मेरी माँ
क्रांतिकारी रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा का मार्मिक अंश — एक माँ के त्याग, साहस और उदार विचारों की अमर कहानी
1लेखक से परिचय — रामप्रसाद 'बिस्मिल'
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक क्रांतिकारी वीरों ने अपना बलिदान दिया। 'सरफ़रोशी की तमन्ना' जैसा तराना लिखने वाले रामप्रसाद 'बिस्मिल' (1897–1927) भी उन्हीं क्रांतिकारियों में से एक थे। मात्र तीस वर्ष की आयु में अंग्रेज़ सरकार द्वारा उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया।
असाधारण प्रतिभा के धनी रामप्रसाद 'बिस्मिल' एक अच्छे कवि और लेखक भी थे। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं जिनमें उनकी आत्मकथा 'निज जीवन की एक छटा' काफ़ी चर्चित रही। जेल में रहते हुए ही उन्होंने चोरी-छिपे यह आत्मकथा लिखी थी, जिसने अंग्रेज़ों के होश उड़ा दिए थे। 'मेरी माँ' उनकी इसी आत्मकथा का एक अंश है।
2पाठ परिचय
प्रस्तुत पाठ में रामप्रसाद 'बिस्मिल' अपनी माँ के प्रति अपार श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। मात्र ग्यारह वर्ष की आयु में ब्याहकर आईं उनकी माँ नितांत अशिक्षित थीं, परंतु अपनी इच्छाशक्ति से उन्होंने स्वयं पढ़ना-लिखना सीखा और बेटियों को भी शिक्षित किया। परिवार के विरोध के बावजूद उन्होंने बिस्मिल का उत्साह कभी कम नहीं होने दिया, जिससे उनमें दृढ़ता और साहस का संचार हुआ। बिस्मिल अपनी माँ को इस पत्र-शैली में अपनी अंतिम श्रद्धांजलि और कृतज्ञता अर्पित करते हैं, यह मानते हुए कि उनकी सफलता और चरित्र-निर्माण में माँ का ही सबसे बड़ा योगदान था।
3मूल पाठ
लखनऊ कांग्रेस में जाने के लिए मेरी बड़ी इच्छा थी। दादीजी और पिताजी तो विरोध करते रहे, किंतु माताजी ने मुझे खर्च दे ही दिया। उसी समय शाहजहाँपुर में सेवा-समिति का आरंभ हुआ था। मैं बड़े उत्साह के साथ सेवा-समिति में सहयोग देता था। पिताजी और दादीजी को मेरे इस प्रकार के कार्य अच्छे न लगते थे, किंतु माताजी मेरा उत्साह भंग न होने देती थीं, जिसके कारण उन्हें अक्सर पिताजी की डाँट-फटकार तथा दंड सहन करना पड़ता था। वास्तव में, मेरी माताजी देवी हैं। मुझमें जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपाओं का ही परिणाम है। दादीजी और पिताजी मेरे विवाह के लिए बहुत अनुरोध करते, किंतु माताजी यही कहतीं कि शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा। माताजी के प्रोत्साहन तथा सद्व्यवहार ने मेरे जीवन में वह दृढ़ता उत्पन्न की कि किसी आपत्ति तथा संकट के आने पर भी मैंने अपने संकल्प को न त्यागा।
एक समय मेरे पिताजी दीवानी मुकदमे में किसी पर दावा करके वकील से कह गए थे कि जो काम हो वह मुझसे करा लें। कुछ आवश्यकता पड़ने पर वकील साहब ने मुझे बुला भेजा और कहा कि मैं पिताजी के हस्ताक्षर वकालतनामे पर कर दूँ। मैंने तुरंत उत्तर दिया कि यह तो धर्मविरुद्ध होगा, इस प्रकार का पाप मैं कदापि नहीं कर सकता। वकील साहब ने बहुत समझाया कि मुकदमा खारिज हो जाएगा। किंतु मुझ पर कुछ भी प्रभाव न हुआ, न मैंने हस्ताक्षर किए। अपने जीवन में हमेशा सत्य का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाए, सत्य बात कह देता था।
ग्यारह वर्ष की उम्र में माताजी विवाह कर शाहजहाँपुर आई थीं। उस समय वह नितांत अशिक्षित एक ग्रामीण कन्या के समान थीं। शाहजहाँपुर आने के थोड़े दिनों बाद दादीजी ने अपनी छोटी बहन को बुला लिया। उन्होंने माताजी को गृहकार्य की शिक्षा दी। थोड़े दिनों में माताजी ने घर के सब काम-काज को समझ लिया और भोजनादि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं। मेरे जन्म होने के पाँच या सात वर्ष बाद उन्होंने हिंदी पढ़ना आरंभ किया। पढ़ने का शौक उन्हें खुद ही पैदा हुआ था। मुहल्ले की सखी-सहेली जो घर पर आया करती थीं, उन्हीं में जो शिक्षित थीं, माताजी उनसे अक्षर-बोध करतीं। इस प्रकार घर का सब काम कर चुकने के बाद जो कुछ समय मिल जाता, उसमें पढ़ना-लिखना करतीं। परिश्रम के फल से थोड़े दिनों में ही वह देवनागरी पुस्तकों का अध्ययन करने लगीं। मेरी बहनों को छोटी आयु में माताजी ही शिक्षा दिया करती थीं। जब से मैंने आर्यसमाज में प्रवेश किया, माताजी से खूब वार्तालाप होता। उस समय की अपेक्षा अब उनके विचार भी कुछ उदार हो गए हैं। यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन निर्वाह करता। शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी उन्होंने मेरी वैसी ही सहायता की है, जैसी मेजिनी को उनकी माता ने की थी। माताजी का सबसे बड़ा आदेश मेरे लिए यही था कि किसी की प्राणहानि न हो। उनका कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी प्राणदंड न देना। उनके इस आदेश की पूर्ति करने के लिए मुझे मजबूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग करनी पड़ी थी।
जन्मदात्री जननी! इस जीवन में तो तुम्हारा ऋण उतारने का प्रयत्न करने का भी अवसर न मिला। इस जन्म में तो क्या यदि मैं अनेक जन्मों में भी सारे जीवन प्रयत्न करूँ तो भी तुमसे उऋण नहीं हो सकता। जिस प्रेम तथा दृढ़ता के साथ तुमने इस तुच्छ जीवन का सुधार किया है, वह अवर्णनीय है। मुझे जीवन की प्रत्येक घटना का स्मरण है कि तुमने जिस प्रकार अपनी देववाणी का उपदेश करके मेरा सुधार किया है। तुम्हारी दया से ही मैं देश-सेवा में संलग्न हो सका। धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी। जो कुछ शिक्षा मैंने ग्रहण की उसका भी श्रेय तुम्हीं को है। जिस मनोहर रूप से तुम मुझे उपदेश करती थीं, उसका स्मरण कर तुम्हारी मंगलमयी मूर्ति का ध्यान आ जाता है और मस्तक झुक जाता है। तुम्हें यदि मुझे ताड़ना भी देनी हुई, तो बड़े स्नेह से हर बात को समझा दिया। यदि मैंने धृष्टतापूर्ण उत्तर दिया तब तुमने प्रेम भरे शब्दों में यही कहा कि तुम्हें जो अच्छा लगे, वह करो, किंतु ऐसा करना ठीक नहीं, इसका परिणाम अच्छा न होगा। जीवनदात्री! तुमने इस शरीर को जन्म देकर केवल पालन-पोषण ही नहीं किया बल्कि आत्मिक, धार्मिक तथा सामाजिक उन्नति में तुम्हीं मेरी सदैव सहायक रहीं। जन्म-जन्मांतर परमात्मा ऐसी ही माता दें।
महान से महान संकट में भी तुमने मुझे अधीर नहीं होने दिया। सदैव अपनी प्रेम भरी वाणी को सुनाते हुए मुझे सांत्वना देती रहीं। तुम्हारी दया की छाया में मैंने अपने जीवन भर में कोई कष्ट अनुभव न किया। इस संसार में मेरी किसी भी भोग-विलास तथा ऐश्वर्य की इच्छा नहीं। केवल एक इच्छा है, वह यह कि एक बार श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना लेता। किंतु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती और तुम्हें मेरी मृत्यु की दुखभरी खबर सुनाई जाएगी। माँ! मुझे विश्वास है कि तुम यह समझ कर धैर्य धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता या भारत माता की सेवा में अपने जीवन को बलि-देवी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारी कोख कलंकित न की, अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा। जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जाएगा तो उसके किसी पृष्ठ पर उज्ज्वल अक्षरों में तुम्हारा भी नाम लिखा जाएगा। गुरु गोबिंद सिंह जी की धर्मपत्नी ने जब अपने पुत्रों की मृत्यु की खबर सुनी तो बहुत प्रसन्न हुई थीं और गुरु के नाम पर धर्म-रक्षार्थ अपने पुत्रों के बलिदान पर मिठाई बाँटी थी। जन्मदात्री! वर दो कि अंतिम समय भी मेरा हृदय किसी प्रकार विचलित न हो और तुम्हारे चरण-कमलों को प्रणाम कर मैं परमात्मा का स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करूँ।
— रामप्रसाद 'बिस्मिल'
4सरल व्याख्या (भावार्थ)
भाग 1 — माँ का साथ और सत्य के प्रति निष्ठा
बिस्मिल बताते हैं कि परिवार के विरोध के बावजूद उनकी माँ ने हमेशा उनका उत्साह बनाए रखा, चाहे इसके लिए उन्हें दंड ही क्यों न सहना पड़े। माँ की प्रेरणा से ही बिस्मिल में दृढ़ता आई, जिसके बल पर उन्होंने वकील के दबाव में भी झूठे हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया और जीवनभर सत्य का पालन किया।
भाग 2 — माँ का स्वयं शिक्षित होना और उदार विचार
ग्यारह वर्ष की छोटी उम्र में अशिक्षित ग्रामीण कन्या के रूप में आईं माँ ने न केवल गृहकार्य सीखा, बल्कि अपनी इच्छाशक्ति से स्वयं पढ़ना-लिखना भी सीखा और अपनी बेटियों को भी शिक्षित किया। उनके उदार विचारों और मार्गदर्शन ने ही बिस्मिल को क्रांतिकारी जीवन में मेजिनी जैसी सहायता दी, और उन्होंने बिस्मिल से यही वचन लिया कि वे कभी किसी की जान न लें।
भाग 3 — माँ के प्रति असीम कृतज्ञता
बिस्मिल कहते हैं कि वे कभी भी अपनी माँ के ऋण से उऋण नहीं हो सकते। माँ के प्रेम, स्नेह भरे उपदेशों और मार्गदर्शन ने ही उनके जीवन को सुधारा, उन्हें देश-सेवा और धार्मिक जीवन में सहायता दी, और उनकी संपूर्ण शिक्षा तथा आत्मिक उन्नति में माँ का ही सबसे बड़ा योगदान रहा।
भाग 4 — बलिदान से पहले अंतिम श्रद्धांजलि
बिस्मिल अपनी माँ से कहते हैं कि उन्हें कभी कोई कष्ट अनुभव नहीं हुआ क्योंकि माँ हमेशा उनके साथ रहीं। उनकी एकमात्र इच्छा माँ की सेवा करने की थी, जो पूरी नहीं हो सकी क्योंकि उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाई जाने वाली है। वे माँ से धैर्य रखने का अनुरोध करते हैं और विश्वास दिलाते हैं कि उनका बलिदान भारत माता की सेवा में है, और स्वाधीन भारत के इतिहास में माँ का नाम भी उज्ज्वल अक्षरों में लिखा जाएगा।
5शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| आधिपत्य | अधिकार, शासन |
| सेवा-समिति | समाज-सेवा के लिए बनी संस्था |
| वकालतनामा | वकील को अधिकृत करने वाला कानूनी दस्तावेज़ |
| कदापि | कभी भी (नकारात्मक अर्थ में) |
| नितांत | बिल्कुल, पूर्णतः |
| ग्रामीण | गाँव से संबंधित |
| गृहकार्य | घर के काम-काज |
| अक्षर-बोध | अक्षरों का ज्ञान |
| देवनागरी | हिंदी, संस्कृत आदि भाषाओं की लिपि |
| आर्यसमाज | महर्षि दयानंद द्वारा स्थापित एक सुधारवादी संस्था |
| क्रांतिकारी | क्रांति में भाग लेने वाला व्यक्ति |
| प्राणदंड | मृत्युदंड, जान से मार डालने की सज़ा |
| मजबूरन | विवश होकर |
| प्रतिज्ञा भंग करना | अपनी ली हुई शपथ तोड़ना |
| जन्मदात्री जननी | जन्म देने वाली माँ |
| ऋण | कर्ज़ |
| उऋण होना | ऋण चुकाकर मुक्त होना |
| अवर्णनीय | जिसका वर्णन न किया जा सके |
| धृष्टतापूर्ण | ढिठाई भरा, अशिष्ट |
| श्रद्धापूर्वक | आदर और भक्ति के साथ |
| कोख कलंकित करना | माँ को शर्मिंदा करने वाला कार्य करना |
| बलि-देवी की भेंट | बलिदान के रूप में अर्पित |
| स्वाधीन | स्वतंत्र |
| महाप्रलय | बहुत बड़ा विनाश |
| विचलित | डगमगाना, स्थिर न रहना |
6पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
मेरी समझ से (क)
- 'किंतु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती।' बिस्मिल को अपनी किस इच्छा के पूर्ण न होने की आशंका थी?
- भारत माता के साथ रहने की
- अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने की
- अपनी माँ की जीवनपर्यंत सेवा करने की ✔
- भोग-विलास तथा ऐश्वर्य भोगने की
- रामप्रसाद बिस्मिल की माँ का सबसे बड़ा आदेश क्या था?
- देश की सेवा करें
- कभी किसी के प्राण न लेना ✔
- कभी किसी से छल न करना
- सदा सच बोलना
पंक्तियों पर चर्चा
(क) "यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं, तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन निर्वाह करता।"
अर्थ — बिस्मिल यह मानते हैं कि उनकी माँ की प्रेरणा, शिक्षा और उदार विचारों के कारण ही वे एक सामान्य जीवन जीने के बजाय क्रांतिकारी और देशभक्त बन सके। माँ के बिना वे भी आम लोगों की तरह रोज़मर्रा की चिंताओं में उलझकर जीवन बिता देते।
(ख) "उनके इस आदेश की पूर्ति करने के लिए मुझे मजबूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी।"
अर्थ — माँ का आदेश था कि किसी की जान न ली जाए। एक क्रांतिकारी के जीवन में परिस्थितियाँ कठिन होती हैं, इसलिए बिस्मिल को कभी-कभी अपनी निजी प्रतिज्ञाओं (शायद हिंसा से जुड़ी किसी शपथ) से समझौता करना पड़ा, ताकि माँ के इस बड़े आदेश (जीवहत्या न करने) का पालन हो सके।
मिलकर करें मिलान
| शब्द | अर्थ या संदर्भ |
|---|---|
| 1. देवनागरी | 4. भारत की एक भाषा-लिपि जिसमें हिंदी, संस्कृत, मराठी आदि भाषाएँ लिखी जाती हैं। |
| 2. आर्यसमाज | 3. महर्षि दयानंद द्वारा स्थापित एक संस्था। |
| 3. मेजिनी | 2. इटली के गुप्त राष्ट्रवादी दल का सेनापति; इटली का मसीहा था जिसने लोगों को एक सूत्र में बाँधा। |
| 4. गोबिंद सिंह | 1. सिखों के दसवें और अंतिम गुरु थे। उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की। |
सोच-विचार के लिए
1. बिस्मिल की माताजी जब ब्याह कर आईं तो उनकी आयु काफ़ी कम थी। (क) फिर भी उन्होंने स्वयं को अपने परिवार के अनुकूल कैसे ढाला?
दादीजी ने अपनी छोटी बहन को बुलाकर माताजी को गृहकार्य की शिक्षा दिलवाई, जिससे उन्होंने थोड़े ही दिनों में घर के सभी काम-काज और भोजन आदि का प्रबंध ठीक-ठीक करना सीख लिया।
(ख) उन्होंने अपनी इच्छाशक्ति के बल पर स्वयं को कैसे शिक्षित किया?
बिस्मिल के जन्म के पाँच-सात वर्ष बाद माताजी ने अपनी इच्छा से हिंदी पढ़ना शुरू किया। मुहल्ले की शिक्षित सखी-सहेलियों से अक्षर-बोध करके और घर का काम निपटाने के बाद बचे हुए समय में अभ्यास करके, थोड़े ही दिनों में वे देवनागरी पुस्तकें पढ़ने-समझने लगीं।
2. बिस्मिल को साहसी बनाने में उनकी माताजी ने कैसे सहयोग दिया?
माताजी बिस्मिल का उत्साह कभी भंग नहीं होने देती थीं, चाहे इसके लिए उन्हें पिताजी की डाँट-फटकार और दंड ही क्यों न सहना पड़े। उनके निरंतर प्रोत्साहन और सद्व्यवहार ने बिस्मिल के जीवन में ऐसी दृढ़ता उत्पन्न की कि किसी भी आपत्ति या संकट में उन्होंने अपना संकल्प कभी नहीं त्यागा।
3. आज से कई दशक पहले बिस्मिल की माँ शिक्षा के महत्व को समझती थीं, बताइए कैसे?
वे स्वयं अशिक्षित होते हुए भी अपनी इच्छा से पढ़ना-लिखना सीखा, अपनी बेटियों (बिस्मिल की बहनों) को छोटी आयु में ही स्वयं शिक्षा दी, और बिस्मिल के विवाह की बात पर भी उनका यही कहना था कि पहले शिक्षा पूरी कर लेना ज़रूरी है, विवाह बाद में हो सकता है।
4. हम कैसे कह सकते हैं कि बिस्मिल की माँ स्वतंत्र और उदार विचारों वाली थीं?
दादा-दादी और पिताजी के विरोध के बावजूद वे बिस्मिल को सेवा-समिति और क्रांतिकारी गतिविधियों में सहयोग देती रहीं; उन्होंने स्वयं अपनी इच्छा से पढ़ना सीखा और बेटियों को भी शिक्षा दिलाई; और आर्यसमाज में प्रवेश के बाद बिस्मिल से हुए वार्तालाप के कारण उनके विचार पहले से भी अधिक उदार हो गए — ये सभी बातें उनकी स्वतंत्र और उदार सोच को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं।
आत्मकथा की रचना
यह पाठ रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा का एक अंश है। आत्मकथा यानी अपनी कथा।
(क) इस पाठ में ऐसी पंक्तियों की सूची बनाइए जिनसे पता लगे कि लेखक अपने बारे में कह रहा है।
उदाहरण पंक्तियाँ — "लखनऊ कांग्रेस में जाने के लिए मेरी बड़ी इच्छा थी।", "मैं बड़े उत्साह के साथ सेवा-समिति में सहयोग देता था।", "मैंने तुरंत उत्तर दिया कि यह तो धर्मविरुद्ध होगा।", "अपने जीवन में हमेशा सत्य का आचरण करता था।", "मुझमें जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी की कृपाओं का ही परिणाम है।" — इन सभी पंक्तियों में 'मैं', 'मुझे', 'मेरी' जैसे प्रथम-पुरुष सर्वनामों का प्रयोग स्पष्ट दिखाता है कि लेखक स्वयं अपने बारे में बता रहा है।
(ख) अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।
यह एक समूह-गतिविधि है — प्रत्येक समूह अपनी बनाई सूची कक्षा में पढ़कर सुनाए और अन्य समूहों से मिलान करे।
शब्द-प्रयोग तरह-तरह के
"माता जी उनसे अक्षर-बोध करतीं" में 'अक्षर-बोध' का अर्थ है अक्षर का बोध/ज्ञान। इसी तरह "पढ़ना-लिखना" का अर्थ है पढ़ना और लिखना — हम लेखन में शब्दों को मिलाकर छोटा बना लेते हैं। इस पाठ से ऐसे संक्षिप्त शब्द खोजकर सूची बनाइए—
पाठ से ऐसे संक्षिप्त (मिलाकर बनाए गए) शब्दों की सूची बनाइए।
कुछ उदाहरण — अक्षर-बोध (अक्षर का बोध), पढ़ना-लिखना (पढ़ना और लिखना), काम-काज (काम और काज), भोजनादि (भोजन आदि), शिक्षादि (शिक्षा आदि), सखी-सहेली (सखी और सहेली), दो-एक (दो या एक), डाँट-फटकार (डाँटना और फटकारना)।
आपकी बात
(क) रामप्रसाद 'बिस्मिल' के मित्रों के नाम खोजिए और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भागीदारी पर कक्षा में चर्चा कीजिए।
(अन्वेषण-आधारित उत्तर है।) उदाहरण — बिस्मिल के प्रसिद्ध साथियों में अशफ़ाक़ुल्ला ख़ाँ, चंद्रशेखर आज़ाद, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह जैसे क्रांतिकारी शामिल थे, जिन्होंने काकोरी कांड सहित स्वतंत्रता संग्राम की कई महत्वपूर्ण घटनाओं में भाग लिया।
(ख) अपनी माँ या अभिभावक से बातचीत करके उनके प्रिय रंग, भोज्य पदार्थ, गीत, बचपन की यादें, प्रिय स्थान आदि के बारे में जानिए।
(व्यक्तिगत उत्तर है।) यह एक साक्षात्कार-गतिविधि है — विद्यार्थी अपने अभिभावक से बातचीत करके प्राप्त जानकारी अपनी लेखन-पुस्तिका में नोट करें और कक्षा में साझा करें।
पुस्तकालय या इंटरनेट से
शब्दों की बात
आप अपनी माँ को क्या कहकर संबोधित करते हैं? अन्य भाषाओं में माँ के लिए प्रयुक्त संबोधन और शब्द ढूँढ़िए। क्या उनमें कुछ समानता दिखती है?
माँ के लिए विभिन्न भाषाओं में प्रचलित शब्द — हिंदी में माँ/माता/अम्मा, मराठी में आई, गुजराती में बा, बांग्ला में माँ/जननी, उर्दू में अम्मी, अंग्रेज़ी में मदर/मॉम, तमिल में अम्मा। समानता यह दिखती है कि लगभग सभी भाषाओं के शब्दों में 'म' या नासिक्य (नाक से बोली जाने वाली) ध्वनि प्रमुखता से आती है — जैसे माँ, मम्मी, अम्मा, अम्मी, मॉम — शायद इसलिए क्योंकि 'म' ध्वनि शिशु के लिए बोलने में सबसे सरल और सहज होती है।
आज की पहेली — वर्ग-पहेली
यहाँ दी गई वर्ग-पहेली में पाठ से बारह विशेषण दिए गए हैं। उन्हें छाँटकर पाठ में रेखांकित कीजिए—
| मं | ग | ल | म | यी | ल |
| प्र | त्ये | क | नो | छो | टी |
| धा | ग्या | र | ह | खू | ब |
| र्मि | सा | धा | र | ण | ड़ा |
| क | दु | ख | भ | री | प |
| म | हा | न | स्वा | धी | न |
झरोखे से — ऐ मातृभूमि!
ऐ मातृभूमि!
ऐ मातृभूमि! तेरी जय हो, सदा विजय हो।
प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शांति-कांतिमय हो।
अज्ञान की निशा में, दुख से भरी दिशा में;
संसार के हृदय में, तेरी प्रभा उदय हो।
तेरा प्रकोप सारे जग का महाप्रलय हो।
तेरी प्रसन्नता ही आनंद का विषय हो।
वह भक्ति दे कि 'बिस्मिल' सुख में तुझे न भूले,
वह शक्ति दे कि दुख में कायर न यह हृदय हो।
— रामप्रसाद 'बिस्मिल'
खोजबीन के लिए
7पाठ का सार — माइंड मैप
8अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'मेरी माँ' पाठ के लेखक कौन हैं?
इस पाठ के लेखक क्रांतिकारी रामप्रसाद 'बिस्मिल' (1897–1927) हैं, और यह उनकी आत्मकथा 'निज जीवन की एक छटा' का एक अंश है।
बिस्मिल की माँ का सबसे बड़ा आदेश क्या था?
उनकी माँ का सबसे बड़ा आदेश यह था कि किसी की प्राणहानि न हो — अपने शत्रु को भी कभी प्राणदंड न दिया जाए।
बिस्मिल की माँ ने कैसे स्वयं को शिक्षित किया?
ग्यारह वर्ष की उम्र में अशिक्षित होते हुए भी उन्होंने अपनी इच्छा से मुहल्ले की शिक्षित सखियों से अक्षर-बोध करके हिंदी पढ़ना सीखा और धीरे-धीरे देवनागरी पुस्तकें पढ़ने लगीं।
रामप्रसाद बिस्मिल का प्रसिद्ध तराना कौन-सा है?
रामप्रसाद बिस्मिल का सबसे प्रसिद्ध तराना 'सरफ़रोशी की तमन्ना' है।
बिस्मिल को फाँसी की सज़ा कब और क्यों मिली?
मात्र तीस वर्ष की आयु में अंग्रेज़ सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम में उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उन्हें फाँसी दे दी।
ब्लॉगर SEO सुझाव
सुझाया गया शीर्षक: मेरी माँ (रामप्रसाद बिस्मिल) — कक्षा 6 हिंदी मल्हार पाठ 6: भावार्थ, शब्दार्थ और संपूर्ण प्रश्नोत्तर
मेटा विवरण: कक्षा 6 मल्हार पाठ 6 'मेरी माँ' का सरल भावार्थ, शब्द-संपदा, लेखक परिचय (रामप्रसाद बिस्मिल), वर्ग-पहेली हल और सभी पाठ्यपुस्तक प्रश्नों के हल — एक ही स्थान पर।
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