रहीम के दोहे
अब्दुर्रहीम खानखाना के अमर नीति-दोहे — प्रेम, परोपकार, संयम और सच्ची मित्रता की कालजयी सीख
1कवि से परिचय — रहीम
रहीम (अब्दुर्रहीम खानखाना) भक्तिकाल के एक प्रसिद्ध कवि थे। ऐसा माना जाता है कि उनका जन्म 16वीं शताब्दी में हुआ था। उन्होंने नीति, भक्ति और प्रेम संबंधी रचनाएँ कीं। उन्होंने अवधी और ब्रजभाषा दोनों में कविताएँ लिखी हैं।
रहीम रामायण, महाभारत आदि प्रसिद्ध ग्रंथों के अच्छे जानकार थे। उनकी मृत्यु 17वीं शताब्दी में हुई थी। आज भी आम जन-जीवन में उनके दोहे बहुत लोकप्रिय हैं।
2पाठ परिचय
प्रस्तुत पाठ में रहीम के सात नीति-दोहे संकलित हैं, जिनमें जीवन की गहरी सीख छिपी है। इनमें छोटे-बड़े सभी की उपयोगिता, परोपकार के लिए संपत्ति संचित करने, प्रेम के धागे को सँभालकर रखने, जल के महत्व, विपत्ति के अस्थायी स्वभाव, वाणी पर संयम रखने और सच्चे मित्र की पहचान जैसे विषयों पर सुंदर और सरल शब्दों में गहरी बात कही गई है। ये दोहे सदियों बाद आज भी उतने ही प्रासंगिक और लोकप्रिय हैं।
3मूल पाठ
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि।।
तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान।।
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय।।
रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।।
रहिमन बिपदाहू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय।।
रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।।
कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत।।
— अब्दुर्रहीम खानखाना
(संदर्भ — रहीम ग्रंथावली, सं. विद्यानिवास मिश्र)
4सरल व्याख्या (भावार्थ)
भाग 1 — छोटे-बड़े का अपना-अपना महत्व
रहीम कहते हैं कि किसी बड़ी वस्तु या व्यक्ति को देखकर छोटी वस्तु या व्यक्ति को तुच्छ समझकर त्याग नहीं देना चाहिए। जहाँ सुई का काम आता है, वहाँ तलवार किसी काम की नहीं होती। अर्थात हर छोटी-बड़ी वस्तु की अपनी उपयोगिता और महत्व होता है।
भाग 2 — परोपकार के लिए संपत्ति का संचय
पेड़ स्वयं अपने फल नहीं खाते और तालाब स्वयं अपना पानी नहीं पीते। रहीम कहते हैं कि इसी प्रकार समझदार (सुजान) व्यक्ति भी दूसरों की भलाई (पर-काज हित) के लिए ही धन-संपत्ति इकट्ठा करते हैं, अपने स्वार्थ के लिए नहीं।
भाग 3 — प्रेम के धागे को सँभालकर रखना
रहीम प्रेम की तुलना एक नाज़ुक धागे से करते हुए कहते हैं कि इसे कभी झटके से मत तोड़ो। क्योंकि एक बार टूटा हुआ धागा अगर दोबारा जोड़ा भी जाए, तो उसमें गाँठ पड़ जाती है — यानी टूटा हुआ रिश्ता भले ही सुधर जाए, फिर भी उसमें पहले जैसी सहजता नहीं रह पाती।
भाग 4 — जल का महत्व
रहीम कहते हैं कि पानी (आब/चमक अथवा सम्मान) को सदैव बचाकर रखना चाहिए, क्योंकि पानी के बिना सब कुछ सूना (व्यर्थ) है। मोती अपनी चमक (पानी) खोकर बेकार हो जाता है, आटा (चून) बिना पानी के गूँधा नहीं जा सकता, और मनुष्य बिना सम्मान (पानी) के जीवन व्यर्थ है — एक बार यह 'पानी' चला जाए तो वापस नहीं आता।
भाग 5 — विपत्ति का अस्थायी स्वभाव और उसकी उपयोगिता
रहीम कहते हैं कि विपत्ति (मुसीबत) भी भली होती है, बशर्ते वह थोड़े ही दिनों की हो, क्योंकि विपत्ति के समय में ही यह पता चलता है कि इस संसार में कौन हमारा हितैषी (सच्चा साथी) है और कौन अहितकर (स्वार्थी)।
भाग 6 — वाणी पर संयम रखने की सीख
रहीम जीभ को 'बावरी' (पागल) बताते हुए कहते हैं कि यह इतनी उतावली होती है कि स्वर्ग-पाताल तक की बड़ी-बड़ी बातें बोल देती है, पर स्वयं मुँह के भीतर ही रहती है, जबकि इन बड़ी बातों का परिणाम भुगतना पड़ता है — सिर को जूतियाँ (यानी बुरा परिणाम/अपमान) सहना पड़ता है। इसलिए सोच-समझकर बोलना चाहिए।
भाग 7 — सच्चे मित्र की पहचान
रहीम कहते हैं कि संपत्ति (सुख-समृद्धि) के समय तो बहुत से लोग कई तरह से रिश्तेदार और मित्र बन जाते हैं, परंतु सच्चे मित्र वही होते हैं जो विपत्ति की कसौटी पर कसे जाने पर भी साथ न छोड़ें।
5शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| लघु | छोटा |
| डारि (डारना) | त्याग देना, फेंक देना |
| सुई | सिलाई का एक छोटा उपकरण |
| कहा करे | क्या कर सकती है |
| तरुवर | पेड़, वृक्ष |
| सरवर | सरोवर, तालाब |
| पियहिं | पीते हैं |
| सुजान | समझदार, बुद्धिमान, चतुर |
| छिटकाय | झटके से/छिटककर तोड़ना |
| गाँठ परि जाय | गाँठ पड़ जाना |
| बिनु | बिना |
| सून | सूना, खाली, व्यर्थ |
| ऊबरै | बच पाना, उबर पाना |
| चून | आटा |
| बिपदाहू | विपत्ति भी |
| थोरे | थोड़े |
| हित अनहित | भलाई करने वाला और बुराई करने वाला |
| जिह्वा | जीभ |
| बावरी | पागल, उतावली |
| सरग पताल | स्वर्ग और पाताल — यानी बहुत बड़ी-बड़ी बातें |
| कपाल | सिर, खोपड़ी |
| बिपति | विपत्ति, मुसीबत |
| कसौटी | परखने का पत्थर/मापदंड |
| साँचे मीत | सच्चे मित्र |
6पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
मेरी समझ से (क)
- "रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल। आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।" दोहे का भाव है—
- सोच-समझकर बोलना चाहिए ✔
- मधुर वाणी में बोलना चाहिए
- धीरे-धीरे बोलना चाहिए
- सदा सच बोलना चाहिए
- "रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि। जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि।" इस दोहे का भाव क्या है?
- तलवार सुई से बड़ी होती है
- सुई का काम तलवार नहीं कर सकती
- तलवार का महत्व सुई से ज़्यादा है
- हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है ✔
मिलकर करें मिलान
| स्तंभ 1 — दोहा | स्तंभ 2 — भाव |
|---|---|
| 1. रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय। टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय।। | 3. प्रेम या रिश्तों को सहेजकर रखना चाहिए। |
| 2. कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत। बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत।। | 2. सच्चे मित्र विपत्ति या विपदा में भी साथ रहते हैं। |
| 3. तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान। कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान।। | 1. सज्जन परहित के लिए ही संपत्ति संचित करते हैं। |
पंक्तियों पर चर्चा
(क) "रहिमन बिपदाहू भली, जो थोरे दिन होय। हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय।।"
अर्थ — विपत्ति भी अच्छी होती है, बशर्ते वह थोड़े ही दिनों की हो, क्योंकि मुसीबत के समय ही यह साफ़ पता चल जाता है कि दुनिया में कौन हमारा सच्चा हितैषी है और कौन स्वार्थी। विपत्ति हमें अपनों और परायों की पहचान कराती है।
(ख) "रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल। आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।।"
अर्थ — जीभ बहुत उतावली होती है और बिना सोचे-समझे बड़ी-बड़ी बातें बोल देती है। बोलने के बाद तो जीभ मुँह के भीतर सुरक्षित रह जाती है, लेकिन उसके कारण होने वाले बुरे परिणाम (अपमान, झगड़ा) सिर को झेलने पड़ते हैं। इसलिए वाणी पर संयम रखना अत्यंत आवश्यक है।
सोच-विचार के लिए
1. (क) "रहिमन धागा प्रेम का..." दोहे में 'मिले' के स्थान पर 'जुड़े', 'छिटकाय' के स्थान पर 'चटकाय', 'डारि' के स्थान पर 'डार', 'तलवारि' के स्थान पर 'तरवार' और 'मानुष' के स्थान पर 'मानस' का प्रयोग भी लोक में प्रचलित है। ऐसा क्यों होता है?
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये दोहे सदियों से मौखिक (जुबानी) परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और बोलियों में लोग इन्हें अपने उच्चारण और सुविधा के अनुसार थोड़ा बदलकर बोलते हैं, जिससे एक ही दोहे के कई प्रचलित रूप बन जाते हैं, फिर भी उनका मूल भाव एक समान रहता है।
1. (ख) इस दोहे में प्रेम के उदाहरण में धागे का प्रयोग ही क्यों किया गया है? क्या आप धागे के स्थान पर कोई अन्य उदाहरण सुझा सकते हैं?
धागे का उदाहरण इसलिए उपयुक्त है क्योंकि धागा बहुत नाज़ुक होता है और एक बार टूटने पर दोबारा जोड़े जाने पर भी उसमें गाँठ पड़ जाती है, ठीक वैसे ही जैसे टूटा हुआ रिश्ता सुधर तो सकता है पर पहले जैसा सहज नहीं रह पाता। अन्य उदाहरण — काँच का बर्तन (टूटने पर जोड़ने से भी दरार की रेखा साफ़ दिखती है) भी इसी भाव को दर्शा सकता है।
2. "तरुवर फल नहिं खात हैं..." इस दोहे में प्रकृति के माध्यम से मनुष्य के किस मानवीय गुण की बात की गई है? प्रकृति से हम और क्या-क्या सीख सकते हैं?
इस दोहे में परोपकार (दूसरों की भलाई के लिए काम करने) के गुण की बात की गई है। प्रकृति से हम त्याग, निःस्वार्थ सेवा और परोपकार जैसे गुण सीख सकते हैं — जैसे पेड़ स्वयं अपने फल नहीं खाते, नदी-तालाब स्वयं अपना पानी नहीं पीते, और बादल वर्षा करके धरती को लाभ पहुँचाते हैं, अपने लिए कुछ नहीं रखते।
शब्दों की बात — शब्द-संपदा
कविता में आए कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। इन शब्दों को अपनी मातृभाषा/मानक हिंदी में समानार्थक रूप से लिखिए—
| कविता में आए शब्द | समानार्थक शब्द |
|---|---|
| तरुवर | पेड़, वृक्ष |
| बिपति | विपत्ति, मुसीबत, संकट |
| छिटकाय | झटके से/छिटककर |
| सुजान | समझदार, बुद्धिमान |
| सरवर | सरोवर, तालाब |
| साँचे | सच्चे |
| कपाल | सिर, खोपड़ी |
शब्द एक अर्थ अनेक
"रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।।" इस दोहे में 'पानी' शब्द के तीन अर्थ हैं — सम्मान, जल, चमक। इसी प्रकार नीचे दिए गए शब्दों के भी तीन-तीन अर्थ लिखिए—
| शब्द | तीन अर्थ |
|---|---|
| कल | आने वाला दिन (भविष्य), बीता हुआ दिन (भूतकाल), चैन/सुकून (जैसे 'कल न पड़ना') |
| पत्र | चिट्ठी, पत्ता (पेड़ का), समाचार-पत्र |
| कर | हाथ, टैक्स/चुंगी, किरण (जैसे सूर्य-कर) |
| फल | वृक्ष का फल, परिणाम, हथियार की धार/नोक (जैसे भाले का फल) |
आपकी बात
अपने मनपसंद दोहे को इस तरह की शैली में अपने शब्दों में लिखिए। दोहा पाठ से या पाठ से बाहर का हो सकता है।
(व्यक्तिगत उत्तर है।) उदाहरण — कबीर का दोहा "बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।" इस दोहे का भाव है — केवल शरीर या पद से बड़ा होना काफी नहीं, बड़प्पन तभी सार्थक है जब हम दूसरों के काम आ सकें। खजूर का पेड़ ऊँचा तो होता है, पर न तो राहगीर को छाया देता है और न उसका फल आसानी से मिलता है — इसी तरह जो व्यक्ति ऊँचे पद पर होकर भी दूसरों की सहायता नहीं करता, उसकी ऊँचाई व्यर्थ है।
सरगम
आज की पहेली
1. "दो अक्षर का मेरा नाम, आता हूँ खाने के काम। उल्टा होकर नाच दिखाऊँ, मैं क्यों अपना नाम बताऊँ।"
उत्तर — थाली। थाली भोजन खाने के काम आती है, और जब उसे उलटा करके ज़ोर से घुमाया जाए तो वह लट्टू की तरह घूमती हुई नाचती-सी प्रतीत होती है।
2. "एक किले के दो ही द्वार, उनमें सैनिक लकड़ीदार। टकराएँ जब दीवारों से, जल उठे सारा संसार।"
उत्तर — माचिस। माचिस की डिब्बी (किला) में लकड़ी की तीलियाँ (लकड़ीदार सैनिक) होती हैं, जिन्हें डिब्बी के किनारे (दीवार) से रगड़ने/टकराने पर आग जल उठती है, जो हर जगह उपयोग में आती है (सारा संसार जल उठे)।
खोजबीन के लिए
7पाठ का सार — माइंड मैप
8अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
रहीम कौन थे?
रहीम (अब्दुर्रहीम खानखाना) भक्तिकाल के एक प्रसिद्ध कवि थे, जिनका जन्म 16वीं शताब्दी में हुआ था और जिन्होंने नीति, भक्ति और प्रेम पर सुंदर दोहे लिखे।
"रहिमन धागा प्रेम का..." दोहे का क्या भाव है?
प्रेम के धागे को कभी झटके से नहीं तोड़ना चाहिए, क्योंकि टूटा हुआ धागा दोबारा जोड़े जाने पर भी उसमें गाँठ पड़ जाती है — रिश्ते भी वैसे ही होते हैं।
रहीम के अनुसार सच्चा मित्र कौन है?
रहीम के अनुसार वही सच्चा मित्र है जो विपत्ति की कसौटी पर कसे जाने पर भी साथ न छोड़े।
"पानी" शब्द के दोहे में कितने अर्थ बताए गए हैं?
'रहिमन पानी राखिये' दोहे में 'पानी' शब्द के तीन अर्थ हैं — सम्मान, जल और चमक।
रहीम जीभ को 'बावरी' क्यों कहते हैं?
क्योंकि जीभ बिना सोचे-समझे बड़ी-बड़ी बातें बोल देती है, जिसके बुरे परिणाम बाद में भुगतने पड़ते हैं — इसलिए रहीम वाणी पर संयम रखने की सीख देते हैं।
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सुझाया गया शीर्षक: रहीम के दोहे — कक्षा 6 हिंदी मल्हार पाठ 5: भावार्थ, शब्दार्थ और संपूर्ण प्रश्नोत्तर
मेटा विवरण: कक्षा 6 मल्हार पाठ 5 'रहीम के दोहे' का सरल भावार्थ, शब्द-संपदा, कवि परिचय, पहेली-हल (थाली, माचिस) और सभी पाठ्यपुस्तक प्रश्नों के हल — एक ही स्थान पर।
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