गोल
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की आत्मकथा का एक रोचक अंश — खेल भावना, लगन और साधना की प्रेरक कहानी
1लेखक से परिचय — मेजर ध्यानचंद
मेजर ध्यानचंद (1905–1979) भारत के महानतम हॉकी खिलाड़ियों में से एक थे, जिन्हें उनके अद्भुत खेल-कौशल के कारण दुनिया भर में 'हॉकी का जादूगर' कहा जाता है। उनकी हॉकी स्टिक से गेंद ऐसे नियंत्रित होती थी मानो वह उनके इशारों पर चलती हो।
उनके सम्मान में भारत उनके जन्मदिन (29 अगस्त) को 'राष्ट्रीय खेल दिवस' के रूप में मनाता है, और भारत का सर्वोच्च खेल पुरस्कार 'खेल रत्न' भी उन्हीं के नाम पर 'मेजर ध्यानचंद खेल रत्न' कहलाता है। प्रस्तुत पाठ उनकी आत्मकथा का एक अंश है, जिसमें उन्होंने अपने खेल-जीवन के दो रोचक प्रसंग साझा किए हैं।
2पाठ परिचय
प्रस्तुत संस्मरण में मेजर ध्यानचंद अपने आत्मकथा के दो प्रसंग सुनाते हैं। पहले प्रसंग में वे बताते हैं कि सन् 1933 में एक मैच के दौरान विरोधी टीम के एक खिलाड़ी ने गुस्से में उनके सिर पर हॉकी स्टिक मार दी थी, और उन्होंने बड़ी सूझबूझ और खेल-भावना से इसका 'बदला' छह गोल दागकर लिया। दूसरे प्रसंग में वे अपनी सफलता के राज — लगन, साधना और खेल भावना — के बारे में बताते हैं, और अपने बचपन से लेकर बर्लिन ओलंपिक (1936) की कप्तानी तक के सफर का वर्णन करते हैं, जहाँ भारत ने स्वर्ण पदक जीता था। पूरा पाठ हमें सिखाता है कि सच्ची सफलता और महानता विनम्रता, टीम-भावना और खेल के प्रति ईमानदार समर्पण से मिलती है।
3मूल पाठ
खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक की घटनाएँ होती रहती हैं। खेल में तो यह सब चलता है। जिन दिनों हम खेला करते थे, उन दिनों भी यह सब चलता था। सन् 1933 की बात है। उन दिनों में, मैं पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करता था। एक दिन 'पंजाब रेजिमेंट' और 'सैंपर्स एंड माइनर्स टीम' के बीच मुकाबला हो रहा था। 'माइनर्स टीम' के खिलाड़ी मुझसे गेंद छीनने की कोशिश करते, लेकिन उनकी हर कोशिश बेकार जाती। इतने में एक खिलाड़ी ने गुस्से में आकर हॉकी स्टिक मेरे सिर पर दे मारी। मुझे मैदान से बाहर ले जाया गया। थोड़ी देर बाद मैं पट्टी बाँधकर फिर मैदान में आ पहुँचा। आते ही मैंने उस खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रखकर कहा, "तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं जरूर लूँगा।" मेरे इतना कहने ही वह खिलाड़ी घबरा गया। अब हर समय मुझे वह देखता रहता कि मैं कब उसके सिर पर हॉकी स्टिक मारने वाला हूँ। मैंने एक के बाद एक झटपट छह गोल कर दिए। खेल खत्म होने के बाद मैंने फिर उस खिलाड़ी की पीठ थपथपाई और कहा, "दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है। अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते तो शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।" वह खिलाड़ी सचमुच बड़ा शर्मिंदा हुआ। तो देखा आपने मेरा बदला लेने का ढंग? सच मानो, बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी।
आज मैं जहाँ भी जाता हूँ बच्चे व बूढ़े मुझे घेर लेते हैं और मुझसे मेरी सफलता का राज जानना चाहते हैं। मेरे पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र तो है नहीं। हर किसी से यही कहता कि लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र हैं। मेरा जन्म सन् 1905 में प्रयाग में एक साधारण परिवार में हुआ। बाद में हम झाँसी आकर बस गए। 16 साल की उम्र में मैं 'फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट' में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हो गया। मेरी रेजिमेंट का हॉकी खेल में काफी नाम था पर खेल में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी। उस समय हमारी रेजिमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी थे वे बार-बार मुझे हॉकी खेलने के लिए कहते। हमारी छावनी में हॉकी खेलने का कोई निश्चित समय नहीं था सैनिक जब चाहे मैदान में पहुँच जाते और अभ्यास शुरू कर देते। उस समय तक मैं एक नौसिखिया खिलाड़ी था। जैसे-जैसे मेरे खेल में निखार आता गया, वैसे-वैसे मुझे तरक्की भी मिलती गई। सन् 1936 में बर्लिन ओलंपिक में मुझे कप्तान बनाया गया। उस समय मैं सेना में लांस नायक था। बर्लिन ओलंपिक में लोग मेरे हॉकी खेलने के ढंग से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मुझे 'हॉकी का जादूगर' कहना शुरू कर दिया। इसका यह मतलब नहीं कि सारे गोल मैं ही करता था। मेरी तो हमेशा यह कोशिश रहती कि मैं गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को दे दूँ ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाए। अपनी इसी खेल भावना के कारण मैंने दुनिया के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया। बर्लिन ओलंपिक में हमें स्वर्ण पदक मिला। खेलते समय मैं हमेशा इस बात का ध्यान रखता था कि हार या जीत मेरी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।
— मेजर ध्यानचंद
4सरल व्याख्या (भावार्थ)
भाग 1 — बदला लेने का अनोखा ढंग
ध्यानचंद बताते हैं कि खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और झगड़े होते ही रहते हैं। सन् 1933 में एक मैच में विरोधी टीम के एक खिलाड़ी ने गुस्से में उनके सिर पर हॉकी मार दी, जिससे उन्हें मैदान से बाहर जाना पड़ा। लेकिन पट्टी बाँधकर लौटने पर उन्होंने बदला लेने की धमकी देकर उस खिलाड़ी को डरा दिया और फिर हॉकी स्टिक से नहीं, बल्कि छह गोल दागकर अपना 'बदला' ले लिया। इससे पता चलता है कि सच्चा बदला हिंसा से नहीं, बल्कि अपने कौशल और खेल-भावना से लिया जा सकता है। साथ ही यह भी सीख मिलती है कि बुरा काम करने वाला व्यक्ति हमेशा डरा-सहमा रहता है।
भाग 2 — सफलता का असली मंत्र
ध्यानचंद बताते हैं कि लोग उनसे सफलता का राज पूछते हैं, और उनका जवाब है — लगन, साधना और खेल भावना। सन् 1905 में प्रयाग में जन्मे ध्यानचंद 16 साल की उम्र में सेना में भर्ती हुए, जहाँ शुरू में उनकी हॉकी में कोई रुचि नहीं थी। धीरे-धीरे अभ्यास से वे निखरते गए और सन् 1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारतीय टीम के कप्तान बने, जहाँ भारत ने स्वर्ण पदक जीता। लोग उनके अद्भुत खेल से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें 'हॉकी का जादूगर' कहने लगे। परंतु ध्यानचंद बताते हैं कि उनकी हमेशा यही कोशिश रहती थी कि गोल करने का श्रेय अपने साथी खिलाड़ियों को मिले — यही उनकी सच्ची खेल-भावना और महानता थी। वे मानते थे कि हार-जीत किसी एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि पूरे देश की होती है।
5शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| धक्का-मुक्की | आपस में धकियाना, धक्के मारना |
| नोंक-झोंक | छोटी-मोटी नोक-झोंक, हल्की तकरार |
| रेजिमेंट | सेना की एक टुकड़ी/दल |
| मुकाबला | प्रतियोगिता, मैच |
| बेकार जाना | व्यर्थ जाना, असफल होना |
| पट्टी बाँधना | घाव पर बैंडेज लगाना |
| घबराना | डर जाना, बेचैन होना |
| झटपट | बहुत जल्दी, फुर्ती से |
| थपथपाना | प्यार से हाथ से थपकी देना |
| शर्मिंदा | लज्जित, शर्म महसूस करना |
| गुरु-मंत्र | सफलता का कोई गूढ़ रहस्य या उपाय |
| लगन | किसी काम को करने की तीव्र इच्छा और मेहनत |
| साधना | निरंतर अभ्यास और तपस्या |
| खेल भावना | खेल को ईमानदारी और सद्भाव से खेलने की भावना |
| साधारण सिपाही | सेना का एक सामान्य/निम्न पद का जवान |
| सूबेदार | सेना का एक अधिकारी-पद |
| छावनी | सैनिकों के रहने का क्षेत्र, कैंट |
| नौसिखिया | नया सीखने वाला, अनुभवहीन |
| निखार आना | सुधार आना, चमक आना |
| तरक्की | उन्नति, प्रगति |
| लांस नायक | भारतीय सेना का एक पद (रैंक) |
| श्रेय | किसी अच्छे काम का यश/श्रेय पाना |
| स्वर्ण पदक | सोने का तमगा, प्रथम स्थान का पुरस्कार |
6पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
मेरी समझ से (क)
- "दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं..." इस बात से क्या पता चलता है?
- वे अत्यंत क्रोधी थे
- वे अच्छे ढंग से बदला लेते थे ✔
- उन्हें हॉकी से मारने पर वे अधिक गोल करते थे
- वे जानते थे कि खेल को सही भावना से खेलना चाहिए ✔
- लोगों ने उन्हें 'हॉकी का जादूगर' क्यों कहा?
- उनके हॉकी खेलने के विशेष कौशल के कारण ✔
- उनकी हॉकी स्टिक की अनोखी विशेषताओं के कारण
- हॉकी के लिए उनके विशेष लगाव के कारण
- उनकी खेल भावना के कारण
मिलकर करें मिलान
| शब्द | अर्थ या संदर्भ |
|---|---|
| 1. लांस नायक | 2. भारतीय सेना का एक पद (रैंक) है |
| 2. बर्लिन ओलंपिक | 4. वर्ष 1936 में जर्मनी के बर्लिन शहर में आयोजित ओलंपिक खेल प्रतियोगिता, जिसमें 49 देशों ने भाग लिया था |
| 3. पंजाब रेजिमेंट | 5. स्वतंत्रता से पहले अंग्रेजों की भारतीय सेना का एक दल |
| 4. सैंपर्स एंड माइनर्स टीम | 6. अंग्रेजों के समय का एक हॉकी दल |
| 5. सूबेदार | 1. स्वतंत्रता से पहले सूबेदार भारतीय सैन्य अधिकारियों का दूसरा सबसे बड़ा पद था |
| 6. छावनी | 3. सैनिकों के रहने का क्षेत्र |
पंक्तियों पर चर्चा
(क) "बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी।"
अर्थ — जो व्यक्ति दूसरों के साथ गलत करता है, उसके मन में हमेशा यह डर बना रहता है कि कहीं उसके साथ भी वैसा ही बुरा व्यवहार न हो जाए। यही कारण है कि उस खिलाड़ी को ध्यानचंद के बदला लेने की धमकी से लगातार डर लगा रहा।
(ख) "मेरी तो हमेशा यह कोशिश रहती कि मैं गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को दे दूँ ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाए। अपनी इसी खेल भावना के कारण मैंने दुनिया के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया।"
अर्थ — ध्यानचंद स्वयं गोल करने के बजाय अपने साथियों को श्रेय दिलाना पसंद करते थे। यह उनकी निःस्वार्थ टीम-भावना को दर्शाता है, और यही सच्ची खेल-भावना उन्हें दुनिया भर में लोकप्रिय बना गई।
सोच-विचार के लिए
(क) ध्यानचंद की सफलता का क्या रहस्य था?
ध्यानचंद की सफलता का रहस्य था — लगन, निरंतर साधना (अभ्यास) और सच्ची खेल भावना। उन्होंने कभी शॉर्टकट नहीं अपनाया, बल्कि धीरे-धीरे अभ्यास से अपने खेल को निखारा।
(ख) किन बातों से ऐसा लगता है कि ध्यानचंद स्वयं से पहले दूसरों को रखते थे?
वे हमेशा गेंद को गोल के पास ले जाकर साथी खिलाड़ी को गोल करने का मौका देते थे ताकि उसे श्रेय मिले, और वे यह भी मानते थे कि हार-जीत किसी एक खिलाड़ी की नहीं बल्कि पूरे देश की होती है — इन बातों से पता चलता है कि वे स्वयं से पहले टीम और देश को रखते थे।
संस्मरण की रचना
"उन दिनों में मैं, पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करता था।" — यह पाठ मेजर ध्यानचंद द्वारा स्वयं अपनी आत्मकथा से लिखा गया एक संस्मरण (memoir) है, जो 'मैं' शैली (प्रथम पुरुष) में लिखा गया है।
(क) संस्मरण की कुछ विशेषताएँ लिखिए।
संस्मरण की विशेषताएँ — 1) यह लेखक के अपने जीवन की सच्ची घटनाओं पर आधारित होता है; 2) यह प्रायः प्रथम पुरुष ('मैं') शैली में लिखा जाता है; 3) इसमें लेखक अपने अनुभव, भावनाएँ और सीख साझा करता है; 4) भाषा सरल, आत्मीय और सहज होती है; 5) यह पाठक को लेखक के जीवन और समय से सीधे जोड़ता है।
(ख) क्या आपने कभी कोई ऐसी घटना अनुभव की है जिसे आप संस्मरण के रूप में लिख सकें? अपने सहपाठियों के साथ साझा कीजिए।
(व्यक्तिगत उत्तर है।) उदाहरण — एक बार खेल-दिवस पर मैंने दौड़ प्रतियोगिता में भाग लिया था और गिर जाने के बावजूद हिम्मत न हारते हुए दौड़ पूरी की — यह घटना मैं संस्मरण के रूप में लिख सकता/सकती हूँ।
शब्दों के जोड़े, विभिन्न प्रकार के
(क) "जैसे-जैसे मेरे खेल में निखार आता गया, वैसे-वैसे मुझे तरक्की भी मिलती गई।" — यह एक ही शब्द को दोहराकर बनाया गया शब्द-युग्म है। पाँच और ऐसे शब्द-युग्म लिखिए:
उदाहरण-सा और शब्द-युग्म लिखिए:
धीरे-धीरे, बार-बार, एक-एक, दिन-दिन, घर-घर।
(ख) "खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक की घटनाएँ होती रहती हैं।" — यहाँ 'धक्का-मुक्की' और 'नोंक-झोंक' में जुड़े दोनों शब्द अलग-अलग हैं पर मिलते-जुलते अर्थ देते हैं। पाँच और ऐसे शब्द-युग्म लिखिए:
पाँच शब्द-युग्म लिखिए:
लेन-देन, खाना-पीना, कहा-सुनी, रहन-सहन, आगे-पीछे।
(ग) "हार या जीत मेरी नहीं" और "बच्चे व बूढ़े मुझे घेर लेते हैं" — जब दो अलग-अलग शब्दों को 'या'/'और' की जगह योजक चिह्न (-) लगाकर जोड़ा जाता है तो वे संक्षिप्त और सुंदर बन जाते हैं। नीचे दिए गए शब्दों को योजक चिह्न लगाकर जोड़िए:
| दिए गए शब्द | योजक चिह्न से जोड़ा गया रूप |
|---|---|
| अच्छा या बुरा | अच्छा-बुरा |
| छोटा या बड़ा | छोटा-बड़ा |
| अमीर और गरीब | अमीर-गरीब |
| उत्तर और दक्षिण | उत्तर-दक्षिण |
| गुरु और शिष्य | गुरु-शिष्य |
| अमृत या विष | अमृत-विष |
बात पर बल देना
"मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है" — यहाँ 'ही' शब्द जोड़ने से वाक्य के भाव पर विशेष बल (जोर) पड़ता है। यदि 'ही' हटा दें — "मैंने तो अपना बदला ले लिया है" — तो वाक्य का सामान्य अर्थ तो वही रहता है, पर 'ही' लगाने से यह अर्थ और पक्का/निश्चित हो जाता है।
'ही', 'भी', 'तो' जैसे बल देने वाले शब्दों को पाठ में खोजकर उनके प्रयोग पर चर्चा कीजिए।
पाठ में प्रयुक्त उदाहरण — "खेल में तो यह सब चलता है" (तो — बल देने के लिए), "उन दिनों भी यह सब चलता था" (भी — समानता/जोड़ के लिए बल), "मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है" (तो और ही — दोनों मिलकर निश्चय पर बल देते हैं), "इसका यह मतलब नहीं कि सारे गोल मैं ही करता था" (ही — विशेष रूप से इंगित करने के लिए)। इस प्रकार ये शब्द वाक्य के भाव को अधिक स्पष्ट और प्रभावी बना देते हैं।
आपकी बात
(क) ध्यानचंद के स्थान पर आप होते तो क्या बदला लेते? कैसे?
(व्यक्तिगत उत्तर है।) उदाहरण — मैं भी ध्यानचंद की तरह अपने खेल-कौशल से ही जवाब देना पसंद करूँगा/करूँगी, क्योंकि इससे न केवल बदला लिया जा सकता है बल्कि सामने वाले को अपनी गलती का एहसास भी हो जाता है।
(ख) आपको कौन-से खेल और खिलाड़ी सबसे अधिक अच्छे लगते हैं? क्यों?
(व्यक्तिगत उत्तर है।) उदाहरण — मुझे हॉकी और क्रिकेट पसंद हैं, और मेजर ध्यानचंद मेरे प्रिय खिलाड़ी हैं क्योंकि उनकी खेल-भावना और विनम्रता मुझे बहुत प्रेरित करती है।
समाचार-पत्र से
(क) क्या आप समाचार-पत्र पढ़ते हैं? समाचार-पत्र में खेल-समाचार किस तरह लिखे जाते हैं, ध्यान से पढ़िए और एक खेल-समाचार लिखने का प्रयास कीजिए।
(व्यक्तिगत उत्तर है।) उदाहरण-शीर्षक — "विद्यालय की अंतर-सदन हॉकी प्रतियोगिता में नीला सदन विजयी" — फिर मैच का संक्षिप्त विवरण, स्कोर और खिलाड़ियों के प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए समाचार लिखा जा सकता है।
(ख) समूह में खेल-संवाददाता बनकर किसी खेल के मैदान का आँखों देखा हाल कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
यह एक समूह-गतिविधि है — विद्यार्थी बारी-बारी से किसी खेल (जैसे हॉकी, क्रिकेट, कबड्डी) का काल्पनिक लाइव कमेंट्री के रूप में आँखों देखा हाल सुनाएँ, जैसे रेडियो/टीवी के खेल-संवाददाता करते हैं।
डायरी का प्रारंभ
आज की पहेली
7झरोखे से — डाँडी या गोथा
यह भील-भिलाला बच्चों का खेल है। 'डाँडी' और 'गोथा' शब्द का अर्थ एक ही है — खेलने की हाथ-लकड़ी। देखा जाए तो यह खेल काफी-कुछ हमारे खेल हॉकी जैसा है। अंतर बस इतना है कि हॉकी में गोल करने के लिए गोलपोस्ट होते हैं, जबकि इस खेल में ऐसा कोई निर्धारण नहीं है। दूसरा अंतर यह है कि भील-भिलाला बच्चों की यह गेंद, हॉकी की अपेक्षा एकदम साधारण होती है। यह बाँस की बनी होती है।
खेल सामग्री — 1) बाँस के गुद्दे की गेंद जिसे 'दुईत' कहते हैं; 2) 'गोथा' यानी अंग्रेजी के 'L' अक्षर की तरह नीचे से मुड़ी हुई बाँस की डंडियाँ; 3) राख से खेल के मैदान में सीमांकन करना और घेरे के भीतर एक छोटा वृत्त बनाना।
कैसे खेलें — इस खेल में कितने भी खिलाड़ी (कम-से-कम दो-दो प्रति दल) खेल सकते हैं। टॉस के बाद गेंद को घेरे के भीतर बने छोटे वृत्त में रखा जाता है। हमला करने वाला दल गेंद को पीटकर दूर ले जाता है। दोनों दलों के एक-एक खिलाड़ी अपनी-अपनी 'डी' में खड़े रहते हैं ताकि गेंद रेखा पार न कर सके। हॉकी से अलग, इस खेल में दोनों ओर से खेला जा सकता है। जो दल गेंद को अधिक बार विरोधी के पाले में ढकेलता है, वही विजयी माना जाता है। दो विशेष नियम हैं — गेंद को शरीर के किसी अंग से छूना या रोकना मना है, और गेंद को हवाई शॉट मारकर या हवा में पास देकर नहीं खेला जा सकता।
विशेष — यह खेल होली के त्योहार से कुछ दिन पहले खेला जाता है। होलिका जलाने के दिन दुईत और गोथे आग में डाल दिए जाते हैं।
8साझी समझ
(क) 'डाँडी' या 'गोथा' खेल अपने मित्रों के साथ खेलकर देखिए।
यह एक व्यावहारिक कक्षा-गतिविधि है — विद्यार्थी उपलब्ध सामग्री (जैसे कागज़ की गेंद और मुड़ी हुई डंडी) से इस खेल का अभ्यास कर सकते हैं और अपने अनुभव कक्षा में साझा कर सकते हैं।
(ख) आप भी अपने आस-पास खेले जाने वाले किसी अन्य स्वदेशी खेल के नियम इसी तरह लिखिए ताकि कोई भी बच्चा उसे समझकर खेल सके।
(व्यक्तिगत उत्तर है।) उदाहरण — गिल्ली-डंडा, कंचे, पिट्ठू (सात पत्थर), लंगड़ी-टाँग आदि खेलों के नियम खेल-सामग्री, खिलाड़ियों की संख्या और खेलने के तरीके के साथ लिखे जा सकते हैं।
9खोजबीन के लिए
10पढ़ने के लिए — एक दौड़ ऐसी भी
एक दौड़ ऐसी भी
कई साल पहले ओलंपिक खेलों के दौरान एक विशेष दौड़ होने जा रही थी। सौ मीटर की इस दौड़ में एक आश्चर्यजनक घटना हुई। नौ प्रतिभागी आरंभिक रेखा पर तैयार खड़े थे। उन सभी को कोई-न-कोई शारीरिक विकलांगता थी। सीटी बजी, सभी दौड़ पड़े। बहुत तीव्र तो नहीं, पर उनमें जीतने की होड़ अवश्य तेज़ थी।
सभी जीतने की उत्सुकता के साथ आगे बढ़े, बस एक छोटे से लड़के को छोड़कर। तभी छोटा लड़का ठोकर खाकर लड़खड़ाया, गिरा और रो पड़ा। उसकी पुकार सुनकर बाकी प्रतिभागी दौड़ना छोड़ देखने लगे कि क्या हुआ। फिर, एक-एक करके वे सब उस बच्चे की सहायता के लिए उसके पास आने लगे। सब के सब लौट आए उसे दोबारा खड़ा किया। उसके आँसू पोंछे, धूल साफ़ की।
वह छोटा लड़का एक ऐसी बीमारी से ग्रस्त था, जिसमें शरीर के अंगों की बढ़त धीमी होती है और उनमें तालमेल की कमी भी रहती है। फिर तो सारे बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा और साथ मिलकर दौड़ लगाई और सब के सब अंतिम रेखा तक एक साथ पहुँच गए, दर्शक मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे, इस प्रश्न के साथ कि सब के सब एक साथ यह दौड़ जीते हैं, इनमें से किसी एक को स्वर्ण पदक कैसे दिया जा सकता है? निर्णायकों ने सबको स्वर्ण पदक देकर समस्या का बढ़िया हल ढूँढ़ निकाला। उस दिन मित्रता का अनोखा दृश्य देख दर्शकों की तालियाँ थमने का नाम नहीं ले रही थीं।
11पाठ का सार — माइंड मैप
12अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
मेजर ध्यानचंद को 'हॉकी का जादूगर' क्यों कहा जाता है?
उनके हॉकी खेलने के अद्भुत और असाधारण कौशल के कारण लोग उन्हें 'हॉकी का जादूगर' कहते थे — गेंद मानो उनकी स्टिक से चिपकी रहती थी।
'गोल' पाठ किस विधा की रचना है?
यह एक संस्मरण (आत्मकथा का अंश) है, जो मेजर ध्यानचंद ने स्वयं प्रथम पुरुष ('मैं') शैली में लिखा है।
भारत में 'राष्ट्रीय खेल दिवस' कब और क्यों मनाया जाता है?
29 अगस्त को, मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन के उपलक्ष्य में, भारत में 'राष्ट्रीय खेल दिवस' मनाया जाता है।
मेजर ध्यानचंद ने पहले प्रसंग में अपना 'बदला' कैसे लिया?
उन्होंने हिंसा से नहीं, बल्कि अपने खेल-कौशल से — एक के बाद एक छह गोल दागकर अपना बदला लिया।
'डाँडी या गोथा' खेल क्या है?
यह भील-भिलाला बच्चों का एक पारंपरिक खेल है, जो हॉकी से मिलता-जुलता है और होली के त्योहार के आस-पास खेला जाता है।
🔗 कक्षा 6 मल्हार — सभी पाठ आपस में जुड़े हुए
इस पाठ के साथ-साथ कक्षा 6 हिंदी मल्हार पुस्तक के बाकी सभी पाठ भी पढ़ें:
ब्लॉगर SEO सुझाव
सुझाया गया शीर्षक: गोल (मेजर ध्यानचंद) — कक्षा 6 हिंदी मल्हार पाठ 2: भावार्थ, शब्दार्थ और संपूर्ण प्रश्नोत्तर
मेटा विवरण: कक्षा 6 मल्हार पाठ 2 'गोल' का सरल भावार्थ, शब्द-संपदा, लेखक परिचय (मेजर ध्यानचंद), डाँडी या गोथा खेल, और सभी पाठ्यपुस्तक प्रश्नों के हल — एक ही स्थान पर।
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