साखी (कबीर) — कक्षा 10 हिंदी स्पर्श: पात्र-चार्ट, व्याख्या, प्रश्नोत्तर और MCQ
कक्षा 10 हिंदी (स्पर्श भाग-2) के काव्य खंड के पहले पाठ 'साखी' की संपूर्ण अध्ययन सामग्री — कवि परिचय, आठों साखियाँ, साखियों में आए प्रतीकों का चार्ट, साखी-वार सरल व्याख्या, NCERT प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, 20 वस्तुनिष्ठ, 20 लघु-उत्तरीय, 10 दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न तथा परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न।
1. पाठ परिचय
'साखी' शब्द 'साक्षी' का तद्भव रूप है। साक्षी शब्द 'साक्ष्य' से बना है, जिसका अर्थ है — प्रत्यक्ष ज्ञान। संत परंपरा में शास्त्रों के ज्ञान से अधिक अनुभव से मिले ज्ञान का महत्त्व है, और यही प्रत्यक्ष ज्ञान गुरु शिष्य को देता है। साखी वास्तव में दोहा छंद ही है, जिसमें 13 और 11 मात्राओं पर विराम के साथ कुल 24 मात्राएँ होती हैं। इस पाठ की आठ साखियों में कबीर ने मीठी वाणी, ईश्वर की सर्वव्यापकता, अहंकार-त्याग, ईश्वर-प्रेम की व्याकुलता, निंदक का महत्त्व, सच्चे ज्ञान और मोह-त्याग जैसे जीवन-मूल्यों की शिक्षा दी है।
कवि परिचय — कबीर (1398–1518)
कबीर का जन्म 1398 में काशी में माना जाता है। वे गुरु रामानंद के शिष्य थे और कहा जाता है कि उन्होंने 120 वर्ष की आयु पाई। जीवन के अंतिम वर्ष मगहर में बिताए और वहीं देह त्यागी। कबीर ऐसे समय में हुए जब राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक उथल-पुथल चरम पर थी। वे क्रांतदर्शी कवि थे — एक ओर उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों पर तीखी चोट की, तो दूसरी ओर आत्मा-परमात्मा के विरह-मिलन के भावपूर्ण गीत गाए। वे शास्त्र-ज्ञान की अपेक्षा अनुभव-ज्ञान को महत्त्व देते थे; उनका विश्वास सत्संग में था और वे मानते थे कि ईश्वर एक है, निर्विकार है, अरूप है।
भाषा — कबीर जगह-जगह घूमकर अनुभव प्राप्त करते थे, इसलिए उनकी साखियों में अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी के शब्द मिलते हैं। इसी कारण उनकी भाषा को 'पचमेल खिचड़ी' या 'सधुक्कड़ी' कहा जाता है। उन्होंने अपने विचार सबद (पद) और साखी के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाए।
पाठ की आठों साखियाँ (मूल पाठ)
1. ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ॥
2. कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।
ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहिं॥
3. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥
4. सुखिया सब संसार है, खायै अरू सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै॥
5. बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ॥
6. निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।
बिन साबण पाँणीं बिना, निरमल करै सुभाइ॥
7. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ॥
8. हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि।
अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि॥
संदर्भ — कबीर ग्रंथावली (बाबू श्यामसुंदर दास), जैसा स्पर्श भाग-2 में संकलित है।
2. पात्रों का चार्ट
साखियों में कोई कहानी या मानव पात्र नहीं है। कबीर ने अपनी बात समझाने के लिए कुछ प्रतीकों का प्रयोग किया है — वही इन साखियों के 'पात्र' हैं।
| प्रतीक / पात्र | किस साखी में | किसका प्रतीक / भूमिका |
|---|---|---|
| मीठी वाणी | साखी 1 | अहंकार-रहित, दूसरों को सुख देने वाली बोली; बोलने वाले के मन को भी शीतलता देती है। |
| मृग (हिरण) | साखी 2 | अज्ञानी मनुष्य, जो ईश्वर को बाहर — मंदिर-मस्जिद, तीर्थ — में ढूँढता है। |
| कस्तूरी | साखी 2 | ईश्वर, जो मनुष्य के भीतर ही बसता है। |
| 'मैं' (अहंकार) | साखी 3 | ईश्वर-प्राप्ति की सबसे बड़ी बाधा। |
| दीपक / अँधियारा | साखी 3 | दीपक — ज्ञान (ईश्वर का साक्षात्कार); अँधियारा — अज्ञान और अहंकार। |
| सुखिया संसार | साखी 4 | सांसारिक लोग, जो खाने-सोने को ही सुख मानकर ईश्वर को भूले हुए हैं। |
| दुखिया कबीर | साखी 4 | सच्चा भक्त, जो संसार की नश्वरता जानकर 'जागता' है और प्रभु-विरह में 'रोता' है। |
| बिरह भुवंगम (साँप) | साखी 5 | ईश्वर से बिछुड़ने की पीड़ा, जिस पर कोई मंत्र (उपाय) असर नहीं करता। |
| निंदक | साखी 6 | आलोचक, जो बिना साबुन-पानी के हमारा स्वभाव निर्मल कर देता है। |
| पोथी-पंडित | साखी 7 | केवल किताबी ज्ञान रखने वाले; प्रेम के बिना ज्ञान अधूरा। |
| मुराड़ा (जलती लकड़ी) | साखी 8 | ज्ञान, जिससे कबीर ने अपना मोह-माया का 'घर' जला दिया। |
3. पात्रों से जुड़ी घटनाएँ (प्रसंग)
| प्रसंग | क्या होता है | सीख |
|---|---|---|
| मृग का वन-वन भटकना | हिरण की नाभि में कस्तूरी है, पर उसकी सुगंध से बेचैन होकर वह उसे जंगल में ढूँढता फिरता है। | ईश्वर हमारे भीतर है, उसे बाहर ढूँढना व्यर्थ है। |
| भीतर दीपक दिखना | जब तक 'मैं' था, ईश्वर नहीं मिले; अहंकार मिटते ही भीतर ज्ञान का दीपक जल गया और अँधेरा मिट गया। | अहंकार-त्याग से ही ईश्वर-प्राप्ति। |
| संसार सोता है, कबीर जागता है | लोग खा-पीकर सोते हैं और सुखी हैं; कबीर संसार की असलियत जानकर जागते और रोते हैं। | सच्चा सुख ईश्वर-भक्ति में है। |
| विरह रूपी साँप का डसना | विरह का साँप शरीर में बस गया है; कोई मंत्र काम नहीं करता — प्रभु-वियोगी या तो जीता नहीं, या पागल-सा हो जाता है। | ईश्वर-प्रेम की तीव्रता। |
| आँगन में निंदक की कुटिया | कबीर कहते हैं कि निंदक को आँगन में कुटिया बनाकर पास रखो। | आलोचना से स्वभाव सुधरता है। |
| अपना घर जलाना | कबीर ने ज्ञान की मशाल से अपना मोह-माया का घर जला दिया और अब उसी का घर जलाएँगे जो उनके साथ चलेगा। | मोह-त्याग के बिना भक्ति नहीं। |
4. पाठ की मुख्य बातें
- अहंकार छोड़कर मीठी वाणी बोलने से अपना मन शांत होता है और सुनने वालों को सुख मिलता है।
- ईश्वर कण-कण में, हर हृदय में बसा है; अज्ञानी मनुष्य उसे बाहर ढूँढता है।
- अहंकार और ईश्वर साथ नहीं रह सकते — 'मैं' मिटने पर ही ज्ञान का प्रकाश होता है।
- सांसारिक सुख क्षणिक है; सच्चा भक्त संसार की नश्वरता देखकर दुखी होता है।
- ईश्वर-विरह की पीड़ा पर कोई उपाय काम नहीं करता।
- निंदक हमारा हितैषी है — वह बिना साबुन-पानी के स्वभाव निर्मल करता है।
- प्रेम (ईश्वर-प्रेम) का एक अक्षर पढ़ लेने वाला ही सच्चा पंडित है, केवल पोथी पढ़ने वाला नहीं।
- भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए मोह-माया का त्याग ज़रूरी है।
- शिल्प — दोहा छंद, सधुक्कड़ी (पचमेल) भाषा, प्रतीकात्मकता, उपदेशात्मक शैली, दृष्टांत अलंकार, रूपक, अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश।
5. पाठ की व्याख्या
साखी 1 — ऐसी बाँणी बोलिये...
शब्दार्थ — बाँणी — बोली; आपा — अहंकार; खोइ — छोड़कर; सीतल — शीतल; औरन कौं — दूसरों को।
व्याख्या — कबीर कहते हैं कि हमें मन का अहंकार त्यागकर ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए, जिससे हमारा अपना तन-मन भी शीतल (शांत) हो और सुनने वालों को भी सुख मिले। अहंकार से भरी कड़वी बात दोनों को कष्ट देती है, जबकि विनम्र मीठी बात दोनों को सुख।
विशेष — 'मन का आपा' में अहंकार-त्याग का संदेश; 'सीतल' — शांति का भाव; सरल सधुक्कड़ी भाषा; उपदेशात्मक शैली; दोहा छंद।
साखी 2 — कस्तूरी कुंडलि बसै...
शब्दार्थ — कुंडलि — नाभि; मृग — हिरण; घटि घटि — कण-कण में / हर हृदय में।
व्याख्या — कस्तूरी हिरण की नाभि में ही होती है, पर वह उसकी सुगंध से बेचैन होकर उसे पूरे जंगल में ढूँढता फिरता है। इसी प्रकार ईश्वर हर प्राणी के हृदय में बसा है, किंतु अज्ञानी संसार उसे पहचान नहीं पाता और मंदिर-मस्जिद, तीर्थों में भटकता रहता है।
विशेष — दृष्टांत अलंकार (मृग-कस्तूरी के उदाहरण से ईश्वर की बात); 'घटि घटि' में पुनरुक्ति प्रकाश; ईश्वर की सर्वव्यापकता; बाह्याडंबर का विरोध।
साखी 3 — जब मैं था तब हरि नहीं...
व्याख्या — कबीर कहते हैं — जब तक मुझमें 'मैं' (अहंकार) था, तब तक हरि (ईश्वर) नहीं मिले; अब हरि मिल गए हैं तो 'मैं' नहीं रहा। जब हृदय में ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश हुआ, तो अज्ञान रूपी सारा अँधेरा मिट गया।
विशेष — 'मैं' — अहंकार का प्रतीक; 'दीपक' — ज्ञान, 'अँधियारा' — अज्ञान (रूपकात्मक प्रयोग); अहंकार और ईश्वर एक साथ नहीं रह सकते — यह भाव।
साखी 4 — सुखिया सब संसार है...
व्याख्या — सारा संसार खाने-पीने और सोने में ही मग्न है और स्वयं को सुखी समझता है। पर दास कबीर दुखी है — वह 'जागता' है अर्थात संसार की नश्वरता और ईश्वर से दूरी को समझ चुका है, इसलिए प्रभु-मिलन के लिए 'रोता' (व्याकुल रहता) है।
विशेष — 'सोना' — अज्ञान/सांसारिकता का प्रतीक, 'जागना' — ज्ञान/सजगता का प्रतीक; सुखिया-दुखिया का विरोधाभास; अनुप्रास ('सुखिया सब संसार')।
साखी 5 — बिरह भुवंगम तन बसै...
शब्दार्थ — भुवंगम — भुजंग, साँप; बियोगी — बिछुड़ा हुआ; बौरा — पागल।
व्याख्या — ईश्वर से बिछुड़ने की पीड़ा साँप के समान शरीर में बस गई है, जिस पर कोई मंत्र (उपाय) असर नहीं करता। राम (ईश्वर) से बिछुड़ा व्यक्ति जीवित नहीं रहता, और यदि जीता भी है तो पागल जैसा हो जाता है।
विशेष — 'बिरह भुवंगम' में रूपक अलंकार; विरह की तीव्रता का चित्रण; वियोग श्रृंगार की झलक।
साखी 6 — निंदक नेड़ा राखिये...
शब्दार्थ — नेड़ा — निकट; आँगणि — आँगन में; साबण — साबुन; सुभाइ — स्वभाव।
व्याख्या — कबीर सलाह देते हैं कि निंदा करने वाले को सदा अपने पास रखो — हो सके तो उसके लिए अपने आँगन में ही कुटिया बनवा दो। वह हमारी कमियाँ बताता रहता है, जिससे हम उन्हें सुधारते हैं; इस तरह वह बिना साबुन और पानी के ही हमारा स्वभाव निर्मल कर देता है।
विशेष — आलोचना को सकारात्मक रूप से लेने का संदेश; 'बिन साबण पाँणीं बिना' में विरोधाभासी चमत्कार; अनुप्रास ('निंदक नेड़ा')।
साखी 7 — पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा...
शब्दार्थ — पोथी — पुस्तक, ग्रंथ; मुवा — मर गया; अषिर — अक्षर; पीव — प्रिय (ईश्वर)।
व्याख्या — बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़ते-पढ़ते सारा संसार मर गया, पर कोई सच्चा ज्ञानी (पंडित) नहीं बन सका। जो प्रिय (ईश्वर) के प्रेम का एक अक्षर भी पढ़ ले, अर्थात ईश्वर से सच्चा प्रेम कर ले, वही वास्तव में पंडित है।
विशेष — किताबी ज्ञान पर अनुभव और प्रेम की श्रेष्ठता; 'पढ़ि पढ़ि' में पुनरुक्ति प्रकाश; 'पीव' — ईश्वर के लिए प्रेमपूर्ण संबोधन।
साखी 8 — हम घर जाल्या आपणाँ...
शब्दार्थ — जाल्या — जलाया; मुराड़ा — जलती हुई लकड़ी (मशाल); तास का — उसका; जे — जो।
व्याख्या — कबीर कहते हैं कि मैंने ज्ञान की जलती मशाल हाथ में लेकर अपना मोह-माया रूपी घर जला दिया है। अब जो मेरे साथ (भक्ति के मार्ग पर) चलना चाहे, मैं उसका घर भी जला दूँगा — अर्थात उसके मोह-बंधन भी नष्ट कर दूँगा।
विशेष — 'घर' — मोह-माया/सांसारिक बंधन का प्रतीक; 'मुराड़ा' — ज्ञान का प्रतीक; त्याग और वैराग्य का संदेश; प्रतीकात्मक शैली।
6. प्रश्न-अभ्यास (NCERT)
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर
1. मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है?
उत्तर — मीठी वाणी अहंकार-रहित और प्रेम से भरी होती है। सुनने वाले को उसमें अपनापन और सम्मान मिलता है, इसलिए उसे सुख होता है। बोलने वाले का मन भी क्रोध और अहंकार से मुक्त रहता है — उसमें कटुता की जलन नहीं होती, इसलिए उसका तन-मन शीतल (शांत) रहता है।
2. दीपक दिखाई देने पर अँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर — यहाँ दीपक ज्ञान का और अँधियारा अज्ञान व अहंकार का प्रतीक है। जब मनुष्य का अहंकार मिटता है, तो उसके भीतर ईश्वर के साक्षात्कार का ज्ञान-दीपक जल उठता है। जैसे दीपक जलते ही अँधेरा भाग जाता है, वैसे ही ज्ञान होते ही अज्ञान और 'मैं' का अंधकार मिट जाता है।
3. ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते?
उत्तर — हम अज्ञान और अहंकार के कारण ईश्वर को अपने भीतर नहीं खोजते, बल्कि मंदिर, मस्जिद, तीर्थ जैसे बाहरी स्थानों में ढूँढते हैं — ठीक वैसे ही जैसे हिरण अपनी नाभि की कस्तूरी को जंगल में ढूँढता है। ज्ञान की दृष्टि न होने के कारण हम सर्वव्यापक ईश्वर को नहीं देख पाते।
4. संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुखी कौन? यहाँ 'सोना' और 'जागना' किसके प्रतीक हैं? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर — जो लोग खाने-पीने और सोने को ही जीवन मानते हैं, वे अपने को सुखी समझते हैं। कबीर जैसे भक्त, जो संसार की नश्वरता समझकर ईश्वर से मिलने को व्याकुल रहते हैं, दुखी हैं। 'सोना' अज्ञान और सांसारिक भोगों में डूबे रहने का प्रतीक है, जबकि 'जागना' ज्ञान, सजगता और ईश्वर के प्रति सचेत रहने का। इनका प्रयोग यह बताने के लिए किया गया है कि सांसारिक सुख वास्तव में अज्ञान की नींद है और सच्चा भक्त जागकर ईश्वर-वियोग की पीड़ा अनुभव करता है।
5. अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है?
उत्तर — कबीर ने सुझाया है कि निंदक (आलोचक) को अपने पास रखना चाहिए, यहाँ तक कि आँगन में उसके लिए कुटिया बनवा देनी चाहिए। निंदक हमारी कमियाँ बताता है, हम उन्हें दूर करते हैं — इस तरह बिना साबुन-पानी के हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है।
6. 'ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ' — इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर — कवि कहना चाहता है कि केवल बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़ने से कोई ज्ञानी नहीं बनता। जो प्रिय (ईश्वर) के प्रेम का एक अक्षर पढ़ लेता है — अर्थात सच्चे मन से ईश्वर से प्रेम करता है — वही सच्चा पंडित (ज्ञानी) है। प्रेम और अनुभव का ज्ञान, किताबी ज्ञान से श्रेष्ठ है।
7. कबीर की उद्धृत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर — कबीर की भाषा सधुक्कड़ी या 'पचमेल खिचड़ी' है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी, पंजाबी आदि के शब्द मिलते हैं (जैसे बाँणी, नेड़ा, आँगणि, पाँणीं, जाल्या)। भाषा सरल, सहज और जनसाधारण की बोलचाल के निकट है। प्रतीकों (दीपक, मृग, भुवंगम, घर) और दृष्टांतों के प्रयोग से गहरी बात आसानी से समझ में आती है। शैली उपदेशात्मक है और दोहा छंद के कारण साखियाँ याद रखने में सरल हैं।
(ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए
1. बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
भाव — ईश्वर से बिछुड़ने की पीड़ा साँप की तरह शरीर में बस गई है। जैसे साँप का विष कभी-कभी किसी मंत्र से नहीं उतरता, वैसे ही विरह की इस पीड़ा पर कोई उपाय काम नहीं करता — इसका एकमात्र उपचार ईश्वर-मिलन है।
2. कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।
भाव — कस्तूरी हिरण की नाभि में होती है, पर वह उसे जंगल में खोजता फिरता है। इसी तरह ईश्वर मनुष्य के भीतर है, पर वह अज्ञानवश उसे बाहर तीर्थों और धर्मस्थलों में ढूँढता है।
3. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
भाव — जब तक मन में अहंकार था, तब तक ईश्वर की अनुभूति नहीं हुई। अहंकार मिटते ही ईश्वर की प्राप्ति हो गई। अहंकार और ईश्वर एक साथ नहीं रह सकते।
4. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
भाव — ग्रंथ पढ़ते-पढ़ते पूरा संसार समाप्त हो गया, पर केवल किताबी ज्ञान से कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बना। सच्चा ज्ञान प्रेम और अनुभव से आता है।
भाषा अध्ययन — प्रचलित रूप लिखिए
| पाठ का शब्द | प्रचलित रूप | पाठ का शब्द | प्रचलित रूप |
|---|---|---|---|
| जिवै | जीना | औरन | औरों को / दूसरों को |
| माँहि | में / भीतर | देख्या | देखा |
| भुवंगम | भुजंग (साँप) | नेड़ा | निकट |
| आँगणि | आँगन | साबण | साबुन |
| मुवा | मरा / मर गया | पीव | प्रिय |
| जालौं | जलाऊँ | तास | उसका |
7. अतिरिक्त प्रश्न — 20 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
- 'साखी' शब्द किस शब्द का तद्भव रूप है? (क) सखी (ख) साक्षी (ग) शाखा (घ) साख
- 'साखी' किस छंद में लिखी गई है? (क) चौपाई (ख) सोरठा (ग) दोहा (घ) कवित्त
- दोहे में कुल कितनी मात्राएँ होती हैं (प्रत्येक चरण-युग्म में)? (क) 16 (ख) 24 (ग) 28 (घ) 32
- कबीर के गुरु कौन थे? (क) वल्लभाचार्य (ख) रामानंद (ग) रैदास (घ) नामदेव
- कबीर ने जीवन के अंतिम वर्ष कहाँ बिताए? (क) काशी (ख) मगहर (ग) प्रयाग (घ) मथुरा
- कबीर की भाषा को क्या कहा जाता है? (क) अवधी (ख) ब्रज (ग) सधुक्कड़ी (घ) मैथिली
- 'बाँणी' का अर्थ है— (क) पानी (ख) बोली (ग) बाण (घ) बनी
- 'आपा' का अर्थ है— (क) बहन (ख) आप (ग) अहंकार (घ) आपत्ति
- कस्तूरी हिरण के किस अंग में होती है? (क) सींग (ख) नाभि (कुंडलि) (ग) खाल (घ) पूँछ
- साखी 3 में 'दीपक' किसका प्रतीक है? (क) अहंकार (ख) ज्ञान (ग) धन (घ) प्रेम
- कबीर के अनुसार संसार सुखी क्यों है? (क) भक्ति के कारण (ख) खाने और सोने के कारण (ग) ज्ञान के कारण (घ) धन के कारण
- 'जागै अरू रोवै' कौन है? (क) संसार (ख) पंडित (ग) दास कबीर (घ) निंदक
- 'भुवंगम' का अर्थ है— (क) भ्रमर (ख) साँप (ग) भूमि (घ) बादल
- 'बिरह भुवंगम' में कौन-सा अलंकार है? (क) उपमा (ख) रूपक (ग) यमक (घ) श्लेष
- कबीर निंदक को कहाँ रखने की सलाह देते हैं? (क) गाँव से बाहर (ख) आँगन में कुटिया बनाकर (ग) दूर (घ) मंदिर में
- निंदक बिना किसके स्वभाव निर्मल करता है? (क) गुरु के (ख) साबुन-पानी के (ग) धन के (घ) ग्रंथ के
- 'पीव' का अर्थ है— (क) पानी (ख) प्रिय (ग) पीला (घ) पीड़ा
- कबीर के अनुसार सच्चा पंडित कौन है? (क) जो पोथी पढ़े (ख) जो प्रिय (ईश्वर) के प्रेम का एक अक्षर पढ़े (ग) जो संस्कृत जाने (घ) जो तीर्थ करे
- 'मुराड़ा' का अर्थ है— (क) मोर (ख) जलती हुई लकड़ी (ग) मुरली (घ) मूर्ति
- साखी 8 में 'घर' किसका प्रतीक है? (क) मकान (ख) मोह-माया / सांसारिक बंधन (ग) परिवार (घ) मंदिर
8. 20 लघु-उत्तरीय प्रश्न
1. 'साखी' का अर्थ क्या है?
उत्तर — 'साखी' 'साक्षी' का तद्भव रूप है, जिसका अर्थ है प्रत्यक्ष ज्ञान — वह ज्ञान जो गुरु अनुभव से शिष्य को देता है।
2. साखी का छंद-विधान बताइए।
उत्तर — साखी दोहा छंद है — 13 और 11 मात्राओं पर विराम के साथ कुल 24 मात्राएँ।
3. कबीर की भाषा 'पचमेल खिचड़ी' क्यों कहलाती है?
उत्तर — क्योंकि उसमें अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी, पंजाबी आदि कई भाषाओं के शब्द मिले हुए हैं।
4. कबीर किस प्रकार के भक्त थे?
उत्तर — कबीर निर्गुण (निराकार) ईश्वर के उपासक थे; वे ईश्वर को एक, निर्विकार और अरूप मानते थे।
5. कबीर ने किस प्रकार की वाणी बोलने की सलाह दी है?
उत्तर — अहंकार त्यागकर ऐसी मीठी वाणी, जो अपने को शीतलता और दूसरों को सुख दे।
6. मृग वन-वन क्यों भटकता है?
उत्तर — उसकी नाभि में कस्तूरी है, पर वह यह नहीं जानता और सुगंध के स्रोत को बाहर जंगल में खोजता है।
7. 'घटि घटि राँम है' का क्या अर्थ है?
उत्तर — ईश्वर हर प्राणी के हृदय में, कण-कण में बसा है।
8. 'मैं' और 'हरि' साथ क्यों नहीं रह सकते?
उत्तर — क्योंकि 'मैं' अहंकार है; अहंकार रहते ईश्वर की अनुभूति नहीं होती, अहंकार मिटने पर ही ईश्वर मिलते हैं।
9. संसार को 'सुखिया' क्यों कहा गया है?
उत्तर — क्योंकि सांसारिक लोग खाने-पीने और सोने को ही सुख मानकर संतुष्ट रहते हैं।
10. कबीर दुखी क्यों हैं?
उत्तर — वे संसार की नश्वरता समझ चुके हैं और ईश्वर से मिलने के लिए व्याकुल हैं।
11. विरह को साँप क्यों कहा गया है?
उत्तर — जैसे साँप का विष प्राण ले लेता है और मंत्र से भी न उतरे, वैसे ही ईश्वर-विरह असहनीय है और उस पर कोई उपाय काम नहीं करता।
12. राम-वियोगी की क्या दशा होती है?
उत्तर — वह या तो जीवित नहीं रहता, या जीवित रहे तो पागल-सा हो जाता है।
13. निंदक को पास रखने से क्या लाभ है?
उत्तर — वह हमारी कमियाँ बताता है, जिन्हें सुधारकर हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है।
14. 'बिन साबण पाँणीं बिना' का आशय क्या है?
उत्तर — निंदक बिना किसी बाहरी साधन (साबुन-पानी) के, केवल आलोचना से हमारे मन का मैल दूर कर देता है।
15. कबीर ने पोथी-ज्ञान को व्यर्थ क्यों कहा?
उत्तर — क्योंकि ग्रंथ पढ़कर भी लोग सच्चे ज्ञानी नहीं बने; ईश्वर-प्रेम के बिना किताबी ज्ञान अधूरा है।
16. 'अषिर' और 'पीव' के अर्थ लिखिए।
उत्तर — अषिर — अक्षर; पीव — प्रिय (ईश्वर)।
17. कबीर ने अपना घर कैसे जलाया?
उत्तर — ज्ञान रूपी जलती लकड़ी (मुराड़ा) से उन्होंने मोह-माया रूपी अपना घर जला दिया।
18. कबीर किसका घर जलाने की बात करते हैं?
उत्तर — उसका, जो उनके साथ भक्ति के मार्ग पर चलना चाहे — वे उसके मोह-बंधन भी नष्ट कर देंगे।
19. साखी 2 में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर — दृष्टांत अलंकार; साथ ही 'घटि घटि' में पुनरुक्ति प्रकाश।
20. कबीर किन बातों के विरोधी थे?
उत्तर — धार्मिक आडंबर, बाहरी दिखावा, अहंकार, कोरा पुस्तकीय ज्ञान और मोह-माया के।
9. 10 दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न
1. कबीर की साखियों के आधार पर मधुर वाणी का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर — कबीर कहते हैं कि मन का अहंकार त्यागकर ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो सुनने वाले को सुख दे और बोलने वाले को भी शीतलता। मधुर वाणी संबंधों को मज़बूत करती है, झगड़े और कटुता मिटाती है, और व्यक्ति को सबका प्रिय बनाती है। कड़वे वचन तलवार से भी गहरा घाव करते हैं, जबकि मीठे वचन बिना किसी खर्च के दूसरे का मन जीत लेते हैं। अहंकार-रहित वाणी बोलने वाले का मन भी क्रोध, ईर्ष्या और तनाव से मुक्त रहता है। आज के समय में भी परिवार, विद्यालय, कार्यस्थल — हर जगह मधुर वाणी सफलता और शांति की कुंजी है।
2. 'कस्तूरी कुंडलि बसै...' साखी के माध्यम से कबीर ने क्या संदेश दिया है? आज के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर — इस साखी में कबीर ने बताया है कि ईश्वर हर प्राणी के भीतर है, जैसे कस्तूरी हिरण की नाभि में; पर मनुष्य अज्ञानवश उसे तीर्थों, मंदिरों, मस्जिदों में ढूँढता फिरता है। आज भी लोग दिखावे की पूजा, महँगे अनुष्ठानों और यात्राओं में ईश्वर खोजते हैं, पर अपने आचरण, दया और सच्चाई पर ध्यान नहीं देते। कबीर का संदेश है कि ईश्वर को पाने के लिए बाहर भटकने की बजाय अपने मन को शुद्ध करो, हर प्राणी में ईश्वर देखो और सबसे प्रेम करो। यही सच्ची भक्ति है।
3. कबीर ने 'सोने' और 'जागने' के प्रतीकों से संसार और भक्त का अंतर कैसे बताया है?
उत्तर — कबीर कहते हैं कि सारा संसार खाने और सोने में मग्न होकर सुखी है, जबकि दास कबीर जागते हैं और रोते हैं। यहाँ 'सोना' अज्ञान, मोह और भोग-विलास में डूबे रहने का प्रतीक है; ऐसे लोग जीवन की नश्वरता और ईश्वर से दूरी पर विचार नहीं करते, इसलिए स्वयं को सुखी मानते हैं। 'जागना' ज्ञान और सजगता का प्रतीक है; भक्त जान चुका है कि यह संसार क्षणभंगुर है और जीवन का लक्ष्य ईश्वर-प्राप्ति है, इसलिए वह प्रभु से मिलने को व्याकुल होकर 'रोता' है। यह दुख वास्तव में आध्यात्मिक जागरण का संकेत है, जो सांसारिक सुख से श्रेष्ठ है।
4. 'निंदक नेड़ा राखिये' — निंदक को पास रखने की सलाह आज के जीवन में कितनी उपयोगी है?
उत्तर — कबीर कहते हैं कि निंदक को अपने आँगन में कुटिया बनाकर रखो, क्योंकि वह बिना साबुन-पानी के स्वभाव निर्मल कर देता है। प्रशंसा करने वाले हमें हमारी कमियाँ नहीं बताते, जिससे हम अहंकारी और लापरवाह हो जाते हैं; आलोचक हमारी गलतियाँ दिखाकर सुधार का अवसर देता है। आज के जीवन में भी विद्यार्थी के लिए शिक्षक की टिप्पणी, खिलाड़ी के लिए कोच की आलोचना, या किसी संस्था के लिए ग्राहकों की शिकायत — सब सुधार के साधन हैं। आलोचना को सहनशीलता से सुनने से विनम्रता आती है और व्यक्तित्व निखरता है। इसलिए यह सलाह आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है।
5. कबीर ने पुस्तकीय ज्ञान और प्रेम के ज्ञान में से किसे श्रेष्ठ माना है और क्यों?
उत्तर — कबीर ने प्रेम के ज्ञान को श्रेष्ठ माना है। वे कहते हैं कि ग्रंथ पढ़ते-पढ़ते संसार मर गया, पर कोई पंडित नहीं बना; जो ईश्वर के प्रेम का एक अक्षर पढ़ ले, वही पंडित है। कबीर स्वयं अनुभव-ज्ञान के समर्थक थे — शास्त्रों का रटा हुआ ज्ञान व्यक्ति को अहंकारी बना सकता है, पर प्रेम उसे विनम्र, दयालु और ईश्वर के निकट बनाता है। ज्ञान का असली उद्देश्य जीवन को बेहतर बनाना है; यदि पढ़-लिखकर भी व्यक्ति में प्रेम, करुणा और सद्व्यवहार नहीं आया, तो वह ज्ञान व्यर्थ है।
6. 'हम घर जाल्या आपणाँ...' साखी का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कबीर किस प्रकार के अनुयायी चाहते हैं।
उत्तर — इस साखी में 'घर' मोह-माया और सांसारिक आसक्तियों का प्रतीक है तथा 'मुराड़ा' (जलती लकड़ी) ज्ञान का। कबीर कहते हैं कि उन्होंने ज्ञान की मशाल से अपना मोह-माया का घर जला दिया है। अब जो उनके साथ चलना चाहे, उसे भी अपने मोह-बंधन त्यागने होंगे — कबीर उसका 'घर' भी जला देंगे। कबीर ऐसे अनुयायी चाहते हैं जो त्याग के लिए तैयार हों, जो धन, पद, अहंकार और सांसारिक बंधनों को छोड़कर सच्चाई और भक्ति के कठिन मार्ग पर चल सकें। यह साखी वैराग्य और साहस का संदेश देती है।
7. कबीर की साखियों में व्यक्त जीवन-मूल्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर — साखियों में अनेक जीवन-मूल्य मिलते हैं — (1) मधुर और विनम्र वाणी; (2) अहंकार-त्याग; (3) ईश्वर की सर्वव्यापकता और आडंबर-विरोध; (4) आत्म-जागरण — भोग में न डूबकर जीवन के लक्ष्य के प्रति सजगता; (5) ईश्वर के प्रति गहरा प्रेम; (6) आलोचना को स्वीकार करने की सहनशीलता; (7) किताबी ज्ञान की जगह व्यावहारिक, प्रेमपूर्ण ज्ञान; (8) मोह-माया का त्याग। ये मूल्य आज भी व्यक्ति और समाज को बेहतर बनाने में सहायक हैं।
8. कबीर की भाषा-शैली की विशेषताएँ साखियों के उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर — कबीर की भाषा सधुक्कड़ी (पचमेल खिचड़ी) है — 'नेड़ा', 'आँगणि', 'पाँणीं' (राजस्थानी/पंजाबी प्रभाव), 'जाल्या', 'देख्या' आदि। भाषा सरल और लोक-जीवन से जुड़ी है। वे प्रतीकों का कुशल प्रयोग करते हैं — दीपक (ज्ञान), भुवंगम (विरह), घर (मोह)। दृष्टांत अलंकार ('कस्तूरी कुंडलि बसै'), रूपक ('बिरह भुवंगम'), अनुप्रास ('सुखिया सब संसार') और पुनरुक्ति प्रकाश ('पढ़ि पढ़ि', 'घटि घटि') मिलते हैं। शैली उपदेशात्मक है और दोहा छंद के कारण साखियाँ गेय और याद रखने योग्य हैं।
9. कबीर के जीवन और व्यक्तित्व का परिचय देते हुए उनके समाज-सुधारक रूप पर प्रकाश डालिए।
उत्तर — कबीर का जन्म 1398 में काशी में माना जाता है; वे रामानंद के शिष्य थे और जीवन के अंतिम वर्ष मगहर में बिताए। वे जुलाहे का काम करते हुए भी भक्ति और ज्ञान की बातें जन-जन तक पहुँचाते रहे। उनके समय में समाज में धार्मिक कट्टरता, जाति-भेद और आडंबर फैले थे। कबीर ने निर्भीक होकर हिंदू-मुसलमान दोनों के पाखंडों पर चोट की, एक निराकार ईश्वर की बात की, मानवता और प्रेम को सबसे बड़ा धर्म बताया। उन्होंने अनुभव-ज्ञान और सत्संग का महत्त्व बताया। इस प्रकार वे भक्त कवि होने के साथ-साथ एक महान समाज-सुधारक थे।
10. 'जब मैं था तब हरि नहीं...' साखी में अहंकार और ज्ञान के संबंध को समझाइए।
उत्तर — कबीर कहते हैं कि जब तक उनमें 'मैं' (अहंकार) था, तब तक हरि नहीं मिले; अब हरि मिले हैं तो 'मैं' नहीं है। अहंकार मनुष्य को स्वयं को सबसे बड़ा मानने पर मजबूर करता है, जिससे वह ईश्वर और दूसरों के प्रति विनम्र नहीं हो पाता — यही अज्ञान का अँधेरा है। जब मनुष्य अहंकार छोड़ता है, तब उसके भीतर ज्ञान का दीपक जलता है और उसे ईश्वर का अनुभव होता है; अज्ञान का अंधकार मिट जाता है। अर्थात अहंकार और ज्ञान (ईश्वर-अनुभूति) विरोधी हैं — एक के रहते दूसरा नहीं रह सकता।
10. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न
इस पाठ से प्रायः साखी का भाव, प्रतीकों का अर्थ ('सोना-जागना', 'दीपक', 'भुवंगम') और कबीर की भाषा पर प्रश्न आते हैं।
⭐ सबसे महत्वपूर्ण (अवश्य तैयार करें)
- मीठी वाणी से अपने तन को शीतलता और औरों को सुख कैसे मिलता है?
- ईश्वर कण-कण में है, फिर भी हम उसे क्यों नहीं देख पाते?
- 'सोना' और 'जागना' किसके प्रतीक हैं?
- निंदक को पास रखने की सलाह क्यों दी गई है?
- 'ऐकै अषिर पीव का...' का आशय।
महत्वपूर्ण
- दीपक दिखने पर अँधियारा कैसे मिटता है?
- 'बिरह भुवंगम तन बसै' का भाव।
- कबीर की भाषा को सधुक्कड़ी क्यों कहते हैं?
- 'हम घर जाल्या आपणाँ' में 'घर' और 'मुराड़ा' का प्रतीकार्थ।
व्याकरण / मूल्यपरक
- प्रचलित रूप — औरन, माँहि, देख्या, भुवंगम, नेड़ा, आँगणि, साबण, मुवा, पीव, जालौं, तास।
- अलंकार — दृष्टांत, रूपक, अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश के उदाहरण।
- साखी और दोहे का संबंध; दोहे की मात्राएँ।
🔗 कक्षा 10 हिंदी — स्पर्श व संचयन के सभी पाठ आपस में जुड़े हुए
- साखी — कबीर (स्पर्श) (आप यही पढ़ रहे हैं)
— मनोज शर्मा, हिंदी शिक्षक | HINDI GYAN —
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