सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु – सरल अर्थ, श्लोक-व्याख्या और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 संस्कृत दीपकम्
सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु — सरल अर्थ, श्लोक-व्याख्या और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 संस्कृत (दीपकम्)
कक्षा 8 की एनसीईआरटी संस्कृत पाठ्यपुस्तक ‘दीपकम्’ का तृतीय पाठ ‘सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु’ दादी-पोती के संवाद से आरम्भ होकर आठ नीतिश्लोकों (सुभाषितों) के माध्यम से गुण, विनम्रता, सत्य और पुरुषार्थ का सन्देश देता है। इस लेख में स्रोत-परिचय, मूल संवाद व श्लोक, हिंदी अनुवाद, पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ, शब्द-संपदा, सन्धि-समास आदि व्याकरण, पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर तथा 75 अतिरिक्त प्रश्न (MCQ सहित) — सब कुछ एक ही जगह मिलेगा।
स्रोत-परिचय : सुभाषित और उनके ग्रन्थ
सुभाषितानि — नीतिश्लोक-संग्रहः
संस्कृत नीति-साहित्य के चुने हुए श्लोक (पाठ्यपुस्तक के अनुसार)‘सुभाषित’ शब्द ‘सु’ (सुन्दर/श्रेष्ठ) और ‘भाषित’ (कहा हुआ) से बना है — अर्थात् अच्छे वचन। पाठ में दादी और पोती के संवाद द्वारा बताया गया है कि सुभाषितों को नीतिश्लोक भी कहते हैं और वे सदा लोगों के हित के लिए होते हैं।
इस पाठ में आठ सुभाषित संकलित हैं। पाठ्यपुस्तक के ‘योग्यताविस्तर’ में विष्णुपुराण, महाभारत, भर्तृहरि, हितोपदेश और चाणक्यनीति — इन पाँच प्रसिद्ध स्रोतों का परिचय दिया गया है, जिनसे संस्कृत के नीति-वचन लिए जाते हैं।
- शाब्दिक अर्थ सुष्ठु भाषितानि = सुन्दर/शोभन वचन
- पाठ में कुल श्लोक आठ (८) सुभाषित
- पाठ का रूप दादी-पोती संवाद + आठ श्लोक (पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ सहित)
- मुख्य विषय भारतभूमि का गौरव, गुण की पहचान, विनम्रता, चरित्र-परीक्षा, आठ गुण, सत्संग-कुसंग, पुरुषार्थ
- पाठ्यपुस्तक दीपकम् (कक्षा 8, एनसीईआरटी संस्कृत)
- पाठ का सन्देश सुभाषित-रस का पान कर जीवन को सफल बनाओ
योग्यताविस्तर : पाँच प्रसिद्ध स्रोत-ग्रन्थ
| ग्रन्थ | पाठ्यपुस्तक के अनुसार परिचय |
|---|---|
| विष्णुपुराणम् | अठारह प्रसिद्ध पुराणों में से एक; इसमें सात हज़ार से अधिक श्लोक हैं। भगवान् विष्णु और उनके अवतारों का वर्णन है तथा भारतवर्ष के गौरव के विषय में अत्यन्त प्रामाणिक तथ्य मिलते हैं। |
| महाभारतम् | संस्कृत साहित्य का इतिहास-ग्रन्थ, जिसे पञ्चम वेद माना गया है। इसमें एक लाख से अधिक श्लोक हैं, इसीलिए इसका दूसरा नाम शतसाहस्रीसंहिता है। इसमें अठारह पर्व हैं। |
| भर्तृहरिः | संस्कृत काव्य-साहित्य के महान् कवि और नीतिशास्त्र के विशारद; उनकी रचनाएँ नीतिशतक, शृङ्गारशतक और वैराग्यशतक भारतीय ज्ञान-परम्परा को पुष्ट करती हैं। |
| हितोपदेशः | पण्डित नारायण द्वारा संकलित कथाग्रन्थ, जिसमें अनेक कथाएँ और नीतिश्लोक हैं। यह चार भागों में विभक्त है — मित्रलाभ, सुहृद्भेद, विग्रह और सन्धि। |
| चाणक्यनीतिः | आचार्य चाणक्य के नीतिश्लोक माणिक्य (रत्न) के समान हैं। बालकों के चरित्र-निर्माण और आदर्श मानव-जीवन की प्रतिष्ठा के लिए उनके उपदेश अत्यन्त उपयोगी हैं। |
पाठ परिचय
‘सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु’ का अर्थ है — “सुभाषितों (अच्छे वचनों) का रस पीकर अपने जीवन को सफल बनाओ।” यह पाठ दीपकम् (कक्षा 8) का तृतीय पाठ है। इसका आरम्भ दादी और पोती की सुन्दर बातचीत से होता है, जिसमें पोती कहानी सुनना चाहती है, पर दादी उसे आज नीतिश्लोक सुनाने की बात कहती है।
इस बातचीत में बताया गया है कि सुभाषित पढ़ने से आदर्श मानव-जीवन बनाने की प्रेरणा मिलती है, सुख और समृद्धि के लिए उनकी आवश्यकता है, और जो व्यक्ति सुभाषित पढ़कर अपने कार्यक्षेत्र में उनके ज्ञान का प्रयोग करता है, वह बहुत लाभ पाता है। इसके बाद आठ सुभाषित दिए गए हैं।
आठ श्लोकों का विषय-सार
| श्लोक | आरम्भिक पंक्ति | विषय / सन्देश |
|---|---|---|
| १ | गायन्ति देवाः किल गीतकानि… | भारतभूमि की महिमा — देवता भी यहाँ जन्म लेना चाहते हैं |
| २ | गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः… | गुणी ही गुण को और बलवान् ही बल को पहचानता है |
| ३ | भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः… | फलदार वृक्ष और जल-भरे बादल की तरह सज्जन विनम्र होते हैं |
| ४ | यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते… | सोने की चार परीक्षाएँ और मनुष्य की चार परीक्षाएँ |
| ५ | अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति… | मनुष्य को शोभित करने वाले आठ गुण |
| ६ | न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः… | सभा, वृद्ध, धर्म और सत्य का परस्पर सम्बन्ध |
| ७ | दुर्जनेन समं सख्यं… | दुर्जन से मित्रता न करना |
| ८ | यथा ह्येकेन चक्रेण… | पुरुषार्थ (प्रयत्न) के बिना भाग्य सिद्ध नहीं होता |
मूल पाठ
(क) प्रस्तावना-संवाद — पितामही और पौत्री
पौत्री — पितामहि! एकां नूतनां कथां कथयतु।
पितामही — वत्से! त्वं प्रतिदिनं कथां शृणोषि, अद्य नीतिश्लोकान् शृणु।
पौत्री — नीतिश्लोकाः...? किं नाम सुभाषितानि?
पितामही — आम्। नीतिश्लोकाः नाम सुभाषितानि। सुष्ठु भाषितानि इति सुभाषितानि अर्थात् शोभनानि वचनानि। तानि सर्वदा जनानां हिताय भवन्ति।
पौत्री — सुभाषितपठनेन कः लाभः?
पितामही — सुभाषितपठनेन आदर्श-मानवजीवन-निर्माणाय प्रेरणा प्राप्यते। मानवजीवनस्य सुखाय समृद्धये च सुभाषितानां पठनस्य आवश्यकता अस्ति। यः सुभाषितानि पठित्वा कार्यक्षेत्रे तस्य ज्ञानस्य प्रयोगं करोति सः बहून् लाभान् प्राप्नोति।
पौत्री — अहो सुन्दरम्। यदि एवं तर्हि अहं नूनं सुभाषितानि पठिष्यामि।
पितामही — सुभाषितानि स्वकर्तव्यस्य अकर्तव्यस्य च विषये स्पष्टतया मार्गदर्शनं कुर्वन्ति। अतः सर्वे अवश्यं सुभाषितानि पठन्तु। तानि पठित्वा सर्वे जीवनस्य रहस्यम् अवगच्छन्तु, जीवनं सुखमयं च कुर्वन्तु।
(ख) आठ सुभाषित
श्लोक १ — भारतभूमि का गौरव
श्लोक २ — गुणी ही गुण जानता है
श्लोक ३ — सज्जनों की विनम्रता
श्लोक ४ — चार कसौटियाँ
श्लोक ५ — आठ गुण
श्लोक ६ — सभा, वृद्ध, धर्म और सत्य
श्लोक ७ — दुर्जन से दूरी
श्लोक ८ — पुरुषार्थ का महत्त्व
सरल व्याख्या (हिंदी अनुवाद व भावार्थ)
प्रस्तावना-संवाद का हिंदी अनुवाद
पोती — दादी जी! मुझे एक नई कहानी सुनाइए।
दादी — बेटी! तुम प्रतिदिन कहानी सुनती हो, आज नीतिश्लोक सुनो।
पोती — नीतिश्लोक...? सुभाषित क्या होते हैं?
दादी — हाँ, नीतिश्लोक ही सुभाषित कहलाते हैं। ‘सुष्ठु भाषितानि’ अर्थात् सुन्दर ढंग से कहे गए, यानी शोभन (अच्छे) वचन — वही सुभाषित हैं। वे सदा लोगों के हित के लिए होते हैं।
पोती — सुभाषित पढ़ने से क्या लाभ होता है?
दादी — सुभाषित पढ़ने से आदर्श मानव-जीवन बनाने की प्रेरणा मिलती है। मनुष्य के सुख और समृद्धि के लिए सुभाषितों को पढ़ना आवश्यक है। जो व्यक्ति सुभाषित पढ़कर अपने कार्य-क्षेत्र में उनके ज्ञान का प्रयोग करता है, वह बहुत लाभ पाता है।
पोती — वाह, कितना सुन्दर! यदि ऐसा है तो मैं अवश्य सुभाषित पढ़ूँगी।
दादी — सुभाषित अपने कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में स्पष्ट मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए सभी लोग अवश्य सुभाषित पढ़ें, उन्हें पढ़कर जीवन का रहस्य समझें और जीवन को सुखमय बनाएँ।
श्लोकों का पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ
श्लोक १ — भारतभूमि का गौरव
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥ १ ॥
पदच्छेद — गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्याः तु ते भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पद-मार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।
अन्वय — भारतभूमिभागे (ये) भवन्ति ते धन्याः इति देवाः गीतकानि गायन्ति किल। स्वर्गापवर्गास्पद-मार्गभूते (भारतभूमिभागे) तु (देवाः) सुरत्वात् भूयः पुरुषाः (भवन्ति)।
भावार्थ — देवता भी निश्चय ही यह गीत गाते हैं कि जो लोग इस भारतभूमि में जन्म लेते हैं, वे धन्य हैं। यह भूमि स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग है, इसलिए देवता भी देवत्व छोड़कर यहाँ बार-बार मनुष्य-रूप में जन्म लेना चाहते हैं। अतः हम सब भारतवासी बड़े भाग्यशाली हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग इसी भूखण्ड में है।
श्लोक २ — गुणी ही गुण जानता है
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः करी च सिंहस्य बलं न मूषकः॥ २ ॥
पदच्छेद — गुणी गुणम् वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः बली बलम् वेत्ति न वेत्ति निर्बलः पिकः वसन्तस्य गुणम् न वायसः करी च सिंहस्य बलम् न मूषकः।
अन्वय — गुणी गुणं वेत्ति। निर्गुणः (गुणं) न वेत्ति। बली बलं वेत्ति, निर्बलः (बलं) न वेत्ति। पिकः वसन्तस्य गुणं (वेत्ति), वायसः (वसन्तस्य गुणं) न (वेत्ति)। करी च सिंहस्य बलं (वेत्ति)। मूषकः (सिंहस्य बलं) न वेत्ति।
भावार्थ — गुणवान् व्यक्ति ही दूसरों के अच्छे गुणों को पहचान पाता है, गुणहीन नहीं। बलवान् ही दूसरे के बल को समझ सकता है, निर्बल नहीं। वसन्त के आने पर कोयल उसके गुण को पहचानकर मीठी कूक करती है, पर कौआ मधुर गा ही नहीं सकता। हाथी सिंह के बल को जानता है, किन्तु चूहा नहीं जान पाता। इसलिए योग्य व्यक्ति ही किसी के महत्त्व को समझ सकता है, अयोग्य नहीं।
श्लोक ३ — सज्जनों की विनम्रता
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥ ३ ॥
पदच्छेद — भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः नवाम्बुभिः दूरविलम्बिनः घनाः अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभावः एव एषः परोपकारिणाम्।
अन्वय — तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति। घनाः नवाम्बुभिः दूरविलम्बिनः (भवन्ति)। सत्पुरुषाः समृद्धिभिः अनुद्धताः (भवन्ति)। परोपकारिणाम् एष एव स्वभावः (भवति)।
भावार्थ — समय आने पर वृक्षों में फल लगते हैं और फलों के भार से वे झुक जाते हैं। नए जल से भरे बादल भी नीचे की ओर झुककर धरती के पास आते हैं और वर्षा करते हैं। इसी प्रकार संसार के परोपकारी सज्जन अपनी समृद्धि (धन-वैभव) के समय भी घमण्ड नहीं करते; वे दयालु और विनम्र रहकर सदा दूसरों की भलाई में लगे रहते हैं। व्यासजी ने कहा है — “परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्” (परोपकार पुण्य के लिए और दूसरों को पीड़ा देना पाप के लिए होता है)।
श्लोक ४ — चार कसौटियाँ
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥ ४ ॥
पदच्छेद — यथा चतुर्भिः कनकम् परीक्ष्यते निघर्षण-छेदन-ताप-ताडनैः तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा।
अन्वय — यथा निघर्षण-छेदन-ताप-ताडनैः चतुर्भिः (उपायैः) कनकं परीक्ष्यते। तथा कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा (च) चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते।
भावार्थ — सुनार सोने की शुद्धता जाँचने के लिए पहले उसे कसौटी पर घिसता है, फिर काटता है, फिर आग में तपाता है और अन्त में उस पर चोट करता है। इन चार प्रकारों से सोने की शुद्धता जानी जाती है। ठीक उसी प्रकार मनुष्य की भी चार उपायों से परीक्षा होनी चाहिए — वह किस कुल में जन्मा है, उसका स्वभाव (शील) कैसा है, वह किन गुणों से युक्त है और किस कर्म से सर्वत्र सम्मान पाता है। इन कसौटियों पर परखकर ही उसके व्यक्तित्व को जाना जा सकता है।
श्लोक ५ — आठ गुण
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥ ५ ॥
पदच्छेद — अष्टौ गुणाः पुरुषम् दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यम् च दमः श्रुतम् च पराक्रमः च अबहुभाषिता च दानम् यथाशक्ति कृतज्ञता च।
अन्वय — प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, श्रुतं, पराक्रमः, अबहुभाषिता च, यथाशक्ति दानं, कृतज्ञता च (इत्येते) अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति।
भावार्थ — ये आठ गुण मनुष्य को प्रकाशित (सुशोभित) करते हैं — (१) प्रज्ञा (विशेष बुद्धि), (२) कौल्य (कुलीनता), (३) दम (इन्द्रियों पर संयम), (४) श्रुत (शास्त्रों का ज्ञान), (५) पराक्रम (साहस), (६) अबहुभाषिता (कम और सार्थक बोलना), (७) यथाशक्ति दान और (८) कृतज्ञता। जो मनुष्य इन आठ गुणों से युक्त होता है, वह समाज में सदा सम्मान पाता है। इसीलिए कहा गया है — “गुणवान् पूज्यते नरः।”
श्लोक ६ — सभा, वृद्ध, धर्म और सत्य
धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति॥ ६ ॥
पदच्छेद — न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः वृद्धाः न ते ये न वदन्ति धर्मम् धर्मः सः नो यत्र न सत्यम् अस्ति सत्यम् न तद् यद् छलम् अभ्युपैति।
अन्वय — सा सभा न (अस्ति), यत्र वृद्धाः न सन्ति। ते वृद्धाः न (सन्ति), ये धर्मं न वदन्ति। सः धर्मः न (अस्ति), यत्र सत्यं न अस्ति। तत् सत्यं न (अस्ति), यत् छलम् अभ्युपैति।
भावार्थ — वह सभा सभा नहीं है जिसमें वृद्ध (अनुभवी और ज्ञानी) लोग न हों; वे वृद्ध वृद्ध नहीं हैं जो धर्म की बात न कहें; वह धर्म धर्म नहीं है जिसमें सत्य न हो; और वह सत्य सत्य नहीं है जो छल से युक्त हो। संसार में अनेक सभाएँ होती हैं, पर वही सभा सफल है जिसमें वयोवृद्ध और ज्ञानवृद्ध लोग हों, वे धर्म पर बोलें और धर्म-चर्चा में केवल छल-रहित सत्य ही कहा जाए।
श्लोक ७ — दुर्जन से दूरी
उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम्॥ ७ ॥
पदच्छेद — दुर्जनेन समम् सख्यम् प्रीतिम् च अपि न कारयेत् उष्णः दहति च अङ्गारः शीतः कृष्णायते करम्।
अन्वय — दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं च अपि न कारयेत्। उष्णः अङ्गारः दहति शीतः च करं कृष्णायते।
भावार्थ — दुर्जन (दुष्ट व्यक्ति) के साथ न मित्रता करनी चाहिए, न प्रेम बढ़ाना चाहिए; क्योंकि उसका मुख मीठा होता है पर हृदय में कपट रहता है। जैसे गरम अंगारा हाथ को जला देता है और ठण्डा अंगारा हाथ को काला कर देता है, वैसे ही दुर्जन सदा अनिष्ट करता है। इसलिए विद्या से सुशोभित होने पर भी दुर्जन का त्याग करना चाहिए।
श्लोक ८ — पुरुषार्थ का महत्त्व
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति॥ ८ ॥
पदच्छेद — यथा हि एकेन चक्रेण न रथस्य गतिः भवेत् एवम् पुरुषकारेण विना दैवम् न सिध्यति।
अन्वय — यथा हि एकेन चक्रेण रथस्य गतिः न भवेत्, एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति।
भावार्थ — रथ की गति दो पहियों से ही ठीक प्रकार होती है; एक पहिये से रथ नहीं चल सकता। इसी प्रकार बिना पुरुषार्थ (परिश्रम) के केवल भाग्य से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। भाग्य होने पर भी उद्योग करने से ही फल मिलता है। मनुष्य के जीवन-रथ के दो पहिये हैं — प्रयत्न और भाग्य। कहा भी गया है — “उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।”
शब्द-संपदा (शब्दार्थ)
| शब्दः | संस्कृत अर्थः | हिन्दी अर्थ | English |
|---|---|---|---|
| शृङ्खलितम् | अनुशासितम् | अनुशासित | Disciplined |
| गायन्ति | गानं कुर्वन्ति | गाते हैं | Sing |
| किल | निश्चयेन | निश्चय से | With determination |
| धन्याः | प्रशंसिताः | प्रशंसनीय | Praiseworthy |
| अपवर्गः | निर्वाणम् | मोक्ष | Liberation |
| भूयः | पुनः पुनः | बार-बार | Over and over again |
| सुरत्वात् | देवत्वात् | देवत्व से | From divinity |
| वेत्ति | जानाति | जानता है | Knows |
| निर्गुणः | गुणहीनः | गुणरहित | Without virtue |
| बली | बलवान् | बलशाली | Powerful |
| निर्बलः | बलरहितः | बलहीन | Weak |
| पिकः | कोकिलः | कोयल | Cuckoo |
| वायसः | काकः | कौआ | Crow |
| करी | गजः | हाथी | Elephant |
| नम्राः | अवनताः | झुके हुए | Bent |
| तरवः | पादपाः | वृक्ष | Trees |
| फलोद्गमैः | फलभारैः | फलों के भार से | With weight of fruits |
| अम्बुभिः | जलैः | जल से भरे हुए | Filled with water |
| दूरविलम्बिनः | दूरात् अधः अवनताः | दूर से नीचे झुके हुए | Come down from above |
| घनाः | मेघाः | बादल | Clouds |
| अनुद्धताः | गर्वशून्याः | अभिमान से रहित | Polite |
| सत्पुरुषाः | सज्जनाः | अच्छे लोग | Good people |
| समृद्धिभिः | प्रचुरैः धनैः | बहुत धन से | With abundance of wealth |
| कनकम् | सुवर्णम् | सोना | Gold |
| परीक्ष्यते | परीक्षितं भवति | उसकी परीक्षा की जाती है | Is tested |
| निघर्षणम् | घर्षणम् | घिसना | Rubbing |
| छेदनम् | कर्तनम् | काटना | Cutting |
| ताडनैः | प्रहारैः | प्रहार के द्वारा | By hitting |
| कुलेन | वंशेन | कुल से | By the family |
| शीलेन | स्वभावेन | स्वभाव से | By nature |
| कर्मणा | कार्येण | कार्य से | By work |
| दीपयन्ति | प्रकाशयन्ति | प्रकाशित करते हैं | Illuminate |
| प्रज्ञा | विशेषज्ञानम् | विशिष्ट बुद्धि | Extra-ordinary intelligence |
| कौल्यम् | कुलीनता | अच्छे कुल में जन्म | Birth in a good family |
| दमः | इन्द्रियसंयमः | इन्द्रियों का संयम | Control over senses |
| श्रुतम् | शास्त्रज्ञानम् | शास्त्रों का ज्ञान | Knowledge of scriptures |
| पराक्रमः | साहसः | वीरता | Bravery |
| अबहुभाषिता | मितभाषिता | कम और सार्थक बोलना | Speaking less but meaningfully |
| छलम् | कपटता | छलना | Cheating |
| अभ्युपैति | प्राप्नोति | प्राप्त करता है | Associates |
| दुर्जनेन | दुष्टजनेन | दुष्ट व्यक्ति से | With wicked people |
| समम् | सह | साथ | With |
| सख्यम् | मैत्री | मित्रता | Friendship |
| दहति | ज्वलयति | जलाता है | Burns |
| अङ्गारः | दग्धकाष्ठः | अङ्गारा | Charcoal |
| कृष्णायते | मलिनं करोति | काला करता है | Blackens |
| दैवम् | भाग्यम् | भाग्य | Luck |
| सिध्यति | सिद्धं भवति | फलता है | Fruitifies |
भाषा-विशेष : सन्धि, समास, धातु-रूप और विलोम शब्द
1. पाठ्यपुस्तक में दिए गए उदाहरण
| पद | विग्रह / विच्छेद | भेद |
|---|---|---|
| नम्रास्तरवः | नम्राः + तरवः | विसर्ग-सन्धि |
| अभ्युपैति | अभि + उप + एति | सन्धि (यण् व वृद्धि) |
| अनुद्धताः | न उद्धताः | नञ् तत्पुरुष समास |
| यथाशक्ति | शक्तिम् अनतिक्रम्य | अव्ययीभाव समास |
2. पाठ से अन्य सन्धि-विच्छेद
| पद | सन्धि-विच्छेद | सन्धि का नाम |
|---|---|---|
| धन्यास्तु | धन्याः + तु | विसर्ग-सन्धि (विसर्ग को स्) |
| पिको वसन्तस्य | पिकः + वसन्तस्य | विसर्ग-सन्धि (अः को ओ) |
| नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनः | नवाम्बुभिः + दूरविलम्बिनः | विसर्ग-सन्धि (विसर्ग को र्) |
| स्वभाव एवैष | स्वभावः + एव + एष | विसर्ग-लोप तथा वृद्धि सन्धि |
| चाङ्गारः | च + अङ्गारः | दीर्घ सन्धि |
| प्रीतिं चापि | प्रीतिं + च + अपि | दीर्घ सन्धि (च + अ = चा) |
| ह्येकेन | हि + एकेन | यण् सन्धि |
| गतिर्भवेत् | गतिः + भवेत् | विसर्ग-सन्धि (विसर्ग को र्) |
| पराक्रमश्चाबहुभाषिता | पराक्रमः + च + अबहुभाषिता | विसर्ग-सन्धि तथा दीर्घ सन्धि |
3. समास-विग्रह
| समस्त पद | विग्रह | समास |
|---|---|---|
| सत्पुरुषाः | सन्तः पुरुषाः | कर्मधारय |
| परोपकारिणाम् | परेषाम् उपकारिणाम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| भारतभूमिभागे | भारतभूमेः भागे | षष्ठी तत्पुरुष |
| निघर्षणच्छेदनतापताडनैः | निघर्षणं च छेदनं च तापश्च ताडनं च | द्वन्द्व |
| अनुद्धताः | न उद्धताः | नञ् तत्पुरुष |
| यथाशक्ति | शक्तिम् अनतिक्रम्य | अव्ययीभाव |
4. पाठ में आए प्रमुख क्रियापद
| क्रियापद | धातु / लकार | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| वेत्ति | विद् (जानना), लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन | जानता है |
| गायन्ति | गै (गाना), लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन | गाते हैं |
| भवन्ति | भू (होना), लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन | होते हैं |
| परीक्ष्यते | परि + ईक्ष्, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन | परीक्षा की जाती है |
| दीपयन्ति | दीप् (प्रेरणार्थक), लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन | प्रकाशित करते हैं |
| कारयेत् | कृ (प्रेरणार्थक), विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन | कराए / करना चाहिए |
| सिध्यति | सिध्, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन | सिद्ध होता है |
5. विलोम (विपरीतार्थक) शब्द
| शब्द | विलोम | शब्द | विलोम |
|---|---|---|---|
| गुणी | निर्गुणः | बली | निर्बलः |
| उष्णः | शीतः | सज्जनः / सत्पुरुषः | दुर्जनः |
| धर्मः | अधर्मः | सत्यम् | असत्यम् / छलम् |
| नम्रः | उद्धतः | समृद्धिः | दरिद्रता |
पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
- (क) गीतानि के गायन्ति?
देवाः। - (ख) कः बलं न वेत्ति?
निर्बलः। - (ग) कः वसन्तस्य गुणं वेत्ति?
पिकः (कोकिलः)। - (घ) मूषकः कस्य बलं न वेत्ति?
सिंहस्य। - (ङ) फलोद्गमैः के नम्राः भवन्ति?
तरवः (वृक्षाः)। - (च) केन समं सख्यं न करणीयम्?
दुर्जनेन। - (छ) केन विना दैवं न सिध्यति?
पुरुषकारेण (उद्योगेन)।
- (क) तरवः कदा नम्राः भवन्ति?
तरवः फलोद्गमैः (फलानां भारेण) नम्राः भवन्ति। - (ख) समृद्धिभिः के अनुद्धताः भवन्ति?
समृद्धिभिः सत्पुरुषाः अनुद्धताः भवन्ति। - (ग) सत्पुरुषाणां स्वभावः कीदृशः भवति?
सत्पुरुषाणां स्वभावः परोपकारिणः, विनम्रः अनुद्धतः च भवति। ते समृद्धिकालेऽपि औद्धत्यं न प्रकटयन्ति। - (घ) सत्यम् कदा सत्यम् न भवति?
यत् सत्यं छलम् अभ्युपैति (छलयुक्तं भवति), तत् सत्यं सत्यं न भवति। - (ङ) दैवं कदा न सिध्यति?
पुरुषकारेण (उद्योगेन) विना दैवं न सिध्यति।
(अ) उक्तिः को (आ) भावार्थः से मिलाइए —
- गायन्ति देवाः किल गीतकानि
→ भारतभूमेः माहात्म्यवर्णनम् - गुणी गुणं वेत्ति
→ सज्जनः एव गुणानां मर्मज्ञः - भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः
→ सत्पुरुषाणां स्वाभाविकी नम्रता - यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते
→ सुवर्णं चतुर्भिः प्रकारैः परीक्ष्यते - अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति
→ प्रज्ञा, दमः, दानं, कृतज्ञता इत्यादयः - दुर्जनेन समं सख्यं न कारयेत्
→ दुष्टसङ्गः उष्णाङ्गारसदृशः - एकेन चक्रेण न रथस्य गतिः
→ केवलं दैवं प्रयत्नं विना असिद्धम्
मञ्जूषा : फलोद्गमैः, गुणं, कृतज्ञता, सिध्यति, श्रुतम्, शीलेन
- (क) गुणी ______ वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः।
गुणं - (ख) भवन्ति नम्राः तरवः ______।
फलोद्गमैः - (ग) पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन, ______, गुणेन, कर्मणा।
शीलेन - (घ) गुणाः पुरुषं दीपयन्ति — प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, ______।
श्रुतम् - (ङ) दानं यथाशक्ति ______ च।
कृतज्ञता - (च) एवं पुरुषकारेण विना दैवं न ______।
सिध्यति
- (क) “गायन्ति देवाः किल गीतकानि” — इत्यस्य श्लोकस्य मुख्यविषयः कः? (i) वसन्तस्य सौन्दर्यम् (ii) भारतभूमेः गौरवम् (iii) कर्मणां फलम् (iv) दानस्य प्रभावः
(ii) भारतभूमेः गौरवम् - (ख) “गुणी गुणं वेत्ति” — इत्यत्र कः गुणं न जानाति? (i) गुणी (ii) निर्गुणः (iii) पिकः (iv) बली
(ii) निर्गुणः - (ग) “पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः” — इत्यस्य तात्पर्यं किम्? (i) पिकः मधुरं गायति न वायसः (ii) सुजन एव गुणं जानाति (iii) वायसः अपि सरसं गानं करोति (iv) वसन्तः निर्गुणः अस्ति
(i) पिकः मधुरं गायति न वायसः - (घ) “भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः” — इत्यस्य अर्थः कः? (i) वृक्षाणां कठोरता (ii) सत्पुरुषाणाम् उन्नतिः (iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति (iv) परोपकारिणां दुर्बलता
(iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति - (ङ) “न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः” — इत्यत्र सभायाः महत्त्वं किम्? (i) सभा मनोरञ्जनाय भवति (ii) सभा धनसम्पत्तिं प्रदातुं शक्नोति (iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः (iv) सभा केवलं राजकार्यार्थं भवति
(iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः - (च) दुर्जनेन सह सख्यं किमर्थं न कार्यम्? (i) सः मित्रं भवति (ii) सः धनं ददाति (iii) सः शिक्षां ददाति (iv) सः उष्णाङ्गारवद् हानिकरः भवति
(iv) सः उष्णाङ्गारवद् हानिकरः भवति
योग्यताविस्तर और परियोजना-कार्य
सुझाव: इस कार्य के लिए विद्यार्थी नीचे के जैसे सुभाषित चुन सकते हैं तथा हर सुभाषित का हिंदी अर्थ भी लिखें —
- उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
प्रयत्न से ही कार्य सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं। - गुणवान् पूज्यते नरः।
गुणी मनुष्य ही पूजा (सम्मान) पाता है। - परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।
परोपकार पुण्य देता है और दूसरों को कष्ट देना पाप। - सत्यमेव जयते।
सत्य की ही विजय होती है। - विद्या ददाति विनयम्।
विद्या विनम्रता देती है।
आदर्श उत्तर (नीतिवाक्य : “उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः”) —
- १. उद्यमः जीवनस्य आधारः अस्ति।
परिश्रम जीवन का आधार है। - २. उद्यमेन एव कार्याणि सिध्यन्ति, न मनोरथैः।
परिश्रम से ही कार्य सिद्ध होते हैं, इच्छा मात्र से नहीं। - ३. आलस्यं मानवस्य शत्रुः अस्ति।
आलस्य मनुष्य का शत्रु है। - ४. परिश्रमी जनः सर्वत्र सम्मानं प्राप्नोति।
परिश्रमी व्यक्ति सर्वत्र सम्मान पाता है। - ५. अतः वयं सर्वे प्रतिदिनं परिश्रमं कुर्मः।
इसलिए हम सब प्रतिदिन परिश्रम करें।
कण्ठस्थ करने की सरल विधि:
- प्रत्येक श्लोक को पहले पदच्छेद सहित पढ़ें।
अर्थ समझ लेने पर श्लोक जल्दी याद होता है। - हर दिन एक श्लोक याद करें।
आठ श्लोक आठ दिनों में सरलता से कण्ठस्थ हो जाएँगे। - श्लोक को लय (सुर) में बोलें।
छन्दोबद्ध श्लोक लय से शीघ्र याद रहते हैं।
अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न
(अ) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
- ‘सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु’ दीपकम् का कौन-सा पाठ है?
- (क) प्रथम पाठ
- (ख) द्वितीय पाठ
- (ग) तृतीय पाठ ✓
- (घ) चतुर्थ पाठ
- ‘सुभाषित’ का अर्थ क्या है?
- (क) कठोर वचन
- (ख) सुन्दर (अच्छे) वचन ✓
- (ग) लम्बी कथा
- (घ) राजा की आज्ञा
- पाठ का आरम्भ किनके संवाद से होता है?
- (क) गुरु–शिष्य
- (ख) राजा–मन्त्री
- (ग) पितामही–पौत्री ✓
- (घ) माता–पुत्र
- पितामही आज पौत्री को क्या सुनाना चाहती है?
- (क) नई कथा
- (ख) नीतिश्लोक ✓
- (ग) गीत
- (घ) पहेली
- पाठ में कुल कितने सुभाषित (श्लोक) दिए गए हैं?
- (क) छह
- (ख) सात
- (ग) आठ ✓
- (घ) दस
- ‘गायन्ति देवाः किल गीतकानि’ श्लोक का मुख्य विषय है —
- (क) वसन्त की शोभा
- (ख) भारतभूमि का गौरव ✓
- (ग) कर्म का फल
- (घ) दान का प्रभाव
- ‘गुणी गुणं वेत्ति’ में ‘वेत्ति’ का अर्थ है —
- (क) खाता है
- (ख) जाता है
- (ग) जानता है ✓
- (घ) देता है
- वसन्त के गुण को कौन जानता है?
- (क) वायस
- (ख) पिक ✓
- (ग) मूषक
- (घ) करी
- सिंह के बल को कौन जानता है?
- (क) मूषक
- (ख) पिक
- (ग) करी (हाथी) ✓
- (घ) वायस
- ‘वायसः’ का हिन्दी अर्थ है —
- (क) कोयल
- (ख) कौआ ✓
- (ग) हाथी
- (घ) चूहा
- ‘तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति’ का आशय है —
- (क) वृक्ष सूख जाते हैं
- (ख) फल लगने पर वृक्ष झुक जाते हैं ✓
- (ग) वृक्ष ऊँचे हो जाते हैं
- (घ) वृक्ष गिर जाते हैं
- ‘घनाः’ शब्द का अर्थ है —
- (क) बादल ✓
- (ख) वृक्ष
- (ग) फल
- (घ) जल
- ‘अनुद्धताः’ का अर्थ है —
- (क) घमण्डी
- (ख) अभिमान से रहित ✓
- (ग) क्रोधी
- (घ) दुर्बल
- सोने की परीक्षा में कौन-सी क्रिया सम्मिलित नहीं है?
- (क) निघर्षण (घिसना)
- (ख) छेदन (काटना)
- (ग) ताप (तपाना)
- (घ) सिंचन (सींचना) ✓
- मनुष्य की परीक्षा किन चार बातों से होती है?
- (क) कुल, शील, गुण, कर्म ✓
- (ख) धन, बल, रूप, आयु
- (ग) नाम, ग्राम, जाति, वेश
- (घ) वाणी, वस्त्र, भोजन, निवास
- ‘कनकम्’ का अर्थ है —
- (क) चाँदी
- (ख) ताँबा
- (ग) सोना ✓
- (घ) लोहा
- पुरुष को शोभित करने वाले गुण कितने बताए गए हैं?
- (क) चार
- (ख) छह
- (ग) आठ ✓
- (घ) दस
- ‘दमः’ का अर्थ है —
- (क) दान
- (ख) इन्द्रिय-संयम ✓
- (ग) क्रोध
- (घ) भय
- ‘श्रुतम्’ से तात्पर्य है —
- (क) शास्त्र-ज्ञान ✓
- (ख) धन
- (ग) साहस
- (घ) मैत्री
- ‘अबहुभाषिता’ का अर्थ है —
- (क) बहुत बोलना
- (ख) मौन रहना
- (ग) कम और सार्थक बोलना ✓
- (घ) झूठ बोलना
- ‘न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः’ के अनुसार सभा में क्या आवश्यक है?
- (क) धन
- (ख) वृद्ध (ज्ञानी) जन ✓
- (ग) संगीत
- (घ) राजा
- ‘सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति’ का अर्थ है —
- (क) सत्य वही है जो छल से युक्त हो
- (ख) वह सत्य नहीं जो छल से जुड़ा हो ✓
- (ग) सत्य सदा छल है
- (घ) छल ही सत्य है
- दुर्जन की मित्रता की तुलना किससे की गई है?
- (क) जल से
- (ख) अंगारे से ✓
- (ग) फूल से
- (घ) चन्द्रमा से
- ‘कृष्णायते’ का अर्थ है —
- (क) सफेद करता है
- (ख) काला करता है ✓
- (ग) साफ़ करता है
- (घ) गरम करता है
- रथ, पुरुषकार और दैव के उदाहरण से क्या सिद्ध होता है?
- (क) रथ एक पहिये से चलता है
- (ख) पुरुषकार के बिना दैव सिद्ध नहीं होता ✓
- (ग) केवल दैव ही सब कुछ है
- (घ) पुरुषकार व्यर्थ है
(ब) अति लघु उत्तरीय प्रश्न
- 1. ‘सुभाषित’ शब्द का अर्थ लिखिए।
सुन्दर ढंग से कहे गए अच्छे वचन (सुष्ठु भाषितानि)। - 2. सुभाषितों को और किस नाम से जाना जाता है?
नीतिश्लोक। - 3. पाठ में कुल कितने श्लोक हैं?
आठ (८) श्लोक। - 4. पाठ के आरम्भ में संवाद किनके बीच होता है?
पितामही (दादी) और पौत्री (पोती) के बीच। - 5. देवता किस भूमि में जन्म लेने वालों को धन्य कहते हैं?
भारतभूमि में जन्म लेने वालों को। - 6. ‘अपवर्ग’ का क्या अर्थ है?
मोक्ष (निर्वाण)। - 7. ‘पिकः’ और ‘वायसः’ के हिन्दी अर्थ लिखिए।
पिक = कोयल; वायस = कौआ। - 8. ‘करी’ किसे कहते हैं?
हाथी (गज) को। - 9. मूषक किसके बल को नहीं जानता?
सिंह के बल को। - 10. फलों से लदे वृक्ष कैसे हो जाते हैं?
नम्र (झुके हुए)। - 11. नए जल से भरे बादल कैसे होते हैं?
नीचे की ओर झुके हुए (दूरविलम्बिनः)। - 12. सोने की परीक्षा के चार उपाय कौन-से हैं?
निघर्षण, छेदन, ताप और ताडन। - 13. मनुष्य की परीक्षा के चार आधार बताइए।
कुल, शील, गुण और कर्म। - 14. पुरुष को दीप्त (शोभित) करने वाले कितने गुण हैं?
आठ गुण। - 15. ‘कौल्यम्’ का अर्थ क्या है?
कुलीनता (अच्छे कुल में जन्म)। - 16. ‘दमः’ का अर्थ क्या है?
इन्द्रियों का संयम। - 17. दुर्जन के साथ क्या नहीं करना चाहिए?
मित्रता और प्रीति (प्रेम)। - 18. ठण्डा अंगारा क्या करता है?
हाथ को काला (मलिन) कर देता है। - 19. रथ की गति के लिए कितने चक्र आवश्यक हैं?
दो; एक चक्र से रथ की गति नहीं होती। - 20. ‘दैवम्’ का क्या अर्थ है?
भाग्य।
(स) लघु उत्तरीय प्रश्न
- 1. सुभाषित किसे कहते हैं?
‘सुष्ठु भाषितानि’ अर्थात् सुन्दर और शोभन (अच्छे) वचनों को सुभाषित कहते हैं। इन्हें नीतिश्लोक भी कहा जाता है और ये सदा लोगों के हित के लिए होते हैं। - 2. सुभाषित पढ़ने के क्या लाभ बताए गए हैं?
सुभाषित पढ़ने से आदर्श मानव-जीवन बनाने की प्रेरणा मिलती है। वे मनुष्य के सुख और समृद्धि में सहायक हैं और कर्तव्य-अकर्तव्य का स्पष्ट मार्गदर्शन करते हैं। - 3. पहले श्लोक में भारतभूमि की महिमा कैसे बताई गई है?
देवता भी गीत गाते हैं कि भारतभूमि में जन्म लेने वाले धन्य हैं, क्योंकि यह भूमि स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग है। इसलिए देवता भी यहाँ मनुष्य-रूप में जन्म लेना चाहते हैं। - 4. ‘गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
गुणवान् व्यक्ति ही दूसरे के गुणों को पहचान सकता है। गुणहीन व्यक्ति में गुणों को परखने की योग्यता ही नहीं होती। - 5. दूसरे श्लोक में कौन-कौन-से उदाहरण दिए गए हैं?
कोयल और कौए का उदाहरण (वसन्त के गुण के सन्दर्भ में) तथा हाथी और चूहे का उदाहरण (सिंह के बल के सन्दर्भ में) दिया गया है। - 6. सज्जनों की तुलना फलदार वृक्ष और बादल से क्यों की गई है?
फल लगने पर वृक्ष झुक जाते हैं और जल से भरे बादल नीचे आकर बरसते हैं। इसी प्रकार सज्जन समृद्धि पाकर अभिमान नहीं करते, बल्कि और अधिक विनम्र होकर परोपकार करते हैं। - 7. परोपकारी लोगों का स्वभाव कैसा होता है?
परोपकारी लोग दयालु और विनम्र होते हैं। वे अपनी समृद्धि के समय भी घमण्ड नहीं करते और सदा दूसरों की भलाई के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। - 8. सोने की परीक्षा किस प्रकार की जाती है?
सुनार सोने को पहले कसौटी पर घिसता है, फिर काटता है, फिर आग में तपाता है और अन्त में उस पर चोट करता है। इन चार उपायों से सोने की शुद्धता जानी जाती है। - 9. मनुष्य की परीक्षा किन चार आधारों पर होती है?
मनुष्य की परीक्षा (१) कुल — वह किस परिवार में जन्मा, (२) शील — उसका स्वभाव कैसा है, (३) गुण — वह किन गुणों से युक्त है, और (४) कर्म — वह किस कार्य से सम्मान पाता है, इन चार आधारों पर होती है। - 10. पाँचवें श्लोक में बताए गए आठ गुण कौन-से हैं?
प्रज्ञा, कौल्य (कुलीनता), दम (इन्द्रिय-संयम), श्रुत (शास्त्र-ज्ञान), पराक्रम, अबहुभाषिता (कम बोलना), यथाशक्ति दान और कृतज्ञता। - 11. ‘गुणवान् पूज्यते नरः’ का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है कि गुणों से युक्त मनुष्य ही समाज में पूजा (सम्मान) पाता है। केवल धन या पद से नहीं, गुणों से मनुष्य की प्रतिष्ठा बनती है। - 12. ‘न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः’ में सभा के विषय में क्या कहा गया है?
वही सभा वास्तव में सभा है जिसमें वयोवृद्ध और ज्ञानवृद्ध जन हों। यदि सभा में वृद्ध या ज्ञानी लोग न हों, तो उसे सभा नहीं कहा जा सकता। - 13. छठे श्लोक के अनुसार सत्य कब सत्य नहीं रहता?
जब सत्य में छल (कपट) मिल जाता है, तब वह सत्य नहीं रहता। इसलिए धर्म-चर्चा में केवल तथ्ययुक्त, छल-रहित सत्य ही कहा जाना चाहिए। - 14. दुर्जन के साथ मित्रता क्यों नहीं करनी चाहिए?
दुर्जन के मुख में मिठास और हृदय में कपट रहता है, इसलिए उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। वह सदा अनिष्ट करता या कराता है। - 15. गरम और ठण्डे अंगारे के उदाहरण का क्या भाव है?
गरम अंगारा हाथ जलाता है और ठण्डा अंगारा हाथ काला करता है। इसी प्रकार दुर्जन किसी भी दशा में हानि ही पहुँचाता है — क्रोध में भी और प्रेम दिखाने पर भी। - 16. एक पहिये से रथ न चलने का उदाहरण किस सन्देश को स्पष्ट करता है?
यह उदाहरण बताता है कि केवल भाग्य के भरोसे कार्य सिद्ध नहीं होता। जैसे रथ को दो पहिये चाहिए, वैसे ही सफलता के लिए भाग्य और पुरुषार्थ दोनों आवश्यक हैं। - 17. ‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः’ का अर्थ लिखिए।
परिश्रम (उद्यम) से ही कार्य सिद्ध होते हैं, केवल मन की इच्छाओं (मनोरथों) से नहीं। - 18. ‘परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
दूसरों की भलाई करना पुण्य का कारण है और दूसरों को पीड़ा देना पाप का कारण है। यह उक्ति पाठ में व्यासजी के नाम से उद्धृत है। - 19. पितामही ने सुभाषितों के विषय में पौत्री को क्या समझाया?
पितामही ने समझाया कि सुभाषित नीतिश्लोक हैं, जो हितकारी हैं और कर्तव्य-अकर्तव्य का मार्गदर्शन करते हैं। अतः सबको सुभाषित पढ़कर जीवन का रहस्य समझना और जीवन को सुखमय बनाना चाहिए। - 20. ‘यथाशक्ति दान’ का क्या अर्थ है?
अपनी शक्ति (सामर्थ्य) के अनुसार दान करना। दान करते समय अपनी क्षमता से अधिक देना आवश्यक नहीं है; अपनी शक्ति के अनुसार देना ही उत्तम गुण है।
(द) महत्वपूर्ण प्रश्न
- 1. ‘सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु’ पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
यह पाठ दादी-पोती के संवाद से आरम्भ होकर बताता है कि सुभाषित (नीतिश्लोक) सुन्दर वचन हैं, जो जीवन को सही दिशा देते हैं। इसके बाद आठ श्लोकों में भारतभूमि की महिमा, गुणी द्वारा गुण की पहचान, सज्जनों की विनम्रता, मनुष्य की चार कसौटियाँ, आठ गुण, सभा-धर्म-सत्य का सम्बन्ध, दुर्जन की संगति से बचाव और पुरुषार्थ का महत्त्व बताया गया है। पाठ का सन्देश है कि सुभाषितों के अर्थ को समझकर उन्हें जीवन में उतारने से जीवन सफल और सुखमय बनता है। - 2. पहले श्लोक (‘गायन्ति देवाः किल गीतकानि’) के आधार पर भारतभूमि की महिमा समझाइए।
श्लोक के अनुसार देवता भी गीत गाते हैं कि भारतभूमि में जन्म लेने वाले धन्य हैं। यह भूमि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग है, इसलिए देवता भी अपना देवत्व छोड़कर यहाँ मनुष्य-रूप में जन्म लेना चाहते हैं। इससे हमें ज्ञात होता है कि हम भारतवासी भाग्यशाली हैं और हमें अपनी मातृभूमि का सम्मान करना चाहिए। - 3. ‘गुणी गुणं वेत्ति’ श्लोक की व्याख्या कीजिए।
गुणवान् व्यक्ति ही दूसरों के गुण पहचान सकता है, गुणहीन नहीं; बलवान् ही बल को पहचानता है, निर्बल नहीं। कोयल वसन्त-ऋतु के गुण को जानकर मधुर कूकती है, पर कौआ नहीं जानता। हाथी सिंह के बल को जानता है, पर चूहा नहीं। अतः किसी के महत्त्व को वही समझ सकता है जिसमें स्वयं योग्यता हो। - 4. सज्जनों की विनम्रता की तुलना वृक्ष और बादल से करते हुए तीसरे श्लोक का भावार्थ लिखिए।
वृक्षों में फल लगने पर वे फलों के भार से झुक जाते हैं और नए जल से भरे बादल भी नीचे की ओर झुककर वर्षा करते हैं। ठीक इसी प्रकार सत्पुरुष धन-सम्पत्ति और समृद्धि पाकर भी घमण्ड नहीं करते, बल्कि अधिक विनम्र होकर दूसरों की सेवा करते हैं। यही परोपकारी लोगों का स्वाभाविक गुण है। - 5. चौथे श्लोक के आधार पर बताइए कि सोने और मनुष्य की परीक्षा कैसे होती है।
सुनार सोने की शुद्धता के लिए उसे घिसता, काटता, तपाता और पीटता है। इन चार कसौटियों पर खरा उतरने पर सोना शुद्ध माना जाता है। उसी प्रकार मनुष्य की परीक्षा उसके कुल (वंश), शील (स्वभाव), गुण और कर्म — इन चार आधारों पर होती है। इन पर परखकर ही किसी के व्यक्तित्व का ठीक ज्ञान होता है। - 6. पाँचवें श्लोक में आए आठ गुणों को संक्षेप में समझाइए।
(१) प्रज्ञा — विशेष बुद्धि; (२) कौल्य — कुलीनता; (३) दम — इन्द्रियों पर संयम; (४) श्रुत — शास्त्रों का ज्ञान; (५) पराक्रम — साहस; (६) अबहुभाषिता — कम और सार्थक बोलना; (७) यथाशक्ति दान — सामर्थ्य के अनुसार देना; (८) कृतज्ञता — उपकार को याद रखना। इन आठ गुणों से युक्त मनुष्य समाज में सम्मान पाता है। - 7. छठे श्लोक (‘न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः’) का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
श्लोक में कहा गया है कि वही सभा सभा है जिसमें वृद्ध हों; वही वृद्ध वृद्ध है जो धर्म की बात कहे; वही धर्म धर्म है जिसमें सत्य हो; और वही सत्य सत्य है जिसमें छल न हो। तात्पर्य यह है कि सभा में अनुभवी और ज्ञानी लोग हों, वे धर्म की चर्चा करें और वह चर्चा सत्य तथा छल-रहित हो। - 8. सातवें श्लोक के आधार पर दुर्जन की संगति के दोष लिखिए।
दुर्जन के मुख में मिठास होती है पर हृदय में कपट रहता है, इसलिए वह विश्वास के योग्य नहीं होता। जैसे गरम अंगारा हाथ जलाता है और ठण्डा अंगारा हाथ काला करता है, वैसे ही दुर्जन सदा हानि ही करता है। इसलिए विद्या से सुशोभित होने पर भी दुर्जन से मित्रता और प्रेम नहीं करना चाहिए। - 9. आठवें श्लोक के आधार पर पुरुषार्थ और भाग्य का सम्बन्ध समझाइए।
श्लोक में कहा गया है कि जैसे एक पहिये से रथ नहीं चलता, वैसे ही पुरुषार्थ के बिना केवल भाग्य से सिद्धि नहीं मिलती। जीवन-रथ के दो पहिये हैं — प्रयत्न और भाग्य। भाग्य अनुकूल हो तब भी परिश्रम करना पड़ता है। इसलिए कहा गया है — ‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः’। - 10. आज के जीवन में सुभाषितों की उपयोगिता पर 8–10 पंक्तियाँ लिखिए।
सुभाषित कम शब्दों में जीवन के बड़े सत्य बता देते हैं। ये हमें सही-गलत का विवेक देते हैं, विनम्रता, सत्य, परिश्रम और परोपकार जैसे गुण सिखाते हैं तथा बुरी संगति से बचाते हैं। विद्यार्थी के लिए ये चरित्र-निर्माण का साधन हैं। आज के तनावपूर्ण जीवन में सुभाषितों का स्मरण मन को दिशा और शान्ति देता है। इसलिए पाठ का सन्देश है कि सुभाषित-रस का पान कर हम अपने जीवन को सफल और सुखमय बनाएँ।
माइंड मैप
स्वरूप
- सुभाषित = सुन्दर वचन
- नीतिश्लोक
- पितामही–पौत्री संवाद
- कुल 8 श्लोक
श्लोक १–३
- भारतभूमि की महिमा
- गुणी ही गुण जानता है
- फलदार वृक्ष व बादल — विनम्रता
श्लोक ४–५
- सोने की 4 कसौटियाँ
- मनुष्य की 4 कसौटियाँ
- आठ गुण
श्लोक ६–८
- सभा, वृद्ध, धर्म, सत्य
- दुर्जन-संगति से दूरी
- पुरुषार्थ बनाम दैव
भाषा-विशेष
- सन्धि: नम्रास्तरवः, अभ्युपैति
- समास: अनुद्धताः, यथाशक्ति
- विलोम शब्द
- धातु-रूप
अभ्यास
- 25 MCQ
- 20 अति लघु
- 20 लघु
- 10 महत्वपूर्ण
सन्देश
- गुण अपनाओ
- विनम्र बनो
- सत्य व धर्म का पालन
- परिश्रम करो
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
‘सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु’ पाठ किस पुस्तक व कक्षा का है?
यह कक्षा 8 की एनसीईआरटी संस्कृत पाठ्यपुस्तक ‘दीपकम्’ का तृतीय पाठ है।
इस पाठ में कितने श्लोक हैं और उनका मुख्य विषय क्या है?
पाठ में आठ सुभाषित हैं। उनके विषय हैं — भारतभूमि की महिमा, गुणी द्वारा गुण की पहचान, सज्जनों की विनम्रता, मनुष्य की चार कसौटियाँ, आठ गुण, सभा-धर्म-सत्य, दुर्जन की संगति से बचाव और पुरुषार्थ का महत्त्व।
‘सुभाषित’ शब्द का क्या अर्थ है?
‘सुष्ठु भाषितानि’ — अर्थात् सुन्दर और शोभन वचन। इन्हें नीतिश्लोक भी कहते हैं।
पाठ में मनुष्य को शोभित करने वाले कौन-से आठ गुण बताए गए हैं?
प्रज्ञा, कौल्य, दम, श्रुत, पराक्रम, अबहुभाषिता, यथाशक्ति दान और कृतज्ञता।
इस पाठ में कौन-सा व्याकरण-बिन्दु ध्यान देने योग्य है?
पाठ्यपुस्तक ने ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में श्लोकों के चार पाद तथा सन्धि-समास वाले पदों (नम्रास्तरवः, अभ्युपैति, अनुद्धताः, यथाशक्ति) पर ध्यान दिलाया है। इस लेख में सन्धि-विच्छेद, समास-विग्रह, क्रियापद और विलोम शब्द भी दिए गए हैं।
परीक्षा के लिए इस पाठ की तैयारी कैसे करें?
पहले संवाद और आठ श्लोकों को पदच्छेद-अन्वय सहित पढ़ें, फिर शब्दार्थ याद करें। इसके बाद पाठ्यपुस्तक के अभ्यास हल करें और इस लेख के 75 अतिरिक्त प्रश्नों (25 MCQ, 20 अति लघु, 20 लघु, 10 महत्वपूर्ण) का अभ्यास करें।
- संगच्छध्वं संवदध्वम् (पाठ 1)
- अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका (पाठ 2)
- सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु (पाठ 3) — (यही लेख)
- प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः (पाठ 4)
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