दोपहर का भोजन (अमरकांत) कक्षा 11 हिंदी अंतरा — सम्पूर्ण व्याख्या, प्रश्न-उत्तर, MCQ और Quick Revision
दोपहर का भोजन (अमरकांत) — सम्पूर्ण व्याख्या, प्रश्न-उत्तर और परीक्षा तैयारी
लेखक परिचय, सरल व्याख्या, शब्दार्थ, Mind Map, पाठ्यपुस्तक व अतिरिक्त प्रश्न-उत्तर, MCQ और Quick Revision — एक ही जगह
(NCERT कक्षा 11 हिंदी पाठ्यपुस्तक "अंतरा" भाग-1 पर आधारित अध्ययन सामग्री)
दोपहर का भोजन प्रसिद्ध कथाकार अमरकांत द्वारा रचित एक मार्मिक कहानी है, जो कक्षा 11 की हिंदी पाठ्यपुस्तक "अंतरा" (भाग-1) के गद्य-खंड की दूसरी रचना है। यह कहानी गरीबी से जूझ रहे एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार की कथा है, जिसमें माँ सिद्धेश्वरी अपने परिवार को गरीबी के अहसास से बचाने के लिए निरंतर झूठ का सहारा लेती है। इस लेख में आपको पाठ की सरल व्याख्या, महत्वपूर्ण शब्दार्थ, Mind Map, पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-उत्तर, अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न, MCQ और परीक्षा-उपयोगी संक्षिप्त पुनरावृत्ति (Quick Revision) — सब कुछ एक ही जगह मिलेगा।
📖 दोपहर का भोजन : संक्षिप्त परिचय
सिद्धेश्वरी एक निम्न मध्यवर्गीय गृहिणी है, जो खाना बनाने के बाद थकान और भूख-प्यास से व्याकुल होकर बैठ जाती है। उसका सबसे छोटा पुत्र प्रमोद (छह वर्ष) कुपोषण का शिकार, टूटे खटोले पर सोया है। परिवार में बड़ा पुत्र रामचंद्र (इक्कीस वर्ष) एक स्थानीय अखबार में प्रूफ-रीडरी सीखता है, मँझला पुत्र मोहन (अठारह वर्ष) हाई स्कूल के प्राइवेट इम्तिहान की तैयारी कर रहा है, और पति मुंशी चंद्रिका प्रसाद घर के मुखिया हैं। कहानी में सिद्धेश्वरी एक-एक करके परिवार के हर सदस्य को भोजन परोसती है, परंतु भोजन इतना कम है कि हर सदस्य दूसरे के लिए बहाना बनाकर अपना हिस्सा बचा देता है। सिद्धेश्वरी बार-बार झूठ बोलकर परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे की वास्तविक स्थिति (मोहन का पढ़ाई में मन न लगना, रामचंद्र का न आना, घर की आर्थिक तंगी) से अनजान रखने का प्रयास करती है। कहानी के अंत में पता चलता है कि मुंशी जी को डेढ़ महीने पहले ही उनकी क्लर्की की नौकरी से निकाल दिया गया था, फिर भी वे बेफिक्र होकर सोए रहते हैं, जबकि सिद्धेश्वरी अकेले परिवार की भूख और सम्मान दोनों को बचाए रखने के लिए संघर्ष करती रहती है।
✍️ लेखक परिचय — अमरकांत
अमरकांत ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत पत्रकारिता से की। सबसे पहले उन्होंने आगरा से प्रकाशित होनेवाले दैनिक पत्र सैनिक के संपादकीय विभाग में कार्य किया और प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़े। इसके अतिरिक्त उन्होंने दैनिक अमृत पत्रिका तथा दैनिक भारत के संपादकीय विभागों में भी काम किया, और कुछ समय तक कहानी पत्रिका के संपादन से भी जुड़े रहे। अमरकांत नयी कहानी आंदोलन के एक प्रमुख कहानीकार हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में शहरी और ग्रामीण जीवन का यथार्थ चित्रण किया है — वे मुख्यतः मध्यवर्गीय जीवन की वास्तविकता और विसंगतियों को व्यक्त करनेवाले कहानीकार हैं। वर्तमान समाज में व्याप्त अमानवीयता, हृदयहीनता, पाखंड, आडंबर आदि को उन्होंने अपनी कहानियों का विषय बनाया है। उनकी शैली की सहजता और भाषा की सजीवता पाठकों को आकर्षित करती है — आंचलिक मुहावरों और शब्दों के प्रयोग से उनकी कहानियों में जीवंतता आती है।
प्रमुख कृतियाँ — ज़िंदगी और जोंक देश के लोग मौत का नगर मित्र-मिलन कुहासा (कहानी संग्रह) सूखा पत्ता ग्राम सेविका काले उजले दिन सुखजीवी बीच की दीवार इन्हीं हथियारों से (उपन्यास)
अमरकांत को 'इन्हीं हथियारों से' उपन्यास पर 2007 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन् 2009 में उन्हें श्री लाल शुक्ल के साथ संयुक्त रूप से भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। अमरकांत ने बाल-साहित्य भी लिखा है — 'दोपहर का भोजन' कहानी भी उन्हीं की बाल-साहित्य से इतर, गरीबी से जूझ रहे एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार की मार्मिक कथा है।
🎭 पाठ की विधा
दोपहर का भोजन विधा की दृष्टि से एक कहानी (short story) है, जो यथार्थवादी शैली में लिखी गई है। यह कहानी समाज में व्याप्त गरीबी को चिह्नित करती है और एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार के संघर्ष को भावी उम्मीदों पर टिका हुआ दिखाती है। सिद्धेश्वरी गरीबी के अहसास को मुखर नहीं होने देती और उसकी आँच से अपने परिवार को बचाए रखती है। शिल्प की सादगी और सहज संकेतों के माध्यम से कथा प्रस्तुत करने की कला का उत्कृष्ट रूप इस कहानी में देखने को मिलता है।
🎯 पाठ का मुख्य विषय
- गरीबी का यथार्थ चित्रण: एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में भोजन की कमी और आर्थिक तंगी का सजीव वर्णन।
- पारिवारिक त्याग व स्नेह: परिवार का हर सदस्य दूसरे की भूख को समझते हुए अपना भोजन बचाकर उसे देना चाहता है।
- झूठ, जो सच से भारी है: सिद्धेश्वरी बार-बार झूठ बोलती है, परंतु यह झूठ परिवार को जोड़े रखने और एक-दूसरे को दुख से बचाने का प्रयास है।
- मातृत्व का त्याग: सिद्धेश्वरी स्वयं भूखी-प्यासी रहकर परिवार के हर सदस्य को पहले भोजन कराती है और सबसे अंत में बचा-खुचा भोजन खाती है।
- सामाजिक विडंबना: मुंशी जी की नौकरी छूट जाने के बावजूद परिवार में इस संकट पर खुलकर बात न होना, और पिता का बेफिक्र बने रहना।
- शिल्प की सादगी: कहानी बिना किसी अलंकरण के, सहज संकेतों व आम बोलचाल की भाषा के माध्यम से गहरी संवेदना जगाती है।
📝 सरल भाषा में पाठ की व्याख्या
भाग 1 — सिद्धेश्वरी की व्याकुलता और प्रमोद की दशा
खाना बनाने के बाद सिद्धेश्वरी चूल्हे को बुझा देती है और दोनों घुटनों के बीच सिर रखकर बैठ जाती है, मानो अपने पैर की उँगलियों या ज़मीन पर चलती चींटियों को देख रही हो। अचानक उसे बहुत तेज़ प्यास लगती है। वह मतवाले की तरह उठकर गगरे से लोटा भर पानी गट-गट पी जाती है और 'हाय राम!' कहकर वहीं ज़मीन पर लेट जाती है। लगभग आधे घंटे बाद जब उसे होश आता है, तो वह उठकर बैठ जाती है और उसकी दृष्टि ओसारे में अध-टूटे खटोले पर सोए अपने छह वर्षीय बेटे प्रमोद पर जम जाती है। प्रमोद नंग-धड़ंग पड़ा है, उसकी हड्डियाँ साफ़ दिखाई देती हैं, हाथ-पैर बासी ककड़ियों की तरह सूखे-बेजान हैं, पेट हँडिया की तरह फूला हुआ है, और उस पर अनगिनत मक्खियाँ उड़ रही हैं — यह दृश्य परिवार में व्याप्त गहरे कुपोषण व गरीबी को उजागर करता है। सिद्धेश्वरी उठकर बच्चे के मुँह पर अपना एक फटा, गंदा ब्लाउज़ डाल देती है और बाहर दरवाज़े पर जाकर बड़े बेटे रामचंद्र का इंतज़ार करने लगती है।
भाग 2 — रामचंद्र का भोजन और मोहन के विषय में झूठ
दस-पंद्रह मिनट बाद बड़ा बेटा रामचंद्र घर की ओर आता दिखता है — उसका मुँह लाल-चढ़ा हुआ, बाल अस्त-व्यस्त और जूते धूल से सने हैं। वह आकर चौकी पर धम से बैठ जाता है, मानो बेजान हो। सिद्धेश्वरी हिम्मत करके पास जाकर पूछती है, 'खाना तैयार है, यहीं लाऊँ क्या?' रामचंद्र पूछता है, 'बाबूजी खा चुके?' सिद्धेश्वरी झूठ बोलती है, 'आते ही होंगे।' रामचंद्र थाली में परोसी गई दो रोटियाँ, भर कटोरा पनियाई दाल और चने की तली तरकारी को दार्शनिक भाव से देखता है। खाते-खाते वह पूछता है, 'मोहन कहाँ है? बड़ी कड़ी धूप हो रही है।' सिद्धेश्वरी को सच बोलने की हिम्मत नहीं होती — वह झूठ बोलती है कि मोहन किसी लड़के के यहाँ पढ़ने गया है और उसकी तबीयत चौबीसों घंटे पढ़ने में ही लगी रहती है। रामचंद्र चुपचाप सुनकर आगे खाने में लग जाता है। जब थाली में एक ही रोटी शेष रह जाती है, तो सिद्धेश्वरी एक रोटी और लाने को उठती है, पर रामचंद्र हड़बड़ाकर मना कर देता है — 'नहीं-नहीं, ज़रा भी नहीं। मेरा पेट पहले ही भर चुका है' — यह कहकर वह बचा हुआ टुकड़ा अपनी माँ के लिए छोड़ देता है।
भाग 3 — मोहन का भोजन, मुंशी जी का आगमन और सिद्धेश्वरी की अंतिम व्यथा
इसी बीच मँझला बेटा मोहन आता है — साँवला, छोटी आँखों वाला, चेचक के दागों से भरे चेहरे वाला यह लड़का अपने भाई जितना ही दुबला-पतला पर उतना लंबा नहीं है, और अपनी उम्र से कहीं अधिक गंभीर व उदास दिखाई देता है। सिद्धेश्वरी उससे पूछती है कि वह कहाँ रह गया था, भैया पूछ रहे थे। मोहन बहानेबाज़ी में उत्तर देता है कि वह कहीं नहीं गया था, यहीं पास में था। वह रोटी के बड़े ग्रास निगलने की कोशिश करते हुए एक अस्वाभाविक मोटे स्वर में बोलता है। खाते-खाते वह भी बचा हुआ रोटी का टुकड़ा नहीं लेता — सिद्धेश्वरी के आग्रह पर भी वह मना कर देता है और कहता है कि अब भूख नहीं है, बस थोड़ी दाल दे दो। इसी बीच मुंशी चंद्रिका प्रसाद जूते खस-खस घसीटते हुए आते हैं और राम का नाम लेकर चौकी पर बैठ जाते हैं। मुंशी जी की उम्र लगभग पैंतालीस वर्ष है, किंतु देखने में पचास-पचपन के लगते हैं — गंजी खोपड़ी, ढीला शरीर। वे पालथी मारकर बैठे रोटी के हर ग्रास को इस तरह चुभला-चबा रहे हैं, जैसे कोई बूढ़ी गाय जुगाली कर रही हो। खाते हुए वे बड़के (रामचंद्र) के बारे में पूछते हैं कि वह दिखाई नहीं दे रहा। सिद्धेश्वरी झूठ बोलती है कि वह अभी-अभी खाकर काम पर गया है और कुछ ही दिनों में उसकी नौकरी पक्की हो जाएगी। मुंशी जी संतोष से सुनते हैं, परिवार की वास्तविक स्थिति से पूरी तरह अनजान बने रहते हैं और गुड़ माँगकर हँसी-मज़ाक भी करते हैं। मुंशी जी के निबट जाने के बाद सिद्धेश्वरी उनकी जूठी थाली लेकर चौके की ज़मीन पर बैठ जाती है — बटलोई की दाल कटोरे में उँडेल देती है, पर वह पूरी नहीं भरती; छिपुली में बची थोड़ी तरकारी भी पास खींच लेती है; रोटियों की थाली में केवल एक मोटी, भद्दी व जली रोटी बचती है। उसकी नज़र अचानक ओसारे में सोए प्रमोद की ओर जाती है — वह उस रोटी को दो बराबर टुकड़ों में विभाजित कर देती है, एक टुकड़ा अलग रख देती है और दूसरे को अपनी जूठी थाली में लेकर एक लोटा पानी लेकर खाने बैठ जाती है। पहला ग्रास मुँह में रखते ही, न मालूम कहाँ से, उसकी आँखों से टप-टप आँसू चूने लगते हैं। सारा घर मक्खियों से भनभना रहा है, दोनों बड़े लड़कों का कहीं पता नहीं, और बाहर की कोठरी में मुंशी जी औंधे मुँह होकर निश्चिंतता के साथ सो रहे हैं — मानो डेढ़ महीने पूर्व मकान किराया नियंत्रण विभाग की क्लर्की से उनकी छँटनी न हुई हो और शाम को उन्हें काम की तलाश में कहीं जाना न हो!
📚 महत्वपूर्ण शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| व्यग्रता | व्याकुलता, घबराया हुआ |
| बर्राक | याद रखना, चमकता हुआ |
| पंडूक | कबूतर की तरह का एक प्रसिद्ध पक्षी |
| कनखी | आँख के कोने से |
| ओसारा | बरामदा |
| निर्विकार | जिसमें कोई विकार या परिवर्तन न होता हो |
| छिपुली | खाने का छोटा बर्तन |
| अलगनी | कपड़े टाँगने के लिए बाँधी गई रस्सी |
| नाक में दम आना | परेशान होना |
| जी में जी आना | चैन आ जाना |
🔑 पाठ के मुख्य बिंदु
- सिद्धेश्वरी खाना बनाने के बाद भूख-प्यास से व्याकुल होकर बैठ जाती है, कुछ देर बेहोश-सी पड़ी रहती है।
- छह वर्षीय बेटा प्रमोद कुपोषण की दशा में टूटे खटोले पर सोया है — गरीबी का सजीव प्रतीक।
- बड़ा बेटा रामचंद्र (21 वर्ष, प्रूफ-रीडरी सीखता है) थका हुआ लौटता है; सिद्धेश्वरी मोहन के बारे में झूठ बोलती है।
- रामचंद्र खाना खाते हुए बचा हुआ टुकड़ा माँ के लिए छोड़ देता है, बहाना बनाता है कि पेट भर गया।
- मँझला बेटा मोहन (18 वर्ष, हाई स्कूल की तैयारी) भी बहाना बनाकर बचा हुआ भोजन नहीं लेता।
- पिता मुंशी चंद्रिका प्रसाद बेफिक्री से खाना खाते हैं, परिवार की वास्तविक स्थिति से अनजान बने रहते हैं।
- सिद्धेश्वरी रामचंद्र के बारे में मुंशी जी से भी झूठ बोलती है कि वह काम पर गया है।
- अंत में सिद्धेश्वरी बचा-खुचा भोजन (एक रोटी का आधा टुकड़ा, थोड़ी दाल) लेकर स्वयं खाने बैठती है और आँसू बहाती है।
- कहानी के अंत में पता चलता है कि मुंशी जी को डेढ़ महीने पहले नौकरी से निकाला जा चुका है, फिर भी वे निश्चिंत सोए हैं।
- कहानी परिवार के हर सदस्य के आपसी त्याग, प्रेम और एक-दूसरे को बचाने के लिए बोले गए झूठ को मार्मिकता से चित्रित करती है।
🧠 Mind Map
📗 पाठ्यपुस्तक प्रश्न-उत्तर
(क) वह मतवाले की तरह उठी और गगरे से लोटा भर पानी लेकर गट-गट चढ़ा गई।
(ख) यह कहकर उसने अपने मँझले लड़के की ओर इस तरह देखा, जैसे उसने कोई चोरी की हो।
(ख) यह पंक्ति उस क्षण की है जब सिद्धेश्वरी मोहन के बारे में रामचंद्र से झूठ बोल चुकी होती है और अपराध-बोध के कारण मोहन की ओर सहमी हुई, दोषी-सी दृष्टि से देखती है — मानो झूठ बोलना कोई अपराध कर बैठने जैसा हो।
योग्यता-विस्तार (मार्गदर्शन)
💡 महत्वपूर्ण अतिरिक्त प्रश्न
✅ MCQ / वस्तुनिष्ठ प्रश्न
- फणीश्वरनाथ रेणु
- अमरकांत
- मुंशी प्रेमचंद
- यशपाल
- दो
- तीन
- चार
- पाँच
- अठारह वर्ष
- इक्कीस वर्ष
- पच्चीस वर्ष
- तीस वर्ष
- डाकघर
- स्थानीय दैनिक समाचार-पत्र का दफ़्तर (प्रूफ-रीडरी)
- स्कूल
- अस्पताल
- मैट्रिक बोर्ड
- हाई स्कूल का प्राइवेट इम्तिहान
- बी.ए.
- इंटर
- चार वर्ष
- छह वर्ष
- आठ वर्ष
- दस वर्ष
- मुंशी रामलाल
- मुंशी चंद्रिका प्रसाद
- मुंशी गंगाराम
- मुंशी हरिप्रसाद
- डाक विभाग
- रेलवे
- मकान किराया नियंत्रण विभाग
- शिक्षा विभाग
- एक महीना
- डेढ़ महीना
- तीन महीने
- छह महीने
- मोहन बीमार है
- मोहन किसी लड़के के यहाँ पढ़ने गया है
- मोहन बाज़ार गया है
- मोहन सो रहा है
- एक
- दो
- तीन
- चार
- अचार
- गुड़
- नमक
- मिर्च
- रोटी बाँटते हुए और खाते हुए
- पानी पीते हुए
- बर्तन धोते हुए
- सोते हुए
- उच्च वर्ग
- निम्न मध्यवर्गीय वर्ग
- जमींदार वर्ग
- व्यापारी वर्ग
- श्री लाल शुक्ल
- फणीश्वरनाथ रेणु
- निर्मल वर्मा
- भीष्म साहनी
🎯 परीक्षा की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- लेखक परिचय (नाम, जन्म-स्थान, प्रमुख कृतियाँ व पुरस्कार) याद रखें — प्रायः 1-2 अंक के प्रश्न में पूछा जाता है।
- सिद्धेश्वरी के चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न परीक्षा में सबसे अधिक आते हैं — उसके त्याग, धैर्य व झूठ बोलने के पीछे के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से समझें।
- भावार्थ/आशय आधारित प्रश्नों के लिए कहानी के मार्मिक अंश (प्रमोद की दशा, रामचंद्र व मोहन का बहाना बनाना, अंतिम पंक्ति) को ध्यान से समझें।
- शब्दार्थ (व्यग्रता, ओसारा, छिपुली, कनखी आदि) रटें — वस्तुनिष्ठ व अति लघु प्रश्नों में उपयोगी।
- कहानी का केंद्रीय विचार — "गरीबी में भी परिवार का पारस्परिक त्याग व स्नेह-रक्षा" — को हर उत्तर में उचित स्थान पर संदर्भित करें।
- दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों में घटनाक्रम को क्रमबद्ध (सिद्धेश्वरी की व्याकुलता → रामचंद्र का भोजन → मोहन का भोजन → मुंशी जी का भोजन → सिद्धेश्वरी का अंतिम भोजन) लिखें ताकि उत्तर व्यवस्थित लगे।
- मुंशी जी की नौकरी छूटने वाला अंतिम रहस्योद्घाटन कहानी की सबसे महत्वपूर्ण नाटकीय युक्ति (twist) है — इसे भावार्थ व सारांश दोनों प्रकार के प्रश्नों में अवश्य शामिल करें।
✏️ अभ्यास प्रश्न
- सिद्धेश्वरी के परिवार की आर्थिक स्थिति का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
- प्रमोद की शारीरिक दशा से लेखक ने किस सामाजिक यथार्थ को उजागर किया है?
- रामचंद्र और मोहन के व्यवहार में क्या समानता दिखाई देती है? स्पष्ट कीजिए।
- मुंशी चंद्रिका प्रसाद का स्वभाव सिद्धेश्वरी से किस प्रकार भिन्न है?
- यदि सिद्धेश्वरी परिवार को अपनी वास्तविक स्थिति बता देती, तो कहानी में क्या परिवर्तन आ सकता था? अपने विचार सहित उत्तर दीजिए।
- कहानी में गरीबी को किन-किन प्रसंगों के माध्यम से दिखाया गया है?
- 'दोपहर का भोजन' कहानी से आपको क्या सीख (मूल्यबोध) मिलती है?
- कहानी के अंतिम रहस्योद्घाटन (मुंशी जी की नौकरी छूटना) का कहानी पर क्या प्रभाव पड़ता है, स्पष्ट कीजिए।
⚡ Quick Revision
- लेखक: अमरकांत (1925-2014)
- विधा: कहानी (यथार्थवादी, निम्न मध्यवर्गीय जीवन पर आधारित)
- नायिका: सिद्धेश्वरी (गृहिणी, त्याग व संयम की प्रतिमूर्ति)
- मुख्य पात्र: मुंशी चंद्रिका प्रसाद (पति), रामचंद्र, मोहन, प्रमोद (तीनों पुत्र)
- मुख्य घटना: सीमित भोजन में सिद्धेश्वरी का हर सदस्य को पहले खिलाना और स्वयं भूखी रहना, परिवार में एक-दूसरे से झूठ बोलना
- अंतिम रहस्योद्घाटन: मुंशी जी को डेढ़ महीने पहले मकान किराया नियंत्रण विभाग की नौकरी से निकाला जा चुका है
- केंद्रीय भाव: गरीबी में भी परिवार का पारस्परिक त्याग, स्नेह व एक-दूसरे की रक्षा
- संदेश: सच्चा प्रेम व त्याग गरीबी में भी परिवार को जोड़े रखता है; कभी-कभी झूठ सच से भी भारी होता है
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