पेड़ की बात
लेखक: जगदीशचंद्र बसु (1858–1937) · अनुवादक: शंकर सेन · विधा: वैज्ञानिक निबंध
✒️ लेखक से परिचय
📜 मूल पाठ — सार-रूप में
भाग 1 — बीज से अंकुर तक
बहुत दिनों तक मिट्टी के नीचे बीज पड़े रहे। सर्दियों के बाद वसंत आया, वर्षा की पहली बूँदें बरसीं — मानो कोई शिशु को पुकार रहा हो, "सोए मत रहो, ऊपर उठ जाओ, सूरज की रोशनी देखो!" बीज का ढक्कन दरक गया, दो सुकोमल पत्तियों के बीच अंकुर बाहर निकला — एक अंश मिट्टी में मज़बूती से गड़ गया (जड़), दूसरा अंश ऊपर की ओर उठा (तना)। एक प्रयोग द्वारा यह भी सिद्ध होता है कि पेड़-पौधों को चाहे जिस तरह भी रखो, जड़ हमेशा नीचे और तना हमेशा ऊपर की ओर ही बढ़ता है — गमले को उल्टा लटकाने पर भी कुछ दिन बाद पत्तियाँ-डालियाँ मुड़कर ऊपर उठ आती हैं और जड़ नीचे की ओर लटक जाती है।
भाग 2 — पौधों का भोजन
हम जिस तरह भोजन करते हैं, पेड़-पौधे भी उसी तरह भोजन करते हैं। हमारे दाँत हैं, इसलिए कठोर चीज़ खा सकते हैं; नन्हे बच्चों के दाँत नहीं होते, वे केवल दूध पी सकते हैं। पेड़-पौधों के भी दाँत नहीं होते, इसलिए वे केवल तरल द्रव्य या वायु से भोजन ग्रहण करते हैं। जड़ों के द्वारा वे माटी से रस-पान करते हैं; जड़ों को पानी न मिलने पर पेड़ का भोजन बंद हो जाता है और पेड़ मर जाता है।
भाग 3 — साँस लेने वाले पत्ते
सूक्ष्मदर्शी यंत्र से पेड़ की डाल या जड़ की जाँच करने पर पता चलता है कि पेड़ में हज़ारों-हज़ार बारीक नल हैं, जिनके द्वारा माटी से रस पेड़ के शरीर में पहुँचता है। इसके अलावा वृक्ष पत्तों से हवा में से आहार ग्रहण करते हैं — पत्तों में अनगिनत छोटे-छोटे मुँह होते हैं, जिनके होंठ ज़रूरत के अनुसार खुलते-बंद होते हैं। जब हम श्वास छोड़ते हैं, तो एक विषाक्त वायु निकलती है जिसे 'अंगारक' वायु (कार्बन डाईऑक्साइड) कहते हैं। यदि यह ज़हरीली हवा पृथ्वी पर इकट्ठी होती रहे, तो सभी जीव-जंतु थोड़े ही दिनों में नष्ट हो जाएँ। पर विधाता की करुणा देखिए — जो वायु जीव-जंतुओं के लिए ज़हर है, पेड़-पौधे उसी का सेवन करके उसे पूर्णतया शुद्ध कर देते हैं।
भाग 4 — प्रकाश ही जीवन का मूलमंत्र
जब सूर्य का प्रकाश पड़ता है, तब पत्ते सूर्य-ऊर्जा के सहारे 'अंगारक' वायु से अंगार निःशेष कर डालते हैं — यही अंगार वृक्ष के शरीर में प्रवेश करके उसका संवर्धन करते हैं। प्रकाश न मिलने पर पेड़-पौधे बच नहीं सकते, इसलिए उनकी सर्वाधिक कोशिश यही रहती है कि किसी तरह उन्हें थोड़ा-सा प्रकाश मिल जाए — खिड़की के पास रखा पौधा प्रकाश की ओर मुड़ जाता है, वन में सभी पेड़ प्रकाश पाने की होड़ में सिर उठाते हैं, और छाया में पड़ी बेल-लताएँ प्रकाश के अभाव में मुरझा जाती हैं, इसलिए वे पेड़ों से लिपटकर निरंतर ऊपर की ओर बढ़ती हैं। सूर्य-किरण का स्पर्श पाकर ही पेड़ पल्लवित होता है — ईंधन जलाने पर जो प्रकाश-ताप निकलता है, वह सूर्य की ही ऊर्जा है। पेड़-पौधे व समस्त हरियाली मानो प्रकाश को पकड़ने का एक जाल हैं; पशु-पक्षी हरियाली खाकर अपने प्राणों का निर्वाह करते हैं, इस तरह सूर्य का प्रकाश उनके शरीर में भी प्रवेश करता है। अनाज व सब्ज़ी न खाने पर हम भी बच नहीं सकते — सोचकर देखें तो हम भी प्रकाश की ही खुराक पर जीवित हैं।
भाग 5 — फूल और बलिदान
कोई-कोई पेड़ एक वर्ष के बाद ही मर जाते हैं। सभी पेड़ मरने से पहले संतान छोड़ जाने के लिए व्यग्र हैं — बीज ही उनकी संतान है। बीज की सुरक्षा के लिए पेड़ फूल की पंखुड़ियों से घिरा एक छोटा-सा घर तैयार करता है। फूलों से आच्छादित होने पर पेड़ कितना सुंदर दिखलाई पड़ता है, मानो फूल-फूल के बहाने वह स्वयं हँस रहा हो! मटमैली माटी और विषाक्त वायु से अंगारक ग्रहण करके यह अपरूप उपादान आख़िर कैसे ऐसे सुंदर फूल खिलाता है? स्पर्शमणि (पारस पत्थर) की कथा तो सुनी ही होगी, जिसके स्पर्श से लोहा सोना हो जाता है। मेरे विचार से माँ की ममता ही वह मणि है — संतान पर स्नेह न्योछावर होते ही फूल खिलखिला उठते हैं, मानो माटी व अंगार के फूल बन जाते हैं।
भाग 6 — जीवन का न्योछावर
संतान की खातिर वृक्ष सब-कुछ लुटा देता है। जो शरीर कुछ दिन पहले हरा-भरा था, अब बिल्कुल सूख जाता है। अपने ही शरीर का भार उठाने की शक्ति क्षीण हो चली है। पहले हवा से पत्ते और डालियाँ क्रीड़ा करती थीं, अब सूखा पेड़ हवा का आघात सहन नहीं कर सकता — एक थपेड़ा लगते ही थर-थर काँपने लगता है, एक-एक करके सभी डालियाँ टूट पड़ती हैं, और अंत में एक दिन अकस्मात पेड़ जड़ सहित भूमि पर गिर पड़ता है। इस तरह संतान के लिए अपना जीवन न्योछावर करके वृक्ष समाप्त हो जाता है।
— जगदीशचंद्र बसु (अनुवादक — शंकर सेन)
💡 सरल व्याख्या (मुख्य भाव)
इस निबंध में जगदीशचंद्र बसु पेड़-पौधों को मनुष्य जैसा जीवंत प्राणी सिद्ध करते हैं — जो जन्म लेते हैं (अंकुरण), भोजन करते हैं (जड़ों व पत्तों से), साँस लेते हैं, प्रकाश की ओर आकर्षित होते हैं, संतान (बीज) उत्पन्न करते हैं और अंततः उसके लिए अपना जीवन बलिदान कर देते हैं। लेखक की यह अनूठी वैज्ञानिक दृष्टि हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाती है — यह समझाती है कि वृक्ष केवल निर्जीव लकड़ी नहीं, बल्कि हमारे ही समान भावनाओं और जीवन-चक्र वाला एक सजीव प्राणी है।
📖 शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अंकुर | बीज से निकलने वाली कली, नोंक, रोआँ; विकास का सूचक चिह्न |
| अंगारक | कार्बन (कार्बन डाईऑक्साइड गैस) |
| अकस्मात | अचानक, संयोगवश |
| अनगिनत | बेहिसाब, अगणित |
| द्रव्य | तरल पदार्थ, किसी पदार्थ का तरल रूपांतर |
| प्रफुल्लित | खिला हुआ, अति प्रसन्न |
| सूक्ष्मदर्शी | बहुत बारीक देखने वाला यंत्र (माइक्रोस्कोप) |
| सूक्ष्म पदार्थ | बहुत बारीक तत्व, वस्तु |
| विषाक्त | विष मिश्रित, ज़हरीला |
| विगलित | पिघला हुआ, बहा हुआ, शिथिल |
| उपादान | प्रयुक्त वस्तु, कच्चा माल |
| न्योछावर | समर्पण करना, त्यागना |
| शस्य-श्यामला | नई घास-फ़सल से भरी, हरी-भरी |
| चिरायु | दीर्घायु, बहुत दिन जीने वाला |
📝 पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
मेरी समझ से — (क) सटीक उत्तर चुनिए
- "जैसे पौधे को भी सब भेद मालूम हो गया हो" — पौधे को कौन-सा भेद पता लग गया? ✔ उसे उल्टा लटकाया गया है (और इसलिए उसने जड़-तना की दिशा स्वयं ठीक कर ली)। उसे किसी ने सज़ा दी है। बच्चे को गमला रखना नहीं आया। प्रकाश ऊपर से आ रहा है।
- पेड़-पौधे जीव-जंतुओं के मित्र कैसे हैं? हमारे जैसे ही साँस लेते हैं। हमारे जैसे ही भोजन ग्रहण करते हैं। ✔ वे हमारे द्वारा छोड़ी गई विषाक्त वायु ('अंगारक') को ग्रहण करके हवा को शुद्ध करते हैं। धरती पर हमारे साथ ही जन्मे हैं।
पंक्तियों पर चर्चा
(क) "पेड़-पौधों के रेशे-रेशे में सूरज की किरणें आबद्ध हैं। ईंधन को जलाने पर जो प्रकाश व ताप बाहर प्रकट होता है, वह सूर्य की ही ऊर्जा है।"
अर्थ — पेड़-पौधे सूर्य के प्रकाश को अपने भीतर संचित (जमा) करके रखते हैं। जब हम लकड़ी जैसे ईंधन को जलाते हैं, तो जो रोशनी और गर्मी निकलती है, वह असल में पौधे के भीतर वर्षों से संचित सूर्य की ही ऊर्जा है, जो अब मुक्त हो रही है।
(ख) "मधुमक्खी व तितली के साथ वृक्ष की चिरकाल से घनिष्ठता है। वे दल-बल सहित फूल देखने आती हैं।"
अर्थ — वृक्ष और मधुमक्खी-तितलियों के बीच बहुत पुराना और गहरा संबंध है। ये कीट फूलों का रस पीने झुंड बनाकर आते हैं और इस क्रम में परागकण एक फूल से दूसरे फूल तक पहुँचाते हैं, जिससे पौधों में बीज बनने की प्रक्रिया संभव होती है — यह दोनों के लिए लाभदायक संबंध है।
मिलकर करें मिलान — सही मिलान
| वाक्यांश | सही अर्थ/संदर्भ |
|---|---|
| 1. बीज का ढक्कन दरक गया | बीज के दोनों दलों में दरार आ गई या फट गए। |
| 2. उसे 'अंगारक' वायु कहते हैं | साँस छोड़ने पर निकलने वाली वायु — कार्बन डाईऑक्साइड। |
| 3. पत्ते सूर्य-ऊर्जा के सहारे 'अंगारक' वायु से अंगार निःशेष कर डालते हैं | सूर्य के प्रकाश से पत्ते विषाक्त वायु के प्रभाव को नष्ट कर देते हैं। |
| 4. प्रकाश ही जीवन का मूलमंत्र है | जीवन के लिए सूर्य का प्रकाश आधारशक्ति है। |
| 5. जैसे फूल-फूल के बहाने वह स्वयं हँस रहा हो | अपनी संपन्नता और भावी पीढ़ी की उत्पत्ति से प्रसन्न-संतुष्ट। |
| 6. इस अपरूप उपादान से किस तरह ऐसे सुंदर फूल खिलते हैं | मटमैली माटी और विषाक्त वायु सुंदर-सुंदर फूलों में परिवर्तित होते हैं। |
सोच-विचार के लिए
(क) बीज के अंकुरित होने में किस-किस का सहयोग मिलता है?
मिट्टी, वर्षा का जल, वसंत ऋतु की गर्माहट (उपयुक्त तापमान) और सूर्य के प्रकाश — इन सबके सम्मिलित सहयोग से बीज अंकुरित होता है।
(ख) पौधे अपना भोजन कैसे प्राप्त करते हैं?
जड़ों द्वारा मिट्टी में घुले तरल पदार्थों (रस) को सोखकर, और पत्तों द्वारा वायु में मौजूद 'अंगारक' गैस को सूर्य-ऊर्जा की सहायता से ग्रहण करके पौधे अपना भोजन प्राप्त करते हैं।
लेख की रचना
जैसे लेखक ने 'पेड़ की बात' कही है, वैसे ही अपने आस-पास की किसी चीज़ पर लेख लिखिए — जैसे 'गेहूँ की बात'।
उदाहरण — "गेहूँ की बात": क्या आपने कभी सोचा है कि रोटी की थाली तक पहुँचने से पहले गेहूँ का दाना कितनी लंबी यात्रा तय करता है? किसान खेत जोतकर उसमें बीज बोता है। बारिश और सूरज की रोशनी पाकर बीज अंकुरित होता है, धीरे-धीरे हरी बालियाँ निकलती हैं, जो पककर सुनहरी हो जाती हैं। फिर कटाई होती है, दाने अलग किए जाते हैं, पिसाई होकर आटा बनता है — और तब कहीं जाकर हमारी रोटी बनती है। इस तरह एक छोटा-सा बीज हमारी थाली तक पहुँचने के लिए धूप, वर्षा और मेहनत की एक पूरी कहानी समेटे रहता है।
अनुमान या कल्पना से
(क) "इस तरह संतान के लिए अपना जीवन न्योछावर करके वृक्ष समाप्त हो जाता है।" वृक्ष के समाप्त होने के बाद क्या होता है?
सूखा वृक्ष धीरे-धीरे मिट्टी में मिलकर सड़ जाता है और खाद के रूप में मिट्टी को पोषक तत्व लौटा देता है, जिससे आस-पास के नए पौधों को बढ़ने में सहायता मिलती है। साथ ही, वृक्ष द्वारा पहले बिखेरे गए बीज नए अंकुर बनकर उसकी संतति (वंश) को आगे बढ़ाते रहते हैं — इस प्रकार जीवन का चक्र चलता रहता है।
(ख) पेड़-पौधों के बारे में लेखक की रुचि कैसे जागृत हुई होगी?
बचपन से ही प्रकृति के प्रति गहरे प्रेम और सूक्ष्म अवलोकन की आदत के कारण लेखक की रुचि जागृत हुई होगी। उन्होंने वैज्ञानिक प्रयोगों (जैसे गमले को उल्टा लटकाकर पौधे की प्रतिक्रिया देखना) के माध्यम से पौधों के व्यवहार को गहराई से समझने की कोशिश की, जिससे उनकी जिज्ञासा निरंतर बढ़ती गई।
प्रवाह चार्ट — बीज से बीज तक की यात्रा
दिए गए बॉक्सों (आंशिक अक्षरों सहित) का आरेख पूरा कीजिए।
इस चक्र का स्वाभाविक क्रम है — बीज → अंकुर → पौधा → पत्ता/कली → फूल → फल → बीज (और चक्र फिर दोहराता है)। पाठ्यपुस्तक में दिए गए आंशिक शब्दों (जैसे "___र", "फ__", "__ल", "क__" आदि) को इसी क्रम के शब्दों — अंकुर, फूल, फल, कली, पौधा — से मिलाकर पूरा करें। चूँकि यह सटीक बॉक्स-व्यवस्था मूल चित्र पर निर्भर है, कक्षा में मूल पुस्तक के आरेख से मिलाकर अंतिम पुष्टि कर लें।
अंकुरण (गतिविधि)
मिट्टी के किसी पात्र में राजमा या चने के 4–5 बीज बोकर हल्का पानी छिड़कें और 3–4 दिन तक थोड़ा-थोड़ा पानी देते रहें। प्रतिदिन देखें कि पौधे की लंबाई कितनी बढ़ रही है, कितने पत्ते निकले, और पौधा प्रकाश की ओर मुड़ रहा है या नहीं — इसे अपनी लेखन-पुस्तिका में दर्ज करें। यह गतिविधि छात्रों को अंकुरण और प्रकाशोन्मुखता (light के प्रति पौधों के झुकाव) को प्रत्यक्ष अनुभव कराती है।
शब्दों के रूप — विशेषता बताने वाले शब्द
| शब्द | विशेषता बताने वाले शब्द |
|---|---|
| पेड़ | हरा-भरा, घना, ऊँचा, छायादार, फलदार |
| सर्दी | ठंडी, कँपकँपाती, धुंधली, सुहावनी, कठोर |
| सूर्य | तेजस्वी, प्रखर, उष्ण, चमकीला, जीवनदायी |
मेरे प्रिय
(व्यक्तिगत तालिका-गतिविधि) — प्रत्येक विद्यार्थी अपनी पसंद के तीन-तीन फूल, पक्षी, वृक्ष, पुस्तक और खेल के नाम लिखे। उदाहरणस्वरूप — फूल: गुलाब, कमल, गेंदा; पक्षी: मोर, तोता, कोयल; वृक्ष: नीम, आम, बरगद; पुस्तक: पंचतंत्र, बच्चों की कहानियाँ; खेल: क्रिकेट, कबड्डी, बैडमिंटन।
आज की पहेली — शब्द सीढ़ी
इस पाठ में आए शब्दों को सीढ़ीनुमा खानों में पूरा कीजिए और पाठ में रेखांकित कीजिए।
यह एक विशुद्ध दृश्य/व्याकरणिक पहेली है, जिसके सटीक उत्तर मूल पुस्तक के सीढ़ीनुमा ख़ानों को देखे बिना निश्चित रूप से नहीं दिए जा सकते। सुझाव — पाठ के प्रमुख शब्दों जैसे बीज, अंकुर, पत्ती, तना, जड़, फूल, फल, ऊर्जा आदि को खानों की लंबाई (अक्षर-संख्या) से मिलाकर सीढ़ी क्रम में भरने का प्रयास करें, और अंत में मूल पाठ में इन्हें रेखांकित करें।
खोजबीन के लिए
इंटरनेट कड़ियों की सहायता से जगदीशचंद्र बसु के बारे में और जान-समझ सकते हैं — जगदीशचंद्र बसु (उनका जीवन-परिचय एवं वैज्ञानिक योगदान), और जगदीशचंद्र बसु — एक विलक्षण और संवेदनशील वैज्ञानिक (उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों तथा पौधों पर किए गए प्रयोगों का विस्तृत विवरण)।
📗 पढ़ने के लिए — आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की
कवि प्रदीप (1915–1998)
यह देशभक्ति-गीत प्रसिद्ध कवि व गीतकार कवि प्रदीप द्वारा रचित है, जो "ऐ मेरे वतन के लोगो" जैसे अमर देशभक्ति-गीतों के लिए जाने जाते हैं। इस गीत में भारत की भौगोलिक विविधता, ऐतिहासिक बलिदानों और सांस्कृतिक गौरव का सजीव चित्रण है।
आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।
उत्तर में रखवाली करता पर्वतराज विराट है
दक्षिण में चरणों को धोता सागर का सम्राट है
जमुना जी के तट को देखो गंगा का ये घाट है
बाट-बाट में हाट-हाट में यहाँ निराला ठाठ है
देखो, ये तस्वीरें अपने गौरव की अभिमान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।
ये है अपना राजपूताना नाज़ इसे तलवारों पे
इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे
ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे
कूद पड़ी थीं यहाँ हज़ारों पद्मिनियाँ अंगारों पे
बोल रही है कण-कण से क़ुर्बानी राजस्थान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।
देखो, मुल्क मराठों का ये यहाँ शिवाजी डोला था
मुग़लों की ताक़त को जिसने तलवारों पे तोला था
हर पर्वत पे आग जली थी हर पत्थर एक शोला था
बोली हर-हर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था
शेर शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।
जलियाँवाला बाग ये देखो, यहीं चली थी गोलियाँ
ये मत पूछो किसने खेली यहाँ खून की होलियाँ
एक तरफ़ बंदूकें दन-दन एक तरफ़ थी टोलियाँ
मरनेवाले बोल रहे थे इंक़लाब की बोलियाँ
यहाँ लगा दी बहनों ने भी बाज़ी अपनी जान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।
ये देखो बंगाल यहाँ का हर चप्पा हरियाला है
यहाँ का बच्चा-बच्चा अपने देश पे मरनेवाला है
ढाला है इसको बिजली ने भूचालों ने पाला है
मुट्ठी में तूफ़ान बँधा है और प्राण में ज्वाला है
जन्मभूमि है यही हमारे वीर सुभाष महान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।
— कवि प्रदीप
भावार्थ — यह गीत भारत के विभिन्न भागों की यात्रा कराता है — उत्तर में हिमालय, दक्षिण में सागर, गंगा-यमुना के घाट, राजस्थान का शौर्य व बलिदान, महाराष्ट्र में शिवाजी की वीरता, पंजाब में जलियाँवाला बाग का बलिदान, और बंगाल की हरियाली व नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जन्मभूमि — इस तरह पूरे भारत की विविधता में एकता और त्याग की भावना को उजागर करता है।
🧠 पाठ का सार — माइंड मैप
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्र. 'पेड़ की बात' निबंध किसने लिखा है?
उ. प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु ने (बांग्ला से हिंदी अनुवाद — शंकर सेन)।
प्र. पौधे भोजन कैसे ग्रहण करते हैं?
उ. जड़ों द्वारा मिट्टी से तरल रस चूसकर, और पत्तों द्वारा वायु से 'अंगारक' (कार्बन डाईऑक्साइड) गैस सूर्य-ऊर्जा की सहायता से ग्रहण करके।
प्र. पेड़-पौधे मनुष्यों की किस तरह सहायता करते हैं?
उ. वे हमारे द्वारा छोड़ी गई ज़हरीली 'अंगारक' वायु को शुद्ध करके साफ़ हवा देते हैं और हमारे भोजन (अनाज, फल, सब्ज़ी) का स्रोत भी हैं।
प्र. जगदीशचंद्र बसु की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खोज क्या थी?
उ. उन्होंने सबसे पहले रेडियो तरंगों द्वारा संचार स्थापित किया और यह भी सिद्ध किया कि पौधों में भी जीवन तथा संवेदनशीलता होती है।
🔗 कक्षा 6 मल्हार — सभी पाठ आपस में जुड़े हुए
इस पाठ के साथ-साथ कक्षा 6 हिंदी मल्हार पुस्तक के बाकी सभी पाठ भी पढ़ें:
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