीच का सही 'अनुपात' है। अर्थात मनुष्य इस अनंत ब्रह्मांड के सामने अत्यंत सूक्ष्म, नगण्य-सा प्राणी है।
इतना छोटा और सूक्ष्म होने के बावजूद आदमी ईर्ष्या, अहं (घमंड), स्वार्थ, घृणा और अविश्वास जैसी नकारात्मक भावनाओं में पूरी तरह डूबा (लीन) रहता है। वह असंख्य (संख्यातीत, शंख जितनी विशाल संख्या वाली) दीवारें — यानी भेदभाव, वैमनस्य और अलगाव की सीमाएँ — खड़ी करता चला जाता है। इतना ही नहीं, वह स्वयं को दूसरों का स्वामी (मालिक) भी घोषित करता है, यानी सत्ता और वर्चस्व की भावना उसमें प्रबल होती है। यह अंश आदमी की सूक्ष्मता और उसके भीतर के विशाल अहंकार के बीच के विरोधाभास को तीखे व्यंग्य के साथ उभारता है।
कवि कहते हैं कि देशों के बीच बँटवारे और मतभेद की तो बात ही क्या करें — मनुष्य इतना संकुचित हो चुका है कि वह एक ही कमरे में रहते हुए भी अपने और दूसरे के बीच अलग-अलग दो दुनिया रच लेता है। यह अंतिम पंक्ति पूरी कविता के व्यंग्य को चरम पर पहुँचाती है — जो आदमी संपूर्ण ब्रह्मांड के अनुपात में कुछ भी नहीं है, वही आदमी अपने निकटतम व्यक्ति से भी दीवार खड़ी कर लेता है।
शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अनुपात | दो वस्तुओं के आकार/मात्रा का परस्पर तुलनात्मक संबंध |
| विराट | अत्यंत बड़ा, विशाल |
| अनगिन | जिसकी गिनती न की जा सके, असंख्य |
| नक्षत्र | तारा, आकाशीय पिंड |
| परिधि | घेरा, चारों ओर की सीमा-रेखा |
| नभ गंगा | आकाशगंगा, मंदाकिनी |
| ब्रह्मांड | समस्त सृष्टि, विश्व, जगत |
| भूमियाँ | धरातल, भू-भाग |
| सृष्टियाँ | रचनाएँ, संसार, निर्मित जगत |
| ईर्ष्या | दूसरे की उन्नति/सुख देखकर होने वाली जलन |
| अहं | अहंकार, घमंड, 'मैं' का भाव |
| घृणा | नफ़रत, तिरस्कार का भाव |
| अविश्वास | विश्वास न होना, शक |
| लीन | डूबा हुआ, मग्न, तल्लीन |
| संख्यातीत | जिसकी गिनती संभव न हो, असंख्य |
| शंख | भारतीय संख्या-पद्धति में एक अत्यंत बड़ी संख्या (100 पद्म) |
| दूजा | दूसरा |
| स्वामी | मालिक, अधिपति |
पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
आगे पाठ्यपुस्तक में दी गई सभी गतिविधियाँ उन्हीं शीर्षकों सहित दी जा रही हैं, साथ ही हर प्रश्न/उप-प्रश्न का पूरा उत्तर भी दिया गया है।
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।
- (1) कविता के अनुसार ब्रह्मांड में मानव का स्थान कैसा है?
★ ब्रह्मांड की तुलना में अत्यंत सूक्ष्म — यही सही उत्तर है। (शेष तीनों विकल्प — 'पृथ्वी पर सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण', 'सूर्य, चंद्र आदि सभी नक्षत्रों से बड़ा' तथा 'समस्त प्रकृति पर शासन करने वाला' — कविता के मूल भाव के विपरीत हैं, क्योंकि कविता तो मानव की लघुता और नगण्यता को ही रेखांकित करती है।)
- (2) कविता में मुख्य रूप से किन दो वस्तुओं के अनुपात को दिखाया गया है?
★ मानव और ब्रह्मांड — यही सही उत्तर है, क्योंकि कविता का केंद्रीय भाव "यह है अनुपात / आदमी का विराट से" पंक्ति में स्पष्ट रूप से व्यक्त हुआ है। ('पृथ्वी और सूर्य', 'देश और नगर', 'घर और कमरा' — ये सभी तो केवल विस्तार दिखाने के माध्यम/सोपान हैं, कविता का मूल विषय नहीं।)
- (3) कविता के अनुसार मानव किन भावों और कार्यों में लिप्त रहता है?
★ ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा में — यही सही उत्तर है। (कविता में 'त्याग, ज्ञान और प्रेम', 'सेवा और परोपकार' अथवा 'उदारता, धर्म और न्याय' जैसे सकारात्मक भावों का कोई उल्लेख नहीं है, बल्कि कवि ने ठीक इसके विपरीत मानव की नकारात्मक प्रवृत्तियों को उजागर किया है।)
- (4) कविता के अनुसार मानव का सबसे बड़ा दोष क्या है?
★ वह अपने छोटेपन को भूल अहंकारी हो जाता है — यही सबसे उपयुक्त उत्तर है, क्योंकि पूरी कविता इसी विरोधाभास पर टिकी है कि ब्रह्मांड के अनुपात में अत्यंत सूक्ष्म होने पर भी मनुष्य अहंकार, स्वामित्व और भेदभाव की भावना नहीं छोड़ पाता। ('वह प्रकृति के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता' का सीधा उल्लेख कविता में नहीं है, जबकि 'सीमाओं को न समझना' और 'दूसरों पर शासन चाहना' इसी अहंकार के ही अलग-अलग पहलू हैं।)
(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ विचार कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
यह एक कक्षा-चर्चा गतिविधि है। विद्यार्थी आपस में चर्चा करें कि उन्होंने कविता की किन पंक्तियों के आधार पर कोई विशेष विकल्प चुना, और यदि किसी साथी ने भिन्न उत्तर चुना है तो उसका तर्क भी समझने का प्रयास करें। इस पारस्परिक चर्चा से कविता की गहरी और बहुआयामी समझ विकसित होती है।
नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। अपने समूह में इनके अर्थ पर चर्चा कीजिए और लिखिए—
- (क) "अनगिन नक्षत्रों में / पृथ्वी एक छोटी / करोड़ों में एक ही"
इसका अर्थ है कि यह पृथ्वी, जिसे हम अपने लिए संपूर्ण संसार मानते हैं, वास्तव में असंख्य तारों-नक्षत्रों के बीच स्थित करोड़ों ग्रहों में से एक साधारण और छोटा-सा ग्रह मात्र है। यह पंक्ति हमारे भीतर की संकीर्ण सोच को तोड़कर ब्रह्मांड की विशालता का बोध कराती है।
- (ख) "संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है / अपने को दूजे का स्वामी बताता है।"
इसका आशय है कि मनुष्य अपने चारों ओर असंख्य (गिनती से परे) दीवारें — जाति, धर्म, वर्ग, संपत्ति आदि के आधार पर भेदभाव और अलगाव की सीमाएँ — खड़ी करता चला जाता है, और साथ ही स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ व उनका स्वामी (मालिक) मानने लगता है। यह मानव के अहंकार और सत्ता-लोलुपता को दर्शाता है।
- (ग) "देशों की कौन कहे / एक कमरे में / दो दुनिया रचाता है।"
इसका अर्थ है कि पूरे देशों के बीच के मतभेद और बँटवारे की तो बात ही छोड़िए, मनुष्य इतना संकुचित हो चुका है कि वह एक ही कमरे में रहते हुए भी अपने और दूसरे व्यक्ति के बीच दो अलग-अलग दुनिया रच लेता है। यह पंक्ति मनुष्य के भीतर की गहरी विभाजनकारी और अलगाववादी प्रवृत्ति को उजागर करती है।
नीचे दो स्तंभ दिए गए हैं। अपने समूह में चर्चा करके स्तंभ 1 की पंक्तियों का मिलान स्तंभ 2 में दिए गए सही अर्थ से कीजिए।
| क्रम | स्तंभ 1 | स्तंभ 2 (सही मिलान) |
|---|---|---|
| 1. | संख्यातीत शंख सी दीवारें | मनुष्य की नकारात्मक भावनाएँ |
| 2. | पृथ्वी एक छोटी, करोड़ों में एक | पृथ्वी की अल्पता और अनोखेपन की ओर संकेत |
| 3. | ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा | मनुष्य द्वारा खींची गई कृत्रिम सीमाएँ |
| 4. | दो व्यक्ति कमरे में / कमरे से छोटे | सीमित स्थान में भी और अलगाव की प्रवृत्ति |
| 5. | परिधि नभ गंगा की | ब्रह्मांड की विशालता का प्रतीक |
| 6. | एक कमरे में दो दुनिया रचाता है | आदमी के संकुचित होने का प्रतीक |
इस कविता में 'मानव' और 'ब्रह्मांड' के उदाहरण द्वारा व्यक्ति के अल्पत्व और सृष्टि की विशालता के अनुपात को दिखाया गया है। अपने साथियों के साथ मिलकर विचार कीजिए कि मानव को ब्रह्मांड जैसा विस्तार पाने के लिए इनमें से किन-किन गुणों या मूल्यों की आवश्यकता होगी? आपने ये गुण क्यों चुने, यह भी साझा कीजिए।
विद्यार्थी अपने समूह में मिलकर उन गुणों की सूची बना सकते हैं जो मानव को संकुचित मानसिकता से ऊपर उठाकर व्यापक दृष्टिकोण देते हैं — जैसे सहअस्तित्व, विशालता (व्यापक सोच), सौहार्द, सहनशीलता, विविधता का सम्मान, समावेशिता, त्याग और सहयोग की भावना। इसके विपरीत वर्चस्व, अहंकार, सत्ता, ईर्ष्या, विरोध, मतभेद, स्वार्थ और अविश्वास जैसे गुण मानव को और अधिक संकुचित बनाते हैं। विद्यार्थी बताएँ कि उन्होंने सकारात्मक गुण इसलिए चुने क्योंकि ये गुण मनुष्य के भीतर की दीवारों को गिराकर उसे ब्रह्मांड जितनी विशाल हृदयशीलता की ओर ले जाते हैं।
कविता को पुनः पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए—
- (क) कविता के अनुसार मानव किन कारणों से स्वयं को सीमाओं में बाँधता चला जाता है?
कविता के अनुसार मानव ईर्ष्या, अहं (अहंकार), स्वार्थ, घृणा और अविश्वास जैसी नकारात्मक भावनाओं में लीन रहने के कारण ही स्वयं को असंख्य सीमाओं में बाँधता चला जाता है। यही भावनाएँ उसे दूसरों से भेद करने, दीवारें खड़ी करने और स्वयं को दूसरों का स्वामी बताने के लिए प्रेरित करती हैं।
- (ख) यदि आपको इस कविता की एक पंक्ति को दीवार पर लिखना हो, जो आपको प्रतिदिन प्रेरित करे तो आप कौन-सी पंक्ति चुनेंगे और क्यों?
विद्यार्थी अपनी पसंद के अनुसार पंक्ति चुन सकते हैं। उदाहरण के लिए, "यह है अनुपात / आदमी का विराट से" पंक्ति चुनी जा सकती है, क्योंकि यह प्रतिदिन यह याद दिलाएगी कि हम इस विशाल ब्रह्मांड के सामने कितने सूक्ष्म हैं, इसलिए हमें अहंकार, ईर्ष्या और स्वार्थ छोड़कर विनम्र व व्यापक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
- (ग) कवि ने मानव की सीमाओं और कमियों की ओर ध्यान दिलाया है, लेकिन कहीं भी क्रोध नहीं दिखाया। आपको इस कविता का भाव कैसा लगा— व्यंग्य, करुणा, चिंता या कुछ और? क्यों?
इस कविता में मुख्य रूप से व्यंग्य का भाव प्रधान है, क्योंकि कवि बिना क्रोधित हुए, संयत और तार्किक ढंग से मानव के अहंकार व संकीर्णता पर चोट करते हैं — "देशों की कौन कहे / एक कमरे में / दो दुनिया रचाता है" जैसी पंक्तियाँ स्पष्ट व्यंग्य दर्शाती हैं। साथ ही इसमें हल्की चिंता का भाव भी है, क्योंकि कवि मानव-स्वभाव की इस विडंबना को गंभीरता से उठाते हैं, जिससे पाठक स्वयं आत्ममंथन करने को विवश हो जाता है।
- (घ) आपके अनुसार 'दीवारें उठाना' केवल ईंट-पत्थर से जुड़ा काम है या कुछ और भी हो सकता है? अपने विचारानुसार समझाइए।
'दीवारें उठाना' केवल भौतिक निर्माण-कार्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी हो सकता है। जाति, धर्म, वर्ग, भाषा, संपत्ति या विचारधारा के आधार पर लोगों के बीच पैदा किया गया भेदभाव, दूरी, अविश्वास और वैमनस्य भी एक प्रकार की अदृश्य दीवार ही है, जो ईंट-पत्थर की दीवार से कहीं अधिक मज़बूत और हानिकारक सिद्ध होती है, क्योंकि यह मन और समाज को बाँट देती है।
- (ङ) मानवता के विकास में सहयोग, समर्पण और सहिष्णुता जैसी सकारात्मक प्रवृत्तियाँ ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ और घृणा जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों से कहीं अधिक प्रभावी हैं। उदाहरण देकर बताइए कि सहिष्णुता या सहयोग के कारण समाज में कैसे परिवर्तन आए हैं?
इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जहाँ सहयोग और सहिष्णुता ने समाज में बड़े सकारात्मक परिवर्तन लाए हैं — जैसे भारत के स्वतंत्रता संग्राम में विभिन्न धर्मों, जातियों व क्षेत्रों के लोगों ने मिलकर सहयोग किया और आज़ादी प्राप्त की; टीकाकरण व स्वच्छता अभियानों में सामूहिक सहयोग से बीमारियों पर नियंत्रण पाया गया; तथा आपदा (बाढ़, भूकंप) के समय विभिन्न समुदायों के लोग एकजुट होकर एक-दूसरे की सहायता करते हैं। इसके विपरीत, ईर्ष्या व घृणा पर आधारित समाज में संघर्ष, दंगे और विभाजन ही जन्म लेते हैं। इससे स्पष्ट है कि सहयोग व सहिष्णुता समाज को जोड़ती है जबकि नकारात्मक भावनाएँ उसे तोड़ती हैं।
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए—
- (क) मान लीजिए कि आप एक दिन के लिए पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित कर सकते हैं। अब आप मानव की कौन-कौन सी आदतों को बदलना चाहेंगे? क्यों?
विद्यार्थी लिख सकते हैं कि वे मानव की ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास जैसी आदतों को बदलना चाहेंगे और उनके स्थान पर सहयोग, प्रेम, समानता व सहिष्णुता की भावना स्थापित करना चाहेंगे, क्योंकि यही आदतें मनुष्यों के बीच दीवारें और संघर्ष पैदा करती हैं तथा समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा हैं।
- (ख) यदि आप अंतरिक्ष यात्री बन जाएँ और ब्रह्मांड के किसी दूसरे भाग में जाएँ तो आप किस स्थान (कमरा, घर, नगर आदि) को सबसे अधिक याद करेंगे और क्यों?
विद्यार्थी अपने अनुभव के आधार पर उत्तर दें — जैसे, मैं अपने घर के उस कमरे को सबसे अधिक याद करूँगा/करूँगी जहाँ मेरा परिवार साथ बैठता है, क्योंकि वहाँ अपनापन, सुरक्षा और स्नेह का भाव जुड़ा है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चाहे ब्रह्मांड कितना भी विशाल क्यों न हो, अपनापन सबसे छोटी जगह में ही मिलता है।
- (ग) मान लीजिए कि एक बच्चा या बच्ची कविता में उल्लिखित सभी सीमाओं को पार कर सकता या सकती है — वह कहाँ तक जाएगा या जाएगी और क्या देखेगा या देखेगी? एक कल्पनात्मक यात्रा-वृतांत लिखिए।
यह एक रचनात्मक प्रश्न है। विद्यार्थी कल्पना करके लिख सकते हैं कि वह बच्चा अपने कमरे से निकलकर घर, मुहल्ला, नगर, देश, पृथ्वी और फिर अनगिनत नक्षत्रों को पार करते हुए दूसरे ब्रह्मांडों तक पहुँच जाता है, जहाँ उसे नई-नई पृथ्वियाँ, अलग-अलग सृष्टियाँ और विविध जीवन-रूप दिखाई देते हैं। यह यात्रा उसे यह सिखाती है कि मनुष्य द्वारा बनाई गई सीमाएँ कितनी छोटी और कृत्रिम हैं, जबकि वास्तविक ब्रह्मांड असीम और अद्भुत है।
- (घ) इस कविता को पढ़ने के बाद, आप स्वयं को ब्रह्मांड के अनुपात में कैसा अनुभव करते हैं? एक अनुच्छेद लिखिए— "मैं ब्रह्मांड में एक... हूँ।"
मैं ब्रह्मांड में एक अत्यंत सूक्ष्म बिंदु के समान हूँ। जिस प्रकार यह पृथ्वी करोड़ों नक्षत्रों में से एक छोटा-सा ग्रह है, उसी प्रकार मैं भी इस अनंत सृष्टि की तुलना में नगण्य हूँ। परंतु यह अहसास मुझे विनम्र बनाता है और सिखाता है कि मुझे अहंकार, स्वार्थ व ईर्ष्या छोड़कर व्यापक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, क्योंकि इतने विराट ब्रह्मांड में मेरा छोटा-सा जीवन तभी सार्थक होगा जब मैं दूसरों के साथ प्रेम व सहयोग से रहूँगा।
- (ङ) मान लीजिए कि किसी दूसरे संसार से आपके पास संदेश आया है कि उसे पृथ्वी के किसी व्यक्ति की आवश्यकता है। आप किसे भेजना चाहेंगे और क्यों?
विद्यार्थी अपने अनुसार किसी वैज्ञानिक, समाज-सुधारक या शिक्षक का नाम लेकर तर्क दे सकते हैं। उदाहरण के लिए, मैं किसी ऐसे वैज्ञानिक को भेजना चाहूँगा/चाहूँगी जो नई खोजें कर सके और साथ ही मानवता के मूल्यों — सहयोग, प्रेम व समानता — को भी उस संसार में स्थापित कर सके, ताकि पृथ्वी की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा और भावना दोनों का प्रतिनिधित्व हो सके।
- (च) कविता में "ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ" जैसी प्रवृत्तियों की चर्चा की गई है। कल्पना कीजिए कि एक दिन के लिए ये भाव सभी व्यक्तियों में समाप्त हो जाएँ तो उससे समाज में क्या-क्या परिवर्तन होगा?
यदि एक दिन के लिए ईर्ष्या, अहं और स्वार्थ जैसे भाव समाप्त हो जाएँ, तो समाज में अद्भुत सौहार्द और शांति स्थापित हो जाएगी — लोग एक-दूसरे की सहायता निःस्वार्थ भाव से करेंगे, झगड़े व मतभेद समाप्त हो जाएँगे, संसाधनों का बँटवारा समान रूप से होगा, तथा हर व्यक्ति दूसरों के सुख-दुख में सच्चे मन से शामिल होगा। इससे यह भी सिद्ध होगा कि ये नकारात्मक भावनाएँ ही समाज में विभाजन और संघर्ष की मूल जड़ हैं।
- (छ) यदि आपको इस कविता का एक पोस्टर बनाना हो जिसमें इसके मूल भाव — 'विराटता और लघुता' तथा 'मनुष्य का भ्रम' — दर्शाया जाए तो आप क्या चित्र, प्रतीक और शब्द उपयोग करेंगे? संक्षेप में बताइए।
पोस्टर में एक ओर विशाल ब्रह्मांड, आकाशगंगा और असंख्य तारों का चित्र बनाया जा सकता है, और दूसरी ओर उसी के एक कोने में अत्यंत छोटा-सा एक कमरा दिखाया जा सकता है जिसमें दो व्यक्तियों के बीच एक दीवार खींची गई हो। पृष्ठभूमि में 'यह है अनुपात, आदमी का विराट से' पंक्ति लिखी जा सकती है और दीवार पर 'अहं', 'स्वार्थ', 'ईर्ष्या' जैसे शब्द अंकित किए जा सकते हैं, ताकि विराटता व लघुता का विरोधाभास तथा मनुष्य के अहंकार-भ्रम का भाव स्पष्ट रूप से उभर सके।
नीचे दिए गए रिक्त स्थानों में 'सृष्टि' से जुड़े शब्द अपने समूह में चर्चा करके लिखिए।
'सृष्टि' शब्द से जुड़े शब्द इस प्रकार हो सकते हैं — पृथ्वी, ब्रह्मांड, प्रकृति, नक्षत्र, आकाशगंगा, ग्रह, जीव-जगत। विद्यार्थी अपने समूह में चर्चा करके इसी प्रकार के अन्य संबंधित शब्द भी सूचीबद्ध कर सकते हैं, जैसे— उपग्रह, तारामंडल, वायुमंडल, जैव-विविधता आदि।
- (क) कविता में कमरे से लेकर ब्रह्मांड तक का विस्तार दिखाया गया है। इस क्रम को अपनी तरह से एक रेखाचित्र, सीढ़ी या 'मानसिक-चित्रण' (माइंड-मैप) द्वारा प्रदर्शित कीजिए। प्रत्येक स्तर पर कुछ विशेषताएँ लिखिए, जैसे— पास-पड़ोस की एक विशेष बात, नगर का कोई स्थान, देश की विविधता आदि। उसके नीचे एक पंक्ति में इस प्रश्न का उत्तर लिखिए— "मैं इस चित्र में कहाँ हूँ और क्यों?"
विद्यार्थी कमरा → घर → मुहल्ला → नगर → प्रदेश → देश → पृथ्वी → ब्रह्मांड का एक सीढ़ीनुमा चित्र बनाकर प्रत्येक स्तर पर अपनी विशेषताएँ लिख सकते हैं, जैसे— मुहल्ले की कोई खास गली, नगर का प्रसिद्ध स्थान, देश की भाषाई-सांस्कृतिक विविधता आदि। अंत में लिखें— "मैं इस चित्र में सबसे छोटे स्तर यानी 'घर के कमरे' में हूँ, क्योंकि मेरा वास्तविक जीवन और पहचान वहीं से आरंभ होकर धीरे-धीरे इस विशाल संसार से जुड़ती है।"
- (ख) अगर इसी कविता की तरह कोई कहानी लिखनी हो जिसका नाम हो 'ब्रह्मांड में मानव' तो उसको आरंभ कैसे करेंगे? कुछ वाक्य लिखिए।
विद्यार्थी अपनी रचनात्मकता से आरंभ कर सकते हैं, जैसे— "यह कहानी उस दिन शुरू होती है जब एक छोटा बच्चा रात को छत पर लेटकर तारों को निहार रहा था। अचानक उसके मन में सवाल उठा कि इन असंख्य तारों के बीच हमारी पृथ्वी और हम इंसानों का क्या स्थान है? उसी जिज्ञासा से उसकी अंतरिक्ष-यात्रा और आत्म-खोज की यह अनोखी कहानी आरंभ होती है..."
- (ग) 'एक कमरे में दो दुनिया रचाता है' पंक्ति को ध्यान से पढ़िए। अगर आपसे कहा जाए कि आप एक ऐसी दुनिया बनाइए जिसमें कोई दीवार न हो तो वह कैसी होगी? उसका वर्णन कीजिए।
ऐसी दुनिया में सभी लोग जाति, धर्म, भाषा, वर्ग या क्षेत्र के भेदभाव के बिना एक-दूसरे के साथ खुले मन से रहते होंगे। वहाँ हर व्यक्ति दूसरे की सहायता के लिए तत्पर रहेगा, संसाधन समान रूप से बँटेंगे, और किसी को भी पराया या शत्रु नहीं समझा जाएगा। ऐसे संसार में मतभेद तो होंगे, परंतु उन्हें संवाद व समझ से सुलझाया जाएगा, दीवार खड़ी करके नहीं।
- (घ) एक चित्र शृंखला बनाइए जिसमें यह क्रम दिखे — आदमी → कमरा → घर → पड़ोसी क्षेत्र → नगर → देश → पृथ्वी → ब्रह्मांड। प्रत्येक चित्र में आकार का अनुपात दिखाया जाए जिससे यह स्पष्ट हो कि आदमी कितना छोटा है।
विद्यार्थी क्रमशः बड़े होते वृत्तों या आकृतियों की एक शृंखला बना सकते हैं — सबसे छोटा वृत्त 'आदमी' का, उससे बड़ा 'कमरा', फिर क्रमशः 'घर', 'पड़ोसी क्षेत्र', 'नगर', 'देश', 'पृथ्वी' और सबसे बड़ा वृत्त 'ब्रह्मांड' का, जिसके भीतर पिछले सभी वृत्त बहुत छोटे बिंदुओं जैसे दिखाई दें। इससे स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होगा कि ब्रह्मांड के अनुपात में मनुष्य कितना नगण्य है।
पाठ्यपुस्तक में कविता की पंक्ति "दो व्यक्ति कमरे में / कमरे से छोटे —" के आधार पर 'निदेशक चिह्न' (—) पर चर्चा की गई है। यह एक प्रकार का विराम चिह्न है जो किसी बात को आगे बढ़ाने या स्पष्ट करने के लिए प्रयोग होता है — जैसे व्याख्या, उदाहरण या उद्धरण देने के लिए। इस कविता में इस चिह्न का प्रयोग एक ठहराव, सोच का संकेत और आगे आने वाले महत्वपूर्ण विचार की ओर पाठक का ध्यान आकर्षित करने के लिए किया गया है — यह संकेत देता है कि अब कुछ ऐसा कहा जाने वाला है जो पाठक को सोचने पर विवश करेगा। इस कविता में अन्य अनेक विशेषताएँ भी छिपी हैं, जैसे— अधिकतर पंक्तियों का अंतिम शब्द 'में' है, बहुत छोटी-छोटी पंक्तियाँ हैं आदि।
(क) अपने समूह के साथ मिलकर कविता की अन्य विशेषताओं की सूची बनाइए। अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।
कविता की अन्य विशेषताएँ इस प्रकार हो सकती हैं— (1) कविता में तुकांत का बंधन नहीं है, यह मुक्त छंद में रची गई है; (2) एक ही शब्द ('में') की बार-बार आवृत्ति से लयात्मकता आई है; (3) क्रमिक विस्तार (कमरा → घर → ... → ब्रह्मांड) की शैली अपनाई गई है; (4) अंत में तीखा व्यंग्य है; (5) संस्कृतनिष्ठ शब्दावली (अनुपात, विराट, संख्यातीत आदि) का प्रयोग है; (6) कविता आकार में छोटी है परंतु भाव में अत्यंत गहन है।
(ख) नीचे इस कविता की कुछ विशेषताएँ और वे पंक्तियाँ दी गई हैं जिनमें ये विशेषताएँ झलकती हैं। विशेषताओं का सही पंक्तियों से मिलान कीजिए—
| क्रम | कविता की विशेषताएँ | कविता की पंक्तियाँ |
|---|---|---|
| 1. | सरल वाक्य के शब्दों को विशेष क्रम में लगाया गया है। | कमरा है घर में, घर है मोहल्ले में, मोहल्ला नगर में… |
| 2. | मुहावरे का प्रयोग किया गया है। | अपने को दूजे का स्वामी बताता है |
| 3. | छोटे से बड़े की ओर विस्तार देने के लिए शब्दों को दोहराया गया है। | कमरा है घर में |
| 4. | प्रश्न शैली में व्यंग्य किया गया है। | देशों की कौन कहे, एक कमरे में दो दुनिया रचाता है |
| 5. | अतिशयोक्ति से भरा कथन है (बढ़ा-चढ़ाकर कहना)। | यह है अनुपात आदमी का विराट से |
| 6. | मानव के अहंकार पर तीखा व्यंग्य किया गया है। | संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है |
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपने समूह में मिलकर खोजिए।
- (क) कविता में अलग-अलग प्रकार से ब्रह्मांड की विशालता को व्यक्त किया गया है। उनकी पहचान कीजिए।
ब्रह्मांड की विशालता को कवि ने अनेक स्तरों से व्यक्त किया है — "अनगिन नक्षत्रों में" (असंख्य तारों की उपस्थिति), "करोड़ों में एक ही" (पृथ्वी की तुलना करोड़ों ग्रहों से), "परिधि नभ गंगा की" (आकाशगंगा का विस्तार), "लाखों ब्रह्मांडों में" (अनगिनत ब्रह्मांडों का अस्तित्व) तथा "कितनी ही पृथ्वियाँ, कितनी ही भूमियाँ, कितनी ही सृष्टियाँ" (हर ब्रह्मांड में अनंत संभावनाएँ) — इस प्रकार कवि क्रमशः बढ़ते हुए विस्तार से ब्रह्मांड की अकल्पनीय विशालता को उभारते हैं।
- (ख) "संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है" / "अपने को दूजे का स्वामी बताता है" / "एक कमरे में / दो दुनिया रचाता है" — कविता में ये सारी क्रियाएँ मनुष्य के लिए आई हैं। आप अपने अनुसार कविता में नई क्रियाओं का प्रयोग करके कविता की रचना कीजिए।
यह एक रचनात्मक गतिविधि है। विद्यार्थी अपनी कल्पना से नई पंक्तियाँ बना सकते हैं, जैसे— "अपने ही भाई से नाता तोड़ता है", "छोटी-सी बात पर रिश्ता छोड़ता है", "सुविधा के लिए सत्य मरोड़ता है" आदि — इस प्रकार मनुष्य की अन्य संकुचित प्रवृत्तियों को नई क्रियाओं के माध्यम से कविता के ढाँचे में ढालकर प्रस्तुत करें।
"सबको समेटे है / परिधि नभ गंगा की" — आपने 'आकाशगंगा' शब्द सुना और पढ़ा होगा। लेकिन कविता में 'नभ गंगा' जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। आप भी अपने समूह में मिलकर इसी प्रकार दो शब्दों को मिलाकर नए शब्द बनाइए।
'नभ' (आकाश) + 'गंगा' (नदी) मिलकर 'नभ गंगा' शब्द बना है। इसी प्रकार विद्यार्थी नए संयुक्त शब्द बना सकते हैं — जैसे 'जल + धारा = जलधारा', 'चंद्र + मुख = चंद्रमुख', 'नील + आकाश = नीलाकाश', 'सूर्य + मुखी = सूर्यमुखी', 'रत्न + गर्भा = रत्नगर्भा' आदि।
"हर ब्रह्मांड में / कितनी ही पृथ्वियाँ / कितनी ही भूमियाँ / कितनी ही सृष्टियाँ" — क्या आपके मस्तिष्क में कभी इस प्रकार के प्रश्न आते हैं? अपने समूह के साथ मिलकर अपने मन में आने वाले प्रश्नों की सूची बनाइए। अपने शिक्षक, इंटरनेट और पुस्तकालय की सहायता से इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ने का प्रयास कीजिए।
विद्यार्थी अपने मन में उठने वाले खगोलीय जिज्ञासा भरे प्रश्नों की सूची बना सकते हैं, जैसे— क्या ब्रह्मांड में और भी पृथ्वी जैसे ग्रह हैं जहाँ जीवन संभव हो? आकाशगंगा में कितने तारे हैं? ब्रह्मांड का अंत कहाँ है या यह अनंत है? क्या हमसे परे किसी और सभ्यता का अस्तित्व है? इन प्रश्नों के उत्तर शिक्षक, विज्ञान की पुस्तकों, वृत्तचित्रों (डॉक्यूमेंट्री) और विश्वसनीय इंटरनेट स्रोतों की सहायता से खोजे जा सकते हैं।
पाठ्यपुस्तक में उदाहरण दिया गया है — "पृथ्वी एक छोटी" में 'छोटी' शब्द 'पृथ्वी' की विशेषता बता रहा है, अर्थात 'छोटी' विशेषण है। 'पृथ्वी' एक संज्ञा शब्द है जिसकी विशेषता बताई जा रही है, अर्थात 'पृथ्वी' विशेष्य शब्द है। अब नीचे दी गई पंक्तियों में विशेषण और विशेष्य शब्दों को पहचानकर लिखिए—
| पंक्ति | विशेषण | विशेष्य |
|---|---|---|
| 1. दो व्यक्ति कमरे में | दो | व्यक्ति |
| 2. अनगिन नक्षत्रों में | अनगिन | नक्षत्रों |
| 3. लाखों ब्रह्मांडों में | लाखों | ब्रह्मांडों |
| 4. अपना एक ब्रह्मांड | अपना एक | ब्रह्मांड |
| 5. संख्यातीत शंख सी | संख्यातीत, शंख सी | (दीवारें — अगली पंक्ति में) |
| 6. एक कमरे में | एक | कमरे |
| 7. दो दुनिया रचाता है | दो | दुनिया |
- (क) कोई ऐसी स्थिति बताइए जहाँ 'अनुपात' बिगड़ गया हो— जैसे काम का बोझ अधिक और समय कम।
विद्यार्थी अपने अनुभव से उदाहरण दे सकते हैं, जैसे— परीक्षा के दिनों में पढ़ने के लिए विषय बहुत अधिक हों परंतु समय बहुत कम बचा हो; किसी शहर में जनसंख्या बहुत अधिक हो परंतु संसाधन (पानी, बिजली, सड़कें) सीमित हों; या घर के सभी सदस्यों की ज़रूरतें अधिक हों परंतु आमदनी सीमित हो। इन सभी स्थितियों में 'अनुपात' बिगड़ा हुआ माना जाएगा।
- (ख) आप अपने परिवार, विद्यालय या मोहल्ले में 'विराटता' (विशाल दृष्टिकोण) कैसे ला सकते हैं? कुछ उपाय सोचकर लिखिए। (संकेत— किसी को अनदेखा न करना, सबकी सहायता करना आदि)
विराटता (व्यापक दृष्टिकोण) लाने के लिए हम सभी सदस्यों/साथियों की बात ध्यान से सुन सकते हैं, किसी को उसकी जाति, धर्म या आर्थिक स्थिति के आधार पर अनदेखा न करें, ज़रूरतमंदों की सहायता करें, मतभेद होने पर संवाद से समाधान खोजें, तथा सबके साथ समान व्यवहार व सम्मान बनाए रखें। इस प्रकार छोटे-छोटे प्रयासों से भी हम अपने आस-पास व्यापक व समावेशी दृष्टिकोण विकसित कर सकते हैं।
- (ग) 'करोड़ों में एक ही पृथ्वी' — इस पंक्ति को पढ़कर आपके मन में क्या भाव आता है? आप इस अनोखी पृथ्वी को सुरक्षित रखने के लिए क्या-क्या करेंगे?
इस पंक्ति को पढ़कर मन में यह भाव आता है कि हमारी पृथ्वी कितनी अनमोल और दुर्लभ है, इसलिए इसे सुरक्षित रखना हमारा परम कर्तव्य है। इसके लिए हम पेड़ लगा सकते हैं, जल व ऊर्जा का सदुपयोग कर सकते हैं, प्लास्टिक व प्रदूषण कम कर सकते हैं, कचरे का सही निपटान कर सकते हैं और दूसरों को भी पर्यावरण-संरक्षण के प्रति जागरूक कर सकते हैं।
- (घ) कविता हमें 'अपने को दूजे का स्वामी बताने' के प्रति सचेत करती है। आप अपने किन-किन गुणों को प्रबल करेंगे ताकि आपमें ऐसा भाव न आए?
इस भाव से बचने के लिए मैं विनम्रता, समानता का सम्मान, सहानुभूति, सहयोग की भावना और आत्म-नियंत्रण जैसे गुणों को प्रबल करूँगा/करूँगी, ताकि मैं कभी भी दूसरों पर श्रेष्ठता या स्वामित्व जताने के बजाय उन्हें समान समझकर उनके साथ मिलजुलकर रहूँ।
- (ङ) अपने जीवन में ऐसी तीन 'दीवारों' के विषय में सोचिए जो आपने स्वयं खड़ी की हैं (जैसे— डर, संकोच आदि)। फिर एक योजना बनाइए कि आप उन्हें कैसे तोड़ेंगे? क्या समाज में भी ऐसी दीवारें होती हैं? उन्हें गिराने में हम कैसे सहायता कर सकते हैं?
विद्यार्थी अपनी निजी दीवारों (जैसे नए लोगों से बात करने में संकोच, असफलता का डर, गलती स्वीकार न करने का अहंकार आदि) की पहचान करके यह लिख सकते हैं कि वे धीरे-धीरे अभ्यास, आत्मविश्वास और खुले संवाद से इन्हें दूर करने का प्रयास करेंगे। समाज में भी जाति, धर्म, आर्थिक स्थिति आधारित दीवारें होती हैं, जिन्हें गिराने के लिए हम शिक्षा, संवाद, आपसी सम्मान और मिल-जुलकर काम करने की भावना को बढ़ावा दे सकते हैं।
"संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है" — शंख का अर्थ है 100 पद्म की संख्या। नीचे भारतीय संख्या प्रणाली एक तालिका के रूप में दी गई है। तालिका के आधार पर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर खोजिए—
| हिंदी | संख्या | गणितीय संख्या |
|---|---|---|
| एक (इकाई) | 1 | 10⁰ |
| दस (दहाई) | 10 | 10¹ |
| सौ (सैकड़ा) | 100 | 10² |
| सहस्र (हज़ार) | 1,000 | 10³ |
| दस हज़ार | 10,000 | 10⁴ |
| लाख | 1,00,000 | 10⁵ |
| दस लाख | 10,00,000 | 10⁶ |
| करोड़ | 1,00,00,000 | 10⁷ |
| दस करोड़ | 10,00,00,000 | 10⁸ |
| अरब | 1,00,00,00,000 | 10⁹ |
| दस अरब | 10,00,00,00,000 | 10¹⁰ |
| खरब | 1,00,00,00,00,000 | 10¹¹ |
| दस खरब | 10,00,00,00,00,000 | 10¹² |
| नील | 1,00,00,00,00,00,000 | 10¹³ |
| दस नील | 10,00,00,00,00,00,000 | 10¹⁴ |
| पद्म | 1,00,00,00,00,00,00,000 | 10¹⁵ |
| दस पद्म | 10,00,00,00,00,00,00,000 | 10¹⁶ |
| शंख | 1,00,00,00,00,00,00,00,000 | 10¹⁷ |
| दस शंख | 10,00,00,00,00,00,00,00,000 | 10¹⁸ |
| महाशंख | 1,00,00,00,00,00,00,00,00,000 | 10¹⁹ |
- 1. जिस संख्या में 15 शून्य होते हैं, उसे क्या कहते हैं?
जिस संख्या में 15 शून्य होते हैं, उसे 'पद्म' कहते हैं (10¹⁵)।
- 2. महाशंख में कितने शून्य होते हैं?
महाशंख (10¹⁹) में 19 शून्य होते हैं।
- 3. एक लाख में कितने हज़ार होते हैं?
एक लाख में 100 हज़ार होते हैं।
- 4. उपर्युक्त तालिका के अनुसार सबसे छोटी और सबसे बड़ी संख्या कौन-सी है?
तालिका के अनुसार सबसे छोटी संख्या 'एक (इकाई)' (10⁰) है और सबसे बड़ी संख्या 'महाशंख' (10¹⁹) है।
- 5. दस करोड़ और एक अरब को जोड़ने पर कौन-सी संख्या आएगी?
दस करोड़ (10,00,00,000) और एक अरब (1,00,00,00,000) को जोड़ने पर 1,10,00,00,000 अर्थात एक अरब दस करोड़ की संख्या आएगी।
जैसे पृथ्वी अनगिनत नक्षत्रों में एक छोटा-सा ग्रह है, वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह विशेष आवश्यकता वाला हो या न हो, समाज का एक महत्वपूर्ण भाग है। एक समूह चर्चा आयोजित करें जिसमें सभी मानवों के लिए समान अवसरों की आवश्यकता पर बल दिया जाए (भले ही उनका जेंडर, आयु, मत, विश्वास, शारीरिक रूप, रंग या आकार-प्रकार आदि कैसा भी हो)।
यह एक कक्षा-चर्चा गतिविधि है। विद्यार्थी इस बात पर चर्चा करें कि जिस प्रकार ब्रह्मांड में हर छोटी-बड़ी वस्तु का अपना महत्व है, उसी प्रकार समाज में भी प्रत्येक व्यक्ति चाहे उसका लिंग, आयु, धर्म, शारीरिक क्षमता या रंग-रूप कुछ भी हो, समान सम्मान और अवसर का अधिकारी है। विद्यार्थी दिव्यांगजनों, महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों व वंचित वर्गों को समान अवसर देने के महत्व पर विचार साझा करें।
पता लगाइए कि कौन-सा अंतरिक्ष यान कौन-से ग्रह पर जाएगा।
यह एक चित्र-आधारित भूल-भुलैया (मेज़) गतिविधि है, जिसमें विद्यार्थियों को दी गई रेखाओं का अनुसरण करते हुए प्रत्येक अंतरिक्ष यान को उसके संबंधित ग्रह से जोड़ना होता है। विद्यार्थी पाठ्यपुस्तक में दिए गए चित्र में रेखाओं को ध्यानपूर्वक देखकर सही मिलान करें।
आइए, अब पढ़ते हैं प्रसिद्ध गीत 'होंगे कामयाब'।
भावांतर — गिरिजा कुमार माथुर
गिरिजा कुमार माथुर की अन्य रचनाएँ पुस्तकालय या इंटरनेट पर खोजकर पढ़िए और कक्षा में साझा कीजिए।
विद्यार्थी पुस्तकालय व इंटरनेट की सहायता से गिरिजा कुमार माथुर के काव्य-संग्रहों — मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले, भीतरी नदी की यात्रा, मैं वक्त के हूँ सामने आदि — से कुछ अन्य कविताएँ पढ़ें और उनकी भाषा-शैली व विषय-वस्तु पर कक्षा में चर्चा करें।
नीचे दी गई इंटरनेट कड़ियों की सहायता से 'हम होंगे कामयाब एक दिन', 'कल्पना जो सितारों में खो गई', 'सुनीता अंतरिक्ष में', 'ब्रह्माण्ड और पृथ्वी' तथा 'हौसलों की उड़ान-मंगलयान' विषयों पर जानकारी प्राप्त कीजिए।
विद्यार्थी शिक्षक के मार्गदर्शन में दी गई इंटरनेट कड़ियों की सहायता से 'होंगे कामयाब' गीत, अंतरिक्ष-यात्री सुनीता विलियम्स, ब्रह्मांड व पृथ्वी की संरचना, तथा भारत के मंगलयान मिशन जैसे विषयों पर जानकारी एकत्र करें और कक्षा में प्रस्तुत करें, जिससे कविता में वर्णित ब्रह्मांडीय विस्तार को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी समझा जा सके।
अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न
ये प्रश्न पाठ्यपुस्तक के अभ्यासों से अलग हैं तथा परीक्षा-अभ्यास एवं पुनरावृत्ति हेतु तैयार किए गए हैं।
(अ) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
- 1. 'आदमी का अनुपात' कविता के रचनाकार कौन हैं?
- 2. गिरिजा कुमार माथुर का जन्म किस राज्य में हुआ था?
- 3. गिरिजा कुमार माथुर का जन्म वर्ष क्या है?
- 4. गिरिजा कुमार माथुर का निधन किस वर्ष हुआ?
- 5. कविता के आरंभ में कितने व्यक्ति कमरे में बताए गए हैं?
- 6. कविता के अनुसार कमरा किसमें है?
- 7. कविता में 'नभ गंगा' किसे कहा गया है?
- 8. कविता के अनुसार पृथ्वी कैसी है?
- 9. कविता के अनुसार हर ब्रह्मांड में क्या-क्या हो सकता है?
- 10. "यह है अनुपात, आदमी का विराट से" — यहाँ 'विराट' शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
- 11. कविता के अनुसार आदमी किन भावों में लीन रहता है?
- 12. 'संख्यातीत शंख सी दीवारें' पंक्ति में 'दीवारें' किसका प्रतीक हैं?
- 13. आदमी स्वयं को दूसरों का क्या बताता है?
- 14. कविता की अंतिम पंक्तियों में कवि किस बात पर व्यंग्य करते हैं?
- 15. 'शंख' भारतीय संख्या-प्रणाली में किस संख्या को कहा जाता है?
- 16. 'लीन' शब्द का अर्थ है—
- 17. गिरिजा कुमार माथुर किस प्रसिद्ध काव्य-संकलन के सात कवियों में से एक थे?
- 18. गिरिजा कुमार माथुर को 'मैं वक्त के हूँ सामने' के लिए कौन-सा पुरस्कार मिला?
- 19. 'होंगे कामयाब' गीत मूल रूप से किस भाषा के गीत का भावांतर है?
- 20. गिरिजा कुमार माथुर किस संस्था में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे?
- 21. 'अनगिन' शब्द का अर्थ है—
- 22. कविता में मानव-स्वभाव की किस प्रवृत्ति की सबसे तीखी आलोचना की गई है?
- 23. 'परिधि' शब्द का अर्थ है—
- 24. कविता की भाषा-शैली की दृष्टि से इसे किस प्रकार की कविता कहा जा सकता है?
- 25. कविता का केंद्रीय संदेश क्या है?
(ब) अति लघु उत्तरीय प्रश्न
- 1. 'आदमी का अनुपात' कविता के कवि कौन हैं?
इस कविता के कवि गिरिजा कुमार माथुर हैं।
- 2. गिरिजा कुमार माथुर का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उनका जन्म 22 अगस्त 1919 को मध्य प्रदेश के अशोकनगर जनपद में हुआ था।
- 3. कविता के आरंभ में किस दृश्य का वर्णन है?
कविता के आरंभ में एक कमरे में बैठे दो व्यक्तियों का वर्णन है, जो कमरे से छोटे हैं।
- 4. कविता में विस्तार की शृंखला किससे शुरू होकर किसमें समाप्त होती है?
यह शृंखला कमरे से शुरू होकर घर, मुहल्ला, नगर, प्रदेश, देश, पृथ्वी होते हुए अंततः लाखों ब्रह्मांडों तक जाकर समाप्त होती है।
- 5. कविता के अनुसार पृथ्वी की स्थिति कैसी बताई गई है?
पृथ्वी को अनगिनत नक्षत्रों में एक छोटी और करोड़ों में एक वस्तु बताया गया है।
- 6. 'नभ गंगा' से क्या तात्पर्य है?
'नभ गंगा' से तात्पर्य आकाशगंगा से है।
- 7. कविता के अनुसार हर ब्रह्मांड में क्या-क्या हो सकता है?
हर ब्रह्मांड में कितनी ही पृथ्वियाँ, कितनी ही भूमियाँ और कितनी ही सृष्टियाँ हो सकती हैं।
- 8. "यह है अनुपात" पंक्ति किसके अनुपात की बात करती है?
यह पंक्ति आदमी और विराट ब्रह्मांड के बीच के अनुपात की बात करती है।
- 9. कविता के अनुसार आदमी किन भावों में डूबा रहता है?
वह ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास में डूबा रहता है।
- 10. आदमी कैसी दीवारें उठाता है?
वह संख्यातीत (असंख्य) शंख सी दीवारें उठाता है।
- 11. आदमी अपने को क्या बताता है?
वह अपने को दूसरे का स्वामी (मालिक) बताता है।
- 12. कविता की अंतिम पंक्ति में आदमी एक कमरे में क्या रचाता है?
वह एक कमरे में दो दुनिया रचाता है।
- 13. 'शंख' संख्या का क्या अर्थ है?
'शंख' भारतीय संख्या-प्रणाली में 100 पद्म की संख्या को कहा जाता है।
- 14. गिरिजा कुमार माथुर किस प्रसिद्ध काव्य-संकलन से जुड़े थे?
वे 1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित 'तारसप्तक' से जुड़े थे।
- 15. गिरिजा कुमार माथुर के दो प्रमुख काव्य-संग्रहों के नाम बताइए।
मंजीर तथा शिलापंख चमकीले उनके दो प्रमुख काव्य-संग्रह हैं।
- 16. गिरिजा कुमार माथुर की रचना किस प्रसिद्ध गीत का भावांतर है?
'होंगे कामयाब' नामक प्रसिद्ध गीत उनका भावांतर है।
- 17. 'अहं' शब्द का अर्थ बताइए।
'अहं' का अर्थ है अहंकार, घमंड।
- 18. 'विराट' शब्द का अर्थ बताइए।
'विराट' का अर्थ है अत्यंत बड़ा, विशाल।
- 19. कविता में प्रयुक्त कोई एक मुहावरा बताइए।
"अपने को दूजे का स्वामी बताना" — यह एक मुहावरेदार प्रयोग है, जो श्रेष्ठता व अहंकार की भावना दर्शाता है।
- 20. कविता का केंद्रीय भाव संक्षेप में बताइए।
कविता का केंद्रीय भाव यह है कि विराट ब्रह्मांड के अनुपात में अत्यंत सूक्ष्म होते हुए भी मनुष्य अहंकार, ईर्ष्या व स्वार्थ के कारण दीवारें खड़ी कर लेता है।
(स) लघु उत्तरीय प्रश्न
- 1. कविता में कवि ने कमरे से ब्रह्मांड तक की यात्रा किस क्रम में दिखाई है?
कवि ने यह यात्रा कमरा → घर → मुहल्ला → नगर → प्रदेश → देश → पृथ्वी → नक्षत्र → ब्रह्मांड के क्रम में दिखाई है, जिसमें प्रत्येक छोटी इकाई अगली बड़ी इकाई में समाई हुई है।
- 2. "पृथ्वी एक छोटी, करोड़ों में एक ही" पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
इस पंक्ति का भाव है कि हमारी पृथ्वी, जिसे हम विशाल और महत्वपूर्ण मानते हैं, वास्तव में असंख्य नक्षत्रों-ग्रहों में से एक साधारण और छोटी वस्तु मात्र है, जो ब्रह्मांड की विशालता के सामने अत्यंत नगण्य है।
- 3. कविता के अनुसार मनुष्य की कौन-सी नकारात्मक प्रवृत्तियाँ बताई गई हैं?
कविता के अनुसार मनुष्य ईर्ष्या, अहं (अहंकार), स्वार्थ, घृणा और अविश्वास जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों में लीन रहता है, जिसके कारण वह दूसरों से दूरी व भेदभाव बनाए रखता है।
- 4. "संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है" पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
इसका आशय है कि मनुष्य असंख्य (गिनती से परे) दीवारें, अर्थात जाति, धर्म, वर्ग, संपत्ति व विचारधारा के आधार पर भेदभाव व अलगाव की सीमाएँ खड़ी करता चला जाता है, जिससे समाज में विभाजन बढ़ता है।
- 5. कविता की अंतिम पंक्तियों में निहित व्यंग्य स्पष्ट कीजिए।
अंतिम पंक्तियों में कवि व्यंग्य करते हैं कि देशों के बीच के मतभेद की तो बात ही क्या करें, मनुष्य एक ही कमरे में रहकर भी अपने व दूसरे व्यक्ति के बीच दो अलग-अलग दुनिया बना लेता है। यह मनुष्य की संकीर्ण और विभाजनकारी मानसिकता पर तीखा कटाक्ष है।
- 6. कविता में 'अनुपात' शब्द का प्रयोग किस विशेष अर्थ में हुआ है?
यहाँ 'अनुपात' का प्रयोग मनुष्य के आकार और विराट ब्रह्मांड के बीच के तुलनात्मक संबंध को दर्शाने के लिए हुआ है — यह स्पष्ट करने के लिए कि मनुष्य इस अनंत सृष्टि के सामने कितना सूक्ष्म और नगण्य है।
- 7. गिरिजा कुमार माथुर के जीवन व साहित्यिक योगदान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
गिरिजा कुमार माथुर (1919–1994) 'तारसप्तक' के प्रमुख कवियों में से एक थे। उन्होंने कविता के साथ-साथ नाटक, गीत, कहानी व निबंध भी लिखे। उनकी प्रमुख कृतियों में मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले तथा मैं वक्त के हूँ सामने शामिल हैं। उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार व व्यास सम्मान से सम्मानित किया गया, तथा उन्होंने प्रसिद्ध भावांतर गीत 'होंगे कामयाब' की भी रचना की।
- 8. कविता में मानव के आत्ममुग्ध/अहंकारी स्वभाव को किन पंक्तियों से दर्शाया गया है?
"इस पर भी आदमी / ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास लीन / संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है। / अपने को दूजे का स्वामी बताता है" — इन पंक्तियों से मानव के अहंकारी व आत्ममुग्ध स्वभाव का स्पष्ट चित्रण होता है।
- 9. कविता की भाषा-शैली की विशेषताएँ लिखिए।
कविता की भाषा सरल, संक्षिप्त और भावपूर्ण है। इसमें तत्सम शब्दावली (अनुपात, विराट, संख्यातीत आदि) का प्रयोग हुआ है। कविता मुक्त छंद में रची गई है, जिसमें छोटी-छोटी पंक्तियाँ और शब्दों की क्रमिक पुनरावृत्ति ('में' शब्द की बार-बार आवृत्ति) से एक विशेष लय उत्पन्न हुई है।
- 10. कविता से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
यह कविता हमें सिखाती है कि हमें अपनी लघुता और सीमाओं को समझते हुए अहंकार, ईर्ष्या व स्वार्थ को त्यागकर व्यापक, समावेशी और सहअस्तित्व की भावना अपनानी चाहिए, क्योंकि इस विराट सृष्टि के सामने मनुष्य का अस्तित्व अत्यंत सूक्ष्म है।
- 11. कविता में प्रयुक्त 'नभ गंगा' और 'ब्रह्मांड' जैसे शब्दों का महत्व स्पष्ट कीजिए।
'नभ गंगा' (आकाशगंगा) और 'ब्रह्मांड' जैसे शब्द कविता में विराटता और असीमता का बोध कराने के लिए प्रयुक्त हुए हैं। ये शब्द मनुष्य की सीमित सोच को चुनौती देकर उसे यह अहसास कराते हैं कि सृष्टि कितनी विशाल व रहस्यमय है।
- 12. "देशों की कौन कहे" पंक्ति का प्रयोग कवि ने क्यों किया होगा?
कवि ने इस पंक्ति का प्रयोग यह दर्शाने के लिए किया है कि मनुष्य का संकीर्ण और विभाजनकारी स्वभाव इतना गहरा है कि देशों के बीच के बड़े मतभेदों की चर्चा तो दूर, वह अपने सबसे निकटतम व्यक्ति से भी, एक ही कमरे में रहकर भी, दूरी बना लेता है।
- 13. कविता में प्रकृति व ब्रह्मांड के वर्णन का क्या उद्देश्य है?
ब्रह्मांड के वर्णन का उद्देश्य मनुष्य को उसकी वास्तविक स्थिति का बोध कराना है — कि वह इस अनंत सृष्टि के सामने अत्यंत सूक्ष्म व नगण्य है, ताकि वह अपने अहंकार व संकीर्ण दृष्टिकोण को त्यागकर विनम्रता व व्यापकता अपनाए।
- 14. कविता में 'दीवार' शब्द का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?
'दीवार' यहाँ केवल भौतिक दीवार नहीं है, बल्कि यह मनुष्यों के बीच जाति, धर्म, वर्ग, अहंकार व स्वार्थ के कारण उत्पन्न मानसिक व सामाजिक दूरी और भेदभाव का प्रतीक है।
- 15. कविता की तुलना यदि किसी दर्पण से की जाए तो यह उपमा कितनी उपयुक्त है?
यह उपमा अत्यंत उपयुक्त है, क्योंकि यह कविता मानो एक दर्पण की भाँति मनुष्य को उसके भीतर छिपे अहंकार, ईर्ष्या व स्वार्थ का वास्तविक प्रतिबिंब दिखाकर आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।
- 16. गिरिजा कुमार माथुर ने अपनी किस कृति के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त किया?
उन्हें अपने काव्य-संग्रह 'मैं वक्त के हूँ सामने' के लिए वर्ष 1991 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।
- 17. कविता में प्रयुक्त संख्यावाचक शब्दों (अनगिन, करोड़ों, लाखों, संख्यातीत) का क्या प्रभाव पड़ता है?
इन संख्यावाचक शब्दों के प्रयोग से ब्रह्मांड की अकल्पनीय विशालता और मनुष्य की नकारात्मक भावनाओं व दीवारों की अधिकता, दोनों का सशक्त व प्रभावी चित्रण होता है, जिससे कविता की अभिव्यक्ति अधिक गहन बन जाती है।
- 18. "इस पर भी आदमी" पंक्ति में 'इस पर भी' का क्या महत्व है?
'इस पर भी' शब्द-समूह विरोधाभास को उजागर करता है — इतना सूक्ष्म व नगण्य होने के बावजूद भी मनुष्य अहंकार व स्वार्थ में डूबा रहता है, जो कविता के मूल व्यंग्य को स्पष्ट करता है।
- 19. कविता में मनुष्य के व्यवहार और ब्रह्मांड के आकार के बीच के विरोधाभास को स्पष्ट कीजिए।
ब्रह्मांड के अनुपात में मनुष्य का आकार अत्यंत सूक्ष्म है, फिर भी उसका अहंकार, स्वार्थ व सत्ता की भावना असीम है — यही विरोधाभास कविता का केंद्रीय बिंदु है, जो मनुष्य की तुच्छता व अहंकार के बीच के अंतर को उजागर करता है।
- 20. कविता के शीर्षक 'आदमी का अनुपात' की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
यह शीर्षक पूर्णतः सार्थक है, क्योंकि पूरी कविता का केंद्रीय विषय ही आदमी और विराट ब्रह्मांड के बीच के तुलनात्मक अनुपात को दर्शाना है, जिसके माध्यम से मानव-स्वभाव की सीमाओं व अहंकार को उजागर किया गया है।
(द) महत्वपूर्ण प्रश्न
- 1. 'आदमी का अनुपात' कविता में विराटता और लघुता के अनुपात को कवि ने किस प्रकार व्यक्त किया है? विस्तार से लिखिए।
कवि ने एक क्रमिक विस्तार-शैली अपनाकर विराटता व लघुता के अनुपात को व्यक्त किया है। कविता की शुरुआत एक कमरे में बैठे दो व्यक्तियों से होती है, जो कमरे से छोटे हैं। इसके बाद कवि कमरे को घर में, घर को मुहल्ले में, मुहल्ले को नगर में, नगर को प्रदेश में, प्रदेश को देश में, और देश को पृथ्वी में समाहित दिखाते हैं। फिर पृथ्वी को अनगिनत नक्षत्रों में एक छोटी वस्तु और करोड़ों में एक बताया जाता है। इसके आगे आकाशगंगा (नभ गंगा) और लाखों ब्रह्मांडों का उल्लेख होता है, जिनमें से हर एक में अनगिनत पृथ्वियाँ, भूमियाँ व सृष्टियाँ हो सकती हैं। इस प्रकार धीरे-धीरे बढ़ते हुए विस्तार से कवि यह स्पष्ट करते हैं कि आदमी इस विराट सृष्टि के सामने अत्यंत सूक्ष्म व नगण्य है — यही कविता का केंद्रीय 'अनुपात' है।
- 2. कविता में वर्णित मानव-स्वभाव की नकारात्मक प्रवृत्तियों का विश्लेषण कीजिए और बताइए कि ये प्रवृत्तियाँ समाज को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।
कविता के अनुसार मनुष्य ईर्ष्या (दूसरों की उन्नति देखकर जलन), अहं (अहंकार), स्वार्थ (केवल अपने हित की चिंता), घृणा (नफ़रत) और अविश्वास जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों में लीन रहता है। ये प्रवृत्तियाँ समाज में गहरा प्रभाव डालती हैं — इनके कारण मनुष्य आपस में असंख्य दीवारें (भेदभाव, वैमनस्य) खड़ी कर लेता है, स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ व उनका स्वामी समझने लगता है, और यहाँ तक कि निकटतम संबंधों में भी दूरी व अलगाव पैदा हो जाता है। इस प्रकार ये प्रवृत्तियाँ सामाजिक सौहार्द, सहयोग व एकता को नष्ट कर समाज को खंडित व संघर्षरत बना देती हैं।
- 3. 'आदमी का अनुपात' कविता के आधार पर गिरिजा कुमार माथुर के काव्य-कौशल व शैली की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
इस कविता में गिरिजा कुमार माथुर का काव्य-कौशल कई रूपों में उभरकर आता है — पहला, वे बहुत ही संक्षिप्त और छोटी-छोटी पंक्तियों में गहन दार्शनिक भाव व्यक्त करने में सक्षम हैं; दूसरा, क्रमिक विस्तार की शैली (कमरे से ब्रह्मांड तक) अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अपनाई गई है; तीसरा, तत्सम व संस्कृतनिष्ठ शब्दावली (अनुपात, विराट, संख्यातीत, अविश्वास) का सटीक प्रयोग हुआ है; चौथा, अंतिम पंक्तियों में तीखा व्यंग्य कविता को विचारोत्तेजक बना देता है। यह कविता उनकी प्रयोगधर्मी काव्य-प्रवृत्ति (जो 'तारसप्तक' के कवियों की पहचान थी) को भी प्रतिबिंबित करती है।
- 4. कविता के शीर्षक 'आदमी का अनुपात' की सार्थकता एवं औचित्य पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
कविता का शीर्षक 'आदमी का अनुपात' अत्यंत सटीक व सार्थक है क्योंकि संपूर्ण कविता इसी विषय के इर्द-गिर्द घूमती है — कमरे से लेकर लाखों ब्रह्मांडों तक की यात्रा कराकर कवि यह स्पष्ट करते हैं कि आदमी इस अनंत सृष्टि के सामने कितना सूक्ष्म है, यही 'अनुपात' है। इसके बाद कविता इसी अनुपात के विरोधाभास को उजागर करती है — इतना छोटा होकर भी आदमी विशाल अहंकार व स्वार्थ पालता है। इस प्रकार शीर्षक न केवल कविता की विषय-वस्तु को, बल्कि उसके संपूर्ण भाव व व्यंग्य को भी सटीक रूप से समेटता है।
- 5. यदि मनुष्य वास्तव में अपनी लघुता (ब्रह्मांड के अनुपात में छोटेपन) को समझ ले, तो उसके व्यवहार व समाज में क्या परिवर्तन आ सकते हैं? तर्कसहित लिखिए।
यदि मनुष्य सचमुच अपनी लघुता को समझ ले, तो वह अहंकार, ईर्ष्या व स्वार्थ जैसी भावनाओं को त्यागकर विनम्र व व्यापक दृष्टिकोण अपनाएगा। वह यह समझेगा कि जाति, धर्म, संपत्ति या सत्ता के आधार पर दूसरों पर श्रेष्ठता जताना निरर्थक है, क्योंकि इस विराट ब्रह्मांड के सामने सभी मनुष्य समान रूप से सूक्ष्म हैं। इससे समाज में सहयोग, सहिष्णुता व सौहार्द बढ़ेगा, आपसी संघर्ष व भेदभाव कम होंगे, तथा मानवता एक अधिक समावेशी व शांतिपूर्ण दिशा में आगे बढ़ सकेगी।
- 6. कविता की भाषा-शैली में प्रयुक्त पुनरावृत्ति (शब्दों की बार-बार आवृत्ति) के काव्यात्मक प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।
कविता में "में" शब्द की बार-बार आवृत्ति (घर में, मुहल्ले में, नगर में, प्रदेश में आदि) एक विशेष लयात्मकता उत्पन्न करती है, जिससे पाठक को क्रमिक विस्तार का बोध सहजता से होता जाता है। यह पुनरावृत्ति मानो एक सीढ़ी की तरह पाठक को कमरे से ब्रह्मांड तक चढ़ाती है। इसी प्रकार 'कितनी ही' शब्द की पुनरावृत्ति (पृथ्वियाँ, भूमियाँ, सृष्टियाँ) ब्रह्मांड की अनंतता व असंख्यता के भाव को और गहरा करती है। यह शैलीगत पुनरावृत्ति कविता को एक सधी हुई लय और गहन प्रभाव प्रदान करती है।
- 7. 'आदमी का अनुपात' कविता को वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों (जैसे युद्ध, विभाजन, असहिष्णुता) के संदर्भ में कितना प्रासंगिक मानते हैं? अपने विचार स्पष्ट कीजिए।
यह कविता वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में अत्यंत प्रासंगिक है। आज भी विश्व में युद्ध, जातीय व धार्मिक विभाजन, असहिष्णुता तथा सत्ता व संसाधनों के लिए संघर्ष व्याप्त हैं, जबकि मानवता ब्रह्मांड के अनुपात में अत्यंत सूक्ष्म व नाशवान है। यह कविता हमें यह याद दिलाती है कि इतने विराट ब्रह्मांड के सामने मनुष्यों के बीच के छोटे-छोटे मतभेद, सीमाएँ व श्रेष्ठता की भावना कितनी निरर्थक हैं। यदि विश्व-समुदाय इस भाव को आत्मसात करे, तो युद्ध व विभाजन के स्थान पर सहयोग व शांति की स्थापना संभव हो सकती है।
- 8. कविता में प्रयुक्त प्रतीकों (दीवार, स्वामी, दो दुनिया) का गहन अर्थ स्पष्ट कीजिए।
'दीवार' मनुष्यों के बीच की मानसिक, सामाजिक व भावनात्मक दूरी का प्रतीक है, जो जाति, धर्म, वर्ग या व्यक्तिगत अहंकार से उत्पन्न होती है। 'स्वामी' शब्द सत्ता, वर्चस्व व श्रेष्ठता की भावना का प्रतीक है, जिसके माध्यम से मनुष्य दूसरों पर नियंत्रण चाहता है। 'दो दुनिया' प्रतीक है उस विभाजन का, जो निकटतम संबंधों में भी उत्पन्न हो जाता है — भले ही दो व्यक्ति भौतिक रूप से एक ही स्थान (कमरे) में क्यों न हों, मानसिक व भावनात्मक रूप से वे पूर्णतः भिन्न व अलग-थलग दुनिया में जी रहे होते हैं। ये तीनों प्रतीक मिलकर मनुष्य के अहंकार-जनित विभाजन को गहराई से उजागर करते हैं।
- 9. 'आदमी का अनुपात' और गिरिजा कुमार माथुर के भावांतर गीत 'होंगे कामयाब' के भाव में क्या समानता या अंतर देखा जा सकता है?
दोनों रचनाओं में एक गहरा वैचारिक संबंध देखा जा सकता है। 'आदमी का अनुपात' मनुष्य के भीतर की नकारात्मकता — ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ व विभाजन — को उजागर करती है, जबकि 'होंगे कामयाब' गीत आशा, एकता, विश्वास व सामूहिक संघर्ष से बेहतर भविष्य की स्थापना का सकारात्मक संदेश देता है ("हम चलेंगे साथ-साथ, डाल हाथों में हाथ")। इस प्रकार दोनों रचनाएँ एक-दूसरे की पूरक प्रतीत होती हैं — पहली मनुष्य की समस्या (विभाजनकारी प्रवृत्ति) को दिखाती है, तो दूसरी उसका समाधान (एकता व सहयोग) प्रस्तुत करती है।
- 10. यदि आपको इस कविता के आधार पर विद्यार्थियों के लिए एक संदेश तैयार करना हो, तो आप क्या लिखेंगे?
विद्यार्थी अपने विचार के अनुसार संदेश तैयार कर सकते हैं, जैसे— "प्रिय मित्रो, यह विराट ब्रह्मांड हमें सिखाता है कि हम सब इसके सामने अत्यंत सूक्ष्म हैं। इसलिए आइए, हम ईर्ष्या, अहंकार व स्वार्थ की दीवारें गिराकर एक-दूसरे के साथ प्रेम, सहयोग व समानता से रहना सीखें, ताकि हमारा छोटा-सा जीवन भी इस विशाल सृष्टि में सार्थक बन सके।" ऐसा संदेश कविता के मूल भाव — विराटता के सामने विनम्रता — को प्रभावी ढंग से दर्शाता है।
माइंड मैप
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
इस कविता के कवि गिरिजा कुमार माथुर हैं और यह कक्षा 8 की हिंदी पाठ्यपुस्तक 'मल्हार' के नौवें पाठ के रूप में संकलित है।
कविता का केंद्रीय भाव यह है कि विराट ब्रह्मांड के अनुपात में मनुष्य अत्यंत सूक्ष्म और नगण्य है, फिर भी वह ईर्ष्या, अहंकार व स्वार्थ के कारण दूसरों से दीवारें खड़ी करता है और स्वयं को दूसरों का स्वामी मानता है।
'अनुपात' शब्द आदमी के आकार और विराट ब्रह्मांड के आकार के बीच के तुलनात्मक संबंध का प्रतीक है, जो यह दर्शाता है कि मनुष्य इस अनंत सृष्टि के सामने कितना छोटा है।
उनकी प्रमुख कृतियों में मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले, भीतरी नदी की यात्रा तथा मैं वक्त के हूँ सामने प्रमुख हैं। उन्होंने प्रसिद्ध भावांतर गीत 'होंगे कामयाब' की भी रचना की।
इसका अर्थ है कि मनुष्य असंख्य (गिनती से परे) दीवारें, अर्थात भेदभाव व अलगाव की सीमाएँ, खड़ी करता चला जाता है। 'शंख' भारतीय संख्या-प्रणाली में एक अत्यंत बड़ी संख्या (100 पद्म) है, जो इस असंख्यता को और तीव्रता से दर्शाती है।
कविता मुक्त छंद (अतुकांत) में रची गई है, जिसमें छोटी-छोटी पंक्तियाँ, शब्दों की सोद्देश्य पुनरावृत्ति (विशेषकर 'में' शब्द की), तत्सम शब्दावली और अंत में तीखा व्यंग्य इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।
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