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अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका – सरल अर्थ, व्याकरण और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 संस्कृत दीपकम्

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका — सरल अर्थ, व्याकरण और प्रश्नोत्तर | कक्षा 8 संस्कृत (दीपकम्)

कक्षा 8 की एनसीईआरटी संस्कृत पाठ्यपुस्तक ‘दीपकम्’ का द्वितीय पाठ ‘अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ हितोपदेश के मित्रलाभ-प्रकरण की प्रसिद्ध कपोत-कथा पर आधारित है, जो संगठन की शक्ति का सन्देश देती है। इस लेख में ग्रन्थ-परिचय, मूल संवाद व कथा, हिंदी अनुवाद, श्लोकों के पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ, शब्द-संपदा, व्याकरण (ल्यप्-प्रत्यय तथा विसर्गसन्धि), पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर तथा 75 अतिरिक्त प्रश्न (MCQ सहित) — सब कुछ एक ही जगह मिलेगा।

इस लेख में: ग्रन्थ-परिचय • पाठ परिचय • मूल पाठ (संवाद व कथा) • सरल व्याख्या • शब्द-संपदा • व्याकरण विशेष (ल्यप्, विसर्गसन्धि) • पाठ्यपुस्तक के अभ्यास • अतिरिक्त प्रश्न (MCQ/लघु/दीर्घ) • माइंड मैप • अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ग्रन्थ-परिचय : हितोपदेश (मित्रलाभ)

हि

हितोपदेशः — मित्रलाभप्रकरणम्

लेखक: पण्डित नारायणशर्मा (पाठ्यपुस्तक के अनुसार) — नीतिकथाओं का प्रसिद्ध संस्कृत ग्रन्थ

प्रस्तुत पाठ हितोपदेश ग्रन्थ के मित्रलाभ-प्रकरण से स्वीकार किया गया है। हितोपदेश में मूल्ययुक्त तथा नीतियुक्त वचनों, सुभाषितों और कथाओं का सुन्दर संग्रह है, इसीलिए यह ग्रन्थ संस्कृत-साहित्य में अत्यन्त समादृत है। इस ग्रन्थ में पशु-पक्षियों के पात्रों के माध्यम से मनुष्य को व्यवहार, मित्रता, राजनीति और सामाजिक जीवन की शिक्षा दी गई है।

इस ग्रन्थ के चार प्रकरण हैं — (1) मित्रलाभ, (2) सुहृद्भेद, (3) विग्रह और (4) सन्धि। पाठ्यपुस्तक का मत है कि इसके अध्ययन से विद्यार्थी नीति-विद्या तथा संस्कृत भाषा — दोनों में निपुण बनता है।

  • स्रोत ग्रन्थ हितोपदेश (मित्रलाभ-प्रकरण)
  • ग्रन्थ के चार प्रकरण मित्रलाभ, सुहृद्भेद, विग्रह, सन्धि
  • कथा के मुख्य पात्र चित्रग्रीव (कबूतरों का राजा), हिरण्यक (चूहों का राजा), व्याध (शिकारी)
  • पाठ का सूत्र-वाक्य अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका (हितोपदेश 1.36)
  • पाठ्यपुस्तक दीपकम् (कक्षा 8, एनसीईआरटी संस्कृत)
  • मुख्य विषय संगठन की शक्ति, धैर्य, विवेक, नेतृत्व और आश्रितों के प्रति वात्सल्य
ध्यान दें: पाठ का आरंभिक भाग (उत्तराखण्ड-यात्रा वाला संवाद) एक आधुनिक प्रसंग है, जो हितोपदेश की मूल कथा के प्रयोग को समझाने के लिए जोड़ा गया है। असली नीतिकथा “चित्रग्रीव कबूतर और हिरण्यक चूहे” की है, जो गोदावरी-तट के शाल्मली वृक्ष से आरंभ होती है।

पाठ परिचय

‘अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ का अर्थ है — “छोटी-छोटी वस्तुओं का संगठन (एकत्र होना) भी बड़े कार्य को सिद्ध कर देता है।” यह पाठ दो भागों में बँटा है। पहले भाग में विद्यालय के कुछ मित्र ग्रीष्मावकाश में देवभूमि उत्तराखण्ड की यात्रा पर जाते हैं। केदारक्षेत्र की चढ़ाई के समय भयंकर वर्षा, पर्वतस्खलन (भूस्खलन) और नदी के तीव्र प्रवाह से सेतु टूट जाता है। सभी घबरा जाते हैं, परन्तु उनका नायक धैर्य से सबको सान्त्वना देता है और हितोपदेश की एक कथा सुनाता है।

दूसरे भाग में गोदावरी-तट पर रहने वाले कबूतरों की कथा है — शिकारी के बिछाए जाल में कबूतर लोभवश फँस जाते हैं, पर उनके राजा चित्रग्रीव की सूझ-बूझ से सब कबूतर एकमत होकर जाल सहित उड़ जाते हैं और मित्र चूहे हिरण्यक की सहायता से बन्धन-मुक्त होते हैं। कथा सुनकर नायक के साथी भी हिम्मत जुटाते हैं और सब मिलकर सेतु बनाकर अपने प्राणों की रक्षा करते हैं। पाठ का सन्देश स्पष्ट है — संगठन में शक्ति है; विपत्ति में धैर्य, बुद्धि और एकता से असम्भव भी सम्भव हो जाता है।

पात्र-परिचय

पात्रपरिचय / भूमिका
नायकःमित्र-मण्डली का धैर्यशील नेता; संकट में सबको सान्त्वना देकर हितोपदेश की कथा सुनाता है
दिनेशःविषादग्रस्त मित्र, जो कहता है कि मृत्यु निकट है
सुरेशःशंका करने वाला मित्र, जो पूछता है कि क्या असम्भव कार्य किया जा सकता है
कपिलःजिज्ञासु मित्र — “किम् इदं सम्भवति?”
चित्रग्रीवःकबूतरों का बुद्धिमान राजा; संकट में धैर्य, नीति और आश्रित-वात्सल्य का आदर्श
हिरण्यकःचित्रग्रीव का मित्र मूषकराज (चूहों का राजा); गण्डकी-तट के चित्रवन में रहता है
व्याधःशिकारी, जो चावल के दाने बिखेरकर जाल बिछाता है
केचन कपोताःलोभी कबूतर, जिनमें से एक ने चित्रग्रीव की बात का अभिमान से विरोध किया

मूल पाठ

(क) प्रस्तावना-संवाद — केदारक्षेत्र में संकट

कानिचन मित्राणि विद्यालयस्य ग्रीष्मावकाशे पुण्यक्षेत्रदर्शनाय देवभूमिम् उत्तराखण्डम् अगच्छन्। तदानीं वर्षारम्भकालः आसीत्। सर्वेऽपि गौरीकुण्डनामकं स्थानं प्राप्तवन्तः। यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा। सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः। नद्याः तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः। पर्वतस्खलनं सञ्जातम्। सर्वेऽपि उच्चस्वरेण अक्रन्दन् ईश्वरं प्रार्थयन्त च ‘हे भगवन्! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति। सर्वेषाम् अधैर्यं दृष्ट्वा नायकः सुधीरः सर्वान् सांत्वयन् प्रेरयन् च अवदत् —

नायकः — अयि भोः मित्राणि! अस्मिन् विपत्काले वयं धैर्यम् अवलम्ब्य कमपि उपायं चिन्तयामः।

दिनेशः — (सविषादम्) अरे भ्रातः! किं वदसि? अस्माकं मृत्युः एव सन्निकटे अस्ति। एवं चेत् कथम् उपायः चिन्तनीयः?

नायकः — मित्र! विषादं मा कुरु। यदा वृष्टिः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भविष्यति तदा वयं सम्भूय सेतुं, मार्गं च निर्माय पुनः स्वलक्ष्यं प्रति गमिष्यामः।

सुरेशः — एतस्यां स्थितौ वयं किमेतत् अत्यन्तं दुःसाध्यम्, असम्भवं च कार्यं कर्तुं शक्नुमः?

नायकः — प्रियमित्राणि! वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुमः। तेन अस्माकं लक्ष्यप्राप्तिः प्राणरक्षा चापि भविष्यति।

कपिलः — किम् इदं सम्भवति?

नायकः — नूनं सम्भवति मित्र! अस्मिन् प्रसङ्गे अहं हितोपदेशस्य एकां कथां श्रावयामि।

सर्वेऽपि — (उत्कण्ठया) का कथा? वद मित्र! वद।

नायकः — सावधानं शृण्वन्तु।

(ख) हितोपदेश की कथा — कपोतराज चित्रग्रीव

अस्ति गोदावरीतीरे एको विशालः शाल्मलीतरुः। तत्र प्रतिदिनं दूरदेशात् पक्षिणः आगत्य निवसन्ति स्म। अथ कदाचित् तत्र कश्चिद् व्याधस्तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः। तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीवनामा कपोतराजः सपरिवारः आकाशमार्गे गच्छति स्म। केचन कपोताः वनमध्ये तण्डुलकणान् अवलोक्य लोभाकृष्टाः अभवन्। ततो चित्रग्रीवः तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान् अवदत् — “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः तद् निरूप्यताम्। कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत्। सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम्।” एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित् कपोतः सदर्पम् अवदत् — “आः किमर्थम् एवमुच्यते?

वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते। सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्॥ १॥”

तस्य वचनं श्रुत्वा चित्रग्रीवस्य च अवज्ञां कृत्वा सर्वे कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः।

अनन्तरं ते सर्वे तेन जालेन बद्धाः अभवन्। ततो यस्य वचनात् कपोतास्तत्र बद्धास्तं सर्वे तिरस्कुर्वन्ति स्म।

इदं दृष्ट्वा चित्रग्रीवः अवदत् — “अयम् अस्य दोषो न। अनागतविपत्तिं को वा ज्ञातुं समर्थः। अतोऽस्मिन् विपत्काले अस्माभिः अस्य तिरस्कारम् अकृत्वा कश्चन उपायश्चिन्तनीयः। यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्। सत्पुरुषाणां लक्षणं तु —

विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥ २॥”

अतोऽधुना अस्माभिः धैर्यमवलम्ब्य प्रतीकारश्चिन्त्यताम्। प्रियमित्राणि! लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति इति नीतिवचनं लोकसिद्धम्। अतः अस्माभिः सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्।” एवं विचार्य सर्वे पक्षिणः जालमादाय उत्पतिताः।

अनन्तरं स व्याधः सुदूरात् जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चात् अधावत्। परं तस्य दृष्टिपथात् दूरं गतेषु पक्षिषु स व्याधो निवृत्तः। अथ व्याधं निवृत्तं दृष्ट्वा कपोताः उक्तवन्तः — “स्वामिन्! किमिदानीं कर्तुम् उचितम्?” चित्रग्रीव उवाच — “प्रियकपोताः! अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति। सोऽस्माकं पाशान् दन्तबलेन छेत्स्यति।” एतत् आलोच्य सर्वे हिरण्यकस्य विवरसमीपं गताः। हिरण्यकश्च सर्वदा अनिष्टशङ्कया शतद्वारं विवरं कृत्वा निवसति। ततो हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः। चित्रग्रीव उवाच — “सखे हिरण्यक! किम् अस्माभिः सह न सम्भाषसे?” ततो हिरण्यकस्तद्वचनं प्रत्यभिज्ञाय आनन्देन त्वरया बहिः निःसृत्य अब्रवीत् — “आः! पुण्यवान् अस्मि, मम प्रियसुहृत् चित्रग्रीवः समायातः।”

पाशबद्धान् कपोतान् दृष्ट्वा सविस्मयं क्षणं स्थित्वा अवदत् — “सखे! किमेतत्?” चित्रग्रीवोऽवदत् — “सखे! एतद् अस्माकं विचारहीनतायाः फलम्।” तत् श्रुत्वा हिरण्यकः चित्रग्रीवस्य बन्धनं छेत्तुं सत्वरम् उपसर्पति। तदा चित्रग्रीवोऽवदत् — “मित्र! मा मा एवम्। पूर्वं मदाश्रितानाम् एतेषां पाशान् छिनत्तु, पश्चात् मम।” एतदाकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत् — “साधु मित्र! साधु। अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि।” ततो हिरण्यकः स्वमित्रैः सह सर्वेषां कपोतानां बन्धनानि छिनत्ति स्म। सर्वे कपोताः पाशविमुक्ताः अभवन्। सहर्षं पुनः उड्डीय आकाशमार्गेण गच्छन्तः सर्वे कपोताः राजानं चित्रग्रीवं प्रशंसन्ति — “भवतः नीतिशिक्षया नायकधर्मेण च वयं सर्वे सुरक्षिताः। धन्याः वयम्”।

कथां श्रावयित्वा नायकः सर्वान् सम्बोधयति — “मित्राणि! आपद्ग्रस्ताः कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः। तर्हि किमर्थं वयं संघटिताः भूत्वा आत्मसंरक्षणं कर्तुं न शक्नुमः?” नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः। भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरक्षिताः।

सरल व्याख्या (हिंदी अनुवाद व भावार्थ)

संवाद-भाग का हिंदी अनुवाद

कुछ मित्र विद्यालय के ग्रीष्मावकाश में पुण्य-तीर्थ के दर्शन के लिए देवभूमि उत्तराखण्ड गए। उस समय वर्षा-ऋतु का आरम्भ था। सभी मित्र गौरीकुण्ड नामक स्थान पर पहुँचे। जब वे श्रीकेदारनाथ क्षेत्र की ओर चढ़ रहे थे, तब लक्ष्य पर पहुँचने से पहले ही तेज़ वर्षा शुरू हो गई। अचानक चारों ओर अँधेरा छा गया। नदी के तीव्र जलवेग से पुल टूट गया और पहाड़ खिसक गया (भूस्खलन हुआ)। सब लोग ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे और भगवान से प्रार्थना करने लगे — ‘हे भगवन्! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो।’ सबकी अधीरता देखकर धैर्यवान नायक सबको सान्त्वना और प्रेरणा देते हुए बोला —

नायक: अरे मित्रो! इस विपत्ति के समय हम धैर्य रखकर कोई उपाय सोचें।
दिनेश (दुखी होकर): अरे भाई! क्या कह रहे हो? हमारी मृत्यु तो निकट ही है। ऐसे में उपाय कैसे सोचा जाए?
नायक: मित्र! दुखी मत हो। जब वर्षा थम जाएगी और मौसम साफ़ हो जाएगा, तब हम मिलकर पुल और रास्ता बनाकर फिर अपने लक्ष्य की ओर चलेंगे।
सुरेश: इस स्थिति में क्या हम ऐसा अत्यन्त कठिन और असम्भव कार्य कर सकते हैं?
नायक: प्रिय मित्रो! हम आत्मविश्वास के बल से यह असम्भव लगने वाला कार्य भी मिलकर अवश्य कर सकते हैं। इससे हमारा लक्ष्य भी पूरा होगा और प्राणों की रक्षा भी।
कपिल: क्या यह सम्भव है?
नायक: निश्चय ही सम्भव है मित्र! इसी प्रसंग में मैं तुम्हें हितोपदेश की एक कथा सुनाता हूँ।
सब (उत्सुकता से): कौन-सी कथा? मित्र, सुनाओ!
नायक: ध्यान से सुनो।

कथा-भाग का हिंदी अनुवाद

1. जाल में फँसने की भूल — गोदावरी नदी के किनारे एक विशाल सेमल का पेड़ था। वहाँ प्रतिदिन दूर-दूर के देशों से आकर पक्षी रहते थे। एक बार वहाँ कोई शिकारी चावल के दाने बिखेरकर और जाल फैलाकर छिपकर बैठ गया। उसी समय चित्रग्रीव नामक कबूतरों का राजा अपने परिवार सहित आकाश-मार्ग से जा रहा था। कुछ कबूतर जंगल के बीच चावल के दाने देखकर लालच में आ गए। तब चित्रग्रीव ने चावल के दानों के लोभी कबूतरों से कहा — “इस निर्जन वन में चावल के दाने कहाँ से आए, इस पर विचार करो। यहाँ कोई शिकारी हो सकता है। बिना सोचे-विचारे कोई काम कभी नहीं करना चाहिए।” यह सुनकर एक कबूतर अभिमान से बोला — “अरे! ऐसा क्यों कहते हो? विपत्ति आ जाने पर ही बड़ों की बात माननी चाहिए; यदि हर जगह ऐसा ही सोचने लगें तो भोजन करने में भी प्रवृत्ति न होगी।”

2. संकट में चित्रग्रीव का धैर्य — उसकी बात सुनकर और चित्रग्रीव की अवज्ञा करके सभी कबूतर भूमि पर उतरकर दाने चुगने लगे। तभी वे सब उस जाल में फँस गए। तब जिसके कहने से कबूतर वहाँ उतरे थे, सब उसे बुरा-भला कहने लगे। यह देखकर चित्रग्रीव बोला — “इसका दोष नहीं है। आने वाली विपत्ति को कौन जान सकता है? इसलिए इस विपत्ति में उसका तिरस्कार न करके हमें कोई उपाय सोचना चाहिए, क्योंकि विपत्ति में घबरा जाना कायर पुरुषों का लक्षण है। सज्जनों का स्वभाव तो यह होता है कि विपत्ति में धैर्य रखते हैं, समृद्धि में क्षमाशील रहते हैं, सभा में वाक्-चतुर होते हैं, युद्ध में पराक्रम दिखाते हैं, यश में रुचि रखते हैं और शास्त्र-श्रवण का अनुराग रखते हैं।”

3. संगठन का निर्णय — “इसलिए अब हम धैर्य रखकर उपाय सोचें। प्रिय मित्रो! ‘छोटी वस्तुओं का समूह भी कार्य सिद्ध करता है’ — यह नीति-वचन संसार-प्रसिद्ध है। अतः हम सब एकमन होकर जाल को लेकर उड़ जाएँ।” ऐसा विचारकर सभी पक्षी जाल को लेकर उड़ गए।

4. हिरण्यक की शरण में — तब उस शिकारी ने बहुत दूर से जाल ले जाते हुए पक्षियों को देखा और उनके पीछे दौड़ा। परन्तु जब पक्षी उसकी दृष्टि से ओझल हो गए तो शिकारी लौट आया। शिकारी को लौटा देखकर कबूतर बोले — “स्वामी! अब क्या करना उचित है?” चित्रग्रीव ने कहा — “प्रिय कबूतरो! हमारा मित्र हिरण्यक नामक चूहों का राजा गण्डकी नदी के तट पर चित्रवन में रहता है। वह अपने दाँतों के बल से हमारे बन्धन काट देगा।” यह विचारकर सब हिरण्यक के बिल के पास गए। हिरण्यक सदा अनिष्ट की आशंका से सौ द्वारों वाला बिल बनाकर रहता है। इसलिए वह कबूतरों के उतरने के भय से चकित होकर चुप रहा। तब चित्रग्रीव ने कहा — “मित्र हिरण्यक! हमसे बात क्यों नहीं करते?” तब हिरण्यक उसकी वाणी पहचानकर आनन्द से शीघ्र बाहर निकलकर बोला — “अहा! मैं पुण्यवान हूँ, मेरा प्रिय मित्र चित्रग्रीव आया है।”

5. आश्रितों को पहले मुक्ति — जाल में बँधे कबूतरों को देखकर हिरण्यक क्षणभर आश्चर्य से रुका और बोला — “मित्र! यह क्या?” चित्रग्रीव ने कहा — “मित्र! यह हमारी विचारहीनता का फल है।” यह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीव का बन्धन काटने के लिए तुरन्त पास आया। तब चित्रग्रीव बोला — “मित्र! ऐसा मत करो। पहले मेरे आश्रित इन कबूतरों के बन्धन काटो, बाद में मेरे।” यह सुनकर हिरण्यक अत्यन्त प्रसन्न और रोमांचित होकर बोला — “साधु मित्र, साधु! आश्रितों के प्रति इसी वात्सल्य के कारण तुम तीनों लोकों का स्वामी बनने के योग्य हो।” इसके बाद हिरण्यक ने अपने मित्रों के साथ सभी कबूतरों के बन्धन काट दिए। सब कबूतर बन्धन-मुक्त हो गए और हर्ष के साथ फिर उड़कर आकाश-मार्ग से जाते हुए अपने राजा की प्रशंसा करने लगे — “आपकी नीति-शिक्षा और नेतृत्व-धर्म से हम सब सुरक्षित हुए, हम धन्य हैं।”

6. कथा का प्रयोग — कथा सुनाकर नायक ने सबसे कहा — “मित्रो! संकट में फँसे कबूतरों ने बुद्धि-बल और संगठन की शक्ति से अपनी रक्षा की। तो हम संगठित होकर अपनी रक्षा क्यों नहीं कर सकते?” नायक के प्रेरक वचनों से उत्साहित होकर सब भय, शोक और सन्देह छोड़कर पुल बनाने के कार्य में जुट गए। भगीरथ-प्रयत्न जैसे अथक परिश्रम से पुल बनाकर उन्होंने अपने और दूसरों के प्राणों की रक्षा की।

श्लोकों का पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ

श्लोक 1 — कबूतर का अभिमानपूर्ण कथन

वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते।
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्॥ १॥

पदच्छेद — वृद्धानाम् वचनम् ग्राह्यम् आपत्काले हि उपस्थिते। सर्वत्र एवम् विचारे तु भोजने अपि अप्रवर्तनम्।

अन्वय — आपत्काले उपस्थिते हि वृद्धानां वचनं ग्राह्यम्। सर्वत्र एवं विचारे तु भोजने अपि अप्रवर्तनम् (स्यात्)।

भावार्थ — बड़ों की बात तभी माननी चाहिए जब सचमुच विपत्ति आ जाए। यदि हर जगह इसी तरह शंका और विचार करते रहें तो भोजन करने में भी प्रवृत्ति नहीं होगी। कबूतर ने यह बात घमण्ड में कही थी और इसी अविवेक से वे जाल में फँस गए। शिक्षा: अनुभवी बड़ों की सलाह को हल्के में नहीं लेना चाहिए।

श्लोक 2 — सत्पुरुषों के स्वाभाविक लक्षण

विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥ २॥

पदच्छेद — विपदि धैर्यम् अथ अभ्युदये क्षमा सदसि वाक्-पटुता युधि विक्रमः। यशसि च अभिरुचिः व्यसनं श्रुतौ प्रकृति-सिद्धम् इदं हि महात्मनाम्।

अन्वय — अथ विपदि धैर्यम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्-पटुता, युधि विक्रमः, यशसि अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनं च इदं हि महात्मनां प्रकृति-सिद्धं भवति।

भावार्थ — महापुरुषों के लिए ये आचरण स्वभाव से ही सिद्ध होते हैं। जो कुछ भी हो, वे विपत्ति के समय धैर्य का सहारा लेकर समस्या के समाधान का प्रयत्न करते हैं। उन्नति के समय वे सबका उपकार करते हैं, सभा में कुशलता से बोलते हैं, युद्ध में पराक्रम और शौर्य दिखाते हैं, यश के विषय में रुचि रखते हैं तथा शास्त्र-विषय में अनुराग प्रकट करते हैं।

श्लोक 3 (योग्यताविस्तर) — पाठ का सूत्र-वाक्य

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥ (हितोपदेश 1.36)

पदच्छेद — अल्पानाम् अपि वस्तूनाम् संहतिः कार्य-साधिका। तृणैः गुणत्वम् आपन्नैः बध्यन्ते मत्त-दन्तिनः।

अन्वय — अल्पानाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्य-साधिका (भवति)। गुणत्वम् आपन्नैः तृणैः मत्त-दन्तिनः बध्यन्ते।

भावार्थ — अत्यन्त छोटी और कमज़ोर वस्तुओं का भी संघ (समूह) लक्ष्य-सिद्धि में सहायक होता है। जैसे घास के तिनकों को मिलाकर बनाई गई रस्सी से मदमस्त हाथी भी बाँध लिए जाते हैं।

शब्द-संपदा (शब्दार्थ)

शब्दःसंस्कृत अर्थःहिन्दी अर्थEnglish
भग्नःनष्टःटूट गयाBroke down
अक्रन्दन्रुदन्ति स्मरोयेThey cried
सविषादम्चिन्तापूर्वकम्विषाद पूर्वकWith sadness
सम्भूयमिलित्वामिलकरTogether
तरुःवृक्षःपेड़Tree
व्याधःलुब्धकःशिकारी (व्याध)Hunter
तण्डुलकणान्तण्डुललवान्चावल के दानों कोRice grains
विकीर्यविकिरणं कृत्वाबिखेर करHaving scattered
विस्तीर्यविस्तृतं, विस्तरणं कृत्वाफैलाकरHaving spread
प्रच्छन्नःगुप्तःछिपा हुआStood secretly
चित्रग्रीवनामाचित्रग्रीवः नाम यस्यचित्रग्रीव नाम काNamed Chitragriva
प्रतीकारःप्रतिविधानम्उपायRemedy
अविचारितम्अचिन्तितम्चिन्तन किये बिनाNot thought of
अवतीर्यअवतरणं कृत्वा (नीचैः आगत्य)उतर करHaving descended
अवलोक्यदृष्ट्वादेख करHaving seen
अप्रवर्तनम्अप्रवृत्तिःन लगना, प्रवृत्त न होनाNo inclination
प्रवृत्ताःनिरताःलगे हुएEngaged / engrossed
अवलम्ब्यआश्रित्यआश्रित होकरHaving depended on
एकचित्तीभूयएकमनसाएक चित्त होकरWith united mind
कापुरुषलक्षणम्कुत्सितपुरुषाणां चिह्नम्कायर पुरुषों का लक्षणSign of a coward
तिरस्कुर्वन्तिअनादरं कुर्वन्तितिरस्कार करते हैंReject
विस्मयःआश्चर्यम्आश्चर्यAmazement
विक्रमःअतिपराक्रमःअत्यधिक शक्ति युक्तValour
उत्पतिताःउड्डयनं कृतवन्तःउड़ गएFlew away
चिन्त्यताम्चिन्तनीयःचिन्तन करना चाहिए / सोचिएShould be thought
आलोच्यविचार्यअच्छी तरह विचार करHaving analysed
पाशान्बन्धनानिबन्धनों कोCaptivity / snares
प्रत्यभिज्ञायज्ञात्वाजानकर, समझकरHaving recognized
त्वरयाशीघ्रम्शीघ्रHurriedly, quickly
निःसृत्यनिर्गत्यनिकल करComing out
मेमममेराMine
छिनत्तुछेदनं करुकाट दे(You) cut
आकर्ण्यश्रुत्वासुनकरHaving heard
प्रहृष्टमनाःआनन्दितमनाःप्रसन्न मन वालाGleeful (person)
पुलकितःरोमाञ्चितःप्रफुल्लित होकरExcited
सत्वरम्त्वरया सहअति शीघ्रQuickly
उपसर्पतिसमीपम् आगच्छतिनिकट आता हैApproaches near
आश्रितवात्सल्येनशरणम् आगतानां कृते स्नेहभावेनशरण में आए हुए के प्रति प्रेम सेAffection towards people who have taken shelter
आशङ्क्यशङ्कां कृत्वाशंका करकेHaving doubted
अवज्ञातिरस्कारःनिन्दाDisrespect

व्याकरण विशेष : ल्यप्-प्रत्यय एवं विसर्गसन्धि

1. ल्यप्-प्रत्यय

नियम: जहाँ एक क्रिया के समाप्त होने के बाद दूसरी क्रिया होती है, वहाँ पूर्वकालिक क्रिया के लिए धातु से क्त्वा प्रत्यय (हिंदी: “करके”) होता है। किन्तु यदि धातु से पहले कोई उपसर्ग आदि पद हो, तो क्त्वा के स्थान पर ल्यप् होता है। ल्यप् प्रत्यय में केवल “य” शेष रहता है। क्त्वा और ल्यप् प्रत्यय वाले पद अव्यय होते हैं (इनके रूप नहीं चलते)। वाक्यों में इनका प्रयोग क्त्वा के समान ही होता है।

उदाहरण — तण्डुलकणान् अवलोक्य (अव + लोक् + ल्यप्) कपोतान् प्रति आह।  |  धैर्यम् अवलम्ब्य (अव + लम्ब् + ल्यप्) प्रतीकारः चिन्त्यताम्।

ध्यान रखें: जब धातु के अन्त में ह्रस्व स्वर हो (जैसे कृ, स्मृ, चि, नम्…) और ल्यप् जुड़े, तब बीच में “त्” आ जाता है — उप + कृ + ल्यप् = उपकृत्य, वि + स्मृ + ल्यप् = विस्मृत्य, निस् + चि + ल्यप् = निश्चित्य। दीर्घ या व्यञ्जनान्त धातुओं में सीधे “य” जुड़ता है — जैसे आ + नी = आनीय, वि + लिख् = विलिख्य, अव + लोक् = अवलोक्य।

ल्यप्-प्रत्ययान्त पदों की तालिका (पाठ्यपुस्तक)

लट्-लकार क्रियाप्रकृति-प्रत्यय विभागल्यबन्त रूपविवरणार्थल्यप्-प्रत्यय वाला वाक्य
आगच्छतिआ + गम् + ल्यप्आगत्य / आगम्यआगमनं कृत्वाछात्रः विद्यालयम् आगत्य संस्कृतं पठति।
आनयतिआ + नी + ल्यप्आनीयआनयनं कृत्वासः ग्रन्थालयात् ग्रन्थम् आनीय पठति।
उत्तिष्ठतिउत् + स्था + ल्यप्उत्थायउत्थानं कृत्वासुरेशः प्रातः उत्थाय मातापितरौ नमति।
प्रणमतिप्र + नम् + ल्यप्प्रणम्य / प्रणत्यप्रणामं कृत्वाशिष्यः गुरुं प्रणम्य ग्रन्थं पठति।
उपकरोतिउप + कृ + ल्यप्उपकृत्यउपकारं कृत्वासज्जनः दुःखितजनान् उपकृत्य मोदते।
निर्दिशतिनिर् + दिश् + ल्यप्निर्दिश्यनिर्देशं कृत्वाअध्यापकः चित्रं निर्दिश्य पाठयति।
निश्चिनोतिनिस् + चि + ल्यप्निश्चित्यनिश्चयं कृत्वाछात्रः ध्येयं निश्चित्य अध्ययनं करोति।
विस्मरतिवि + स्मृ + ल्यप्विस्मृत्यविस्मरणं कृत्वाअहं पुस्तकं विस्मृत्य आगतवान्।
परिष्करोतिपरि + कृ + ल्यप्परिष्कृत्यपरिष्कारं कृत्वाछात्रः व्याकरणेन भाषां परिष्कृत्य वदति।
आरभतेआ + रभ् + ल्यप्आरभ्यआरम्भं कृत्वाश्वः आरभ्य अहं योगासनानि करिष्यामि।
स्वीकरोतिस्वी + कृ + ल्यप्स्वीकृत्यस्वीकारं कृत्वामाता वस्तूनि स्वीकृत्य आगच्छति।
विलिखतिवि + लिख् + ल्यप्विलिख्यलेखनं कृत्वाशिक्षकः सुधाखण्डेन श्लोकं विलिख्य पाठयति।
प्रक्षालयतिप्र + क्षल् (क्षालि) + ल्यप्प्रक्षाल्यप्रक्षालनं कृत्वामाता वस्त्रं प्रक्षाल्य आपणं गच्छति।
अपकरोतिअप + कृ + ल्यप्अपकृत्यअपकारं कृत्वादुर्जनः सज्जनम् अपकृत्य गच्छति।
अवलोकतेअव + लोक् + ल्यप्अवलोक्यअवलोकनं कृत्वाकपोताः तण्डुलान् अवलोक्य आनन्दन्ति।
आशङ्कतेआ + शकि + ल्यप्आशङ्क्यआशङ्कां कृत्वामनुष्यः निन्दितकर्मणि पापम् आशङ्क्य सत्कर्म कुरुते।
विकिरतिवि + कॄ + ल्यप्विकीर्यविकरणं कृत्वाव्याधः तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तारयति।
अवतरतिअव + तॄ + ल्यप्अवतीर्यअवतरणं कृत्वाकपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलान् भक्षयन्ति।
विस्तृणातिवि + स्तॄ + ल्यप्विस्तीर्यविस्तृतं कृत्वाव्याधः जालं विस्तीर्य प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः।
अवलम्बतेअव + लम्ब् + ल्यप्अवलम्ब्यअवलम्बनं कृत्वामर्कटः वृक्षशाखाम् अवलम्ब्य शयनं करोति।
निर्मातिनिर् + मा + ल्यप्निर्मायनिर्माणं कृत्वाभक्तः मन्दिरं निर्माय देवम् अर्चति।

2. विसर्गसन्धि

जब विसर्ग (ः) के बाद कोई वर्ण आता है तो विसर्ग में जो परिवर्तन होता है, उसे विसर्गसन्धि कहते हैं। इस पाठ में विसर्गसन्धि के ये चार नियम सिखाए गए हैं —

नियमपरिवर्तनउदाहरण
1. विसर्ग के बाद अथवा होविसर्ग के स्थान पर श् होता हैकः + चित् = कश्चित्
प्रतीकारः + चिन्त्यताम् = प्रतीकारश्चिन्त्यताम्
देवदत्तः + छलेन = देवदत्तश्छलेन
2. विसर्ग के बाद अथवा होविसर्ग के स्थान पर स् होता हैचकितः + तूष्णीम् = चकितस्तूष्णीम्
नीतिः + तावत् = नीतिस्तावत्
3. विसर्ग से पूर्व हो और बाद में वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण अथवा ह, य, व, र, ल होअ + विसर्ग (अः) के स्थान पर हो जाता हैहिरण्यकः + नाम = हिरण्यको नाम
ततः + हिरण्यकः = ततो हिरण्यकः
व्याधः + निवृत्तः = व्याधो निवृत्तः
4. विसर्ग से पहले भी हो और बाद में भी होपूर्व के अ तथा विसर्ग (अः) के स्थान पर होता है और बाद वाले अ का लोप होकर अवग्रह चिह्न “ऽ” लग जाता हैकुतः + अत्र = कुतोऽत्र
हितः + अपि = हितोऽपि
सः + अस्माकम् = सोऽस्माकम्
पाठ से अन्य उदाहरण: चित्रग्रीवः + अवदत् = चित्रग्रीवोऽवदत् • चित्रग्रीवः + उवाच = चित्रग्रीव उवाच (अकारान्त विसर्ग के बाद अ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो, तो विसर्ग का लोप हो जाता है) • मूषकराजः + गण्डकीतीरे = मूषकराजो गण्डकीतीरे • व्याधः + तत्र = व्याधस्तत्र • यतः + हि = यतोहि।

पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर

1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत —
  1. (क) मित्राणि ग्रीष्मावकाशे कुत्र गच्छन्ति?
    उत्तराखण्डम् (देवभूमिम्)।
  2. (ख) सर्वत्र कः प्रसृतः?
    अन्धकारः।
  3. (ग) कः सर्वान् प्रेरयन् अवदत्?
    नायकः।
  4. (घ) कः हितोपदेशस्य कथां श्रावयति?
    नायकः।
  5. (ङ) कपोतराजस्य नाम किम्?
    चित्रग्रीवः।
  6. (च) व्याधः कान् विकीर्य जालं प्रसारितवान्?
    तण्डुलकणान्।
  7. (छ) विपत्काले विस्मयः कस्य लक्षणम्?
    कापुरुषस्य (कापुरुषलक्षणम्)।
  8. (ज) चित्रग्रीवस्य मित्रं हिरण्यकः कुत्र निवसति?
    गण्डकीतीरे चित्रवने।
  9. (झ) चित्रग्रीवः हिरण्यकं कथं सम्बोधयति?
    “सखे हिरण्यक!” इति (सखे इति सम्बोधनेन)।
  10. (ञ) पूर्वं केषां पाशान् छिनत्तु इति चित्रग्रीवः वदति?
    मदाश्रितानाम् (आश्रितकपोतानाम्)।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत —
  1. (क) यदा केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् किम् अभवत्?
    यदा मित्राणि केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन्, तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा।
  2. (ख) सर्वे उच्चस्वरेण किं प्रार्थयन्त?
    सर्वे उच्चस्वरेण “हे भगवन्! रक्ष अस्मान् रक्ष” इति प्रार्थयन्त।
  3. (ग) असम्भवं कार्यं कथं कर्तुं शक्यते इति नायकः उक्तवान्?
    नायकः उक्तवान् यत् आत्मविश्वासबलेन सम्भूय च असम्भवम् अपि कार्यं साधयितुं शक्यते।
  4. (घ) निर्जने वने तण्डुलकणान् दृष्ट्वा चित्रग्रीवः किं निरूपयति?
    निर्जने वने तण्डुलकणान् दृष्ट्वा चित्रग्रीवः निरूपयति — “कुतः अत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः? कश्चित् व्याधः अत्र भवेत्।”
  5. (ङ) किं नीतिवचनं प्रसिद्धम्?
    “लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति” इति नीतिवचनं प्रसिद्धम्।
  6. (च) व्याधात् रक्षां प्राप्तुं चित्रग्रीवः कम् आदेशं दत्तवान्?
    व्याधात् रक्षां प्राप्तुं चित्रग्रीवः “सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्” इति आदेशं दत्तवान्।
  7. (छ) हिरण्यकः किमर्थं तूष्णीं स्थितः?
    हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितः सन् तूष्णीं स्थितः।
  8. (ज) पुलकितः हिरण्यकः चित्रग्रीवं कथं प्रशंसति?
    पुलकितः हिरण्यकः चित्रग्रीवम् उक्तवान् — “अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि” इति।
  9. (झ) कपोताः कथम् आत्मरक्षणं कृतवन्तः?
    कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मरक्षणं कृतवन्तः।
  10. (ञ) नायकस्य प्रेरकवचनैः सर्वेऽपि किम् अकुर्वन्?
    नायकस्य प्रेरकवचनैः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः।
3. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ल्यप्-प्रत्ययान्तेषु परिवर्तयत —

(क) छात्रः कक्षां प्रविशति। संस्कृतं पठति। → छात्रः कक्षां प्रविश्य संस्कृतं पठति। (उदाहरणम्)

  1. (ख) भक्तः मन्दिरम् आगच्छति। पूजां करोति।
    भक्तः मन्दिरम् आगत्य पूजां करोति।
  2. (ग) माता भोजनं निर्माति। पुत्राय ददाति।
    माता भोजनं निर्माय पुत्राय ददाति।
  3. (घ) सुरेशः प्रातः उत्तिष्ठति। देवं नमति।
    सुरेशः प्रातः उत्थाय देवं नमति।
  4. (ङ) रमा पुस्तकं स्वीकरोति। विद्यालयं गच्छति।
    रमा पुस्तकं स्वीकृत्य विद्यालयं गच्छति।
  5. (च) अहं गृहम् आगच्छामि। भोजनं करोमि।
    अहं गृहम् आगत्य भोजनं करोमि।
  6. (छ) तण्डुलकणान् विकिरति। जालं विस्तारयति।
    (सः) तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तारयति।
  7. (ज) व्याधः तण्डुलकणान् अवलोकते। भूमौ अवतरति।
    व्याधः तण्डुलकणान् अवलोक्य भूमौ अवतरति।
4. उदाहरणानुसारम् उपसर्गयोजनेन क्त्वा-स्थाने ल्यप्-प्रत्ययस्य प्रयोगं कृत्वा पदानि परिवर्तयत —

(पट्टिका: सम्, आ, उप, उत्, वि, प्र)  |  (क) छात्रः गृहं गत्वा भोजनं करोति। → छात्रः गृहम् आगत्य (आ + गम् + ल्यप्) भोजनं करोति। (उदाहरणम्)

  1. (ख) माता वस्त्राणि क्षालयित्वा पचति।
    माता वस्त्राणि प्रक्षाल्य (प्र + क्षल् + ल्यप्) पचति।
  2. (ग) शिक्षकः श्लोकं लिखित्वा पाठयति।
    शिक्षकः श्लोकं विलिख्य (वि + लिख् + ल्यप्) पाठयति।
  3. (घ) रमा स्थित्वा गीतं गायति।
    रमा उत्थाय (उत् + स्था + ल्यप्) गीतं गायति।
  4. (ङ) शिष्यः सर्वदा गुरुं नत्वा पठति।
    शिष्यः सर्वदा गुरुं प्रणम्य (प्र + नम् + ल्यप्) पठति।
  5. (च) लेखकः आलोचनं कृत्वा लिखति।
    लेखकः आलोच्य (आ + लोच् + ल्यप्) लिखति।
5. पाठे प्रयुक्तेन उपयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत —
  1. (क) सर्वैः ______ उड्डीयताम्।
    सर्वैः एकचित्तीभूय उड्डीयताम्।
  2. (ख) जालापहारकान् तान् ______ पश्चाद् अधावत्।
    जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चाद् अधावत्।
  3. (ग) अस्माकं मित्रं ______ नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति।
    अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति।
  4. (घ) हिरण्यकः कपोतानाम् ______ चकितस्तूष्णीं स्थितः।
    हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः।
  5. (ङ) यतोहि विपत्काले ______ एव कापुरुषलक्षणम्।
    यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्।
6. पाठे प्रयुक्तेन ल्यप्प्रत्ययान्तपदेन सह उपयुक्तं पदं योजयत —
  1. (क) विकीर्य
    तण्डुलकणान्
  2. (ख) विस्तीर्य
    जालम्
  3. (ग) अवतीर्य
    भूमौ
  4. (घ) अवलोक्य
    जालापहारकान्
  5. (ङ) एकचित्तीभूय
    उड्डीयताम्
  6. (च) प्रत्यभिज्ञाय
    तद्वचनम्
7. समासयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत —
  1. (क) गण्डक्याः तीरम्  = ______  |  तस्मिन् = ______
    गण्डकीतीरम्  |  गण्डकीतीरे (उदाहरणम्)
  2. (ख) तण्डुलानां कणाः = ______  |  तान् = ______
    तण्डुलकणाः  |  तण्डुलकणान्
  3. (ग) जालस्य अपहारकाः = ______  |  तान् = ______
    जालापहारकाः  |  जालापहारकान्
  4. (घ) अवपातात् भयम् = ______  |  तस्मात् = ______
    अवपातभयम्  |  अवपातभयात्
  5. (ङ) कापुरुषाणां लक्षणम् = ______  |  तस्मिन् = ______
    कापुरुषलक्षणम्  |  कापुरुषलक्षणे
8. सार्थकपदं ज्ञात्वा सन्धिविच्छेदं कुरुत —
  1. (क) इत्याकर्ण्य
    इति + आकर्ण्य (उदाहरणम्)
  2. (ख) चित्रग्रीवोऽवदत्
    चित्रग्रीवः + अवदत् (उदाहरणम्)
  3. (ग) बालकोऽत्र
    बालकः + अत्र
  4. (घ) धैर्यमथाभ्युदये
    धैर्यम् + अथ + अभ्युदये
  5. (ङ) भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्
    भोजने + अपि + अप्रवर्तनम्
  6. (च) नमस्ते
    नमः + ते
  7. (छ) उपायश्चिन्तनीयः
    उपायः + चिन्तनीयः
  8. (ज) व्याधस्तत्र
    व्याधः + तत्र
  9. (झ) हिरण्यकोऽप्याह
    हिरण्यकः + अपि + आह
  10. (ञ) मूषकराजो गण्डकीतीरे
    मूषकराजः + गण्डकी + तीरे (गण्डकीतीरे = गण्डक्याः तीरे)
  11. (ट) अतस्त्वाम्
    अतः + त्वाम्
  12. (ठ) कश्चित्
    कः + चित्

योग्यताविस्तर और परियोजना-कार्य

योग्यताविस्तरः (ग्रन्थ-परिचय): प्रस्तुत पाठ हितोपदेश ग्रन्थ के मित्रलाभ-प्रकरण से लिया गया है। इस ग्रन्थ के लेखक पण्डित नारायणशर्मा हैं। इसमें मूल्ययुक्त तथा नीतियुक्त वचनों, सुभाषितों और कथाओं का संग्रह है, इसलिए यह संस्कृत-साहित्य में अत्यन्त समादृत है। इसके चार प्रकरण हैं — (1) मित्रलाभ, (2) सुहृद्भेद, (3) विग्रह, (4) सन्धि। इसके अध्ययन से विद्यार्थी नीति-विद्या और संस्कृत भाषा दोनों में निपुण होता है।
परियोजनाकार्यम् 1. पाठात् अधोलिखितानां क्रियापदानां प्रयोगकौशलं ज्ञात्वा तत्समानानि अन्यानि वाक्यानि रचयत — (तिरस्कुर्वन्ति, क्रियताम्, निवसति, आह, छेत्स्यति, सम्भाषसे, अब्रवीत्, उपसर्पति, युज्यते)
  1. तिरस्कुर्वन्ति
    दुर्जनाः सज्जनं तिरस्कुर्वन्ति। (उदाहरणम्)
  2. क्रियताम्
    सर्वैः स्वकर्तव्यं समये क्रियताम्।
  3. निवसति
    मूषकः बिले निवसति।
  4. आह
    शिक्षकः आह — “सदा सत्यं वदत” इति।
  5. छेत्स्यति
    मूषकः जालस्य पाशान् दन्तैः छेत्स्यति।
  6. सम्भाषसे
    त्वं मित्रैः सह किमर्थं न सम्भाषसे?
  7. अब्रवीत्
    नायकः मित्राणि अब्रवीत् — “धैर्यं धारयत” इति।
  8. उपसर्पति
    हिरण्यकः चित्रग्रीवस्य समीपम् उपसर्पति।
  9. युज्यते
    गुरुजनानाम् आज्ञापालनं शिष्यस्य युज्यते।
परियोजनाकार्यम् 2. अनया कथया वयं स्वजीवने कां शिक्षां स्वीकर्तुं शक्नुमः इति अधिकृत्य कक्षायां परिचर्चां कुर्वन्तु।
  1. इस कथा से हम अपने जीवन में क्या शिक्षा ले सकते हैं?
    (1) संगठन में शक्ति है — छोटे-छोटे लोग/वस्तुएँ मिलकर बड़ा कार्य कर लेते हैं। (2) विपत्ति में घबराना नहीं चाहिए, धैर्य रखकर उपाय सोचना चाहिए। (3) बिना विचारे कोई कार्य नहीं करना चाहिए और अनुभवी बड़ों की सलाह माननी चाहिए। (4) नेता को अपने आश्रितों की रक्षा पहले करनी चाहिए। (5) सच्चे मित्र संकट में काम आते हैं। (6) संकट में दोष-दर्शन के बजाय समाधान खोजना चाहिए।

अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न

(अ) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)

  1. ‘अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ पाठ दीपकम् का कौन-सा पाठ है?
    • (क) प्रथम पाठ
    • (ख) द्वितीय पाठ ✓
    • (ग) तृतीय पाठ
    • (घ) चतुर्थ पाठ
  2. यह पाठ किस ग्रन्थ से लिया गया है?
    • (क) पञ्चतन्त्र
    • (ख) हितोपदेश ✓
    • (ग) महाभारत
    • (घ) रामायण
  3. हितोपदेश के किस प्रकरण से यह कथा ली गई है?
    • (क) मित्रलाभ ✓
    • (ख) सुहृद्भेद
    • (ग) विग्रह
    • (घ) सन्धि
  4. पाठ्यपुस्तक के अनुसार हितोपदेश के लेखक कौन हैं?
    • (क) कालिदास
    • (ख) भास
    • (ग) पण्डित नारायणशर्मा ✓
    • (घ) बाणभट्ट
  5. मित्र ग्रीष्मावकाश में किस प्रदेश की यात्रा पर गए?
    • (क) हिमाचल प्रदेश
    • (ख) उत्तराखण्ड ✓
    • (ग) कश्मीर
    • (घ) सिक्किम
  6. मित्र किस स्थान पर पहुँचे थे?
    • (क) हरिद्वार
    • (ख) ऋषिकेश
    • (ग) गौरीकुण्ड ✓
    • (घ) बद्रीनाथ
  7. सेतु (पुल) क्यों टूट गया?
    • (क) भूकम्प से
    • (ख) नदी के तीव्र जलवेग से ✓
    • (ग) आग लगने से
    • (घ) पुराना होने से
  8. संकट में सबको धैर्य किसने दिया?
    • (क) दिनेश ने
    • (ख) सुरेश ने
    • (ग) कपिल ने
    • (घ) नायक ने ✓
  9. “अस्माकं मृत्युः एव सन्निकटे अस्ति” — यह किसने कहा?
    • (क) नायक
    • (ख) दिनेश ✓
    • (ग) सुरेश
    • (घ) कपिल
  10. कथा में विशाल वृक्ष कौन-सा था?
    • (क) आम्रवृक्ष
    • (ख) वटवृक्ष
    • (ग) शाल्मलीतरु (सेमल) ✓
    • (घ) पीपल
  11. शाल्मली वृक्ष किस नदी के तट पर था?
    • (क) यमुना
    • (ख) गोदावरी ✓
    • (ग) गण्डकी
    • (घ) गङ्गा
  12. कबूतरों के राजा का नाम क्या था?
    • (क) हिरण्यक
    • (ख) चित्रग्रीव ✓
    • (ग) सुरेश
    • (घ) नायक
  13. चूहों के राजा का नाम क्या था?
    • (क) चित्रग्रीव
    • (ख) व्याध
    • (ग) हिरण्यक ✓
    • (घ) मूषकेश
  14. हिरण्यक कहाँ रहता था?
    • (क) गोदावरी-तट पर
    • (ख) गण्डकी-तट के चित्रवन में ✓
    • (ग) हिमालय की गुफा में
    • (घ) शाल्मली वृक्ष पर
  15. हिरण्यक अपना बिल कैसा बनाकर रहता था?
    • (क) एक द्वार वाला
    • (ख) दो द्वार वाला
    • (ग) शतद्वार (सौ द्वारों वाला) ✓
    • (घ) बिना द्वार का
  16. ‘सम्भूय’ का अर्थ है —
    • (क) अकेले
    • (ख) मिलकर ✓
    • (ग) दौड़कर
    • (घ) बैठकर
  17. ‘लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ का आशय है —
    • (क) छोटी वस्तुएँ व्यर्थ हैं
    • (ख) छोटी वस्तुओं का संगठन भी कार्य सिद्ध करता है ✓
    • (ग) केवल बड़ी वस्तुएँ काम आती हैं
    • (घ) अकेले काम करना श्रेष्ठ है
  18. ल्यप्-प्रत्यय किस प्रत्यय के स्थान पर आता है?
    • (क) तुमुन्
    • (ख) क्त्वा ✓
    • (ग) क्तवतु
    • (घ) शतृ
  19. ल्यप्-प्रत्यय में कौन-सा वर्ण शेष रहता है?
    • (क) ल
    • (ख) प
    • (ग) य ✓
    • (घ) ल्य
  20. ‘अवलोक्य’ का सही प्रकृति-प्रत्यय विभाग है —
    • (क) अव + लोक् + क्त्वा
    • (ख) अव + लोक् + ल्यप् ✓
    • (ग) अव + लोकय् + ल्यप्
    • (घ) अ + वलोक् + ल्यप्
  21. ‘आगत्य’ किसका ल्यबन्त रूप है?
    • (क) आ + नी + ल्यप्
    • (ख) आ + गम् + ल्यप् ✓
    • (ग) आ + स्था + ल्यप्
    • (घ) आ + कृ + ल्यप्
  22. ‘विकीर्य’ में धातु कौन-सी है?
    • (क) वि + कृ
    • (ख) वि + कॄ (विकिरति) ✓
    • (ग) वि + क्री
    • (घ) वि + कम्
  23. ‘कः + चित्’ की सन्धि होगी —
    • (क) कोचित्
    • (ख) कश्चित् ✓
    • (ग) कःचित्
    • (घ) कस्चित्
  24. ‘हिरण्यकः + नाम’ की सन्धि होगी —
    • (क) हिरण्यकःनाम
    • (ख) हिरण्यको नाम ✓
    • (ग) हिरण्यकनाम
    • (घ) हिरण्यकस्नाम
  25. ‘कुतः + अत्र’ की सन्धि होगी —
    • (क) कुतोत्र
    • (ख) कुतोऽत्र ✓
    • (ग) कुतःअत्र
    • (घ) कुतस्त्र

(ब) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. पाठ का नाम क्या है?
    अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।
  2. यह पाठ किस ग्रन्थ से संकलित है?
    हितोपदेश (मित्रलाभ-प्रकरण) से।
  3. मित्र देवभूमि के रूप में किस प्रदेश में गए?
    उत्तराखण्ड में।
  4. मित्र किस स्थान पर पहुँचे?
    गौरीकुण्ड नामक स्थान पर।
  5. उस समय कौन-सा काल था?
    वर्षारम्भकाल (वर्षा-ऋतु का आरम्भ)।
  6. सेतु क्यों टूट गया?
    नदी के तीव्र जलवेग से।
  7. संकट में सब क्या प्रार्थना कर रहे थे?
    “हे भगवन्! रक्ष अस्मान् रक्ष” — ईश्वर से रक्षा की प्रार्थना।
  8. नायक का विशेषण क्या था?
    सुधीरः (धैर्यवान् और बुद्धिमान्)।
  9. निराश होकर “मृत्यु निकट है” किसने कहा?
    दिनेश ने।
  10. शाल्मलीतरु कहाँ था?
    गोदावरी नदी के तट पर।
  11. व्याध ने क्या बिखेरा था?
    चावल के दाने (तण्डुलकण)।
  12. कबूतरों का राजा कौन था?
    चित्रग्रीव।
  13. सब कबूतर किसका तिरस्कार करने लगे?
    उस कबूतर का जिसकी बात मानकर वे भूमि पर उतरे थे।
  14. चित्रग्रीव के मित्र का नाम क्या है?
    हिरण्यक (मूषकराज)।
  15. हिरण्यक किससे पाश काटेगा?
    अपने दाँतों के बल से।
  16. चित्रग्रीव ने पहले किनके बन्धन काटने को कहा?
    अपने आश्रित कबूतरों के।
  17. पाठ का सूत्र-वाक्य (नीतिवचन) क्या है?
    लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।
  18. ‘भगीरथप्रयत्नैः’ का क्या अर्थ है?
    भगीरथ के समान कठिन और निरन्तर प्रयासों से।
  19. ल्यप् प्रत्यय में कौन-सा अंश शेष रहता है?
    केवल “य”।
  20. “सदसि वाक्पटुता” किसका लक्षण है?
    महात्माओं (सत्पुरुषों) का।

(स) लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. वर्षा शुरू होने पर मित्रों के सामने कौन-सी कठिनाइयाँ आईं?
    सहसा तेज़ वर्षा शुरू हुई, चारों ओर अँधेरा छा गया, नदी के तेज़ प्रवाह से पुल टूट गया और पर्वतस्खलन (भूस्खलन) हो गया। इस कारण सभी मित्र घबराकर रोने और ईश्वर से रक्षा की प्रार्थना करने लगे।
  2. नायक ने दिनेश को किस प्रकार समझाया?
    नायक ने कहा कि विषाद मत करो। जब वर्षा थम जाएगी और मौसम साफ़ होगा, तब हम सब मिलकर पुल तथा मार्ग बनाकर पुनः लक्ष्य की ओर चलेंगे।
  3. नायक ने असम्भव कार्य के बारे में क्या कहा?
    नायक ने कहा कि आत्मविश्वास के बल से और मिलकर काम करने से असम्भव लगने वाला कार्य भी अवश्य किया जा सकता है। इससे लक्ष्य की प्राप्ति और प्राणों की रक्षा दोनों होंगी।
  4. चावल के दाने देखकर कबूतर क्या करने लगे?
    कुछ कबूतर लोभ में आकर चावल के दाने खाने के लिए उतरने को तैयार हो गए। चित्रग्रीव के मना करने पर भी एक कबूतर ने उसकी बात की उपेक्षा की।
  5. चित्रग्रीव ने लोभी कबूतरों को क्या चेतावनी दी?
    चित्रग्रीव ने कहा कि इस निर्जन वन में चावल के दाने कैसे आ सकते हैं, यह सोचो। यहाँ कोई शिकारी हो सकता है, इसलिए बिना विचारे कोई काम नहीं करना चाहिए।
  6. अभिमानी कबूतर ने चित्रग्रीव की बात का क्या उत्तर दिया?
    उसने कहा कि बड़ों की बात विपत्ति आने पर ही माननी चाहिए; यदि हर जगह ऐसे ही विचार करते रहें तो भोजन करने में भी प्रवृत्ति नहीं होगी।
  7. जाल में फँसने पर चित्रग्रीव ने साथियों से क्या कहा?
    उसने कहा कि इस कबूतर का दोष नहीं है, आने वाली विपत्ति को कौन जान सकता है। संकट में दोष देने के बजाय कोई उपाय सोचना चाहिए, क्योंकि विपत्ति में घबराना कायरों का लक्षण है।
  8. सत्पुरुषों के स्वाभाविक लक्षण कौन-से हैं?
    महात्मा विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाक्-चातुर्य, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि तथा शास्त्र-श्रवण में लगाव रखते हैं। ये गुण उनके स्वभाव में ही होते हैं।
  9. कबूतर जाल लेकर कैसे उड़ पाए?
    चित्रग्रीव की सलाह पर सबने एकमन होकर, एक साथ जाल को उठाया और एक ही दिशा में उड़ गए। संगठित शक्ति से वे जाल सहित उड़ने में सफल हुए।
  10. व्याध को क्या करना पड़ा और क्यों?
    व्याध पहले जाल ले जाते हुए पक्षियों के पीछे दौड़ा, पर जब वे उसकी दृष्टि से ओझल हो गए तो वह निराश होकर लौट गया।
  11. हिरण्यक चकित होकर चुप क्यों रहा?
    हिरण्यक हर समय अनिष्ट की आशंका से सौ द्वारों वाले बिल में रहता था। कबूतरों के अचानक उतरने के भय से वह चकित होकर चुप रहा।
  12. हिरण्यक ने चित्रग्रीव की कौन-सी बात की प्रशंसा की?
    हिरण्यक ने कहा कि चित्रग्रीव ने पहले अपने आश्रितों के बन्धन कटवाने की बात कही। इस आश्रित-वात्सल्य के कारण वह तीनों लोकों का स्वामी बनने के योग्य है।
  13. बन्धन-मुक्त होकर कबूतरों ने चित्रग्रीव की प्रशंसा कैसे की?
    उन्होंने कहा कि आपकी नीति-शिक्षा और नायक-धर्म के कारण हम सब सुरक्षित हो गए हैं, इसलिए हम धन्य हैं।
  14. कथा सुनाकर नायक ने मित्रों को क्या प्रेरणा दी?
    नायक ने कहा कि जब आपदा में फँसे कबूतर बुद्धि और संगठन-शक्ति से अपनी रक्षा कर सकते हैं तो हम भी संगठित होकर आत्मरक्षा कर सकते हैं।
  15. सेतु निर्माण से क्या लाभ हुआ?
    मित्रों के सेतु-निर्माण से उनके अपने प्राण भी बचे और अन्य लोगों के प्राणों की भी रक्षा हुई।
  16. ल्यप् प्रत्यय कब प्रयुक्त होता है?
    जब पूर्वकालिक क्रिया की धातु से पहले कोई उपसर्ग या उपसर्ग-जैसा पद हो, तब क्त्वा के स्थान पर ल्यप् प्रत्यय आता है। इसमें केवल “य” शेष रहता है।
  17. ल्यप्-प्रत्यय के तीन उदाहरण उपसर्ग-विभाग के साथ लिखिए।
    आ + गम् + ल्यप् = आगत्य; अव + लोक् + ल्यप् = अवलोक्य; वि + लिख् + ल्यप् = विलिख्य।
  18. ‘कः + चित्’ और ‘चकितः + तूष्णीम्’ की सन्धि करके नियम बताइए।
    कः + चित् = कश्चित् (विसर्ग के बाद च/छ हो तो विसर्ग का श्); चकितः + तूष्णीम् = चकितस्तूष्णीम् (विसर्ग के बाद त/थ हो तो विसर्ग का स्)।
  19. ‘हिरण्यकः + नाम’ तथा ‘कुतः + अत्र’ में सन्धि-नियम में क्या अन्तर है?
    हिरण्यकः + नाम = हिरण्यको नाम — अः के बाद वर्ग का तृतीय/चतुर्थ/पञ्चम वर्ण या य, र, ल, व, ह हो तो “अः” का “ओ”। कुतः + अत्र = कुतोऽत्र — अः के बाद अ हो तो “ओ” होकर अ का लोप (ऽ) हो जाता है।
  20. ‘अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ श्लोक का भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए।
    छोटी और कमज़ोर वस्तुएँ भी जब संगठित हो जाती हैं तो बड़ा काम कर देती हैं। जैसे घास के तिनकों से बनी मोटी रस्सी से मदमस्त हाथी को भी बाँध लिया जाता है।

(द) महत्वपूर्ण प्रश्न

  1. “अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका” पाठ की कथा (चित्रग्रीव और हिरण्यक की कथा) अपने शब्दों में लिखिए।
    गोदावरी-तट पर एक विशाल शाल्मली वृक्ष था, जहाँ पक्षी रहते थे। एक शिकारी ने चावल के दाने बिखेरकर जाल फैलाया। कबूतरों के राजा चित्रग्रीव ने निर्जन वन में दाने देखकर साथियों को सावधान किया, पर एक कबूतर ने अभिमान से उसकी बात न मानी। सब कबूतर उतरे और जाल में फँस गए। चित्रग्रीव ने किसी को दोष दिए बिना धैर्य रखने और एकसाथ मिलकर जाल सहित उड़ जाने की सलाह दी। सब उड़ गए और शिकारी निराश लौट गया। फिर वे गण्डकी-तट पर अपने मित्र चूहे हिरण्यक के पास पहुँचे। हिरण्यक ने चित्रग्रीव के कहने पर पहले आश्रित कबूतरों के और फिर चित्रग्रीव के बन्धन काटे। सब सुरक्षित हुए।
  2. इस पाठ का मूल सन्देश क्या है? संवाद तथा कथा दोनों के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
    पाठ का मूल सन्देश है — संगठन में शक्ति है। संवाद-भाग में जब मित्र केदारक्षेत्र में संकट में फँसते हैं तो नायक धैर्य और आत्मविश्वास से सबको प्रेरित करता है। कथा-भाग में कबूतर संगठित होकर जाल सहित उड़ जाते हैं। दोनों प्रसंगों में विपत्ति से बचाव का उपाय धैर्य, बुद्धि और एकता ही है। अकेला व्यक्ति कमज़ोर हो सकता है, पर समूह में मिलकर असम्भव भी सम्भव हो जाता है।
  3. चित्रग्रीव के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
    चित्रग्रीव कुशल नेता है। वह दूरदर्शी है, इसीलिए निर्जन वन में दाने देखकर सन्देह करता है और अविचारित कर्म से रोकता है। संकट आने पर वह घबराता नहीं, धैर्य रखता है और किसी को दोष नहीं देता। वह संगठन की शक्ति पहचानकर सबको जाल सहित उड़ने की सलाह देता है। वह आश्रितों के प्रति वात्सल्य रखता है और स्वयं से पहले उनके बन्धन कटवाता है। इसीलिए हिरण्यक उसे त्रैलोक्य का स्वामी बनने के योग्य कहता है।
  4. पाठ के अनुसार सत्पुरुषों और कापुरुषों (कायरों) के लक्षणों में क्या अन्तर है?
    पाठ में कहा गया है कि विपत्ति में विस्मय अर्थात् घबरा जाना कापुरुषों का लक्षण है। इसके विपरीत सत्पुरुष विपत्ति में धैर्य रखते हैं, समृद्धि में क्षमा रखते हैं, सभा में वाक्-पटुता, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि और शास्त्र-श्रवण में लगाव रखते हैं। ये गुण उनके स्वभाव से ही सिद्ध होते हैं।
  5. हिरण्यक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
    हिरण्यक चूहों का राजा है, जो सतर्क स्वभाव का है और अनिष्ट की आशंका से सौ द्वारों वाला बिल बनाकर रहता है। वह अपने मित्र चित्रग्रीव की आवाज़ पहचानते ही प्रसन्न होकर बाहर आता है। बन्धन में फँसे मित्रों को देखकर वह विस्मय और करुणा से भर जाता है। वह मित्र का दुःख दूर करने के लिए तुरन्त तत्पर होता है। चित्रग्रीव की आश्रित-वत्सलता से प्रभावित होकर वह उसकी सराहना करता है।
  6. नायक की भूमिका पाठ के संवाद-भाग में कैसी है?
    नायक धैर्यशील, आत्मविश्वासी और प्रेरक नेता है। सब मित्रों के घबराने पर वह उन्हें सान्त्वना देता है, विषाद न करने को कहता है, मिलकर सेतु बनाने की योजना बताता है और हितोपदेश की कथा सुनाकर उन्हें संगठन की शक्ति का बोध कराता है। उसकी प्रेरणा से सब भय छोड़कर कार्य में जुट जाते हैं।
  7. ल्यप्-प्रत्यय का नियम उदाहरण सहित समझाइए।
    जब एक क्रिया के बाद दूसरी क्रिया होती है तो पहली क्रिया में क्त्वा प्रत्यय लगता है (जैसे: गत्वा, पठित्वा)। यदि धातु से पहले उपसर्ग हो तो क्त्वा के स्थान पर ल्यप् होता है, जिसमें केवल “य” बचता है। जैसे: आ + गम् + ल्यप् = आगत्य; प्र + नम् + ल्यप् = प्रणम्य; वि + लिख् + ल्यप् = विलिख्य। ह्रस्व स्वर के बाद ल्यप् जुड़ने पर “त्” का आगम होता है, जैसे उप + कृ = उपकृत्य। इन पदों के रूप नहीं चलते, ये अव्यय होते हैं।
  8. विसर्ग-सन्धि के चारों नियम उदाहरण सहित लिखिए।
    (1) विसर्ग के बाद च/छ हो तो विसर्ग का श् — कः + चित् = कश्चित्। (2) विसर्ग के बाद त/थ हो तो विसर्ग का स् — नीतिः + तावत् = नीतिस्तावत्। (3) अः के बाद वर्ग का 3/4/5 वर्ण या ह य व र ल हो तो अः का ओ — हिरण्यकः + नाम = हिरण्यको नाम। (4) अः के बाद अ हो तो अः का ओ और अ का लोप (ऽ) — कुतः + अत्र = कुतोऽत्र।
  9. “भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा…” — इस वाक्य के आधार पर बताइए कि मित्रों ने सेतु-निर्माण में सफलता कैसे पाई?
    कथा सुनने से मित्रों में साहस, आत्मविश्वास और एकता का भाव जागा। भय, शोक और सन्देह छोड़कर सबने मिलकर काम किया। भगीरथ के समान अथक और निरन्तर प्रयत्नों से उन्होंने पुल बना लिया। इससे अपने प्राण भी बचे और दूसरों के भी।
  10. इस पाठ से आपने कौन-कौन-सी जीवन-शिक्षाएँ ग्रहण कीं?
    पाठ से हमें ये शिक्षाएँ मिलती हैं — संगठित होकर कार्य करना; विपत्ति में धैर्य रखना; बिना विचारे कार्य न करना; अनुभवी बड़ों की सलाह मानना; संकट में दोष-दर्शन के बजाय समाधान ढूँढना; आश्रितों की रक्षा को प्राथमिकता देना; और सच्चे मित्र का महत्व समझना।

माइंड मैप

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका

स्रोत

  • हितोपदेश
  • मित्रलाभ-प्रकरण
  • लेखक: नारायणशर्मा

संवाद-भाग

  • उत्तराखण्ड यात्रा
  • वर्षा व पर्वतस्खलन
  • नायक का धैर्य

कथा-भाग

  • शाल्मलीतरु, गोदावरी-तट
  • चित्रग्रीव व कपोत
  • व्याध का जाल
  • हिरण्यक मूषक

सन्देश

  • संगठन में शक्ति
  • धैर्य व विवेक
  • आश्रित-वात्सल्य

व्याकरण

  • ल्यप्-प्रत्यय
  • विसर्गसन्धि (4 नियम)
  • समास व सन्धिविच्छेद

अभ्यास

  • 25 MCQ
  • 20 अति लघु
  • 20 लघु
  • 10 महत्वपूर्ण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ पाठ किस पुस्तक व कक्षा का है?

यह कक्षा 8 की एनसीईआरटी संस्कृत पाठ्यपुस्तक ‘दीपकम्’ का द्वितीय पाठ है।

यह पाठ किस ग्रन्थ से लिया गया है?

यह पाठ हितोपदेश ग्रन्थ के मित्रलाभ-प्रकरण से लिया गया है।

पाठ की कथा में मुख्य पात्र कौन-कौन हैं?

कबूतरों का राजा चित्रग्रीव, चूहों का राजा हिरण्यक, शिकारी (व्याध) और लोभी कबूतर। प्रस्तावना-संवाद में नायक, दिनेश, सुरेश और कपिल मित्र हैं।

पाठ का मुख्य सन्देश क्या है?

संगठन में शक्ति है। विपत्ति में धैर्य रखकर, बुद्धि और एकता से काम लेने पर असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाता है।

ल्यप् और क्त्वा प्रत्यय में क्या अन्तर है?

दोनों पूर्वकालिक क्रिया (“करके”) के लिए प्रयुक्त होते हैं। जब धातु से पहले उपसर्ग न हो तो क्त्वा (जैसे गत्वा) और उपसर्ग हो तो ल्यप् (जैसे आगत्य) लगता है।

परीक्षा की दृष्टि से इस पाठ के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु कौन-से हैं?

कथा का क्रम व पात्र-चरित्र, श्लोक 1 व 2 का भावार्थ, ‘अल्पानामपि…’ सूत्र-वाक्य, शब्दार्थ, ल्यप्-प्रत्यय (प्रकृति-प्रत्यय विभाग सहित), विसर्गसन्धि के चार नियम तथा अभ्यास के सन्धि-विच्छेद और समास वाले प्रश्न।

🔗 कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् — सभी पाठ आपस में जुड़े हुए

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