पाठ परिचय
यह पाठ आचार्या और छात्रों — दिनेश, रश्मि, कविता, प्रकाश, विवेक — के संवाद से आरम्भ होता है। दिनेश बताता है कि भारत प्राचीन काल से कृषि-प्रधान देश है, और रश्मि पूछती है कि ‘तस्मात् सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत्’ का क्या अभिप्राय है। आचार्या समझाती हैं कि कृषि से ही अन्न, फल, वनस्पति, दूध आदि की उत्पत्ति होती है, जिनके बिना जीवन सम्भव नहीं।
आचार्या बताती हैं कि पराशर आदि प्राचीन महर्षियों ने कृषि पर सूक्ष्म चिन्तन किया और आचार्य कौटिल्य ने कृषि-विद्या को ‘वार्ता’ विद्या में सम्मिलित किया। इसके बाद आठ श्लोकों में अन्न का महत्त्व, समर्थ कृषक की आवश्यकता, कृषकों के गुण और मृदा-परीक्षण की प्राचीन विधि बताई गई है।
📌 विधा: संवाद + श्लोक | प्रमुख ग्रन्थ-संदर्भ: कृषिपराशर, काश्यपीय कृषिपद्धति, वृक्षायुर्वेद, कौटिल्य-अर्थशास्त्र | संदेश: कृषि ही सब अर्थों का साधन है
मूल पाठ का सरलार्थ (हिंदी)
संवाद – कृषि का महत्त्व
आचार्या – कृषिकर्मणा एव सर्वविधानां… अन्नफलादीनां वनस्पतीनां दुग्धादीनां च उत्पत्तिर्भवति।
सरलार्थ: आचार्या — शुभ हो प्रिय छात्रो! क्या आप सब कुशल हैं? दिनेश — हमारा भारतवर्ष प्राचीन काल से कृषि-प्रधान है, ऐसा हम सुनते हैं; आज हम कृषि के महत्त्व के विषय में कुछ जानना चाहते हैं। रश्मि — मैंने ‘इसलिए सब कुछ छोड़कर यत्नपूर्वक कृषि करवानी चाहिए’ — यह सुना है, इसका क्या अभिप्राय है? आचार्या — सुन्दर पद्य! कृषि-कर्म से ही सब प्रकार के अन्न, फल, वनस्पति और दूध आदि की उत्पत्ति होती है; इनके बिना जीवन सम्भव नहीं। हमारे किसान बड़े परिश्रम से अन्न उगाते हैं। कविता — वे पहले भूमि और जल की परीक्षा करते हैं। प्रकाश — योग्य भूमि चुनकर जुताई और बुवाई करते हैं। आचार्या — यही कृषि-विज्ञान है। पराशर आदि महर्षियों ने कृषि पर सूक्ष्म चिन्तन किया, और कौटिल्य ने कृषि-विद्या को ‘वार्ता’ विद्या में रखा।
श्लोक 1 – अन्न ही प्राण
अन्नं प्राणा बलं चान्नमन्नं सर्वार्थसाधनम् ।
देवासुरमनुष्याश्च सर्वे चान्नोपजीविनः ॥१॥
अन्वय: अन्नं प्राणाः, अन्नं बलं च, अन्नं सर्वार्थसाधनम्; देवासुरमनुष्याः च सर्वे अन्नोपजीविनः (सन्ति)।
अर्थ: अन्न ही प्राण है, अन्न ही बल है, अन्न ही सब उद्देश्यों और पदार्थों का साधन है। देवता, असुर और मनुष्य — सभी अन्न पर ही जीवित रहते हैं।
श्लोक 2 – सब छोड़कर कृषि
अन्नं हि धान्यसञ्जातं धान्यं कृष्या विना न च ।
तस्मात् सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत् ॥२॥
अर्थ: अन्न (चावल आदि) धान्य से उत्पन्न होता है और धान्य कृषि के बिना नहीं होता। इसलिए अन्य सब कार्य छोड़कर यत्नपूर्वक कृषि करनी (करवानी) चाहिए।
श्लोक 3 – समर्थ द्वारा कृषि (पाठ का शीर्षक)
समर्थेन कृषिः कार्या लोकानां हितकाम्यया ।
असमर्थो हि कृषको भिक्षां प्राप्नोति मानवः ॥३॥
अर्थ: लोगों के हित की कामना से समर्थ (योग्य) व्यक्ति द्वारा कृषि की जानी चाहिए। असमर्थ कृषक (जो कृषि में सक्षम नहीं) भिक्षा पर निर्भर हो जाता है — अर्थात् जिस समाज में कृषि ठीक से नहीं होती, वहाँ लोगों को जीवन-रक्षा के लिए दूसरों पर आश्रित होना पड़ता है।
श्लोक 4 – कृषक याचक नहीं होता
एकया च पुनः कृष्या प्रार्थको नैव जायते ।
कृष्यन्वितो हि लोकेऽस्मिन् भूयादेकश्च भूपतिः ॥४॥
अर्थ: केवल कृषि से जीवन-यापन करने वाला व्यक्ति कभी याचक (माँगने वाला) नहीं बनता। कृषि-कर्म से युक्त व्यक्ति ही इस संसार में भूपति (भूमि का स्वामी/राजा) बन सकता है।
श्लोक 5 – धनवान भी कृषक पर निर्भर
सुवर्णरौप्यमाणिक्यवसनैरपि पूरिताः ।
तथापि प्रार्थयन्त्येव कृषकान् भक्ततृष्णया ॥५॥
अर्थ: सोने, चाँदी, माणिक्य (रत्न) और वस्त्रों से भरपूर (धनी) लोग भी भोजन की इच्छा से किसानों से ही याचना करते हैं — क्योंकि कोई रत्न नहीं खाता, सबको अन्न ही चाहिए।
श्लोक 6-7 – कृषकों के गुण
गोभूमिदेवभक्ताश्च नितरां सत्यवादिनः ।
परानुकूल्यनिरताः सन्तं तुष्टचेतसः ॥६॥
तन्द्रालस्यादिहीनाश्च कामक्रोधादिवर्जिताः ।
परस्परं स्नेहभाजं साह्यकर्मरताश्च ये ॥७॥
अर्थ: कृषि-कार्य में लगे लोग गाय, भूमि और देवताओं के भक्त, निश्चय ही सत्यवादी, सदा परोपकार में लगे रहने वाले और संतुष्ट चित्त वाले होते हैं। वे तन्द्रा (ऊँघ) और आलस्य से रहित, काम-क्रोध आदि से मुक्त, आपस में स्नेह रखने वाले और सहयोग-कर्म में रत रहते हैं।
श्लोक 8 – मृदा-परीक्षण
आघ्राय पीत्वा च मृदं तोलयित्वाऽपि वा क्वचित् ।
क्षिप्त्वा पात्रस्थसलिले घटिकावधिकोविदः ॥८॥
अर्थ: समय (घटी) की अवधि को जानने वाला विद्वान् (कृषक) मिट्टी को सूँघकर, (उसके जल को) चखकर, कहीं तोलकर, अथवा मिट्टी को बर्तन के जल में डालकर एक घटी (24 मिनट) बाद उसकी दशा देखकर भूमि की कृषि-योग्यता (उर्वरा शक्ति) की परीक्षा करता है।
पाठ का सारांश व मुख्य बिंदु
पाठ बताता है कि अन्न ही प्राण, बल और सब उद्देश्यों का साधन है और देव-असुर-मनुष्य सब अन्न पर जीवित हैं। अन्न धान्य से और धान्य कृषि से होता है, इसलिए कृषि सर्वोपरि है। लोकहित के लिए समर्थ व्यक्ति को कृषि करनी चाहिए; असमर्थ कृषक भिक्षा पर निर्भर होता है। कृषक याचक नहीं होता, बल्कि धनवान भी भोजन के लिए उसी पर निर्भर हैं। कृषक सत्यवादी, परोपकारी, संतुष्ट, परिश्रमी और सहयोगी होते हैं। अन्त में मिट्टी को सूँघने, चखने, तोलने और जल में डालकर परखने की प्राचीन मृदा-परीक्षण विधि बताई गई है।
- भारत प्राचीन काल से कृषि-प्रधान देश है।
- कौटिल्य की चार विद्याएँ: आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता (कृषि इसी में), दण्डनीति।
- प्राचीन कृषि-ग्रन्थ: कृषिपराशर, काश्यपीय कृषिपद्धति, वृक्षायुर्वेद।
- अन्नं प्राणाः, अन्नं बलम्, अन्नं सर्वार्थसाधनम्।
- अन्न ← धान्य ← कृषि; अतः ‘सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत्’।
- समर्थेन कृषिः कार्या लोकानां हितकाम्यया — असमर्थ कृषक भिक्षा पाता है।
- धनी लोग भी भक्ततृष्णा (भोजन की इच्छा) से कृषकों से याचना करते हैं।
- कृषक के गुण: गो-भूमि-देव-भक्त, सत्यवादी, परोपकारी, संतुष्ट, आलस्यहीन, काम-क्रोध-रहित, स्नेही, सहयोगी।
- मृदा-परीक्षण: सूँघना, चखना, तोलना, जल में डालकर एक घटी बाद देखना।
- अन्न के चार प्रकार: व्रीह्यादि (धान्य), मुद्गमाषादि (दालें), शाकादि (सब्जियाँ), लताकुसुमादि (फल-फूल)।
व्याकरण विशेष
1. अन्न के चार प्रकार (कृषिशास्त्र)
| प्रकार | उदाहरण | लाभ (उदाहरण-वाक्य) |
| व्रीह्यादिरूपम् (धान्य) | धान, गेहूँ, जौ | व्रीह्यादिरूपेण अन्नेन शरीरं पुष्टं भवति। |
| मुद्गमाषादिरूपम् (द्विदल/दालें) | मूँग, उड़द, चना | मुद्गमाषादिरूपेण अन्नेन बलं वर्धते। |
| शाकादिरूपम् | पालक, लौकी आदि | शाकादिरूपेण अन्नेन स्वास्थ्यं रक्ष्यते। |
| लताकुसुमादिरूपम् | फल-फूल | लताकुसुमादिरूपेण अन्नेन रोगप्रतिरोधकशक्तिः वर्धते। |
2. घटिकावधिकोविदः
कृषि-कर्म में वही योग्य है जो ऋतु और काल को भली-भाँति जानता हो। एक घटी = 24 मिनट। समय का सूक्ष्म ज्ञान रखने वाला व्यक्ति ‘घटिकावधिकोविद’ कहलाता था।
3. प्रत्यय-परिचय
ल्यप् — परित्यज्य, आघ्राय • क्त्वा — पीत्वा, तोलयित्वा, क्षिप्त्वा • णिनि — सत्यवादिनः, अन्नोपजीविनः • णिच् (प्रेरणार्थक) — कारयेत्, तोलयित्वा
4. सन्धि
चान्नोपजीविनः = च + अन्न + उपजीविनः (दीर्घ, गुण) • प्रार्थको नैव = प्रार्थकः + न + एव • गोभूमिदेवभक्ताश्च = गोभूमिदेवभक्ताः + च • तोलयित्वाऽपि = तोलयित्वा + अपि • भूरपि = भूः + अपि • लोकेऽस्मिन् = लोके + अस्मिन् • वसनैरपि = वसनैः + अपि
पाठ्यपुस्तक अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
प्रश्न 1. पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) तुष्टचेतसः के भवन्ति ?
कृषिकार्ये रताः कृषकाः तुष्टचेतसः भवन्ति।
(ख) अन्नोपजीविनः के ?
देवाः असुराः मनुष्याः च सर्वे अन्नोपजीविनः सन्ति।
(ग) कृष्या विना किं भवति ?
कृष्या विना धान्यं न भवति (अतः अन्नमपि न भवति)।
(घ) सर्वं परित्यज्य किं कारयेत् ?
सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत्।
(ङ) मानवः भिक्षां कदा प्राप्नोति ?
यदा मानवः कृषिकर्मणि असमर्थः भवति तदा सः भिक्षां प्राप्नोति।
(च) माणिक्यादिभिः पूरिताः जनाः भक्ततृष्णया कान् प्रार्थयन्ति ?
माणिक्यादिभिः पूरिताः जनाः भक्ततृष्णया कृषकान् प्रार्थयन्ति।
प्रश्न 2. प्रश्ननिर्माणम् (सम्भावित रेखाङ्कित पद मोटे अक्षरों में)
(क) अन्नं सर्वार्थसाधनं भवति ।
किं सर्वार्थसाधनं भवति ?
(ख) सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत् ।
सर्वं परित्यज्य कां यत्नेन कारयेत् ?
(ग) कृषिकार्ये रताः पुरुषाः गोभूमिदेवभक्ताः भवन्ति ।
कस्मिन् रताः पुरुषाः गोभूमिदेवभक्ताः भवन्ति ?
(घ) कृष्या विना धान्यं न भवति ।
कया विना धान्यं न भवति ?
(ङ) लोकानां हितकाम्यया कृषिः कार्या ।
केषां हितकाम्यया कृषिः कार्या ?
प्रश्न 3. मञ्जूषातः रिक्तस्थानानि
(क) कृषिकार्ये रताः जनाः …… भवन्ति ।
तुष्टचेतसः
(ख) सर्वं …… कृषिं यत्नेन कारयेत् ।
परित्यज्य
(ग) धान्यं कृष्या …… न भवति ।
विना
(घ) लोकानां हितकाम्यया …… कृषिः कार्या ।
समर्थेन
(ङ) कृषकः पात्रस्थसलिले मृत्तिकाम् …… मृदं परीक्षते ।
क्षिप्त्वा
(च) कृषकः मृत्तिकाम् …… कृषिभूमिं परीक्षते ।
आघ्राय
प्रश्न 4. रेखाङ्कितपदानां सन्धिविच्छेदः
(क) सर्वे चान्नोपजीविनः
च + अन्नोपजीविनः (अन्न + उपजीविनः)
(ख) प्रार्थको नैव जायते
प्रार्थकः + न + एव
(ग) गोभूमिदेवभक्ताश्च नितरां सत्यवादिनः
गोभूमिदेवभक्ताः + च
(घ) मृदं तोलयित्वाऽपि वा क्वचित्
तोलयित्वा + अपि
(ङ) घना स्निग्धा च भूरपि
भूः + अपि
25 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
1. ‘समर्थेन कृषिः कार्या’ पाठ किस विषय पर है?
- (क) व्यापार
- (ख) कृषि
- (ग) युद्ध
- (घ) शिक्षा
उत्तर देखें
(ख) कृषि2. आचार्य कौटिल्य ने कृषि-विद्या को किस विद्या में रखा?
- (क) त्रयी
- (ख) वार्ता
- (ग) दण्डनीति
- (घ) आन्वीक्षिकी
उत्तर देखें
(ख) वार्ता3. कृषि पर चिन्तन करने वाले प्राचीन महर्षि हैं —
- (क) पराशर
- (ख) पाणिनि
- (ग) पतञ्जलि
- (घ) वाल्मीकि
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(क) पराशर4. ‘अन्नं प्राणा बलं चान्नम्…’ — अन्न को क्या कहा गया है?
- (क) सर्वार्थसाधनम्
- (ख) विषम्
- (ग) दुर्लभम्
- (घ) त्याज्यम्
उत्तर देखें
(क) सर्वार्थसाधनम्5. सब किस पर जीवित रहते हैं?
- (क) जल
- (ख) अन्न
- (ग) धन
- (घ) वायु
उत्तर देखें
(ख) अन्न6. अन्न किससे उत्पन्न होता है?
- (क) धान्य से
- (ख) धन से
- (ग) वर्षा से
- (घ) राजा से
उत्तर देखें
(क) धान्य से7. ‘सर्वं परित्यज्य …… यत्नेन कारयेत्’
- (क) व्यापारम्
- (ख) कृषिम्
- (ग) युद्धम्
- (घ) यज्ञम्
उत्तर देखें
(ख) कृषिम्8. कृषि किसके द्वारा की जानी चाहिए?
- (क) असमर्थ
- (ख) समर्थ
- (ग) बालक
- (घ) राजा
उत्तर देखें
(ख) समर्थ9. असमर्थ कृषक क्या पाता है?
- (क) धन
- (ख) भिक्षा
- (ग) राज्य
- (घ) यश
उत्तर देखें
(ख) भिक्षा10. केवल कृषि करने वाला क्या नहीं बनता?
- (क) भूपति
- (ख) प्रार्थक (याचक)
- (ग) सुखी
- (घ) सत्यवादी
उत्तर देखें
(ख) प्रार्थक (याचक)11. धनवान लोग भी कृषकों से किस इच्छा से याचना करते हैं?
- (क) धन
- (ख) भक्ततृष्णा (भोजन)
- (ग) यश
- (घ) विद्या
उत्तर देखें
(ख) भक्ततृष्णा (भोजन)12. ‘भक्तम्’ शब्द का यहाँ अर्थ है —
- (क) भक्त
- (ख) भोजन
- (ग) पूजा
- (घ) सेवक
उत्तर देखें
(ख) भोजन13. कृषक किनके भक्त होते हैं?
- (क) गो-भूमि-देव
- (ख) धन-रत्न
- (ग) राजा
- (घ) विदेश
उत्तर देखें
(क) गो-भूमि-देव14. ‘तुष्टचेतसः’ का अर्थ है —
- (क) दुःखी
- (ख) प्रसन्न चित्त वाले
- (ग) क्रोधी
- (घ) आलसी
उत्तर देखें
(ख) प्रसन्न चित्त वाले15. कृषक किससे रहित होते हैं?
- (क) सत्य
- (ख) तन्द्रा-आलस्य
- (ग) स्नेह
- (घ) सहयोग
उत्तर देखें
(ख) तन्द्रा-आलस्य16. ‘साह्यकर्मरताः’ का अर्थ है —
- (क) सहयोग में लगे
- (ख) युद्ध में लगे
- (ग) व्यापार में लगे
- (घ) आलसी
उत्तर देखें
(क) सहयोग में लगे17. ‘आघ्राय’ का अर्थ है —
- (क) सूँघकर
- (ख) पीकर
- (ग) तोलकर
- (घ) फेंककर
उत्तर देखें
(क) सूँघकर18. मृदा-परीक्षण में मिट्टी कहाँ डाली जाती है?
- (क) अग्नि में
- (ख) पात्र के जल में
- (ग) वायु में
- (घ) दूध में
उत्तर देखें
(ख) पात्र के जल में19. एक घटी कितने मिनट की होती है?
- (क) 12
- (ख) 24
- (ग) 48
- (घ) 60
उत्तर देखें
(ख) 2420. ‘घटिकावधिकोविदः’ का अर्थ है —
- (क) समय का ज्ञाता
- (ख) घड़ा बनाने वाला
- (ग) जल-विशेषज्ञ
- (घ) राजा
उत्तर देखें
(क) समय का ज्ञाता21. ‘भूपतिः’ का समास-विग्रह —
- (क) भुवः पतिः
- (ख) भूः च पतिः च
- (ग) भूमि पतिः यस्य
- (घ) भूः पतिः
उत्तर देखें
(क) भुवः पतिः22. ‘परित्यज्य’ में कौन-सा प्रत्यय है?
- (क) क्त्वा
- (ख) ल्यप्
- (ग) तुमुन्
- (घ) शतृ
उत्तर देखें
(ख) ल्यप्23. ‘सत्यवादिनः’ में कौन-सा प्रत्यय है?
- (क) णिनि
- (ख) मतुप्
- (ग) तल्
- (घ) ठक्
उत्तर देखें
(क) णिनि24. ‘भूरपि’ का सन्धि-विच्छेद —
- (क) भूः + अपि
- (ख) भू + रपि
- (ग) भूर् + अपि
- (घ) भूमि + अपि
उत्तर देखें
(क) भूः + अपि25. अन्न के कितने प्रकार कृषिशास्त्र में बताए गए हैं?
- (क) दो
- (ख) तीन
- (ग) चार
- (घ) छह
उत्तर देखें
(ग) चार
20 अति लघु उत्तरीय प्रश्न
1. भारत प्राचीन काल से कैसा देश है?
कृषि-प्रधान देश।
2. कृषि-कर्म से किनकी उत्पत्ति होती है?
अन्न, फल, वनस्पति और दूध आदि की।
3. कृषक पहले किसकी परीक्षा करते हैं?
भूमि और जल की।
4. योग्य भूमि चुनकर कृषक क्या करते हैं?
भूमि-कर्षण (जुताई) और बीज-वपन (बुवाई)।
5. कौटिल्य की चार विद्याओं के नाम लिखिए।
आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता, दण्डनीति।
6. दो प्राचीन कृषि-ग्रन्थों के नाम लिखिए।
कृषिपराशर, वृक्षायुर्वेद।
7. ‘अन्नोपजीविनः’ कौन हैं?
देव, असुर और मनुष्य — सभी।
8. कृषि-युक्त व्यक्ति संसार में क्या बन सकता है?
भूपति (भूमि का स्वामी)।
9. धनवान लोग किनसे भरपूर होते हैं?
सोना, चाँदी, माणिक्य और वस्त्रों से।
10. ‘नितराम्’ का अर्थ लिखिए।
निश्चय ही।
11. ‘परानुकूल्यनिरताः’ का अर्थ लिखिए।
परोपकार में लगे रहने वाले।
12. कृषक किन दोषों से मुक्त होते हैं?
काम, क्रोध आदि से।
13. मृदा-परीक्षण की चार विधियाँ लिखिए।
सूँघना, चखना, तोलना, जल में डालकर देखना।
14. ‘मृदम्’ का पर्याय लिखिए।
मृत्तिकाम्।
15. ‘कारयेत्’ में कौन-सा लकार है?
विधिलिङ् (प्रेरणार्थक)।
16. ‘भूयात्’ में कौन-सा लकार है?
आशीर्लिङ्।
17. दालों वाले अन्न से क्या लाभ है?
बल बढ़ता है।
18. फल-फूल रूप अन्न से क्या लाभ है?
रोग-प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।
19. शाक रूप अन्न से क्या होता है?
स्वास्थ्य की रक्षा होती है।
20. ‘तुष्टचेतसः’ में कौन-सा समास है?
बहुव्रीहि।
20 लघु उत्तरीय प्रश्न
1. ‘अन्नं प्राणा बलं चान्नम्…’ श्लोक का भाव लिखिए।
अन्न ही प्राण, बल और सब उद्देश्यों का साधन है। देवता, असुर और मनुष्य — सब अन्न पर ही जीवित हैं। अतः अन्न जीवन का आधार है।
2. ‘तस्मात् सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत्’ का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
अन्न धान्य से होता है और धान्य कृषि से। कृषि के बिना जीवन सम्भव नहीं, इसलिए कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए — अन्य कार्य छोड़कर भी यत्नपूर्वक कृषि करनी चाहिए।
3. ‘समर्थेन कृषिः कार्या’ श्लोक की व्याख्या कीजिए।
लोक-कल्याण की इच्छा से योग्य और सक्षम व्यक्ति को कृषि करनी चाहिए। जहाँ कृषक असमर्थ होता है, वहाँ लोग भिक्षाटन पर निर्भर हो जाते हैं — अर्थात् कुशल कृषि से ही समाज आत्मनिर्भर बनता है।
4. कृषक को ‘प्रार्थक’ (याचक) क्यों नहीं बनना पड़ता?
क्योंकि वह स्वयं अन्न उत्पन्न करता है और अपनी आवश्यकताएँ पूरी कर लेता है; उसे किसी से माँगना नहीं पड़ता। कृषि से ही वह भूमि का स्वामी बन सकता है।
5. ‘सुवर्णरौप्यमाणिक्य…’ श्लोक का भाव लिखिए।
सोना, चाँदी, रत्न और वस्त्रों से भरपूर धनी लोग भी भोजन के लिए किसानों पर ही निर्भर हैं, क्योंकि कोई रत्न नहीं खा सकता। इससे कृषक का महत्त्व सिद्ध होता है।
6. पाठ के अनुसार कृषकों के गुण लिखिए।
गाय, भूमि व देवताओं के भक्त, सत्यवादी, परोपकारी, सदा संतुष्ट, तन्द्रा-आलस्य से रहित, काम-क्रोध से मुक्त, परस्पर स्नेही और सहयोग-कर्म में रत।
7. प्राचीन मृदा-परीक्षण विधि का वर्णन कीजिए।
मिट्टी को सूँघकर उसकी गन्ध, वहाँ के जल को चखकर उसका स्वाद, मिट्टी तोलकर उसका भार, और मिट्टी को बर्तन के जल में डालकर एक घटी बाद उसकी दशा देखकर भूमि की उर्वरा शक्ति परखी जाती थी।
8. ‘घटिकावधिकोविदः’ किसे कहा गया है और क्यों?
जो ऋतु और काल (घटी = 24 मिनट तक) का सूक्ष्म ज्ञान रखता हो। कृषि में बुवाई, सिंचाई, कटाई का सही समय जानना आवश्यक है, इसलिए ऐसा व्यक्ति कृषि के योग्य है।
9. कृषिशास्त्र में अन्न के चार प्रकार और उनके लाभ लिखिए।
व्रीह्यादि (धान्य) – शरीर पुष्ट; मुद्गमाषादि (दालें) – बल-वृद्धि; शाकादि – स्वास्थ्य-रक्षा; लताकुसुमादि (फल-फूल) – रोग-प्रतिरोधक शक्ति-वृद्धि।
10. कौटिल्य की ‘वार्ता’ विद्या क्या है?
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित चार विद्याओं में से एक; इसमें कृषि, पशुपालन और वाणिज्य आते हैं — अर्थात् आर्थिक जीवन की विद्या।
11. ‘अन्नोपजीविनः’ और ‘तुष्टचेतसः’ का विग्रह लिखिए।
अन्नोपजीविनः – अन्नेन उपजीवितुं शीलं येषां ते (उपपद तत्पुरुष); तुष्टचेतसः – तुष्टानि चेतांसि येषां ते (बहुव्रीहि)।
12. ‘भूपतिः’ और ‘भक्ततृष्णया’ का विग्रह लिखिए।
भूपतिः – भुवः पतिः (षष्ठी तत्पुरुष); भक्ततृष्णया – भक्तस्य तृष्णा भक्ततृष्णा, तया (षष्ठी तत्पुरुष)।
13. आधुनिक मृदा-परीक्षण और प्राचीन विधि में क्या समानता है?
दोनों में मिट्टी के रंग, गन्ध, भार, जल-धारण क्षमता और गुणों की जाँच की जाती है; आज यही काम प्रयोगशाला और मृदा-स्वास्थ्य कार्ड से होता है।
14. कृषक को ‘अन्नदाता’ क्यों कहा जाता है?
क्योंकि वह कठोर परिश्रम से अन्न उगाकर पूरे समाज का पेट भरता है; उसके बिना धनी-निर्धन कोई भी जीवित नहीं रह सकता।
15. ‘परित्यज्य’ और ‘क्षिप्त्वा’ में प्रत्यय का अन्तर बताइए।
‘परित्यज्य’ में उपसर्ग (परि) होने से ल्यप् प्रत्यय है; ‘क्षिप्त्वा’ में उपसर्ग नहीं, इसलिए क्त्वा प्रत्यय है।
16. पाठ के संवाद में छात्रों ने कृषकों के कौन-से श्रम बताए?
कविता — वे भूमि और जल की सम्यक् परीक्षा करते हैं; प्रकाश — योग्य भूमि चुनकर जुताई और बीज-बुवाई करते हैं।
17. ऋतु के अनुसार दो अन्न, दो शाक और दो फल लिखिए।
रबी – गेहूँ, चना; खरीफ – धान, मक्का; शाक – सरसों का साग (शीत), भिंडी (ग्रीष्म); फल – आम (ग्रीष्म), संतरा (शीत)।
18. ‘एकया च पुनः कृष्या…’ श्लोक का अन्वय लिखिए।
पुनः च एकया कृष्या एव (मनुष्यः) प्रार्थकः न जायते; अस्मिन् लोके कृष्यन्वितः हि एकः भूपतिः च भूयात्।
19. आत्मनिर्भर भारत में कृषि की भूमिका लिखिए।
कृषि खाद्य-सुरक्षा, रोजगार और उद्योगों के लिए कच्चा माल देती है; समर्थ और वैज्ञानिक कृषि से देश आत्मनिर्भर बनता है — यही ‘समर्थेन कृषिः कार्या’ का संदेश है।
20. पाठ से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
कृषि और कृषक का सम्मान करें, अन्न व्यर्थ न करें, वृक्षारोपण करें और वैज्ञानिक कृषि को बढ़ावा दें।
10 महत्त्वपूर्ण / दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. ‘समर्थेन कृषिः कार्या लोकानां हितकाम्यया’ पाठ का सारांश लिखिए।
आचार्या और छात्रों के संवाद में बताया गया कि भारत कृषि-प्रधान है और कृषि से ही अन्न, फल, दूध आदि मिलते हैं। पराशर आदि ऋषियों ने कृषि पर चिन्तन किया, कौटिल्य ने इसे वार्ता-विद्या में रखा। श्लोकों में अन्न को प्राण, बल और सर्वार्थसाधन कहा गया; अन्न धान्य से और धान्य कृषि से होता है, इसलिए सब छोड़कर कृषि करनी चाहिए। लोकहित के लिए समर्थ व्यक्ति कृषि करे; कृषक याचक नहीं होता, धनी भी भोजन के लिए उस पर निर्भर हैं। कृषक सत्यवादी, परोपकारी, संतुष्ट, परिश्रमी व सहयोगी होते हैं। अन्त में प्राचीन मृदा-परीक्षण विधि बताई गई है।
2. ‘अन्नं प्राणा बलं चान्नम्…’ और ‘अन्नं हि धान्यसञ्जातम्…’ श्लोकों का पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ लिखिए।
श्लोक 1 — पदच्छेद: अन्नम् प्राणाः बलम् च अन्नम् अन्नम् सर्वार्थसाधनम् देव-असुर-मनुष्याः च सर्वे च अन्न-उपजीविनः। अन्वय: अन्नं प्राणाः, अन्नं बलं च, अन्नं सर्वार्थसाधनम्, देवासुरमनुष्याः च सर्वे अन्नोपजीविनः। भावार्थ: अन्न ही प्राण, बल और सब पदार्थों का साधन है; सब अन्न से जीते हैं। श्लोक 2 — अन्वय: अन्नं हि धान्यसञ्जातम्, धान्यं च कृष्या विना न, तस्मात् सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत्। भावार्थ: चावल आदि अन्न धान्य से होता है, धान्य कृषि के बिना नहीं; अतः सब कार्य छोड़कर यत्नपूर्वक कृषि करनी चाहिए।
3. ‘भारतीय कृषक’ विषय पर पाठ के आधार पर निबन्ध लिखिए।
भारतीय कृषक देश का अन्नदाता है। वह धूप-वर्षा-शीत सहकर कठोर परिश्रम करता है — भूमि-जल की परीक्षा, जुताई, बुवाई, सिंचाई, कटाई। पाठ के अनुसार कृषक गो-भूमि-देव के भक्त, सत्यवादी, परोपकारी, संतुष्ट, आलस्यहीन, काम-क्रोध रहित और परस्पर सहयोगी होते हैं। धनवान भी भोजन के लिए उसी पर निर्भर है। इसलिए कृषक का सम्मान, उचित मूल्य, आधुनिक तकनीक और शिक्षा देना राष्ट्र का कर्तव्य है।
4. प्राचीन भारतीय कृषि-विज्ञान की विशेषताएँ पाठ के आधार पर लिखिए।
1. कृषि को सर्वोच्च कर्म माना गया; 2. कौटिल्य ने इसे वार्ता-विद्या में रखा; 3. कृषिपराशर, काश्यपीय कृषिपद्धति, वृक्षायुर्वेद जैसे ग्रन्थ रचे गए; 4. मिट्टी को सूँघने, चखने, तोलने और जल में डालने से मृदा-परीक्षण होता था; 5. समय-ज्ञान (घटी तक) पर बल था; 6. अन्न को चार प्रकारों में बाँटकर पोषण-मूल्य बताया गया; 7. समर्थ व कुशल कृषक की आवश्यकता बताई गई।
5. कृषकों के गुणों वाले श्लोक 6-7 का अन्वय और भावार्थ लिखिए।
अन्वय — (ये) गोभूमिदेवभक्ताः, नितरां सत्यवादिनः, सन्तं परानुकूल्यनिरताः, तुष्टचेतसः च; ये तन्द्रालस्यादिहीनाः, कामक्रोधादिवर्जिताः, परस्परं स्नेहभाजं साह्यकर्मरताः च (भवन्ति)। भावार्थ — कृषि में लगे लोग गाय, भूमि और देवताओं के भक्त, सत्यवादी, सदा परोपकारी और प्रसन्नचित्त होते हैं; वे ऊँघ और आलस्य से रहित, काम-क्रोध से मुक्त, आपस में स्नेही और सहयोगी होते हैं।
6. मृदा-परीक्षण वाले श्लोक 8 की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
‘आघ्राय पीत्वा च मृदं तोलयित्वाऽपि वा क्वचित्। क्षिप्त्वा पात्रस्थसलिले घटिकावधिकोविदः॥’ — जहाँ खेती करनी हो, वहाँ की मिट्टी की परीक्षा के कई उपाय हैं: (1) मिट्टी सूँघकर उसकी गन्ध से गुण जानना, (2) वहाँ का जल चखकर स्वाद जानना, (3) मिट्टी तोलकर भार से उर्वरता का अनुमान, (4) बर्तन के जल में मिट्टी डालकर एक घटी (24 मिनट) बाद उसकी दशा देखना। समय-ज्ञ कुशल कृषक ही ऐसा परीक्षण कर सकता है। यह आधुनिक मृदा-विज्ञान का प्राचीन रूप है।
7. ‘अन्न व्यर्थ न करें’ — पाठ के आधार पर एक संदेश/भाषण लिखिए।
प्रिय मित्रो! हमारे शास्त्र कहते हैं — ‘अन्नं प्राणाः, अन्नं बलम्।’ जो अन्न हम थाली में छोड़ देते हैं, उसके पीछे किसान का महीनों का परिश्रम, जल, भूमि और ऊर्जा लगी है। धनवान भी भोजन के लिए किसान पर निर्भर है। इसलिए उतना ही लें जितना खा सकें, बचा भोजन ज़रूरतमंदों को दें और अन्नदाता का सम्मान करें। अन्न का आदर ही प्राणों का आदर है।
8. कृषि और समाज के परस्पर सम्बन्ध को पाठ के श्लोकों से स्पष्ट कीजिए।
श्लोक 1-2 बताते हैं कि पूरा समाज अन्न पर टिका है। श्लोक 3 कहता है कि समर्थ कृषि के अभाव में समाज भिक्षा पर निर्भर होता है। श्लोक 4-5 बताते हैं कि कृषक आत्मनिर्भर है और धनी भी उस पर आश्रित हैं। श्लोक 6-7 दिखाते हैं कि कृषक-समाज सत्य, परोपकार, स्नेह और सहयोग जैसे मूल्यों का वाहक है। अतः कृषि समाज की आर्थिक और नैतिक दोनों रीढ़ है।
9. किसी कृषक से बातचीत करके किसी एक फसल की उत्पादन-प्रक्रिया लिखिए (परियोजना)।
फसल — गेहूँ। (1) अक्टूबर-नवम्बर में खेत की जुताई व मिट्टी-परीक्षण; (2) गोबर खाद/उर्वरक डालना; (3) नवम्बर में बीज-बुवाई; (4) 20-25 दिन पर पहली सिंचाई, फिर 4-5 सिंचाई; (5) खरपतवार निकालना; (6) मार्च-अप्रैल में कटाई; (7) मड़ाई करके दाना अलग करना और भण्डारण। किसान बताते हैं कि समय पर बुवाई और सिंचाई ही अच्छी उपज का रहस्य है — यही ‘घटिकावधिकोविदः’ का भाव है।
10. शीर्षक ‘समर्थेन कृषिः कार्या लोकानां हितकाम्यया’ की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
यह पाठ के तीसरे श्लोक की पहली पंक्ति है और पूरे पाठ का केन्द्रीय भाव है — कृषि लोक-कल्याण का कार्य है और इसे कुशल, समर्थ व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए। पाठ में अन्न का महत्त्व, कृषक के गुण, समय-ज्ञान और मृदा-परीक्षण — सब ‘समर्थ कृषि’ की ही व्याख्या हैं। अतः शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
‘समर्थेन कृषिः कार्या’ का अर्थ क्या है?
समर्थ (योग्य) व्यक्ति द्वारा कृषि की जानी चाहिए — लोगों के हित की इच्छा से।
कौटिल्य ने कृषि को किस विद्या में रखा?
वार्ता विद्या में।
प्राचीन मृदा-परीक्षण कैसे होता था?
मिट्टी सूँघकर, जल चखकर, मिट्टी तोलकर और जल में डालकर एक घटी बाद देखकर।
एक घटी कितने समय की होती है?
24 मिनट।
अन्न के चार प्रकार कौन-से हैं?
व्रीह्यादि (धान्य), मुद्गमाषादि (दालें), शाकादि (सब्जियाँ), लताकुसुमादि (फल-फूल)।
✍️ प्रस्तुति: मनोज शर्मा (हिंदी-संस्कृत शिक्षक) — यह लेख NCERT कक्षा 9 संस्कृत पाठ्यपुस्तक “ऋषिकुल्या” पर आधारित अध्ययन-सामग्री है। मूल पाठ के लिए पाठ्यपुस्तक अवश्य पढ़ें।
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