पर्वत प्रदेश में पावस (सुमित्रानंदन पंत) कक्षा 10 हिंदी स्पर्श — पात्र-चार्ट, व्याख्या, प्रश्नोत्तर और MCQ
पर्वत प्रदेश में पावस (सुमित्रानंदन पंत) — कक्षा 10 हिंदी स्पर्श: पात्र-चार्ट, व्याख्या, प्रश्नोत्तर और MCQ
कक्षा 10 हिंदी (स्पर्श भाग-2) की कविता 'पर्वत प्रदेश में पावस' की संपूर्ण अध्ययन सामग्री — कवि परिचय, कविता का सार, प्रकृति के मानवीकृत पात्रों का चार्ट, अंश-वार सरल व्याख्या, NCERT प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, 20 वस्तुनिष्ठ, 20 लघु-उत्तरीय, 10 दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न तथा परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न।
1. पाठ परिचय
'पर्वत प्रदेश में पावस' प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत की कविता है। 'पावस' का अर्थ है वर्षा ऋतु। कविता में वर्षा ऋतु में पहाड़ी प्रदेश की प्रकृति के पल-पल बदलते रूप का अत्यंत सजीव चित्र है — कभी विशाल पर्वत तालाब के दर्पण में अपना रूप निहारता है, कभी झरने गौरव-गान करते हैं, कभी बादलों में पूरा पर्वत ओझल हो जाता है और लगता है मानो इंद्र जादू का खेल दिखा रहे हों। कविता पढ़कर लगता है जैसे हम कक्षा में बैठे-बैठे पहाड़ों की सैर कर आए हों।
कवि परिचय — सुमित्रानंदन पंत (1900–1977)
सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 को उत्तराखंड के कौसानी-अल्मोड़ा में हुआ। बचपन से ही कविता लिखने लगे; सात वर्ष की उम्र में स्कूल में काव्य-पाठ के लिए पुरस्कृत हुए। 1915 से स्थायी रूप से साहित्य-सृजन शुरू किया और छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने गए। आरंभिक कविताओं में प्रकृति-प्रेम और रहस्यवाद, बाद में मार्क्स और गांधी के विचारों का प्रभाव, और फिर अरविंद दर्शन का प्रभाव दिखता है। वे उदयशंकर संस्कृति केंद्र से जुड़े, आकाशवाणी के परामर्शदाता रहे और लोकायतन संस्था की स्थापना की। 1961 में पद्मभूषण मिला। वे हिंदी के पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता हैं (1969, चिदंबरा)। 'कला और बूढ़ा चाँद' पर 1960 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। 28 दिसंबर 1977 को निधन हुआ।
प्रमुख कृतियाँ — वीणा, पल्लव, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्णकिरण, लोकायतन, चिदंबरा, कला और बूढ़ा चाँद।
निराला का कथन — पंत जी का सबसे बड़ा कौशल यह है कि वे शेली (Shelley) की तरह अपने विषय को अनेक उपमाओं से सँवारकर मधुर से मधुर और कोमल से कोमल बना देते हैं।
कविता का सार
- वर्षा ऋतु है, पर्वतीय प्रदेश है और प्रकृति पल-पल अपना रूप बदल रही है।
- करधनी (मेखला) के आकार का विशाल पर्वत अपने हज़ारों फूल रूपी नेत्र खोलकर नीचे फैले दर्पण-से तालाब में बार-बार अपना विशाल रूप निहार रहा है।
- मोती की लड़ियों जैसे सुंदर, झाग भरे झरने पर्वत का गौरव गाते हुए झर-झर बह रहे हैं; उनकी ध्वनि नस-नस में उत्तेजना भर देती है।
- पर्वत के हृदय से उठे ऊँचे पेड़ ऊँचा उठने की कामना लिए शांत आकाश की ओर एकटक, अटल, कुछ चिंतित-से झाँक रहे हैं।
- अचानक पर्वत मानो पारे जैसे चमकीले पंख फड़फड़ाकर उड़ गया — बादलों में छिप गया; केवल झरनों का शोर बचा। लगता है आकाश धरती पर टूट पड़ा है।
- डर के मारे शाल के पेड़ धरती में धँस गए-से लगते हैं, तालाब से धुआँ उठ रहा है मानो वह जल गया हो — इस तरह बादल रूपी विमान में घूमते इंद्र इंद्रजाल (जादू) का खेल दिखा रहे थे।
2. पात्रों का चार्ट
इस कविता में कोई मानव पात्र नहीं है — कवि ने प्रकृति के तत्त्वों का मानवीकरण किया है। वही इस कविता के 'पात्र' हैं।
| पात्र | परिचय | विशेषताएँ / भूमिका |
|---|---|---|
| पर्वत (भूधर) | मेखलाकार, अपार, महाकार | अपने रूप पर मुग्ध — फूल रूपी हज़ारों आँखों से तालाब-दर्पण में स्वयं को निहारता है; अंत में पंख फड़फड़ाकर उड़ जाता है (बादलों में छिप जाता है) |
| ताल (तालाब) | पर्वत के चरणों में पला | दर्पण-सा विशाल; बादलों के धुएँ से लगता है जैसे जल गया हो |
| निर्झर (झरने) | मोती की लड़ियों जैसे, झाग भरे | पर्वत का गौरव-गान करने वाले; अंत में केवल इनकी ध्वनि (रव) शेष रहती है |
| तरुवर (ऊँचे वृक्ष) | पर्वत के उर से उठे | उच्चाकांक्षी, एकटक, अटल, कुछ चिंतित — मनुष्य की ऊँचा उठने की इच्छा के प्रतीक |
| शाल के वृक्ष | विशाल पेड़ | भयभीत होकर धरती में धँसे-से लगते हैं |
| बादल (जलद) | इंद्र का विमान | पूरे दृश्य को ढककर बदल देने वाले |
| इंद्र | वर्षा के देवता | जलद-यान में घूमते हुए इंद्रजाल (जादू) दिखाते हैं |
3. पात्रों से जुड़ी घटनाएँ
| पात्र | घटना / प्रसंग | इससे पता चलता है |
|---|---|---|
| पर्वत | फूल रूपी नेत्रों से तालाब में अपना प्रतिबिंब बार-बार देखना | आत्ममुग्धता; पानी में पहाड़ का प्रतिबिंब |
| झरने | गौरव-गान करते हुए झर-झर बहना | पर्वत की महिमा और वर्षा में उमड़ता जल |
| तरुवर | शांत आकाश की ओर एकटक, चिंतित होकर देखना | ऊँचा उठने की आकांक्षा और उसकी चिंता |
| पर्वत / बादल | पर्वत का अचानक पारद-पंख फड़फड़ाकर उड़ जाना | घने बादलों का पहाड़ को ढक लेना |
| आकाश | धरती पर टूट पड़ना | मूसलाधार वर्षा, बादलों का धरती तक उतर आना |
| शाल / ताल | शाल का धँसना, ताल से धुआँ उठना | घने कोहरे-बादल में पेड़ों का ओझल होना; तालाब से उठता कुहासा |
| इंद्र | जलद-यान में घूमकर इंद्रजाल खेलना | प्रकृति का पल-पल बदलता रूप जादू जैसा लगता है |
4. पाठ की मुख्य बातें
- विधा — कविता (प्रकृति-चित्रण); पुस्तक — स्पर्श भाग-2
- पावस — वर्षा ऋतु
- मेखलाकार — करधनी के आकार की पहाड़ की ढाल — पहाड़ गोलाई में फैला हुआ
- सहस्र दृग-सुमन — हज़ारों फूल रूपी आँखें — पहाड़ पर खिले असंख्य फूल
- दर्पण — पर्वत के चरणों में फैला तालाब, जिसमें पर्वत का प्रतिबिंब दिखता है
- पारद के पर — पारे के समान धवल और चमकीले पंख — सफ़ेद चमकीले बादल
- प्रमुख अलंकार — मानवीकरण (पूरी कविता में), उपमा (दर्पण-सा, मोती की लड़ियों-से), अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश (पल-पल, झर-झर, उठ-उठ, विचर-विचर), अतिशयोक्ति (टूट पड़ा भू पर अंबर)
- विशेषता — चित्रात्मक / बिंबात्मक भाषा, तत्सम शब्दावली, संगीतात्मकता — छायावादी शैली
5. पाठ की व्याख्या
अंश 1 — पल-पल बदलता प्रकृति-वेश
कवि कहता है कि वर्षा ऋतु थी और कवि पर्वतीय प्रदेश में था। वहाँ प्रकृति क्षण-क्षण में अपना वेश (रूप) बदल रही थी — कभी धूप, कभी बादल, कभी वर्षा, कभी कोहरा।
अंश 2 — दर्पण में अपना रूप देखता पर्वत
करधनी की तरह गोलाई में फैला विशाल पर्वत, अपने ऊपर खिले हज़ारों फूलों को आँखें बनाकर, नीचे जल में बार-बार अपना विशाल रूप निहार रहा है। पर्वत के चरणों में पला हुआ तालाब दर्पण की तरह दूर तक फैला है। लगता है मानो पर्वत अपने सौंदर्य पर मुग्ध होकर आईने में स्वयं को देख रहा हो।
विशेष — पर्वत का मानवीकरण; 'दृग-सुमन' में रूपक; 'दर्पण-सा' में उपमा; 'बार-बार' में पुनरुक्ति प्रकाश।
अंश 3 — गौरव-गान करते झरने और ऊँचे तरुवर
पर्वत से गिरते झाग भरे झरने ऐसे लगते हैं जैसे पर्वत का गौरव गा रहे हों; उनकी झर-झर ध्वनि सुनने वाले की नस-नस में मस्ती और उत्तेजना भर देती है। वे मोतियों की लड़ियों जैसे सुंदर दिखते हैं। पर्वत के हृदय से उठे ऊँचे-ऊँचे वृक्ष ऐसे लगते हैं जैसे ऊँचा उठने की आकांक्षा लिए शांत आकाश की ओर एकटक, अटल होकर और कुछ चिंतित भाव से देख रहे हों।
विशेष — झरनों और वृक्षों का मानवीकरण; 'मोती की लड़ियों-से' में उपमा; 'झर-झर', 'उठ-उठ' में पुनरुक्ति प्रकाश; वृक्ष मनुष्य की महत्त्वाकांक्षा के प्रतीक।
अंश 4 — उड़ गया भूधर, टूट पड़ा अंबर
अचानक घने सफ़ेद बादल छा गए और पूरा पर्वत दिखना बंद हो गया — कवि को लगता है मानो पर्वत पारे जैसे चमकीले पंख फड़फड़ाकर उड़ गया हो। अब केवल झरनों की आवाज़ बची है। बादल इतने नीचे उतर आए और ऐसी मूसलाधार वर्षा होने लगी कि लगता है आकाश ही धरती पर टूट पड़ा है।
विशेष — 'पारद के पर' — बादलों के लिए सुंदर बिंब; 'टूट पड़ा भू पर अंबर' — अतिशयोक्ति; 'रव-शेष' — निस्तब्धता में केवल ध्वनि।
अंश 5 — इंद्र का इंद्रजाल
घने कोहरे में शाल के ऊँचे पेड़ ओझल हो गए — लगता है मानो डरकर धरती में धँस गए हों। तालाब से कुहासा (धुआँ-सा) उठ रहा है, जैसे तालाब में आग लग गई हो। इस प्रकार बादल रूपी विमान में घूमते हुए वर्षा के देवता इंद्र मानो जादू का खेल दिखा रहे थे — पल भर में सब कुछ बदल जाता था।
विशेष — 'जलद-यान' में रूपक; 'इंद्र खेलता इंद्रजाल' — यमक-सा चमत्कार व मानवीकरण; 'विचर-विचर' में पुनरुक्ति प्रकाश; 'सभय शाल' में मानवीकरण।
6. प्रश्न-अभ्यास (NCERT)
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर
1. पावस ऋतु में प्रकृति में कौन-कौन से परिवर्तन आते हैं? कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
पावस ऋतु में प्रकृति पल-पल रूप बदलती है — कभी धूप में पर्वत तालाब में अपना प्रतिबिंब देखता है, फूल खिल उठते हैं, झरने झाग भरकर झर-झर बहने लगते हैं, ऊँचे पेड़ आकाश की ओर देखते लगते हैं; फिर अचानक घने बादल छा जाते हैं, पर्वत ओझल हो जाता है, केवल झरनों का स्वर रह जाता है, मूसलाधार वर्षा होती है, शाल के पेड़ कोहरे में छिप जाते हैं और तालाब से कुहासा उठने लगता है।
2. 'मेखलाकार' शब्द का क्या अर्थ है? कवि ने इस शब्द का प्रयोग यहाँ क्यों किया है?
'मेखलाकार' का अर्थ है करधनी (कमर में पहनने वाले गोल आभूषण) के आकार का। कवि ने यह शब्द पर्वत की उस ढाल के लिए किया है जो गोलाई में दूर तक फैली हुई है — जैसे पर्वत ने पूरी धरती को करधनी की तरह घेर रखा हो। इससे पर्वत की विशालता और सुंदरता प्रकट होती है।
3. 'सहस्र दृग-सुमन' से क्या तात्पर्य है? कवि ने इस पद का प्रयोग किसके लिए किया होगा?
'सहस्र दृग-सुमन' का अर्थ है — हज़ारों फूल रूपी आँखें। कवि ने यह पद पर्वत पर खिले असंख्य फूलों के लिए किया है, जिन्हें वह पर्वत की आँखें मानता है जिनसे पर्वत नीचे तालाब में अपना रूप निहार रहा है।
4. कवि ने तालाब की समानता किसके साथ दिखाई है और क्यों?
कवि ने तालाब की समानता दर्पण (आईने) से की है, क्योंकि तालाब का जल स्वच्छ और शांत है और उसमें पर्वत, फूलों और पेड़ों का प्रतिबिंब आईने की तरह साफ़ दिखाई देता है। तालाब विशाल दर्पण-सा फैला है जिसमें पर्वत अपना रूप देखता है।
5. पर्वत के हृदय से उठकर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर क्यों देख रहे थे और वे किस बात को प्रतिबिंबित करते हैं?
ऊँचे वृक्ष मानो ऊँचा उठने की कामना से शांत आकाश की ओर एकटक, अटल और कुछ चिंतित होकर देख रहे थे, जैसे वे और ऊपर पहुँचना चाहते हों। वे मनुष्य की महत्त्वाकांक्षा (उच्चाकांक्षा) और उसके साथ जुड़ी चिंता को प्रतिबिंबित करते हैं।
6. शाल के वृक्ष भयभीत होकर धरती में क्यों धँस गए?
घने बादलों और कोहरे के छा जाने तथा मूसलाधार वर्षा से ऐसा लगा मानो आकाश धरती पर टूट पड़ा हो। इस दृश्य से डरकर शाल के वृक्ष मानो धरती में धँस गए — वास्तव में कोहरे में वे दिखाई देना बंद हो गए, इसलिए कवि ने यह कल्पना की।
7. झरने किसके गौरव का गान कर रहे हैं? बहते हुए झरने की तुलना किससे की गई है?
झरने पर्वत (गिरि) के गौरव का गान कर रहे हैं। बहते हुए झाग भरे झरनों की तुलना मोती की लड़ियों से की गई है।
(ख) भाव स्पष्ट कीजिए
1. 'है टूट पड़ा भू पर अंबर' — भाव स्पष्ट कीजिए।
घने बादल धरती तक उतर आए और इतनी मूसलाधार वर्षा होने लगी कि ऐसा लगा मानो पूरा आकाश ही धरती पर टूटकर गिर पड़ा हो। यहाँ वर्षा की तीव्रता का अतिशयोक्तिपूर्ण चित्रण है।
2. जलद-यान और इंद्रजाल वाले अंश का भाव स्पष्ट कीजिए।
प्रकृति के पल-पल बदलते रूप — पर्वत का छिप जाना, पेड़ों का ओझल होना, तालाब से धुआँ उठना — को देखकर कवि को लगता है कि वर्षा के देवता इंद्र बादल रूपी विमान में घूमते हुए जादू का खेल दिखा रहे हैं।
3. तरुवरों के आकाश की ओर झाँकने वाले अंश का भाव स्पष्ट कीजिए।
पर्वत के हृदय से उगे ऊँचे पेड़ ऐसे लगते हैं मानो ऊँचा उठने की महत्त्वाकांक्षा लिए शांत आकाश की ओर बिना पलक झपकाए, स्थिर होकर और कुछ चिंतित भाव से देख रहे हों — यह मनुष्य की ऊँचाइयाँ छूने की इच्छा का प्रतीक है।
कविता का सौंदर्य
1. इस कविता में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किस प्रकार किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
कवि ने प्रकृति के निर्जीव तत्त्वों पर मानवीय क्रियाओं का आरोप किया है — पर्वत फूल रूपी आँखों से दर्पण में अपना रूप देखता है; झरने गौरव-गान करते हैं; पेड़ उच्चाकांक्षा से चिंतित होकर आकाश की ओर झाँकते हैं; पर्वत पंख फड़फड़ाकर उड़ जाता है; शाल डरकर धरती में धँस जाते हैं; इंद्र जादू का खेल खेलते हैं। इस प्रकार पूरी कविता में मानवीकरण है।
2. आपकी दृष्टि में इस कविता का सौंदर्य किस पर निर्भर करता है — (क) शब्दों की आवृत्ति (ख) शब्दों की चित्रमयी भाषा (ग) संगीतात्मकता?
मेरी दृष्टि में इस कविता का सौंदर्य मुख्य रूप से शब्दों की चित्रमयी भाषा पर निर्भर है। कविता पढ़ते समय पर्वत, तालाब, झरने, पेड़, बादल और कोहरे के दृश्य आँखों के सामने साकार हो उठते हैं। साथ ही शब्दों की आवृत्ति (पल-पल, झर-झर) और संगीतात्मकता भी सौंदर्य बढ़ाती है।
3. कवि ने चित्रात्मक शैली का प्रयोग करते हुए पावस ऋतु का सजीव चित्र अंकित किया है। ऐसे स्थलों को छाँटकर लिखिए।
(1) करधनी के आकार का पर्वत फूल रूपी आँखों से नीचे तालाब-दर्पण में अपना रूप देखता हुआ। (2) मोती की लड़ियों-से झाग भरे झरने झर-झर बहते हुए। (3) ऊँचे पेड़ शांत आकाश की ओर एकटक झाँकते हुए। (4) पारे जैसे चमकीले पंख फड़फड़ाकर पर्वत का उड़ जाना। (5) शाल का धरती में धँसना और तालाब से धुआँ उठना।
7. अतिरिक्त प्रश्न — 20 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
- 'पर्वत प्रदेश में पावस' के कवि हैं— (क) सुमित्रानंदन पंत (ख) महादेवी वर्मा (ग) निराला (घ) जयशंकर प्रसाद
- 'पावस' का अर्थ है— (क) शीत ऋतु (ख) वर्षा ऋतु (ग) ग्रीष्म ऋतु (घ) वसंत ऋतु
- पंत जी का जन्म कहाँ हुआ? (क) कौसानी (अल्मोड़ा) (ख) चिरगाँव (ग) काशी (घ) प्रयाग
- पंत जी किस काव्यधारा के प्रमुख स्तंभ हैं? (क) प्रगतिवाद (ख) छायावाद (ग) प्रयोगवाद (घ) रीतिवाद
- पंत जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार किस कृति पर मिला? (क) पल्लव (ख) चिदंबरा (ग) वीणा (घ) ग्राम्या
- 'मेखलाकार' का अर्थ है— (क) करधनी के आकार का (ख) मेघ के आकार का (ग) गोल पत्थर (घ) ऊँचा
- 'सहस्र दृग-सुमन' से तात्पर्य है— (क) हज़ारों फूल रूपी आँखें (ख) हज़ारों पेड़ (ग) हज़ारों झरने (घ) हज़ारों बादल
- कवि ने तालाब की तुलना किससे की है? (क) आकाश (ख) दर्पण (ग) मोती (घ) चाँदी
- झरने किसका गौरव गा रहे हैं? (क) आकाश का (ख) गिरि (पर्वत) का (ग) इंद्र का (घ) वृक्षों का
- झरनों की तुलना किससे की गई है? (क) मोती की लड़ियों से (ख) चाँदी की थाली से (ग) दूध से (घ) बादलों से
- ऊँचे वृक्ष किस ओर झाँक रहे हैं? (क) तालाब की ओर (ख) नीरव नभ की ओर (ग) झरनों की ओर (घ) धरती की ओर
- 'पारद के पर' का अर्थ है— (क) पारे जैसे चमकीले पंख (ख) पीले पंख (ग) टूटे पंख (घ) कागज़ के पंख
- 'रव-शेष' का अर्थ है— (क) केवल आवाज़ का रह जाना (ख) सब समाप्त (ग) शोर का बढ़ना (घ) शांति
- भयभीत होकर कौन-से वृक्ष धरती में धँस गए? (क) देवदार (ख) शाल (ग) चीड़ (घ) बाँज
- तालाब के विषय में कवि ने क्या कल्पना की? (क) सूख गया (ख) जल गया (धुआँ उठ रहा है) (ग) जम गया (घ) भर गया
- 'जलद-यान' का अर्थ है— (क) बादल रूपी विमान (ख) जल का जहाज़ (ग) नाव (घ) बादल का घर
- 'इंद्रजाल' का अर्थ है— (क) इंद्र का जाल (ख) जादूगरी (ग) इंद्रधनुष (घ) वर्षा
- कविता में प्रमुख रूप से कौन-सा अलंकार है? (क) यमक (ख) मानवीकरण (ग) श्लेष (घ) वक्रोक्ति
- 'है टूट पड़ा भू पर अंबर' में कौन-सा अलंकार है? (क) अतिशयोक्ति (ख) उपमा (ग) यमक (घ) श्लेष
- पंत जी की कृति नहीं है— (क) वीणा (ख) पल्लव (ग) युगवाणी (घ) यशोधरा
उत्तर — 1-क, 2-ख, 3-क, 4-ख, 5-ख, 6-क, 7-क, 8-ख, 9-ख, 10-क, 11-ख, 12-क, 13-क, 14-ख, 15-ख, 16-क, 17-ख, 18-ख, 19-क, 20-घ
8. अतिरिक्त प्रश्न — 20 लघु-उत्तरीय प्रश्न
1. 'प्रकृति-वेश' के पल-पल परिवर्तित होने से क्या तात्पर्य है?
वर्षा में पहाड़ों पर क्षण-क्षण में धूप, बादल, वर्षा, कोहरा बदलते रहते हैं।
2. पर्वत को 'अपार' क्यों कहा गया है?
क्योंकि वह बहुत विशाल है और दूर-दूर तक फैला हुआ है।
3. पर्वत बार-बार क्या अवलोक रहा है?
नीचे तालाब के जल में अपना विशाल प्रतिबिंब।
4. तालाब को 'पर्वत के चरणों में पला' क्यों कहा गया?
क्योंकि तालाब पर्वत की तलहटी में स्थित है।
5. झरनों की ध्वनि का क्या प्रभाव पड़ता है?
वह सुनने वालों की नस-नस में मस्ती और उत्तेजना भर देती है।
6. झरनों को 'झाग भरे' क्यों कहा गया है?
वेग से गिरने के कारण उनके जल में सफ़ेद फेन बनता है।
7. 'उच्चाकांक्षा' का अर्थ और कविता में संदर्भ लिखिए।
ऊँचा उठने की कामना; पेड़ इसी भाव से आकाश की ओर देखते लगते हैं।
8. वृक्षों को 'चिंतापर' क्यों कहा गया है?
ऊँचा उठने की इच्छा पूरी न होने की चिंता में डूबे-से दिखते हैं।
9. 'उड़ गया भूधर' का वास्तविक अर्थ क्या है?
घने बादलों के छा जाने से पर्वत दिखाई देना बंद हो गया।
10. बादलों को 'पारद के पर' क्यों कहा गया?
क्योंकि वे पारे की तरह सफ़ेद, चमकीले और तेज़ी से उड़ने वाले हैं।
11. 'रव-शेष रह गए हैं निर्झर' का भाव लिखिए।
झरने दिखते नहीं, केवल उनकी आवाज़ सुनाई देती है।
12. तालाब से धुआँ उठने का वास्तविक कारण क्या है?
वर्षा और ठंडक से तालाब से उठता कुहासा/भाप।
13. कवि इंद्र को जादूगर क्यों मानता है?
क्योंकि वे बादलों से पल भर में पूरे दृश्य को बदल देते हैं।
14. कविता में प्रयुक्त पुनरुक्ति प्रकाश के तीन उदाहरण लिखिए।
पल-पल, झर-झर, उठ-उठ (विचर-विचर भी)।
15. कविता में उपमा अलंकार के दो उदाहरण लिखिए।
दर्पण-सा फैला ताल; मोती की लड़ियों-से सुंदर निर्झर।
16. पंत जी को 'प्रकृति का सुकुमार कवि' क्यों कहा जाता है?
उन्होंने प्रकृति का अत्यंत कोमल, मधुर और सजीव चित्रण किया है।
17. निराला ने पंत जी की किस विशेषता की प्रशंसा की?
शेली की तरह विषय को उपमाओं से सँवारकर मधुर व कोमल बना देना।
18. पाठ-प्रवेश के अनुसार यह कविता पाठक को क्या अनुभूति देती है?
जैसे वह कक्षा में बैठे-बैठे पर्वतीय अंचल की सैर कर आया हो।
19. 'अनिमेष' और 'नीरव नभ' के अर्थ लिखिए।
अनिमेष — एकटक; नीरव नभ — शांत आकाश।
20. पंत जी को पद्मभूषण कब मिला?
1961 में।
9. अतिरिक्त प्रश्न — 10 दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न
1. 'पर्वत प्रदेश में पावस' कविता का प्रतिपाद्य लिखिए।
उत्तर — इस कविता में कवि ने वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेश के पल-पल बदलते प्राकृतिक सौंदर्य का सजीव चित्रण किया है। विशाल पर्वत तालाब-दर्पण में अपना प्रतिबिंब निहारता है, झरने पर्वत का गौरव गाते हैं, ऊँचे पेड़ आकाश की ओर ताकते हैं; फिर अचानक बादल छाकर पर्वत को ढक लेते हैं, वर्षा मूसलाधार हो जाती है, पेड़ और तालाब कोहरे में छिप जाते हैं — मानो इंद्र जादू दिखा रहे हों। मानवीकरण और चित्रात्मक भाषा से कवि प्रकृति के प्रति प्रेम और विस्मय का भाव जगाता है।
2. कविता में चित्रित प्रकृति के पल-पल बदलते रूपों का क्रमवार वर्णन कीजिए।
उत्तर — (1) पहले दृश्य में धूप में चमकता करधनी-सा विशाल पर्वत अपने फूलों रूपी नेत्रों से नीचे फैले दर्पण-से तालाब में अपना रूप निहारता है। (2) फिर मोती की लड़ियों-से झाग भरे झरने झर-झर बहते हुए पर्वत का गौरव गाते हैं। (3) ऊँचे पेड़ उच्चाकांक्षा से शांत आकाश की ओर एकटक देखते हैं। (4) अचानक पारे-से चमकीले बादल छाते हैं, पर्वत उड़ गया-सा लगता है, केवल झरनों का स्वर बचता है। (5) मूसलाधार वर्षा से लगता है आकाश धरती पर टूट पड़ा। (6) शाल के पेड़ कोहरे में धँसे-से लगते हैं, तालाब से धुआँ उठता है — इंद्र का इंद्रजाल।
3. कविता में मानवीकरण अलंकार के सौंदर्य को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर — मानवीकरण में निर्जीव वस्तुओं पर मानवीय भावनाओं और क्रियाओं का आरोप होता है। इस कविता में — पर्वत आत्ममुग्ध मनुष्य की तरह आईने (तालाब) में अपना रूप बार-बार देखता है; झरने गायक की तरह पर्वत का गौरव-गान करते हैं; पेड़ महत्त्वाकांक्षी मनुष्य की तरह चिंतित होकर ऊपर ताकते हैं; पर्वत पक्षी की तरह पंख फड़फड़ाकर उड़ता है; शाल डरे हुए व्यक्ति की तरह धरती में धँसते हैं; इंद्र जादूगर की तरह इंद्रजाल खेलते हैं। इससे प्रकृति सजीव, भावपूर्ण और मनुष्य के निकट हो उठती है।
4. कविता की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर — (1) तत्सम-प्रधान खड़ी बोली — पावस, मेखलाकार, सहस्र, दृग-सुमन, उच्चाकांक्षा, अनिमेष, भूधर, पारद, जलद। (2) चित्रात्मक/बिंबात्मक शैली — हर अंश एक दृश्य-चित्र खड़ा करता है। (3) संगीतात्मकता और लय — तुकांत पंक्तियाँ, ध्वन्यात्मक शब्द (झर-झर)। (4) अलंकार — मानवीकरण, उपमा, रूपक, पुनरुक्ति प्रकाश, अनुप्रास, अतिशयोक्ति। (5) कोमलकांत पदावली और माधुर्य गुण — छायावादी शैली की विशेषताएँ।
5. 'उच्चाकांक्षाओं से तरुवर' — पेड़ों के माध्यम से कवि मनुष्य के किस स्वभाव की ओर संकेत करता है?
उत्तर — पर्वत के हृदय से उठे ऊँचे पेड़ आकाश की ओर एकटक, अटल और कुछ चिंतित होकर देखते हैं। इसके माध्यम से कवि मनुष्य की महत्त्वाकांक्षा की ओर संकेत करता है — मनुष्य सदैव ऊँचा उठना, आगे बढ़ना चाहता है; इसके लिए वह दृढ़ (अटल) भी रहता है, पर लक्ष्य न मिलने की चिंता भी उसे घेरे रहती है। यह भी संकेत है कि जिस धरती (पर्वत) से हम उठते हैं, उसी से जुड़े रहकर हम ऊँचाइयाँ छूते हैं।
6. 'उड़ गया, अचानक लो, भूधर' से लेकर कविता के अंत तक के दृश्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर — अचानक घने सफ़ेद बादल उमड़ आते हैं और पूरा पर्वत उनमें छिप जाता है — कवि को लगता है पर्वत पारे जैसे चमकीले पंख फड़फड़ाकर उड़ गया। झरने दिखने बंद हो जाते हैं, केवल उनकी आवाज़ रह जाती है। बादल धरती तक उतर आते हैं, मूसलाधार वर्षा होने लगती है — जैसे आकाश धरती पर टूट पड़ा हो। कोहरे में ऊँचे शाल के पेड़ ओझल हो जाते हैं — मानो डरकर धरती में धँस गए। तालाब से भाप-कुहासा उठता है — मानो वह जल रहा हो। यह सब देखकर लगता है कि इंद्र बादल के विमान में घूमते हुए जादू का खेल दिखा रहे हैं।
7. अपने क्षेत्र में वर्षा ऋतु में होने वाले प्राकृतिक परिवर्तनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर — हमारे क्षेत्र (मैदानी भाग) में वर्षा ऋतु जुलाई-अगस्त में आती है। आसमान में काले बादल छा जाते हैं, ठंडी हवा चलती है और भीषण गर्मी से राहत मिलती है। खेत-खलिहान, पेड़-पौधे हरे-भरे हो जाते हैं; किसान धान, बाजरा आदि की बुवाई करते हैं। तालाब और गड्ढे पानी से भर जाते हैं, मेंढक टर्राते हैं, मोर नाचते हैं, कभी-कभी इंद्रधनुष दिखाई देता है। अधिक वर्षा से कीचड़, जलभराव और मच्छरजनित रोग भी बढ़ जाते हैं। फिर भी वर्षा जीवन के लिए वरदान है।
8. सुमित्रानंदन पंत का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर — सुमित्रानंदन पंत (1900–1977) का जन्म उत्तराखंड के कौसानी-अल्मोड़ा में हुआ। वे छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं और 'प्रकृति के सुकुमार कवि' कहलाते हैं। उनकी आरंभिक कविताओं में प्रकृति-प्रेम और रहस्यवाद, बाद में मार्क्सवाद और गांधीवाद, फिर अरविंद दर्शन का प्रभाव है। वे आकाशवाणी के परामर्शदाता रहे और लोकायतन संस्था की स्थापना की। सम्मान — पद्मभूषण (1961), साहित्य अकादेमी पुरस्कार (1960, कला और बूढ़ा चाँद), ज्ञानपीठ पुरस्कार (1969, चिदंबरा) — हिंदी के पहले ज्ञानपीठ विजेता। कृतियाँ — वीणा, पल्लव, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्णकिरण, लोकायतन।
9. इस कविता को पढ़कर मन पर क्या प्रभाव पड़ता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर — यह कविता पढ़कर मन प्रकृति के सौंदर्य से भर उठता है। पर्वत, तालाब, झरने, पेड़, बादल — सब आँखों के सामने जीवित हो उठते हैं, जैसे हम स्वयं पहाड़ों पर वर्षा का आनंद ले रहे हों। प्रकृति के पल-पल बदलते रूप हमें आश्चर्य और रोमांच से भर देते हैं। मन में प्रकृति के प्रति प्रेम, उसकी रक्षा का भाव और पहाड़ों पर जाने की इच्छा जागती है। कविता यह भी सिखाती है कि प्रकृति को ध्यान से देखने पर साधारण दृश्य भी अद्भुत लगने लगते हैं।
10. कविता में ध्वनि (श्रव्य) बिंब और दृश्य बिंब के उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर — बिंब वह शब्द-चित्र है जो किसी इंद्रिय का अनुभव कराए। दृश्य बिंब — करधनी-सा फैला पर्वत, दर्पण-सा फैला तालाब, मोती की लड़ियों-से झरने, आकाश की ओर ताकते ऊँचे पेड़, पारे जैसे चमकीले बादल, धँसते शाल, तालाब से उठता धुआँ। श्रव्य बिंब — झरनों का झर-झर बहना, गौरव-गान, बादलों में छिपने के बाद केवल झरनों का स्वर (रव-शेष)। इन बिंबों से कविता इतनी सजीव हो जाती है कि पाठक दृश्य देखने और ध्वनि सुनने का अनुभव करता है।
10. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न
इस कविता से शब्दार्थ-आधारित (मेखलाकार, सहस्र दृग-सुमन), अलंकार (मानवीकरण) और भाव-स्पष्टीकरण के प्रश्न प्रायः पूछे जाते हैं।
⭐ सबसे महत्वपूर्ण (अवश्य तैयार करें)
- पावस ऋतु में प्रकृति में कौन-कौन से परिवर्तन आते हैं?
- 'मेखलाकार' शब्द का अर्थ और प्रयोग का कारण।
- 'सहस्र दृग-सुमन' से क्या तात्पर्य है?
- कविता में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग स्पष्ट कीजिए।
- 'है टूट पड़ा भू पर अंबर' का भाव।
महत्वपूर्ण
- तालाब की समानता किससे और क्यों?
- ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर क्यों देख रहे थे?
- शाल के वृक्ष धरती में क्यों धँस गए?
- झरने किसका गौरव गा रहे हैं? उनकी तुलना किससे?
- जलद-यान और इंद्रजाल वाले अंश का भाव।
व्याकरण / मूल्यपरक
- शब्दार्थ — पावस, मेखलाकार, सहस्र, दृग-सुमन, अवलोक, झाग, उर, अनिमेष, भूधर, पारद, रव-शेष, जलद, इंद्रजाल।
- अलंकार — मानवीकरण, उपमा, पुनरुक्ति प्रकाश, अतिशयोक्ति के उदाहरण।
- चित्रात्मक शैली के स्थल छाँटिए।
🔗 कक्षा 10 हिंदी — स्पर्श व संचयन के सभी पाठ आपस में जुड़े हुए
- पर्वत प्रदेश में पावस — सुमित्रानंदन पंत (स्पर्श) (आप यही पढ़ रहे हैं)
— मनोज शर्मा, हिंदी शिक्षक | HINDI GYAN —
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