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सपनों के-से दिन (गुरदयाल सिंह) कक्षा 10 हिंदी संचयन — पात्र-चार्ट, व्याख्या, प्रश्नोत्तर और MCQ

सपनों के-से दिन (गुरदयाल सिंह) — कक्षा 10 हिंदी संचयन: पात्र-चार्ट, व्याख्या, प्रश्नोत्तर और MCQ

कक्षा 10 हिंदी (संचयन भाग-2) के पाठ 'सपनों के-से दिन' की संपूर्ण अध्ययन सामग्री — लेखक परिचय, पाठ का सार, पात्रों का चार्ट, पात्रों से जुड़ी घटनाएँ, प्रसंग-वार व्याख्या, NCERT अभ्यास प्रश्नोत्तर, 20 वस्तुनिष्ठ, 20 लघु-उत्तरीय, 10 दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न तथा परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न।

कक्षा 10संचयन भाग-2संस्मरणCBSE / NCERT

1. पाठ परिचय

'सपनों के-से दिन' गुरदयाल सिंह का संस्मरण है, जिसमें लेखक अपने बचपन, स्कूल, खेल-कूद और अध्यापकों की यादें सुनाता है। पाठ बताता है कि बचपन के दिन सपनों जैसे सुंदर होते हैं, पर उनमें डर और पिटाई की कड़वी यादें भी शामिल रहती हैं।

लेखक परिचय — गुरदयाल सिंह

गुरदयाल सिंह (1933–2016) पंजाबी के प्रसिद्ध कथाकार थे। उनका जन्म पंजाब के जैतो (फरीदकोट) में हुआ। उन्होंने ग्रामीण और साधारण लोगों के जीवन को अपनी रचनाओं में स्थान दिया। 'मढ़ी दा दीवा', 'अणहोए', 'परसा' उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। उन्हें 1999 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।

पाठ का सार

  • लेखक के साथी गरीब परिवारों के बच्चे थे — नंगे पाँव, फटे कपड़े, बिखरे बाल। चोट लगने पर घर में पिटाई होती, फिर भी अगले दिन वे खेलने आ जाते।
  • अधिकांश परिवार राजस्थान-हरियाणा से आकर मंडी में बसे थे। बोलियाँ अलग थीं, पर खेलते समय सब एक-दूसरे की बात समझ लेते।
  • उस समय बच्चों की पढ़ाई को महत्त्व नहीं दिया जाता था; कई बच्चे स्कूल ही नहीं जाते थे।
  • गर्मी की छुट्टियों में ननिहाल जाना, तालाब में नहाना, रेत पर लोटना सुखद यादें हैं; छुट्टियाँ खत्म होते ही गृहकार्य और पिटाई का डर बढ़ जाता।
  • हेडमास्टर मदनमोहन शर्मा कोमल स्वभाव के थे, जबकि पीटी मास्टर प्रीतमचंद बेहद कठोर थे। स्काउटिंग में पीटी साहब की 'शाबाश' बच्चों को फ़ौजी तमगे जैसी लगती।
  • लेखक हेडमास्टर के धनी शिष्य की पुरानी किताबों से पढ़ा; नई कक्षा की गंध उसे उदास कर देती।
  • फ़ारसी का शब्द-रूप याद न होने पर प्रीतमचंद ने बच्चों को मुर्गा बनाया। यह देखकर हेडमास्टर ने उन्हें मुअत्तल कर दिया।
  • मुअत्तल होने के बाद भी प्रीतमचंद अपने चौबारे में तोतों से प्यार से बातें करते — बच्चों के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।

2. पात्रों का चार्ट

पाठ के केंद्र में तीन पात्र हैं — लेखक (बालक), हेडमास्टर शर्मा जी और पीटी मास्टर प्रीतमचंद; शेष पात्र वातावरण रचते हैं।

पात्रपरिचयचारित्रिक विशेषताएँ
लेखक (बालक गुरदयाल)कथावाचक; अपने परिवार का पहला स्कूल जाने वाला लड़कादुबला-कमज़ोर, डरपोक, खेल-प्रेमी, संवेदनशील, पढ़ाई से अरुचि; बाद में स्वयं अध्यापक बना
मास्टर प्रीतमचंद (पीटी साहब)स्काउटिंग और फ़ारसी पढ़ाने वाले अध्यापककठोर अनुशासनप्रिय, क्रूर दंड देने वाले, ठिगने-गठीले, बाज़-सी तेज़ आँखें; कभी न हँसने वाले; पर तोतों के प्रति कोमल
हेडमास्टर मदनमोहन शर्माविद्यालय के प्रधानाचार्य; पाँचवीं-आठवीं को अंग्रेज़ी पढ़ातेकोमल, स्नेही, न्यायप्रिय, शारीरिक दंड के विरोधी, सहायक (लेखक को पुरानी किताबें दिलाते)
ओमालेखक का सहपाठी, शरारती बच्चों का 'नेता'हाँडी जैसा बड़ा सिर, ठिगना शरीर; सिर से टक्कर ('रेल-बम्बा') मारकर लड़ने वाला; पिटाई को 'सस्ता सौदा' मानने वाला
साथी बच्चेगरीब परिवारों के बच्चेनंगे पाँव, फटे कपड़े; खेल-प्रेमी, पढ़ाई से दूर, मार खाकर भी खेलने आने वाले
नानीलेखक की ननिहाल मेंस्नेहमयी, दूध-दही-मक्खन खिलाने वाली
माँ-बहनें और पिताबच्चों के परिवारचोट लगने पर तरस खाने के बजाय पिटाई करने वाले; पिता गुस्सैल
चंदू चपड़ासीस्कूल का चपरासीफूलों की क्यारियों की रखवाली करने वाला
हरबंसलेखक का सहपाठीसज़ा में लेखक के साथ
मास्टर नौहरिया रामफ़ारसी पढ़ाने आए दूसरे अध्यापकबच्चों के लिए राहत का कारण
हेडमास्टर का शिष्यधनाढ्य परिवार का लड़का, लेखक से एक कक्षा आगेउसकी पुरानी किताबें लेखक को मिलती थीं
अन्यपंडत घनश्याम दास (लंडे पढ़ाने वाले), डॉक्टर कपलाश, डायरेक्टर हरजीलाल, भरती अफ़सर और नौटंकी वाले, गुरुद्वारे के भाई जीवातावरण और समय का चित्र खींचते हैं

3. पात्रों से जुड़ी घटनाएँ

पात्रघटनाघटना से पता चलता है
लेखकछुट्टियों में ननिहाल जाना, तालाब में नहाना, रेत के टीले पर लोटनाबचपन का निश्चिंत आनंद
लेखकछुट्टियाँ खत्म होने पर 200 सवालों का हिसाब लगाना — 10 रोज़ तो 20 दिन, फिर 15 रोज़ की सोचकाम टालने की बाल-प्रवृत्ति और पिटाई का डर
लेखकचंदू चपड़ासी से आँख बचाकर गुलाब-मोतिया की कलियाँ तोड़नाप्रकृति-प्रेम और बाल-शरारत
लेखकहर साल हेडमास्टर के धनी शिष्य की पुरानी किताबें पानाआर्थिक कठिनाई; पुरानी किताबें ही पढ़ाई जारी रहने का कारण बनीं
लेखकनई कक्षा में नई कापियों-पुरानी किताबों की गंध से उदास होनाआगे की कठिन पढ़ाई और नए मास्टरों का भय
साथी बच्चेलकड़ी के ढेर से गिरकर चोट खाना और घर में और पिटनाउस समय बच्चों के प्रति कठोर व्यवहार
साथी बच्चेतालाब में तैरना न आने पर भैंस के सींग या दुम पकड़कर निकलने की सलाहबाल-सुलभ भोलापन
ओमासिर से पेट-छाती में टक्कर मारना ('रेल-बम्बा')उसकी अनोखी, डरावनी लड़ाई-शैली
प्रीतमचंदप्रार्थना-सभा में ज़रा हिलने पर बाघ की तरह झपटना, 'खाल खींचना'कठोर, भयकारी अनुशासन
प्रीतमचंदस्काउटिंग परेड में गलती न होने पर 'शाबाश' कहनाकठोरता के पीछे छिपी प्रशंसा; बच्चों को फ़ौजी जैसा गर्व
प्रीतमचंदफ़ारसी का शब्द-रूप याद न होने पर चौथी कक्षा के बच्चों को मुर्गा बनानाबर्बर दंड-पद्धति
प्रीतमचंदमुअत्तल होकर भी चौबारे में तोतों को भिगोए बादाम खिलाना, मीठी बातें करनाउनके व्यक्तित्व का कोमल, छिपा पक्ष
हेडमास्टर शर्मा जीगुस्से में भी केवल हल्की 'चपत' लगानास्नेहपूर्ण, मनोवैज्ञानिक अनुशासन
हेडमास्टर शर्मा जीप्रीतमचंद की बर्बरता देखकर उन्हें मुअत्तल करना और आदेश नाभा भेजनान्यायप्रियता, बच्चों के प्रति संवेदना
भरती अफ़सर, नौटंकी वाले'भरती हो जा रे रंगरूट' गाकर युवकों को फ़ौज में खींचनादूसरे विश्वयुद्ध का समय, अंग्रेज़ों की भरती-नीति

4. पाठ की मुख्य बातें

  1. विधा — संस्मरण (आत्मकथात्मक); पुस्तक — संचयन भाग-2।
  2. भाषा बाधा नहीं — अलग बोलियों के बच्चे खेल में एक-दूसरे को पूरी तरह समझ लेते थे।
  3. शिक्षा के प्रति उदासीनता — परचूनिये-आढ़तिये बच्चों को लंडे और मुनीमी सिखाना ही काफ़ी समझते थे।
  4. खेल का आकर्षण — बाल-मनोविज्ञान के अनुसार बच्चे पिटकर भी खेलने आते हैं।
  5. लोकोक्ति — 'एह खेडण दे दिन चार' — खेलने के दिन थोड़े होते हैं।
  6. सस्ता युग — एक रुपये में एक सेर घी, दो रुपये में एक मन (40 सेर) गेहूँ।
  7. विद्यालय — नौ कमरों वाला, अंग्रेज़ी अक्षर H के आकार का; रास्ते में अलिआर की झाड़ियाँ (डंडियाँ)।
  8. अनुशासन के दो रूप — प्रीतमचंद का भय और शर्मा जी का स्नेह।
  9. शाबाश का मूल्य — रोज़ डाँटने वाले का एक बार 'शाबाश' कहना चमत्कार जैसा लगता है।
  10. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — दूसरा विश्वयुद्ध; नाभा रियासत के राजा को अंग्रेज़ों ने 1923 में गिरफ़्तार किया; उनका देहांत कोडाइकेनाल में हुआ।
  11. मुअत्तली — प्रीतमचंद के निलंबन की मंज़ूरी के लिए आदेश नाभा के डायरेक्टर हरजीलाल को भेजा गया।
  12. संदेश — बच्चों को भय से नहीं, स्नेह और समझ से अनुशासित करना चाहिए; आज स्कूलों में शारीरिक दंड वर्जित है।
महत्वपूर्ण शब्दार्थ — लंडे (पंजाबी की हिसाब-किताब की प्राचीन लिपि), बहियाँ (खाता), खेडण (खेलने), चपड़ासी (चपरासी), हरफ़नमौला (हर फ़न में माहिर), जबरन (बलपूर्वक), मुअत्तल (निलंबित), महकमा-ए-तालीम (शिक्षा विभाग), सतिगुर (सतगुरु)।

5. पाठ की व्याख्या (प्रसंग-क्रम से)

प्रसंग 1 — बचपन के साथी और खेल

लेखक के सभी साथी गरीब घरों के थे। फटे कुर्ते, नंगे पाँव और धूल-मिट्टी से भरे घुटने उनकी पहचान थे। खेलते हुए चोट लगती तो घर पर माँ-बहनें और गुस्सैल पिता उन्हें पीटते, पर अगले दिन वे फिर खेलने पहुँच जाते। लेखक को इसका कारण तब समझ आया जब अध्यापक-प्रशिक्षण में उसने बाल-मनोविज्ञान पढ़ा — खेल बच्चे की स्वाभाविक ज़रूरत है।

प्रसंग 2 — शिक्षा के प्रति समाज का रवैया

मोहल्ले के अधिकांश परिवार आसपास के गाँवों या राजस्थान-हरियाणा से आए थे। बोलियाँ अलग होने पर भी खेल में सब एक-दूसरे को समझ लेते थे। उस समय पढ़ाई को आवश्यक नहीं माना जाता था। व्यापारी सोचते कि बच्चा लंडे और बहीखाता सीखकर दुकान सँभाल लेगा, उसे तहसीलदार थोड़े ही बनना है। कई बच्चे बस्ता तालाब में फेंककर स्कूल छोड़ देते।

प्रसंग 3 — स्कूल का रास्ता और फूलों की गंध

लेखक कहता है कि बचपन में घास अधिक हरी और फूल अधिक सुगंधित लगते हैं। स्कूल के रास्ते की अलिआर की झाड़ियों की महक और क्यारियों के गुलाब-मोतिया की खुशबू उसे आज भी याद है। यह प्रसंग बचपन की संवेदनशील स्मृति को दिखाता है।

प्रसंग 4 — छुट्टियाँ, ननिहाल और तालाब

डेढ़-दो महीने की छुट्टियों के पहले सप्ताह खूब खेल-कूद में बीतते। ननिहाल में नानी स्नेह से खिलाती। तालाब में कूदना, रेत में लोटना, फिर कूदना — यह बार-बार होता। तैरना न आने पर भी बच्चे बड़े तैराक होने का अभिनय करते। यहाँ बचपन की निश्चिंतता और भोलापन उभरता है।

प्रसंग 5 — गृहकार्य का डर और ओमा

छुट्टियाँ घटने लगतीं तो गृहकार्य का डर बढ़ता। लेखक मन में हिसाब लगाता कि रोज़ दस सवाल करके बीस दिन में काम पूरा हो जाएगा, फिर पंद्रह की सोचकर दिन खेल में गँवा देता। कुछ साथी काम करने के बजाय पिटाई को सस्ता सौदा मानते। इनका नेता ओमा था — विचित्र शक्ल वाला, सिर से टक्कर मारकर लड़ने वाला।

प्रसंग 6 — दो अध्यापक, दो स्वभाव

स्कूल H के आकार का छोटा-सा भवन था। प्रार्थना-सभा में हेडमास्टर शर्मा जी कतारें देखकर प्रसन्न होते, जबकि पीटी मास्टर प्रीतमचंद पीछे खड़े होकर हर हरकत पर नज़र रखते और ज़रा-सी चूक पर बाघ की तरह टूट पड़ते। इसके विपरीत शर्मा जी अधिक-से-अधिक एक हल्की चपत लगाते, जिस पर बच्चे भी हँस देते।

प्रसंग 7 — स्काउटिंग और 'शाबाश'

स्काउटिंग में झंडियाँ लहराना, खाकी वर्दी, धुले कपड़े और पॉलिश किए जूते बच्चों को फ़ौजी होने का गर्व देते। पीटी साहब की एक 'शाबाश' उन्हें साल-भर के 'गुड' से अधिक मूल्यवान लगती। लेखक इसकी तुलना गुरुद्वारे के भाई जी की इस बात से करता है कि भय से भी प्रेम जागता है।

प्रसंग 8 — पुरानी किताबें और नई कक्षा की उदासी

शर्मा जी अपने धनी शिष्य की पुरानी किताबें लेखक को दिला देते। घर में पढ़ाई में किसी की रुचि न थी; नई किताबें खरीदनी पड़तीं तो पढ़ाई शायद छूट जाती। फिर भी नई कक्षा में जाने का उत्साह उसे नहीं होता था, क्योंकि आगे की कठिन पढ़ाई और नए मास्टरों की मार का डर मन में बैठा था।

प्रसंग 9 — युद्ध, भरती और परेड का गर्व

दूसरे विश्वयुद्ध का समय था। नाभा रियासत में राजा न होने से अंग्रेज़ जबरन भरती नहीं कर पाते थे, इसलिए नौटंकी वालों के साथ आकर गानों से युवकों को लुभाते। परेड करते हुए लेखक को भी लगता कि वह विद्यार्थी नहीं, महत्त्वपूर्ण फ़ौजी जवान है।

प्रसंग 10 — प्रीतमचंद की सज़ा और मुअत्तली

चौथी कक्षा में फ़ारसी का शब्द-रूप याद न होने पर प्रीतमचंद ने बच्चों को कान पकड़वाकर पीठ ऊँची करवाई। कमज़ोर बच्चे गिर पड़ते। यह देख शर्मा जी बहुत उत्तेजित हुए, सज़ा तुरंत रुकवाई और प्रीतमचंद को मुअत्तल कर आदेश नाभा भेज दिया।

प्रसंग 11 — तोतों से बातें

मुअत्तल होने पर भी प्रीतमचंद को चिंता नहीं थी। वे चौबारे में पिंजरे के दो तोतों को भिगोए बादाम छीलकर खिलाते और मीठी बातें करते। बच्चों को यह 'अलौकिक' लगता कि जो व्यक्ति उनकी चमड़ी उधेड़ देता था, वह तोतों से इतना कोमल कैसे है। यहीं पाठ मनुष्य के स्वभाव की जटिलता दिखाकर समाप्त होता है।

6. अभ्यास प्रश्नोत्तर (बोध-प्रश्न)

प्रश्न 1. कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती — पाठ के किस अंश से यह सिद्ध होता है?

उत्तर — लेखक के आधे से अधिक साथी राजस्थान या हरियाणा से आकर मंडी में बसे परिवारों के थे। बचपन में उनकी बोली के कुछ शब्द सुनकर हँसी आती थी, पर खेलते समय सब एक-दूसरे की बात भली-भाँति समझ लेते थे। इससे सिद्ध होता है कि आपसी प्रेम और व्यवहार में भाषा बाधा नहीं बनती।

प्रश्न 2. पीटी साहब की 'शाबाश' फ़ौज के तमगों-सी क्यों लगती थी?

उत्तर — पीटी साहब बहुत कठोर थे, कभी हँसते या मुसकराते नहीं थे और छोटी-सी गलती पर कड़ी सज़ा देते थे। ऐसे अध्यापक से स्काउटिंग में गलती न करने पर जब 'शाबाश' मिलती, तो बच्चों को लगता मानो उन्होंने फ़ौज के सारे तमगे जीत लिए हों। रोज़ डाँटने वाले की एक प्रशंसा चमत्कार जैसी लगती है।

प्रश्न 3. नयी श्रेणी में जाने और नयी कापियों-पुरानी किताबों की गंध से लेखक का बालमन क्यों उदास हो उठता था?

उत्तर — नयी श्रेणी का अर्थ था कठिन पढ़ाई और नए मास्टरों की मार का डर। अध्यापक हर साल ऐसी अपेक्षा करते मानो बच्चे 'हरफ़नमौला' हो गए हों और अपेक्षा पूरी न होने पर चमड़ी उधेड़ने को तैयार रहते। यही भय मन में जमकर बैठ गया था, इसलिए कापियों-किताबों की गंध भी उदासी जगा देती थी।

प्रश्न 4. स्काउट परेड करते समय लेखक अपने को महत्त्वपूर्ण 'आदमी' फ़ौजी जवान क्यों समझने लगता था?

उत्तर — धोबी की धुली वर्दी, पॉलिश किए जूते और जुराबें पहनकर, मास्टर प्रीतमचंद की सीटी और 'लेफ़्ट-राइट' पर बूटों की ठक-ठक करते हुए अकड़कर चलने से लेखक को लगता था कि वह साधारण विद्यार्थी नहीं, बल्कि महत्त्वपूर्ण फ़ौजी जवान है।

प्रश्न 5. हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को क्यों मुअत्तल कर दिया?

उत्तर — फ़ारसी का शब्द-रूप याद न होने पर पीटी साहब ने चौथी कक्षा के बच्चों को कान पकड़वाकर पीठ ऊँची करने (मुर्गा बनने) की सज़ा दी। कमज़ोर बच्चे गिरने लगे। शारीरिक दंड के विरोधी शर्मा जी यह बर्बरता सहन न कर सके और उन्होंने पीटी साहब को मुअत्तल करके मंज़ूरी के लिए आदेश नाभा भेज दिया।

प्रश्न 6. लेखक के अनुसार उन्हें स्कूल खुशी से भागे जाने की जगह न लगने पर भी कब और क्यों स्कूल जाना अच्छा लगने लगा?

उत्तर — जब पीटी साहब स्काउटिंग का अभ्यास करवाते, नीली-पीली झंडियाँ हाथ में देकर 'वन-टू-थ्री' पर ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ लहरवाते और गलती न होने पर 'शाबाश' कहते, तब स्कूल अच्छा लगता। खाकी वर्दी और गले के दोरंगे रूमाल पहनकर परेड करने से बच्चों में गर्व और उत्साह जागता था।

प्रश्न 7. लेखक छुट्टियों में मिले काम के लिए क्या-क्या योजनाएँ बनाता था और उसे पूरा न कर पाने पर किसकी भाँति 'बहादुर' बनने की कल्पना करता था?

उत्तर — लेखक हिसाब लगाता कि हिसाब के मास्टर के 200 सवाल रोज़ 10-10 करके 20 दिन में हो जाएँगे; दिन बीतने पर सोचता कि रोज़ 15 सवाल भी आसानी से हो सकते हैं। इस तरह काम टलता जाता। अंत में वह ओमा जैसे साथियों की भाँति 'बहादुर' बनने की सोचता, जो काम करने की बजाय पिटाई को 'सस्ता सौदा' मानते थे।

प्रश्न 8. पाठ में वर्णित घटनाओं के आधार पर पीटी सर की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर — (1) कठोर अनुशासनप्रिय — कतार में ज़रा-सी हरकत पर झपट पड़ते थे। (2) क्रूर दंड देने वाले — 'खाल खींचना' और मुर्गा बनाना उनकी आदत थी। (3) भयकारी व्यक्तित्व — ठिगना गठीला शरीर, बाज़-सी आँखें, खुरियों-कीलों वाले बूट। (4) प्रशंसा करने वाले — सही काम पर 'शाबाश' कहते। (5) स्वाभिमानी और निश्चिंत — मुअत्तल होकर भी विचलित नहीं हुए। (6) कोमल पक्ष — तोतों को बादाम खिलाकर प्यार से बातें करते।

प्रश्न 9. विद्यार्थियों को अनुशासन में रखने के लिए पाठ में अपनाई गई युक्तियों और वर्तमान में स्वीकृत मान्यताओं के संबंध में अपने विचार प्रकट कीजिए।

उत्तर — पाठ में भय, मार-पीट, कान पकड़वाना और 'खाल खींचना' जैसी युक्तियाँ अपनाई गईं, जिनसे बच्चे पढ़ाई से डरने लगे और रोते-चिल्लाते स्कूल जाते। आज बाल-मनोविज्ञान के अनुसार शारीरिक दंड पूर्णतः वर्जित है। अब प्रेम, प्रोत्साहन, संवाद और सकारात्मक अनुशासन पर बल दिया जाता है। मेरे विचार में शर्मा जी जैसा स्नेहपूर्ण अनुशासन ही उचित है, क्योंकि उससे बच्चे सीखने में रुचि लेते हैं।

प्रश्न 10. अपने अब तक के स्कूली जीवन की खट्टी-मीठी यादों को लिखिए।

उत्तर (संकेत) — विद्यार्थी अपने अनुभव लिखें: पहला दिन, प्रिय शिक्षक, खेल-दिवस, विद्यालय-यात्रा, किसी प्रतियोगिता में जीत (मीठी यादें) और गृहकार्य न करने पर डाँट, परीक्षा का डर, किसी मित्र से झगड़ा (खट्टी यादें)। उत्तर अपने शब्दों में, उदाहरण सहित।

प्रश्न 11. (क) खेल आपके लिए क्यों ज़रूरी हैं? (ख) आप कौन-से ऐसे नियम-कायदे अपनाएँगे जिससे अभिभावकों को आपके खेल पर आपत्ति न हो?

उत्तर — (क) खेल से शरीर स्वस्थ और फुर्तीला रहता है, मन प्रसन्न रहता है, तनाव दूर होता है, और अनुशासन, टीम-भावना, धैर्य तथा हार-जीत को स्वीकारना सीखते हैं। (ख) पढ़ाई और खेल का समय-सारणी बनाकर संतुलन रखूँगा; गृहकार्य पूरा करके ही खेलूँगा; समय पर घर लौटूँगा; सुरक्षित स्थान पर खेलूँगा; चोट से बचाव रखूँगा और परीक्षा के दिनों में खेल का समय घटा दूँगा।

7. अतिरिक्त प्रश्न — 20 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  1. 'सपनों के-से दिन' पाठ की विधा है— (क) कहानी (ख) संस्मरण (ग) निबंध (घ) रेखाचित्र
  2. पाठ के लेखक हैं— (क) मिथिलेश्वर (ख) राही मासूम रज़ा (ग) गुरदयाल सिंह (घ) प्रेमचंद
  3. लेखक के आधे से अधिक साथी कहाँ से आए परिवारों के थे? (क) पंजाब-हिमाचल (ख) राजस्थान-हरियाणा (ग) उत्तर प्रदेश-बिहार (घ) गुजरात-महाराष्ट्र
  4. 'लंडे' क्या है? (क) एक खेल (ख) हिसाब-किताब की पंजाबी प्राचीन लिपि (ग) एक मिठाई (घ) एक वाद्य
  5. 'एह खेडण दे दिन चार' का अर्थ है— (क) खेलने के दिन थोड़े होते हैं (ख) चार दिन खेलो (ग) खेल चार प्रकार के हैं (घ) खेल बेकार है
  6. स्कूल की इमारत किस अक्षर के आकार की थी? (क) L (ख) U (ग) H (घ) T
  7. हेडमास्टर का पूरा नाम क्या था? (क) प्रीतमचंद (ख) मदनमोहन शर्मा (ग) नौहरिया राम (घ) हरजीलाल
  8. पीटी मास्टर का नाम था— (क) प्रीतमचंद (ख) घनश्याम दास (ग) हरबंस (घ) चंदू
  9. बच्चों का 'नेता' कौन था? (क) हरबंस (ख) चंदू (ग) ओमा (घ) भीखे
  10. ओमा की सिर की टक्कर को बच्चों ने क्या नाम दिया था? (क) रेल-बम्बा (ख) हाथी-धक्का (ग) सांड-टक्कर (घ) बम-गोला
  11. हिसाब के मास्टर छुट्टियों में कम-से-कम कितने सवाल देते थे? (क) 100 (ख) 150 (ग) 200 (घ) 50
  12. पीटी साहब की 'शाबाश' बच्चों को कैसी लगती थी? (क) व्यंग्य जैसी (ख) फ़ौज के तमगों-सी (ग) डरावनी (घ) साधारण
  13. उस समय एक रुपये में क्या आता था? (क) एक मन गेहूँ (ख) एक सेर घी (ग) दस सेर चीनी (घ) एक जोड़ी जूते
  14. लेखक को पुरानी किताबें किसकी मिलती थीं? (क) बड़े भाई की (ख) पड़ोसी की (ग) हेडमास्टर के धनी शिष्य की (घ) चचेरे भाई की
  15. पीटी साहब ने बच्चों को किस विषय का शब्द-रूप याद न होने पर सज़ा दी? (क) अंग्रेज़ी (ख) उर्दू (ग) फ़ारसी (घ) संस्कृत
  16. अंग्रेज़ी किस कक्षा से पढ़ाई जानी शुरू होती थी? (क) तीसरी (ख) चौथी (ग) पाँचवीं (घ) छठी
  17. 'मुअत्तल' शब्द का अर्थ है— (क) पदोन्नत (ख) निलंबित (ग) स्थानांतरित (घ) सम्मानित
  18. प्रीतमचंद की मुअत्तली की मंज़ूरी के लिए आदेश कहाँ भेजा गया? (क) लाहौर (ख) पटियाला (ग) नाभा (घ) दिल्ली
  19. मुअत्तल होने के बाद पीटी साहब किनसे मीठी बातें करते थे? (क) बच्चों से (ख) तोतों से (ग) कबूतरों से (घ) पड़ोसियों से
  20. 'भरती हो जा रे रंगरूट' गीत किसके द्वारा गाया जाता था? (क) स्कूली बच्चों द्वारा (ख) नौटंकी वालों द्वारा (ग) गुरुद्वारे के भाई जी द्वारा (घ) अध्यापकों द्वारा

उत्तर — 1-ख, 2-ग, 3-ख, 4-ख, 5-क, 6-ग, 7-ख, 8-क, 9-ग, 10-क, 11-ग, 12-ख, 13-ख, 14-ग, 15-ग, 16-ग, 17-ख, 18-ग, 19-ख, 20-ख

8. अतिरिक्त प्रश्न — 20 लघु-उत्तरीय प्रश्न

1. लेखक के साथी बच्चों की दशा कैसी होती थी?

वे नंगे पाँव, फटी-मैली कच्छी, टूटे बटनों वाले फटे कुर्ते और बिखरे बालों में रहते थे। धूल-मिट्टी से भरे, छिले पाँव और घुटने उनकी पहचान थे।

2. चोट लगने पर घर में बच्चों के साथ कैसा व्यवहार होता था?

माँ-बहनें तरस खाने के बजाय पिटाई करतीं। गुस्सैल पिता इतना पीटते कि यह भी न देखते कि बच्चे की नाक-मुँह से खून बह रहा है।

3. बुरी तरह पिटकर भी बच्चे खेलने क्यों आ जाते थे?

बाल-मनोविज्ञान के अनुसार खेल बच्चों की स्वाभाविक प्रवृत्ति और आनंद का स्रोत है। खेल का आकर्षण पिटाई के डर से अधिक होता है।

4. उस समय लोग बच्चों को स्कूल भेजना ज़रूरी क्यों नहीं समझते थे?

परचूनिये-आढ़तिये सोचते थे कि बच्चे को तहसीलदार नहीं बनाना। पंडित से लंडे और बहीखाता सिखाकर दुकान पर बैठा देंगे, यही पर्याप्त है।

5. लेखक को स्कूल के रास्ते की कौन-सी गंध आज भी याद है?

रास्ते के दोनों ओर उगी अलिआर की झाड़ियों (डंडियों) के नीम जैसे पत्तों की महक और क्यारियों के गुलाब, गेंदा, मोतिया की खुशबू आज भी याद है।

6. ननिहाल में लेखक का समय कैसे बीतता था?

नानी खूब दूध-दही, मक्खन खिलाती और प्यार करती। दोपहर तक तालाब में नहाते, फिर नानी से जो मन होता माँगकर खाते।

7. तालाब में नहाते समय बच्चे क्या करते थे?

कपड़े उतारकर पानी में कूदते, फिर रेतीले टीले पर लोटते, रेत से लथपथ होकर फिर तालाब में छलाँग लगाते। तैरना न आने पर भी तैराक होने का अभिनय करते।

8. छुट्टियाँ खत्म होने के दिनों में लेखक की मनःस्थिति कैसी होती थी?

दिन गिनने लगता, डर बढ़ता जाता, खेल-कूद भूल जाता। उसे लगता छुट्टियाँ भाग रही हैं, दिन छोटे हो गए हैं और सूरज दोपहर में ही छिप जाता है।

9. ओमा का रूप कैसा था?

हाँडी जैसा बड़ा सिर, ठिगना चार बालिश्त का शरीर, नारियल जैसी आँखें और बंदरिया के बच्चे जैसा चेहरा — मानो बिल्ली के बच्चे के माथे पर तरबूज़ रखा हो।

10. प्रार्थना के समय पीटी मास्टर क्या करते थे?

वे लड़कों की कतारों के पीछे खड़े होकर देखते कि कौन ठीक नहीं खड़ा। सिर हिलाने या पिंडली खुजलाने पर बाघ की तरह झपटकर 'खाल खींच' देते।

11. हेडमास्टर शर्मा जी गुस्से में क्या करते थे?

वे जल्दी-जल्दी आँखें झपकाते और लंबे हाथ की उलटी उँगलियों से गाल पर हल्की 'चपत' लगाते, जो बच्चों को भीखे की नमकीन पापड़ी जैसी मज़ेदार लगती।

12. गुरुद्वारे के भाई जी की कौन-सी बात लेखक को याद आती थी?

भाई जी कथा में बताते थे कि सतगुरु के भय से ही प्रेम जागता है। इसी प्रकार पीटी साहब के प्रति भी बच्चों के मन में प्रेम जाग जाता था।

13. लेखक की पढ़ाई जारी रहने में पुरानी किताबों का क्या योगदान था?

घर में पढ़ाई में किसी की रुचि नहीं थी। नई किताबें खरीदनी पड़तीं तो पढ़ाई तीसरी-चौथी में छूट जाती; पुरानी किताबें मिलने से वह सात वर्ष स्कूल में रहा।

14. उस समय स्कूल कौन-से परिवारों के लड़के जाते थे और क्यों?

केवल खाते-पीते घरों के लड़के ही स्कूल जाते थे, क्योंकि एक रुपया भी बड़ी रकम थी — उसमें एक सेर घी आता था।

15. नौटंकी वाले युवकों को फ़ौज के प्रति कैसे आकर्षित करते थे?

रात को खुले मैदान में शामियाने लगाकर फ़ौजी सुख-आराम और बहादुरी के दृश्य दिखाते; मसखरे अजीब वर्दियाँ और बड़े फ़ौजी बूट पहनकर 'भरती हो जा रे रंगरूट' गाते।

16. अंग्रेज़ नाभा रियासत से जबरन भरती क्यों नहीं कर पाए?

नाभा के राजा को अंग्रेज़ों ने 1923 में गिरफ़्तार कर लिया था और बेटा विलायत में पढ़ रहा था। राजा के न रहते भी अंग्रेज़ रियासत के गाँवों से जबरन भरती नहीं कर सके।

17. मास्टर प्रीतमचंद के बूट कैसे थे?

चमड़े के चौड़े पंजों वाले, ऊँची एड़ियों के नीचे घोड़े की नाल जैसी खुरियाँ और पंजों के नीचे मोटे सिरों वाले कील; सख्त ज़मीन पर भी निशान छोड़ते थे।

18. मुअत्तल होने के बाद पीटी साहब कहाँ और कैसे रहते थे?

बाज़ार में दुकान के ऊपर किराए के चौबारे में आराम से रहते थे। उन्हें मुअत्तली की रत्ती भर चिंता नहीं थी; तोतों को बादाम खिलाते रहते।

19. 'हरफ़नमौला' शब्द का प्रयोग पाठ में किस संदर्भ में हुआ है?

अध्यापक नई कक्षा में बच्चों से ऐसी अपेक्षा करते मानो वे एक साल में हर विषय के माहिर (हरफ़नमौला) बन गए हों; अपेक्षा पूरी न होने पर पिटाई करते।

20. पाठ के शीर्षक 'सपनों के-से दिन' की सार्थकता बताइए।

बचपन के दिन सपनों जैसे सुंदर, सरल और फिर कभी न लौटने वाले होते हैं। लेखक ने इन्हीं यादों — खेल, ननिहाल, स्कूल — का वर्णन किया है, अतः शीर्षक सार्थक है।

9. अतिरिक्त प्रश्न — 10 दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

1. हेडमास्टर शर्मा जी और पीटी मास्टर प्रीतमचंद के स्वभाव की तुलना कीजिए।

उत्तर — दोनों अध्यापक स्वभाव में एक-दूसरे के विपरीत थे। प्रीतमचंद कठोर, भयकारी और क्रूर दंड देने वाले थे; बच्चों ने उन्हें कभी हँसते नहीं देखा। ज़रा-सी गलती पर वे 'खाल खींच' देते और मुर्गा बनाते। शर्मा जी कोमल, स्नेही और न्यायप्रिय थे। गुस्से में भी वे केवल हल्की चपत लगाते, जिस पर बच्चे हँस देते। वे गरीब लेखक को पुरानी किताबें दिलाते और बर्बर दंड देखकर उन्होंने प्रीतमचंद को मुअत्तल भी किया। इस तुलना से स्नेहपूर्ण अनुशासन की श्रेष्ठता सिद्ध होती है।

2. पाठ के आधार पर उस समय के समाज में शिक्षा की स्थिति का वर्णन कीजिए।

उत्तर — उस समय शिक्षा को महत्त्व नहीं दिया जाता था। अधिकतर बच्चे स्कूल ही नहीं जाते थे; जो जाते, वे रुचि न होने पर बस्ता तालाब में फेंककर पढ़ाई छोड़ देते। माता-पिता भी जबरदस्ती नहीं भेजते थे। व्यापारी वर्ग बच्चों को लंडे और बहीखाता सिखाना ही पर्याप्त मानता था। पढ़ाई महँगी थी — एक रुपया बड़ी रकम था — इसलिए केवल खाते-पीते घरों के लड़के ही पढ़ते थे। स्कूल में भय और मार-पीट का वातावरण था, जिससे बच्चे रोते-चिल्लाते स्कूल जाते।

3. बचपन में खेल-कूद का क्या महत्त्व है? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर — पाठ से स्पष्ट होता है कि खेल बच्चों की स्वाभाविक आवश्यकता है। चोट लगने और घर में पिटने के बाद भी बच्चे अगले दिन खेलने पहुँच जाते थे। खेल ने अलग बोलियों वाले बच्चों को एक कर दिया। तालाब में नहाना, रेत में लोटना, स्काउटिंग की परेड — इन सबने बच्चों में आनंद, आत्मविश्वास और गर्व भरा। लेखक ने बाल-मनोविज्ञान पढ़कर यह समझा कि खेल बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास का आधार है।

4. छुट्टियों के आरंभ और अंत के दिनों में लेखक की मनःस्थिति में क्या अंतर था?

उत्तर — छुट्टियों के आरंभ में लेखक पूरी तरह निश्चिंत रहता। पहले दो-तीन सप्ताह ननिहाल में नानी के स्नेह, दूध-दही और तालाब में नहाने में बीतते। अंत आते-आते मन पर गृहकार्य और पिटाई का डर छा जाता। वह दिन गिनने लगता, सवालों का हिसाब लगाता, पर काम टालता रहता। दिन छोटे और छुट्टियाँ भागती-सी लगतीं। इस प्रकार आनंद धीरे-धीरे भय में बदल जाता था।

5. स्काउटिंग के अभ्यास ने बच्चों के मन पर क्या प्रभाव डाला?

उत्तर — स्कूल सामान्यतः बच्चों को भय की जगह लगता था, पर स्काउटिंग के समय वही अच्छा लगने लगता। खाकी वर्दी, गले में दोरंगे रूमाल, हाथों में फड़फड़ाती नीली-पीली झंडियाँ और 'वन-टू-थ्री' की ताल पर परेड बच्चों में गर्व भर देती। बूटों की ठक-ठक के साथ अकड़कर चलते हुए वे खुद को महत्त्वपूर्ण फ़ौजी जवान मानते। गलती न होने पर पीटी साहब की 'शाबाश' उन्हें फ़ौज के तमगों जैसी लगती और आत्मविश्वास बढ़ाती।

6. "मुझे नयी कापियों और पुरानी पुस्तकों में से ऐसी गंध आने लगती कि मन बहुत उदास होने लगता" — इस कथन के आधार पर लेखक के बालमन का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर — सामान्यतः बच्चे नई कक्षा में जाने पर उत्साहित होते हैं, पर लेखक उदास हो जाता था। कारण यह था कि नई कक्षा में पढ़ाई कठिन होती और हर साल दो-तीन नए मास्टर आते जो बहुत अपेक्षा करते और पूरी न होने पर मार-पीट करते। यह भय उसके मन में गहराई से जम गया था। इसलिए किताबों की गंध भी उसे डर की याद दिलाती। यह प्रसंग बताता है कि भयपूर्ण वातावरण बच्चे की सीखने की रुचि को नष्ट कर देता है।

7. पाठ में दूसरे विश्वयुद्ध और नाभा रियासत का जो चित्र मिलता है, उसका वर्णन कीजिए।

उत्तर — पाठ दूसरे विश्वयुद्ध के समय का है। नाभा रियासत के राजा को अंग्रेज़ों ने 1923 में गिरफ़्तार कर लिया था और युद्ध से पहले कोडाइकेनाल में उनका देहांत हो गया। उनका बेटा विलायत में पढ़ रहा था, इसलिए रियासत में अंग्रेज़ों की ही चलती थी। फिर भी वे गाँवों से जबरन भरती नहीं कर पाए। इसलिए भरती अफ़सर नौटंकी वालों के साथ आकर गानों और फ़ौजी सुख-सुविधाओं के दृश्य दिखाकर युवकों को लुभाते थे।

8. प्रीतमचंद के व्यक्तित्व के दो रूप — कठोर और कोमल — पाठ में कैसे उभरते हैं?

उत्तर — स्कूल में प्रीतमचंद अत्यंत कठोर थे। उनका ठिगना गठीला शरीर, चेचक के दागों वाला चेहरा, बाज़-सी आँखें और कीलों वाले भारी बूट बच्चों को डराते थे। वे कतार में ज़रा-सी हरकत पर टूट पड़ते और मुर्गा बनाते। पर मुअत्तल होने के बाद वे चौबारे में दो तोतों को बादाम की गिरियाँ छीलकर खिलाते और मीठी बातें करते। यह विरोधाभास बच्चों को अलौकिक लगता था। इससे पता चलता है कि कठोर दिखने वाले व्यक्ति के भीतर भी कोमल भाव छिपे रहते हैं।

9. 'सपनों के-से दिन' पाठ के माध्यम से लेखक क्या संदेश देना चाहता है?

उत्तर — लेखक बताता है कि बचपन सपनों जैसा सुंदर होता है, पर भयपूर्ण शिक्षा-पद्धति उसे कड़वा भी बना देती है। बच्चों को खेल की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, क्योंकि खेल उनकी स्वाभाविक आवश्यकता है। अनुशासन भय और मार से नहीं, शर्मा जी जैसे स्नेह और समझ से होना चाहिए। एक 'शाबाश' का प्रोत्साहन साल-भर की डाँट से अधिक प्रभावी होता है। पाठ यह भी बताता है कि भाषा और बोली के भेद मानवीय संबंधों में बाधा नहीं बनते।

10. "हमारी समझ में ऐसी बातें तब नहीं आ पाती थीं, बस एक तरह इन्हें अलौकिक ही मानते थे" — आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर — यह पंक्ति प्रीतमचंद के तोतों से प्रेम के प्रसंग की है। जो मास्टर बच्चों को बिल्ला मार-मारकर उनकी चमड़ी उधेड़ देते थे, वही तोतों को प्यार से बादाम खिलाते और मीठी बातें करते थे। बालमन यह नहीं समझ पाता था कि एक ही व्यक्ति में कठोरता और कोमलता दोनों कैसे हो सकती हैं। इसलिए बच्चे इसे चमत्कार या अलौकिक बात मानते थे। बड़े होकर लेखक ने समझा कि मनुष्य का स्वभाव जटिल होता है।

10. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न

संचयन से बोर्ड परीक्षा में प्रायः 50–60 शब्दों के प्रश्न आते हैं; नीचे दिए प्रश्न बार-बार पूछे जाने वाले विषयों पर आधारित हैं।

⭐ सबसे महत्वपूर्ण (अवश्य तैयार करें)

  1. पीटी मास्टर प्रीतमचंद की चारित्रिक विशेषताएँ पाठ के आधार पर लिखिए।
  2. हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को मुअत्तल क्यों किया? इससे उनके चरित्र की कौन-सी विशेषता प्रकट होती है?
  3. पीटी साहब की 'शाबाश' बच्चों को फ़ौज के तमगों-सी क्यों लगती थी?
  4. विद्यार्थियों को अनुशासित करने की पाठ में वर्णित पद्धति और आज की मान्यताओं की तुलना कीजिए।
  5. नयी कक्षा में जाने पर लेखक का बालमन उदास क्यों हो जाता था?

महत्वपूर्ण

  1. 'कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती' — पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए।
  2. स्काउट परेड के समय लेखक स्वयं को फ़ौजी जवान क्यों समझता था?
  3. छुट्टियों का गृहकार्य पूरा करने के लिए लेखक क्या योजनाएँ बनाता था? वह ओमा जैसा 'बहादुर' क्यों बनना चाहता था?
  4. पाठ के आधार पर उस समय के समाज में शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।
  5. मुअत्तल होने के बाद पीटी साहब के व्यवहार को बच्चे 'अलौकिक' क्यों मानते थे?

मूल्यपरक / स्वयं विचार वाले प्रश्न

  1. खेल आपके लिए क्यों आवश्यक हैं? पढ़ाई और खेल में संतुलन कैसे बनाएँगे?
  2. एक आदर्श शिक्षक में कौन-से गुण होने चाहिए? शर्मा जी और प्रीतमचंद के उदाहरण से समझाइए।
  3. शारीरिक दंड बच्चों के मन पर क्या प्रभाव डालता है? पाठ के आधार पर अपने विचार लिखिए।
  4. पाठ का शीर्षक 'सपनों के-से दिन' कितना सार्थक है?
✍️ लेखन-संकेत — 50–60 शब्दों के उत्तर में पहला वाक्य सीधा उत्तर दे, फिर पाठ की एक-दो घटनाओं का उदाहरण दें (जैसे — मुर्गा बनाना, तोतों को बादाम खिलाना, 'शाबाश', पुरानी किताबें), और अंत में एक वाक्य निष्कर्ष या संदेश का लिखें।

— मनोज शर्मा, हिंदी शिक्षक | HINDI GYAN —

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