पाठ परिचय
“वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा” (वैद्य का आचरण चार प्रकार का होता है) एक संवादात्मक पाठ है। कक्षा में आचार्य आते हैं और छात्रा अनन्या को उदास देखकर पूछते हैं। वह बताती है कि उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। इसी प्रसंग से आचार्य स्वास्थ्य का महत्त्व, आयुर्वेद की परिभाषा, चिकित्सा के चार पाद, जल-पान का सही नियम, रोग-रहित रहने के उपाय और वैद्य के चार प्रकार के व्यवहार समझाते हैं।
पाठ के श्लोक आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थों — चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, अष्टाङ्गहृदयम् और वैद्यकीय सुभाषित — से लिए गए हैं। आरम्भ में महाकवि कालिदास की प्रसिद्ध सूक्ति “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्” (शरीर ही धर्म का पहला साधन है) उद्धृत है।
📌 पात्र: आचार्य, अनन्या, देवांश, पूजा, मुदिता, मोहित, सुधीर | विधा: संवाद | विषय: आयुर्वेद व स्वास्थ्य
मूल पाठ का सरलार्थ (हिंदी)
संवाद 1 – स्वास्थ्य का महत्त्व
आचार्यः – महाकविकालिदासेन उक्तं वर्तते – ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’।
सरलार्थ: आचार्य कक्षा में आते हैं, सब उठकर अभिवादन करते हैं। आचार्य पूछते हैं — अनन्या! आज तुम उदास क्यों दिख रही हो? अनन्या — आचार्य! मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है। आचार्य — अस्वस्थता क्यों? स्वास्थ्य के विषय में विशेष ध्यान रखना चाहिए। महाकवि कालिदास ने कहा है — ‘शरीर ही धर्म का पहला साधन है।’ देवांश — इस वाक्य का क्या अभिप्राय है? आचार्य — यदि धर्म (कर्तव्य) का आचरण करना चाहते हो तो शरीर का स्वस्थ होना आवश्यक है। अनन्या — स्वास्थ्य-रक्षा के क्या उपाय हैं? आचार्य — शरीर की स्वस्थता के विषय में आयुर्वेद में बहुत से उत्तम उपाय बताए गए हैं।
श्लोक 1 – आयुर्वेद की परिभाषा (चरकसंहिता, सूत्रस्थान 1/41)
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम् ।
मानञ्च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते ॥
अन्वय: यत्र हिताहितं सुखं दुःखम् आयुः, तस्य (आयुषः) हिताहितं, मानं च तत् च उक्तम्, सः आयुर्वेदः उच्यते।
अर्थ: जिस शास्त्र में हितकर आयु, अहितकर आयु, सुखमय आयु, दुःखमय आयु, आयु के लिए हितकर-अहितकर वस्तुएँ, आयु का मान (परिमाण/अवधि) और आयु का लक्षण बताया गया हो, उसे आयुर्वेद कहते हैं।
श्लोक 2-3 – चिकित्सा के चार पाद (सुश्रुतसंहिता 34/15-16)
वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः ।
एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः ॥
गुणवद्भिस्त्रिभिः पादैश्चतुर्थो गुणवान् भिषक् ।
व्याधिमल्पेन कालेन महान्तमपि साधयेत् ॥
अर्थ: मुदिता कहती है — ये विषय तो चिकित्सा से सम्बन्धित हैं! आचार्य — हाँ, चिकित्सा के चार अवयव (पाद) हैं — वैद्य, रोगी, औषध और परिचारक (सेवक)। ये चिकित्सा-कर्म की सफलता के कारण हैं। यदि बाकी तीन पाद (रोगी, औषध, परिचारक) गुणयुक्त हों और चौथा — वैद्य — भी गुणवान हो, तो वह बड़े से बड़े रोग को भी थोड़े समय में ठीक कर देता है।
श्लोक 4 – जल-पान का नियम (वैद्यकीय सुभाषित 10/20)
अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेऽन्नं
निरम्बुपानाच्च स एव दोषः ।
तस्मान्नरो वह्निविवर्धनाय
मुहुर्मुहुर्वारि पिबेदभूरि ॥
अर्थ: मोहित — यदि रोग ही न हो तो हम सुखी रहेंगे! आचार्य — सही है, आयुर्वेद में स्वास्थ्य-रक्षा के अनेक नियम हैं। जैसे — भोजन के समय बहुत अधिक जल पीने से अन्न नहीं पचता, और बिल्कुल जल न पीने से भी वही दोष (अपच) होता है। इसलिए मनुष्य को जठराग्नि बढ़ाने के लिए बार-बार थोड़ा-थोड़ा जल पीना चाहिए।
श्लोक 5 – निरोगी कौन? (अष्टाङ्गहृदयम् 4.36)
नित्यं हिताहार-विहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः ।
दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः ॥
अर्थ: जो व्यक्ति प्रतिदिन हितकर आहार और उचित दिनचर्या का पालन करता है, सोच-समझकर कार्य करता है, इन्द्रिय-विषयों में आसक्त नहीं होता, दानी है, सबके प्रति समभाव रखता है, सत्यवादी है, क्षमाशील है और विश्वसनीय (श्रेष्ठ) लोगों की संगति करता है — वह रोगरहित रहता है।
श्लोक 6 – वैद्य का चतुर्विध आचरण (चरकसंहिता, सूत्रस्थान 9/26)
मैत्री कारुण्यमार्त्तेषु शक्ये प्रीतिरुपेक्षणम् ।
प्रकृतिस्थेषु भूतेषु वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा ॥
अर्थ: सुधीर कहता है — मैं भी जीवन में वैद्य बनना चाहता हूँ, कृपया वैद्य के कर्तव्य बताइए। आचार्य — वैद्य का आचरण चार प्रकार का है: (1) सब रोगियों से मैत्री, (2) दुःखी/पीड़ितों पर करुणा, (3) जिसका उपचार सम्भव (शक्य) हो उसमें प्रीति (विशेष रुचि व ध्यान), और (4) जो रोग असाध्य हो या जो स्वभाव से स्वस्थ प्राणी हों, उनके प्रति उपेक्षा (तटस्थता)।
पाठ का सारांश व मुख्य बिंदु
अनन्या की अस्वस्थता से आरम्भ होकर पाठ स्वास्थ्य के महत्त्व पर आता है — ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’। आचार्य आयुर्वेद की परिभाषा देते हैं, चिकित्सा के चार पाद (वैद्य, रोगी, औषध, परिचारक) बताते हैं, जल-पान का सन्तुलित नियम समझाते हैं, निरोगी रहने के लिए आहार-विहार व सदाचार का महत्त्व बताते हैं और अन्त में वैद्य के चार प्रकार के आचरण — मैत्री, करुणा, प्रीति, उपेक्षा — का वर्णन करते हैं।
- ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ – कालिदास (कुमारसम्भव); स्वस्थ शरीर से ही कर्तव्य-पालन सम्भव।
- आयुर्वेद: जिसमें आयु के हित-अहित, सुख-दुःख, मान और लक्षण बताए जाएँ (चरकसंहिता)।
- चिकित्सा के 4 पाद: वैद्य, व्याध्युपसृष्ट (रोगी), भेषज (औषध), परिचारक (सेवक) — सुश्रुतसंहिता।
- गुणवान वैद्य + गुणयुक्त तीन पाद = बड़ा रोग भी अल्प समय में ठीक।
- जल-नियम: अधिक जल और जल-रहित भोजन दोनों से अपच; अतः बार-बार थोड़ा जल।
- अरोगी: हिताहार-विहार, विवेक, अनासक्ति, दान, समभाव, सत्य, क्षमा, आप्त-संगति (अष्टाङ्गहृदयम्)।
- वैद्यवृत्ति: मैत्री, करुणा (आर्तों पर), प्रीति (शक्य रोग में), उपेक्षा (असाध्य/स्वस्थ के प्रति) — चरकसंहिता।
- अनुच्छेद-कथा: आचार्य आत्रेय और शिष्य जीवितराम — प्रकृति की हर वनस्पति औषधीय है।
पाठ्यपुस्तक अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
प्रश्न 1. पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) धर्मसाधनविषये महाकविना कालिदासेन उक्तं वाक्यं किम् ?
‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ इति कालिदासेन उक्तं वाक्यम्।
(ख) आयुर्वेदे के विषयाः विचार्यन्ते ?
आयुर्वेदे हितम् अहितं सुखं दुःखम् आयुः, आयुषः हिताहितं, मानं (परिमाणं) लक्षणं च विचार्यन्ते।
(ग) चिकित्सायाः चत्वारः पादाः के ?
वैद्यः, व्याध्युपसृष्टः (रोगी), भेषजं परिचारकः च इति चिकित्सायाः चत्वारः पादाः।
(घ) गुणवान् भिषक् अल्पेन कालेन किं साधयेत् ?
गुणवान् भिषक् अल्पेन कालेन महान्तम् अपि व्याधिं साधयेत्।
(ङ) अत्यम्बुपानात् कः दोषः सम्भवति ?
अत्यम्बुपानात् अन्नं न विपच्यते (अजीर्णता भवति)।
प्रश्न 2. रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) …… विषये विशेषतो अवधानं कर्तव्यम् ।
स्वास्थ्यस्य
(ख) आयुर्वेदे चिकित्सायाः …… अवयवाः उक्ताः सन्ति ।
चत्वारः
(ग) …… अन्नं न विपच्यते ।
अत्यम्बुपानात्
(घ) नरः …… मुहुर्मुहुः अभूरि वारि पिबेत् ।
वह्निविवर्धनाय
(ङ) चिकित्सकस्य आर्त्तेषु मैत्री …… च भवेत् ।
कारुण्यम्
प्रश्न 3. प्रश्ननिर्माणम् (सम्भावित रेखाङ्कित पद मोटे अक्षरों में)
(क) चिकित्सायाः चत्वारः पादाः उक्ताः सन्ति ।
कस्याः चत्वारः पादाः उक्ताः सन्ति ?
(ख) भिषक् अल्पेन कालेन महान्तमपि व्याधिं साधयेत् ।
भिषक् कियता कालेन महान्तमपि व्याधिं साधयेत् ?
(ग) शरीरस्य स्वास्थ्यस्य रक्षणाय आयुर्वेदे बहवः उत्तमाः उपायाः सन्ति ।
शरीरस्य स्वास्थ्यस्य रक्षणाय कस्मिन् बहवः उत्तमाः उपायाः सन्ति ?
(घ) अत्यम्बुपानात् अन्नं न विपच्यते ।
कस्मात् अन्नं न विपच्यते ?
(ङ) वैद्यानां चतुर्विधा वृत्तिः भवति ।
केषां चतुर्विधा वृत्तिः भवति ?
प्रश्न 4. उपसर्गपदानि
उपसृष्टः • परिचारकः • अत्यम्बुः • विपच्यते
उप • परि • अति • वि
निरम्बुः • विवर्धनाय • उपेक्षणम्
निर् • वि • उप
प्रश्न 5. अनुच्छेद (आत्रेय-जीवितराम कथा)
(क) आत्रेयः कीदृशं वनस्पतिम् आनेतुं शिष्यान् प्रेषितवान् ?
यस्य किमपि औषधीयमहत्त्वं न स्यात्, तादृशं वनस्पतिम् आनेतुं शिष्यान् प्रेषितवान्।
(ख) प्रियशिष्यः जीवितरामः कथं प्रत्यागतवान् ?
जीवितरामः रिक्तहस्तः प्रत्यागतवान्।
(ग) खिन्नः जीवितरामः किम् अवदत् ?
‘अहं सम्पूर्णप्रकृतौ तादृशं कमपि वनस्पतिं न प्राप्तवान्, यस्मिन् औषधीयगुणः न स्यात्’ इति अवदत्।
(घ) जीवितरामस्य वचनं श्रुत्वा गुरुः किं कृतवान् ?
गुरुः अतीव प्रसन्नः अभवत्, तं च परीक्षायां सफलं घोषितवान्।
(ङ) अस्य कथानकस्य सारः कः ?
प्रत्येकस्मिन् अपि वनस्पतौ कोऽपि औषधीयगुणः अवश्यमेव वर्तते।
25 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
1. ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ किसकी उक्ति है?
- (क) भवभूति
- (ख) कालिदास
- (ग) चरक
- (घ) सुश्रुत
उत्तर देखें
(ख) कालिदास2. पाठ में अस्वस्थ छात्रा कौन है?
- (क) पूजा
- (ख) मुदिता
- (ग) अनन्या
- (घ) रश्मि
उत्तर देखें
(ग) अनन्या3. आयुर्वेद की परिभाषा वाला श्लोक किस ग्रन्थ से है?
- (क) सुश्रुतसंहिता
- (ख) चरकसंहिता
- (ग) अष्टाङ्गहृदयम्
- (घ) शुक्रनीति
उत्तर देखें
(ख) चरकसंहिता4. चिकित्सा के कितने पाद हैं?
- (क) दो
- (ख) तीन
- (ग) चार
- (घ) पाँच
उत्तर देखें
(ग) चार5. ‘भेषजम्’ का अर्थ है —
- (क) रोगी
- (ख) औषध
- (ग) वैद्य
- (घ) सेवक
उत्तर देखें
(ख) औषध6. ‘परिचारकः’ का अर्थ है —
- (क) सेवक
- (ख) चिकित्सक
- (ग) रोग
- (घ) दवा
उत्तर देखें
(क) सेवक7. ‘व्याध्युपसृष्टः’ से अभिप्राय है —
- (क) वैद्य
- (ख) रोगी
- (ग) औषधि
- (घ) शिष्य
उत्तर देखें
(ख) रोगी8. चिकित्सा के चार पाद वाला श्लोक किस ग्रन्थ से है?
- (क) चरकसंहिता
- (ख) सुश्रुतसंहिता
- (ग) अष्टाङ्गहृदयम्
- (घ) रामायण
उत्तर देखें
(ख) सुश्रुतसंहिता9. अधिक जल पीने से क्या होता है?
- (क) अन्न जल्दी पचता है
- (ख) अन्न नहीं पचता
- (ग) भूख बढ़ती है
- (घ) कुछ नहीं
उत्तर देखें
(ख) अन्न नहीं पचता10. जल कैसे पीना चाहिए?
- (क) एक साथ बहुत
- (ख) बिल्कुल नहीं
- (ग) बार-बार थोड़ा-थोड़ा
- (घ) केवल रात में
उत्तर देखें
(ग) बार-बार थोड़ा-थोड़ा11. ‘वह्निः’ का अर्थ है —
- (क) जल
- (ख) अग्नि
- (ग) वायु
- (घ) पृथ्वी
उत्तर देखें
(ख) अग्नि12. ‘मुहुर्मुहुः’ का अर्थ है —
- (क) कभी नहीं
- (ख) बार-बार
- (ग) धीरे-धीरे
- (घ) एक बार
उत्तर देखें
(ख) बार-बार13. ‘अभूरि’ का अर्थ —
- (क) अधिक
- (ख) थोड़ा
- (ग) शुद्ध
- (घ) ठंडा
उत्तर देखें
(ख) थोड़ा14. ‘नित्यं हिताहार-विहारसेवी…’ श्लोक किस ग्रन्थ से है?
- (क) अष्टाङ्गहृदयम्
- (ख) चरकसंहिता
- (ग) सुश्रुतसंहिता
- (घ) हितोपदेश
उत्तर देखें
(क) अष्टाङ्गहृदयम्15. वैद्य की वृत्ति कितने प्रकार की है?
- (क) दो
- (ख) तीन
- (ग) चार
- (घ) छह
उत्तर देखें
(ग) चार16. आर्त (दुःखी) लोगों के प्रति वैद्य में क्या होना चाहिए?
- (क) उपेक्षा
- (ख) करुणा
- (ग) क्रोध
- (घ) भय
उत्तर देखें
(ख) करुणा17. शक्य (साध्य) रोग में वैद्य में क्या हो?
- (क) प्रीति
- (ख) उपेक्षा
- (ग) द्वेष
- (घ) आलस्य
उत्तर देखें
(क) प्रीति18. ‘उपेक्षणम्’ का अर्थ है —
- (क) उदासीनता
- (ख) प्रेम
- (ग) दया
- (घ) सेवा
उत्तर देखें
(क) उदासीनता19. कौन-सा छात्र वैद्य बनना चाहता है?
- (क) मोहित
- (ख) सुधीर
- (ग) देवांश
- (घ) अथर्व
उत्तर देखें
(ख) सुधीर20. ‘साधयेत्’ में कौन-सा लकार है?
- (क) लट्
- (ख) लोट्
- (ग) विधिलिङ्
- (घ) लृट्
उत्तर देखें
(ग) विधिलिङ्21. ‘निरुत्साहा’ में उपसर्ग है —
- (क) निर्
- (ख) नि
- (ग) उत्
- (घ) सा
उत्तर देखें
(क) निर्22. ‘उपेक्षणम्’ में उपसर्ग है —
- (क) उप
- (ख) उत्
- (ग) अप
- (घ) ईक्ष
उत्तर देखें
(क) उप23. ‘भवत्यरोगः’ का सन्धि-विच्छेद —
- (क) भवति + अरोगः
- (ख) भवत् + अरोगः
- (ग) भवती + रोगः
- (घ) भव + त्यरोगः
उत्तर देखें
(क) भवति + अरोगः24. आत्रेय के प्रिय शिष्य का नाम था —
- (क) जीवक
- (ख) जीवितराम
- (ग) अजित
- (घ) सुधीर
उत्तर देखें
(ख) जीवितराम25. आत्रेय-कथा का सार है —
- (क) हर वनस्पति औषधीय है
- (ख) वन में मत जाओ
- (ग) गुरु कठोर होते हैं
- (घ) औषधि दुर्लभ है
उत्तर देखें
(क) हर वनस्पति औषधीय है
20 अति लघु उत्तरीय प्रश्न
1. आचार्य ने अनन्या से क्या पूछा?
आज तुम उदास (निरुत्साहा) क्यों दिख रही हो?
2. ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ का अर्थ लिखिए।
शरीर ही धर्म (कर्तव्य) का पहला साधन है।
3. स्वास्थ्य-रक्षा के उत्तम उपाय कहाँ बताए गए हैं?
आयुर्वेद में।
4. आयुर्वेद में आयु के कितने प्रकार कहे गए हैं?
चार — हित, अहित, सुख और दुःख आयु।
5. चिकित्सा के चार पादों के नाम लिखिए।
वैद्य, रोगी, औषध, परिचारक।
6. ‘भिषक्’ शब्द का अर्थ लिखिए।
वैद्य/चिकित्सक।
7. जल न पीने से क्या दोष होता है?
अन्न नहीं पचता (अपच)।
8. जठराग्नि बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए?
बार-बार थोड़ा-थोड़ा जल पीना चाहिए।
9. ‘समीक्ष्यकारी’ किसे कहते हैं?
जो सोच-समझकर कार्य करे।
10. ‘आप्तोपसेवी’ का अर्थ लिखिए।
विश्वसनीय/श्रेष्ठ लोगों की संगति करने वाला।
11. वैद्य की चतुर्विध वृत्ति के नाम लिखिए।
मैत्री, करुणा, प्रीति, उपेक्षा।
12. ‘मैत्री कारुण्यमार्त्तेषु…’ श्लोक किस ग्रन्थ से है?
चरकसंहिता, सूत्रस्थान 9/26।
13. ‘प्रकृतिस्थेषु’ का अर्थ क्या है?
स्वस्थ व्यक्तियों/प्राणियों के प्रति।
14. ‘अम्बु’ का पर्याय लिखिए।
जलम्, वारि।
15. ‘एते विषयाः चिकित्सासम्बद्धाः’ किसने कहा?
मुदिता ने।
16. ‘यदि रोगः एव न भवेत्…’ किसने कहा?
मोहित ने।
17. आत्रेय ने शिष्यों को क्या लाने को कहा?
ऐसी वनस्पति जिसका कोई औषधीय महत्त्व न हो।
18. जीवितराम कैसे लौटा?
खाली हाथ (रिक्तहस्तः)।
19. ‘कारुण्यम्’ में कौन-सा प्रत्यय है?
ष्यञ्।
20. आयुर्वेद के दो प्रमुख ग्रन्थों के नाम लिखिए।
चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता।
20 लघु उत्तरीय प्रश्न
1. ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ का अभिप्राय समझाइए।
धर्म अर्थात् कर्तव्य, पढ़ाई, सेवा, उपासना — सब शरीर के माध्यम से होते हैं। यदि शरीर अस्वस्थ हो तो कोई भी कर्तव्य ठीक से नहीं हो सकता। इसलिए स्वास्थ्य की रक्षा सबसे पहला कर्तव्य है।
2. आयुर्वेद की परिभाषा श्लोक के आधार पर लिखिए।
जिस शास्त्र में हितकर-अहितकर, सुखमय-दुःखमय आयु, आयु के लिए हितकर-अहितकर पदार्थ, आयु का परिमाण और लक्षण बताए गए हों, वह आयुर्वेद कहलाता है।
3. चिकित्सा के चार पादों का महत्त्व बताइए।
वैद्य उपचार करता है, रोगी सहयोग करता है, औषध रोग दूर करती है और परिचारक सेवा करता है। चारों गुणयुक्त हों तो कठिन रोग भी शीघ्र ठीक होता है; एक के भी दुर्बल होने से चिकित्सा अधूरी रहती है।
4. ‘अत्यम्बुपानान्न…’ श्लोक का भाव लिखिए।
भोजन के समय बहुत अधिक जल पीने से भोजन नहीं पचता और बिल्कुल न पीने से भी अपच होता है। इसलिए पाचन-अग्नि बढ़ाने के लिए बीच-बीच में थोड़ा-थोड़ा जल पीना चाहिए।
5. रोगरहित रहने के लिए अष्टाङ्गहृदयम् में कौन-से गुण बताए गए हैं?
हितकर आहार-विहार, सोच-समझकर कार्य, विषयों में अनासक्ति, दानशीलता, समभाव, सत्यप्रियता, क्षमाशीलता और विश्वसनीय लोगों की संगति।
6. वैद्य की चतुर्विध वृत्ति को स्पष्ट कीजिए।
(1) मैत्री – सब रोगियों से मित्रता; (2) करुणा – पीड़ितों पर दया; (3) प्रीति – साध्य रोगी पर विशेष ध्यान; (4) उपेक्षा – असाध्य रोग या स्वस्थ व्यक्तियों के प्रति तटस्थ भाव।
7. स्वास्थ्य के लिए मानसिक गुण भी आवश्यक क्यों हैं?
पाठ में सत्य, क्षमा, समभाव, अनासक्ति जैसे मानसिक गुण बताए गए हैं, क्योंकि क्रोध, लोभ, तनाव से शरीर भी रोगी होता है। शान्त मन स्वस्थ शरीर का आधार है।
8. आत्रेय-जीवितराम कथा का संदेश लिखिए।
प्रकृति की प्रत्येक वनस्पति में कोई न कोई औषधीय गुण अवश्य होता है। सच्चा ज्ञानी वही है जो हर वस्तु के गुण पहचान सके।
9. जीवितराम को परीक्षा में सफल क्यों घोषित किया गया?
क्योंकि उसने समझ लिया था कि कोई भी वनस्पति औषधीय गुण से रहित नहीं है। यही सच्चे वैद्य की दृष्टि थी।
10. ‘गुणवान् भिषक्’ की विशेषताएँ लिखिए।
शास्त्र का ज्ञाता, अनुभवी, कुशल, दयालु, मैत्रीपूर्ण, सावधान और रोगी के प्रति समर्पित वैद्य गुणवान कहलाता है।
11. पाठ में आए आयुर्वेद के ग्रन्थों का परिचय दीजिए।
चरकसंहिता (आचार्य चरक – काय-चिकित्सा), सुश्रुतसंहिता (आचार्य सुश्रुत – शल्य-चिकित्सा), अष्टाङ्गहृदयम् (वाग्भट – आयुर्वेद के आठों अंगों का सार) और वैद्यकीय सुभाषित।
12. ‘निरुत्साहा’ और ‘अस्वस्थता’ के समास-विग्रह लिखिए।
निरुत्साहा – निर्गतः उत्साहः यस्याः सा (बहुव्रीहि); अस्वस्थता – न स्वस्थता (नञ् तत्पुरुष)।
13. ‘वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा’ का सन्धि-विच्छेद और अर्थ लिखिए।
वैद्यवृत्तिः + चतुर्विधा — वैद्य का आचरण चार प्रकार का होता है।
14. ‘हिताहार-विहारसेवी’ से क्या तात्पर्य है?
जो शरीर के लिए हितकर भोजन करता है और उचित दिनचर्या (सोना, जागना, व्यायाम) का पालन करता है।
15. आज के डॉक्टरों के लिए ‘वैद्यवृत्ति’ कितनी प्रासंगिक है?
पूर्णतः प्रासंगिक है — रोगी से मैत्री, पीड़ा में करुणा, उपचार में लगन और भावनात्मक संतुलन आज के डॉक्टर के लिए भी आवश्यक गुण हैं।
16. ‘विषयेष्वसक्तः’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
विषयेषु + असक्तः — इन्द्रियों के विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) में आसक्त न होने वाला, अर्थात् संयमी।
17. चिकित्सा में परिचारक का क्या योगदान है?
परिचारक रोगी की देखभाल, समय पर दवा देना, भोजन-पथ्य का ध्यान रखना और वैद्य के निर्देशों का पालन करवाता है — इससे उपचार सफल होता है।
18. स्वस्थ शरीर होने से कौन-कौन से लाभ होते हैं? (छात्र-कार्य)
आनन्द से खेल सकते हैं, अच्छी तरह कार्य कर सकते हैं, भ्रमण कर सकते हैं, मन लगाकर पढ़ सकते हैं और दूसरों की सेवा कर सकते हैं।
19. कोई रोगी हो जाए तो पहले क्या करना चाहिए? (छात्र-कार्य)
उसे आराम कराना, वैद्य/डॉक्टर को दिखाना, समय पर दवा देना, पथ्य भोजन देना और उसका मनोबल बढ़ाना चाहिए।
20. ‘मैत्री कारुण्यमार्त्तेषु’ श्लोक का अन्वय लिखिए।
(वैद्यस्य) आर्त्तेषु मैत्री कारुण्यं च, शक्ये प्रीतिः, प्रकृतिस्थेषु भूतेषु उपेक्षणं (च) — इति चतुर्विधा वैद्यवृत्तिः (भवति)।
10 महत्त्वपूर्ण / दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. ‘वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा’ पाठ का सारांश लिखिए।
अनन्या की अस्वस्थता पर आचार्य कालिदास की सूक्ति ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ से स्वास्थ्य का महत्त्व बताते हैं। फिर चरकसंहिता से आयुर्वेद की परिभाषा, सुश्रुतसंहिता से चिकित्सा के चार पाद (वैद्य, रोगी, औषध, परिचारक), वैद्यकीय सुभाषित से जल-पान का सन्तुलित नियम, अष्टाङ्गहृदयम् से निरोगी रहने के गुण और अन्त में चरकसंहिता से वैद्य के चार आचरण — मैत्री, करुणा, प्रीति, उपेक्षा — समझाते हैं।
2. आयुर्वेद की परिभाषा वाले श्लोक का पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ लिखिए।
पदच्छेद — हित-अहितम् सुखम् दुःखम् आयुः तस्य हित-अहितम् मानम् च तत् च यत्र उक्तम् आयुर्वेदः सः उच्यते। अन्वय — यत्र हिताहितं सुखं दुःखम् आयुः, तस्य हिताहितं, मानं तत् च उक्तम्, सः आयुर्वेदः उच्यते। भावार्थ — आयुर्वेद वह विज्ञान है जिसमें हितकर-अहितकर, सुखद-दुःखद आयु, आयु-वृद्धि के लिए हितकर-अहितकर विषयों, आयु की अवधि और लक्षणों का वर्णन है।
3. ‘स्वस्थ जीवन के नियम’ पर पाठ के आधार पर निबन्ध लिखिए।
स्वस्थ जीवन के लिए सन्तुलित आहार, उचित दिनचर्या, व्यायाम, पर्याप्त नींद और सही ढंग से जल-पान आवश्यक है — न बहुत अधिक, न बिल्कुल नहीं। मानसिक स्वास्थ्य के लिए सत्य, क्षमा, समभाव, दान, अनासक्ति और अच्छी संगति चाहिए। विवेकपूर्वक कार्य करने वाला व्यक्ति रोगों से बचा रहता है। यही आयुर्वेद का संदेश है — रोग होने से पहले ही स्वास्थ्य की रक्षा।
4. चिकित्सा के चार पाद और गुणवान वैद्य का महत्त्व विस्तार से लिखिए।
सुश्रुत के अनुसार चिकित्सा के चार पाद हैं — वैद्य, रोगी, भेषज और परिचारक। रोगी को वैद्य पर विश्वास और नियम-पालन करना चाहिए; औषध शुद्ध व उपयुक्त हो; परिचारक सेवाभावी हो। इन तीनों के गुणयुक्त होने पर गुणवान वैद्य बड़े से बड़े रोग को भी थोड़े समय में ठीक कर देता है। अतः वैद्य सबसे प्रमुख पाद है, पर सफलता चारों के सहयोग से ही मिलती है।
5. वैद्य के चतुर्विध आचरण की व्याख्या कीजिए और बताइए कि यह आज भी क्यों उपयोगी है।
मैत्री — रोगी के साथ मित्रवत् व्यवहार से वह खुलकर समस्या बताता है; करुणा — पीड़ित के दुःख को समझना; प्रीति — साध्य रोग में पूरी लगन; उपेक्षा — असाध्य स्थिति या स्वस्थ व्यक्ति के प्रति भावनात्मक संतुलन व तटस्थता। आज के चिकित्सा-व्यवसाय में भी डॉक्टर-रोगी सम्बन्ध, संवेदनशीलता और व्यावसायिक संतुलन के लिए ये चारों गुण अनिवार्य हैं।
6. ‘नित्यं हिताहार-विहारसेवी…’ श्लोक का अन्वय और भावार्थ लिखिए।
अन्वय — (यः मनुजः) नित्यं हिताहारविहारसेवी, समीक्ष्यकारी, विषयेषु असक्तः, दाता, समः, सत्यपरः, क्षमावान्, आप्तोपसेवी च (भवति) सः अरोगः भवति। भावार्थ — जो प्रतिदिन हितकर भोजन व दिनचर्या अपनाता है, सोच-समझकर काम करता है, विषयों में आसक्त नहीं, दानी, सबके प्रति समान, सत्यवादी, क्षमाशील और श्रेष्ठजनों की सेवा करने वाला है, वह रोगरहित रहता है।
7. आत्रेय-जीवितराम कथा को अपने शब्दों में लिखकर उसकी शिक्षा बताइए।
आचार्य आत्रेय ने शिष्यों की परीक्षा के लिए कहा कि वन से ऐसी वनस्पति लाओ जिसका कोई औषधीय महत्त्व न हो। सब शिष्य कुछ न कुछ ले आए, पर प्रिय शिष्य जीवितराम खाली हाथ लौटा और दुःखी होकर बोला कि पूरी प्रकृति में उसे ऐसी कोई वनस्पति नहीं मिली जिसमें औषधीय गुण न हो। गुरु प्रसन्न हुए और उसे सफल घोषित किया। शिक्षा — प्रकृति की हर वनस्पति उपयोगी है; हमें प्रकृति का सम्मान और संरक्षण करना चाहिए।
8. पाठ में दिए गए श्लोकों के स्रोत ग्रन्थों और उनके विषयों की तालिका बनाइए।
1. हिताहितं सुखं दुःखम्… – चरकसंहिता 1/41 – आयुर्वेद की परिभाषा। 2. वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च… / गुणवद्भिस्त्रिभिः… – सुश्रुतसंहिता 34/15-16 – चिकित्सा के चार पाद। 3. अत्यम्बुपानान्न… – वैद्यकीय सुभाषित 10/20 – जल-पान नियम। 4. नित्यं हिताहार… – अष्टाङ्गहृदयम् 4.36 – अरोगी के गुण। 5. मैत्री कारुण्यम्… – चरकसंहिता 9/26 – वैद्यवृत्ति।
9. भारतीय चिकित्सा-परम्परा (आयुर्वेद) की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
आयुर्वेद केवल रोग-उपचार नहीं, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा पर भी बल देता है। यह शरीर, मन और आचरण तीनों को जोड़ता है; आहार-विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या, सदाचार पर बल देता है; प्राकृतिक वनस्पतियों से औषधि बनाता है; और वैद्य के नैतिक आचरण को भी महत्त्व देता है। चरक, सुश्रुत, वाग्भट जैसे आचार्यों ने इसे वैज्ञानिक रूप दिया।
10. ‘मैं वैद्य बनकर क्या करूँगा/करूँगी’ — पाठ के आधार पर अनुच्छेद लिखिए।
मैं वैद्य बनकर हर रोगी से मित्रवत् व्यवहार करूँगा, पीड़ितों पर करुणा रखूँगा, उपचार में पूरी लगन लगाऊँगा और संतुलित मन से निर्णय लूँगा। लोगों को हितकर आहार-विहार, सही जल-पान और सदाचार के बारे में जागरूक करूँगा ताकि वे रोगी ही न हों। गरीबों का उपचार सेवा-भाव से करूँगा। यही आयुर्वेद की सच्ची ‘वैद्यवृत्ति’ है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
‘वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा’ का अर्थ क्या है?
वैद्य का आचरण (व्यवहार) चार प्रकार का होता है।
वैद्य के चार आचरण कौन-से हैं?
मैत्री, करुणा (आर्तों पर), प्रीति (साध्य रोग में), उपेक्षा (असाध्य/स्वस्थ के प्रति)।
चिकित्सा के चार पाद किस ग्रन्थ में बताए गए हैं?
सुश्रुतसंहिता (34/15-16) में।
‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ कहाँ से है?
महाकवि कालिदास के कुमारसम्भव महाकाव्य से।
आत्रेय-जीवितराम कथा का सार क्या है?
हर वनस्पति में कोई न कोई औषधीय गुण अवश्य होता है।
✍️ प्रस्तुति: मनोज शर्मा (हिंदी-संस्कृत शिक्षक) — यह लेख NCERT कक्षा 9 संस्कृत पाठ्यपुस्तक “ऋषिकुल्या” पर आधारित अध्ययन-सामग्री है। मूल पाठ के लिए पाठ्यपुस्तक अवश्य पढ़ें।
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