डायरी का एक पन्ना (सीताराम सेकसरिया) कक्षा 10 हिंदी स्पर्श — पात्र-चार्ट, व्याख्या, प्रश्नोत्तर और MCQ
डायरी का एक पन्ना (सीताराम सेकसरिया) — कक्षा 10 हिंदी स्पर्श: पात्र-चार्ट, व्याख्या, प्रश्नोत्तर और MCQ
कक्षा 10 हिंदी (स्पर्श भाग-2) के पाठ 'डायरी का एक पन्ना' की संपूर्ण अध्ययन सामग्री — लेखक परिचय, पाठ का सार, पात्रों का चार्ट, पात्रों से जुड़ी घटनाएँ, प्रसंग-वार व्याख्या, NCERT प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, 20 वस्तुनिष्ठ, 20 लघु-उत्तरीय, 10 दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न तथा परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न।
1. पाठ परिचय
'डायरी का एक पन्ना' सीताराम सेकसरिया की डायरी का 26 जनवरी 1931 का अंश है। इसमें कलकत्ता (कोलकाता) के लोगों द्वारा देश का दूसरा स्वतंत्रता दिवस मनाने, पुलिस के अत्याचार और विशेषकर स्त्रियों की साहसिक भागीदारी का आँखों देखा वर्णन है। पाठ बताता है कि संगठित और कृतसंकल्प समाज कुछ भी कर सकता है।
लेखक परिचय — सीताराम सेकसरिया (1892–1982)
सीताराम सेकसरिया का जन्म 1892 में राजस्थान के नवलगढ़ में हुआ, पर उनका अधिकांश जीवन कलकत्ता में बीता। वे व्यापार-व्यवसाय से जुड़े थे और अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक व नारी-शिक्षा संस्थाओं के प्रेरक, संस्थापक और संचालक रहे। गांधी जी के आह्वान पर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया, सत्याग्रह के दौरान जेल गए और कुछ समय आज़ाद हिंद फ़ौज के मंत्री भी रहे। वे रवींद्रनाथ ठाकुर, गांधी जी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के करीबी थे। 1962 में उन्हें पद्मश्री मिला।
विशेष — उन्हें विद्यालयी शिक्षा का अवसर नहीं मिला; स्वाध्याय से पढ़ना-लिखना सीखा। प्रमुख कृतियाँ — स्मृतिकण, मन की बात, बीता युग, नयी याद और दो भागों में 'एक कार्यकर्ता की डायरी'।
पाठ का सार
- 26 जनवरी 1930 को पहली बार पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था; 1931 में उसकी पुनरावृत्ति थी। केवल प्रचार पर दो हज़ार रुपये खर्च हुए और कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर समझाया गया।
- बड़े बाज़ार के मकानों पर राष्ट्रीय झंडे फहरा रहे थे, मानो स्वतंत्रता मिल गई हो। पुलिस पूरी ताकत से गश्त कर रही थी; पार्कों और मैदानों को सवेरे से घेर लिया गया था।
- श्रद्धानंद पार्क में अविनाश बाबू ने झंडा गाड़ा तो पकड़े गए; तारा सुंदरी पार्क में मारपीट हुई; गुजराती सेविका संघ की लड़कियाँ गिरफ़्तार हुईं।
- पुलिस कमिश्नर ने सभा पर रोक का नोटिस निकाला, जबकि कौंसिल ने घोषणा की कि मोनुमेंट के नीचे 4 बजकर 24 मिनट पर झंडा फहराया जाएगा — यह खुला चैलेंज था।
- सुभाष बाबू 4:10 पर जुलूस लेकर आए; पुलिस ने लाठियाँ चलाईं, उन पर भी लाठियाँ पड़ीं, पर वे "वंदे मातरम्" बोलते आगे बढ़ते रहे। उन्हें गिरफ़्तार कर लालबाज़ार लॉकअप भेजा गया।
- स्त्रियों ने मोनुमेंट की सीढ़ियों पर झंडा फहराकर घोषणा पढ़ी; धर्मतल्ले के मोड़ पर 50-60 स्त्रियाँ बैठ गईं; विमल प्रतिभा के नेतृत्व में दूसरा दल बहू बाज़ार पर रोका गया। कुल 105 स्त्रियाँ गिरफ़्तार हुईं।
- लगभग 200 लोग घायल हुए। लेखक के अनुसार इस दिन बंगाल और कलकत्ता पर लगा "काम नहीं होने" का कलंक बहुत हद तक धुल गया।
2. पात्रों का चार्ट
यह डायरी है, इसलिए इसके पात्र वास्तविक व्यक्ति हैं; केंद्र में सुभाष बाबू, स्त्री-कार्यकर्ता और स्वयं लेखक हैं।
| पात्र | परिचय | भूमिका / विशेषता |
|---|---|---|
| लेखक (सीताराम सेकसरिया) | डायरी-लेखक, कार्यकर्ता; डायरी में स्वयं को 'अपने' कहते हैं | प्रत्यक्षदर्शी, संगठनकर्ता, संवेदनशील; घायलों की सेवा में लगे |
| सुभाष बाबू (नेताजी सुभाषचंद्र बोस) | जुलूस के नेता | निडर, दृढ़-संकल्पी; लाठियाँ खाकर भी "वंदे मातरम्" बोलते आगे बढ़े; गिरफ़्तार हुए |
| अविनाश बाबू | बंगाल प्रांतीय विद्यार्थी संघ के मंत्री | श्रद्धानंद पार्क में झंडा गाड़ा, पकड़े गए |
| हरिश्चंद्र सिंह | बड़ा बाज़ार कांग्रेस कमेटी के युद्ध मंत्री | तारा सुंदरी पार्क में झंडा फहराने गए, भीतर न जा सके |
| पूर्णोदास | सुभाष बाबू के जुलूस के प्रबंधक | प्रबंध पूरा करके दो-तीन बजे गिरफ़्तार हुए |
| पुरुषोत्तम राय | कार्यकर्ता | दोपहर में गिरफ़्तार |
| ज्योतिर्मय गांगुली | सुभाष बाबू के साथी | सुभाष बाबू को किनारे आने को कहा |
| क्षितीश चटर्जी | जुलूस में घायल | लाठी से सिर फट गया |
| विमल प्रतिभा | स्त्रियों के एक दल की नेता | बहू बाज़ार के मोड़ पर साथियों सहित धरने पर बैठीं, गिरफ़्तार |
| वृजलाल गोयनका | लेखक का साथी, दमदम जेल में भी साथ रहा | झंडा लेकर दौड़ा, गिरा, घुड़सवार की लाठी खाई; 200 लोगों का जुलूस लेकर लालबाज़ार गया और गिरफ़्तार हुआ |
| जानकीदेवी | जमनालाल बजाज की पत्नी | बालिका विद्यालय के झंडोत्सव और घायलों की सेवा में लेखक के साथ |
| मदालसा | जानकीदेवी-जमनालाल बजाज की पुत्री | गिरफ़्तार हुई, थाने में मार भी खाई |
| डॉक्टर दासगुप्ता | चिकित्सक | घायलों की देख-रेख की और उनके फ़ोटो उतरवाए |
| पुलिस, गोरखे, सारजेंट | अंग्रेज़ी प्रशासन | लाठीचार्ज और दमन के प्रतीक |
3. पात्रों से जुड़ी घटनाएँ
| पात्र / समूह | घटना (समय-क्रम से) | घटना से पता चलता है |
|---|---|---|
| कार्यकर्ता | प्रचार पर 2000 रुपये खर्च, घर-घर जाकर समझाना; मकानों पर झंडे | संगठित तैयारी और जन-उत्साह |
| पुलिस | भोर छह बजे से मोनुमेंट और मैदान घेरना; मोड़ों पर गोरखे-सारजेंट तैनात | सरकार का भय और दमन की तैयारी |
| अविनाश बाबू | श्रद्धानंद पार्क में झंडा गाड़ते ही गिरफ़्तार | राष्ट्रीय ध्वज फहराना भी अपराध था |
| हरिश्चंद्र सिंह | तारा सुंदरी पार्क में झंडा फहराने पहुँचे; मारपीट, दो-चार के सिर फटे | पुलिस की हिंसा |
| मारवाड़ी बालिका विद्यालय | 11 बजे झंडोत्सव; लड़कियों को उत्सव का अर्थ समझाया गया | नई पीढ़ी में राष्ट्रीय चेतना |
| पूर्णोदास, पुरुषोत्तम राय | दो-तीन बजे गिरफ़्तार | मुख्य कार्यकर्ताओं को पहले ही रोकने की कोशिश |
| सुभाष बाबू | 4:10 पर जुलूस लेकर आए; चौरंगी पर रोके गए; लाठियाँ खाईं; "आगे बढ़ना है"; गिरफ़्तार कर लालबाज़ार लॉकअप भेजे गए | नेतृत्व का साहस |
| स्त्रियाँ | मोनुमेंट की सीढ़ियों पर झंडा फहराया, घोषणा पढ़ी; धर्मतल्ले पर 50-60 स्त्रियाँ बैठीं; कुल 105 गिरफ़्तार | स्वतंत्रता आंदोलन में स्त्रियों की सक्रिय भूमिका |
| वृजलाल गोयनका | मोनुमेंट की ओर दौड़ते गिरा, लाठी खाई, छोड़ा गया; फिर 200 लोगों का जुलूस लेकर गिरफ़्तार | अदम्य जोश |
| लेखक, जानकीदेवी | रात आठ बजे कांग्रेस ऑफ़िस में घायलों के लिए गाड़ी लेकर पहुँचे | सेवा-भाव |
| डॉ. दासगुप्ता | घायलों की देख-रेख और फ़ोटो उतरवाना (67, फिर 103 घायल) | अत्याचार के प्रमाण जुटाना |
4. पाठ की मुख्य बातें
- विधा — डायरी; पुस्तक — स्पर्श भाग-2।
- तिथि — 26 जनवरी 1931 (देश का दूसरा स्वतंत्रता दिवस); पहला 26 जनवरी 1930 को मनाया गया।
- पृष्ठभूमि — दिसंबर 1929 का लाहौर अधिवेशन (सभापति जवाहरलाल नेहरू), 'पूर्ण स्वराज्य' का प्रस्ताव।
- प्रचार-व्यय — केवल प्रचार में दो हज़ार रुपये।
- दो नोटिस — पुलिस कमिश्नर: सभा नहीं होगी, भाग लेने वाले दोषी; कौंसिल: 4:24 पर मोनुमेंट के नीचे झंडा फहराया जाएगा और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी जाएगी।
- समय — सुभाष बाबू 4:10 पर जुलूस लेकर आए।
- स्थान — मोनुमेंट (स्मारक), चौरंगी, धर्मतल्ला, बहू बाज़ार, लालबाज़ार लॉकअप, श्रद्धानंद पार्क, तारा सुंदरी पार्क।
- आँकड़े — 105 स्त्रियाँ गिरफ़्तार (रात 9 बजे छोड़ी गईं); कांग्रेस ऑफ़िस में 67 फिर 103 घायल; 160 अस्पताल में; कुल लगभग 200 घायल।
- भाषा-शैली — लेखक स्वयं के लिए 'अपने/अपना' का प्रयोग करते हैं; अंग्रेज़ी शब्द — ओपन लड़ाई, चैलेंज, लॉकअप, वालंटियर।
- निष्कर्ष — कलकत्ता पर लगा "यहाँ काम नहीं हो रहा" का कलंक धुल गया।
5. पाठ की व्याख्या (प्रसंग-क्रम से)
प्रसंग 1 — अमर दिन की तैयारी
लेखक 26 जनवरी को "अमर दिन" कहते हैं, क्योंकि पिछले वर्ष इसी दिन पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। इस वर्ष कलकत्ता के लोगों ने पिछले साल से कहीं अधिक योगदान दिया — प्रचार में दो हज़ार रुपये लगे, कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर लोगों को समझाया और सबने इसे अपनी ज़िम्मेदारी माना।
प्रसंग 2 — सजा हुआ शहर और पुलिस का पहरा
बड़े बाज़ार के लगभग हर मकान पर झंडा था; सजावट ऐसी थी मानो आज़ादी मिल गई हो। दूसरी ओर पुलिस पूरी ताकत से गश्त कर रही थी — मोटर लारियों में गोरखे-सारजेंट, घुड़सवार; ट्रैफ़िक पुलिस तक को इसी काम में लगा दिया गया। यह जन-उत्साह और सरकारी भय का विरोधाभास है।
प्रसंग 3 — सुबह की झड़पें
मोनुमेंट को भोर छह बजे से घेर लिया गया, फिर भी कई जगह झंडे फहराए गए। अविनाश बाबू झंडा गाड़ते ही पकड़े गए, तारा सुंदरी पार्क में मारपीट हुई और गुजराती सेविका संघ की लड़कियाँ गिरफ़्तार हुईं। इससे दिखता है कि सरकार हर छोटे प्रतीक से भी डरती थी।
प्रसंग 4 — दो नोटिस : खुला चैलेंज
पुलिस कमिश्नर ने धारा लगाकर सभा पर रोक लगा दी और कार्यकर्ताओं को चेतावनी दी। इसके उत्तर में कौंसिल ने समय तय करके घोषणा की कि 4:24 पर मोनुमेंट के नीचे झंडा फहराया जाएगा और जनता उपस्थित रहे। लेखक इसे "ओपन लड़ाई" और "खुला चैलेंज" कहते हैं — पहले कभी इस तरह खुली चुनौती देकर सभा नहीं हुई थी।
प्रसंग 5 — सुभाष बाबू का जुलूस
4:10 पर सुभाष बाबू जुलूस लेकर आए। भीड़ के कारण पुलिस उन्हें चौरंगी पर नहीं रोक पाई, तब लाठियाँ चलीं। सुभाष बाबू पर भी लाठियाँ पड़ीं, पर उन्होंने ज्योतिर्मय गांगुली की सलाह न मानकर कहा — "आगे बढ़ना है।" लेखक स्वयं पास थे और उन्होंने क्षितीश चटर्जी का फटा सिर देखा। यह नेतृत्व के साहस का चित्र है।
प्रसंग 6 — स्त्रियों का साहस
उधर स्त्रियाँ मोनुमेंट की सीढ़ियों पर चढ़कर झंडा फहरा रही थीं और घोषणा पढ़ रही थीं। फिर उन्होंने जुलूस निकाला; धर्मतल्ले के मोड़ पर जुलूस टूटा तो 50-60 स्त्रियाँ वहीं बैठ गईं। विमल प्रतिभा का दल बहू बाज़ार पर धरने पर बैठा। कुल 105 स्त्रियाँ गिरफ़्तार हुईं — कलकत्ता में इतनी स्त्रियाँ एक साथ पहले कभी गिरफ़्तार नहीं हुई थीं।
प्रसंग 7 — वृजलाल गोयनका और मदालसा
वृजलाल गोयनका इतने जोश में दौड़ा कि अपने आप गिर पड़ा, घुड़सवार की लाठी खाई, छोड़ा गया, फिर 200 लोगों का जुलूस बनाकर लालबाज़ार पहुँचा और गिरफ़्तार हुआ। मदालसा को थाने में भी मारा गया। ये घटनाएँ आम कार्यकर्ताओं के अदम्य जोश को दिखाती हैं।
प्रसंग 8 — घायलों की सेवा और अपूर्व दिन
रात को लेखक जानकीदेवी के साथ घायलों के लिए गाड़ी लेकर कांग्रेस ऑफ़िस पहुँचे। डॉ. दासगुप्ता घायलों का इलाज करते हुए उनके फ़ोटो उतरवा रहे थे। लगभग 200 लोग घायल हुए। फिर भी लेखक इस दिन को "अपूर्व" कहते हैं, क्योंकि इससे बंगाल और कलकत्ता पर लगा निष्क्रियता का कलंक धुल गया और लोगों को विश्वास हुआ कि यहाँ भी बड़ा काम हो सकता है।
6. प्रश्न-अभ्यास (NCERT)
मौखिक — एक-दो पंक्तियों में
1. कलकत्ता वासियों के लिए 26 जनवरी 1931 का दिन क्यों महत्त्वपूर्ण था?
क्योंकि इसी दिन 1930 में पहली बार देशभर में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था और 1931 में उसकी पुनरावृत्ति थी, जिसे कलकत्ता वासियों ने पूरे जोश से मनाने की तैयारी की थी।
2. सुभाष बाबू के जुलूस का भार किस पर था?
सुभाष बाबू के जुलूस का भार पूर्णोदास पर था।
3. विद्यार्थी संघ के मंत्री अविनाश बाबू के झंडा गाड़ने पर क्या प्रतिक्रिया हुई?
पुलिस ने अविनाश बाबू को पकड़ लिया तथा वहाँ मौजूद अन्य लोगों को मारा या हटा दिया।
4. लोग अपने-अपने मकानों व सार्वजनिक स्थलों पर राष्ट्रीय झंडा फहराकर किस बात का संकेत देना चाहते थे?
वे संकेत देना चाहते थे कि वे स्वयं को स्वतंत्र मानते हैं, अंग्रेज़ी शासन को स्वीकार नहीं करते और आज़ादी के लिए एकजुट हैं।
5. पुलिस ने बड़े-बड़े पार्कों तथा मैदानों को क्यों घेर लिया था?
ताकि लोग वहाँ इकट्ठे होकर झंडा न फहरा सकें, सभा न कर सकें और स्वतंत्रता दिवस न मना सकें।
लिखित (क) — 25-30 शब्दों में
1. 26 जनवरी 1931 के दिन को अमर बनाने के लिए क्या-क्या तैयारियाँ की गईं?
केवल प्रचार पर दो हज़ार रुपये खर्च किए गए। कार्यकर्ताओं के घर जा-जाकर उन्हें समझाया गया। मकानों और सार्वजनिक स्थलों पर झंडे लगाए गए, सजावट की गई, जुलूस और मोनुमेंट के नीचे सभा की योजना बनाई गई।
2. 'आज जो बात थी वह निराली थी' — किस बात से पता चल रहा था कि आज का दिन अपने आप में निराला है?
पुलिस के कड़े पहरे और नोटिस के बावजूद तीन बजे से ही मैदान में हज़ारों लोगों की भीड़ जुटने लगी थी और लोग टोलियाँ बनाकर घूम रहे थे। लोगों में भय नहीं, उत्साह था; ऐसी खुली चुनौती पहले कभी नहीं दी गई थी।
3. पुलिस कमिश्नर के नोटिस और कौंसिल के नोटिस में क्या अंतर था?
पुलिस कमिश्नर के नोटिस में कहा गया था कि कोई सभा नहीं हो सकती और भाग लेने वाले दोषी माने जाएँगे। कौंसिल के नोटिस में कहा गया था कि 4:24 पर मोनुमेंट के नीचे झंडा फहराया जाएगा, स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी जाएगी और सर्वसाधारण उपस्थित हों।
4. धर्मतल्ले के मोड़ पर आकर जुलूस क्यों टूट गया?
भीड़ बहुत बढ़ गई थी और पुलिस ने फिर से डंडे बरसाने शुरू कर दिए, जिससे बहुत लोग घायल हुए। इसी कारण धर्मतल्ले के मोड़ पर जुलूस टूट गया और 50-60 स्त्रियाँ वहीं बैठ गईं।
5. डॉ. दासगुप्ता घायलों के फ़ोटो भी उतरवा रहे थे। इसकी क्या वजह हो सकती थी?
फ़ोटो पुलिस के अत्याचार का प्रमाण थे। इन्हें समाचार-पत्रों में छापकर देश-दुनिया को अंग्रेज़ों की क्रूरता दिखाई जा सकती थी, लोगों में जागरूकता फैलाई जा सकती थी और ज़रूरत पड़ने पर सबूत के रूप में प्रयोग किया जा सकता था।
लिखित (ख) — 50-60 शब्दों में
1. सुभाष बाबू के जुलूस में स्त्री समाज की क्या भूमिका थी?
स्त्रियों ने बहुत बड़ी संख्या में भाग लिया। वे जगह-जगह से जुलूस बनाकर मोनुमेंट पहुँचीं, लाठियों के बीच सीढ़ियों पर चढ़कर झंडा फहराया और स्वतंत्रता की घोषणा पढ़ी। धर्मतल्ले और बहू बाज़ार के मोड़ पर वे धरने पर बैठ गईं। पुलिस की मार और गिरफ़्तारी से नहीं डरीं — 105 स्त्रियाँ गिरफ़्तार हुईं। उन्होंने सिद्ध किया कि आज़ादी की लड़ाई में वे पुरुषों से पीछे नहीं।
2. जुलूस के लालबाज़ार आने पर लोगों की क्या दशा हुई?
लालबाज़ार पहुँचने पर बहुत से लोगों को गिरफ़्तार कर लॉकअप में डाल दिया गया। सुभाष बाबू, मदालसा, वृजलाल गोयनका आदि वहीं भेजे गए; मदालसा को थाने में मारा भी गया। 105 स्त्रियाँ लॉकअप में थीं। लाठियों से अनेक लोग घायल हुए और कई की हालत गंभीर थी।
3. 'जब से कानून भंग का काम शुरू हुआ है...' — यहाँ किस कानून को भंग करने की बात है? क्या कानून भंग करना उचित था?
यहाँ अंग्रेज़ सरकार (पुलिस कमिश्नर) द्वारा लागू सभा-निषेध और झंडा फहराने पर रोक जैसे दमनकारी कानूनों को भंग करने की बात है, जो गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन का हिस्सा था। ऐसे कानून भंग करना उचित था, क्योंकि वे भारतीयों की स्वतंत्रता और अधिकारों का हनन करते थे। यह अहिंसक विरोध था, जिसका उद्देश्य अन्यायपूर्ण शासन से मुक्ति था।
4. बहुत से लोग घायल हुए, बहुत-सी स्त्रियाँ जेल गईं, फिर भी इस दिन को अपूर्व बताया गया है। क्यों?
क्योंकि इस दिन कलकत्ता के लोगों ने पहली बार इतने बड़े पैमाने पर संगठित होकर खुली चुनौती देते हुए सभा की। पुलिस के अत्याचार के बावजूद लोग पीछे नहीं हटे, स्त्रियों ने अभूतपूर्व साहस दिखाया और इतनी बड़ी संख्या में गिरफ़्तारियाँ दीं। इससे बंगाल पर लगा कलंक धुल गया और लोगों में विश्वास जागा कि यहाँ भी बड़ा काम हो सकता है।
लिखित (ग) — आशय स्पष्ट कीजिए
1. आज तो जो कुछ हुआ वह अपूर्व हुआ है। बंगाल के नाम या कलकत्ता के नाम पर कलंक था कि यहाँ काम नहीं हो रहा है वह आज बहुत अंश में धुल गया।
आशय — पहले माना जाता था कि बंगाल/कलकत्ता के लोग स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय नहीं हैं। 26 जनवरी 1931 को लोगों की विशाल भागीदारी, स्त्रियों के साहस और गिरफ़्तारियों ने यह धारणा काफ़ी हद तक मिटा दी।
2. खुला चैलेंज देकर ऐसी सभा पहले नहीं की गई थी।
आशय — पुलिस के प्रतिबंध के बावजूद कौंसिल ने सभा का समय और स्थान पहले से घोषित करके जनता को आमंत्रित किया। यह सरकार को खुली चुनौती थी, जो इससे पहले कभी नहीं दी गई थी।
भाषा अध्ययन
1. (i) सरल वाक्यों में बदलिए—
(क) दो सौ आदमियों का जुलूस लालबाज़ार जाकर गिरफ़्तार हो गया।
(ख) मैदान में हज़ारों आदमियों की भीड़ होने पर लोग टोलियाँ बना-बनाकर मैदान में घूमने लगे।
(ग) सुभाष बाबू को पकड़कर गाड़ी में बैठाकर लालबाज़ार लॉकअप में भेज दिया गया।
1. (ii) 'बड़े भाई साहब' पाठ से दो-दो सरल, संयुक्त और मिश्र वाक्य छाँटिए।
सरल — (1) भाई साहब उपदेश की कला में निपुण थे। (2) मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।
संयुक्त — (1) मैं छोटा था, वह बड़े थे। (2) भाई साहब फ़ेल हो गए, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया।
मिश्र — (1) मैंने बहुत चेष्टा की कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ। (2) सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशाना खाली न जाए।
2. जाना, रहना और चुकना क्रियाओं का प्रयोग समझिए।
(क) 'सजाए गए थे', 'लगाए गए थे' — जाना का प्रयोग कर्मवाच्य बनाने में हुआ है (कार्य किसी के द्वारा किया गया)।
(ख) 'फहरा रहा था', 'घुमाई जा रही थीं', 'कर रही थी' — रहना से कार्य के जारी रहने (अपूर्ण/सातत्य) का बोध होता है।
(ग) 'कर चुका था', 'निकल चुका था' — चुकना से कार्य के पूरा हो जाने का बोध होता है।
3. संधि कीजिए।
श्रद्धा + आनंद = श्रद्धानंद; प्रति + एक = प्रत्येक; पुरुष + उत्तम = पुरुषोत्तम; झंडा + उत्सव = झंडोत्सव; पुनः + आवृत्ति = पुनरावृत्ति; ज्योतिः + मय = ज्योतिर्मय।
7. अतिरिक्त प्रश्न — 20 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
- 'डायरी का एक पन्ना' के लेखक हैं— (क) प्रेमचंद (ख) निदा फ़ाज़ली (ग) हबीब तनवीर (घ) सीताराम सेकसरिया
- सीताराम सेकसरिया का जन्म कहाँ हुआ? (क) कलकत्ता (ख) बनारस (ग) नवलगढ़, राजस्थान (घ) लाहौर
- लेखक को पद्मश्री कब मिला? (क) 1962 (ख) 1952 (ग) 1972 (घ) 1982
- पाठ डायरी के किस दिन का है? (क) 26 जनवरी 1931 (ख) 26 जनवरी 1930 (ग) 15 अगस्त 1947 (घ) 26 जनवरी 1950
- पहली बार स्वतंत्रता दिवस कब मनाया गया? (क) 26 जनवरी 1929 (ख) 26 जनवरी 1930 (ग) 26 जनवरी 1931 (घ) 15 अगस्त 1947
- केवल प्रचार पर कितना रुपया खर्च हुआ? (क) एक हज़ार (ख) पाँच हज़ार (ग) दस हज़ार (घ) दो हज़ार
- श्रद्धानंद पार्क में झंडा किसने गाड़ा? (क) हरिश्चंद्र सिंह (ख) पूर्णोदास (ग) अविनाश बाबू (घ) क्षितीश चटर्जी
- अविनाश बाबू किस संस्था के मंत्री थे? (क) कांग्रेस कमेटी (ख) बंगाल प्रांतीय विद्यार्थी संघ (ग) गुजराती सेविका संघ (घ) खादी भंडार
- सुभाष बाबू के जुलूस का भार किस पर था? (क) पुरुषोत्तम राय (ख) पूर्णोदास (ग) वृजलाल गोयनका (घ) ज्योतिर्मय गांगुली
- कौंसिल के अनुसार झंडा कितने बजे फहराया जाना था? (क) 4:10 (ख) 5:00 (ग) 4:24 (घ) 3:00
- सुभाष बाबू जुलूस लेकर कितने बजे आए? (क) 4:24 (ख) 4:10 (ग) 3:30 (घ) 5:10
- सुभाष बाबू को किस स्थान पर रोका गया? (क) चौरंगी (ख) बहू बाज़ार (ग) धर्मतल्ला (घ) लालबाज़ार
- सुभाष बाबू को गिरफ़्तार कर कहाँ भेजा गया? (क) लालबाज़ार लॉकअप (ख) दमदम जेल (ग) अलीपुर जेल (घ) अंडमान
- किसका फटा सिर देखकर लेखक की आँखें मिंच गईं? (क) क्षितीश चटर्जी (ख) अविनाश बाबू (ग) पूर्णोदास (घ) वृजलाल
- स्त्रियों के एक दल का नेतृत्व कौन कर रही थीं? (क) विमल प्रतिभा (ख) जानकीदेवी (ग) मदालसा (घ) सरोजिनी नायडू
- कुल कितनी स्त्रियाँ गिरफ़्तार हुईं? (क) 50 (ख) 67 (ग) 103 (घ) 105
- मदालसा किसकी पुत्री थीं? (क) सुभाष बाबू (ख) जानकीदेवी और जमनालाल बजाज (ग) सेकसरिया (घ) विमल प्रतिभा
- घायलों के फ़ोटो कौन उतरवा रहे थे? (क) डॉक्टर दासगुप्ता (ख) लेखक (ग) पुलिस (घ) सुभाष बाबू
- 'मोनुमेंट' का अर्थ है— (क) मैदान (ख) स्मारक (ग) थाना (घ) बाज़ार
- डायरी में लेखक स्वयं के लिए किस शब्द का प्रयोग करते हैं? (क) मैं (ख) हम लोग (ग) लेखक (घ) अपने
उत्तर — 1-घ, 2-ग, 3-क, 4-क, 5-ख, 6-घ, 7-ग, 8-ख, 9-ख, 10-ग, 11-ख, 12-क, 13-क, 14-क, 15-क, 16-घ, 17-ख, 18-क, 19-ख, 20-घ
8. अतिरिक्त प्रश्न — 20 लघु-उत्तरीय प्रश्न
1. लेखक ने 26 जनवरी को 'अमर दिन' क्यों कहा?
क्योंकि इसी दिन 1930 में पहली बार सारे हिंदुस्तान में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था; यह दिन आज़ादी के संकल्प का प्रतीक बन गया था।
2. पिछले वर्ष और इस वर्ष के योगदान में लेखक ने क्या अंतर बताया?
पिछले वर्ष कलकत्ता का हिस्सा बहुत साधारण था, जबकि इस वर्ष लोगों ने जितना दे सकते थे दिया और सारे काम का भार अपने ऊपर समझा।
3. बड़े बाज़ार की सजावट कैसी थी?
प्रायः सभी मकानों पर राष्ट्रीय झंडा फहरा रहा था और कई मकान ऐसे सजाए गए थे मानो स्वतंत्रता मिल गई हो।
4. पुलिस ने शहर में अपनी ताकत का प्रदर्शन कैसे किया?
मोटर लारियों में गोरखे और सारजेंट हर मोड़ पर तैनात थे, लारियाँ शहर में घुमाई जा रही थीं, घुड़सवार पुलिस थी और ट्रैफ़िक पुलिस भी इसी काम में लगा दी गई थी।
5. तारा सुंदरी पार्क में क्या हुआ?
बड़ा बाज़ार कांग्रेस कमेटी के युद्ध मंत्री हरिश्चंद्र सिंह झंडा फहराने गए पर भीतर न जा सके; वहाँ मारपीट हुई और दो-चार लोगों के सिर फट गए।
6. मारवाड़ी बालिका विद्यालय में क्या हुआ?
11 बजे लड़कियों ने विद्यालय में झंडोत्सव मनाया; जानकीदेवी और मदालसा भी गईं और लड़कियों को उत्सव का अर्थ समझाया गया।
7. एक बजे के आसपास लोगों को क्या आशा होने लगी?
मोनुमेंट के पास पुलिस का प्रबंध भोर जैसा कड़ा नहीं रहा, इसलिए लोगों को आशा हुई कि शायद पुलिस अपना रंग न दिखाए; पर ऐसा नहीं हुआ।
8. लेखक ने इस सभा को 'ओपन लड़ाई' क्यों कहा?
क्योंकि सरकार के स्पष्ट प्रतिबंध के बावजूद समय और स्थान घोषित करके खुलेआम सभा की गई; यह सरकार से सीधा मुकाबला था।
9. ज्योतिर्मय गांगुली ने सुभाष बाबू से क्या कहा और उन्होंने क्या उत्तर दिया?
गांगुली ने कहा — "आप इधर आ जाइए", ताकि लाठियों से बच सकें; सुभाष बाबू ने उत्तर दिया — "आगे बढ़ना है।"
10. सुभाष बाबू के साहस का परिचय किस प्रकार मिलता है?
लाठियाँ पड़ने पर भी वे पीछे नहीं हटे, बहुत ज़ोर से "वंदे मातरम्" बोलते रहे और आगे बढ़ने पर अड़े रहे।
11. वालंटियरों की दृढ़ता का क्या उदाहरण मिलता है?
जो वालंटियर गए थे, वे लाठियाँ पड़ने पर भी अपने स्थान से नहीं हटे।
12. विमल प्रतिभा के दल के साथ क्या हुआ?
उन्हें बहू बाज़ार के मोड़ पर रोका गया, वे वहीं बैठ गईं; पौन घंटे बाद पुलिस की लारी आई और उन्हें लालबाज़ार ले जाया गया।
13. वृजलाल गोयनका के बारे में लेखक ने क्या बताया?
वह झंडा लेकर इतने ज़ोर से दौड़ा कि गिर पड़ा, एक अंग्रेज़ घुड़सवार ने लाठी मारी और छोड़ दिया; फिर वह 200 लोगों का जुलूस लेकर लालबाज़ार गया और गिरफ़्तार हुआ।
14. मदालसा के साथ क्या हुआ?
मदालसा को गिरफ़्तार किया गया और थाने में उसे मारा भी गया।
15. गिरफ़्तार स्त्रियों को कब छोड़ा गया?
सभी 105 स्त्रियों को रात नौ बजे छोड़ दिया गया।
16. कांग्रेस ऑफ़िस से फ़ोन क्यों आया?
वहाँ बहुत से लोग चोट खाकर आए थे, कई की हालत गंभीर थी और उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए गाड़ी चाहिए थी।
17. घायलों की संख्या के बारे में क्या पता चला?
कांग्रेस ऑफ़िस में पहले 67, फिर 103 घायल पहुँचे; 160 लोग अस्पतालों में पहुँचे; कुल मिलाकर लगभग 200 लोग घायल हुए।
18. डायरी विधा की क्या विशेषता है?
डायरी गद्य की वह विधा है जिसमें लेखक दैनिक जीवन की घटनाएँ और अनुभव तिथि के अनुसार अपने शब्दों में दर्ज करता है; इसमें सच्चाई और आत्मीयता होती है।
19. पाठ से स्त्रियों की कौन-सी छवि उभरती है?
स्त्रियाँ निडर, संगठित और देशभक्त दिखाई देती हैं, जो लाठियाँ और गिरफ़्तारी सहकर भी झंडा फहराने और धरना देने से पीछे नहीं हटीं।
20. यह पाठ क्या संदेश देता है?
संगठित और कृतसंकल्प समाज कोई भी लक्ष्य पा सकता है; स्वतंत्रता के लिए हमारे पूर्वजों ने जो बलिदान दिए, उनका सम्मान करना चाहिए।
9. अतिरिक्त प्रश्न — 10 दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न
1. 26 जनवरी 1931 को कलकत्ता में मनाए गए स्वतंत्रता दिवस का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर — इस दिन कलकत्ता में जगह-जगह झंडे फहराए गए और शहर ऐसे सजा मानो आज़ादी मिल गई हो। पुलिस ने भोर से ही मैदानों को घेर लिया और कई कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया। प्रतिबंध के बावजूद कौंसिल ने मोनुमेंट पर सभा घोषित की। सुभाष बाबू जुलूस लेकर आए, लाठियाँ खाईं और गिरफ़्तार हुए। स्त्रियों ने सीढ़ियों पर झंडा फहराया, धरने दिए; 105 स्त्रियाँ गिरफ़्तार हुईं और लगभग 200 लोग घायल हुए। यह दिन कलकत्ता के इतिहास में अपूर्व बन गया।
2. स्वतंत्रता आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका पर पाठ के आधार पर प्रकाश डालिए।
उत्तर — पाठ में स्त्रियाँ आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में दिखती हैं। गुजराती सेविका संघ की लड़कियाँ जुलूस निकालकर गिरफ़्तार हुईं। मारवाड़ी बालिका विद्यालय में झंडोत्सव हुआ। सैकड़ों स्त्रियाँ मोनुमेंट पहुँचीं, झंडा फहराया, घोषणा पढ़ी और धर्मतल्ला व बहू बाज़ार में धरने पर बैठीं। विमल प्रतिभा ने नेतृत्व किया, मदालसा ने थाने में मार सही। 105 स्त्रियों की गिरफ़्तारी ने सिद्ध किया कि स्त्रियाँ भी आज़ादी की लड़ाई में बराबर की भागीदार थीं।
3. पाठ के आधार पर अंग्रेज़ी पुलिस के दमनकारी रवैये का वर्णन कीजिए।
उत्तर — पुलिस ने पूरे शहर में गश्त लगाई, हर मोड़ पर गोरखे और सारजेंट तैनात किए और पार्क-मैदान भोर से घेर लिए। झंडा फहराने वालों को पकड़ा और पीटा गया। सभा पर रोक का नोटिस निकाला गया। जुलूस पर भयानक लाठीचार्ज हुआ, सुभाष बाबू तक पर लाठियाँ पड़ीं, क्षितीश चटर्जी का सिर फट गया। स्त्रियों को भी नहीं बख्शा गया — मदालसा को थाने में मारा गया। लगभग 200 लोग घायल हुए।
4. सुभाष चंद्र बोस के व्यक्तित्व की कौन-सी विशेषताएँ इस पाठ से उजागर होती हैं?
उत्तर — सुभाष बाबू निडर, साहसी और दृढ़-संकल्पी नेता के रूप में सामने आते हैं। पुलिस के प्रतिबंध के बावजूद वे ठीक समय पर जुलूस लेकर पहुँचे। लाठियाँ पड़ने पर भी पीछे नहीं हटे और "वंदे मातरम्" का नारा लगाते रहे। साथी के कहने पर भी उन्होंने कहा — "आगे बढ़ना है।" उनके नेतृत्व से जनता में अपार उत्साह था। वे सच्चे देशभक्त और प्रेरणास्रोत थे।
5. "संगठित समाज कृतसंकल्प हो तो ऐसा कुछ भी नहीं जो वह न कर सके" — पाठ के आधार पर इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर — कलकत्ता के लोगों ने मिलकर योजना बनाई, प्रचार किया, कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर समझाया। पुलिस की पूरी ताकत, नोटिस और लाठियों के बावजूद हज़ारों लोग मैदान पहुँचे, झंडा फहराया गया और प्रतिज्ञा पढ़ी गई। स्त्री-पुरुष, विद्यार्थी, व्यापारी सबने भाग लिया। परिणामस्वरूप वर्षों से लगा निष्क्रियता का कलंक एक ही दिन में धुल गया। यह संगठित संकल्प की शक्ति का प्रमाण है।
6. डायरी विधा के रूप में इस पाठ की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर — पाठ एक निश्चित तिथि (26 जनवरी 1931) का विवरण है। इसमें लेखक ने जो देखा, सुना और महसूस किया, उसे सच्चाई से लिखा है — कुछ घटनाएँ आँखों देखी हैं, कुछ सुनी हुई, और लेखक यह स्पष्ट भी करते हैं। समय, स्थान, नाम और संख्याएँ (4:10, 4:24, 105 स्त्रियाँ) सटीक दी गई हैं। भाषा बोलचाल की है; लेखक स्वयं को 'अपने' कहते हैं। इससे विवरण आत्मीय और विश्वसनीय बन गया है।
7. पुलिस कमिश्नर और कौंसिल के नोटिस की तुलना करते हुए बताइए कि लेखक ने इस सभा को 'खुला चैलेंज' क्यों कहा।
उत्तर — पुलिस कमिश्नर के नोटिस में धारा के अनुसार सभा पर रोक थी और कार्यकर्ताओं को चेतावनी दी गई थी कि भाग लेने पर वे दोषी माने जाएँगे। इसके विपरीत कौंसिल ने ठीक समय (4:24) और स्थान (मोनुमेंट) बताकर झंडा फहराने और प्रतिज्ञा पढ़ने की घोषणा की और जनता से उपस्थित रहने को कहा। सरकारी आदेश को सार्वजनिक रूप से ठुकराकर पहले से सूचना देकर सभा करना ही 'खुला चैलेंज' था।
8. "बंगाल के नाम पर कलंक था..." — यह कलंक क्या था और कैसे धुला?
उत्तर — यह धारणा थी कि बंगाल या कलकत्ता में स्वतंत्रता आंदोलन का काम ठीक से नहीं हो रहा, लोग उदासीन हैं। 26 जनवरी 1931 को हज़ारों लोगों ने प्रतिबंध तोड़कर सभा में भाग लिया, पुलिस की लाठियाँ सहीं, सुभाष बाबू समेत अनेक गिरफ़्तार हुए और रिकॉर्ड 105 स्त्रियों ने गिरफ़्तारी दी। इस अपूर्व भागीदारी से कलंक बहुत हद तक धुल गया।
9. पाठ में वर्णित आम कार्यकर्ताओं के योगदान पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर — बड़े नेताओं के साथ आम कार्यकर्ताओं का योगदान भी उल्लेखनीय है। अविनाश बाबू और हरिश्चंद्र सिंह ने झंडा फहराने का प्रयास किया, पूर्णोदास ने जुलूस का प्रबंध किया, वृजलाल गोयनका गिरकर-पिटकर भी 200 लोगों को लेकर लालबाज़ार पहुँचा। वालंटियर लाठियाँ खाकर भी डटे रहे। लेखक, जानकीदेवी और डॉ. दासगुप्ता ने घायलों की सेवा की। इन्हीं गुमनाम योद्धाओं से आंदोलन सफल हुआ।
10. आज के समय में यह पाठ हमारे लिए क्यों प्रासंगिक है?
उत्तर — यह पाठ याद दिलाता है कि जो स्वतंत्रता हमें आज सहज रूप से मिली है, उसके लिए लोगों ने लाठियाँ खाईं, जेल गए और खून बहाया। हमें स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को केवल औपचारिकता नहीं, संकल्प के रूप में मनाना चाहिए। पाठ एकता, अनुशासन, अहिंसक विरोध और स्त्री-सशक्तीकरण की प्रेरणा देता है, जो आज भी उतने ही आवश्यक हैं।
10. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न
बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से तथ्यात्मक (तिथि, समय, संख्या) और विचारात्मक दोनों प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं।
⭐ सबसे महत्वपूर्ण (अवश्य तैयार करें)
- 26 जनवरी 1931 के दिन को अमर बनाने के लिए क्या तैयारियाँ की गईं?
- पुलिस कमिश्नर के नोटिस और कौंसिल के नोटिस में क्या अंतर था?
- सुभाष बाबू के जुलूस में स्त्री समाज की क्या भूमिका थी?
- डॉ. दासगुप्ता घायलों के फ़ोटो क्यों उतरवा रहे थे?
- इतने लोगों के घायल और गिरफ़्तार होने पर भी इस दिन को 'अपूर्व' क्यों कहा गया?
महत्वपूर्ण
- 'आज जो बात थी वह निराली थी' — स्पष्ट कीजिए।
- धर्मतल्ले के मोड़ पर जुलूस क्यों टूट गया?
- किस कानून को भंग करने की बात है? क्या कानून भंग करना उचित था?
- "खुला चैलेंज देकर ऐसी सभा पहले नहीं की गई थी" — आशय स्पष्ट कीजिए।
- सुभाष बाबू के व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए।
व्याकरण / मूल्यपरक
- संयुक्त/मिश्र वाक्य को सरल वाक्य में बदलना।
- संधि — श्रद्धानंद, प्रत्येक, पुरुषोत्तम, झंडोत्सव, पुनरावृत्ति, ज्योतिर्मय।
- बिना पैसे के पल्स पोलियो केंद्र की सूचना मोहल्ले तक कैसे पहुँचाएँगे?
- स्वतंत्रता आंदोलन में सरोजिनी नायडू / अरुणा आसफ़ अली / कस्तूरबा गांधी का योगदान।
🔗 कक्षा 10 हिंदी — स्पर्श व संचयन के सभी पाठ आपस में जुड़े हुए
- बड़े भाई साहब — प्रेमचंद (स्पर्श)
- डायरी का एक पन्ना — सीताराम सेकसरिया (स्पर्श) (आप यही पढ़ रहे हैं)
- अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले — निदा फ़ाज़ली (स्पर्श)
- कारतूस — हबीब तनवीर (स्पर्श)
- हरिहर काका — मिथिलेश्वर (संचयन)
- सपनों के-से दिन — गुरदयाल सिंह (संचयन)
— मनोज शर्मा, हिंदी शिक्षक | HINDI GYAN —
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