बिरजू महाराज से साक्षात्कार
कथक-सम्राट पद्मविभूषण बिरजू महाराज की जुबानी — जीवन, संघर्ष, कला और लय की कहानी
1पाठ परिचय
कथक की जब भी बात होती है तो हमारे मस्तिष्क में एक नाम अवश्य आता है — बिरजू महाराज। कथक की कला उन्हें विरासत में मिली थी; भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी उन्हें उनकी मनमोहक प्रस्तुतियों के लिए स्मरण किया जाता है। बिरजू महाराज का जीवन शास्त्रीय संगीत के रागों के समान ही उतार-चढ़ाव भरा था। अपने जीवन में प्राप्त सफलताओं के लिए उन्होंने कठिन साधना की। प्रस्तुत पाठ विद्यालय पत्रिका के लिए विद्यार्थियों (श्रेया, तनुश्री और माणिक) द्वारा पद्मविभूषण श्री बिरजू महाराज से लिया गया एक साक्षात्कार है।
2साक्षात्कार — मूल पाठ
सुना है कि आपका बचपन संघर्षों से भरा हुआ था। अपने बचपन के बारे में कुछ बताएँगे?
एक जमाना था जब हमलोग छोटे नवाब कहलाते थे। हवेली के दरवाजे पर आठ-आठ सिपाहियों का पहरा होता था। मेरे बाबूजी के देहांत के बाद आर्थिक परेशानियाँ बढ़ने लगीं। जिन डिब्बों में कभी तीन-चार लाख की कीमत के हार हुआ करते थे वे अब खाली पड़े थे। जीवन में उतार-चढ़ाव तो होता ही है। सब समय का चक्र है। संघर्षों के दौर में मेरी सबसे बड़ी सहयोगी मेरी माँ थीं। कभी कर्ज लेते थे तो कभी पुरानी जरी की साड़ियाँ जलाकर उनके सोने-चाँदी के तार बेचते थे और गुजारा करते थे। नृत्य के कार्यक्रमों से भी कभी-कभी पैसा आ जाता था। दिन में खाना खाते थे तो रात को कई बार नहीं भी खाते थे। अम्मा बार-बार यही कहा करती थीं, "खाने को भले ही चना मिले या कुछ भी न मिले पर अभ्यास जरूर करो।"
आपने कथक किससे सीखा?
मेरे गुरु थे मेरे पिता अच्छन महाराज और चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज। घर में चूँकि कथक का माहौल था, अत: औपचारिक प्रशिक्षण शुरू होने से पहले ही मैं देख-देखकर कथक सीख गया था और नवाब के दरबार में नाचने भी लगा था। कथक की तालीम शुरू करते समय गुरु शिष्यों को गंडा (ताबीज़) बाँधते हैं और शिष्य गुरु को भेंट देता है। जब मेरी तालीम शुरू होने की बात आई तो बाबूजी ने कहा, "भेंट मिलने पर ही गंडा बाँधूँगा।" इस पर अम्मा ने मेरे दो कार्यक्रमों की कमाई बाबूजी को भेंट के रूप में दे दी। 'गंडा' गुरु और शिष्य के बीच पवित्र रिश्ता होता है। मैंने अब इस रस्म को उल्टा कर दिया है। कई वर्षों तक नृत्य सिखाने के बाद जब देखता हूँ कि शिष्य में सच्ची लगन है तभी गंडा बाँधता हूँ।
क्या पढ़ाई या दूसरे कामों के साथ-साथ संगीत और नृत्य जारी रखना संभव है?
यह तो अपने सामर्थ्य पर निर्भर करता है। मेरी शिष्या शोभना नारायण आई.ए.एस. अफसर हैं और अच्छी नर्तकी भी। मैं नृत्य के साथ-साथ बजाता और गाता भी हूँ। इसके अतिरिक्त नृत्य नाटिकाएँ और उनके लिए संगीत भी तैयार करता हूँ। मैंने जब नौकरी शुरू की तो मेरे चाचा ने कहा, "तुम नौकरी में बँट जाओगे। तुम्हारे अंदर का नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएगा।" पर मैंने दृढ़ निश्चय किया था कि 'महाराज' बनना है तो उसके लिए मेहनत भी करनी होगी।
कथक की शुरुआत कब हुई?
कथक की परंपरा बहुत पुरानी है। 'महाभारत' के आदिपर्व और 'रामायण' में इसकी चर्चा मिलती है। पहले कथक रोचक और अनौपचारिक रूप से कथा कहने का ढंग होता था। तब यह मंदिरों तक ही सीमित था। हमारे लखनऊ घराने के लोग मूलत: बनारस-इलाहाबाद के बीच हरिया गाँव के रहने वाले थे। वहाँ 989 कथिकों के घर हुआ करते थे। कथिकों का एक तालाब अभी भी है। गाँव में एक बैरगिया नाला है, जिसके साथ यह कहानी जुड़ी हुई है — एक बार नौ कथिक नाले के पास से गुजर रहे थे कि तीन डाकू वहाँ आ पहुँचे। कुछ कथिक डर गए, किंतु उन कथिकों की कला में इतना दम था कि डाकू सब कुछ भूलकर उन कथिकों के कथक में मग्न हो गए। तब से यह पद लोगों में प्रचलित हो गया —
बैरगिया नाला जुलुम जोर,
नौ कथिक नचावें तीन चोर।
जब तबला बोले धीन-धीन,
तब एक-एक पर तीन-तीन॥
लखनऊ घराने के बाद जयपुर घराने और फिर बनारस घराने का विकास हुआ। इसके अलावा रायगढ़ के महाराज चक्रधर की भी अपनी अलग शैली थी।
क्या नृत्य सीखने के लिए संगीत जानना जरूरी होता है?
गाना, बजाना और नाचना — ये तीनों संगीत का हिस्सा हैं। संगीत में लय होती है। उसका ज्ञान आवश्यक है। नृत्य में शरीर, ध्यान और तपस्या का साधन होता है। नृत्य करना एक तरह से अदृश्य शक्ति को निमंत्रण देना है — कृष्ण, मेरे अंदर समाओ और नाचो। नृत्य ही नहीं, हमारी हर गतिविधि में लय होती है। घसियारा घास को हाथ से पकड़ कर उस पर हँसिया मारता है और फिर घास हटाता है। मारने और हटाने की इस लय में जरा भी गड़बड़ी हुई नहीं कि उसका हाथ गया। लय हर काम में, नृत्य में, जीवन में संतुलन बनाए रखती है। लय एक तरह का आवरण है, जो नृत्य को सुंदरता प्रदान करती है। अगर नर्तक को सुर-ताल की समझ है तो वह जान पाएगा कि यह लहरा ठीक नहीं है, इसके माध्यम से नृत्य अंगों में प्रवेश नहीं करेगा।
आपने कथक में कई नई चीजें भी जोड़ी हैं न?
कथक की पुरानी परंपरा को तो कायम रखा है। हाँ, उसके प्रस्तुतीकरण में बदलाव किए हैं। हमने गौर किया कि हमारे चाचा लोग और बाबूजी नाचते तो खूबसूरत थे ही, उनके खड़े होने का अंदाज भी निराला होता था। हमने उन भाव-भंगिमाओं को भी कथक में शामिल कर लिया। चाचा लोग और बाबूजी हमारे लिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश थे। हमने तीनों की शिक्षा को इकट्ठा करके एक नया रूप तैयार किया। इसी प्रकार टैगोर, त्यागराज आदि कई आधुनिक कवियों की रचनाओं को लेकर भी कथक रचनाएँ तैयार कीं।
पर ये लोग तो अलग-अलग भाषाओं के कवि थे।
भाषाएँ अलग-अलग होती हैं पर इंसान तो सब जगह एक-से होते हैं। फ्रांस में एक दर्शक ने कहा, "मैं नहीं जानता कि यशोदा कौन है?" मैंने उन्हें बताया कि इस धरती पर सब माँएँ यशोदा हैं और सब नन्हें बच्चे कृष्ण। बच्चे की जिद, रोना, उठना, बैठना, सब जगह एक जैसा होता है। धीरे-धीरे हमें अलग-अलग भाषा, संस्कार और तौर-तरीके मिलते हैं। चाहे नृत्य हो या कुछ और, परंपरा एक वृक्ष के समान होती है, जो सबको एक जैसी छाया और आश्रय देती है। उसके नीचे बैठने वाले अलग-अलग स्वभाव के होते हैं। वृक्ष से लिए बीज को बोएँ तो समय आने पर ही एक और वृक्ष फलेगा। वह नया वृक्ष कैसा होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उसे कैसी हवा, पानी और खाद मिली है।
आपने जब सीखना शुरू किया था, तब से अब तक कथक की दुनिया में क्या-क्या बदलाव आए हैं?
पहले मंच नहीं होते थे। फर्श पर चाँदनी (बिछाने की बड़ी सफेद चादर) बिछी होती थी जिस पर कथक होता था और दर्शक चारों ओर बैठते थे। शृंगार के लिए चंदनलेप और होंठ रंगने के लिए पान होता था। पहले नर्तक कथा के दृश्यों का ऐसा विस्तृत वर्णन करते थे कि दर्शक के सामने पूरा दृश्य खिंच जाता था — कि कैसे गोपियों ने घड़ा उठाया, धीमी चाल से पनघट की ओर चलीं, पीछे से कृष्ण चुपचाप आए, कंकड़ उठाया और दे मारा। अब सिर्फ 'पनघट की गत देखो' कहकर बाकी दर्शक की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है।
आपने गाना, बजाना और नाचना कब शुरू किया?
बहुत छुटपन से ही तबला पीटना शुरू कर दिया था। चाचा ने कहा, "लड़के के हाथ में लय है।" पाँच साल का होते-होते हारमोनियम पर लहरा बजाने लगा। सबको खुश करने के लिए फिल्मी गाने भी खूब गाता था। एक बार सबकी फरमाइश पर सुरैया के एक गाने पर देर तक नाचा। बहनों ने बड़े शौक से बिंदी-चुन्नी से सजा दिया था तब तक चाचा आ गए। बस डर के मारे तुरंत सब कुछ उतार फेंका और छिप गया।
शास्त्रीय नृत्य और लोक नृत्य में क्या अंतर है?
लोक नृत्य सामूहिक होता है। दिनभर की मेहनत के बाद लोग थकान दूर करने और मनोरंजन के लिए इकट्ठा मिलकर नाचते हैं। दूसरी ओर शास्त्रीय नृत्य में एक नर्तक अकेला ही काफी होता है। लोक नृत्य नाचने वालों के अपने मन बहलाव और संतुष्टि के लिए होता है जबकि शास्त्रीय नृत्य दर्शकों के लिए होता है। शुरू में कथावाचक भी लोक नर्तक हुआ करता था। धीरे-धीरे जब उसकी खास शैली व रूप निश्चित होता गया तो वह शास्त्रीय नृत्य हो गया।
इस समय भारत में शास्त्रीय नृत्य की क्या स्थिति है?
कुछ वर्ष पहले तक स्थिति दयनीय थी। अब इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है पर शोर वाले संगीत-नृत्य का भी खूब प्रचलन है। मैं सबसे यही कहता हूँ, वह संगीत सुनो-देखो, लेकिन अपनी परंपरा की गहराई को भी समझो, अनुभव करो।
कर्नाटक और हिन्दुस्तानी शैली के संगीत की तरह क्या दक्षिण और उत्तर के नृत्य में भी अंतर है?
कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, कथकली, मोहिनीअट्टम, ओडिसी, मणिपुरी — ये शास्त्रीय नृत्य की प्रमुख शैलियाँ हैं। संगीत और गाने के ढंग का अंतर तो है ही, इसके अतिरिक्त भी हर नृत्य की अपनी लय और भाव-भंगिमा है। कथक की भाव-भंगिमा दैनिक जीवन से ली गई होती है और भरतनाट्यम में मूर्तिकला से। भरतनाट्यम में दोनों भावों का इकट्ठा प्रयोग होता है और कथक में बारी-बारी से। ओडिसी और मणिपुरी में कोमलता है, कथकली में ओज है। कथक में दोनों हैं। कथक में गर्दन को हल्के से हिलाया जाता है, चिराग की लौ के समान। इसी प्रकार उँगलियाँ भी बहुत धीरे-से हिलाई जाती हैं, जैसे घूँघट पकड़ने या घूँघट उठाने में। उँगलियाँ जरा जोर से हिलीं नहीं कि चाचा जी तुरंत टोकते थे, "घूँघट उठा रहे हो या तंबू?"
खाली समय में आप क्या करते हैं?
खाली तो होता ही नहीं हूँ। नींद में भी हाथ चलता रहता है। मशीनों में मन खूब लगता है। अगर मैं नर्तक न होता तो शायद इंजीनियर होता। कोई भी मशीन या यंत्र खोलकर उसके कल-पुर्जे देखने की जिज्ञासा होती है। तुम्हें जानकर हैरानी होगी कि मैं अपने ब्रीफकेस में हरदम पेचकस और दूसरे छोटे-मोटे औजार रखता हूँ। कभी अपना पंखा-फ्रिज ठीक किया तो कभी और मशीनें। बेटी-दामाद चित्रकार हैं, उन्हें देख-देखकर पेंटिंग बनाने का भी शौक हो गया है। प्राय: रात बारह बजे के बाद चित्र बनाने बैठता हूँ। जब नींद से आँखें बंद होने लगती हैं तो ब्रश एक तरफ रख देता हूँ और सो जाता हूँ। पिछले दो वर्षों में लगभग सत्तर चित्र बनाए हैं।
अगर कोई बच्चा गाना, बजाना या नृत्य सीखना चाहे पर घर के लोग न चाहते हों तो ऐसे में क्या करना चाहिए?
आजकल के माँ-बाप से मेरी विनती है कि यदि बच्चे की रुचि है तो उसे लय के साथ खेलने दें। जैसे अन्य खेल हैं वैसे ही यह भी एक खेल है, जिसमें बहुत-कुछ सीखने को मिलता है। इस खेल की दुनिया में संतुलन, समय का अंदाजा व सदुपयोग बच्चे के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
क्या आपके परिवार में लड़कियों ने कथक नहीं सीखा?
मेरी बहनों को कथक नहीं सिखाया गया पर मैंने अपनी बेटियों को खूब सिखाया। लड़कियों के पास शिक्षा या कोई-न-कोई हुनर अवश्य होना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर हो सकें। हुनर ऐसा खजाना है, जिसे कोई नहीं छीन सकता और वक्त पड़ने पर काम आता है। बच्चो, तुम लोग संगीत सीखते हो? यदि नहीं तो जरूर सीखो। मन की शांति के लिए यह बहुत जरूरी है। लय हमें अनुशासन सिखाती है, संतुलन सिखाती है। नाचने, गाने और बजाने वाले एक-दूसरे के साथ तालमेल बैठाकर एक नई रचना करते हैं। सुर और लय से हमें एक-दूसरे का सहयोगी बनकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
3शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तालीम | प्रशिक्षण, शिक्षा |
| गंडा | गुरु द्वारा शिष्य को बाँधा जाने वाला ताबीज़, जो गुरु-शिष्य के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है |
| घराना | संगीत/नृत्य की विशिष्ट शैली साझा करने वाला कलाकारों का कुटुंब या परंपरा |
| लहरा | नृत्य के लिए बजाई जाने वाली एक लयबद्ध धुन |
| चाँदनी | बिछाने की बड़ी सफेद चादर |
| भाव-भंगिमा | चेहरे व शरीर के हाव-भाव, मुद्राएँ |
| पनघट | वह स्थान जहाँ से लोग पानी भरते हैं (कुआँ/तालाब का किनारा) |
| दयनीय | दुखद, बुरी स्थिति वाली |
| ओज | तेज, बल, ऊर्जा से भरा भाव |
| कल-पुर्जे | मशीन के छोटे-छोटे हिस्से |
| सदुपयोग | अच्छा/सही उपयोग |
| आत्मनिर्भर | अपने पैरों पर खड़ा, स्वावलंबी |
4पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
मेरी समझ से (क)
- बिरजू महाराज ने गंडा बाँधने की परंपरा में परिवर्तन क्यों किया होगा?
- वे गुरु के प्रति शिष्य के निष्ठा भाव को परखना चाहते थे।
- वे नृत्य शिक्षण के लिए इस परंपरा को महत्वपूर्ण नहीं मानते थे।
- वे नृत्य के प्रति शिष्य के लगन व समर्पण भाव को जाँचना चाहते थे। ✔
- वे शिष्य की भेंट देने की सामर्थ्य को परखना चाहते थे।
- "जीवन में उतार-चढ़ाव तो होता ही है।" बिरजू महाराज के जीवन में किस तरह के उतार-चढ़ाव आए?
- पिता के देहांत के बाद आर्थिक अभावों का सामना करना पड़ा। ✔ (उतार)
- कोई भी संस्था नृत्य प्रस्तुतियों के लिए आमंत्रित नहीं करती थी।
- किसी समय विशेष में घर में सुख-समृद्धि थी। ✔ (चढ़ाव — "छोटे नवाब" वाला समय)
- नृत्य के औपचारिक प्रशिक्षण के अवसर बहुत ही सीमित हो गए थे।
- बिरजू महाराज के अनुसार बच्चों को लय के साथ खेलने की अनुशंसा क्यों की जानी चाहिए?
- संगीत, नृत्य, नाटक और सभी कलाएँ बच्चों में मानवीय मूल्यों का विकास नहीं करती हैं।
- कला संबंधी विषयों से जुड़ाव बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ✔
- कला भी एक खेल है, जिसमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। ✔
- वर्तमान समय में कला भी एक सफल माध्यम नहीं है।
मिलकर करें मिलान
| शब्द | मिलान — संदर्भ/अवधारणा |
|---|---|
| 1. कर्नाटक संगीत शैली | भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक शैली, मुख्यतः दक्षिण भारत में प्रचलित; स्वर शैली की प्रधानता; जल तरंगम, वीणा, मृदंग, मंडोलिन वाद्ययंत्रों से संगत। |
| 2. घराना | कलाकारों का समुदाय/कुटुंब, जो संगीत-नृत्य की विशिष्ट शैली साझा करता है; सिद्धांत-शैली पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है। |
| 3. शास्त्रीय संगीत | भारत की प्राचीन गायन-वादन-नृत्य-अभिनय परंपरा का अभिन्न अंग; शब्दों से अधिक सुरों का महत्व; नियमों की प्रधानता। |
| 4. हिंदुस्तानी संगीत शैली | मुख्यतः उत्तर भारत में प्रचलित शास्त्रीय संगीत शैली; तबला, सारंगी, सितार, संतूर से संगत; छह प्रमुख राग। |
| 5. कनछेदन | हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में एक; कान में सोने/चाँदी का तार पहनाने से संबंधित। |
| 6. लोक नृत्य | क्षेत्र विशेष में लोक द्वारा किए जाने वाले पारंपरिक नृत्य; संस्कृति व रीति-रिवाजों को दर्शाते हैं; फसल कटाई/उत्सवों पर किए जाते हैं। |
मिलान: कर्नाटक संगीत शैली → स्वर-शैली/दक्षिण भारत विवरण; घराना → कलाकार-कुटुंब विवरण; शास्त्रीय संगीत → सुर-नियम प्रधान विवरण; हिंदुस्तानी संगीत शैली → उत्तर भारत/छह राग विवरण; कनछेदन → 16 संस्कार विवरण; लोक नृत्य → क्षेत्रीय पारंपरिक नृत्य विवरण।
शीर्षक
इस पाठ का शीर्षक 'बिरजू महाराज से साक्षात्कार' है। इसे अन्य नाम भी दिए जा सकते हैं, जैसे — "लय ही जीवन है: बिरजू महाराज की जुबानी" या "कथक-सम्राट से बातचीत"।
तर्क — पहला शीर्षक इसलिए उपयुक्त है क्योंकि पूरे साक्षात्कार में बिरजू महाराज बार-बार 'लय' को नृत्य ही नहीं, जीवन के हर पहलू (अनुशासन, संतुलन, कार्य-कुशलता) से जोड़ते हैं — यह शीर्षक साक्षात्कार के केंद्रीय भाव को उभारता है।
पंक्तियों पर चर्चा
"तुम नौकरी में बँट जाओगे। तुम्हारे अंदर का नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएगा।"
अर्थ — चाचा को आशंका थी कि नौकरी करने से बिरजू महाराज का ध्यान बँट जाएगा, जिससे वे नृत्य को पूरा समय व समर्पण नहीं दे पाएँगे और उनकी नृत्य-प्रतिभा पूरी तरह विकसित नहीं हो सकेगी।
"नृत्य में शरीर, ध्यान और तपस्या का साधन होता है।"
अर्थ — नृत्य केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि इसके लिए गहरी एकाग्रता (ध्यान) और तपस्या जैसी कठिन साधना चाहिए, तभी उसमें पूर्णता आती है।
"कथक में गर्दन को हल्के से हिलाया जाता है, चिराग की लौ के समान।"
अर्थ — कथक में गर्दन की गति अत्यंत सूक्ष्म और कोमल होती है, ठीक वैसे ही जैसे दीये की लौ हल्की हवा में मंद-मंद काँपती है — यह कथक की नाजुक भाव-भंगिमा को दर्शाता है।
सोच-विचार के लिए
1. साक्षात्कार को पुनः पढ़कर उत्तर दीजिए:
(क) बिरजू महाराज नृत्य का औपचारिक प्रशिक्षण आरंभ होने से पहले ही कथक कैसे सीख गए थे?
घर में कथक का माहौल होने के कारण वे देख-देखकर ही कथक सीख गए थे और नवाब के दरबार में नाचने भी लगे थे।
(ख) नृत्य सीखने के लिए संगीत की समझ होना क्यों अनिवार्य है?
क्योंकि गाना, बजाना और नाचना — तीनों संगीत के ही अंग हैं और नृत्य में लय का ज्ञान आवश्यक है। सुर-ताल की समझ के बिना नर्तक यह नहीं जान पाएगा कि उसकी लय ठीक है या नहीं, जिससे नृत्य में वांछित सुंदरता नहीं आ पाएगी।
(ग) नृत्य के अतिरिक्त बिरजू महाराज को और किन-किन कार्यों में रुचि थी?
मशीनों और यंत्रों के पुर्जे खोलकर देखना-समझना (इंजीनियरिंग जैसी रुचि) और पेंटिंग बनाना।
(घ) बिरजू महाराज ने बच्चों की शिक्षा और रुचियों के बारे में अभिभावकों से क्या कहा है?
उन्होंने कहा कि यदि बच्चे की रुचि संगीत-नृत्य में है तो माता-पिता उसे लय के साथ खेलने दें, क्योंकि यह भी एक खेल है जिससे संतुलन, समय का अंदाजा और बौद्धिक विकास जैसा बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
2. निम्न प्रसंगों की पहचान कर चर्चा कीजिए:
(क) बिरजू महाराज बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।
वे नृत्य के साथ-साथ गाते-बजाते भी हैं, नृत्य नाटिकाएँ व संगीत भी रचते हैं, मशीनों के पुर्जे ठीक करते हैं, और पेंटिंग भी बनाते हैं।
(ख) बिरजू महाराज को नृत्य की ऊँचाइयों तक पहुँचाने में उनकी माँ का बहुत योगदान रहा।
कठिन समय में माँ ने साड़ियों के जरी के तार बेचकर गुजारा किया, बाबूजी को भेंट देने के लिए अपनी कमाई दी, और हमेशा अभ्यास जारी रखने के लिए प्रेरित किया — "खाने को भले ही चना मिले या कुछ भी न मिले पर अभ्यास जरूर करो।"
(ग) बिरजू महाराज महिलाओं के लिए समानता के पक्षधर थे।
उन्होंने अपनी बेटियों को खूब कथक सिखाया और कहा कि लड़कियों के पास शिक्षा या हुनर अवश्य होना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
शब्दों की बात (उपसर्ग-प्रत्यय)
(क) पाठ में आए शब्द — आजीविका, सीमित, प्रशिक्षण, सुंदरता, आधुनिक, पारंपरिक, भारतीय, सामूहिक, शास्त्रीय — इनमें से कुछ में उपसर्ग (शब्द के आगे जुड़ने वाला अंश) और कुछ में प्रत्यय (शब्द के पीछे जुड़ने वाला अंश) लगे हैं:
| शब्द | विभाजन | प्रकार |
|---|---|---|
| आजीविका | आ + जीविका | उपसर्ग (आ) |
| प्रशिक्षण | प्र + शिक्षण | उपसर्ग (प्र) |
| सीमित | सीमा + इत | प्रत्यय (इत) |
| सुंदरता | सुंदर + ता | प्रत्यय (ता) |
| आधुनिक | अधुना + इक | प्रत्यय (इक) |
| पारंपरिक | परंपरा + इक | प्रत्यय (इक) |
| भारतीय | भारत + ईय | प्रत्यय (ईय) |
| सामूहिक | समूह + इक | प्रत्यय (इक) |
| शास्त्रीय | शास्त्र + ईय | प्रत्यय (ईय) |
(ख) दिए गए उपसर्ग/प्रत्यय (आ, अ, ईय, सु, इक, ता, इत) और मूल शब्दों (मर्म, गमन, राष्ट्र, खंड, श्रम, संस्कृति, कर्म, नाम, साधारण) की सहायता से बने नए शब्द:
| मूल शब्द | उपसर्ग/प्रत्यय | नया शब्द |
|---|---|---|
| मर्म | + इक | मार्मिक |
| गमन | आ + | आगमन |
| राष्ट्र | + ईय | राष्ट्रीय |
| खंड | अ + | अखंड |
| श्रम | + इक | श्रमिक |
| संस्कृति | + इक | सांस्कृतिक |
| कर्म | सु + | सुकर्म |
| नाम | + इत | नामित |
| साधारण | + ता | साधारणता |
(ग) वाक्य उदाहरण — "कठिन प्रशिक्षण के बिना कोई भी कला निखर नहीं पाती।" / "भारतीय शास्त्रीय नृत्य विश्व भर में प्रसिद्ध है।" / "सामूहिक प्रयासों से ही बड़े कार्य संभव होते हैं।"
शब्दों का प्रभाव
वाक्य — "कुछ कथिक डर गए किंतु उन कथिकों की कला में इतना दम था कि डाकू सब कुछ भूलकर उन कथिकों के कथक में मग्न हो गए।" 'इतना' शब्द हटाकर पढ़ने पर वाक्य का प्रभाव कमज़ोर पड़ जाता है।
'इतना' शब्द यह दर्शाता है कि कथिकों की कला असाधारण रूप से प्रभावशाली थी, जिसने डाकुओं तक को मंत्रमुग्ध कर दिया — इसे हटाने से वाक्य की तीव्रता कम हो जाती है। पाठ में ऐसे ही बल देने वाले अन्य शब्द: "बहुत छुटपन से", "पूरी तरह", "खूब", "बिल्कुल" — इनके प्रयोग से वाक्यों में विशेष ज़ोर उत्पन्न होता है।
कला का संसार
(क) "कथक की पुरानी परंपरा को तो कायम रखा है। हाँ, उसके प्रस्तुतीकरण में बदलाव किए हैं।" — कथक की प्रस्तुतियों में किस प्रकार के परिवर्तन आए?
बिरजू महाराज ने अपने बाबूजी व चाचाओं की भाव-भंगिमाओं (जिनका खड़े होने का अंदाज निराला था) को कथक में शामिल किया, टैगोर व त्यागराज जैसे कवियों की रचनाओं पर आधारित नई कथक-रचनाएँ तैयार कीं, और विस्तृत कथा-वर्णन के बजाय संक्षिप्त संकेत देकर दर्शकों की कल्पनाशक्ति पर अधिक छोड़ने लगे (जैसे "पनघट की गत देखो")।
(ख) लोकनृत्य और शास्त्रीय नृत्य में क्या अंतर है?
लोकनृत्य सामूहिक होता है और नाचने वालों के अपने मनोरंजन के लिए किया जाता है, जबकि शास्त्रीय नृत्य में एक नर्तक अकेला भी पर्याप्त होता है और यह दर्शकों के लिए प्रस्तुत किया जाता है। समय के साथ जब किसी लोकनृत्य की शैली व रूप निश्चित हो जाता है, तो वह शास्त्रीय नृत्य का रूप ले लेता है।
(ग) "बैरगिया नाला जुलुम जोर..." हरिया गाँव में गाया जाने वाला यह पद है। अपने क्षेत्र के किसी लोकगीत को कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
(यह एक कक्षा-प्रस्तुति गतिविधि है — विद्यार्थी अपने क्षेत्र के परिचित लोकगीत को याद कर कक्षा में प्रस्तुत करें।)
साक्षात्कार की रचना
(क) साक्षात्कार से पहले क्या-क्या तैयारियाँ की गई होंगी?
साक्षात्कारदाता (बिरजू महाराज) के जीवन, उपलब्धियों और कार्यों पर गहन शोध, प्रश्नों की सूची पहले से तैयार करना, उपयुक्त समय व स्थान तय करना, और बातचीत रिकॉर्ड/नोट करने की व्यवस्था करना।
(ख) आप इस साक्षात्कार में और क्या-क्या प्रश्न जोड़ना चाहेंगे?
जैसे — "आपकी सबसे यादगार प्रस्तुति कौन-सी रही?", "आप नई पीढ़ी के नर्तकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?", "कथक सीखने के इच्छुक विद्यार्थी के लिए आपकी क्या सलाह है?"
(ग) किसी सब्जी विक्रेता, रिक्शा चालक, घरेलू सहायक या सहायिका का साक्षात्कार लेने पर प्रश्न किस प्रकार के होंगे?
प्रश्न उनके दैनिक जीवन के संघर्ष, कार्य के अनुभव, आय और परिवार से जुड़े व्यावहारिक होंगे — जैसे "आप रोज़ कितने घंटे काम करते हैं?", "इस काम में आपको सबसे ज़्यादा चुनौती किसकी लगती है?", "आपका सबसे संतोषजनक अनुभव क्या रहा?" — यानी प्रश्न व्यक्ति के कार्यक्षेत्र और परिस्थितियों के अनुसार बदल जाते हैं।
सृजन
(क) दर्शकों को कथक नृत्यकला के बारे में क्या बताएँगे?
कथक भारत के प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों में से एक है, जिसकी उत्पत्ति कथा कहने की परंपरा से हुई है। इसमें पैरों की थाप (तत्कार), तेज़ चक्कर, सूक्ष्म भाव-भंगिमा और हाव-भाव का अनूठा संगम देखने को मिलता है। यह लखनऊ, जयपुर और बनारस — तीन प्रमुख घरानों में विकसित हुआ है।
(ख) कार्यक्रम की सूचना देने हेतु एक विज्ञापन तैयार कीजिए।
उदाहरण — "आमंत्रण! विद्यालय प्रांगण में कथक नृत्य संध्या। दिनांक व समय की घोषणा शीघ्र। प्रवेश निःशुल्क, सभी सादर आमंत्रित।"
(ग) दृष्टिबाधित दर्शक के लिए विद्यालय की ओर से क्या व्यवस्था होनी चाहिए?
नृत्य के दौरान संगीत और घुँघरुओं की ध्वनि स्पष्ट सुनाई देने की व्यवस्था, दृश्यों का संक्षिप्त मौखिक विवरण (ऑडियो-वर्णन) उपलब्ध कराना, अगली पंक्ति में बैठने की व्यवस्था, और सहायता के लिए एक स्वयंसेवक की नियुक्ति।
आज की पहेली
एक विद्यार्थी की डायरी के उल्लेख में संगीत के कुछ 'ताल' के नाम छिपे हैं — कलाकारों और दर्शकों के नाम व पसंद के रूप में:
छिपे हुए ताल के नाम — रूपक, तिलवाड़ा, दादरा, झूमरा, दीपचंदी, कहरवा (और लक्ष्मी भी एक ताल का नाम है)।
इसके बाद दी गई शब्द-पहेली (अक्षर-ग्रिड) में संगीत के और तालों के नाम ढूँढ़े जाने हैं — यह गतिविधि मूल पाठ्यपुस्तक के पन्ने पर ग्रिड में सीधे घेरा बनाकर करने के लिए है। खोजते समय इन सामान्य प्रचलित तालों के नामों पर ध्यान दीजिए, जो हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रयुक्त होते हैं:
तीनताल, झपताल, एकताल, चौताल, धमार, सूलताल, केहरवा, दादरा, रूपक, झूमरा, दीपचंदी, तिलवाड़ा — कक्षा में मूल ग्रिड पर इन्हें ढूँढ़कर घेरा बनाइए।
झरोखे से — नृत्य की छटाएँ
बिरजू महाराज ने भारत के विभिन्न राज्यों के शास्त्रीय नृत्यों का उल्लेख किया है। आइए, इनके बारे में अपनी समझ बढ़ाते हैं:
साझी समझ
पाँच-पाँच विद्यार्थियों के समूह में भारत के लोक नृत्यों की सूची बनाइए और उनकी विशिष्टताओं का पता लगाइए। नीचे कुछ प्रसिद्ध लोक नृत्यों के नाम संदर्भ के लिए दिए गए हैं — भांगड़ा व गिद्धा (पंजाब), गरबा व डांडिया (गुजरात), बिहू (असम), घूमर (राजस्थान), लावणी (महाराष्ट्र), छऊ (झारखंड-ओडिशा-पश्चिम बंगाल), भरतनाट्यम-क्षेत्र के अतिरिक्त कोलाट्टम (तमिलनाडु), और भारत के मानचित्र में इन्हें राज्यानुसार चिह्नित कीजिए।
खोजबीन के लिए
शिक्षक/अभिभावक की अनुमति से भारतीय नृत्य, संगीत और बिरजू महाराज के बारे में अतिरिक्त वीडियो देखे जा सकते हैं — भारतीय शास्त्रीय संगीत में नृत्य संगत, कथक परिचय, और पंडित बिरजू महाराज पर केंद्रित वीडियो शृंखला।
5पढ़ने के लिए — नृत्यांगना सुधा चंद्रन
दृढ़ इच्छाशक्ति की एक और मिसाल
जीवन के किसी भी क्षेत्र में शिखर तक पहुँचने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और कठिन परिश्रम की आवश्यकता होती है। कई लोग ऐसे भी हुए हैं, जिन्होंने शारीरिक अक्षमता के बावजूद संघर्ष किया और लक्ष्य प्राप्त किया। ऐसा ही एक नाम है — सुधा चंद्रन। पैर खराब होने के बावजूद वह चोटी की नृत्यांगना बनीं।
पाँच वर्ष की अल्पायु में ही उन्हें मुंबई के प्रसिद्ध नृत्य विद्यालय 'कला-सदन' में भर्ती कराया गया, जहाँ सुप्रसिद्ध नृत्य शिक्षक श्री के.एस. रामास्वामी भागवतार ने उनकी प्रतिभा पहचानकर उन्हें शिष्या के रूप में स्वीकार किया। किंतु 2 मई, 1981 को तिरुचिरापल्ली से मद्रास (चेन्नई) जाते समय बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई। दुर्घटना में सुधा का दायाँ पैर बुरी तरह जख्मी हो गया और उसमें 'गैंग्रीन' (एक प्रकार का संक्रमण) हो गया। एक महीने बाद डॉक्टरों को उनका दायाँ पैर घुटने के साढ़े सात इंच नीचे से काटना पड़ा।
सुधा ने हार नहीं मानी। लकड़ी के गुटके और बैसाखियों के सहारे चलना शुरू किया और मुंबई आकर पढ़ाई में जुट गईं। इसी बीच उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार विजेता कृत्रिम अंग विशेषज्ञ डॉ. पी.सी. सेठी के बारे में पता चला। डॉ. सेठी ने सुधा के लिए विशेष अल्युमिनियम पैर बनाया, जिससे वह पैर को आसानी से घुमा सकती थीं। शुरुआत में कठिनाइयाँ आईं — कटे पैर से खून रिसने लगा — किंतु सुधा ने कड़ा अभ्यास जारी रखा और जल्दी ही सामान्य नृत्य-मुद्राएँ प्रदर्शित करने में सफल हो गईं।
28 जनवरी, 1984 को मुंबई में सुधा ने दुबारा नृत्य का सार्वजनिक प्रदर्शन किया, जो बेहद सफल रहा। उनकी अद्भुत जीवन-यात्रा से प्रभावित होकर एक तेलुगु फिल्मकार ने उनकी कहानी पर आधारित फिल्म 'मयूरी' बनाई, जिसमें सुधा ने स्वयं अपना पात्र निभाया। फिल्म को अपार सफलता मिली और सुधा को 33वें राष्ट्रीय फिल्म समारोह में विशेष पुरस्कार भी मिला। यह फिल्म हिंदी में 'नाचे मयूरी' नाम से भी प्रदर्शित हुई। आज सुधा चंद्रन एक सफल नृत्यांगना ही नहीं, फिल्म अभिनेत्री भी हैं, और उन्हें उनके असामान्य साहस व उपलब्धियों के लिए कई पुरस्कार मिल चुके हैं।
— रामाज्ञा तिवारी
इस प्रेरक प्रसंग को बिरजू महाराज के जीवन-संघर्ष से जोड़कर देखें, तो दोनों ही कहानियाँ यह सिखाती हैं कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी दृढ़ इच्छाशक्ति, अभ्यास और परिश्रम से असंभव को संभव बनाया जा सकता है।
6पाठ का सार — माइंड मैप
7अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
बिरजू महाराज कौन थे?
बिरजू महाराज (पद्मविभूषण) भारत के सुप्रसिद्ध कथक नृत्य के महान कलाकार थे। कथक की कला उन्हें अपने परिवार से विरासत में मिली थी और भारत सहित विदेशों में भी उनकी प्रस्तुतियों के लिए उन्हें स्मरण किया जाता है।
बिरजू महाराज ने कथक किससे सीखा?
उन्होंने कथक अपने पिता अच्छन महाराज और चाचा शंभू महाराज व लच्छू महाराज से सीखा। घर में कथक का माहौल होने के कारण औपचारिक प्रशिक्षण से पहले ही वे देख-देखकर कथक सीख गए थे।
'गंडा' बाँधने की रस्म क्या है?
कथक की तालीम शुरू करते समय गुरु शिष्य को 'गंडा' (ताबीज़) बाँधते हैं और शिष्य गुरु को भेंट देता है — यह गुरु-शिष्य के बीच एक पवित्र रिश्ते का प्रतीक है।
कथक के प्रमुख घराने कौन-कौन से हैं?
कथक के तीन प्रमुख घराने हैं — लखनऊ घराना, जयपुर घराना और बनारस घराना। इसके अतिरिक्त रायगढ़ के महाराज चक्रधर की भी अपनी अलग शैली थी।
शास्त्रीय नृत्य और लोक नृत्य में क्या अंतर है?
लोक नृत्य सामूहिक होता है और नाचने वालों के अपने मनोरंजन के लिए किया जाता है, जबकि शास्त्रीय नृत्य में एक नर्तक अकेला भी पर्याप्त होता है और यह दर्शकों के लिए प्रस्तुत किया जाता है।
भारत की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ कौन-सी हैं?
कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, कथकली, मोहिनीअट्टम, ओडिसी और मणिपुरी — ये भारत की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ हैं, जिनकी अपनी विशिष्ट लय और भाव-भंगिमाएँ हैं।
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शीर्षक (Title): बिरजू महाराज से साक्षात्कार — पाठ 8, कक्षा 7 हिंदी मल्हार : सम्पूर्ण सार व प्रश्नोत्तर
मेटा विवरण (Meta description): कक्षा 7 हिंदी मल्हार पाठ 8 'बिरजू महाराज से साक्षात्कार' का सार, शब्द-संपदा, उपसर्ग-प्रत्यय व्याकरण, भारतीय नृत्य-शैलियों की जानकारी और पाठ्यपुस्तक के सभी प्रश्नों के उत्तर एक ही लेख में।
परमालिंक (Permalink): birju-maharaj-sakshatkar-class-7-hindi
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