पाठ परिचय
प्राचीन भारत के अध्ययन-विषयों में नीतिशास्त्र का विशेष महत्त्व है, जो धर्मशास्त्र का ही एक अंग माना जाता है। नीतिशास्त्र के साहित्य में शुक्रनीति एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है, जिसकी रचना शुक्राचार्य ने की। इसमें राज्य-व्यवस्था, दण्डनीति, अर्थनीति, प्रजापालन, शिक्षा-व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था का निरूपण है। लोक-कल्याण, सुशासन और आदर्श समाज की स्थापना के लिए यह ग्रन्थ मार्गदर्शक है।
प्रस्तुत पाठ शुक्रनीति के चौथे अध्याय के तीसरे प्रकरण से संकलित है। इसमें बताया गया है कि गुरु कौन बन सकता है, विद्या और कला में क्या अन्तर है, तथा 32 विद्याओं (वेद, उपवेद, वेदाङ्ग, दर्शन आदि) के नाम क्या हैं। अन्त में धर्मपरायण, नीतिमान राजा की कीर्ति का वर्णन है।
📌 स्रोत: शुक्रनीति (अध्याय 4, प्रकरण 3) | रचयिता: शुक्राचार्य | छन्द: अनुष्टुप् | श्लोक: 10
मूल पाठ का सरलार्थ (हिंदी)
श्लोक 1 – गुरु कौन?
योऽधीतविद्यः सकलः स सर्वेषां गुरुर्भवेत् ।
न च जात्यानधीती यो गुरुर्भवितुमर्हति ॥१॥
अन्वय: यः सकलः अधीतविद्यः सः सर्वेषां गुरुः भवेत्। यः अनधीती (सः) जात्या गुरुः भवितुं न अर्हति।
अर्थ: जिसने सम्पूर्ण विद्याओं (और कलाओं) का भली-भाँति अध्ययन किया है, वही सबका गुरु बन सकता है। जिसने विद्या ग्रहण नहीं की, वह केवल जन्म (जाति) के आधार पर गुरु बनने योग्य नहीं होता। — योग्यता ज्ञान से है, जन्म से नहीं।
श्लोक 2 – विद्या-कला अनन्त
विद्या ह्यनन्ताश्च कलाः संख्यातुं नैव शक्यते ।
विद्या मुख्याश्च द्वात्रिंशच्चतुःषष्टिः कलाः स्मृताः ॥२॥
अर्थ: विद्याएँ और कलाएँ अनन्त हैं, उन्हें गिनना सम्भव ही नहीं। फिर भी स्थूल रूप से मुख्य विद्याएँ 32 और कलाएँ 64 मानी गई हैं।
श्लोक 3 – विद्या और कला का लक्षण
यद्यत्स्याद्वाचिकं सम्यक्कर्म विद्याभिसंज्ञकम् ।
शक्तो मूकोऽपि यत्कर्तुं कलासंज्ञं तु तत्स्मृतम् ॥३॥
अर्थ: जो-जो कार्य वाणी द्वारा भली-भाँति सम्पन्न होता है, वह ‘विद्या’ कहलाता है; और जिस कार्य को गूँगा व्यक्ति भी करने में समर्थ हो (अर्थात् जो हाथ आदि के कौशल से हो), वह ‘कला’ कहलाती है।
श्लोक 4
उक्तं संक्षेपतो लक्ष्म विशिष्टं पृथगुच्यते ।
विद्यानां च कलानां च नामानि तु पृथक् पृथक् ॥४॥
अर्थ: विद्याओं और कलाओं का लक्षण संक्षेप में कह दिया गया; अब उनके विशिष्ट नाम अलग-अलग बताए जाते हैं।
श्लोक 5 – वेद और उपवेद
ऋग्यजुःसाम चाथर्व वेदा आयुर्धनुः क्रमात् ।
गान्धर्वश्चैव तन्त्राणि उपवेदाः प्रकीर्तिताः ॥५॥
अर्थ: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद — ये चार वेद हैं। क्रमशः आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद (संगीत) और तन्त्र — ये चार उपवेद कहे गए हैं। (पाठ्यपुस्तक की तालिका में चौथा उपवेद अर्थवेद/स्थापत्यवेद भी दिया है।)
श्लोक 6 – छह वेदाङ्ग
शिक्षा व्याकरणं कल्पो निरुक्तं ज्यौतिषं तथा ।
छन्दः षडङ्गानीमानि वेदानां कीर्तितानि हि ॥६॥
अर्थ: शिक्षा, व्याकरण, कल्प, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द — ये वेदों के छह अंग (वेदाङ्ग) कहे गए हैं।
श्लोक 7-8 – अन्य विद्याएँ
मीमांसातर्कसांख्यानि वेदान्तो योग एव च ।
इतिहासाः पुराणानि स्मृतयो नास्तिकं मतम् ॥७॥
अर्थशास्त्रं कामशास्त्रं तथा शिल्पमलङ्कृतिः ।
काव्यानि देशभाषाऽवसरोक्तिर्यावनं मतम् ॥८॥
अर्थ: मीमांसा, तर्क (न्याय), सांख्य, वेदान्त, योग, इतिहास, पुराण, स्मृतियाँ, नास्तिक मत, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, शिल्पशास्त्र, अलंकारशास्त्र, काव्य, देशभाषा, अवसरोक्ति (अवसर के अनुकूल बोलने की कला) और यावन मत (विदेशी विद्या) — ये भी विद्याएँ हैं।
श्लोक 9 – 32 विद्याएँ पूरी
देशादिधर्मा द्वात्रिंशदेता विद्याभिसंज्ञिताः ।
स्वस्वधर्मपरो लोको यस्य राष्ट्रे प्रवर्तते ॥९॥
अर्थ: देश आदि के धर्म (स्थानीय रीति-रिवाज) — इनके साथ ये 32 विद्याएँ कहलाती हैं। (आगे) जिस राजा के राष्ट्र में लोग अपने-अपने धर्म (कर्तव्य) में तत्पर रहते हैं…
श्लोक 10 – धर्मनीतिपरायण राजा
धर्मनीतिपरो राजा चिरं कीर्तिं स चाश्नुते ।
भूमौ यावद्यस्य कीर्तिस्तावत्स्वर्गे स तिष्ठति ॥१०॥
अर्थ: …और जो राजा धर्म और नीति में तत्पर रहता है, वह दीर्घकाल तक कीर्ति प्राप्त करता है। जब तक पृथ्वी पर उसकी कीर्ति रहती है, तब तक वह स्वर्ग में निवास करता है।
व्याकरण विशेष
1. अनुष्टुप् छन्द
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम् ।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥
लक्षण: अनुष्टुप् में 4 चरण, प्रत्येक में 8 अक्षर (कुल 32)। चारों चरणों में छठा अक्षर गुरु और पाँचवाँ लघु होता है। दूसरे और चौथे चरण में सातवाँ अक्षर लघु, तथा पहले-तीसरे चरण में सातवाँ अक्षर दीर्घ होता है।
उदाहरण: अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
ध्यान दें: ‘योऽधीतविद्यः सकलः’ जैसे कुछ प्रयोगों में इस लक्षण का अपवाद मिलता है।
2. वैदिक वाङ्मय की झलक
वाङ्मय दो प्रकार का — शास्त्र और काव्य। शास्त्र भी दो प्रकार का — अपौरुषेय (श्रुति) और पौरुषेय। श्रुति (वेद) के चार भाग — संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्। संहिता में मन्त्रों का संग्रह, ब्राह्मणों में मन्त्रों की व्याख्या व यज्ञ-विधि, उपनिषदों में गूढ़ तत्त्वों का निरूपण है।
| वेदाङ्ग | कार्य |
| शिक्षा | वर्णों के उच्चारण-स्थान, प्रयत्न आदि सिखाती है |
| कल्प | यज्ञ-कर्मों की विधि बताता है |
| व्याकरण | शब्दों की शुद्धता-अशुद्धता का ज्ञान कराता है |
| निरुक्त | शब्दों की व्युत्पत्ति और अर्थ स्पष्ट करता है |
| छन्द | वैदिक छन्दों का ज्ञान देता है |
| ज्योतिष | काल, ग्रह, नक्षत्र का ज्ञान देता है |
3. 32 विद्याओं की गणना
4 वेद + 4 उपवेद + 6 वेदाङ्ग = 14; मीमांसा, तर्क, सांख्य, वेदान्त, योग, इतिहास, पुराण, स्मृति, नास्तिक मत, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, शिल्प, अलंकृति, काव्य, देशभाषा, अवसरोक्ति, यावन मत, देशादिधर्म = 18। कुल 32।
पाठ्यपुस्तक अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
प्रश्न 1. पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) कः सर्वेषां गुरुः भवेत् ?
यः सकलः अधीतविद्यः (सम्पूर्णविद्याध्ययनं कृतवान्) सः सर्वेषां गुरुः भवेत्।
(ख) कीदृशः राजा चिरं कीर्तिम् अश्नुते ?
धर्मनीतिपरः राजा चिरं कीर्तिम् अश्नुते।
(ग) वेदाङ्गानि कानि सन्ति ?
शिक्षा, व्याकरणं, कल्पः, निरुक्तं, ज्यौतिषं, छन्दः च इति षड् वेदाङ्गानि सन्ति।
(घ) किं कलासंज्ञकं स्मृतम् ?
यत् कर्म मूकः अपि कर्तुं शक्तः, तत् कलासंज्ञकं स्मृतम्।
(ङ) काः संख्यातुं नैव शक्यन्ते ?
अनन्ताः विद्याः कलाः च संख्यातुं नैव शक्यन्ते।
(च) किं कर्म विद्याभिसंज्ञकम् ?
यत् यत् वाचिकं कर्म सम्यक् स्यात्, तत् विद्याभिसंज्ञकम्।
प्रश्न 2. मेलनं कुरुत
(ग) व्याकरणम्
(४) वेदाङ्गम्
(घ) अर्थशास्त्रम्
(१) विद्यास्थानम्
(ङ) शुक्रनीतिः
(३) नीतिशास्त्रग्रन्थः
प्रश्न 3. सर्वनामानि परिचिनुत
(क) न च जात्यानधीती यः गुरुः भवितुमर्हति ।
यः
(ख) शक्तो मूकोऽपि यत् कर्तुं कलासंज्ञं तु तत् स्मृतम् ।
यत्, तत्
(ग) देशादिधर्मा द्वात्रिंशत् एताः विद्याभिसंज्ञिताः ।
एताः
(घ) स्वस्वधर्मपरो लोको यस्य राष्ट्रे प्रवर्तते ।
यस्य (स्व – आत्मवाचक)
(ङ) धर्मनीतिपरो राजा चिरं कीर्तिं स चाश्नुते ।
सः
(च) भूमौ यावद् यस्य कीर्तिस्तावत्स्वर्गे स तिष्ठति ।
यस्य, सः
प्रश्न 4. सन्धिविच्छेदं कुरुत
(क) योऽधीतविद्यः
यः + अधीतविद्यः
(ख) स चाश्नुते
सः + च + अश्नुते
(ग) वेदान्तो योग एव
वेदान्तः + योगः + एव
(ङ) कीर्तिस्तावत्
कीर्तिः + तावत्
(च) स तिष्ठति
सः + तिष्ठति
(छ) पृथगुच्यते
पृथक् + उच्यते
प्रश्न 6. समस्तपदानि लिखत
(क) स्वधर्मे परः
स्वधर्मपरः
(ख) देशादीनां धर्माः
देशादिधर्माः
(ग) मीमांसा च तर्कः च साङ्ख्यं च
मीमांसातर्कसाङ्ख्यानि
(घ) विद्या अभिसंज्ञा यस्य तत्
विद्याभिसंज्ञकम्
25 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
1. ‘योऽधीतविद्यः…’ पाठ किस ग्रन्थ से संकलित है?
- (क) चाणक्यनीति
- (ख) शुक्रनीति
- (ग) विदुरनीति
- (घ) पञ्चतन्त्र
उत्तर देखें
(ख) शुक्रनीति2. शुक्रनीति के रचयिता कौन हैं?
- (क) बृहस्पति
- (ख) शुक्राचार्य
- (ग) कौटिल्य
- (घ) मनु
उत्तर देखें
(ख) शुक्राचार्य3. पाठ शुक्रनीति के किस अध्याय से लिया गया है?
- (क) प्रथम
- (ख) द्वितीय
- (ग) चतुर्थ
- (घ) पञ्चम
उत्तर देखें
(ग) चतुर्थ4. सबका गुरु कौन बन सकता है?
- (क) धनवान्
- (ख) उच्च कुल में जन्मा
- (ग) सकल विद्याओं का अध्येता
- (घ) राजा
उत्तर देखें
(ग) सकल विद्याओं का अध्येता5. मुख्य विद्याएँ कितनी हैं?
- (क) चतुःषष्टिः
- (ख) द्वात्रिंशत्
- (ग) अष्टादश
- (घ) षट्
उत्तर देखें
(ख) द्वात्रिंशत्6. कलाएँ कितनी मानी गई हैं?
- (क) 32
- (ख) 64
- (ग) 18
- (घ) 14
उत्तर देखें
(ख) 647. जो कर्म मूक भी कर सके, वह क्या है?
- (क) विद्या
- (ख) कला
- (ग) वेद
- (घ) स्मृति
उत्तर देखें
(ख) कला8. वाचिक कर्म को क्या कहते हैं?
- (क) कला
- (ख) विद्या
- (ग) शिल्प
- (घ) नीति
उत्तर देखें
(ख) विद्या9. इनमें से उपवेद कौन-सा है?
- (क) व्याकरणम्
- (ख) आयुर्वेदः
- (ग) निरुक्तम्
- (घ) सामवेदः
उत्तर देखें
(ख) आयुर्वेदः10. ‘गान्धर्व’ उपवेद किससे सम्बन्धित है?
- (क) युद्ध
- (ख) संगीत
- (ग) चिकित्सा
- (घ) ज्योतिष
उत्तर देखें
(ख) संगीत11. धनुर्वेद किस विद्या से सम्बन्धित है?
- (क) शस्त्र/युद्ध-विद्या
- (ख) संगीत
- (ग) आयुर्वेद
- (घ) काव्य
उत्तर देखें
(क) शस्त्र/युद्ध-विद्या12. वेदाङ्ग कितने हैं?
- (क) चार
- (ख) पाँच
- (ग) छह
- (घ) आठ
उत्तर देखें
(ग) छह13. शब्दों की व्युत्पत्ति कौन-सा वेदाङ्ग बताता है?
- (क) शिक्षा
- (ख) निरुक्त
- (ग) कल्प
- (घ) छन्द
उत्तर देखें
(ख) निरुक्त14. उच्चारण-स्थान का ज्ञान कौन-सा वेदाङ्ग देता है?
- (क) शिक्षा
- (ख) ज्योतिष
- (ग) कल्प
- (घ) निरुक्त
उत्तर देखें
(क) शिक्षा15. यज्ञ-विधि किस वेदाङ्ग का विषय है?
- (क) कल्प
- (ख) व्याकरण
- (ग) छन्द
- (घ) शिक्षा
उत्तर देखें
(क) कल्प16. ‘अवसरोक्तिः’ का अर्थ है —
- (क) अवसर के अनुसार कही गई बात
- (ख) अवसर गँवाना
- (ग) कविता
- (घ) कहानी
उत्तर देखें
(क) अवसर के अनुसार कही गई बात17. ‘यावनं मतम्’ से अभिप्राय है —
- (क) वेदमत
- (ख) विदेशी विद्या
- (ग) जैन मत
- (घ) बौद्ध मत
उत्तर देखें
(ख) विदेशी विद्या18. कौन-सा राजा चिरकाल तक कीर्ति पाता है?
- (क) धनी
- (ख) धर्मनीतिपरः
- (ग) युद्धप्रिय
- (घ) आलसी
उत्तर देखें
(ख) धर्मनीतिपरः19. ‘अधीतविद्यः’ में कौन-सा समास है?
- (क) तत्पुरुष
- (ख) बहुव्रीहि
- (ग) द्वन्द्व
- (घ) कर्मधारय
उत्तर देखें
(ख) बहुव्रीहि20. ‘अनधीती’ में कौन-सा समास है?
- (क) नञ् तत्पुरुष
- (ख) बहुव्रीहि
- (ग) द्विगु
- (घ) अव्ययीभाव
उत्तर देखें
(क) नञ् तत्पुरुष21. ‘योऽधीतविद्यः’ का सन्धि-विच्छेद —
- (क) यो + अधीतविद्यः
- (ख) यः + अधीतविद्यः
- (ग) य + अधीतविद्यः
- (घ) यः + ऽधीतविद्यः
उत्तर देखें
(ख) यः + अधीतविद्यः22. ‘पृथगुच्यते’ का सन्धि-विच्छेद —
- (क) पृथग् + उच्यते
- (ख) पृथक् + उच्यते
- (ग) पृथ + गुच्यते
- (घ) पृथक + उच्यते
उत्तर देखें
(ख) पृथक् + उच्यते23. पाठ के श्लोक किस छन्द में हैं?
- (क) इन्द्रवज्रा
- (ख) अनुष्टुप्
- (ग) वसन्ततिलका
- (घ) उपजाति
उत्तर देखें
(ख) अनुष्टुप्24. अनुष्टुप् में प्रत्येक चरण में कितने अक्षर होते हैं?
- (क) आठ
- (ख) ग्यारह
- (ग) बारह
- (घ) चौदह
उत्तर देखें
(क) आठ25. वेद के चार भागों में कौन नहीं है?
- (क) संहिता
- (ख) ब्राह्मण
- (ग) उपनिषद्
- (घ) पुराण
उत्तर देखें
(घ) पुराण
20 अति लघु उत्तरीय प्रश्न
1. नीतिशास्त्र किस शास्त्र का अङ्ग है?
धर्मशास्त्र का।
2. शुक्रनीति में किन विषयों का निरूपण है?
राज्यव्यवस्था, दण्डनीति, अर्थनीति, प्रजापालन, शिक्षा व समाज-व्यवस्था।
3. कौन गुरु बनने योग्य नहीं है?
जिसने विद्या ग्रहण नहीं की (अनधीती), भले ही जन्म से उच्च हो।
4. चार वेदों के नाम लिखिए।
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद।
5. चार उपवेदों के नाम लिखिए।
आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद, तन्त्र (अर्थवेद/स्थापत्यवेद)।
6. छह दर्शनों के नाम लिखिए।
न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त।
7. तीन स्मृतियों के नाम लिखिए।
मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, पराशरस्मृति।
8. ‘मूकः’ का अर्थ लिखिए।
गूँगा (जो बोल न सके)।
9. ऋग्वेद में क्या है?
ऋचाएँ (स्तुति-मन्त्र)।
10. सामवेद में क्या है?
गेय (गाए जाने वाले) मन्त्र।
11. यजुर्वेद में किस प्रकार के मन्त्र हैं?
यज्ञ-कर्म सम्बन्धी मन्त्र।
12. श्रुति किसे कहते हैं?
अपौरुषेय शास्त्र — वेद को।
13. उपनिषदों में क्या निरूपित है?
गूढ़ (आध्यात्मिक) तत्त्व।
14. ‘देशादिधर्माः’ का अर्थ लिखिए।
देश आदि के रीति-रिवाज।
15. राजा स्वर्ग में कब तक रहता है?
जब तक पृथ्वी पर उसकी कीर्ति रहती है।
16. ज्योतिष वेदाङ्ग किसका ज्ञान देता है?
काल, ग्रह, नक्षत्र आदि का।
17. ‘अर्हति’ में कौन-सा धातु है?
√अर्ह् (योग्य होना)।
18. ‘अश्नुते’ का अर्थ लिखिए।
प्राप्त करता है।
19. व्याकरण वेदाङ्ग का कार्य क्या है?
शब्दों की शुद्धता-अशुद्धता का ज्ञान कराना।
20. ‘चतुःषष्टिः’ का अर्थ क्या है?
चौंसठ (64)।
20 लघु उत्तरीय प्रश्न
1. पाठ के अनुसार गुरु बनने की योग्यता क्या है?
जिसने सभी विद्याओं और कलाओं का भली-भाँति अध्ययन किया हो, वही गुरु बनने योग्य है। केवल ऊँचे कुल या जाति में जन्म लेने से कोई गुरु नहीं बनता।
2. विद्या और कला में क्या अन्तर है?
जो कर्म वाणी के द्वारा सम्यक् रूप से सम्पन्न हो वह विद्या है (जैसे वेद, व्याकरण)। जो कर्म गूँगा व्यक्ति भी कर सके, अर्थात् हाथ आदि के कौशल से हो, वह कला है (जैसे चित्रकारी, शिल्प)।
3. ‘विद्या ह्यनन्ताश्च कलाः…’ श्लोक का भाव लिखिए।
विद्याएँ और कलाएँ अनगिनत हैं, उनकी गणना सम्भव नहीं। फिर भी सुविधा के लिए मुख्य 32 विद्याएँ और 64 कलाएँ मानी गई हैं।
4. उपवेदों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
आयुर्वेद – चिकित्सा-विज्ञान; धनुर्वेद – शस्त्र व युद्ध-विद्या; गान्धर्ववेद – संगीत-शास्त्र; तन्त्र/अर्थवेद/स्थापत्यवेद – तन्त्र, अर्थ व वास्तु सम्बन्धी विद्या।
5. छह वेदाङ्गों के कार्य बताइए।
शिक्षा – उच्चारण; कल्प – यज्ञ-विधि; व्याकरण – शब्द-शुद्धि; निरुक्त – व्युत्पत्ति व अर्थ; छन्द – छन्द-ज्ञान; ज्योतिष – काल व ग्रह-नक्षत्र का ज्ञान।
6. श्लोक 7-8 में वर्णित विद्याओं के नाम लिखिए।
मीमांसा, तर्क, सांख्य, वेदान्त, योग, इतिहास, पुराण, स्मृति, नास्तिक मत, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, शिल्प, अलंकृति, काव्य, देशभाषा, अवसरोक्ति, यावन मत।
7. पाठ में ‘अवसरोक्ति’ को विद्या क्यों माना गया है?
सही अवसर पर, परिस्थिति के अनुकूल उचित बात कहना एक विशेष कौशल है। यह वाणी से सम्बन्धित है, इसलिए इसे विद्या माना गया।
8. ‘यावनं मतम्’ और ‘देशभाषा’ को विद्या में गिनने से क्या संकेत मिलता है?
इससे पता चलता है कि प्राचीन भारतीय शिक्षा उदार थी — विदेशी ज्ञान और स्थानीय भाषाओं को भी सम्मान से सीखा जाता था।
9. धर्मनीतिपरायण राजा का वर्णन कीजिए।
जिस राजा के राज्य में प्रजा अपने-अपने कर्तव्य में लगी रहती है और जो स्वयं धर्म व नीति का पालन करता है, वह लम्बे समय तक कीर्ति पाता है; उसकी कीर्ति रहने तक वह स्वर्ग में रहता है।
10. ‘न च जात्यानधीती यो गुरुर्भवितुमर्हति’ का आज के संदर्भ में महत्त्व लिखिए।
आज भी शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर आदि पद योग्यता व ज्ञान से मिलते हैं, जन्म से नहीं। यह पंक्ति समता और योग्यता-आधारित व्यवस्था का समर्थन करती है।
11. वैदिक वाङ्मय के विभाजन को स्पष्ट कीजिए।
वाङ्मय — शास्त्र और काव्य। शास्त्र — अपौरुषेय (श्रुति) और पौरुषेय। श्रुति के चार भाग — संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्।
12. अनुष्टुप् छन्द का लक्षण लिखिए।
चार चरण, प्रत्येक में 8 अक्षर। सभी चरणों में छठा अक्षर गुरु, पाँचवाँ लघु; दूसरे-चौथे चरण में सातवाँ लघु और पहले-तीसरे में सातवाँ दीर्घ।
13. ‘अधीतविद्यः’ और ‘विद्याभिसंज्ञकम्’ का विग्रह लिखिए।
अधीतविद्यः – अधीता विद्या येन सः (बहुव्रीहि); विद्याभिसंज्ञकम् – विद्या इति अभिसंज्ञा यस्य तत् (बहुव्रीहि)।
14. ‘स्वस्वधर्मपरो लोकः’ का भावार्थ लिखिए।
अपने-अपने कर्तव्य में तत्पर रहने वाले लोग। ऐसे लोग जिस राष्ट्र में हों, वह राष्ट्र श्रेष्ठ बनता है।
15. पाठ में दर्शन-शास्त्रों का उल्लेख किस रूप में है?
श्लोक 7 में मीमांसा, तर्क, सांख्य, वेदान्त, योग का उल्लेख है; तालिका में छह आस्तिक दर्शन — न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त दिए हैं।
16. ब्राह्मण-ग्रन्थों और संहिता में क्या अन्तर है?
संहिता में मन्त्रों का संग्रह है, जबकि ब्राह्मण-ग्रन्थों में उन मन्त्रों की व्याख्या और यज्ञादि कर्मों का वर्णन है।
17. ‘विद्या ह्यनन्ताश्च’ का सन्धि-विच्छेद लिखिए।
विद्याः + हि + अनन्ताः + च।
18. आपकी दृष्टि में आज कौन-सी चार ‘कलाएँ’ उपयोगी हैं?
चित्रकला, संगीत-वादन, कम्प्यूटर-कौशल (कोडिंग), हस्तशिल्प/सिलाई — क्योंकि इनसे रोजगार और सृजनात्मकता दोनों मिलते हैं।
19. पाठ से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
हमें निरन्तर ज्ञान अर्जित करना चाहिए, क्योंकि सम्मान ज्ञान से मिलता है, जन्म से नहीं; विद्या और कला दोनों का अभ्यास करना चाहिए।
20. शुक्रनीति ग्रन्थ आदर्श समाज के लिए मार्गदर्शक क्यों है?
क्योंकि इसमें लोक-कल्याण, सुशासन, दण्डनीति, अर्थनीति, शिक्षा और प्रजापालन के नियम बताए गए हैं, जो आदर्श समाज की नींव हैं।
10 महत्त्वपूर्ण / दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. ‘योऽधीतविद्यः सकलः स सर्वेषां गुरुर्भवेत्’ पाठ का सारांश लिखिए।
यह पाठ शुक्रनीति से लिया गया है। इसमें कहा गया है कि सम्पूर्ण विद्याओं का अध्येता ही गुरु बनता है, जन्म से नहीं। विद्याएँ-कलाएँ अनन्त हैं, फिर भी 32 विद्याएँ और 64 कलाएँ मुख्य हैं। वाचिक कर्म विद्या है, मूक द्वारा भी सम्भव कर्म कला है। फिर 4 वेद, 4 उपवेद, 6 वेदाङ्ग, दर्शन, इतिहास, पुराण, स्मृति, अर्थशास्त्र, शिल्प, काव्य, देशभाषा, अवसरोक्ति, यावन मत, देशादिधर्म — इन 32 विद्याओं के नाम हैं। अन्त में धर्मनीतिपरायण राजा की अमर कीर्ति का वर्णन है।
2. 32 विद्याओं की सूची बनाकर उनका वर्गीकरण कीजिए।
वेद (4): ऋक्, यजुः, साम, अथर्व। उपवेद (4): आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्व, तन्त्र। वेदाङ्ग (6): शिक्षा, व्याकरण, कल्प, निरुक्त, ज्योतिष, छन्द। अन्य (18): मीमांसा, तर्क, सांख्य, वेदान्त, योग, इतिहास, पुराण, स्मृति, नास्तिक मत, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, शिल्प, अलंकृति, काव्य, देशभाषा, अवसरोक्ति, यावन मत, देशादिधर्म। कुल = 32।
3. ‘गुरु’ की अवधारणा पर पाठ के आधार पर निबन्ध लिखिए।
भारतीय परम्परा में गुरु अज्ञान का अन्धकार दूर करने वाला है। शुक्रनीति स्पष्ट कहती है कि गुरु बनने का अधिकार ज्ञान से है, जन्म से नहीं। जो सब विद्याओं में पारंगत हो, अनुभवी हो, वही सबका गुरु है। यह विचार योग्यता-आधारित समाज का समर्थन करता है और आज की शिक्षा-व्यवस्था में भी पूर्णतः प्रासंगिक है।
4. वेदाङ्गों को ‘वेदों के अंग’ क्यों कहा गया है? विस्तार से लिखिए।
जैसे शरीर अंगों के बिना पूर्ण नहीं, वैसे ही वेदों का सही पठन व अर्थ इन छह के बिना सम्भव नहीं। शिक्षा से शुद्ध उच्चारण, व्याकरण से शुद्ध शब्द, निरुक्त से अर्थ, छन्द से लय, कल्प से यज्ञ-विधि और ज्योतिष से उचित काल का ज्ञान होता है। इसलिए ये वेदों के अंग कहलाते हैं।
5. श्लोक 1 और 3 का पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ लिखिए।
श्लोक 1 — पदच्छेद: यः अधीतविद्यः सकलः सः सर्वेषां गुरुः भवेत्, न च जात्या अनधीती यः गुरुः भवितुम् अर्हति। भावार्थ: समस्त विद्याओं का अध्येता ही गुरु; अनपढ़ जन्म से गुरु नहीं। श्लोक 3 — पदच्छेद: यत् यत् स्यात् वाचिकं सम्यक् कर्म विद्याभिसंज्ञकम्, शक्तः मूकः अपि यत् कर्तुं कलासंज्ञं तु तत् स्मृतम्। भावार्थ: वाणी से सम्पन्न कर्म विद्या; मूक द्वारा भी सम्भव कर्म कला।
6. प्राचीन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था की व्यापकता पर पाठ के आधार पर प्रकाश डालिए।
प्राचीन शिक्षा केवल धार्मिक नहीं थी। उसमें आयुर्वेद (चिकित्सा), धनुर्वेद (रक्षा), गान्धर्व (संगीत), अर्थशास्त्र (अर्थव्यवस्था), शिल्प (तकनीक), ज्योतिष (खगोल), काव्य, देशभाषा और विदेशी विद्या (यावन मत) तक शामिल थे। यहाँ तक कि नास्तिक मत को भी विद्या माना गया। इससे इसकी व्यापकता और उदारता सिद्ध होती है।
7. ‘धर्मनीतिपरो राजा…’ श्लोक का आज के शासन से सम्बन्ध जोड़िए।
आज के लोकतंत्र में भी जो शासक ईमानदार, न्यायप्रिय और नीतियुक्त होते हैं, उन्हें जनता लम्बे समय तक याद रखती है। जिस देश के नागरिक अपने कर्तव्य निभाते हैं और शासक नीति से चलता है, वह देश समृद्ध होता है — यही इस श्लोक का शाश्वत संदेश है।
8. ‘मेरी प्रिय कला’ विषय पर पाठ के लक्षण के आधार पर लेख लिखिए।
मेरी प्रिय कला चित्रकला है। शुक्रनीति के अनुसार जो कर्म मूक भी कर सके वह कला है — चित्रकारी हाथ और रंगों से होती है, बोलने की आवश्यकता नहीं। इससे मन शान्त होता है, एकाग्रता बढ़ती है और भावों की अभिव्यक्ति होती है। यह भारतीय 64 कलाओं में से एक प्रमुख कला है।
9. अनुष्टुप् छन्द का लक्षण उदाहरण सहित समझाइए।
अनुष्टुप् में चार चरण, प्रत्येक 8 अक्षर। लक्षण — ‘श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्। द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥’ उदाहरण — ‘अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।’ यहाँ प्रत्येक चरण में 8 अक्षर, छठा गुरु, पाँचवाँ लघु। रामायण-महाभारत का अधिकांश भाग इसी छन्द में है।
10. पाठ के आधार पर ‘ज्ञान ही श्रेष्ठता का आधार है’ — इस कथन की पुष्टि कीजिए।
पहला श्लोक ही कहता है कि विद्वान ही सबका गुरु है और अज्ञानी जन्म से गुरु नहीं बन सकता। पूरे पाठ में विद्याओं-कलाओं की महिमा है और अन्त में धर्म-नीति (ज्ञान का आचरण) करने वाले राजा की अमर कीर्ति बताई गई है। अतः श्रेष्ठता का आधार जन्म नहीं, ज्ञान और आचरण है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
‘योऽधीतविद्यः’ पाठ का स्रोत क्या है?
शुक्राचार्य रचित शुक्रनीति का चतुर्थ अध्याय, तृतीय प्रकरण।
विद्या और कला की संख्या कितनी है?
मुख्य विद्याएँ 32 और कलाएँ 64।
विद्या और कला का अन्तर एक पंक्ति में बताइए।
वाणी से होने वाला कर्म विद्या, मूक भी जिसे कर सके वह कला।
पाठ के श्लोक किस छन्द में हैं?
अनुष्टुप् छन्द में।
वेदाङ्ग कितने हैं?
छह — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
✍️ प्रस्तुति: मनोज शर्मा (हिंदी-संस्कृत शिक्षक) — यह लेख NCERT कक्षा 9 संस्कृत पाठ्यपुस्तक “ऋषिकुल्या” पर आधारित अध्ययन-सामग्री है। मूल पाठ के लिए पाठ्यपुस्तक अवश्य पढ़ें।
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